अध्याय - 16
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
प्राकृतिक संसाधन :-🔹 वे संसाधन जो हमें प्रकृति ने दिए हैं और जीवों के द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं । जैसे मिट्टी , वायु , जल , कोयला , पेट्रोलियम , वन्य जीवन , वन ।
प्राकृतिक संसाधन के प्रकार :-
👉 समाप्य संसाधन
👉 असमाप्य संसाधन
समाप्य संसाधन :-
🔹 ये बहुत सीमित मात्रा में पाए जाते हैं और समाप्त हो सकते हैं । उदाहरण — कोयला , पेट्रोलियम।
असमाप्य संसाधन :-
🔹 ये असीमित मात्रा में पाए जाते हैं व समाप्त नहीं होंगे । उदाहरण - वायु ।
प्रदूषण :-
🔹 प्राकृतिक संसाधनों का दूषित होना प्रदुषण कहलाता है ।
प्रदुषण के प्रकार : -
👉 ( i ) जल प्रदुषण
👉 ( ii ) मृदा प्रदूषण
👉 ( iii ) वायु प्रदुषण
पर्यावरण समस्याएँ :-
🔹 पर्यावरण समस्याएँ वैश्विक समस्याएँ हैं तथा इनके समाधान अथवा परिवर्तन में हम अपने आपको असहाय पाते हैं । इनके लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं विनियमन हैं तथा हमारे देश में भी पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कानून हैं । अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं ।
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन :- प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखने के लिए इनके प्रबंधन की आवश्यकता होती है ताकि यह अगली कई पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सके और संसाधनों का शोषण न हो ।
🔹 पर्यावरण को बचाने के लिए राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय अधिनियम हैं ।
प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन की आवश्यकता :-
🔹 ( i ) प्राकृतिक संसाधनों के संपोषित विकास लिए |
🔹 ( ii ) विविधता को बचाने के लिए |
🔹 ( iii ) पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए ।
🔹 ( iv ) प्राकृतिक संसाधनों को दूषित होने से बचाने के लिए |
🔹 ( v ) संसाधनों को समाज के सभी वर्गों में उचित वितरण और शोषण से बचाना
संसाधनों के दोहन का अर्थ :-
🔹 जब हम संसाधनों का अंधाधुन उपयोग करते है तो बडी तीव्रता से प्रकृति से इनका हारास होने लगता है । इससे हम पर्यावरण को क्षति पहुँचाते है । जब हम खुदाई से प्राप्त धातु कर निष्कर्षण करते है तो साथ ही साथ अपशिष्ट भी प्राप्त होता है जिनका निपटारा नहीं करने पर पर्यावरण को प्रदूषित करता है । जिसके कारण बहुत सी प्राकृतिक आपदाएँ होती रहती है । ये संसाधन हमारे ही नहीं अपितु अगली कई पिढियों के भी है ।
गंगा कार्य परियोजना :-
🔹 यह कार्ययोजना करोड़ों रूपयों का एक प्रोजेक्ट है । इसे सन् 1985 में गंगा स्तर सुधारने के लिए बनाया गया ।
जल की गुणवत्ता या प्रदूषण मापन हेतु कुछ कारक हैं :-
🔹 ( 1 ) जल का pH जो आसानी से सार्व सूचक की मदद से मापा जा सकता है ।
🔹 ( 2 ) जल में कोलिफार्म जीवाणु ( जो मानव की आंत्र में पाया जाता है ) की उपस्थिति जल का संदूषित होना दिखाता है ।
पर्यावरण को बचाने के लिए पाँच प्रकार के R :-
( 1 ) इनकार :-
🔹 उपयोग न आने वाली वस्तुओं को ना कहना ।
🔹 उदाहरण : सामान खरीदते समय प्लास्टिक थैली को मना करना व अपने स्वयं के थैले में सामान डालो
( 2 ) कम उपयोग :-
🔹 वस्तुओं का कम उपयोग करना ।
🔹 उदाहरण :
क ) आवश्यकता न होन पर पंखे व बल्ब का स्विच बंद करना ।
ख ) टपकते नल को ठीक करना ।
ग ) भोजन को न फेंकना ।
( 3 ) पुनः उपयोग :-
🔹 फेंकन के बदले वस्तु का पुनः उपयोग करना ।
🔹 उदाहरण :
क ) जिस पानी से फल व सब्जी धोए है उसे पौधों में डाल देना
ख ) कपड़े धोने के बाद बचे पानी से फर्श व गाड़ी साफ करना ।
( 4 ) पुनः प्रयोजन :-
🔹 वस्तु को पुनः किसी अन्य कार्य लिए उपयोग करना ।
🔹 उदाहरण : टूटे हुए चीनी मिट्टी के बर्तनों में पौधे उगाना
( 5
) पुनः चक्रण :-
🔹 पुनः चक्रित हो जाने वाली वस्तुओं को अलग करना ।
🔹 उदाहरण : प्लास्टिक , काँच , धातु आदि को कबाड़ी वाले को
👉 पुनः इस्तेमाल / उपयोग , पुनः चक्रण से बेहतर है क्योंकि इसमें ऊर्जा की बचत होती है ।
संपोषित विकास :-
🔹 संपोषित विकास की संकल्पना मनुष्य की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति और विकास के साथ - साथ भावी संतति के लिए संसाधनों का संरक्षण भी करती है ।
संपोषित विकास का उदेश्य :
🔹 ( i ) मनुष्य की वर्तमान आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति एवं विकास को प्रोत्साहित करना ।
🔹 ( ii ) पर्यावरण को नुकसान से बचाना और भावी पीढ़ी के लिए संसाधनों का संरक्षण करना ।
🔹 ( iii ) पर्यावरण संरक्षण के साथ - साथ आर्थिक विकास को बढ़ाना |
प्राकृतिक संसाधनों की व्यवस्था करते समय ध्यान देना होगा:-
🔹 ( 1 ) दीर्घकालिक दृष्टिकोण — ये प्राकृतिक संसाधन भावी पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सके ।
🔹 ( 2 ) इनका वितरण सभी समूहों में समान रूप से हो , न कि कुछ प्रभावशाली लोगों को ही इसका लाभ हो ।
🔹 ( 3 ) अपशिष्टों के सुरक्षित निपटान का भी प्रबन्ध होना चाहिए ।
वन्य एवं वन्य जीवन संरक्षण :-
🔹 वन , जैव विविधता के तप्त स्थल हैं । जैव विविधता को संरक्षित रखना प्राकृतिक संरक्षण के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है क्योंकि विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक स्थायित्व (
ecological balance ) नष्ट हो सकता है ।
जैव विविधता :-
🔹 जैव विविधता किसी एक क्षेत्र में पाई जाने वाली विविध स्पीशीज की संख्या है जैसे पुष्पी पादप , पक्षी , कीट , सरीसृप , जीवाणु आदि ।
तप्त स्थल :-
🔹 ऐसा क्षेत्र जहाँ अनेक प्रकार की संपदा पाई जाती है ।
दावेदार :-
🔹 ऐसे लोग जिनका जीवन , कार्य किसी चीज पर निर्भर हो , वे उसके दावेदार होते हैं ।
वनों के दावेदार :-
🔹 ( i ) स्थानीय लोग : वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं ।
🔹 ( ii ) सरकार और वन विभाग : सरकार और वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं ।
🔹 ( iii ) वन उत्पादों पर निर्भर व्यवसायी : ऐसे छोटे व्यवसायी जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं , परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं करते ।
🔹 ( iv ) वन्य जीव और पर्यावरण प्रेमी : वन जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं ।
👉 कुछ ऐसे उदाहरण जहाँ निवासियों ने वन संरक्षण में मुख्य भूमिका निभाई है ।
( 1 ) खेजरी वृक्ष :-
🔹 अमृता देवी विश्नोई ने 1731 में राजस्थान के जोधपुर के एक गाँव में खेजरी वृक्षों को बचाने के लिए 363 लोगों के साथ अपने आप को बलिदान कर दिया था ।
🔹 भारत सरकार ने जीव संरक्षण के लिए अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा की जो उनकी स्मृति में दिया जाता है ।
( 2 ) चिपको आंदोलन :-
🔹 यह आंदोलन गढ़वाल के ' रेनी ' नाम के गाँव में हुआ था । वहाँ की महिलाएँ उसी समय वन पहुँच गईं जब ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने लगे थे । महिलाएँ पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं और ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोक लिया । यह आंदोलन तीव्रता से बहुत से समुदायों में फैल गया और सरकार को वन संसाधनों के उपयोग के लिए प्राथमिकता निश्चित करने पर पुनः विचार करने पर मजबूर कर दिया ।
( 3 ) पश्चिम बंगाल के वन विभाग ने क्षयित हुए साल के वृक्षों को अराबाड़ी वन क्षेत्र में नया जीवन दिया ।
सभी के लिए जल :-
🔹 जल पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों की मूलभूत आवश्यकता है ।
🔹 वर्षा हमारे लिए जल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है ।
🔹 भारत के कई क्षेत्रों में बाँध , तालाब और नहरें सिंचाई के लिए उपयोग किए जाते हैं ।
बांध :-
🔹 बांध में जल संग्रहण काफी मात्रा में किया जाता है जिसका उपयोग सिंचाई में ही नहीं बल्कि विद्युत उत्पादन में भी किया जाता है ।
🔹 कई बड़ी नदियों के जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए बांध बनाए गए हैं ; जैसे—
👉 ( a ) टिहरी बांध — नदी भगीरथी ( गंगा )
👉 ( b ) सरदार सरोवर बांध - नर्मदा नदी
👉 ( c ) भाखड़ा नांगल बांध — सतलुज नदी ।
बांधों के लाभ :-
🔹 ( 1 ) सिंचाई के लिए पर्याप्त जल सुनिश्चित करना ।
🔹 ( 2 ) विद्युत उत्पादन
🔹 ( 3 ) क्षेत्रों में जल का लगातार वितरण करना ।
बांधों से हानियाँ :-
सामाजिक समस्याएँ :-
🔹 ( 1 ) बड़ी संख्या में किसान एवं आदिवासी विस्थापित होते हैं ।
🔹 ( 2 ) उन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता ।
पर्यावरण समस्याएँ :-
🔹 ( 1 ) वनों का क्षय होता है ।
🔹 ( 2 ) जैव विविधता को हानि होती है ।
🔹 ( 3 ) पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है ।
आर्थिक समस्याएँ :-
🔹 ( 1 ) जनता का अत्यधिक धन लगता है ।
🔹 ( 2 ) उस अनुपात में लाभ नहीं होता ।
जल संग्रहण :-
🔹 इसका मुख्य उद्देश्य है भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास करना ।
वर्षा जल संचयन :-
🔹 वर्षा जल संचयन से वर्षा जल को भूमि के अंदर भौम जल के रूप में संरक्षित किया जाता है ।
🔹 जल संग्रहण भारत में बहुत प्राचीन संकल्पना है ।
🔹 कुछ पुराने जल संग्रहण के तरीके हैं ।
भौम जल के रूप में संरक्षण के लाभ :-
🔹 ( 1 ) पानी का वाष्पीकरण नहीं होता ।
🔹 ( 2 ) यह कुओं को भरता है ।
🔹 ( 3 ) पौधों को नमी पहुँचाता है ।
🔹 ( 4 ) मच्छरों के जनन की समस्या नहीं होती ।
🔹 ( 5 ) यह जंतुओं के अपशिष्ट के संदूषण से सुरक्षित रहता है ।
कोयला और पेट्रोलियम :-
🔹 कोयला और पेट्रोलियम अनविकरणीय प्राकृतिक संसाधन हैं । इन्हें जीवाश्म ईंधन भी कहते हैं ।
🔹 निर्माण ( कोयला ) 300 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी में वनस्पति अवशेषों के अपघटन से कोयले का निर्माण हुआ ।
पेट्रोलियम :-
🔹 पेट्रोलियम का निर्माण समुद्र में रहने वाले जीवों के मृत अवशेषों के अपघटन से हुआ । यह अपघटन उच्च दाब और उच्च ताप के कारण हुआ और पेट्रोलियम के निर्माण में लाखों वर्ष लगे ।
🔹 कोयला और पेट्रोल भविष्य में समाप्त हो जायेंगे ।
( a ) कोयला :- वर्तमान दर से प्रयोग करने पर कोयला अगले 200 वर्ष तक ही उपलब्ध रह सकता है ।
( b ) पेट्रोलियम :- वर्तमान दर से प्रयोग करने पर पेट्रोलियम केवल अगले 40 वर्षों तक ही मिलेगा ।
जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से होने वाली हानियाँ :-
1. वायु प्रदूषण :- कोयले और हाइड्रोकार्बन के दहन से बड़ी मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड , कार्बन डाइऑक्साइड , नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्पन्न होती हैं जो वायु को प्रदूषित करती हैं ।
2. बीमारियाँ :- यह प्रदूषित वायु कई प्रकार की श्वसन समस्याएँ उत्पन्न करती है और कई रोग ; जैसे - दमा , खाँसी का कारण बनती हैं ।
3. वैश्विक ऊष्मण :- जीवाश्म ईंधनों के दहन से CO , गैस उत्पन्न होती है जो ग्रीन हाउस गैस है और विश्व ऊष्मणता उत्पन्न करती है ।
🔹 जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग में मितव्ययता बरतनी चाहिए ।
🔹 ( a ) ये समाप्य और सीमित हैं ।
🔹 ( b ) एक बार समाप्त होने के बाद ये निकट भविष्य में उपलब्ध नहीं हो पायेंगे क्योंकि इनके निर्माण की प्रक्रिया बहुत ही धीमी होती है और उसमें कई वर्ष लगते हैं ।
जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को सीमित करने के उपाय :-
🔹 ( a ) जिन विद्युत उपकरणों का उपयोग नहीं हो रहा हो उनका स्विच बंद करें ।
🔹 ( b ) घरों में CFL का उपयोग करें जिस से बिजली की बचत हो ।
🔹 ( c ) निजी वाहन की अपेक्षा सार्वजनिक यातायात का प्रयोग करना ।
🔹 ( d ) लिफ्ट की अपेक्षा सीढ़ी का उपयोग करना ।
🔹 ( e ) जहाँ हो सके सोलर कुकर का प्रयोग करना ।
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