physics12th विधुत धारा

 विद्युत धारा नोट्स कक्षा 12 electric current notes in hindi physics

विद्युत धारा की परिभाषा क्या है , विधुत धारा मात्रक , विमा तथा दिशा electric current in hindi

 electric current in hindi विद्युत धारा की परिभाषा क्या है विधुत धारा मात्रक , विमा तथा दिशा किसे कहते है ?

परिभाषा: जिस प्रकार जल उच्च तल से निम्न तल की ओर गति करता है , ठीक उसी प्रकार आवेश भी उच्च विद्युत तल (उच्च विद्युत विभव ) से निम्न विद्युत तल (निम्न विभव ) की और गति करता है , आवेश के इस प्रवाह को ही विद्युत धारा कहते है।
परिभाषा : किसी अनुप्रस्थ काट से प्रति एकांक समय में प्रवाहित होने वाले आवेश के मान को विद्युत धारा कहलाती है , माना Q आवेश अनुप्रस्थ काट से t समय में गुजरता है तो परिभाषा से
विद्युत धारा = Q /t
चूँकि हम यहाँ आवेश प्रवाह की बात कर रहे है अतः आवेश धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेशित होगा , अतः हम कह सकते है की धारा के प्रवाह में धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेश योगदान करते है।

विद्युत धारा की दिशा

धन आवेश का प्रवाह उच्च विभव से निम्न विभव की ओर होता है तथा धारा का प्रवाह भी उच्च विभव से निम्न विभव की ओर होता है अतः हम कह सकते है की धन आवेश तथा धारा की दिशा एक ही होती है।
ऋण आवेश का प्रवाह निम्न विभव से उच्च विभव की ओर होता है तथा धारा की दिशा उच्च विभव से निम्न विभव की ओर होती है अतः कह सकते है की ऋण आवेश (इलेक्ट्रॉन ) का प्रवाह धारा की दिशा के विपरीत होता है।
धारा एक अदिश राशि है पर क्यों ?
हमने ऊपर धारा का सूत्र (Q/t ) पढ़ा , इस सूत्र में हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की यहाँ दो राशियाँ रही है 1. आवेश , 2. समय , और दोनों राशियाँ ही अदिश राशियाँ है अतः विद्युत धारा भी अदिश राशि है।

विद्युत धारा का मात्रक तथा विमा

SI (Système international) अंतर्राष्ट्रीय पद्धति में धारा को मूल राशि माना गया है।

धारा का मात्रक = कुलाम /समय  = Cs-1 

 चूँकि अंतर्राष्ट्रीय पद्धति में इसे मूल राशि माना है इसे अंतर्राष्ट्रीय पद्धति में ऐम्पियर कहा है।

अतः धारा का मात्रक ऐम्पियर है।

धारा की विमा = चूँकि यह मूल राशि है इसलिए इसकी विमा A1 होती है।

विद्युत धारा (electric current in hindi) : हम जानते है कि प्रत्येक द्रव का प्रवाह उच्च गुरुत्वीय तल से निम्न गुरुत्वीय तल की ओर होता है ; ऊष्मा का प्रवाह उच्च उष्मीय तल (अर्थात उच्च ताप) से निम्न उष्मीय तल (निम्न ताप) की ओर होता है ; ठीक इसी प्रकार आवेश का प्रवाह भी उच्च विद्युत तल (अर्थात उच्च विभव) से निम्न विद्युत तल (निम्न विभव) की ओर होता है। जिस प्रकार द्रवों के प्रवाह की दर को द्रव-धारा कहते है ; ऊष्मा के प्रवाह की दर को उष्मीय धारा कहते है , ठीक इसी प्रकार विद्युत आवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते है।

धन आवेश का प्रवाह उच्च विभव से निम्न विभव की तरफ होता है अत: धनावेश के प्रवाह की दिशा ही (परम्परा के अनुसार) विद्युत धारा की दिशा होती है।

ऋण आवेश का प्रवाह निम्न विभव से उच्च विभव की ओर होता है इसलिए धारा की दिशा ऋण आवेश की गति के विपरीत दिशा में होती है। इस प्रकारआवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते है। ”

नोट :

§  धारा , जो उच्च विभव (धनात्मक विभव) से निम्न विभव (ऋणात्मक विभव) की ओर बहती है , परंपरागत धारा कहलाती है।

§  किसी चालक के अनुप्रस्थ परिच्छेद से t सेकंड में यदि धनावेश q1 बिंदु A से B की ओर तथा ऋणात्मक आवेश q2 बिंदु B से A की ओर बहता है तो चालक से प्रवाहित कुल धारा

I = q1/t  + q2/t

होगी जिसकी दिशा A से B की ओर होगी।

§  धारा की दिशा : धनात्मक आवेश के प्रवाह की दिशा में

§  धारा की दिशा : ऋणात्मक आवेश के प्रवाह के विपरीत दिशा में अर्थात इलेक्ट्रॉन की गति के विपरीत दिशा में।

यदि किसी चालक के परिच्छेद से q आवेश प्रवाहित होने में t सेकंड का समय लगता है तो चालक में प्रवाहित विद्युत धारा

i = q/t

SI पद्धति में विद्युत धारा एक मूल राशि है अत: इसका मात्रक मूल मात्रक होता है।

i का मात्रक = कूलाम/सेकंड  = Cs-1 = एम्पियर

1 A = 1 Cs-1

एक एम्पियर की परिभाषा

यदि q = 1C , t = 1 sec. तो i = 1 A

अर्थात यदि किसी बंद परिपथ में किसी स्थान से 1 सेकंड में 1 कुलाम आवेश प्रवाहित होता है तो परिपथ में बहने वाली धारा 1A (एक एम्पियर) होगी।

एक कूलाम आवेश में इलेक्ट्रॉन की संख्या

q = ne से

n = q/e = 1/1.6 x 10-19 = 6.25 x 1018

चूँकि 1 कूलाम 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉनों के आवेश के तुल्य है अत: 1 एम्पियर धारा का तात्पर्य है चालक के परिच्छेद से एक सेकंड में 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉनों का बहना अथवा गुजरना।

अत: 1A = 1 Cs-1 = 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉन/सेकंड

नोट : विद्युत धारा जो आकाशीय बिजली गिरते समय बहती है अर्थात तड़ित धारा दसियों हजार एम्पियर की कोटि की होती है जबकि हमारी धमनियों में बहने वाली धारा माइक्रोएम्पियर की कोटि की होती है।

यदि किसी चालक में प्रवाहित आवेश की दर समय के साथ नहीं बदलती है जो धारा को स्थायी धारा कहते है। यहाँ ध्यान रखने की बात यह है कि स्थायी धारा चाल के सभी परिच्छेदों के लिए समान होगी।

यदि किसी परिपथ में किसी स्थान से t सेकंड में n इलेक्ट्रॉन गुजरते है तो धारा

i = q/t = ne/t एम्पियर

इसी प्रकार यदि t सेकंड में ऐसे n आयन बह रहे हो जिनमें प्रत्येक पर आवेश 2e हो (जैसे आदि। )

तो धारा i = n x 2e/t  एम्पियर

विद्युत धारा एक अदिश राशि है (electric current is a scalar quantity)

दिष्ट धारा परिपथों में धारा की दिशा यद्यपि प्रदर्शित की जाती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि विद्युत धारा सदिश राशि है। वास्तव में वैद्युत धारा अदिश राशि है। इसका कारण यह है कि विद्युत धारा दिशा होते हुए भी वेक्टर योग के नियम का पालन नहीं करती है। दो वेक्टरों का योग उनके परिमाणों के साथ साथ उनके मध्य कोण पर भी निर्भर करता है जबकि दो धाराओं का योग उनके मध्य कोण पर निर्भर नहीं करता है।

दोनों चित्रों में i + i2 = 8A ही मिलता है जबकि i1 और i2 के मध्य दोनों चित्रों में कोण भिन्न है। इस प्रकारपरिमाणों और दिशा दोनों होते हुए भी विद्युत धारा अदिश राशि है।

स्पष्ट है कि परिपथ आरेख में प्रदर्शित धारा की दिशा मात्र धनावेश की गति की दिशा व्यक्त करती है।

धारा घनत्व क्या है , परिभाषा , मात्रक , विमा current density in hindi धारा घनत्व किसे कहते है , विमीय सूत्र

(current density in hindi) धारा घनत्व क्या है , परिभाषा , मात्रक , विमा , धारा घनत्व किसे कहते है , विमीय सूत्र ?

धारा घनत्व की परिभाषा : किसी एकांक अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल से प्रवाहित धारा के मान को धारा घनत्व कहते है , यह एक सदिश राशि है तथा इसकी दिशा धारा की दिशा में होती है इसको प्राय: J से व्यक्त किया जाता है।

माना चित्रानुसार एक तार दिया गया है जिसका अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है , इसमें I धारा प्रवाहित हो रही है अतः धारा घनत्व परिभाषा से

J = I/A

चूँकि हमने बताया की धारा घनत्व की दिशा धारा की दिशा में होती है और धारा की दिशा धनावेश प्रवाह की दिशा में और ऋणावेश (इलेक्ट्रॉनके प्रवाह के विपरीत होता है

अतः

धारा घनत्व भी धनावेश के प्रवाह की दिशा में तथा ऋण आवेश (इलेक्ट्रॉनप्रवाह की दिशा के विपरीत दिशा में होता है।

ऊपर हमने यह माना है की क्षेत्रफल तथा धारा आपस में लंबवत है।

यदि क्षेत्रफल (A) , धारा के लंबवत हो और किसी कोण θ पर स्थित हो तो इस स्थिति में धारा घनत्व

जैसा चित्र में दिखाया गया है की क्षेत्रफल A , धारा से θ कोण पर रखा है इस स्थिति में

J = I/cosθ

यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है की विधुत धारा एक अदिश राशि है लेकिन धारा घनत्व एक सदिश राशि है। 

 

 धारा घनत्व का मात्रक तथा विमा :

हम पढ़ चुके है की J = I/A

J का मात्रकA/m2 = Am-2

J का विमीय सूत्रA1/L2 = [M0 L-2 T0 A1 ]

नोट : यदि अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल भिन्न भिन्न हो तो धारा का मान समान रहता है क्योंकि धारा का मान अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (A) पर निर्भर नहीं करता लेकिन यदि अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल भिन्न भिन्न  है तो धारा घनत्व का मान भी भिन्न भिन्न होगा क्योंकि यह A पर निर्भर करता है।

धारा घनत्व (current density in hindi) : एकांक अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल से होकर बहने वाली धारा को धारा घनत्व कहते है।

धारा घनत्व को J से व्यक्त करते है। यह सदिश राशि है जिसकी दिशा धारा की दिशा में होती है। यदि A अनुप्रस्थ क्षेत्रफल वाले चालक में i धारा बहती है तो धारा घनत्व

J = i/A

लेकिन यदि चालक का परिच्छेद क्षेत्रफल धारा के लम्बवत नहीं है बल्कि अभिलम्ब से θ कोण बनाता है तो धारा घनत्व के लिए परिच्छेद क्षेत्रफल A का धारा के अभिलम्बवत घटक An लेना होगा।

An = A cosθ

धारा घनत्व J = i/An  = i/A cosθ

अथवा

J = i/A cosθ

मात्रक और विमीय सूत्र

चूँकि J = i/A

J का मात्रक = A/m2 = Am-2

और J का विमीय सूत्र = A1/L2 = [M0L-2T0A1]

आंकिक प्रश्न और हल

उदाहरण : यदि किसी चालक के अनुप्रस्थ परिच्छेद से एक मिली सेकंड में एक मिलियन इलेक्ट्रॉन गुजरते है तो चालक से प्रवाहित धारा कितनी होगी ?

हल : q = ne = 106 e = 106 x 1.6 x 10-19

q = 1.6 x 10-13 कूलाम

t = 1 मिली सेकंड

= 1 x 10-3 सेकंड

धारा I = q/t = 1.6 x 10-13/1x 10-3

I = 1.6 x 10-10 एम्पियर

उदाहरण : बिंदु A से B की ओर 1016 इलेक्ट्रॉन 10-3 सेकंड में प्रवाहित होते है। कितनी धारा किस दिशा में प्रवाहित हो रही है ?

हल : q = ne = 1016 x 1.6 x 10-19

= 1.6 x 10-3 C

t = 10-3 s

I = q/t = 1.6 x 10-3/10-3 = 1.6 एम्पियर , B से A की ओर

उदाहरण : ताम्बे के तार की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 3 x 10-4 मीटर2 है। इसमें 4.8 एम्पियर की धारा बह रही है .तार में धारा घनत्व ज्ञात कीजिये।

हल : A = 3 x 10-4 m2 , I = 4.8 A

धारा घनत्व j = I/A = 4.8/3×10-4

J = 1.6 x 104 Am2

चालक में विद्युत धारा का प्रवाह (flow of electric current in a conductor)

सभी धातुएँ विद्युत की सुचालक होती है। इनमें विद्युत चालन मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा होता है। मुक्त इलेक्ट्रॉन मॉडल के आधार पर चालन की व्याख्या अग्र प्रकार से की जाती है

प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना होता है तथा परमाणु में एक धनावेशित नाभिक के परित: कुछ निश्चित कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन गतिशील रहते है। ये इलेक्ट्रॉन दो प्रकार के होते है

§  समबद्ध इलेक्ट्रॉन और

§  मुक्त इलेक्ट्रॉन

नाभिक के पास वाली कक्षाओं के इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक का नियंत्रण अधिक होता है , ये सामान्यतया अपनी कक्षा नहीं छोड़ सकते है। इन्ही को सम्बद्ध इलेक्ट्रॉन कहते है। इलेक्ट्रॉनों की नाभिक से दूरी जैसे जैसे बढती जाती है , इन पर नाभिक का नियंत्रण कम होता जाता है। आखिरी कक्षा के इलेक्ट्रॉनों पर नियन्त्रण इतना कम हो जाता है कि इन्हें थोड़ी भी ऊर्जा देकर संगत परमाणु से अलग किया जा सकता है। ये इलेक्ट्रॉन ही मुक्त इलेक्ट्रॉन कहलाते है। सामान्य ताप पर भी अनेक इलेक्ट्रॉन मुक्त होकर चालक की परिसीमाओं के अन्दर उसी प्रकार अनियमित गति करते रहते है जिस प्रकार आदर्श गैस के अणु बर्तन के अन्दर गति करते है।

नोट : यदि हम प्रति परमाणु एक मुक्त इलेक्ट्रॉन मान ले तो चालक के 1 m3 में लगभग 1029 मुक्त इलेक्ट्रॉन होंगे।

धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन ही आवेश वाहक का कार्य करते है। इसलिए धातुओं की विद्युत चालकता उनमें उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। जिस धातु में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होती है , उसकी चालकता उतनी ही अधिक होती है। ऐसी धातुएं ही विद्युत की सुचालक होती है। चांदी की चालकता सबसे अधिक होती है। इसके बाद तांबा , सोना , एलुमिनियम आदि का क्रम आता है।

जिन पदार्थो में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत कम होती है , उन्हें विद्युतरोधी या कुचालक कहते है ; जैसेकाँच , क्वार्टज़ , एबोनाइट , अभ्रक , मोम आदि।

धात्विक चालकों में वैद्युत आवेश का प्रवाह flow of electric charge in metallic conductors

flow of electric charge in metallic conductors in hindi धात्विक चालकों में वैद्युत आवेश का प्रवाह : प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना होता है और परमाणु में नाभिक होती है और इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारो ओर निश्चित कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते है , जो इलेक्ट्रॉन नाभिक के समीप वाली कक्षाओं में चक्कर लगाते है वो नाभिकीय बल से आकर्षित रहते है अर्थात बंधे रहते है और जो इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर स्थित कक्षाओं में चक्कर लगाते है उन पर नाभिक का आकर्षण बल कम होता है और वो विचरण के लिए स्वतंत्र होते है इन्हे मुक्त इलेक्ट्रान कहते है।

चित्र को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है

धात्विक चालकों में परमाणुओं के नाभिक तथा बाह्य इलेक्ट्रोनो पर लगने वाला नाभिकीय आकर्षण बल नगण्य होता है इसलिए धातुओं में इलेक्ट्रॉन नाभिक से बंधे नहीं रहते है और सम्पूर्ण धातु में स्वतंत्र रूप से गति करते है इनको मुक्त या चालन इलेक्ट्रॉन कहते है।

धात्विक चालकों में मुक्त इलेक्ट्रोनो की संख्या बहुत अधिक होती है।

धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन उसी तरह गति करते रहते है जिस तरह किसी पात्र गैस के अणु यादृच्छ गति करते है।

धातुओं में यादृच्छ गति इसलिए होती है क्योंकि मुक्त इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रूप से गति करते रहते है और कभी अशुद्धि से टकराते है , कभी अन्य आयनों से , इस प्रकार परिणामी गति यादृच्छ गति प्राप्त होती है।

जब ये मुक्त इलेक्ट्रॉन अन्य आयनों से टकराते है तो इनकी दिशा तथा वेग अचानक ही बदल जाते है। जैसा हम अणु गति सिद्धान्त में गैसों के लिए पढ़ते है।

किसी बाह्य विद्युत क्षेत्र की अनुपस्थिति में धारा का मान शून्य होता है क्योंकि जितने किसी एकांक क्षेत्रफल S से जितने इलेक्ट्रॉन गति करते है उसी समय में इसी क्षेत्रफल से उतने ही इलेक्ट्रॉन विपरीत दिशा में गति करते है जिससे परिणामी धारा का मान शून्य होता है।

 लेकिन जब धात्विक चालक को बाह्य विद्युत क्षेत्र से जोड़ा जाता है तो सभी इलेक्ट्रॉन पर क्षेत्र की विपरीत दिशा में एक बल (F = -eE ) कार्य करता है जिससे सभी इलेक्ट्रॉन एक निश्चित दिशा में अर्थात क्षेत्र के विपरीत दिशा में गति करते है जिसे अपवाह गति कहते है।

अपवाह चाल तथा विद्युत धारा में संबंध relation between drift speed and electric current

relation between drift speed and electric current in hindi अपवाह चाल तथा विद्युत धारा में संबंध : अपवाह चाल के बारे में हम पढ़ चुके है की विद्युत क्षेत्र आरोपित करने के बाद यह आवेशों की क्षेत्र के विपरीत दिशा में चाल है।

अब बात करते है की अपवाह चाल का उपयोग करके चालक में प्रवाहित हो रही विद्युत धारा का मान कैसे ज्ञात कर सकते है तथा इनमे आपस में क्या संबंध होता है।

माना किसी चालक के एकांक क्षेत्रफल में n इलेक्ट्रॉन उपस्थित है और चालक का काट क्षेत्रफल A है अब यदि इस चालक पर बाह्य विधुत क्षेत्र आरोपित करेंगे तो इलेक्ट्रॉन विद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में अपवाह चाल से गति करेंगे , माना अपवाह चाल का मान Vd है। इस चालक का एक अल्पांश L लेते है और अध्ययन करते है।

अल्पांश L में कुल आवेश का मान  = Q = (nAL)e

आवेश अपवाह चाल से गति कर रहे है अतः अल्पांश से गुजरने में लगा समय t = L/Vd

विद्युत धारा की परिभाषा से अल्पांश से गुजरने वाली धारा का मान I = कुल आवेश / समय

I =   (nAL)e /(L/Vd) यह धारा तथा अपवाह वेग में संबंध समीकरण है।

I = nAe Vd

चूँकि Vd =  μE

Vd का मान समीकरण में रखने पर

I = nAe μE

यह धारा , अपवाह वेग तथा गतिशीलता में संबंध समीकरण है।

अपवहन वेग तथा विभवांतर में सम्बन्ध (relation between drift velocity and potential difference )

हम जानते है की विद्युत क्षेत्र तथा विभवांतर में निम्न संबंध होता है

E = V / L

तथा हम पढ़ चुके है की अपवहन वेग

अपवाह वेग Vd = eE τ /m

समीकरण में E का मान रखने पर

Vd = e τ  V/mL

यह समीकरण अपवहन चाल तथा विभवान्तर में दर्शाती है।

ओम का नियम परिभाषा क्या है Ohm’s law in hindi ओम का नियम किसे कहते हैं समझाइए , सूत्र . विमा

Ohm’s law in hindi ओम का नियम परिभाषा क्या है , ओम का नियम किसे कहते हैं समझाइए , सूत्र . विमा ?

परिभाषा : जर्मनी के महान वैज्ञानिक डॉ जॉर्ज साइमन ओम ने 1826 में एक नियम दिया , यह नियम किसी चालक के सिरों पर आरोपित विभवांतर तथा उस चालक में प्रवाहित धारा में संबंध स्थापित करता है इस नियम को ओम का नियम कहते है।
ओम के नियम के अनुसारयदि चालक की भौतिक अवस्थाएं जैसे लम्बाई , क्षेत्रफल ,आयतन , ताप दाब इत्यादि अपरिवर्तित रहे तो चालक के सिरों पर आरोपित विभवांतर तथा इसमें बहने वाली धारा का अनुपात नियत रहता है।
ओम ने अपने नियम में बताया की यदि भौतिक अवस्था नियत रखी जाए तो चालक में प्रवाहित धारा का मान इसके सिरों पर विभवान्तर के समानुपाती होती है।
अतः ओम के नियमानुसार
  I
V = R I
यहाँ R समानुपाती नियतांक है इसे चालक का प्रतिरोध कहते है।
अतः चालक का प्रतिरोध R = V / I
प्रतिरोध का S.I. मात्रक ओम है इसे Ω से दर्शाया जाता है।
ओम के नियम से निष्कर्ष निकाल कर जब हम विभवांतर तथा चालक में प्रवाहित धारा के मध्य ग्राफ खींचते है तो यह ग्राफ निम्न प्रकार प्राप्त होता है।

ओम के नियम की असफलता (What are the failures of Ohm’s law?)

ओम ने अपने नियम में जो समीकरण दिया V = IR , यह प्रकृति का मूल नियम नहीं है अर्थात प्रकृति में यह हर जगह सही साबित नहीं होता है कई स्थितियों में यह समीकरण असफल हो जाती है जो ओम के नियम की असफलता है।

1. धारा में परिवर्तन सिर्फ विभवांतर पर ही निर्भर नहीं करता , विभवान्तर के चिन्ह पर भी निर्भर करता है , जब p-n संधि पर विभवांतर लगाया जाता है तो धारा का मान विभवांतर के साथ चिन्ह (अभिनीति) पर भी निर्भर करता है , अभिनीति (चिन्ह) बदलने पर धारा की दिशा बदल जाती है यहाँ ओम का नियम काम नहीं करता।

2. जब धात्विक चालक के सिरों पर विभवांतर आरोपित किया जाता है तो धारा में परिवर्तन अरैखिक भी सकता है।

3. जब थाइरिस्टर के के लिए V-I ग्राफ खींचते है तो वह भी रैखिक प्राप्त नहीं होता।

विद्युत चालन

ओम का नियमधारा और विभवांतर के बीच संबंध की खोज सर्वप्रथम जर्मनी के जार्ज साइमन आम ने की। इस संबंध को व्यक्त करने के लिए ओम ने जिस नियम का प्रतिपादन किया, उसे ही ओम का नियम कहते है। इस नियम के अनुसार ‘‘स्थिर ताप पर किसी चालक में प्रवाहित होने वाली धारा चालक के सिरों के बीच विभवांतर के समानुपाती होती है।’’

यदि चालक के सिरों के बीच विभवांतर हो और उसमें प्रवाहित धारा प् हो, तो ओम के नियम से µ प् या = प्त् जहाँ त् एक नियतांक है, जिसे चालक प्रतिरोध कहते है।

विद्युत-धारा

दो भिन्न विभव की वस्तुओं को यदि किसी धातु की तार में जोड़ दिया जाए, तो आवेश एक वस्तु से दूसरी वस्तु में प्रवाहित होने लगेगा। किसी चालक में आवेश के इसी प्रवाह को विद्युत धारा कहते है। धारा निम्न विभव से उच्च विभव की ओर प्रवाहित होती है, किन्तु परम्परा के अनुसार हम यह मानते है कि धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की विपरीत दिशा में होता है। अर्थात धनात्मक आवेश के प्रवाह की दिशा ही विद्युत-धारा की दिशा मानी जाती है। परिमाण एवं दिशा दोनों होने के बावजूद विद्युत-धारा एक अदिश राशि है, क्योकि यह जोड़ के त्रिभुज नियम का पालन नहीं करती है। प्रायः ठोस चालकों में विद्युत प्रवाह इलेक्ट्रॉनों द्वारा और द्रवों मे आयन तथा इलेक्ट्रॅन दोनों से ही होता है। अर्द्धचालकों में विद्युत प्रवाह इलेक्ट्रॉन तथा होल द्वारा होता है।

यदि किसी परिपथ में धारा का प्रवाह सदैव एक ही दिशा में होता रहता है, तो हम इसे दिष्ट धारा कहते है और यदि धारा का प्रवाह एकांतर क्रम में समानान्तर रूप से आगे और पीछे होता हो, तो ऐसी धारा प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है। दिष्टधारा को संक्षेप में डी.सी. तथा प्रत्यावर्ती धारा को .सी. कहते है। विद्युत धारा का मात्रक एम्पीयर होता है।

यदि किसी चालक तार में 1 एम्पियर () की विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, तो इसका अर्थ है कि उस तार में प्रति सेकण्ड 6.25 1018 इलेक्ट्रॉन एक सिरे से प्रविष्ट होते है तथा इतने ही इलेक्ट्रॉन प्रति सेकण्ड दूसरे सिरे से बाहर निकल जाते है।

विद्युत परिपथ में धारा का लगातार प्रवाह प्राप्त करने के लिए विद्युत वाहक बल की आवश्यकता होती है, इसे विद्युत सेल या जनित्र द्वारा प्राप्त किया जाता है।

प्रतिरोधकिसी चालक का वह गुण जो उसमें प्रवाहित धारा का विरोध करता है, प्रतिरोध कहलाता है। जब किसी चालक मे विद्युत धारा प्रवाहित की जाती हैं, तो चालक मे गतिशील इलेक्ट्रॉन अपने मार्ग में आने वाले इलेक्ट्रॉनों, परमाणुओं एवं आयनों से निरन्तर टकराते रहते हैं, इसी कारण प्रतिरोध की उत्पत्ति होती है। यदि किसी चालक के सिरों के बीच का विभवान्तर वोल्ट एवं उसमें प्रवाहित धारा द्य एम्पीयर हो।

प्रतिरोध = विभवान्तर या, त् = टध्प्

धारा

प्रतिरोध का ैप् इकाई ओम है, जिसका संकेत W  है। किसी चालक का प्रतिरोध निम्नलिखित बातो पर निर्भर करता है-

चालक पदार्थ की प्रकृति पर- किसी चालक का प्रतिरोध उसके पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।

चालक के ताप पर- किसी चालक का प्रतिरोध उसके ताप पर निर्भर करता है। ताप बढ़ने पर चालक का प्रतिरोध बढ़ता है, लेकिन ताप बढ़ने पर अर्द्धचालकों का प्रतिरोध घटता है।

चालक की लम्बाई पर- किसी चालक का प्रतिरोध उसकी लम्बाई का समानुपाती होता है। अर्थात लम्बाई बढ़ने से चालक का प्रतिरोध बढ़ता है और लम्बाई घटने से चालक का प्रतिरोध घटता है।

–  चालक के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर- किसी चालक का प्रतिरोध उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल का व्युत्क्रमानुपाती होता है। अर्थात मोटाई बढ़ने पर चालक का प्रतिरोध घटता है।

अनुगमन वेग और विभवान्तर में सम्बन्ध (relation between drift velocity and potential difference)

माना PQ एक l लम्बाई का चालक है जिसके सिरों पर V विभवान्तर लगाया जाता है। चालक के अन्दर धनात्मक सिरे Q से ऋणात्मक सिरे P की तरफ एक विद्युत क्षेत्र E पैदा हो जाता है। इस क्षेत्र की तीव्रता

E = V/l      . . . . . .. .  समीकरण-1

चालक का प्रत्येक मुक्त इलेक्ट्रॉन इसी क्षेत्र में स्थित है अत: प्रत्येक मुक्त इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला विद्युत बल

F = -E.e   . . . . . .. .  समीकरण-2

यदि इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान m हो तो विद्युत बल के कारण इलेक्ट्रॉन में उत्पन्न त्वरण

a = F/m = -E.e/m    . . . . . .. .  समीकरण-3

चूँकि मुक्त इलेक्ट्रॉन का औसत वेग शून्य होता है।

चूँकि प्रारंभिक वेग u = 0

अंतिम वेग v = vd = अनुगमन वेग

इलेक्ट्रॉन द्वारा प्राप्त अधिकतम त्वरण

a = -eE/m     (समीकरण 3 से)

टकराने में लगा समय (श्रान्तिकाल) = τ

चूँकि गति के प्रथम समीकरण से

V = u + at

मान रखने पर , Vd = 0 + (-eE/m)τ

Vd = -eEτ/mसमीकरण-1 से विद्युत क्षेत्र का मान रखने पर

Vd = (-eτ/m)V/l

वेग का परिमाण |Vd| = | (-eτ/m)V/l|

इसलिए

Vd =  eτ/m.v/l

यह समीकरण अनुगमन वेग और विभवान्तर में सम्बन्ध प्रदर्शित करता है।

अनुगमन वेग और धारा में सम्बन्ध (relation between drift velocity and electric field)

माना A अनुप्रस्थ परिच्छेद और l लम्बाई का PQ चालक है। इसके सिरों के मध्य विभवान्तर लगाते है। जैसे ही विभवान्तर लगाया जाता है , चालक का प्रत्येक मुक्त इलेक्ट्रॉन अनुगमन वेग Vd से धनात्मक सिरे Q की ओर गति करने लगता है। सबसे पहले Q सिरे पर स्थित इलेक्ट्रॉन चालक को छोड़ेगा तथा उसके बाद क्रमशः उसके पीछे वाले इलेक्ट्रॉन Q सिरे को छोड़ते रहेंगे। जिस समय P सिरे का इलेक्ट्रॉन Q सिरे को पार कर रहा होगा , तब तक चालक के समस्त मुक्त इलेक्ट्रॉन Q सिरे को पार कर चुके होंगे। इस क्रिया में लगा समय

t = l/Vd

यदि चालक के एकांक आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अर्थात इलेक्ट्रॉन घनत्व n हो तो चालक का प्रवाहित होने वाला आवेश

q = इलेक्ट्रॉनों की संख्या x इलेक्ट्रॉन का आवेश

q = आयतन x इलेक्ट्रॉन घनत्व x इलेक्ट्रॉन आवेश

या

q = Al.ne

अत:

चालक में प्रवाहित धारा

i = q/t = A.l.ne/l/Vd = A.ne.Vd

या

Vd = i/Ane

यही अनुगमन और धारा में सम्बन्ध है।

नोट :

चूँकि i = nAVde

चूँकि Vd = e τ.E/m

अत: i = nAe x eτ.E/m = nAe2τ.E/m

या

i = nAe2τ.E/m

आंकिक प्रश्न और हल

उदाहरण : 10-4 m2 अनुप्रस्थ परिच्छेद वाले चालक में 10 एम्पियर की धारा बह रही है। यदि मुक्त इलेक्ट्रॉनों का घनत्व 9 x 1028 m-3 हो तो  इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग ज्ञात कीजिये। इलेक्ट्रॉन का आवेश e = 1.6 x 10-19 C

हल : दिया गया है

I = 10A , A = 10-4 m2 , n = 9 x 1028 m-3 , e = 1.6 x 10-19 C , Vd = ?

चूँकि Vd = 1/Ane

मान रखकर हल करने पर

अत: Vd = 6.94 x 10-6 ms-1

गतिशीलता (mobility)

हम जानते है कि चालकता गतिमान आवेश वाहकों से उत्पन्न होती है। धातुओं में ये गतिमान आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन है , आयनित गैस में ये इलेक्ट्रॉन और धनावेशित आयन है , विद्युत् अपघट्य में ये धनायन और ऋण आयन दोनों हो सकते है।

एक महत्वपूर्ण राशि गतिशीलता है जिसे प्रति एकांक विद्युत क्षेत्र के अनुगमन वेग के परिमाण के रूप में परिभाषित करते है।

चूँकि µ = vd/E = vd/E

अत: vd = e.τ.E/m

या

Vd/E = eτ/m

अत: µ = eτ/m

अत: इलेक्ट्रॉन की गतिशीलता

µe = eτe/me

मात्रक – चूँकि µ = vd/E

अत: µ का मात्रक = ms-1/Vm-1 = m2s-1v-1

या µ का मात्रक = ms-1/NC-1 = mCs-1N-1

नोट : धात्विक चालक में इलेक्ट्रॉन आवेश वाहक होते है जबकि अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉन और होल दोनों आवेश वाहक की भूमिका निर्वाह करते है। अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉन की कमी ही होल होती है तथा ये धनावेश की तरह व्यवहार करते है। यदि होल का द्रव्यमान mh द्वारा व्यक्त करे तथा औसत श्रान्तिकाल τh से व्यक्त करे तो होलों की गतिशीलता निम्नलिखित सूत्र से प्राप्त होगी

µh = eτh/mh

यह ध्यान देने की बात है कि इलेक्ट्रॉनों और होलो दोनों की गतिशीलता धनात्मक है लेकिन दोनों के अनुगमन वेग विपरीत दिशा में होंगे।

उदाहरण : 0.1 मीटर लम्बाई के चालक के सिरों के मध्य 5V का विभवान्तर लगाया जाता है। इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग 2.5 x 10-4 ms-1 है। इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता की गणना कीजिये।

हल : दिया है , विभवान्तर V = 5 वोल्ट , l = 0.1 m , Vd = 2.5 x 10-4 ms-1 , µe = ?

चालक के सिरों के मध्य विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

E = v/l = 5/0.1 = 50 Vm-1

अत: इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता

µe = vd/E = 2.5 x 10-4/50

µe = 5 x 10-6 m2v-1s-1

ओम का नियम (ohm’s law)

सन 1826 में जर्मन वैज्ञानिक डॉ. जोर्ज साइमन ओम (georg simon ohm) ने किसी चालक के सिरों पर लगाये गए विभवान्तर और उसमें प्रवाहित होने वाली वैद्युत धारा का सम्बन्ध एक नियम द्वारा व्यक्त किया जिसे ओम का नियम कहते है। इस नियम के अनुसार , “यदि किसी चालक की भौतिक अवस्था (जैसे ताप , लम्बाई , क्षेत्रफल आदि) बदले तो उसके सिरों पर लगाये गए विभवान्तर और उसमें बहने वाली धारा का अनुपात नियत रहता है।

माना यदि चालक के सिरों पर v विभवान्तर लगाने पर उसमें i धारा बहे तो ओम के नियम से

V/i = नियतांक

इस नियतांक को चालक का विद्युत प्रतिरोध कहते है तथा इसे R से व्यक्त करते है।

अत:

V/i = R

इस सूत्र से , V = R.i

अथवा i या i V

अर्थात किसी चालक में बहने वाली धारा चालक पर लगाये गए विभवान्तर के समानुपाती होती है , यदि चालक की भौतिक अवस्थाएँ बदली जाए।

चूँकि v i , i   v या v i

अत: V और i के मध्य खिंचा गया ग्राफ एक सरल रेखा होगी।

मुक्त इलेक्ट्रॉन सिद्धांत अथवा अनुगमन वेग के आधार पर ओम के नियम की व्याख्याअनुगमन वेग और विभवान्तर में सम्बन्ध

vd = eτ/m .V/l . . . . .. . .  समीकरण-1

 इसी प्रकार अनुगमन वेग और धारा में निम्नलिखित सम्बन्ध होता है

 vd = i/Ane . . . . . . .    समीकरण-2

समीकरण-1 और समीकरण-2 से

eτ/m .V/l = i/Ane

अथवा V = ml i/eτ.Ane

अथवा V = (m/ne2τ).(l/A).i . . . . . . . समीकरण-3

या V = ρ.l.i/A

जहाँ ρ = m/ne2τ , चालक के पदार्थ की विशेषता है , अत: इसे चालक के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कहते है। इसका मान एक पदार्थ के लिए नियत होता है।

यदि चालक की भौतिक अवस्थाएं बदले तो l और A भी नियत रहेंगे , अत:

 ρ.l/A = नियतांक = R (चालक का प्रतिरोध)

अत: V = R.i

अथवा i या V

अर्थात किसी चालक में बहने वाली धारा उस पर लगाये गए विभवान्तर के अनुक्रमानुपाती होती है , बशर्तें की चालक की भौतिक अवस्थाएँ बदलें।

यही ओम का नियम है।

ओम के नियम का सदिश रूप (vector form of ohms law)

समीकरण से

V = (m/ne2τ).(l/A).i

V/l = (m/ne2τ).(i/A)

यहाँ v/l = विद्युत क्षेत्र

i/A = धारा घनत्व

यहाँ m/ne2τ विशिष्ट प्रतिरोध

या E = m/ne2τ  .j

या

E = ρ.j

j = E/ρ

j = σ.E

अत: 1/ρ = विशिष्ट चालकता

जिसे σ (सिग्मा) से प्रदर्शित करते है

σ = 1/ρ

यही ओम के नियम का सदिश रूप और धारा घनत्व तथा विद्युत क्षेत्र में सम्बन्ध है।

ओम के नियम की असफलता (failure of ohm’s law) : ओम का नियम प्रकृति का मूल नियम नहीं है। अनेक स्थितियों में सम्बन्ध

V = IR

का पालन पूर्णतया नहीं होता है तथा ये स्थितियां ही ओम के नियम की असफलता की जनक है। इनमें से कुछ स्थितियाँ निम्नलिखित है

1. विभवान्तर धारा के साथ अरैखिक रूप से बदल सकता है : धात्विक चालक के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर , धारा के साथ बिन्दुवत रेखा के अनुसार रैखिक रूप से बदलना चाहिए परन्तु विभवान्तर को लगातार बढाते रहने पर धारा का वास्तविक परिवर्तन मोटी रेखा के अनुसार होता है। इस परिवर्तन का कारण धारा का उष्मीय प्रभाव है। लगातार धारा बढ़ने से चालक का प्रतिरोध बढ़ जाता है।

2. विभवान्तर के साथ धारा का परिवर्तन लगाये गए विभवान्तर के चिन्ह पर निर्भर कर सकता है : जब PN संधि या अर्द्धचालक पर लगाये गए विभवान्तर (अभिनति) का चिन्ह बदल देते है तो विभवान्तर के साथ धारा का परिवर्तन बदल जाता है। जब PN संधि के p सिरे को बैट्री के धन ध्रुव से और n सिरे को ऋण ध्रुव से जोड़ते है , अर्थात अग्र अभिनति लगाते है तो धारा तेजी से बदलती है तथा इसकी विपरीत वोल्टता अर्थात उत्क्रम अभिनति लगाने पर धारा परिवर्तन की दर बहुत कम हो जाती है।

3. विभवान्तर के बढाने पर धारा घट सकती है। : एक थाइरिस्टर में p और n प्रकार के अर्द्धचालकों की क्रमागत चार परतें होती है।

थाइरिस्टर के लिए V-I ग्राफ (अग्र और उत्क्रम दोनों अभिनतियों के लिए) में दिखाया गया है। ग्राफ का AB भाग यह व्यक्त करता है कि विभवान्तर घटाने पर धारा का मान बढ़ता है।

यह थाइरिस्टर के ऋणात्मक प्रतिरोध क्षेत्र के संगत है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि थाइरिस्टर में विभवान्तर बदलने पर धारा का परिवर्तन अरैखिक तो है ही , साथ ही साथ धारा परिवर्तन का परिमाण विभवान्तर के चिन्ह पर भी निर्भर करता है।

नोट :

अनओमीय चालक : वे चालक जो ओम के नियम का पालन नहीं करते है उन्हें अनओमीय चालक कहते है ; जैसेडायोड , ट्रायोड , ट्रांजिस्टर आदि।

प्रतिरोधकता की परिभाषा क्या है , विशिष्ट प्रतिरोध , चालकता का मात्रक विमा

प्रतिरोधकता (resistivity ) :मान लीजिये किसी चालक का प्रतिरोध R , लम्बाईतथा इसका अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A है प्रयोगो से यह निष्कर्ष निकाला गया की चालक का प्रतिरोध इसकी लम्बाईके समानुपाती होता है तथा अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

अतः लिखा जा सकता है

 L /A

समानुपाती चिन्ह हटाने पर

= ρL /A

यहाँ ρ एक समानुपाती नियतांक है और इसे (ρ) चालक की प्रतिरोधकता कहते है  ध्यान रखिये की दो भिन्न भिन्न पदार्थों के प्रतिरोध समान हो सकते है लेकिन दो भिन्न पदार्थो की प्रतिरोधकता समान नहीं हो सकती।

प्रतिरोधकता का मान पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है और अलग अलग चालकों के लिए इसका मान अलग होता है।

प्रतिरोधकता का मान ताप पर भी निर्भर करता है।
प्रतिरोधकता किसी पदार्थ का वह गुण है जो यह दर्शाता है की वह कितनी तीव्रता से धारा के प्रवाह का विरोध करेगा। प्रतिरोधकता को ही पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध (specific electrical resistance) भी कहते है।
प्रतिरोधकता का मात्रक Ω.m होता है तथा विमा M1L3T-3A-2 है।
यदि चालक तार की त्रिज्या r हो तो क्षेत्रफल A = πr2
ρ = RA /L
ρ = Rπr2 /L
सूत्र को देखकर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है सकते है की चालक की प्रतिरोधकता का मान पदार्थ के प्रतिरोध , अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल , लम्बाई पर निर्भर करता है।

चालकता (Conductance)

प्रतिरोधकता के व्युत्क्रम को पदार्थ की चालकता कहते है चालकता का मात्रक Ω-1m-1 तथा इसकी विमा M-1L-3T3Aहोती है।

विद्युत प्रतिरोध की परिभाषा क्या है Electrical resistance definition in hindi प्रतिरोध किसे कहते है ?

Electrical resistance definition in hindi विद्युत प्रतिरोध की परिभाषा क्या है प्रतिरोध किसे कहते है ? विमीय सूत्र , मात्रक , सूत्र क्या होता है ?

परिभाषा : चालक का वह गुण जो चालक में प्रवाहित धारा का विरोध करता है इस गुण को चालक का विद्युत प्रतिरोध कहते है।

हमने पीछे पढ़ा था की चालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते है जो गति करने के लिए स्वतंत्र होते है या दूसरे शब्दों मे कहे तो उन इलेक्ट्रोनो पर नाभिकीय आकर्षण बल का मान कम होता है।

जब चालक पर विभवांतर आरोपित किया जाता है तो इलेक्ट्रॉन चालक के एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ बहने लगते है , एक सिरे से दूसरे सिरे तक इलेक्ट्रॉन के प्रवाह में वे एक दूसरे से टकराते है या चालक में अन्य अशुद्धि आवेश से टकराते है तो आवेश अर्थात धारा के प्रवाह में एक बाधा उत्पन्न होती है जो इन आवेशों को (धारा) को चालक में बहने से रोकती है चालक में धारा के प्रवाह में उत्पन्न इस बाधा को ही चालक का प्रतिरोध कहते है।

प्रतिरोध का मान चालक के अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल , लम्बाई के साथ साथ इस बात पर भी निर्भर करता है की विभवांतर किस प्रकार आरोपित किया जा रहा है।

प्रतिरोध का मात्रक ओम होता है इसे Ω से व्यक्त किया जाता है यदि किसी मशीन का प्रतिरोध 5 ओम बताया जाए तो आपको प्रतिरोध =  5Ω इस प्रकार लिखना है।

यदि एक बेलनाकार आकृति के चालक की बात करे जिसका अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A है , लम्बाई L है तथा प्रतिरोधकता ρ है तो इस चालक का प्रतिरोध R लिखा जाता है तो

R = ρL /A

किसी चालक का प्रतिरोध (resistance of a conductor) : किसी चालक द्वारा धारा के मार्ग में जो रुकावट डाली जाती है , उसे उस चालक का विद्युत प्रतिरोध कहते है। इसे R से व्यक्त करते है। यदि चालक के सिरों का विभवान्तर V हो तथा उसमें बहने वाली धारा i हो तो ओम के नियम से चालक का प्रतिरोध

R = V/l

मात्रक :-

R का मात्रक = V का मात्रक/i का मात्रक

= वोल्ट/एम्पियर = ओम (Ω)

अत: 1Ω = 1 VA-1

एक ओम की परिभाषा :-

यदि V = 1 वोल्ट , i = 1 एम्पियर

तो R = 1 ओम (Ω)

यदि किसी चालक के सिरों पर 1 वोल्ट का विभवान्तर लगाने पर उसमें 1 एम्पियर की धारा प्रवाहित हो तो चालक का प्रतिरोध 1 ओम (Ω) होगा।

विमीय सूत्र :

चूँकि R = V/i = W/q.i = w/i2t

अत: R का विमीय सूत्र = M1L2T-2/A2.T1

= [M1L2T-3A-2]

ज्यामितीय संरचना पर निर्भरता : किसी चालक का प्रतिरोध (R) , उसकी लम्बाई (l) , अनुप्रस्थ परिच्छेद (A) और चालक के पदार्थ के विशिष्ट प्रतिरोध (ρ) में निम्नलिखित सम्बन्ध होता है

R = ρ.l/A . . . .. . . . .. . समीकरण-1

अत: स्पष्ट है कि

(i) R  l

अर्थात चालक का वैद्युत प्रतिरोध उसकी लम्बाई के अनुक्रमानुपाती होता है।

(ii) R  l/A

अर्थात चालक का विद्युत प्रतिरोध उसके अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

(iii) R  ρ

अर्थात चालक का प्रतिरोध उसके पदार्थ के विशिष्ट प्रतिरोध या पदार्थ की प्रकृति के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

नोट : जिन पदार्थो की प्रतिरोधकता बहुत कम (चाँदी , तांबा , एलुमिनियम) होती है , उनसे संयोजक तार (कनेक्शन वायर) बनाये जाते है। क्योंकि इनके प्रतिरोध को नगण्य माना जाता है। इसके विपरीत जिन पदार्थों की प्रतिरोधकता बहुत अधिक (नाइक्रोम , मैंगनीन , कांस्टेंटन आदि) होती है , उनसे प्रतिरोधक तार (resistance wires) बनाये जाते है।

विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता (specific resistance or resistivity)

चालक के भीतर किसी बिंदु पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E और धारा घनत्व J के अनुपात को चालक के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कहते है।

इसे ρ से व्यक्त करते है अत:

ρ = E/J

यदि चालक का विभवान्तर V , उसकी लम्बाई l तथा उसमें बहने वाली धारा i हो तो

E = V/l तथा J = i/A

जहाँ A अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल है।

अत: ρ = (V/l)/(i/A) = V.A/i.l = R.A/l

अथवा

ρ = R.A/l

यदि A = l m2 , l = 1m तो  ρ = R

अर्थात किसी पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध उस पदार्थ के एकांक लम्बाई और एकांक अनुप्रस्थ क्षेत्रफल वाले चालक के प्रतिरोध के बराबर होता है। विशिष्ट प्रतिरोध का मान निम्नलिखित सूत्र से भी ज्ञात किया जा सकता है

ρ = m/ne2τ

जहाँ m इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान , n एकांक आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या , e इलेक्ट्रॉन का आवेश और  τ श्रांतिकाल है।

मात्रक :

चूँकि ρ = R.A/l

चूँकि ρ का मात्रक = (R का मात्रक) x (A का मात्रक)/(l का मात्रक)

= Ωm2/m

= Ωm

विमीय सूत्र :

चूँकि ρ = R.A/l

= V.A/i.l

= W.A/q.i.l

= W.A/i2t.l

या

ρ = W.A/i2.t.l

अत: ρ का विमीय सूत्र = [M1L3T-3A-2]

नोट : किसी चालक का प्रतिरोध उसकी लम्बाई , अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल और चालक के पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है। जबकि विशिष्ट प्रतिरोध केवल पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है , चालक की विमाओं पर नहीं। प्रतिरोध चालक की विशेषता है जबकि विशिष्ट प्रतिरोध उसके पदार्थ की विशेषता है।

ओम x मीटर प्रतिरोधकता का मात्रक है जबकि ओम-मीटर प्रतिरोध मापन के लिए एक उपकरण है।

विभिन्न पदार्थों की वैद्युत प्रतिरोधकता

विभिन्न पदार्थो की विद्युत प्रतिरोधकता में परिवर्तन काफी वृहत परास में होता है जैसा कि निम्नलिखित सारणी में स्पष्ट है

A. पदार्थ का नाम (चालक पदार्थ)

डिग्री सेल्सियस पर प्रतिरोधकता

चाँदी

1.6 x 10-8

तांबा

1.7 x 10-8

एलुमिनियम

2.7 x 10-8

टंग्स्टन

5.6 x 10-8

लोहा

10 x 10-8

प्लेटिनम

11 x 10-8

पारा

98 x 10-8

 

B. मिश्र धातुएं

डिग्री सेल्सियस पर प्रतिरोधकता

मैंगनीन

48 x 10-8

कांस्टेंटन

49 x 10-8

नाइक्रोम

100 x 10-8

 

C. अर्द्धचालक

0 डिग्री सेल्सियस पर प्रतिरोधकता

कार्बन

3.5 x 10-5

जर्मेनियम

0.46

सिलिकन

2300

 

D. अचालक

शून्य डिग्री सेल्सियस पर प्रतिरोधकता (em)

शुद्ध जल

2.5 x 105

काँच

1010-1014

साधारण नमक (NaCl)

1014

माइका

1011-1015

रबर

1013-1016

पिघला हुआ क्वार्ट्ज

1016

लकड़ी

108-1011

आबनूस

5 x 1014

महत्वपूर्ण बिंदु

1.     तांबे की प्रतिरोधकता कम है तथा विद्युत चालकता अधिक होती है। इसलिए संयोजक तार तांबे के बनाये जाते है।

2.     मिश्र धातुओं की वैद्युत प्रतिरोधकता ; जैसेमैंगनीन (Cu 84% + Mn 12% + Ni 4%) और कांस्टेंटन (Cu 60% + Ni 40%) काफी अधिक होती है। अत: निश्चित व्यास के प्रामाणिक प्रतिरोध बनाने के लिए उनकी कम लम्बाई की आवश्यकता होती है।

ओमीय तथा अन ओमीय प्रतिरोध क्या है Ohmic and non ohmic resistance in hindi

Ohmic and non ohmic resistance in hindi ओमीय तथा अन ओमीय प्रतिरोध  : ओमीय वे पदार्थ होते है जो ओम के नियम की पालना करते है तथा अन ओमीय वे पदार्थ है जो ओम के नियम की पालना नहीं करते है।

ओम का नियम हम पढ़ चुके है की जब चालक के सिरों पर जब विभवांतर आरोपित किया है तो विभवांतर के अनुपात में चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होती है अर्थात विभवांतर धारा के समानुपाती होता है अतः हम कह सकते है की

ओमीय पदार्थो में विभवान्तर तथा प्रवाहित धारा के मध्य ग्राफ खींचने पर एक सीधी रेखा प्राप्त होती है

अनओमीय पदार्थो में विभवान्तर तथा प्रवाहित धारा के मध्य ग्राफ खींचने पर एक सीधी रेखा प्राप्त नहीं होती है

ओमीय पदार्थो में या युक्तियों में विभवांतर के चिन्ह पर निर्भरता नहीं होती है अर्थात युक्तियों में यह निर्भरता नहीं होती है की इस छोर को धनात्मक विभव दिया जाए और इस छोर को ऋणात्मक विभव दिया जाए।

अन ओमीय या युक्तियों में विभवांतर के चिन्ह का ध्यान रखा जाता है अर्थात ये युक्तियाँ इस बात पर निर्भर करती है की किस भाग को ऋणात्मक विभव दिया गया है और किस भाग को धनात्मक विभव

नोट : यहाँ विभवांतर देने से तात्पर्य बैटरी जोड़ने से है और धनात्मक विभव का मतलब बैटरी का धन सिरा जोड़ने तथा ऋण विभव देने का मतलब बैट्री का ऋण सिरा जोड़ने से है।

अन ओमीय पदर्थो या युक्तियों के उदाहरणडायोड , ट्रांज़िस्टर , विद्युत अपघटनी द्रव आदि।

डायोड , ट्रांसिस्टर इत्यादि के ग्राफ यहाँ दिए गए है आप देख सकते है की V (विभवांतर ) तथा धारा (I) में खिंचा गया ग्राफ एक सीधी रेखा के रूप में नहीं आता अतः ये ओम के नियम की पालना नहीं करते इसलिए इन्हे अन ओमीय युक्तियाँ कहा जाता है।

कार्बन प्रतिरोध तथा वर्ण कोड क्या है , कैसे लिखते है carbon resistance and colour codes in hindi

carbon resistance and colour codes for carbon resistance in hindi कार्बन प्रतिरोध तथा वर्ण कोड : विद्युत तथा इलेक्ट्रॉनिकी में उपयोग आने वाले प्रतिरोध कई प्रकार के हो सकते है जैसे तार आबद्ध प्रतिरोधक और कार्बन प्रतिरोध इत्यादि।

तार आबद्ध प्रतिरोधक कम प्रतिरोध वाले होते है इनसे अधिकबड़े प्रतिरोध नहीं बना सकते अधिक मान के  प्रतिरोध बनाने के लिए  कार्बन प्रतिरोध उपयोग में लाये जाते है।

आपने इलेक्ट्रॉनिक परिपथ देखा होगा तो निश्चित रूप से कार्बन प्रतिरोध को भी देखा होगा हम यहाँ फोटो दिखा रहे है यह छोटे से छोटे बड़े से बड़े परिपथ में देखा जा सकता है

अब आप सोच रहे होंगे की ये अलग अलग रंग के क्यों है , हम आपको बता दे की रंग वर्ण कोड कहलाते है इन रंगो से आप यह पता लगा सकते है की कोनसा प्रतिरोध कितने ओम का है। ]

आइये वर्ण कोड को पढ़ना सीखते है

सिरे से पहली दो धारियां ओम में प्रतिरोध के पहले दो सार्थक अंको को निर्देशित करती है।

तीसरी धारी दशमलव गुणांक को दर्शाती है।

अंतिम धारी प्रतिरोध में प्रतिशत विचरण को दर्शाती है इसे पता चलता है की यह इतने प्रतिशत कम या अधिक हो सकता है।

उदाहरण :

वर्ण कोड सारणी

Colour

Digit

Multiplier

Tolerance

Black

0

1

Brown

1

10

± 1%

Red

2

100

± 2%

Orange

3

1,000

Yellow

4

10,000

Green

5

100,000

± 0.5%

Blue

6

1,000,000

± 0.25%

Violet

7

10,000,000

± 0.1%

Grey

8

± 0.05%

White

9

Gold

0.1

± 5%

Silver

0.01

± 10%

None

± 20%

उदाहरण :

निम्न कार्बन प्रतिरोध का प्रतिरोध मान ज्ञात कीजिये

पहला रंग हरा है , हरा5

दूसरा रंग लाल है , लाल = 2

तीसरा रंग Gold हैGold = 0.1

चौथा रंग सिल्वर है , सिल्वर = ± 10%

अतः यह निम्न प्रकार लिखा जायेगा 

2 प्रारम्भ डिजिट x तीसरा रंग गुणक + टॉलरेंस 

52 x 0.1 ± 10%

5.2 ± 10% Ω

कार्बन प्रतिरोधों के लिए वर्ण कोड (colour code for carbon resistance in hindi) : विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में प्रयुक्त प्रतिरोधो का परिसर वृहत होता है। उच्चतर परिसर के प्रतिरोधक मुख्यतः कार्बन से बनाये जाते है। कार्बन के प्रतिरोधक सुसंहत तथा सस्ते होते है , इसलिए इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में व्यापक रूप से उपयोग किये जाते है। कार्बन प्रतिरोध आमाप में छोटे होते है अत: उनके मान वर्ण कोड के द्वारा व्यक्त किये जाते है।

वर्ण कोड निम्नलिखित सारणी में दिया गया है

प्रयुक्त अक्षर

रंग

अंक

गुणक

सह्ता (%) tolerance

B

काला (black)

0

1

B

भूरा (brown)

1

101

R

लाल (red)

2

102

O

नारंगी (orange)

3

103

Y

पीला (yellow)

4

104

G

हरा (green)

5

105

B

नीला (blue)

6

106

V

बैंगनी

7

107

G

धूसर (grey)

8

108

W

सफ़ेद (white)

9

109

सुनहरा (gold)

10-1

5%

चाँदी (silver)

10-2

10%

वर्णहीन (no colour)

20%

 

तालिका के याद रखने के लिए तथ्य –

B B R O Y of great britain has very good wife wearing golden silver necklace

अथवा

black brown rods of your gate became very good when given silver color.

नोट : वाक्य के प्रत्येक शब्द का पहला वर्ण रंग को प्रदर्शित करता है।

प्रतिरोधक पर समाक्ष रंगीन वलयों का समूह होता है जिनकी सार्थकता उक्त सारणी में दी गयी है। सिरे से पहली दो धारियां ओम में प्रतिरोध के पहले दो सार्थक अंकों को निर्देशित करती है। तीसरी धारी दशमलव गुणक को निर्देशित करती है और अंतिम धारी सह्यता या निर्देशित मान के प्रतिशत में संभावित विचरण को व्यक्त करती है। कभी कभी यह अंतिम धारी नहीं होती है जिसका आशय यह है कि सह्यता 20% है।

उदाहरण के लिए , यदि चार रंग नारंगी , नीला , पीला और सुनहरा है तो प्रतिरोध का मान 5% सह्यता मान के साथ 36 x 10Ω होगा।

प्रश्न : एक कार्बन प्रतिरोधक पर चित्र के अनुसार रंगीन पट्टियाँ बनी है। इसका प्रतिरोध क्या होगा ?

उत्तर : हम जानते है कि वर्ण कोड के अनुसार पहली दो धारियां ओम के प्रतिरोध के पहले दो सार्थक अंकों को निर्देशित करती है तथा \तीसरी धारी दशमलव गुणक को निर्देशित करती है और अंतिम धारी सह्यता को निर्देशित करती है।

चूँकि पीले का अंक 4 तथा बैंगनी का 7 है और तीसरे रंग भूरे का गुणक 101 है। अत: प्रतिरोध का मान 47 x 101 = 470 ओम होगा।  सह्यता व्यक्त करने वाली धारी सुनहरी है जिसकी सह्यता 5% है अत: प्रतिरोधक का प्रतिरोध

R = 470 Ω ± 5%

प्रतिरोध एवं प्रतिरोधकता पर ताप का प्रभाव effect of temperature on resistance or resistivity

effect of temperature on resistance or resistivity in hindi प्रतिरोध एवं प्रतिरोधकता पर ताप का प्रभाव : पदार्थ की प्रतिरोधकता भिन्न भिन्न ताप पर भिन्न होती है ,हम यहाँ पढ़ने वाले है की चालकों , कुचालको तथा अर्धचालको पर ताप का किस प्रकार प्रभाव रहता है। और इनकी प्रतिरोधकता को ताप कितना प्रभावित करता है।

1. चालकों पर ताप का प्रभाव (for conductors ) :

हम पढ़ चुके है की चालक के लिए प्रतिरोधकता का सूत्र ρ = m/ne2T से दिया जाता है।

यहाँ

m = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान

n = इलेक्ट्रोनो की संख्या

e = इलेक्ट्रॉन पर आवेश

T = विश्रान्तिकाल

यहां m , n तथा e को नियत माना जा सकता है लेकिन T  विश्रान्तिकाल ताप पर निर्भर करता है।  जैसे जैसे ताप में वृद्धि की जाती है वैसे वैसे चालक के कम्पनों का आयाम मुक्त इलेक्ट्रॉन की टक्कर की आवृति बढ़ जाती है इसलिए ताप बढ़ाने से T  विश्रान्तिकाल का मान घट जाता है और प्रतिरोधकता का मान बढ़ जाता है।

माना 0 डिग्री सेंटीग्रेट ताप पर तथा t डिग्री सेंटीग्रेट ताप पर पदार्थ की प्रतिरोधकता का मान क्रमशः ρ0 and ρt है। तो इनमे निम्न सम्बन्ध होगा

ρ = ρ(1 + αt )

यहाँ α एक नियतांक है जिसे प्रतिरोधकता ताप गुणांक  तथा इसका मान पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है। धात्विक चालकों के लिए  प्रतिरोधकता ताप गुणांक का मान धनात्मक होता है।

2. कुचालको पर ताप का प्रभाव (for insulators )

विद्युत रोधी या अचालक या कुचालको की प्रतिरोधकता का मान ताप बढ़ाने के साथ चरघातांकी के रूप में कम होती जाती है , तथा ताप कम करने पर प्रतिरोधकता का मान बढ़ने लगता है , तथा परम शून्य ताप पर कुचालको की चालकता का मान शून्य हो जाता है शून्य हो जाता है।

इसे निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त किया जाता है

ρ = ρ0eEg/2KT

यहाँ

K = वोल्ट्ज़मान नियतांक है

T = ताप का मान (केल्विन में )

Eg = ऊर्जा अंतराल (चालक तथा संयोजकता बैंड के बीच ऊर्जा अंतराल )

3. अर्द्धचालकों पर ताप का प्रभाव (for semi conductors )

अर्धचालको में सहसंयोजी बंध पाए जाते है , जब ताप बढ़ाया जाता है तो ये सहसंयोजी बंध तेजी से टूटने लगते है , बढ़ टूटने से पदार्थ में इलेक्ट्रॉन तथा होल की संख्या में चरघातांकी रूप से वृद्धि होती है जिससे चालकों में चालकता बढ़ती है , अतः हम कह सकते है की अर्धचालकों में ताप बढ़ाने से प्रतिरोधकता का मान कम होता है।

अर्धचालको में प्रतिरोधकता ताप गुणांक (α) ऋणात्मक होता है।

चालकों कुचालको तथा अर्धचालको में ताप का प्रभाव निम्न प्रकार ग्राफ में दर्शाया जाता है 

अतिचालकता की परिभाषा क्या है , उदाहरण , क्रांतिक ताप , मेसनर प्रभाव , अतिचालक पदार्थ

super conductivity in hindi अति चालकता की परिभाषा क्या है : ऐसे पदार्थ या धातु जिनमे एक निश्चित ताप पर प्रतिरोधकता का मान बहुत तेजी से घटता है और शून्य हो जाता है इन पदार्थो या धातुओं को अतिचालक पदार्थ या धातु कहते है तथा इनके इस गुण को अतिचालकता कहते है। तथा जिस ताप पर अति चालकता की घटना होती है उस ताप को क्रांतिक ताप (critical temperature ) कहते है।

अतिचालकता प्रभाव को सर्वप्रथम पारे में देखा गया , जब पारे को 4.2 K ताप पर ठंडा किया गया तो पारा ने अति चालकता गुण दर्शाया।

अतिचालकता की अवस्था में पदार्थ में चुंबकीय क्षेत्र का मान भी शून्य हो जाता है इस प्रभाव को मेसनर प्रभाव (Messner effect ) कहते है।

यह घटना बहुत कम ताप पर घटित होती है।

उपयोग : इनका उपयोग अधिक चुम्कीय क्षेत्र वाली चुम्बक बनाने में , ट्रांसफॉर्मर एवं सुपर कंप्यूटर बनाने में किया जाता है।

अति चालकता की खोज डच ने April 8, 1911 में की थी , इन्होने सबसे पहले इसके बारे में बताया की जब पदार्थ को क्रांतिक ताप से निचे ताप पर ठंडा किया जाता है तो पदार्थ अति चालकता प्रदर्शित करता है और इस अवस्था में पदार्थ का प्रतिरोध और चुंबकीय क्षेत्र शून्य हो जाते है इस प्रभाव को उन्होंने पदार्थ की अति चालकता नाम दियातथा इन पदार्थो को अति चालक पदार्थ नाम दिया गया।

प्रतिरोध तथा ताप में ग्राफ खींचने पर यह निम्न प्रकार प्राप्त होता है

ग्राफ में देख सकते है की अति चालक पदार्थो में क्रांतिक ताप से कम ताप पर प्रतिरोध का मान शून्य दर्शाया गया है।

प्रतिरोधों का श्रेणी क्रम तथा समान्तर क्रम संयोजन series and parallel combination of resistances

series and parallel combination of resistances in hindi प्रतिरोधों का श्रेणी तथा समान्तर क्रम संयोजन  : विद्युत परिपथ के सभी भागो में हमें भिन्न धारा के मान की आवश्यकता होती है और यह प्रतिरोध के अलग अलग मानो वाले प्रतिरोधों की सहायता से संभव हो पाता है।

प्रतिरोधों का संयोजन हमें उस दशा में करना पड़ जाता है जब हमारे पास जो प्रतिरोध का मान चाहिए वो उपलब्ध नहीं होता लेकिन अन्य मान के प्रतिरोध उपलब्ध होते है , ऐसी स्थिति में हम प्रतिरोधों को का आपस में इस प्रकार संयोजित करते है की हमें आवश्यक प्रतिरोध का मान प्राप्त हो जाए यह संयोजन किसी आवश्यकतानुसार किसी भी प्रकार का हो सकता है श्रेणी , समांतर या मिश्रित।

सामान्तया: प्रतिरोधों का संयोजन दो प्रकार का होता है

1. श्रेणी क्रम संयोजन

2. समान्तर क्रम संयोजन

इनके बारे में विस्तार से पढ़ते है

1. श्रेणी क्रम संयोजन (series combination )

जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधों को इस प्रकार से संयोजित किया जाए की प्रत्येक प्रतिरोध में विद्युत धारा का मान एकसमान हो तो इस प्रकार के प्रतिरोधों के संयोजन को श्रेणी क्रम संयोजन कहते है।

इस प्रकार के संयोजन में प्रतिरोध का दूसरा सिरा अगले प्रतिरोध के पहले सिरे से जुड़ा रहता है और इसी प्रकार दूसरे प्रतिरोध का दूसरा सिरा तीसरे प्रतिरोध के पहले सिरे से जुड़ा रहता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।

चित्रानुसार 3 प्रतिरोध R1 , R2 , R3 है ये तीनो श्रेणीक्रम में जुड़े हुए है , तीनो प्रतिरोधों में समान मान की धारा I प्रवाहित हो रही है , तीनो प्रतिरोधों पर विभवांतर V1 , V2 , V3 है। V1 , V2 , V3 का मान ओम के नियम से निकाल सकते है।

V1 = IR1

V2 = IR2

V3 = IR3

चूँकि परिपथ में आरोपित कुल विभवांतर Vs है।

 V =  V1 +  V2 +  V3

V1 , V2 , V3 का मान रखने पर

V =   IR+ IR+ IR3

V =  I (R1 +  R2 + R3)

चूँकि हम जानते है की V = I R

V का मान ऊपर समीकरण में रखने पर

I R =  I (R1 +  R2 + R3)

अतः

R = R1 +  R2 + R3

यहाँ R को श्रेणी क्रम में प्रतिरोधों का तुल्य या कुल प्रतिरोध कहते है , यहाँ हमने देखा की श्रेणीक्रम में तुल्य प्रतिरोध का मान सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर प्राप्त होता है।

नोट : हमने 3 प्रतिरोध लेकर इसको समझा है , लेकिन 3 से अधिक प्रतिरोध होने पर भी ये ही निष्कर्ष इसी प्रकार निकाला जा सकता है।

निष्कर्ष :

1. सभी प्रतिरोधों में समान धारा प्रवाहित होती है।

2. परिपथ का कुल विभवांतर सभी प्रतिरोधों के विभवान्तर के योग के बराबर होता है।

3. तुल्य प्रतिरोध का मान सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर आता है।

4. तुल्य प्रतिरोध का मान परिपथ में उपस्थित सबसे बड़े प्रतिरोध के मान से भी अधिक प्राप्त होता है।

2. समान्तर क्रम संयोजन (parallel combination of resistances)

जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधों को इस प्रकार से संयोजित किया जाए की प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर का मान समान हो , प्रतिरोधों के इस प्रकार के संयोजन को समांतर क्रम संयोजन कहते है।

इसमें प्रतिरोधों को इस प्रकार जोड़ा जाता है की प्रतिरोधों के एक तरफ के सभी सिरे जुड़े हो और दूसरी तरफ दूसरे सभी सिरे आपस में जुड़े हो जैसा चित्र में दिखाया गया है।

चित्रानुसार 3 प्रतिरोध R1 , R2 , R3 है ये तीनो समांतर क्रम में जुड़े हुए है , तीनो प्रतिरोधों पर विभवांतर V का मान समान है तथा R1 , R2 , R3  में प्रवाहित होने वाली धारा क्रमशः I1 , I2 , I3 है और कुल धारा का मान I है।

ओम के नियम से

V =  I1R1 , V =  I2R2 , V =  I3R3

अतः

I1 = V/R1

I2 = V/R2

I3 = V/R3

परिपथ में प्रवाहित कुल धारा का मान

I = I1 +  I+  I3

 I1 , I2 , I3 का मान रखने पर

I = V/R+  V/R+ V/R3

I =V (1/R+  1/R+ 1/R3)

चूँकि I = V / R

I का मान समीकरण में रखने पर

V / R =V (1/R+  1/R+ 1/R3)

अतः

1 / R =1/R+  1/R+ 1/R3

अतः हम कह सकते है की प्रतिरोधों के समानांतर क्रम में तुल्य प्रतिरोध का मानव्युत्क्रम सभी प्रतिरोधों के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है।

निष्कर्ष

1. समांतर संयोजन में सभी प्रतिरोधों के सिरों पर विभवांतर का मान समान होता है।

2. तुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम सभी प्रतिरोधों के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है।

3. इस प्रकार के संयोजन में जुड़े सबसे कम प्रतिरोध में सबसे अधिक धारा बहती है और सबसे अधिक प्रतिरोध में सबसे कम धारा बहती है।

4. संयोजन का तुल्य प्रतिरोध , परिपथ में उपस्थित सबसे कम प्रतिरोध से भी कम प्राप्त होता है।

सेल , विद्युत वाहक बल , टर्मिनल वोल्टता और आंतरिक प्रतिरोध cell, emf , terminal voltage, internal resistance

cell , electro motive force , terminal voltage and internal resistance in hindi सेल , विद्युत वाहक बल , टर्मिनल वोल्टता और आंतरिक प्रतिरोध  : हम इन सभी के बारे में विस्तार से चर्चा और अध्ययन करेंगे।

विद्युत सेल (electric cell )

वह युक्ति जो किसी परिपथ में स्थायी विद्युत धारा या दो बिन्दुओ के मध्य विभवांतर बनाये रखती है उसे विद्युत सेल कहते है। सभी सेल रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने का कार्य करते है।

अतः हम यह भी कह सकते है कीसेल वह युक्ति है जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन का कार्य करती है

विद्युत सेल परिपथ को ऊर्जा प्रदान करता है अर्थात विभवांतर उत्पन्न करता है जिससे परिपथ में उपस्थित आवेश बहने लगता है और फलस्वरूप परिपथ में धारा बहने लगती है।

विद्युत सेलों के प्रकार : सेल को मुख्यत: दो भागों में बांटा गया है

1. प्राथमिक सेल

2. द्वितीयक सेल

1. प्राथमिक सेल (primary cell )

ये वो सेल होते है जो एक बार रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देते है और इनको चार्ज नहीं किया जा सकता। अतः इनको सिर्फ एक बार उपयोग में लाया जा सकता है इन्हे प्राथमिक सेल कहते है।

उदाहरणशुष्क सेल , डेनियल सेल

2. द्वितीयक सेल (secondary cell ) 

वे सेल जिनमे पहले विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदला जाता है और फिर रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा के रूप में परिपथ में काम में लिया जा सकता है और ऊर्जा खत्म होने पर पुन: चार्ज करके काम में लिए जा सकता है अर्थात पुन: विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित किया जा सकता है।

उदाहरणसीसा संचायक सेल

विद्युत वाहक बल (electromotive force or emf )

एकांक आवेश को परिपथ में बहने के लिए या प्रवाहित होने के लिए सेल द्वारा किया गया कार्य या आवेश को दी गयी ऊर्जा को ही सेल का विद्युत वाहक बल कहा जाता है।

या

जब सेल से कोई धारा प्राप्त नहीं  रही उस स्थिति में दोनों इलेक्ट्रोडो के मध्य विभवान्तर को विद्युत वाहक बल कहते है।

हालंकि इसको बल कहा जाता है लेकिन यह वास्तव में बल नहीं है यह विभवांतर है जो परिपथ में आवेश को प्रवाहित करने के लिए सेल द्वारा परिपथ पर आरोपित किया जाता है।

टर्मिनल वोल्टता (terminal potential difference )

एकांक आवेश को सेल के एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल तक बाहरी परिपथ में प्रवहित करने में सेल द्वारा जो कार्य करना पड़ता है उसे टर्मिनल वोल्टता कहते है।

या

सेल बंद परिपथ में लगा हो तो सेल के दोनों इलेक्ट्रोडो मध्य विभवांतर को टर्मिनल वोल्टता कहते है।

सेल आंतरिक प्रतिरोध (internal resistance of cell )

विद्युत सेल के भीतर धारा के मार्ग में आने वाली बाधा को सेल का आंतरिक प्रतिरोध कहते है।

यह बाधा कई कारण से सकती है जैसे

विद्युत अपघट्य के कारण , सांद्रता इत्यादि।

इसका मात्रक ओम होता है।

सेलों का श्रेणीक्रम संयोजन , समान्तर क्रम संयोजन series & parallel combination of cells

सेलों का संयोजन (combination of cells in hindi ) : हर सेल की एक सीमा होती है है की वह उस सीमा से अधिक धारा परिपथ में प्रवाहित नहीं करता , लेकिन कभी कभी हमारे सामने ऐसी परिस्थिति आती है की हमें अधिक धारा की आवश्यकता होती है इसलिए हमें वांछित धारा प्राप्त करने के लिए सेलो को श्रेणी , समान्तर या मिश्रित क्रम में जोड़ा जाता है , हम आगे विस्तार से इनके बारे में अध्ययन करते है की सेलो को किस प्रकार जोड़ा जाना उचित होगा। तो आइये विस्तार से सेलो के संयोजन का अध्ययन करते है।

सामान्तया: सेलो को दो प्रकार से जोड़ा जा सकता है

. श्रेणीक्रम संयोजन

. समांतर क्रम संयोजन

सेलों का श्रेणीक्रम संयोजन (series combination of cells )

जब सेलों को इस प्रकार जोड़ा जाए की एक सेल का टर्मिनल दूसरे सेल के विपरीत ध्रुवता वाले टर्मिनल से जुड़ा हो तो इस प्रकार के संयोजन को श्रेणीक्रम संयोजन कहते है।

अर्थात एक सेल का धनात्मक सिरा दूसरे सेल के ऋणात्मक सिरे से जुड़ा होगा। जैसा चित्र में दर्शाया गया है।

चित्रानुसार दो सेल श्रेणीक्रम में जुड़े हुए है जिनके विद्युत वाहक बल क्रमशः E1 , E2 हैतथा सेलो का आन्तरिक प्रतिरोध क्रमशःr1 , r2 है।  इन सेलो को श्रेणी क्रम में जोड़कर इस संयोजन से कितनी धारा I प्राप्त की जा सकती है यह देखने के लिए एक प्रतिरोध R जोड़ा गया है , जिसमे संयोजन से कितनी धारा प्रवाहित हो रही है इस बात का अध्ययन किया जावेगा।

बिंदु A तथा B के मध्य विभवान्तर

VAB = V (A) – V (B) = ε1– Ir1.

बिंदुतथा C के मध्य विभवांतर

VBC = V (B) – V (C) = ε2 – Ir2

अतः बिंदु A तथा C के बीच विभवान्तर

VAC  = V (A) – V(C) = [V (A) – V (B)] + V (B) – V (C)]

VAC  =  ε1– Ir+ ε2 – Ir2

VAC  = ( ε1 + ε2) – I(r1+r2).

माना संयोजन में दोनों सेलो का कुल आंतरिक प्रतिरोध req के बराबर है तथा कुल विद्युत वाहक बल εeq है।

तो

 VAC = εeq – I req.

VAC  के दोनों समीकरणों की तुलना करने पर

εeq  = ( ε1 + ε2)

req  = (r1+r2)

पूरे परिपथ के लिए ओम के नियम से निम्न समीकरण बनेगा

VA – VC = I R = ε1– Ir1  + ε2 – Ir2

I (R + r1 + r2) = εε2

I = εε/ (R + r1 + r2)

I = εeq / (R +  req)

निष्कर्ष

सेलो को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाए तो परिणामी विद्युत वाहक बल सेलो के वि. वा.बल के योग के बराबर होता है।

यदि बैटरी की ध्रुवता बदल दी जाये तो ε1 – ε2 की जगह ε– ε1  हो जायेगा।

सेलों का समान्तर क्रम संयोजन (parallel combination of cells )

जब एक सेल को दूसरे सेल से इस प्रकार जोड़ा जाये की उनके समान ध्रुवता वाले सिरे आपस में जुड़े हो तो इस प्रकार के संयोजन को समांतर क्रम संयोजन कहते है।

अर्थात बैटरी का धनात्मक सिरा अगले बैटरी के धनात्मक सिरे से जुड़ा होगा और इसी प्रकार आगे क्रम चलता रहेगा। जैसा चित्र में दिखाया गया है।

चित्रानुसार दो सेल E1 , E2  समांतर क्रम में जुड़े है जिनके आन्तरिक प्रतिरोध क्रमशः r1 , r2  है। कुल धारा I है तो परिपथ में I1 , I2 के रूप में बंट जाती है।

कुल धारा I = I1 + I2

हम जानते है की समांतरक्रम में विभवांतर समान होता है माना विभवांतर V है अतः

V = ε1– I1 r1

V = ε2 – I2 r2

समीकरणों  से I1 , I2 के मान निकालने पर

कुल धारा I = I1 + I2

I1 + Iके मान रखने पर

माना संयोजन का कुल विद्युत वाहक बल εeq तथा कुल आंतरिक प्रतिरोध req है अतः

विद्युत ऊर्जा तथा विधुत शक्ति की परिभाषा क्या है electric energy and electrical power in hindi

electric energy and electrical power in hindi विद्युत ऊर्जा तथा विधुत शक्ति की परिभाषा क्या है  : हम इन दोनों के बारे में विस्तार से पढ़ते है।

1. विद्युत ऊर्जा (electric energy) : हम जानते है की परिपथ में धारा प्रवाह के लिए विद्युत सेल द्वारा कार्य करना पड़ता है

एक निश्चित समय में परिपथ में धारा प्रवाह के लिए सेल द्वारा किया गया कार्य विद्युत ऊर्जा कहलाती है

या

निश्चित समय में सेल द्वारा परिपथ को दी गयी ऊर्जा ही विद्युत ऊर्जा कहलाती है

माना किसी सेल द्वाराप्रतिरोध के परिपथ में I मान की धारा t समय तक प्रवाहित की जाए तो t समय में परिपथ में प्रवाहित कुल आवेश का मान q = It

माना सेल द्वारा परिपथ मेंविभवांतर आरोपित किया गया है अतः सेल द्वारा किया गया कार्य होगा

W = qV

q का मान रखने पर

W =  ItV

हमने ओम का नियम पढ़ा था जिसके अनुसार

V = IR

मान पिछली समीकरण में रखने पर

W = It IR

W = IRt

विद्युत ऊर्जा का SI मात्रक जूल होता है।

विधुत शक्ति (electrical power )

सेल द्वारा परिपथ में धारा प्रवाह के लिए किये गए कार्य की दर या सेल द्वारा परिपथ को इकाई समय में दी गयी ऊर्जा उस परिपथ की विद्युत शक्ति कहलाती है।

इसको P से लिखा जाता है।

हमने ऊपर पढ़ा है की t समय में सेल द्वारा परिपथ में विद्युत धारा प्रवाह के लिए किया  कार्य या दी गयी ऊर्जा

W = IRt

विद्युत शक्ति होती है इकाई समय में किया गया कार्य अतः परिभाषा से

विद्युत शक्तिविद्युत ऊर्जा /t

P = W /t

W का मान रखकर हल करने पर

P = IR

विद्युत शक्ति का मात्रक वाट (watt ) होता है।

वाट = जूल / सेकण्ड

विद्युत शक्ति मापने के लिए अश्व शक्ति का भी उपयोग करते है।

1 अश्व शक्ति = 746 वाट (watt )

 

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