विद्युत परिपथ पाठ 6 भौतिक विज्ञान electrical circuit notes in hindi 12th class
किरचॉफ का
प्रथम
नियम
, द्वितीय नियम
, किरचॉफ़ के
नियम
Kirchhoff’s law in hindi
Kirchhoff’s law in hindi किरचॉफ का प्रथम नियम , द्वितीय नियम किरचॉफ के नियम : हमने ओम का नियम पढ़ा है जिसकी सहायता से परिपथ में प्रवाहित धारा , विभवान्तर इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।
लेकिन ओम का नियम सरल परिपथों के लिए ही उपयोगी है। जटिल परिपथों को हल करने के लिए ओम के नियम से कठिनाई हो जाती है।
अतः जटिल परिपथों को हल करने के लिए किरचॉफ ने दो नियम दिए इन्हे किरचॉफ के नियम कहते है।
हम इन दोनों नियमों को विस्तार से पढ़ेंगे उससे पहले इससे सम्बन्धित कुछ परिभाषाएं पढ़ लेते है।
संधि : विद्युत परिपथ का वह बिंदु जहाँ तीन या तीन से अधिक शाखाएँ मिलती है उसे संधि कहते है।
शाखा : परिपथ का वह भाग जिसमे धारा का मान नियत रहता है शाखा कहलाती है।
लूप : प्रतिरोधों , चालकों इत्यादि से बने बंद परिपथ को लूप कहते है।
किरचॉफ का प्रथम नियम (Kirchhoff’s first law)
किरचॉफ़ का पहला नियम संधि नियम भी कहलाता है , क्यूंकि यह सन्धि से सम्बन्धित है। इस नियम के अनुसार
“किसी वैद्युत परिपथ में किसी सन्धि पर मिलने वाली सभी धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है “
अर्थात
∑I = 0
इस नियम को हम इस प्रकार भी कह सकते है
” विद्युत परिपथ में किसी संधि पर प्रवेश करने वाली धारा का योग , उसी संधि से निकलने वाली धारा के योग के बराबर होता है “
किसी संधि पर आने वाली धाराओं का योग = उसी संधि से जाने वाली धाराओं का योग
इसे किरचॉफ का प्रथम नियम कहते है।
यह नियम आवेश संरक्षण के नियम पर आधारित है इसलिए तो संधि पर आने वाली धारा अर्थात आने वाला आवेश जाने वाले आवेश के बराबर होता है।
चित्र को ध्यान से देखिये इसमें किसी संधि से 5 धाराएं सम्बन्धित दिखाई गयी है। इनमे से
I1 व I2 धाराएं संधि में प्रवेश कर रही है जबकि I3 ,
I4 ,I4 धाराएं संधि से बाहर निकल रही है।
किरचॉफ़ के नियम से
संधि पर प्रवेश करने वाली धाराओं का योग = संधि से निकलने वाली धाराओं का योग
अतः
किरचॉफ का द्वितीय नियम (Kirchhoff’s second law)
किरचॉफ के दूसरे नियम को लूप का नियम भी कहते है क्यूंकि यह लूप से सम्बंधित है। इस नियम के अनुसार
” किसी बंद परिपथ या लूप में परिपथ का परिणामी विद्युत वाहक बल , परिपथ के सभी अवयवों के सिरों पर उत्पन्न विभवांतरों के योग के बराबर होता है “
या
” बंद परिपथ या लूप मे प्रतिरोधों के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर का बीजगणितीय योग उस परिपथ में स्थित सेलो के विद्युत वाहक बालो के बीजगणितीय योग के बराबर होता है।
∑IR = ∑ε
इस समीकरण को किसी परिपथ में लागू करने के लिए चिन्हों का ध्यान रखना पड़ता है ये निम्न है
1. परिपथ में विद्युत धारा की दिशा में चलने पर प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर का मान धनात्मक लेते है तथा धारा के विपरीत दिशा में चलने पर प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर ऋणात्मक लेते है।
2. परिपथ में विद्युत धारा की दिशा में चलने पर रास्ते में सेल के ऋण सिरे से धन सिरे की ओर चलने पर विधुत वाहक बल धनात्मक लेते है तथा सेल के धन सिरे से ऋण सिरे की ओर चलने पर विद्युत वाहक बल को ऋणात्मक लेते है।
हमें निम्न लूप के लिए किरचॉफ का नियम उपयोग लेते हुई समीकरण लिखकर हल करना है
R1 प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर = IR1
R2 प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर = IR2
चिन्हों का ध्यान का ध्यान रखते हुए विभवांतर IR1 तथा IR2 को धनात्मक लेते है तथा सेल में ऋण टर्मिनल से धन टर्मिनल की तरफ चला जा रहा है अतः सेल का विद्युत वाहक बल भी धनात्मक होगा
अतः
किरचॉफ के द्वितीय नियम से
प्रतिरोधों के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर का बीजगणितीय योग = सेलो के विद्युत वाहक बालो के बीजगणितीय योग
अतः
इसे आवश्यकतानुसार आगे भी निम्न प्रकार हल किया जा सकता है और हर मान ज्ञात किया जा सकता है।
व्हीटस्टोन सेतु
क्या
है
, संरचना चित्र
, सिद्धान्त , उपयोग
wheatstone bridge in hindi
व्हीटस्टोन सेतु (wheatstone’s bridge) : किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए इंग्लैंड के वैज्ञानिक सी. एफ. व्हीटस्टोन ने चार प्रतिरोध , एक सेल तथा एक धारामापी का उपयोग कर एक युक्ति (परिपथ) बनाई इसे व्हीटस्टोन सेतु कहते है।
इस विशेष परिपथ (युक्ति) का उपयोग करके किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।
व्हीटस्टोन सेतु की रचना (structure of Wheatstone bridge) : इसकी संरचना चित्र में दिखाई गयी है।
चित्रानुसार इसमें चार प्रतिरोध होते है P , Q , R , S
यहाँ प्रतिरोध P तथा Q श्रेणीक्रम में है और इसी प्रकार R व S आपस में श्रेणी क्रम में है। फिर दोनों श्रेणीक्रम संयोजनों को आपस में समान्तर में जोड़ा गया है।
पॉइंट b तथा d के मध्य एक धारामापी जुड़ा हुआ है।
बिंदु a तथा c के मध्य E विद्युत वाहक बल की बैटरी जुडी हुई है।
व्हीट स्टोन सेतु का सिद्धान्त (principle of wheatstone
bridge)
परिपथ में E विधुत वाहक बल की बैटरी लगी हुई है माना परिपथ में मुख्य धारा I निकलती है जब यह धारा बिंदु a पर पहुँचती है तो इसे दो मार्ग मिलते है इसलिए यह I1 &
I2 में विभक्त हो जाती है फिर I1 को b बिंदु पर तथा I2 को d बिंदु पर दोबारा दो मार्ग प्राप्त होते है यहाँ I1 &
I2 के विभाजन के लिए तीन स्थितियाँ बनती है
1. जब b बिंदु पर विभव (Vb) का मान d बिंदु पर उत्पन्न विभव (Vd) से ज़्यादा है अर्थात Vb > Vd इस स्थिति में चूँकि b बिंदु पर विभव का मान ज़्यादा है और d बिंदु पर विभव कम है अतः b से d की तरफ धारा का प्रवाह होगा लेकिन धारा निम्न विभव से उच्च विभव की तरफ नहीं होता अतः d से b की तरफ धारा प्रवाहित नहीं हो सकती।
अतः जब Vb > Vd है इस स्थिति में I1 धारा दो तरफ बंट जाती है इसका एक हिस्सा धारा मापी में चला जाता है और दूसरा हिस्सा Q प्रतिरोध में दूसरी तरफ d बिंदु पर विभव कम है अतः यह I2 धारा धारामापी की तरफ नहीं जाती है और सम्पूर्ण धारा S प्रतिरोध में चली जाती है।
2. दूसरी स्थिति पहली स्थिति की विपरीत होगी अर्थात d बिंदु पर विभव ज़्यादा हो सकता है और b बिंदु पर कम अर्थात Vb < Vd इस स्थिति में चूँकि d बिंदु पर विभव अधिक है अतः धारा d से b की तरफ बह सकती है लेकिन b से d की तरफ नहीं बह सकती।
अतः इस स्थिति में I2 धारा दो तरफ बंट जाती है इसका एक हिस्सा धारा मापी में चला जाता है और दूसरा हिस्सा S प्रतिरोध में चला जाता है तथा दूसरी तरफ b बिंदु पर विभव कम है अतः यह I1 धारा धारामापी की तरफ नहीं जाती है और सम्पूर्ण धारा Q प्रतिरोध में चली जाती है।
3. तीसरी स्थिति में बिंदु b तथा d पर विभव का मान समान है अर्थात Vb = Vd इस स्थिति में चूँकि दोनों सिरों पर विभव समान है अतः धारा मापी की तरफ कोई धारा नहीं जाती है अर्थात b-d में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है क्योंकि धारा प्रवाहित होने के लिए विभान्तर की आवश्यकता होती है और चूँकि यहाँ दोनों बिंदु पर समान आवेश है।
अतः इस स्थिति में I1 धारा पूर्ण Q प्रतिरोध पर तथा I2 धारा पूर्ण S प्रतिरोध पर पूर्ण रूप से पहुंच जाती है तथा धारामापी में शून्य धारा होने से कोई विक्षेप नहीं होता है इसे सेतु की संतुलन की स्थिति कहते है।
सेतु की संतुलन की अवस्था में इस
Vb = Vd
Va – Vb = Va – Vd
I1P = I2R
I1/I2 =
R/P
दूसरी तरफ
Vb = Vd
Vb – Vc = Vd – Vc
I1Q = I2S
I1/I2 =
S/Q
I1/I2 की समीकरणों की तुलना करने हम पाते है
R/P = S/Q
इस समीकरण का उपयोग किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए की जाती है जैसे मान लीजिये व्हीट सेतु ब्रिज में S प्रतिरोध अज्ञात है तो
S = QR/P
इसमें P , Q , R का मान रखते ही अज्ञात S
प्राप्त हो जाता है।
इस प्रकार व्हीटसेतु ब्रिज की सहायता से अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात किया जाता है।
विभवमापी क्या
है
, पोटेंशियोमीटर संरचना चित्र
, सिद्धान्त तथा
कार्यविधि potentiometer diagram , principle
potentiometer
diagram , principle working in hindi पोटेंशियोमीटर विभवमापी क्या है , संरचना चित्र , सिद्धान्त तथा कार्यविधि : एक ऐसा उपकरण जिसकी सहायता से किसी विभवान्तर या विद्युत वाहक बल का मापन किया जाता है उसे विभवमापी कहते है , इस युक्ति की सहायता से शुद्धता से विभवान्तर का मापन किया जाता है।
अतः याद रखे की जब हमें किसी सेल का विद्युत वाहक बल या दो बिन्दुओ के मध्य विभवान्तर का मान ज्ञात करना होता है तब हम विभवमापी का उपयोग करते है। यह अनंत प्रतिरोध का वोल्ट्मीटर होता है।
किसी सेल का विद्युत वाहक बल निम्न प्रकार ज्ञात करते है
किसी प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर का मान निम्न प्रकार ज्ञात करते है
संरचना चित्र (structure diagram construction of potentiometer ):
विभवमापी का चित्र निचे दिखाया गया है।
इसमें सामान्तया: मैंगनीन या कांस्टेटन का तार इस्तेमाल करते है क्योंकि इन मिश्र धातुओं का विशिष्ट प्रतिरोध का मान अधिक होता है तथा तप गुणांक का मान बहुत कम होता है ताकि ये ताप से कम प्रभावित रहे।
इसमें एक 10 मीटर का तार लेते है जिसका अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल समान रहे अर्थात जिसकी मोटाई हर जगह पर समान हो , अब इस 10 मीटर तार को एक एक मीटर का काटकर दस भाग कर लेते है और लकड़ी के एक मीटर स्केल के समांतर तनी हुई अवस्था में बांध देते है जैसा चित्र में दर्शाया गया है , इसमें एक सर्पी कुंजी भी लगी रहती है जिसे जरुरत अनुसार सरकाया जा सके और किसी भी तार से स्पर्श करवाया जा सके इसे भी चित्र में दिखाया गया है। सभी तार तांबे की पत्तियों की सहायता से श्रेणीक्रम में जुड़े रहते है।
विभवमापी का सिद्धान्त तथा कार्यविधि (principle of potentiometer and working )
हम जानते है की विभवमापी की सहायता से किसी सेल का विद्युत वाहक बल ज्ञात किया जाता है।
अज्ञात विभवांतर या वि.वा.बल ज्ञात करने के लिए अज्ञात विद्युत वाहक बल की तुलना विभव मापी के तार पर ज्ञात विभवांतर से करते है , जब परिपथ में लगे धारामापी में कोई विक्षेप नहीं होगा इस स्थिति में अज्ञात विभवांतर , तार पर ज्ञात विभवांतर के बराबर होगा। यही इसका सिद्धान्त है।
माना L लम्बाई का AB प्रतिरोध तार है , इस तार के सिरों पर एक सेल जोड़ते है जिसका विद्युत वाहक बल E है तथा आंतरिक प्रतिरोध नगण्य है , अतः तार के सिरों पर E विभवान्तर उत्पन्न हो जायेगा।
चूँकि तार का काट क्षेत्रफल समान है अतः तार में उत्पन्न विभव प्रवणता
K = E /L
अब जैसे मान लीजिये हमें A बिंदु से l दुरी पर विभवांतर ज्ञात करना है तो वह ( Kl) होगा।
अब हम चित्रानुसार अज्ञात विद्युत वाहक बल E’ का सेल जोड़ देते है।
E’ जोड़ने से धारामापी में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है , अब सर्पी कुंजी को बिंदु A से B की तरफ स्पर्श करवाते हुए ले जाते है और तार पर वह बिंदु ज्ञात करते है जिस पर धारामापी में विक्षेप शून्य हो जाता है , इस बिंदु को स्केल में पढ़ते है की संतुलन की स्थिति कहा प्राप्त होती है और उस बिंदु पर तार का विभवांतर ज्ञात करते है क्योंकि सिद्धांत से उस बिंदु पर तार का विभवांतर का मान ही अज्ञात सेल का विद्युत वाहक बल होगा।
माना तार पर l लम्बाई पर धारामापी में शून्य विक्षेप प्राप्त होता है।
अतः l लम्बाई पर विभवांतर V = Kl
संतुलन की अवस्था E’ = V
अतः अज्ञात सेल का विद्युत वाहक बल E’ = Kl
विभवमापी का
मानकीकरण , विभव
मापी
की
सुग्राहिता standardisation of potentiometer
standardisation of potentiometer in hindi विभवमापी का मानकीकरण : हम जानते है की लम्बाई के साथ साथ विभवान्तर में परिवर्तन को विभव प्रवणता कहते है हमने इसे यहाँ K से प्रदर्शित किया है , हमने विभवमापी क्या है में जब अज्ञात विद्युत वाहक बल ज्ञात किया तो प्राथमिक सेल तथा अज्ञात वि.धु.वा बल सेल का आंतरिक प्रतिरोध तथा तार का प्रतिरोध नगण्य माना।
लेकिन हम आपको बता दे की विभव प्रवणता का मान इन तीनो पर निर्भर करता है इसलिए हम इनको ध्यान में रखते हुए पहले विभव प्रवणता का मान ज्ञात करेंगे जिसके आधार पर अज्ञात वि.धु.वा ज्ञात्त करेंगे जो अधिक सही प्राप्त होगा इसको विभवमापी का मानकीकरण कहते है।
विभव मापी का मानकीकरण का सीधा उद्देश्य विभवमापी द्वारा अज्ञात वि.वा. बल का सही (यथार्थ) मान ज्ञात करना है।
विभवमापी का मानकीकरण करने के लिए चित्रानुसार एक ज्ञात विद्युत वाहक बल का मानक सेल जोड़ देते है।
जो हमने मानक सेल जोड़ा है वह ऐसा सेल है जिसका विद्युत वाहक बल एक लम्बे समय तक नियत बना रहता है , सामान्तया: डेनियल सेल को मानक सेल की तरह काम में लिया जाता है। डेनियल सेल का 20 डिग्री ताप पर विद्युत वाहक बल 1.08 V होता है।
मानक सेल लगाने के बाद सर्पी कुंजी को A से B की ओर तार को स्पर्श करवाते हुए खिसकाते है और धारामापी में शून्य विक्षेप की स्थिति ज्ञात करते है , मान लीजिये तार पर C बिंदु पर धारामापी में विक्षेप शून्य प्राप्त होता है यह तार पर l लम्बाई पर प्राप्त होता है। माना मानक सेल का वि.वा.बल E” है
अतः विभव प्रवणता K = E”/l
विभवमापी की सुग्राहिता (sensitivity of potentiometer)
सुग्राहिता से तात्पर्य है की विभव मापी की वह क्षमता की वह किसी अज्ञात विद्युत वाहक बल के छोटे से छोटे मान को भी यथार्थता से ज्ञात कर सके।
विभवमापी की सुग्राहिता का मान निम्न बातों पर निर्भर करती है
विभव प्रवणता अर्थात एकांक लम्बाई पर विभव पतन या विभवान्तर में परिवर्तन
अतः सुग्राहिता का मान बढ़ाने के लिए प्रयुक्त तार की लम्बाई को बढ़ा देना चाहिए क्योंकि तार पर विभव प्रवणता का मान जितना कम होगा विभव मापी की सुग्राहिता उतनी ही अधिक होगी।
प्राथमिक सेल
का
आंतरिक प्रतिरोध ज्ञात
करना
determination of internal resistance of a primary cell
determination of internal resistance of a primary cell प्राथमिक सेल का आंतरिक प्रतिरोध ज्ञात करना : विभवमापी के अनुप्रयोग में से एक उपयोग यह भी है इसको प्राथमिक सेल आंतरिक प्रतिरोध का मान ज्ञात करने में प्रयोग करते है , अब यह किस प्रकार करते इसके बारे में आगे विस्तार से अध्ययन करते है।
चित्रानुसार एक परिपथ बनाते है इसमें E0 विद्युत वाहक बल की बैटरी , k1
कुंजी , तथा Rh धारा नियंत्रक को चित्रानुसार जोड़कर इस परिपथ को तार AB के श्रेणीक्रम में जोड़ते है इस पूरे परिपथ को हम प्राथमिक परिपथ कहते है।
फिर एक द्वितीयक परिपथ बनाते है इसमें E विद्युत वाहक बल की बैटरी का धन सिरा विभवमापी के A सिरे से जोड़ते है तथा ऋण सिरे पर धारामापी जोड़ते हुए सर्पी कुंजी J जोड़ते है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
द्वितीयक परिपथ पर एक प्रतिरोध R
तथा कुंजी k2 को भी चित्रानुसार जोड़ कर परिपथ को पूरा करते है।
कार्यविधि (working )
सबसे पहले k1 कुंजी को बंद करके प्राथमिक परिपथ को पूर्ण करते है तथा दूसरी तरफ द्वितीयक परिपथ में k2 कुंजी को खुला छोड़ देते है।
इस स्थिति में सर्पी कुंजी J को तार AB पर खिसकाकर धारामापी में शून्य विक्षेप की अवस्था ज्ञात करते है अर्थात सेल E के लिए विद्युत वाहक बल का मान ज्ञात करते है।
माना L1 लम्बाई पर धारामापी में शून्य विक्षेप की अवस्था आती है अर्थात संतुलन की अवस्था आती है। तथा तार पर एकांक लम्बाई पर विभव में परिवर्तन (विभव प्रवणता ) x है अतः
विद्युत वाहक बल E = xL1
अब दूसरी स्थिति में हम प्राथमिक परिपथ को तो यथावत रखते है लेकिन द्वितीयक परिपथ में k2 कुंजी को बंद कर देते है।
इस स्थिति में R प्रतिरोध से धारा प्रवाहित होने लगती है तथा R के सिरों पर विभवांतर उत्पन्न हो जाता है , माना इस विभवांतर का मान V है।
इस स्थिति में प्रतिरोध R के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर , सेल के विद्युत वाहक बल के बराबर होगा अर्थात V = E .
दूसरी स्थिति में कुंजी k2 को बंद करने के बाद सर्पी कुंजी को तार पर खिसकाकर संतुलन स्थिति ज्ञात करते है माना हमें इस स्थिति पर संतुलन की अवस्था तार पर L2 लम्बाई पर प्राप्त होती है अतः
V = xL2
चूँकि हम पढ़ चुके है की जब सेल का आंतरिक प्रतिरोध r है और तार में धारा I प्रवाहित हो रही हो तो E तथा V में सम्बन्ध को निम्न प्रकार दिखाते है
E = V + rI
अतः
r = (E – V )/I
चूँकि V = IR
अतः
r = (E – V )R/V
समीकरण में E तथा V का मान ऊपर समीकरण से रखने पर
r = (xL1 – xL2 )R/xL2
अतः
सेल का आंतरिक प्रतिरोध r = (L1 – L2 )R/L2
प्राप्त समीकरण सूत्र स्पष्ट है की R का मान रखकर तथा L1 , L2 का मान रखकर सेल का आंतरिक प्रतिरोध ज्ञात कर सकते है।
दो
सेलों
के
विद्युत वाहक
बलों
की
तुलना
comparision of electro motive forces of two cells
comparision
of electro motive forces of two cells दो सेलों के विद्युत वाहक बलों की तुलना : यदि हमें दो सेलो के वि.वा.बल की तुलना करनी है तो यह हम विभवमापी की सहायता से कर सकते है , अब यह हम किस प्रकार कर सकते है इसके बारे में हम विस्तार से आगे अध्ययन करते है।
सबसे पहले हमें चित्रानुसार परिपथ बनाना है।
परिपथ डायग्राम (चित्र ) की व्याख्या
चित्रानुसार एक सेल जिसका विद्युत वाहक बल E है को प्रतिरोध Rh , कुंजी K तथा तार AB को आपस में जोड़ते है तथा इस पूरे परिपथ को प्राथमिक परिपथ कहते है।
अब दो सेल लेते है जिनके विद्युत वाहक बल क्रमशः E1 &
E2 है , दोनों सेलो के धन सिरे को चित्रानुसार A पॉइंट से जोड़ते है तथा इनके ऋण सिरे को क्रमशः 1 व 2 द्विमार्गी कुंजी से संयोजित करते है।
अब द्विमार्गी कुंजी से एक धारामापी G तथा सर्पी कुंजी J से जोड़ते है , इस पूरे परिपथ को हम द्वितीयक परिपथ कहते है।
कार्यविधि वर्णन (working explanation )
सबसे पहले प्राथमिक परिपथ में कुंजी k1 को बंद करते है तथा द्विमार्गी कुंजी में 1 तथा 3 के मध्य डॉट लगाते है जिससे द्वितीयक परिपथ पूर्ण हो जाता है , अब सर्पी कुंजी J को तार AB को स्पर्श करते हुए वह बिंदु ज्ञात करते है जिस पर धारामापी में विक्षेप शून्य हो जाए इसे हम संतुलन की स्थिति कहते है। यह हम सेल E1 का विद्युत वाहक बल ज्ञात करने के लिए कर रहे है।
माना हमें यह संतुलन की स्थिति तार की L1 लम्बाई पर प्राप्त होती है।
माना तार पर विभव प्रवणता x है तो
सेल का विद्युत वाहक बल E1 = xL1
द्वितीय स्थिति में प्राथमिक परिपथ को यथावत रखते है तथा द्वितीयक परिपथ में द्विमार्गी कुंजी में 1 तथा 3 के मध्य लगे डॉट को हटाते है तथा टर्मिनल 2 तथा 3 के मध्य डॉट लगाते है।
अब सेल E2 का विद्युत वाहक बल ज्ञात करने के लिए सर्पी कुंजी J को तार AB पर सरकाते है और धारामापी में जीरो विक्षेप की स्थिति ज्ञात करते है।
माना हमें तार AB पर L2 लम्बाई पर संतुलन की स्थिति मिलती है अतः
विद्युत वाहक बल E2 = xL2
दोनों प्राप्त समीकरणों से
E1 / E2 = xL1 / xL2
अतः
E1 / E2 = L1 / L2
अतः
सेलों का विद्युत वाहक बल का अनुपात संतुलन स्थिति की लम्बाई के अनुपात केबराबर होता है।
अल्प
प्रतिरोध ज्ञात
करना
measurement of small resistance in hindi
measurement of small
resistance in hindi अल्प प्रतिरोध ज्ञात करना : जब किसी परिपथ में कोई अज्ञात अल्प प्रतिरोध जुड़ा हो तो हम विभवमापी का उपयोग करके उस अल्प प्रतिरोध का मान ज्ञात कर सकते है।
यह हम किस प्रकार कर सकते है आइये इसके बारे में अध्ययन करते है।
परिपथ बनावट चित्र (circuit diagram )
अल्प प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए हमें हमें जो परिपथ बनाना है वह चित्र में दर्शाया गया है।
जैसा चित्र में दिखाया गया है एक सेल जिसका विद्युत वाहक बल E है , कुंजी K1 ,
धारा नियंत्रक Rh तथा तार AB को आपस में जोड़ते है इसे प्राथमिक परिपथ कहते है।
फिर चित्रानुसार प्रतिरोध R ,
r तथा धारा नियंत्रक Rh तथा बैटरी E’ कुंजी K2 को ध्यानपूर्वक जोड़ते है।
प्रतिरोध R के एक सिरे को तार के उच्च विभव वाले टर्मिनल A से जोड़ते है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
दूसरी ओर द्विमार्गी कुंजी का एक टर्मिनल R व r के मध्य जोड़ते है तथा दूसरा टर्मिनल प्रतिरोध r व धारा नियंत्रक Rh के मध्य जोड़ते है तथा तीसरे टर्मिनल पर धारामापी से होकर एक विसर्पी कुंजी J जोड़ देते है।
नोट : चित्र में देखकर परिपथ ध्यान से बनाये अन्यथा आउटपुट सही नहीं आएगा।
यहाँ ध्यान दे की परिपथ में प्रतिरोध r अल्प अज्ञात है जिसका मान हमें ज्ञात करना है।
कार्यविधि (working )
चित्रानुसार परिपथ बनाने के बाद परिपथ में लगी हुई कुंजी K1 तथा K2 में डॉट लगाते है तथा प्राथमिक व द्वितीयक परिपथ को पूर्ण करते है।
तथा प्रतिरोध R के सिरों पर विभवांतर का मान ज्ञात करने के लिए द्विमार्गी कुंजी के टर्मिनल 1 व 2 के मध्य डॉट लगाते है तथा सर्पी कुंजी को तार A-B पर A से B की तरफ स्पर्श करते हुए सरकाते है और धारामापी में शून्य विक्षेप की स्थिति अर्थात संतुलन की स्थिति ज्ञात करते है , मान लेते है की संतुलन की स्थिति तार पर L1 लम्बाई पर प्राप्त होती है , द्वितीय परिपथ में प्रवाहित धारा I है तथा प्रतिरोध R के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर V है।
विभवमापी का सिद्धान्त के अनुसार R पर विभवान्तर
V = xL1
ओम का नियम से अनुसार R पर विभवान्तर
V = IR
दोनों समीकरणों से
IR = xL1
इसके बाद द्विमार्गी कुंजी के टर्मिनल 1 व 2 के मध्य डॉट हटा देते है तथा टर्मिनल 2 व 3 के मध्य डॉट लगाते है तथा सर्पी कुंजी को तार AB पर A से B की तरफ स्पर्श करते हुए सरकाते है और धारामापी में शून्य विक्षेप की स्थिति अर्थात संतुलन की स्थिति ज्ञात करते है , मान लीजिये की संतुलन की स्थिति तार AB पर L2 लम्बाई पर प्राप्त होती है , इस स्थिति में प्रतिरोध R तथा अल्प प्रतिरोध r दोनों श्रेणीक्रम में होंगे अतः कुल प्रतिरोध (R +
r ) , माना इसके सिरों पर विभवान्तर V1 तथा धारा I है
अतः विभवमापी सिद्धान्त के अनुसार
V1 = xL2
ओम के नियम से अनुसार (R + r ) पर विभवान्तर
V1 = I(R + r )
समीकरणों की तुलना करने पर
I(R + r ) = xL2
ज्ञात समीकरण
IR = xL1
दोनों समीकरणों से
I(R + r )/ IR = xL2 / xL1
हल करने से अज्ञात अल्प प्रतिरोध
r = (L2 – L1)R/L1
निम्न सूत्र में सभी मान रखकर अल्प प्रतिरोध का मान ज्ञात कर सकते है।
वोल्टमीटर का
अंशशोधन Calibration of Voltmeter in hindi
Calibration
of Voltmeter in hindi वोल्टमीटर का अंशशोधन : जब वोल्टमीटर की सहायता से दो बिन्दुओ के मध्य विभवान्तर का मान ज्ञात किया जाता है तो यह अशुद्ध या गलत प्राप्त होता है।
इसके निम्न कारण हो सकते है
§ वोल्टमीटर में उपयोग की गयी स्प्रिंग के स्प्रिंग नियतांक का नियत नहीं रहना या विचलन
§ वोल्टमीटर के स्केल पर सही चिन्ह या अंक अंकित न होना।
§ प्रयुक्त उपकरणों में यांत्रिक त्रुटियां।
चूँकि हम यह जानते है की विभवमापी द्वारा विभवांतर का सही मापन प्राप्त होता है।
अतः वोल्टमीटर से प्राप्त अशुद्ध (गलत ) मान को , विभवमापी से प्राप्त शुद्ध (सही ) मान से जाँच करना ही वोल्टमीटर का अंशशोधन कहलाता है।
जिस परिपथ की सहायता से हम वोल्टमीटर का अंशशोधन करेंगे वह यहाँ दिखाया गया है।
परिपथ संयोजन
परिपथ की रचना करने के लिए सेल (e) , कुंजी K1 , धारा नियंत्रक Rh तथा तार AB को श्रेणीक्रम में जोड़कर प्राथमिक सर्किट बनाते है।
इसके बाद द्वितीयक परिपथ में एक मानक सेल (E0) का धन सिरा तार के A सिरे से जोड़ते है। तथा दूसरा सिरा द्विकुंजी 1 से जोड़ देते है।
इसके बाद एक सेल , कुंजी K2 , धारानियंत्रक Rh , और प्रतिरोध बॉक्स RB को आपस में श्रेणीक्रम में जोड़ते है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
चित्रानुसार प्रतिरोध बॉक्स RB का उच्च विभव सिरा तार के A सिरे से जोड़ देते है। तथा दूसरा सिरा द्विकुंजी 3 से जोड़ देते है।
जिस वोल्टमीटर V का अंशशोधन करना है उसको प्रतिरोध बॉक्स RB के सिरों पर जोड़ देते है।
फिर द्विमार्गी कुंजी के टर्मिनल 2 से धारामापी G से होकर सर्पी कुंजी C जोड़ते है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
कार्यविधि (working )
ऊपर बताये अनुसार परिपथ पूर्ण करने के बाद कुंजी K1 में डॉट लगाते है तथा द्विमार्गी कुंजी में टर्मिनल 1 व 2 के बिच डॉट लगाते है तथा सर्पी कुंजी को A से B की तरफ सरकाते हुए धारामापी में शून्य विक्षेप या संतुलन की अवस्था ज्ञात करते है इससे मानक सेल (E0) का विद्युत वाहक बल ज्ञात करते है।
माना इस स्थिति में संतुलन की स्थिति L0 लम्बाई पर प्राप्त होती है तथा तार AB पर विभव प्रवणता x है तो
मानक सेल का विद्युत वाहक (E0) = xL0
अतः x = E0/L0
इसके बाद द्विमार्गी कुंजी के टर्मिनल 1 व 2 के बिच डॉट हटा देते है तथा टर्मिनल 2 व 3 के बिच डॉट लगाते है और कुंजी K2 पर भी डॉट लगा देते है और धारा नियंत्रक में स्वेच्छा से प्रतिरोध हटाकर वोल्ट्मीटर V पर पाठ्यांक नोट कर लेते है , वोल्ट्मीटर V पर प्राप्त यह पाठयांक त्रुटिपूर्ण पाठ्यांक कहलाता है। यह पाठ्यांक स्वेच्छा से हटाए गए प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर (V) का मान है।
सही मान ज्ञात करने के लिए सर्पी कुंजी को AB तार पर सरकाते है और धारामापी पर शून्य विक्षेप स्थिति ज्ञात करते है।
माना शून्य विक्षेप स्थिति L1 लम्बाई पर प्राप्त होती है तथा तार AB पर विभव प्रवणता x है तो
प्रतिरोध पर विभवांतर V’ = xL1
अतः वोल्ट्मीटर के पाठ्यांक में त्रुटी
∇V = V – V’
अतः वोल्ट्मीटर का सही पाठ्यांक
V’ = V – ∇V
अमीटर
का
अंशशोधन Calibration of ammeter in hindi
Calibration of ammeter in hindi अमीटर का अंशशोधन : जब किसी परिपथ में प्रवाहित धारा का मान अमीटर की सहायता से ज्ञात किया जाता है तो धारा का यह पाठ्यांक गलत हो सकता है इसलिए अमीटर से प्राप्त पाठ्यांक को विभवमापी से प्राप्त धारा के पाठ्यांक से जाँच की जाती है , अमीटर के पाठ्यांक के विभवमापी के पाठ्यांक से जाँच को ही अमीटर का अंशशोधन कहते है।
परिपथ चित्र तथा संयोजन (circuit diagram and assembling)
यह चित्र आपको वोल्टमीटर का अंशशोधन जैसा ही दिख रहा होगा , इस परिपथ में हमने प्रतिरोध बॉक्स (RB) के स्थान पर 1 ओम की कुण्डली काम में ली है तथा इस एक ओम की कुंडली के श्रेणीक्रम में अमीटर का उपयोग किया है।
यह दोनों परिपथों में मुख्य अंतर है।
बाकी दोनों परिपथ (वोल्ट्मीटर का अंश शोधन व अमीटर का अंशशोधन) समान है।
अतः अमीटर के अंशशोधन के लिए चित्रानुसार परिपथ तैयार करते है , प्रत्येक अवयव को ध्यान से जोड़ते है।
कार्यविधि (working )
प्राथमिक परिपथ में कुंजी K1 पर डॉट लगाते है तथा द्विमार्गी कुंजी में टर्मिनल 1-2 पर भी डॉट लगाते है और सर्पी कुंजी को तार AB पर सरकाते है तथा धारामापी में में संतुलन की अवस्था ज्ञात करते है जिससे हमें मानक सेल का विद्युत वाहक बल (E1) प्राप्त होता है।
माना तार पर विभव प्रवणता (एकांक लम्बाई पर विभवांतर में अंतर ) x है तथा हमें संतुलन की स्थिति L0 लम्बाई पर प्राप्त होती है तो
E1 = xL0
x = E1/L0
अब र्मिनल 1-2 से डॉट हटाकर 2 व 3 के बीच डॉट लगा देते है तथा K2 कुंजी पर भी डॉट लगाकर द्वितीय परिपथ को पूर्ण कर देते है।
अमीटर में प्रवहित हो रही विद्युत धारा का मान नोट कर लेते है यह धारा का मान त्रुटिपूर्ण माना जाता है इसके अंशशोधन के लिए सर्पी कुंजी की सहायता से संतुलन की स्थिति ज्ञात करते है , माना संतुलन की स्थिति L2 लम्बाई पर प्राप्त होती है। 1 ओम कुंडली के सिरों पर माना विभवान्तर V’ है।
अतः विभवमापी सिद्धांत से
V’ = xL2
ओम के नियम से
V’ = I’R
चूँकि R = 1 अतः
V’ = I’
अतः
I’ = xL2
I’ विभवमापी द्वारा मापा गया यथार्थ (सही ) मान है
विभवमापी तथा अमीटर द्वारा लिए गए पाठ्यांको में अंतर
∇I = I – I’
अतः यथार्थ या सही मान
I’ = I – ∇I
















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