विद्युत धारिता पाठ नोट्स कक्षा 12 भौतिक विज्ञान electrical capacitance notes in hindi
चालक व कुचालक क्या है ? विद्युत रोधी ,अचालक की परिभाषा एवं उदाहरण , अंतर conductor and insulator meaning in hindi
conductor and insulator meaning in hindi , चालक व कुचालक क्या है ? विद्युत रोधी ,अचालक की परिभाषा एवं उदाहरण , अंतर चालक किसे कहते है ?
परिभाषा : प्रकृति में विद्युत धारा का चालन भिन्न भिन्न हो सकता है अतः विद्युत धारा के चालन के आधार पर हम पदार्थों को दो भागो में बांटते है।
1. चालक (conductor )
2. विद्युत रोधी (कुचालक) (अचालक ) ( insulator )
1. चालक (conductor )
चालक की परिभाषा एवं उदाहरण क्या है ?
प्रकृति में पाए जाने वाले वे पदार्थ जिनमे विद्युत आवेश स्वतंत्र रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति कर सकते है अर्थात चालक वे पदार्थ है जिनमें आवेश प्रवाह आसानी से हो सकता है।
चूँकि चालक पदार्थों में आवेश का प्रवाह हो पाता है अतः हम यह भी कह सकते है की इन पदार्थो में धारा का प्रवाह आसानी से हो पाता है।
मानव शरीर भी एक चालक है तथा सबसे अच्छा चालक चाँदी है लेकिन यह महंगी होने के कारण उपयोग में नहीं लायी जाती।
अन्य उदाहरण – लोहा , एल्युमिनियम , तांबा , पारा , नमक का विलयन , अम्ल एवं क्षार आदि।
2. विद्युत रोधी (कुचालक) (अचालक ) ( insulator )
प्रकृति में पाये जाने वाले वे पदार्थ जिनमे आवेश का प्रवाह नहीं हो पाता है अर्थात इन पदार्थ से विद्युत धारा का प्रवाह नहीं हो पाता है उन्हें विद्युतरोधी या कुचालक या अचालक पदार्थ कहते है।
ये पदार्थ उन स्थानों पर उपयोग होते है जहाँ हमें विद्युत धारा का प्रवाह नहीं होने देना है जैसे वैद्युत उपकरणों के हत्थे रबर या प्लास्टिक के बनाये जाते है यहाँ रबर व प्लास्टिक विद्युत रोधी पदार्थ है क्योंकि इनसे होकर विद्युत धारा प्रवाहित नहीं हो सकती है।
अन्य उदाहरण – काँच , प्लास्टिक , रबड़ , सूखी लकड़ी इत्यादि विद्युतरोधी पदार्थ के उदाहरण है।
चालक तथा विद्युत रोधी (कुचालक ) (अचालक ) में अंतर (difference between conductor and insulator in points )
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चालक |
विद्युत रोधी |
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1. इनसे धारा का प्रवाह होता है। |
इनमे विद्युत धारा का प्रवाह नहीं होता। |
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2. विद्युत क्षेत्र पृष्ठ पर होता है तथा अंदर शून्य होता है। |
विद्युत क्षेत्र नहीं पाया जाता है। |
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3. चुंबकीय क्षेत्र में ऊर्जा संचित करते है। |
ऊर्जा संचित नहीं करते। |
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4. सभी बिंदु पर विद्युत विभव समान होता है। |
विभव का मान शून्य रहता है। |
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5. ऊष्मा गति अधिक होती है। |
उष्मा गति कम होती है। |
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6. उपसहसंयोजक बंध कमज़ोर होते है। |
इनमे बंध अधिक मजबूत होते है। |
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7. चालकता अधिक होती है। |
चालकता बहुत कम होती है। |
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8. प्रतिरोध कम होता है। |
प्रतिरोध बहुत अधिक होता है। |
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9. इलेक्ट्रॉन का प्रवाह आसानी से होता है। |
इलेक्ट्रॉन का प्रवाह नहीं होता। |
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10. चालक बैंड इलेक्ट्रॉन से भरा होता है |
चालक बैंड खाली रहता है |
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11. वैलेंस बैंड खाली रहता है। |
वैलेन्स बैंड इलेक्ट्रॉन से भरा रहता है। |
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12. ऊर्जा अन्तराल नगण्य होता है। |
ऊर्जा अंतराल अधिक होता है। |
प्रकृति में पदार्थो के प्रकार –
चालक : चालक वे पदार्थ है जिनमे बाह्य इलेक्ट्रॉन बहुत ढीले बंधे होते है इसलिए वे गति के लिए मुक्त होते है। वे पदार्थ जिनमे अधिक संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते है उन्हें चालक कहते है। उदाहरण के लिए धातुएँ।
उदाहरण : कॉपर , लोहा , एल्युमिनियम आदि।
कुचालक या परावैद्युत : कुचालक वे पदार्थ है जिनमे बाह्य इलेक्ट्रॉन बहुत मजबूती से बंधे होते है इसलिए वे गति नहीं कर सकते है। वे पदार्थ जिनमे मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते है उन्हें कुचालक या परावैद्युत पदार्थ कहा जाता है।
उदाहरण के लिए – प्लास्टिक , रबर तथा लकड़ी।
अर्द्धचालक : वे पदार्थ जिनमे मुक्त इलेक्ट्रॉन होते है लेकिन कम होते है अर्द्ध चालक कहलाते है।
चालक– जिन पदार्थो से होकर आवेश का प्रवाह सरलता से होता है, उन्हें चालक कहते है। लगभग सभी धातुएँ अम्ल, क्षार, लवण के जलीय विलयन, मानव शरीर आदि विद्युत चालक पदार्थ के उदाहरण है। चाँदी सबसे अच्छा चालक होता है।
अचालक– जिन पदार्थो से होकर आवेश का प्रवाह नहीं होता है, उन्हें अचालक कहते है। लकडी, रबर, कागज, अभ्रक, शुद्ध आसुत जल आदि अचालक पदार्थो के उदाहरण है।
अर्द्धचालक – कुछ पदार्थ ऐसे होते है, जिनकी विद्युत चालकता चालक एवं अचालक पदार्थो के बीच होती है, उन्हें अर्द्धचालक कहते हैं। सिलिकन, जर्मेनियम, कार्बन, सेलेनियम आदि अर्द्धचालक के उदाहरण है।
ताप बढ़ाने पर चालक पदार्थो का विद्युत प्रतिरोध बढ़ता है तथा उसकी विद्युत चालकता घटती है, जबकि अर्द्धचालक पदार्थो की विद्युत चालकता ताप के बढाने पर बढ़ती है तथा ताप के घटाने पर घटती है। परम शून्य ताप पर अर्द्धचालक पदार्थ अचालक की भाँति व्यवहार करता है। अर्द्धचालक पदार्थों में अशुद्धियाँ मिलाने पर भी उसकी विद्युत चालकता बढ़ जाती है। चालक, अचालक एवं अर्द्धचालक पदार्थों की व्याख्या इलेक्ट्रॉनिक सिद्धान्त क अनुसार की जा सकती हैं। चालक पदार्थों में कुछ मुक्त इलेक्ट्रॉन होते है, जिससे उनमें विद्युत चालन की क्रिया सरलता से होती है। अचालक पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति होने के कारण इनसे होकर विद्युत का चालन नहीं होता है। अर्द्धचालकों में सामान्य अवस्था में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते है, लेकिन विशेष परिस्थितियों जैसे उच्च ताप या अशुद्धियाँ मिलाने पर मुक्त इलेक्ट्रॉन प्राप्त किए जा सकते है।
मुक्त एवं बद्ध आवेश क्या है free and bond charges in hindi
free and bond charges in hindi मुक्त एवं बद्ध आवेश : हम सभी जानते है की प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना होता है तथा परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कक्षाओं में चक्कर लगाते है , जो कक्षाएं नाभिक के निकट होती है उनमे चक्कर लगा रहे इलेक्ट्रोनो पर नाभिकीय बल का आकर्षण बल अधिक प्रभावी होता है , इन इलेक्ट्रोनो या आवेशों को बद्ध आवेश कहा जाता है।
तथा जो इलेक्ट्रॉन या आवेश नाभिक से दूर स्थित कक्षाओं में चक्कर लगाते है उन्हें मुक्त आवेश कहते है।
धात्विक चालकों में बाह्यतम कक्षाओं में उपस्थित इलेक्ट्रॉनो पर नाभिक का आकर्षण बल बहुत कम होता है और इसलिए चालकों के परमाणुओं के बाह्यतम कक्षा के इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकते है , इन स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाले इलेक्ट्रॉनो को मुक्त इलेक्ट्रॉन कहते है। लेकिन मुक्त विचरण का अभिप्राय यह नहीं है की वे परमाणु से बाहर आ जाए अर्थात इलेक्ट्रॉन परमाणुओं से बाहर नहीं आ सकते।
वे परमाणु जिनके बाह्यतम कक्षा के इलेक्ट्रॉन विचरण करने के लिए स्वतंत्र होते है वे विद्युत क्षेत्र की उपस्थिति में सभी इलेक्ट्रॉन एक निश्चित दिशा में गति करते हैजिससे चालकों में धारा का प्रवाह होता है , धारा के प्रवाह में केवल मुक्त इलेक्ट्रॉन ही योगदान करते है।
बद्ध इलेक्ट्रॉन नाभिकीय बल से बंधे हुए रहते है अतः ये विचरण करने के लिए स्वतंत्र नहीं होते है और धारा के प्रवाह में अपना योगदान नहीं दे पाते है।
कुचालक पदार्थों में उपस्थित परमाणु में बाह्यतम कक्षाओं में स्थित इलेक्ट्रॉन भी नाभिकीय आकर्षण बल का प्रभाव अधिक रहता है अर्थात कुचालक के परमाणुओं में नाभिक से बाह्यतम कक्षा के इलेक्ट्रॉन बद्ध (बंधे) रहते है जिससे ये गति नहीं कर पाते और इससे कुचालक पदार्थों में धारा का प्रवाह नहीं हो पाता है।
परावैद्युत पदार्थ व ध्रुवण , ध्रुवीय , अध्रुवीय पदार्थ dielectric substance electric polarization ध्रुवी और अध्रुवी
dielectric substance and polarization in hindi परावैद्युत पदार्थ एवं ध्रुवण , electric
polarisation , विद्युत ध्रुवण किसे कहते है , परिभाषा क्या है ? वैद्युत प्रवृत्ति (electric susceptibility in hindi) :-
परावैद्युत पदार्थ : वे पदार्थ जिनमे विद्युत धारा का प्रवाह नहीं होता लेकिन इन पदार्थों को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो ये विद्युत प्रभाव दर्शाते है , इन पदार्थों को परावैद्युत पदार्थ कहते है।
परावैद्युत पदार्थो के उदाहरण निम्न है –
मोम , अभ्रक , कागज , तेल इत्यादि।
परावैद्युत पदार्थो में इलेक्ट्रॉन अपने परमाणुओं से बद्ध या बंधे हुए ही रहते है इनमे कोई भी मुक्त या स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन नहीं पाए जाते है अतः इनको बाह्य विद्युत क्षेत्र में रखने पर भी कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है।
विद्युत क्षेत्र में रखने पर इनके परमाणु या अणु पुन: व्यवस्थित हो जाते है जिससे इनके व्यवहार में कुछ बदलाव आ जाता है इनको आगे विस्तार से पढ़ते है।
परावैद्युत पदार्थ को दो प्रकार के होते है
1. ध्रुवीय परावैद्युत
2. अध्रुवीय परावैद्युत
1. ध्रुवीय परावैद्युत (polar dielectrics )
इस प्रकार के पदार्थो में धनावेश व ऋणावेश का केंद्र अलग अलग होता है अर्थात वे पदार्थ जिनमे धनावेश व ऋणावेश एक केंद्र पर न होकर अलग अलग होता है। उन पदार्थों को ध्रुवीय परावैद्युत पदार्थ कहते है , चूँकि इनमे एक धनावेश व एक ऋणावेश होता है इसलिए ये द्विध्रुव की भाँती व्यवहार करते है।
उदाहरण – HCl , H2O इत्यादि
बाह्य विद्युत क्षेत्र की अनुपस्थिति में ध्रुवीय परावैद्युत पदार्थ के अणु तापीय ऊर्जा के कारण अनियमित रूप से व्यवस्थित रहते है और इसलिए पदार्थ में परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण का मान शून्य होता है।
जब ध्रुवीय परावैद्युत पदार्थ को बाह्य विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो विद्युत द्विध्रुव पर एक बलाघूर्ण कार्य करता है जो इनके क्षेत्र की दिशा में करने का प्रयास करता है। और जब बाह्य क्षेत्र को बढ़ाया जाता है तो अधिक से अधिक द्विध्रुव क्षेत्र की दिशा में व्यवस्थित हो जाते है जिससे परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त होता है।
2. अध्रुवीय परावैद्युत (Non polar dielectrics)
वे पदार्थ जिनमे अणुओं में धनावेश व ऋणावेश का केंद्र एक ही होता है उन पदार्थो को अध्रुवीय परावैद्युत कहते है।
उदाहरण – H2 ,
CO2 , N2 , O2 आदि
इन पदार्थों में प्रत्येक अणु का द्विध्रुव शून्य होता है अतः पदार्थ का कुल परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण का मान भी शून्य होता है।
जब अध्रुवीय परावैद्युत पदार्थ को बाह्य विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो विद्युत क्षेत्र के कारण धनावेश क्षेत्र की दिशा में व ऋणावेश क्षेत्र के विपरीत दिशा में विस्थापित हो जाता है जिससे प्रत्येक अणु में कुछ द्विध्रुव आघूर्ण का मान प्राप्त होता है।
जब परावैद्युत पदार्थ को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो पदार्थ में विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण प्रेरित होता है इसे पदार्थ का ध्रुवण कहते है।
यदि प्रेरित द्विध्रुव आघूर्ण , बाह्य विद्युत क्षेत्र के समानुपाती होता है तो इस प्रकार के पदार्थो को रेखीय समदैशिक परावैद्युत पदार्थ कहते है।
बाह्य विद्युत क्षेत्र की उपस्थिति में पदार्थ के इकाई आयतन में प्रेरित द्विध्रुव आघूर्ण को पदार्थ का ध्रुवण सदिश कहते है।
ध्रुवण सदिश को P से व्यक्त करते है अतः हम कहते है की रेखीय सम दैशिक पदार्थो में P का मान E (विद्युत क्षेत्र ) के समानुपाती होता है अतः
P ∝ E
P = ✘E
यहाँ ✘ को वैद्युत प्रवृति कहते है।
✘ एक विमाहीन राशि है।
ध्रुवी और अध्रुवी परावैद्युत (polar and
nonpolar dielectrics in hindi)
]हम जानते है कि परमाणु विद्युतत: उदासीन होता है। उसका समस्त धनावेश नाभिक में निहित रहता है तथा ऋण आवेश नाभिक के परित: वितरित इलेक्ट्रॉनों के रूप में होता है। दोनों आवेश परिमाण में समान होते है। इन दोनों आवेशो के गुरुत्व केंद्र समान भी हो सकते है और अलग अलग भी हो सकते है।
यदि दोनों के केंद्र समान है तो परमाणु या अणु अध्रुवी कहलाता है और दोनों के केंद्र यदि अलग अलग है तो ध्रुवी कहलाता है।
अध्रुवी परावैद्युत : ऐसा परावैद्युत जिसके परमाणुओं या अणुओं में धनात्मक और ऋणात्मक आवेशो के गुरुत्व केन्द्र समान होते है , अध्रुवी परावैद्युत कहलाता है। इस प्रकार अध्रुवी परावैद्युत पदार्थ के परमाणु या अणुओं में धन और ऋण आवेशो का उनके केन्द्रों के परित: वितरित सममित होता है।
ऋण और धन आवेशो के केन्द्रों के मध्य शून्य दूरी होने के कारण इन परमाणुओं या अणुओं का विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण भी शून्य होता है।
ध्रुवी परावैद्युत : ऐसे परावैद्युत जिसके परमणु या अणुओं में धन और ऋण आवेशो के गुरुत्व केंद्र अलग अलग होते है , ध्रुवी परावैद्युत कहलाते है।
अत: ध्रुवी पराविद्युत के परमाणुओं या अणुओं में धन और ऋण आवेशो का उनके केन्द्रों के परित: वितरण सममिति में नहीं होता है।
इस प्रकार दोनों आवेशो के केन्द्रों के मध्य एक निश्चित दूरी होने के कारण इन परमाणुओं या अणुओं का एक निश्चित वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण भी होता है।
NH3 , HCl , H2O , CO2 इत्यादि के अणु ध्रुवी अणुओं की श्रेणी में आते है। जल के अणु का एक स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण 6 x 10-28 Cm की कोटि का होता है।
वास्तव में अणुओं में आवेश का वितरण असममित होता है। उदाहरण के लिए एक आयनिक अणु में एक परमाणु से दुसरे परमाणु में इलेक्ट्रॉन स्थानांतरित हो जाते है।
फलस्वरूप अणु धनात्मक और ऋणात्मक आयनों के भिन्न स्थितियों में होने के कारण ध्रुवी हो जाता है और एक स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण रखता है।
विद्युत क्षेत्र में अध्रुवी परमाणु का ध्रुवण (polarisation of
non polar atom in electric field) : जब एक अध्रुवी परमाणु किसी विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो इसका नाभिक क्षेत्र की दिशा में थोडा विस्थापित हो जाता है और ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉनों पर विद्युत क्षेत्र की विपरीत दिशा में बल लगता है। जिससे उनका केंद्र क्षेत्र की विपरीत दिशा में थोडा विस्थापित हो जाता है।
इस कारण प्रत्यानयन बल उत्पन्न हो जाता है जो इलेक्ट्रॉनों को पुनः उनकी पूर्व स्थिति में लाने का प्रयास करता है। जब यह प्रत्यानयन बल विद्युत क्षेत्र द्वारा आवेशो पर लगने वाले खिंचाव बल के बराबर हो जाता है तो संतुलन की स्थिति आ जाती है और परमाणु ध्रुवित हो जाता है।
इस प्रकार परावैद्युत परमाणुओं में आवेशो के विस्थापन के कारण उनमे खिंचाव उत्पन्न होने की घटना ध्रुवण कहलाती है।
स्पष्ट है कि परमाणुओं में खिंचाव उत्पन्न होने के कारण उनके धन और ऋण आवेशों के केंद्र भिन्न हो जाने से उनमे द्विध्रुव आघूर्ण उत्पन्न हो जाता है।
परावैद्युत गुटके का ध्रुवण (electric polarization of dielectric slab)
माना एक समान्तर प्लेट संधारित्र की प्लेटों को एक बैटरी द्वारा आवेशित किया जाता है। प्लेटों के मध्य निर्वात है और यदि आवेश का पृष्ठ घनत्व ±σ है तो प्लेटों के मध्य उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता –
E0
= σ/ε0
माना अब अध्रुवी परमाणुओं वाला एक परावैद्युत गुटका प्लेटों के मध्य रख दिया जाता है। जैसे ही गुटका प्लेटो के मध्य रखा जाता है , इसके अणु ध्रुवित हो जाते है।
फलस्वरूप गुटके के बायां फलक AB , -q और दायाँ फलक CD , +q आवेश व्यक्त करने लगता है। बिन्दुवत रेखाओं से व्यक्त पराविद्युत के अन्दर कोई नेट आवेश नहीं होता है। परावैद्युत गुटके के फलकों पर आवेश -q और +q प्रेरित आवेश कहलाता है। इन प्रेरित आवेशो के कारण परावैद्युत गुटके के अन्दर एक विद्युत क्षेत्र Ep उत्पन्न हो जाता है जिसकी दिशा CD फलक से AB फलक की ओर होती है।
स्पष्ट है कि Ep की दिशा E0 की दिशा के विपरीत होती है।
अत: परावैद्युत के अन्दर परिणामी विद्युत क्षेत्र E = E0 – Ep
इस प्रकार परावैद्युत गुटके को एक विद्युत क्षेत्र में रखने पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कम हो जाती है और विद्युत क्षेत्र E को विद्युत क्षेत्र का घटा हुआ मान कहते है।
परावैद्युत नियतांक (dielectric
constant) : लगाए गए विद्युत क्षेत्र की तीव्रता और संधारित्र की प्लेटो के मध्य पराविद्युत माध्यम रखने पर घटे हुए विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के अनुपात को ही परावैद्युत माध्यम का परावैद्युत नियतांक कहते है।
इसे सापेक्ष वैद्युतशीलता या विशिष्ट प्रेरित धारिता भी कहते है तथा इसे K के द्वारा व्यक्त किया जाता है।
अत: परावैद्युत नियतांक (K) = E0/Ep
ध्रुवण घनत्व (polarization density)
परावैद्युत गुटके को विद्युत क्षेत्र में रखने पर उसके प्रति एकांक आयतन में प्रेरित द्विध्रुव आघूर्ण को ध्रुवण घनत्व कहते है। इसे P के द्वारा व्यक्त किया जाता है।
यदि एक परमाणु का प्रेरित द्विध्रुव आघूर्ण p हो और एकांक आयतन में परमाणुओं की संख्या N हो तो ध्रुवण घनत्व –
P = np
यदि संधारित्र की प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल A हो और प्लेटो के मध्य दूरी d हो तो –
पराविद्युत गुटके का आयतन = A.d
चूँकि परावैद्युत गुटके के फलकों पर +q और -q आवेश प्रेरित होता है अत: पूरे गुटके का तुल्य द्विध्रुव आघूर्ण = qd
ध्रुवण घनत्व की परिभाषा से –
P = qd /A.d = q/A
चूँकि q/A = σ = ध्रुवण आवेश पृष्ठ घनत्व
अत: P = σ
अत: संधारित्र की प्लेटो के मध्य परावैद्युत गुटका रखने पर घटे हुए विद्युत क्षेत्र की तीव्रता –
E = E0 – P/ε0
वैद्युत प्रवृत्ति (electric susceptibility)
किसी परावैद्युत गुटके का ध्रुवण घनत्व घटे हुए विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होता है और इसे निम्न सूत्र द्वारा प्राप्त किया जाता है –
P = Xε0E
इसमें नियतांक X को परावैद्युत गुटके की वैद्युत प्रवृति कहते है। यह एक विमाहीन नियतांक है।
चालक की धारिता capacitance of conductor in hindi , सूत्र , विमा , इकाई , in
english
(capacitance of conductor in hindi ) चालक की धारिता : धारिता का शाब्दिक अर्थ है ‘ धारण करने की क्षमता ‘ , अतः चालक की धारिता से अभिप्राय है चालक द्वारा विद्युत आवेश धारण करने की क्षमता।
जिस प्रकार एक बर्तन में एक सीमा से अधिक द्रव डालते है तो वह बिखरने लग जाता है ठीक उसी प्रकार जब चालक को सीमा से अधिक आवेश दिया जाता है तो आवेश का वातावरण में विसर्जन होने लगता है।
तथा बर्तन में डाला गया द्रव गुरुत्वीय तल को बढ़ाता है उसी प्रकार चालक को दिया गया आवेश चालक के विद्युत तल को बढ़ाता है अर्थात चालक को दिया गया आवेश विद्युत विभव को बढ़ाता है।
एक सीमा से अधिक आवेश किसी वस्तु से न तो लिया जा सकता है और न ही दिया जा सकता है तथा किसी वस्तु पर आवेश देने से उसमे पहले से उपस्थित आवेशों के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है जिससे इसकी स्थितिज ऊर्जा (विभव ) में वृद्धि होती है।
जितना अधिक आवेश चालक को दिया जाता है उतना ही अधिक विभव का मान भी बढ़ता जाता है।
अतः हम कह सकते है की चालक पर विभव का मान उसको दिए गए आवेश के समानुपाती होता है।
q ∝ V
q = CV
यहाँ C एक समानुपाती नियतांक है , C को ही चालक की विद्युत धारिता कहते है।
C (विद्युत धारिता) का मान चालक के आकार , क्षेत्रफल , माध्यम तथा अन्य चालकों की उपस्थिति पर भी निर्भर करता है।
C = q/V
विद्युत धारिता किसी चालक को दिए गए आवेश व चालक के विभव में हुई वृद्धि के अनुपात को कहते है।
V = 1 , C = q
अतः किसी चालक की धारिता उस चालक को दिये गए उस आवेश के बराबर होती है जो उस चालक मे वोल्ट विभव परिवर्तन कर दे ।
C (धारिता) का मात्रक = फैरड (farad) होता है ।
चूँकि फैरड एक बड़ा मात्रक है अत: सामन्यतया इसको उपयोग में नहीं लेते है , सामन्यतया माइक्रो फैरड , पिको फैरड का इस्तेमाल करते है ।
1 माइक्रो फैरड = 10-6 F
1 पिको फैरड = 10-12 F
1 नैनो फैरड = 10-9 F
C (धारिता) का विमा सूत्र = [M-1 L-2 T4 A2 ]
चालक की धारिता को प्रभावित करने वाले कारक (factors affecting
capacity of a conductor)
किसी चालक कि धारिता को कुछ कारण होते है जो प्रभावित करते है वे निम्नलिखित है।
1. चालक का क्षेत्रफल : चालक का क्षेत्रफल बढ़ने पर इसके पृष्ठ पर विद्युत विभव का मान कम हो जाता है अतः चालक की धारिता बढ़ जाती है।
2. जब आवेशित चालक के पास कोई अन्य अनावेशित चालक रखा जाता है तो आवेशित चालक का विभव कम हो जाता है जिससे धारिता बढ़ जाती है।
3. चूँकि धारिता के सूत्र में विभव आता है और विभव का मान माध्यम (K) पर निर्भर करती है अतः धारिता का मान माध्यम पर निर्भर करता है।
विलगित चालक की धारिता : जब किसी चालक को आवेशित किया जाता है तो इसके विभव में वृद्धि होती है। किसी विलगित चालक (चालक परिमित विमाओं का होना चाहिए ताकि अनंत पर विभव शून्य माना जा सके) के लिए चालक का विभव इसको दिए गए आवेश के समानुपाती होता है।
q = चालक पर आवेश
V = चालक का विभव
q ∝ V
q = CV
जहाँ C समानुपाती नियतांक है इसे चालक की धारिता कहा जाता है।
धारिता की परिभाषा : किसी चालक के विभव में इकाई वोल्ट की वृद्धि करने के लिए आवश्यक आवेश की मात्रा चालक की धारिता कहलाती है।
किसी विलगित चालक की धारिता से सम्बंधित महत्वपूर्ण बिंदु
§ यह एक अदिश राशि है।
§ धारिता का SI मात्रक फैरड है और इसकी विमा M-1L-2I2T4 होती है।
§ एक फैरड : 1 फैरड उस चालक की धारिता है जिसे एक कुलाम धन आवेश देने पर उसके विभव में एक वोल्ट की वृद्धि होती है।
विलगित चालक की धारिता निम्न कारकों पर निर्भर करती है :-
§ चालक का आकार और आकृति : आकार बढ़ने पर धारिता बढती है।
§ माध्यम पर : पराविद्युतांक K बढ़ने पर धारिता में वृद्धि होती है।
§ अन्य चालकों की उपस्थिति : जब एक निरावेशित चालक को आवेशित चालक के निकट रखा जाता है तो चालक की धारिता में वृद्धि हो जाती है।
चालक की धारिता निम्नलिखित पर निर्भर नहीं करती है :-
§ चालक पर उपस्थित आवेश पर
§ चालक के विभव पर
§ चालक की स्थितिज ऊर्जा पर
विलगित चालक की स्थितिज ऊर्जा या स्व ऊर्जा : किसी चालक को आवेशित करने के लिए इसके स्वयं के विद्युत क्षेत्र के विरुद्ध किया गया कार्य या चालक के विद्युत क्षेत्र में संचित कुल ऊर्जा को चालक की स्थितिज ऊर्जा या स्व ऊर्जा कहते है।
विधुत स्थितिज ऊर्जा (स्व-ऊर्जा) :- संधारित्र को आवेशित करने में किया गया कार्य।
W = q2/2C
W = U = q2/2C = CV2/2 = qV/2
जहाँ q = चालक पर आवेश
V = चालक पर विभव
C = चालक की धारिता
चालक के विद्युत क्षेत्र में संचित ऊर्जा होती है जिसका ऊर्जा घनत्व (एकांक आयतन की ऊर्जा ) :-
dU/dV = ε0E2/2
या
माध्यम में ऊर्जा घनत्व = dU/dV = ε0εrE2/2
किसी आवेशित चालक में ऊर्जा चालक के बाहर संग्रहित होती है जबकि किसी आवेशित कुचालक (अचालक) पदार्थ में ऊर्जा अचालक के अन्दर और बाहर दोनों ओर संग्रहित होती है।
विलगित गोलीय चालक की धारिता capacitance of an isolated spherical conductor in hindi
capacitance of an isolated spherical conductor विलगित गोलीय चालक की धारिता : अब हम एक चालक गोले के लिए धारिता का मान ज्ञात करते है जिससे हम एक विलगित चालक गोले के लिए धारिता का सूत्र स्थापित करेंगे।
माना एक गोलीय चालक है जिसकी त्रिज्या R तथा इस गोले को K परावैद्युतांक के माध्यम में रखा गया है , अब यदि इस गोले पर Q आवेश दिया गया है तो हम यह जानते है की चालक को दिया गया आवेश उसकी पृष्ठ पर वितरित हो जाता है अर्थात गोले के अंदर आवेश का मान शून्य होता है तथा सम्पूर्ण दिया गया आवेश गोले के पृष्ठ पर समान रूप से वितरित हो जाता है।
माना जब गोलीय चालक को Q आवेश दिया जाता है तो गोले के विद्युत विभव में V उत्पन्न हो जाता है।
गोले पर उत्पन्न विभव V = KQ/R
हम जानते है की धारिता
C = Q /V
यहाँ V का मान रखने पर
C = R/K
इसमें K = 1/4πε0
C = 4πε0 R
हम यहाँ सूत्र को देखकर यह कह सकते है की चालक गोले की धारिता , गोले की त्रिज्या R समानुपाती होता है।
अर्थात गोले की त्रिज्या जितनी अधिक होगी गोले की धारिता का मान भी उतना ही अधिक होगा।
विलगित गोलाकार चालक की धारिता (capacitance of an
isolated spherical conductor)
माना R त्रिज्या का एक गोलाकार चालक K पराविद्युतांक वाले माध्यम में रखा है। जब इस गोले को +q आवेश दिया जाता है तो यह आवेश गोले के पृष्ठ पर समान रूप से वितरित हो जाता है।
जिसके फलस्वरूप गोले के पृष्ठ पर विभव V उत्पन्न हो जाता है। गोले का पृष्ठ समविभव पृष्ठ की तरह व्यवहार करता है।
V = q/4πε0KR
चूँकि चालक की धारिता C = q/V
V का मान रखने पर –
C = q/(q/4πε0KR)
C = 4πε0KR
या
C = KR/9 x 109
C ∝ R
अर्थात किसी गोलाकार चालक की धारिता उसकी त्रिज्या के समानुपाती होती है।
यदि चालक वायु में रखा हो तो K = 1
अत:
C0 = 4πε0R
C0 = R/9 x 10
प्रश्न : पृथ्वी को 6400 किलोमीटर त्रिज्या का गोलाकार चालक मानते हुए उसकी वैद्युत धारिता की गणना करो ?
उत्तर : R मीटर त्रिज्या के गोलीय चालक की वायु में धारिता C = 4πε0KR
यहाँ 4πε0 = 1/9 x 109 C2/Nm2
तथा त्रिज्या R = 6400 KM = 6400 x 103 m
मान रखकर हल करने पर C = 711 x 10-6 फैरड
यहाँ ध्यान दे कि पृथ्वी का आकार बहुत बड़ा है लेकिन उसकी धारिता केवल 711 x 10-6 फैरड है इससे स्पष्ट है कि फैरड धारिता का बहुत बड़ा मात्रक है इसलिए व्यवहार में धारिता के मात्रकों के लिए माइक्रो फैरड , पिको फैरड या नैनो फैरड का उपयोग किया जाता है।
विलगित गोलीय चालक की धारिता (गोले की धारिता) :
प्रश्न : R त्रिज्या के विलगित गोलीय चालक की धारिता ज्ञात करो ?
उत्तर : माना गोले पर Q आवेश है।
अत: गोले का विभव V = KQ/R
धारिता के सूत्र के अनुसार Q = CV
सूत्र में विभव (V) का मान रखकर –
Q = C(KQ/R)
C = R/K
चूँकि
K = 1/4πε0
अत:
C = R4πε0
विलगित गोलीय चालक की धारिता C = R4πε0
स्थिति 1 : यदि चालक वायु या निर्वात माध्यम में हो –
Cनिर्वात = R4πε0
R = गोलीय चालक की त्रिज्या (यह गोला खोखला या ठोस हो सकता है।)
स्थिति 2 : यदि चालक की साथ से अनंत तक K पराविद्युतांक वाला माध्यम हो तो –
Cमाध्यम = R4πKε0
Cमाध्यम/Cनिर्वात = K = पराविद्युतांक
प्रश्न : A और B दो विलगित चालक है (अर्थात दोनों बहुत अधिक दूरी पर रखे है |) जब दोनों को चालक तार द्वारा जोड़ा जाता है तो :-
(i) A एवं B पर अंतिम आवेश ज्ञात करो ?
(ii) आवेशों के प्रवाह के दौरान उत्पन्न ऊष्मा ज्ञात करो ?
(iii) दोनों चालकों को चालक तार द्वारा जोड़ने के पश्चात् उभयनिष्ठ विभव ज्ञात करो ?
उत्तर : (i) A पर अंतिम आवेश = 3 माइक्रो कुलाम
B पर अंतिम आवेश = 6 uC
(ii) आवेशो के प्रवाह के दौरान उत्पन्न ऊष्मा h = 9/4 माइक्रो जूल (uJ)
(iii) दोनों चालकों को चालक तार द्वारा जोड़ने के पश्चात् उभयनिष्ठ विभव V = 1 वोल्ट
संधारित्र की परिभाषा क्या है capacitor in hindi , संधारित्र की धारिता किन दो बातों पर निर्भर करती है
संधारित्र की धारिता किन दो बातों पर निर्भर करती है , संधारित्र किसे कहते है ? चित्र , सूत्र what is capacitor in hindi संधारित्र की परिभाषा क्या है ? in english
meaning ?
संधारित्र : हमने देखा था की चालक का आकार बढाकर उसकी धारिता (इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की क्षमता ) बढ़ाई जा सकती है , लेकिन किसी चालक की धारिता बढ़ाने के लिए उसके आकार में वृद्धि करना एक अच्छा उपाय नहीं है इसलिए संधारित्र का उपयोग हुआ।
संधारित्र एक ऐसी युक्ति है जिसमे चालक के आकार में परिवर्तन किये बिना उसकी धारिता बढ़ायी जा सकती है।
धारिता C = q /C
संधारित्र में q (आवेश) का मान स्थिर करके विभव (V) में कमी की जाती है जिससे धारिता का मान बढ़ जाता है।
संधारित्र में दो चालक प्लेट होती है , दोनों प्लेटें एक दूसरे के निकट स्थित होती है , एक प्लेट को धनावेश देने के लिए बैटरी के धनात्मक सिरे से तथा दूसरी प्लेट को ऋणात्मक सिरे से जोड़ा जाता है जिससे एक प्लेट धनावेशित तथा दूसरी प्लेट ऋणावेशित हो जाती है।
अब बैट्री को हटा लिया जाए तो भी एक प्लेट पर धनावेश तथा दूसरी प्लेट पर उतनी ही मात्रा में ऋणावेश संरक्षित रह जाता है , अतः हम यह भी कह सकते है की संधारित्र एक आवेश संचय युक्ति है जिसमे आवेश संचयित (save) रहता है।
संधारित्र में कुल आवेश शून्य होता है क्योंकि जितना धनात्मक आवेश है उतना ही ऋणावेश भी है , संधारित्र की दोनों प्लेटों के मध्य विद्युत विभवान्तर पाया जाता है जिसे संधारित्र का विभव कहते है।
माना संधारित्र की किसी प्लेट पर q आवेश उपस्थित है अतः हम जानते है की विभव आवेश बढ़ाने पर बढ़ता है अर्थात समानुपाती होता है।
q ∝ V
q = CV
संधारित्र की प्लेट किसी भी आकार की हो सकती है , आयताकार , बेलनाकार या गोलाकार इत्यादि।
संधारित्र की धारिता का मान प्लेट की आकृति , आकार , दोनों प्लेटों के मध्य की दुरी तथा दोनों प्लेटो के बीच के माध्यम पर निर्भर करता है।
संधारित्र में विद्युत ऊर्जा संरक्षित रहती है।
संधारित्र का प्रतिक , अर्थात इसको निम्न प्रकार दर्शाया जाता है
संधारित्र और सिद्धांत : वह युक्ति जिसमे चालक के आकार को बिना बदले उसकी धारिता बढाई जा सकती है , संधारित्र कहलाती है।
किसी चालक को q आवेश देने पर यदि उसका विभव V हो जाता है तो उसकी धारिता –
C = q/V
स्पष्ट है कि यदि किसी प्रकार आवेश q के लिए विभव का मान V से कम हो जाए तो चालक की धारिता C बढ़ जाएगी। इसी विचार से संधारित्र की खोज की गयी।
संधारित्र का सिद्धांत निम्नलिखित तीन पदों में समझा जा सकता है –
1. माना किसी चालक A को q आवेश देने पर उसका विभव V हो जाता है तो उसकी धारिता –
C = q/V
2. अब यदि चालक A के पास इसी प्रकार का दूसरा अनावेशित चालक B लाया जाए तो प्रेरण द्वारा उसका आवेशन चित्र की तरह हो जाता है।
3. अब यदि चालक B को पृथ्वी से सम्बंधित कर दिया जाए तो उसका समस्त धनावेश पृथ्वी में चला जायेगा और नवीन स्थिति में यदि चालक A का विभव V’ हो तो A की धारिता –
C’ = q/V’
दोनों समीकरणों से –
C’/C = (q/V’)/(q/V) = V/V’
लेकिन V’ = चालक A के आवेश के कारण विभव + चालक B के आवेश के कारण उत्पन्न विभव
V’ = V – V”
इस समीकरण से स्पष्ट है कि –
V > V’
चूँकि C’ > C
अर्थात जब एक आवेशित चालक के पास दूसरा अनावेशित और पृथ्वी से सम्बंधित चालक लाया जाता है तो पहले चालक की धारिता बढ़ जाती है , यही संधारित्र का सिद्धांत है।
इस प्रकार उक्त सिद्धांत से स्पष्ट है कि संधारित्र में दो पृथक्कृत धात्वीय प्लेटे होती है जिसमे एक को आवेश दिया जाता है और दूसरी को पृथ्वी से समबन्धित कर देते है। जब प्लेटो के मध्य किसी परावैद्युत माध्यम की जगह वायु होती है तो उसे वायु संधारित्र कहते है।
संधारित्र किसे कहते है ?
किसी संधारित्र में दो चालक प्लेटें होती है जो कि अचालक या परावैद्युत पदार्थ के द्वारा पृथक्कृत होती है।
§ जब अनावेशित चालक को , आवेशित चालक के पास लाया जाता है तो चालकों पर आवेश समान रहता है लेकिन विभव में कमी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप धारिता में वृद्धि हो जाती है।
§ किसी संधारित्र में चालकों पर आवेश समान लेकिन विपरीत प्रकृति का होता है।
§ चालकों को संधारित्र की प्लेटें कहते है। संधारित्र की आकृति के आधार पर संधारित्र का नाम दिया जाता है।
§ संधारित्र से सम्बंधित सूत्र –
Q = CV
C = Q/V
यहाँ Q = संधारित्र की धनात्मक प्लेट का आवेश
V = संधारित्र की धनात्मक और ऋणात्मक प्लेट के मध्य विभवान्तर
C = संधारित्र की धारिता
संधारित्र में संचयित ऊर्जा U = Q2/2C = CV2/2 = QV/2
संधारित्र के विद्युत क्षेत्र में ऊर्जा संचित होती है , जिसका ऊर्जा घनत्व dU/dV = εE2/2 या ε0εrE2/2
आकृति और व्यवस्था के आधार पर संधारित्र निम्नलिखित प्रकार के होते है –
§ समान्तर प्लेट संधारित्र
§ गोलीय संधारित्र
§ बेलनाकार संधारित्र
संधारित्र की धारिता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
§ प्लेटों के क्षेत्रफल पर
§ प्लेटो के मध्य की दूरी पर
§ प्लेटों के मध्य माध्यम के पराविद्युतांक पर
§ संधारित्र का सिद्धान्त क्या है what is
principle of capacitor in hindi
§ what is principle
of capacitor संधारित्र का सिद्धान्त : चित्रानुसार हम एक प्लेट लेते है जिस पर धनावेश (+q ) उपस्थित है चित्र में इसे A से दर्शाया गया है।
§ संधारित्र क्या है capacitor in hindi
§ अब A प्लेट के पास चालक प्लेट B रखी जाये तो प्रेरण के कारण B पर A के तरफ वाले हिस्से पर ऋणावेश व दूसरी तरफ धनावेश आ जाता है।
§ B प्लेट के ऋणावेश के कारण A प्लेट के विभव में कमी होती है।
§ अब यदि B प्लेट को भू सम्पर्कित किया जाए तो B प्लेट पर उपस्थित धनावेश जिसे भू सम्पर्कित किया गया है वह भू से आवेश ग्रहण करके धनावेश नष्ट कर लेता है जिससे B प्लेट पर सिर्फ ऋणावेश ही शेष रह जाता है जिससे A के विभव में और अधिक कमी होती है तथा B पर A के कारण विभव में कमी होती है।
§ और हम पढ़ चुके है की विभव में कमी होने से धारिता बढ़ती है जिससे संधारित्र की धारिता बहुत अधिक बढ़ जाती है।
§ अतः हम कह सकते है की आवेशित चालक प्लेट के पास अन्य भू सम्पर्कित चालक लाने से चालक की धारिता में बहुत अधिक वृद्धि होती है।
समान्तर प्लेट
संधारित्र parallel plate capacitor in hindi , उपान्त प्रभाव
parallel plate capacitor in hindi समान्तर प्लेट संधारित्र : समांतर प्लेट संधारित्र में दो प्लेट अल्प दूरी पर व्यवस्थित करते है इन दोनों प्लेटों का आकार समान होना चाहिए।
ये दोनों प्लेट समान्तर व्यवस्थित होती है और एक संधारित्र की रचना करती है इसलिए इसे समान्तर प्लेट संधारित्र कहते है।
प्लेटो को आवेशित करने के लिए एक प्लेट को बैटरी के धन सिरे से तथा दूसरी प्लेट को बैट्री के ऋण सिरे से जोड़ते है।
जो प्लेट धन सिरे से जुडी है वह इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनावेशित हो जाती है तथा जो प्लेट ऋण सिरे से जुडी है वह इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणावेशित हो जाती है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की जितना आवेश धन प्लेट पर है उतना ही आवेश ऋण प्लेट पर होगा लेकिन दोनों विपरीत प्रकृति के होंगे।
माना धन प्लेट पर +q आवेश है तो ऋण प्लेट पर -q आवेश होगा , चूँकि दोनों प्लेटो का आकार व आवेश समान है अतः दोनों प्लेटों पर आवेश का घनत्व भी समान होगा। (घनत्व = आवेश /क्षेत्रफल )
माना धन प्लेट पर आवेश घनत्व +σ है तथा ऋण प्लेट पर आवेश घनत्व –σ है।
प्लेट के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता मान σ/2ε0 होता है।
अतः प्रत्येक प्लेट के कारण σ/2ε0 विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है।
दोनों प्लेटो के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र σ/2ε0 एक ही दिशा में होंगे अतः दोनों प्लेटों के मध्य कुल उत्पन्न विद्युत क्षेत्र का मान
कुल क्षेत्र E = ऋण प्लेट के कारण क्षेत्र + धन प्लेट के कारण क्षेत्र
E = σ/2ε0 + σ/2ε0
कुल क्षेत्र E = σ/ε0
चूँकि σ = q /A
अतः
E = q /Aε0
उपान्त प्रभाव
प्लेट के किनारों पर पृष्ठ आवेश घनत्व का मान अधिक होता है जिससे विद्युत बल रेखाएं प्रतिकर्षित करती है और वक्रीय हो जाती है व विद्युत क्षेत्र असमान हो जाता है इस प्रभाव को उपान्त प्रभाव कहते है।
नोट : हम यहाँ उपान्त प्रभाव को नगण्य मान रहे है।
माना दोनों प्लेटो के मध्य की दूरी d है अतः
विभव = विद्युत क्षेत्र x दुरी
V = Ed
V = qd /Aε0
समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता का मान
C = q /V
V का मान रखने पर
C = Aε0/d
सूत्र को देखकर हम कह सकते है की समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता का मान प्लेटों के क्षेत्रफल A के समानुपाती होता है तथा दोनों प्लेटो के मध्य की दुरी d के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
संधारित्र की
प्लेटों के
मध्य
परावैद्युत माध्यम की
उपस्थिति का
प्रभाव effect of dielectric medium
effect of dielectric medium
filled between the plates of capacitor संधारित्र की प्लेटों के मध्य परावैद्युत माध्यम की उपस्थिति का प्रभाव
: संधारित्र की धारिता पर परावैद्युत माध्यम का भी प्रभाव पड़ता है इसे समझाने के लिए फैराडे ने एक प्रयोग किया और यह सिद्ध किया की संधारित्र की धारिता परावैद्युत माध्यम पर भी निर्भर करती है।
फेराडे ने दो संधारित्र लिए तथा दोनों को एक ही बैटरी के सिरों से जोड़ा , समान वातावरण में उन्होंने एक संधारित्र की प्लेटो के मध्य वायु ली तथा दूसरे संधारित्र की प्लेटो के मध्य पराविद्युत माध्यम लिया।
ऐसा करने के बाद फैराडे ने दोनों संधारित्र पर एकत्रित आवेश की गणना की और पाया की दोनों पर आवेश का मान अलग अलग है , उन्होंने वायु वाले संधारित्र में एकत्रित आवेश को q0 कहा तथा दूसरे पर एकत्र आवेश को q कहा और दोनों पर एकत्रित आवेशो के मान ये निम्न सम्बन्ध पाया
q = Kq0
चूँकि हम दोनों संधारित्रों में समान विभव (V) की बैटरी इस्तेमाल कर रहे है इससे ये भी स्पष्ट रूप से कह सकते है की दोनों की धारिता का मान भी अलग अलग होगा
वायु वाले संधारित्र की धारिता
C0 =
q0/V
परावैद्युत वाले संधारित्र की धारिता
C =
Kq0/V
फैराडे ने इस प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला की संधारित्र की प्लेटों के मध्य परावैद्युत माध्यम भरकर उसकी धारिता का मान बढ़ाया जा सकता है।
फैराडे धारिता बढ़ने का कारण निम्न प्रकार समझाया
धारिता बढ़ने का कारण
हम जानते है की जब किसी संधारित्र की प्लेटो को आवेशित किया जाता है तो दोनों प्लेटों के मध्य एक विभवांतर उत्पन्न होता है , अब यदि दोनों प्लेटो के बीच में कोई परावैद्युत माध्यम रख दिया जाए तो प्लेटो के मध्य में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है और इस क्षेत्र के कारण परावैद्युत माध्यम के अणुओ का ध्रुवीकरण हो जाता है अर्थात अणुओं के धनात्मक तथा ऋणात्मक केंद्र अलग अलग हो जाते है जिससे अणुओ का ऋणात्मक भाग धनात्मक प्लेट की तरफ हो जाता है तथा अणुओ का धनात्मक भाग ऋणात्मक प्लेट की तरफ हो जाता है , इसका परिणाम यह होता है की परावैद्युत माध्यम में एक विद्युत क्षेत्र E’ उत्पन्न हो जाता है , इस क्षेत्र की दिशा प्लेटो के मध्य उपस्थित विद्युत क्षेत्र E की दिशा के विपरीत होगी।
इससे प्रभावी क्षेत्र = E – E’
इससे विभवांतर में कमी आ जाती है (क्योंकि E = ∇ V /∇x )
परिणामस्वरूप धारिता का मान बढ़ता है। (क्योंकि C = q /V )
प्लेटों के
मध्य
परावैद्युत माध्यम होने
पर
समान्तर प्लेट
संधारित्र की
धारिता capacitance of parallel plate capacitor
capacitance of parallel plate
capacitor प्लेटों के मध्य आंशिक रूप से परावैद्युत माध्यम होने पर समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता : हमने संधारित्र की धारिता के सूत्र में देखा की संधारित्र के लिए धारिता का मान परावैद्युत माध्यम पर निर्भर करता है।
इस टॉपिक का अध्ययन करने का हमारा यह उद्देश्य है की परावैद्युत की सहायता से संधारित्र की धारिता को किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है , इस पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे।
माना समान्तर संधारित्र में दो प्लेट व्यस्थित है , दोनों प्लेटो के मध्य की दूरी d है , दोनों प्लेटो के मध्य t मोटाई का K परावैद्युतांक रखा है चूँकि d > t , इसलिए अभी भी प्लेटों के मध्य कुछ स्थान है जहाँ वायु उपस्थित है इस वायु वाले क्षेत्र में विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E0 है तथा परा वैद्युत माध्यम में विद्युत क्षेत्र E उपस्थित है।
प्लेटो पर आवेश घनत्व
σ = q /A
वायु वाले क्षेत्र की विद्युत क्षेत्र की तीव्रता
E = σ/ ε0K
परा वैद्युत क्षेत्र में विद्युत क्षेत्र
E0 = σ/ ε0
विभवान्तर की परिभाषा से
V = आवेश को (d – t ) क्षेत्र अर्थात वायु वाले क्षेत्र से + t दुरी तक परावैद्युत माध्यम में लाने में कार्य
V = E0(d – t ) + Et
समीकरण में E0 तथा E का मान रखकर हल करने पर
संधारित्र की धारिता C = q /V
यहाँ V का मान रखने पर
1. समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता जबकि प्लेटो के मध्य परावैद्युत पदार्थ पूर्णत: भरा हो :
जब दोनों प्लेटो के मध्य सिर्फ परावैद्युत माध्यम उपस्थित है तो उस स्थिति में t = d होगा
अतः सूत्र में t के स्थान पर d रखने पर
C = KAε0/d
2. समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता जबकि विभिन्न मोटाई के भिन्न भिन्न परावैद्युत पदार्थ भरे है :
जब दोनों समान्तर प्लेटो के मध्य विभिन्न प्रकार के पराविद्युत माध्यम उपस्थित है उस दशा में धारिता।
माना t1 ,
t2 , t3 ….
tn मोटाईके क्रमशः K1 , K2 ,
K3 …. Kn परावैद्युत उपस्थित।
अतः d = t1 , t2 ,
t3 …. tn
अतः सूत्र में मान रखने पर अर्थात d = t1 ,
t2 , t3 ….
tn रखने पर
हल करने पर
3. जब दोनों प्लेटो के मध्य सिर्फ वायु उपस्थित हो :
इस स्थिति में t = 0
सूत्र
में t = 0 रखने पर
C = Aε0/d
संधारित्रो का
श्रेणी क्रम
और
संधारित्र पाशर्व क्रम
या
समानांतर क्रम
संयोजन combination of capacitors
संधारित्रो का संयोजन
(combination of capacitors ) : विभिन्न प्रकार के परिपथों
(circuits) में अलग अलग धारिताओं वाले संधारित्र की तथा विभिन्न विभव विभवांतर की आवश्यकता होती है , संधारित्रों का आपस में संयोजन करके इस आवश्यकता को पूरा किया जा सकता।
संधारित्रों का संयोजन दो प्रकार का होता है
1. श्रेणीक्रम संयोजन
2. पाशर्व क्रम या समान्तर क्रम संयोजन
1. श्रेणी क्रम संयोजन (series combination of capacitors)
यदि दो संधारित्रों को इस तरह से जोड़ा जाये की पहले संधारित्र की दूसरी प्लेट दूसरे संधारित्र की पहली प्लेट से जुड़ा हुआ हो , इसी प्रकार दूसरे संधारित्र की दूसरी प्लेट तीसरे संधारित्र की पहली प्लेट से जुडी हुई हो , और इसी प्रकार अन्य संधारित्र भी जुड़े हुए है तो इस प्रकार के संयोजन को श्रेणी क्रम संयोजन कहते है। जैसा चित्र में दिखाया गया है।
इस संयोजन में सभी प्लेटो पर आवेश का मान समान रहता है , ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब चित्रानुसार पहले संधारित्र की पहली प्लेट को बैटरी के धन सिरे से जोड़ते है तो इस प्लेट पर धनावेश आ जाता है , अब प्रेरण प्रभाव के कारण इस प्लेट की द्वितीय प्लेट पर उतना ही ऋणावेश आ जाता है , फिर से ऋणात्मक आवेश से द्वितीय संधारित्र की प्रथम प्रथम प्लेट पर प्रेरण प्रभाव के कारण समान मात्रा में धनावेश आ जाता है , यह क्रम अंत तक चलता रहता है , अंतिम संधारित्र की द्वितीय प्लेट को बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ा जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
इस प्रकार के संयोजन से बने परिपथ का प्रभावी या परिणामी धारिता का मान ज्ञात करते है।
माना चित्रानुसार 3 संधारित्र है इनकी धारिता क्रमशः C1 ,
C2 , C3 है। सभी संधारित्रों पर समान आवेश Q उपस्थित है तथा माना प्रत्येक संधारित्र पर विभवांतर का मान क्रमशः V1 ,
V2 , V3 है।
चूँकि V = Q /C अतः यहाँ
V1 = Q/C1 , V2 =
Q/C2 , V3 = Q/C3
अतः यहाँ कुल विभवांतर का मान
V = V1 + V2 + V3
V1 , V2 ,
V3 का मान रखने पर
V = Q/C1 + Q/C2 + Q/C3
V = Q [1/C1 + 1 /C2 + 1/C3]
चूँकि चूँकि V = Q /C
अतः
Q /C = Q [1/C1 + 1 /C2 + 1/C3]
1 /C = 1/C1 + 1 /C2 + 1/C3
इसे श्रेणीक्रम में संधारित्र की कुल धारिता (C) कहते है।
सूत्र को देखकर हम निष्कर्ष निकाल सकते है की श्रेणीक्रम संयोजन की कुल धारिता का व्युत्क्रम (1/C ) , सभी संधारित्रों की अलग अलग धारिताओं के व्युक्रम के जोड़ के बराबर होती है।
श्रेणीक्रम संयोजन की तुल्य धारिता का मान परिपथ में उपस्थित सबसे कम धारिता वाले संधारित्र से भी कम प्राप्त होता है।
2. पाशर्व क्रम या समान्तर क्रम संयोजन (parallel
combination of capacitor )
समान्तर क्रम संयोजन का उद्देश्य धारिता को बढ़ाना है।
इस प्रकार के संयोजन में सभी संधारित्रों को इस प्रकार जोड़ा जाता है सभी संधारित्रो की प्रथम प्लेट बैटरी के धन सिरे से जुडी हो तथा दूसरी प्लेट बैट्री के ऋण सिरे से जुडी हो , इस प्रकार के संयोजन में सभी संधारित्रों पर आवेश का मान भिन्न होता है लेकिन विभवांतर का मान समान होता है।
माना चित्रानुसार तीन संधारित्र समान्तर क्रम में जुड़े है तीनो संधारित्र पर समान विभव V है , संधारित्रों पर आवेश क्रमशः Q1 ,
Q2 , Q3 है तथा इनकी धारिता क्रमशः C1 ,
C2 , C3 है।
अतः Q1 = VC1 ,Q2 = VC2 , Q3 = VC3
कुल आवेश Q = Q1 + Q2 + Q3
Q1 , Q2 , Q3 का मान रखने पर
Q = VC1 + VC2 + VC3
यदि संधारित्र की कुल धारिता C हो तथा कुल आवेश Q हो तो
Q = CV
Q का मान ऊपर सूत्र में रखने पर तुल्य धारिता
CV = VC1 + VC2 + VC3
CV = V[C1 + C2 + C3]
अतः
C = C1 + C2 + C3
इसे समान्तर क्रम में संधारित्र की कुल धारिता (C) कहते है।
अतः सूत्र से हम निष्कर्ष निकाल सकते है की समान्तर क्रम में जुड़े संधारित्र की तुल्य धारिता सभी संधारित्रों की धारिता के योग के बराबर होती है।
समांतर क्रम में कुल धारिता का मान संयोजन में सबसे अधिक धारिता वाली संधारित्र की धारिता से अधिक प्राप्त होता है।
संधारित्र में
संचित
ऊर्जा
energy stored in a capacitor in hindi
energy stored in a
capacitor in hindi संधारित्र में संचित ऊर्जा : हमने अध्याय के प्रारम्भ में जब संधारित्र के बारे में बात की थी तो पढ़ा था की संधारित्र एक ऐसी युक्ति है जिसमे ऊर्जा संचित रहती है अर्थात यह एक ऐसा यंत्र है जिसमे ऊर्जा संरक्षित रखी जाती है और जरुरत पड़ने पर इसका उपयोग किया जाता है।
अब हम बात करते है की संधारित्र में संचित ऊर्जा का मान कितना होता है , यह किन किन बातों पर निर्भर करती है इत्यादि।
“संधारित्र को आवेशित करने में किया गया कार्य इसमें ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है इसे संधारित्र की संचित ऊर्जा कहते है “
सामान्तया आवेशन का यह कार्य बैटरी द्वारा किया जाता है , बैट्री यह कार्य अपनी रासायनिक ऊर्जा का उपयोग करके करती है और संधारित्र इस कार्य (आवेशन ) से प्राप्त ऊर्जा को संचित कर लेता है।
जिस प्रकार स्थिर आवेश को अनंत से किसी बिंदु तक लाने में किया गया कार्य इसमें स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है उसी प्रकार संधारित्र में एक प्लेट से दूसरी प्लेट तक आवेश को ले जाने में एक कार्य करना पड़ता है यह कार्य संधारित्र में ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।
मान लीजिये q’ आवेश पहले से ही एक प्लेट से दूसरी प्लेट पर गति कर चुके है अर्थात स्थानांतरित हो चुके है , q’ आवेश स्थानांतरण के कारण विभव में अंतर V’ हुआ है (माना ) ,
अतः सूत्र से विभवांतर परिभाषा से
V’ = q’/C
अब यदि हम dq आवेश एक प्लेट से दूसरी प्लेट पर स्थानांतरित करना चाहते है तो इसमें किया गया कार्य होगा
dW = V’dq
इस dq आवेश को स्थानांतरित करने में जो dW कार्य करना पड़ रहा है , यह कार्य ही संधारित्र में इसकी ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।
यदि हम सम्पूर्ण आवेश को एक प्लेट से दूसरी प्लेट पर स्थानान्तरित करना चाहते है तो हमें समाकलन का उपयोग करना पड़ेगा
अतः सम्पूर्ण आवेश Q को प्लेट पर स्थानान्तरित करने के किया गया कुल कार्य
W = 0∫Q V’ dq
इसमें V’ का मान रखकर हल करने पर
यह किया गया कार्य ही संधारित्र में इसकी ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।
W = U (कार्य = स्थितिज ऊर्जा )
चूँकि Q = CV
हम यह भी जानते है की Q/C
= V
अतः मान रखने पर
हमने यहाँ संधारित्र की ऊर्जा के सूत्र को विभिन्न रूप में देख चुके है
हम आपको बता दे की यह स्थितिज ऊर्जा संधारित्र के विद्युत क्षेत्र में विधमान रहती है और चूँकि संधारित्र में उत्पन्न विद्युत क्षेत्र प्लेट के क्षेत्रफल (A) पर निर्भर करता है (E
= q/ε0A) , इसलिए किसी संधारित्र में संचित ऊर्जा भी प्लेट के क्षेत्रफल पर निर्भर करती है की उसमे अधिकतम कितनी ऊर्जा संचित हो सकती है।
उपयोग
संधारित्र में संचित ऊर्जा के उपयोग की बात करे तो अपने पंखे में लगा कंडेंसर देखा होगा यह संधारित्र ही है जो पंखे का बटन दबाते ही पंखे को चालू अर्थात घूर्णन के लिए ऊर्जा प्रदान करता है यह ऊर्जा प्रारम्भ में दी जाती है यदि यह पंखे को न मिले तो वह गति नहीं करेगा , कभी कभी ऐसा होता है की कंडेसर ख़राब होने पर पंखा नहीं खुमता है इसका कारण यही है की उसको घूर्णन गति प्रारम्भ करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा मिल नहीं रही तो संधारित्र (कंडेंसर ) द्वारा दी जाती है।
समान्तर प्लेट संधारित्र का ऊर्जा घनत्व energy density of a parallel plate capacitor in hindi
energy density of a parallel plate capacitor in hindi समान्तर प्लेट संधारित्र का ऊर्जा घनत्व : हमने संधारित्र में संचित ऊर्जा के बारे में अध्ययन कर लिया है और यह भी पढ़ चुके है की यह संचित ऊर्जा कहाँ पर होती है और इसका क्या उपयोग होता है।
अब हम बात करते है की समांतर प्लेट संधारित्र में ऊर्जा का घनत्व कितना होता है इसके लिए सूत्र स्थापित करेंगे , पहले आप यह समझ ले की ऊर्जा घनत्व का अभिप्राय यह होता है प्रति आयतन ऊर्जा का मान कितना होगा।
अर्थात कुल ऊर्जा का प्रति आयतन में ऊर्जा का मान कितना होगा यह हमें ज्ञात करना है।
माना समान्तर प्लेट संधारित्र की प्लेट का क्षेत्रफल A है और प्रत्येक प्लेट पर आवेश का मान Q है अतः प्लेटों के बीच में उत्पन्न विद्युत क्षेत्र (E) का मान
E = σ/ ε0
σ का मान रखने पर (σ = Q/A )
अतः
E = Q/ε0A
समीकरण को व्यवस्थित करने पर
Q = ε0 E A
हमने संधारित्र में संचित ऊर्जा में ज्ञात किया है की यह संचित ऊर्जा
U = Q2/2C
समान्तर प्लेट संधारित्र के लिए धारिता
C = ε0A/d
यहाँ d दोनों प्लेटो के मध्य की दूरी है।
C तथा Q का मान U वाली समीकरण में रखने पर तथा हल करने पर
U = ε0 E2Ad/2
हम जानते है की प्लेटों के मध्य आयतन V = Ad
ऊर्जा घनत्व = एकांक आयतन में संचित ऊर्जा
ऊर्जा घनत्व = U/V
यहाँ U तथा V का मान रखकर हल करने पर
ऊर्जा घनत्व = ε0 E2/2
अतः हमने ज्ञात ज्ञात किया है की समान्तर प्लेट संधारित्र के प्रति इकाई आयतन में संचित ऊर्जा का मान ε0 E2/2 होगा।
संधारित्रो के
संयोजन में
संचित
ऊर्जा
energy stored in combinations of capacitors in hindi
energy
stored in combinations of capacitors in hindi संधारित्रो के संयोजन में संचित ऊर्जा
: हम संधारित्रों के संयोजन के बारे में पढ़ चुके है की जब बहुत सारे संधारित्र आपस में जुड़े हुए होते है तो प्रभावी या तुल्य धारिता का मान कितना होता है। संधारित्रों का संयोजन तो प्रकार का हो सकता है 1. श्रेणीक्रम तथा 2. समान्तर संयोजन।
अब अध्ययन करते है की संयोजन में संधारित्र की तुल्य या कुल संचित ऊर्जा का मान कितना होता है।
1. श्रेणीक्रम संयोजन में संचित ऊर्जा (energy stored in
series combination of capacitors )
माना तीन संधारित्र चित्रानुसार श्रेणीक्रम में जुड़े हुए है इनकी धारिता का मान क्रमशः C1 , C2 , C3 है
अतः श्रेणी क्रम में जुड़े निम्न तीनो संधारित्रों की प्रभावी या कुल धारिता का मान होगा
चूँकि श्रेणीक्रम में आवेश का मान सभी संधारित्रों पर समान होता है अतः हम श्रेणीक्रम की संचित ऊर्जा का मान ज्ञात करने के लिए आवेश के रूप में ऊर्जा का सूत्र इस्तेमाल करेंगे जो निम्न हमने ज्ञात किया था
इस सूत्र में C तुल्य धारिता है जो हमने अभी ज्ञात की है , सूत्र में तुल्य धारिता का मान रखकर हल करने पर
U = 1/2 q2 (1/c1 + 1/c2 + 1/c3)
हम जब इसको अधिक हल करते है तो हम पाते है की यह सभी संधारित्रों की अलग अलग संचित ऊर्जा के योग के बराबर प्राप्त होता है।
अर्थात
U = U1 +
U2 + U3
2 . समान्तर संयोजन में संचित ऊर्जा (energy stored in
Parallel combination of capacitors )
माना तीन संधारित्र चित्रानुसार समानांतर संयोजन में जुड़े हुए है इनकी धारिता का मान क्रमशः C1
, C2 , C3 है
अतः समान्तर क्रम में जुड़े निम्न तीनो संधारित्रों की प्रभावी या कुल धारिता का मान होगा
C = C1 + C2 +
C3
चूँकि समान्तरक्रम में विभव (V) का मान सभी संधारित्रों पर समान होता है अतः हम समान्तर क्रम की संचित ऊर्जा का मान ज्ञात करने के लिए विभव (V) के रूप में ऊर्जा का सूत्र इस्तेमाल करेंगे जो निम्न हमने ज्ञात किया था
सूत्र में तुल्य धारिता (C) का मान रखकर हल करने पर
U = 1/2 [V2 (C1 + C2 + C3)]
इसको ब्रेकेट के अंदर गुणा करके हल करने पर हम पाते है की यह ऊर्जा सभी संधारित्रों की संचित ऊर्जाओं के योग के बराबर है।
अर्थात
U = U1 +
U2 + U3
नोट : जिस प्रकार हमने श्रेणी तथा समांतर क्रम में 3 संधारित्रों के लिए संचित ऊर्जा का मान ज्ञात किया इसी प्रकार 3 से अधिक के लिए ज्ञात कर सकते है , सूत्र इसी प्रकार होगा चाहे संधारित्रों की संख्या कितनी भी बढ़ा दी जाए।
आवेश
पुनर्वितरण , ऊर्जा
हानि
redistribution of charge and energy loss in hindi
आवेशित चालकों के संयोजन से आवेशों का पुनर्वितरण तथा ऊर्जा हानि
(redistribution of charges and loss of energy by combination of charged
conduction) : जब दो आवेशित चालक जिनका विद्युत विभव भिन्न भिन्न है को आपस में जोड़ा जाता है तो उनमे आवेश एक गोले से दूसरे गोले पर स्थानांतरित तब तक होता है जब तक दोनों गोलों पर विभव दोनों चालकों पर समान हो जाता है , इस प्रक्रिया में ऊर्जा की हानि होती है , इन दोनों के बारे में विस्तार से पढेंगे।
आवेश पुनर्वितरण (redistribution of charge)
चित्रानुसार दो चालक लेते है , दोनों चालकों पर आवेश , त्रिज्या , विभव तथा धारिता अलग अलग है , प्रथम चालक की त्रिज्या r1 , आवेश Q1 , विभव V1 , स्थितिज ऊर्जा अर्थात संचित ऊर्जा U1 है। तथा दूसरे चालक की त्रिज्या r2 , आवेश Q2 , विभव V2 , स्थितिज ऊर्जा अर्थात संचित ऊर्जा U2 है। धारिता क्रमशः C1 ,
C2 होगी।
पुनर्वितरण से पूर्व
Q1 = C1V1
Q2 = C2V2
कुल आवेश
Q
= Q1 + Q2
Q = C1V1+ C2V2
अब हम दोनों चालकों को नगण्य धारिता वाले तार से जोड़ते है , चूँकि दोनों पर विभव का मान बराबर नहीं है और हमने यह भी पढ़ा था की विभव उच्च विभव से निम्न विभव की ओर गति करता है जब तक की दोनों जगह विभव बराबर न हो जाए।
इसलिए यहाँ भी विभव में अंतर होने के कारण आवेश उच्च विभव वाले चालक से निम्न विभव वाले चालक की और प्रवाह करता है जब तक की दोनों चालकों पर विभव का मान समान न हो जाए।
तार से जोड़ने के बाद अर्थात पुनर्वितरण के बाद दोनों चालकों पर विभव V समान रहेगा , आवेश Q’1 , स्थितिज ऊर्जा अर्थात संचित ऊर्जा U’1 है। तथा दूसरे चालक पर आवेश Q’2 , स्थितिज ऊर्जा अर्थात संचित ऊर्जा U’2 है। धारिता दोनों चालकों के लिए क्रमशः C1 , C2 है।
पुनर्वितरण के बाद
Q’1 = C1V
Q’2 =
C2V
कुल आवेश
Q
= Q’1 + Q’2
Q = C1V + C2V
Q = V(C1 + C2)
चूँकि आवेश संरक्षण नियम से कुल आवेश समान रहता है।
अर्थात पहली वाली स्थिति तथा पुनर्वितरण के बाद वाली स्थिति , दोनों स्थितियों में कुल आवेश बराबर होगा।
C1V1+ C2V2 = V(C1 + C2)
यहाँ से पुनर्वितरण के बाद समान विभव (V) का मान
V = C1V1+ C2V2 /(C1 + C2)
इसी तरह हल करने पर
ऊर्जा हानि (energy loss )
पुनर्वितरण प्रक्रिया में जब दोनों चालकों को तार से जोड़ा गया तो हालाँकि यह ध्यान रखा जाता है की तार का चयन नगण्य धारिता वाला हो लेकिन तार से जब आवेश गति करता है तो कुछ न कुछ ऊर्जा ऊष्मा के रूप में बाहर निकलती है क्योंकि चालक तार का कुछ न कुछ प्रतिरोध अवश्य होगा जो इस आवेश की गति का विरोध करेगा और फलस्वरूप ऊर्जा ऊष्मा के रूप में बाहर निकलती है जिससे ऊर्जा की हानि होती है , अब हम ज्ञात करते है की इस ऊर्जा हानि का मान कितना होता है।
पुनर्वितरण से पूर्व की कुल ऊर्जा
U = ½(C1V12) + ½(C2V22)
दोनों चालकों को तार से जोड़ने (पुनर्वितरण )
के बाद कुल ऊर्जा
U’ = ½(C1 +
C2) V2
U’ समीकरण में V का मान रखकर हल करने पर
अतः ऊर्जा हानि
= प्रारंभिक कुल ऊर्जा –
अंतिम कुल ऊर्जा
∇U = U – U’
समीकरण में U तथा U’ का मान रखकर हल करने पर


























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