किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिय उपकरण Ray Optics
and Optical Instruments
फोकस बिन्दु , फोकस दूरी , फोकस तल , परावर्तन की परिभाषा क्या है
निम्न की परिभाषा दीजिए।
answer : निम्न की परिभाष निम्नानुसार है –
1. फोकस बिन्दु (focus point):- मुख्य अक्ष के समानान्तर आने वाली किरणे दर्पण से परावर्तनप के पश्चात मुख्य अक्ष के जिस बिन्दु पर आकर मिलती है अथवा मिलती हुई प्रतीत होती है उसे फोकस बिन्दु (M) कहते है।
2. फोकस दूरी
(focus distance):- दर्पण के ध्रुव और फोकस बिन्दु के बीच की दूरी को फोकस दूरी (f) कहते है।
3. फोकस तल:- मुख्य अक्ष के लम्बव्त फोकस बिन्दु से गुजरता हुआ तल फोकस समतल कहलाता है। जो किरणे मुख्य के समानान्तर नहीं है परन्तु आपस में समानान्तर है फोकस तल के इसी बिन्दु पर आकार मिलती है।
4. परावर्तन (Reflection):- आपतित किरण एक माध्यम से चलकर दूसरे माध्यम से टकराकर उसी माध्यम में लौट आती है इस घटना को परावर्तन कहते है।
परावर्तन के नियम (Rules of
reflection):- आपतन कोण i और परावर्तन कोण r बराबर होता है। यदि कोई किरण लम्बवत् आपतित होती है तो उसी मार्ग से वापिस लौट आती है।
अपवर्तन की परिभाषा क्या है , स्नेल का नियम , उदाहरण Refraction in hindi
निम्न को समझाइये
1. अपवर्तन (Refraction)-
जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम से प्रवेश करती है तो अपने पथ से विचलित हो जाती है। इस घटना को अपवर्तन कहते है।
चित्र
2. अपवर्तन का नियम – (स्नेल का नियम) (Snell’s law) – आपतन कोण की ज्या और अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात किन्हीं दो माध्यमों के लिए नियत होता है। इस नियंताक को पहले मायध्म के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनाक कहते है।
N21 = Sin
i /Sin r
नोट:-
1. किसी पदार्थ का अपवर्तनांक पदार्थ की प्रकृति पर तरंग दैध्र्य पर ताप निर्भर करता है।
2. अपवर्तन की घटना में आवृत्ति में परिवर्तन नहीं होता है। परन्तु वेग और तरंग दैध्र्य बदल जाती है।
3. C = V λ सूत्र से यदि वेग बढ़ता है तो तरंग देैध्र्य का मान भी बढ़ता है और यदि वेग घटता है तो तरंग दैध्र्य का मान भी घटेगा।
4. विरल माध्यम की अपेक्षा सघन माध्यम में प्रकाश का वेग कम होता है। इस आधार पर हवा, जल, काँच में सबसे ज्यादा वेग हवा में जल में और उसके बाद काँच में होगा।
5. जब प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम से जाती है तो अभिलम्ब से दूर हटती है तो यदि विरल से सघन में जाती है तो अभिलम्ब के पास आतीहै।
6. निर्वात का अपवर्तनाक का मान 1 हवा का मान 1.00029 जल का अपवर्तनाक 4/3 और का अपवर्तनांक सबसे अधिक 2.4 होता है।
अपवर्तन के उदाहरण (Examples of
refraction) समझाइए।
(1) जल में डूबे हुए सिक्का का ऊपर उठा दिखाई देना:- सिक्के को जल के ऊपर से देखते है तो सिक्के से आने वाली किरण जल से हवा में जाने के कारण अभिलम्ब से दूर हटती है। इसलिए सिक्का ऊपर उठा हुआ दिखाई देता है यदि वास्तविक गहराई n और आभासी गहराई n’ है तो
चित्र
(2) सूर्योउदय और सूर्यास्त के समय सूर्य क्षैतिज से नीचे होने पर भी दिखाई देता है।
चित्र
जब सूर्य क्षैतिज से नीचे हैं तो सूर्य से आने वाली किरणे जब विरल से सघन माध्यम में प्रवेश करती है तो अभिलम्ब के पास आने के कारण मुडती जाती है और मनुष्य को सूर्य क्षैतिज से ऊपर उठा हुआ दिखाई देता है इसलिए सूर्योस्त के समय में और सूर्योदय के समय में 2 मिनट की वृद्वि हो जाती है इस प्रकार दिन के समय कुल 4 मिनट की वृद्वि हो जाती है।
(3) काँच की पट्टिका पर तीर्यक किरण को आपतित कराते हैं तो निर्गत किरण आपतित के समानान्तर होती है। परन्तु निर्गत किरण और आपतित किरण में बस दूरी से विस्थापन हो जाता है जिसे पाॅश विस्थापन कहते है।
क्रांतिक कोण , पूर्ण आन्तरिक परावर्तन , शर्तें , उदाहरण
प्रश्न 1: क्रातिक कोण की परिभाषा दीजिए अपतर्वनाक और क्रान्तिक कोण में सम्बन्ध ज्ञात कीजिए तथा पूर्ण आन्तरिक परावर्तनप कि परिभाषा देकर इसकी शर्त लिखिए।
क्रांतिक कोण (critical angle):- सघन माध्यम में आपतन कोण का वह मान जिसके लिए विरल माध्यम में आपवर्तन कोण 90 degree होता है। क्रान्तिक कोण कहते है।
नोट:-
1. काँच और हवा के लिए क्रान्तिक कोण का मान लगभग 42 डिग्री होता है।
2. हीरे और हवा के लिए क्रांतिक कोण का मान 24.2 डिग्री होता है।
3. पूर्ण आन्तरिक परावर्तन की घटना में 100 % (प्रतिशत) आपतित ऊर्जा परावर्तित हो जाती है।
पूर्ण आन्तरिक परावर्तन(Full internal
reflection):- यदि सघन माध्यम में आपतित किरण को क्रांतिक कोण से अधिक कोण पर आपतित कराये तो यह उसी माध्यम में लौट जाती है इस घटना को पूर्ण आन्तरिक परावर्तन कहते है।
शर्तें (conditions):-
1. किरण सघन माध्यम से चलकर विरल माध्यम के पृष्ठ पर पड़नी चाहिए।
2. आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए।
प्रश्न 2 : पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के उदाहरण समझाइये ?
(1) मरीचिका:-
चित्र
गर्मी के दिनों में जब तेज गर्मी पड़ती है तो पृथ्वी का धरातल गर्म हो जाता है और हवा की परते भी गर्म हो जाती है। गर्म होने पर हवा की परतों का अपवर्तनांक कम हो जाता है। अतः पृथ्वी तल से जैसे जैसे ऊपर की ओ जाते हैं हवा की परतों का अपवर्तनांक बढ़ता जाता है। जब किसी पेड़ से प्रकाश की किरणे नीचे की ओर आती है तो सघन से विरल माध्यम में जाने के कारण उत्तरोत्तर अभिलम्ब से दूर हटती जाती है और पृथ्वी के निकट आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक हो जाने के कारण पूर्ण आन्तरिक परावर्तन हो जाता है और प्रेरक्षक को ये किरणे पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे से आती हुई इस प्रकार मालूम पड़ती है जैसे कि वहाँ तालाब या पोखर से परावर्तित किरणे पहुच रही हो इस प्रकार वह जल होने की भ्रम की स्थिति हो जाती है जिसे मरीचिका कहते है।
(2) हीरा (Diamond):- हीरे और हवा के लिए क्रांतिक कोण का मान 24.20 होता है। अतः हीरे में प्रकाश की किरण यदि अन्दर पहुँच जाती है तो बार बार उसका पूर्ण आन्तरिक परावर्तन होता रहता है। इसलिए हीरे में चमक होती है हीरे की चमक कारीगर के तराशने पर ही निर्भर करती है वह इसको इस प्रकार तराशता हैं कि बार बार पूर्ण आन्तरिक परावत्रन की घटना हो अतः प्रकाश की किरण इसमें से बाहर न निकल पाने के कारण हीरा चमकता रहता है।
(3) किरण का 90 डिग्री एवं 180 डिग्री से मोडना:- इसके लिए विशेष आकृति का एक प्रिज्म लेते है। जिसका एक कोण 90 डिग्री और शेष दो कोण 45 डिग्री , 45 डिग्री के होते है। जब प्रकाश की किरण पृष्ठ पर लम्बव्त आपतित होती है तो बिना विचलित हुए सीधी चली जाती है और दूसरे पृष्ठ पर 45 डिग्री कोण पर आपतित होती है काँच और हवा के लिए क्रांतिक कोण का मान लगभग 42 डिग्री होता है। अतः पूर्ण आन्तरिक परावर्तन की घटना होती है इस प्रकार चित्र में दिखाये अनुसार किरण को 90 डिग्री एवं 180 डिग्रीसे मोड़ा जा सकता है।
(4) प्रकाशीय तंतु (Optical filament):- यह बाल की आकृति का एक विशेष काँच का बना होता है। जिसके अन्दर वाले भाग को कोर कहते है। जबकि बाहरी भागको आछांदित भाग कहते है। आछंदित भाग का अपवर्तनांक क्लैडिंग परत अपवर्तनांक से थोड़ा कम होता है जब कोर के प्रकाश कि किरण कोर पर आपतित होता है तो आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक होने पर किरण का बार बार पूर्ण आन्तरिक परावर्तन होने से एक सिरे से दूसरे सिरे तक बिना ऊर्जा क्रान्ति के पहुंच जाती है।
प्राथमिक इन्द्रधनुष और द्वितीयक इन्द्रधनुष , प्रकीर्णन , रेले का प्रकीर्णन
प्रश्न 1: प्राथमिक इन्द्रधनुष की संरचना समझाइये और यह द्वितीयक इन्द्रधनुष से इस प्रकार भिन्न है।
उत्तर : जब सूय एक क्षैतिज की ओर होता है और वर्षा इसके विपरित क्षितिज में हो रही है उस समय मनुष्य अपनी पीट को सूर्य की तरपफ रखे तो इन्द्रधनुष दिखाई देता है। जब वर्षा हो रही होती है तो पानी की नन्ही-नन्ही बूंदे हवा में तैरती रहती है ये बूंदे प्रिज्म की तरह कार्य करती है। जब प्रकाश की किरण बूंद में प्रवेश करती है तो अपवर्तन के कारण परिक्षेपण की घटना होती है जब ये किरणे बूंद के दूरसे पृष्ठ पर आपतित होती है और आपतन कोण का मान क्रांन्तिक कोण से 48 डिग्री अधिक है। तो आन्तरिक परावर्तन की घटना होती है और अन्त में अपवर्तन के द्वारा ये किरणे बाहर निकल जाती है चित्र में ऊपर की बूंद से लाल किरण और नीचे की बूंद से बैंगनी किरण आँख में प्रवेश करती है इस प्रकार मनुष्य को इन्द्रधनुष 40 डिग्री से 42 डिग्री (2डिग्री) एक कोण पर इन्द्रधनुष दिखाई देता है।
चित्र
प्रश्न 2 : रेले प्रकीर्णन किसे कहते हैं। प्रकीर्णन की परिभाषा दीजिए और समझाइए कि दिन के समय आकाश नीला और बादल श्वेत दिखायी देते हैं क्योें ?
प्रकीर्णन (Dispersion):- जब सूर्य से प्राप्त किरणे हवा के कणों पर पड़ती है तो प्रकाश की किरणें चारो तरफ फैल जाती है इस घटना को प्रकीर्णन कहते है।
रेले का प्रकीर्णन (Scattering of
rallies):- यदि प्रकीर्णन का आकार तरंगद्र्वध्र्य की तुलना में छोटा है तो प्रकीकर्णन की प्रकाश की तीव्रता तरंग दैध्र्य के चतुर्थ घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
चित्र
रेले प्रकीर्णन से स्पष्ट हैं कि प्रकीर्णन प्रकाश में नीले रंग की तीव्रता अधिक होगी यही करण है कि दिन के समय आकाश नीला दिखाई देता है। पानी की बूंदे, धूए के कण, प्रकाश की तरंग द्र्वध्र्य की तुलना में अधिक बड़े होते हैं। अतः इनमें रेले प्रकीर्णन नहीं होता। इन कणों से प्रकीर्णन प्रकाश की तीव्रता में सभी तरंग द्वैध्र्य की किरणों का मान समान होता है। इसलिए बादल और धुए के कण श्वेत दिखाई देते है।
प्रश्न 3 : सूर्य उगत व छिपते समय लाल रंग का क्यों दिखाई देता है समझाइए?
उत्तर : सूर्य अथवा चन्द्रमा उगते समय इससे आने वाली किरणे जब पे्रक्षक तक पहुॅचती है तो किरणों को वायुमण्डल में अधिक दूरी तय करनी पड़ती है छोटी द्वैध्र्य की किरणों का प्रकीर्णन होने के कारण आपतित प्रकाश में लाल रंग की तीव्रता अधिक होती है। क्योंकि लाल रंग का प्रकीर्णन बहुत कम होता है इसी कारण खतरे के निशान भी लाल रंग के होते है। ताकि लाल रंग अधिक दूरी तक जा सके।
नेत्र की समंजन क्षमता , निकट बिन्दु , दूर बिन्दु , दृष्टि परास , अबिन्दुकता दोष व निवारण
प्रश्न : नेत्र का चित्र बनाइए और समझाइए कि
1. नेत्र की समझन क्षमता
2. नेत्र का निकट बिन्दु
3. नेत्र का दूर बिन्दु
4. दृष्टि परास
5. निकट दृष्टि दोष व निवारण
6. दूर दृष्टि दोष व निवारण
7. अबिंदुकता दोष व निवारण
चित्र
1. नेत्र की समंजन क्षमता (Eye
capability):- अन्नत पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब नेत्र लेंस के द्वारा रेटिना पर बनता है नजदीक की वस्तु को देखने के लिए नेत्र लेंस पर पेशियों के द्वारा दबाव डालकर फोकस दूरी कम कर देते हैं और नजदीक रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब भी रेटिना पर बन जाता है। नेत्र के इस गुण को नेत्र की संमजन क्षमता कहते है।
2. निकट बिन्दु:- नेत्र से वछ न्यूनतम दूरी जिस पर रखी वस्तु आंख को स्पष्ट दिखाई देती है निकट बिन्दु कहलाता है साधारण आंख के लिए यह 25 सेन्टीमीटर (D) होता है। जबकि दस वर्ष के बालक का निकट बिन्दु 8-10 सेन्टीमीटर होता है।
3. दूर बिन्दु:- नेत्र से वह अधिकतम दूरी जहाँ पर रखी वस्तु आंख को स्पष्ट दिखाई देती है दूर बिन्दु कहलाते है। साधारण आंख को दूरी बिन्दु अनंत पर होता है।
4. दृष्टि परास:- न्यूनतम से अधिकतम दूरी जहाँ पर रखी वस्तु आंख को स्पष्ट दिखाई देती है दृष्टि परास कहते है। साधारण आंख के लिए दृष्टि परास 25 सेन्टीमीटर अंनत होता है।
5. निकट दृष्टि दोष एवं निवारण (Near sight
defects and prevention):- आंख का वह दोष जिसके कारण अंनत की वस्तु दिखाई नहीं देती परन्तु नजदीक की स्पष्ट दिखाई देती है इस दोष का कारण हैं कि नेत्र लेंस की फोकस दूरी कम हो जाती है। जिससे दूर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले बनता है। इस दोष को दूर करने के लिए आंख के साथ अवतल लैंस काम में लेना चाहिए।
चित्र
6. दूर दृष्टि दोष एवं निवारण:- इस प्रकार की आंख को दूर की वस्तु तो दिखाई देती है परन्तु नजदीक की दिखायी नहीं देती है। इसका कारण नेत्र लैंस की फोकस दूरी में वृद्वि होना है। अतः नजदीक की वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना के पीछे बनता है। इस दोष का निवारण करने के लिए उतल लैंस काम में लेते है।
चित्र
7. अबिन्दुकता दोष व निवारण:- इस प्रकार की आखं के लिए क्षैतिज और उध्र्व रेखाएं एक साथ दिखाई देती है इस दोष के निवारण के लिए बेलनाकार लेंस काम में लेना चाहिए।



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