साइक्लोट्रॉन की गणितीय विवेचना , सीमाएँ , साइक्लोट्रोन के उपयोग Uses of cyclotron
साइक्लोट्रॉन की गणितीय विवेचना (Mathematical analysis
of cyclotron) : हम यहाँ साइक्लोट्रोन के लिए विभिन्न पहलुओं के लिए सूत्र की स्थापना करेंगे जिनकी सहायता से इसको आसानी से गणितीय रूप में समझा जा सकता है।
चूँकि साइक्लोट्रॉन में धनावेशित कण वृत्ताकार पथ में गति करता है और हम जानते है की वृत्ताकार पथ में गति करने के लिए अभिकेंद्रीय बल की आवश्यकता होती है , इसको यह अभिकेंद्रीय बल चुम्बकीय क्षेत्र से प्राप्त होता है।
चूँकि हम जानते है की कण का रेखीय संवेग p =
mv
अतः
अर्द्ध आवर्त काल अर्थात आधा चक्कर पूरा करने में लगा समय
कण की आवृत्ति
कोणीय वेग का मान
कोणीय आवृत्ति
अतः
साइक्लोट्रॉन की सीमाएँ (Limitations of cyclotron )
1. साइक्लोट्रोन केवल आवेशित कणों को ही त्वरित कर सकता है अर्थात यह अनावेशित कणो को त्वरित करने में असमर्थ है।
2. यह इलेक्ट्रोनो को त्वरित नहीं कर सकता क्योंकि इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान कम होता है अतः ये कम ऊर्जा ग्रहण करने पर भी बहुत ज़्यादा अधिक वेग से गति करते है।
3. एक निश्चित सिमा से अधिक आवेशित कणों को ऊर्जा नहीं दी जा सकती।
साइक्लोट्रोन के उपयोग (Uses of cyclotron )
1. इसका उपयोग नाभिकीय संरचना का पता लगाने में किया जाता है , इसके लिए धनावेशित कणों को त्वरित कर तथा उनकी ऊर्जा में वृद्धि कर उनको नाभिक से संघट्ट करवाया जाता है।
2. साइक्लोट्रॉन का उपयोग रेडियो एक्टिव पदार्थ बनाने में किया जाता है तथा रेडियो एक्टिव पदार्थ का उपयोग विभिन्न रोगों के निदान में किया जाता है अतः चिकित्सा में भी इसका अत्यधिक उपयोग है।
3. इसका उपयोग कर धनावेशित कणों को त्वरित कर या ऊर्जा में वृद्धि कर उनको ठोस में डालकर , ठोस के गुणों में सुधार या बदलवा किया जाता है तथा ठोस पदार्थ के गुणों का भी अध्ययन किया जाता है।
चुम्बकीय क्षेत्र में
धारावाही चालक
तार
पर
बल
Force on current carrying conductor in a magnetic field
Force on current carrying conductor in a magnetic field चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक तार पर बल : हम जानते है की चालक तार में मुक्त इलेक्ट्रॉन बहुतायत से पाए जाते है अतः जब किसी चालक तार को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो तार में उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनो पर लॉरेन्ज बल कार्य करता है और इस लॉरेंज बल (चुम्बकीय बल ) के कारण तार में उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉन चालक में अपवहन चाल (वेग) से प्रवाहित होना शुरू हो जाते है। अतः किसी धारावाही चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर यह चालक एक बल का अनुभव करता है।
यहाँ चित्र में दर्शाया गया है की एक छड़ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा गया है , यहाँ धारावाही चालक तार की लम्बाई L है , तार का अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A है , तथा चालक तार के इकाई आयतन में इलेक्ट्रोनो की संख्या n है तो
चालक तार पर कुल आवेश का मान q = neAL होगा।
चित्रानुसार चालक में धारा I प्रवाहित हो रही है तथा यह चालक तार चुंबकीय क्षेत्र B के साथ θ कोण पर स्थित है तथा मुक्त इलेक्ट्रोनो का अपवहन वेग V है तो इन पर कार्यरत चुम्बकीय बल का मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है।
F = qVBsinθ
यहाँ सूत्र में कुल आवेश q का मान रखने पर , चूँकि q = neAL
अतः
F = neALVBsinθ
चूँकि I = neAV
अतः
F = ILBsinθ
यदि चालक तार तथा चुम्बकीय क्षेत्र के मध्य शून्य डिग्री का कोण हो अर्थात धारावाही चालक चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में स्थित हो तो θ = 0
F = ILBsin0 = 0 चूँकि sin0 = 0
अर्थात चालक पर कोई बल कार्य नहीं करेगा अर्थात चालक स्थिर अवस्था में रहेगा।
यदि चालक तार व चुम्बकीय क्षेत्र के मध्य 90 डिग्री का कोण हो अर्थात दोनों एक दूसरे के लंबवत स्थित हो तो इस स्थिति में θ = 90
F = ILBsin90 = ILB
यह बल का अधिकतम मान है अर्थात इस स्थिति में चालक पर अधिकतम बल कार्य करता है।
फ्लेमिंग का
बायें
हाथ
का
नियम
, दांये
हाथ
की
हथेली
का
नियम
, चुम्बकीय क्षेत्र में
बल
की
दिशा
जब किसी धारावाही चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक तार पर बल कार्य करता है।
चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले इस बल की दिशा को दो नियमों का उपयोग कर ज्ञात करते है
1. फ्लेमिंग का बायें हाथ का नियम (fleming’s left hand rule)
2. दांये हाथ की हथेली का नियम (Right hand palm rule )
अब हम इन दोनों नियमो को विस्तार से पढ़ते है और देखते है की इनका उपयोग कर हम कैसे चुम्बकीय क्षेत्र में रखे चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात कर सकते है।
1. फ्लेमिंग का बायें हाथ का नियम (fleming’s left hand rule)
इस नियमानुसार ” जब हम हमारे बाएं हाथ के अंगूठे , मध्यिका तथा तर्जनी को एक दूसरे के लंबवत व्यवस्थित करते है तो
तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा
मध्यिका चालक में प्रवाहित विद्युत धारा (I) की दिशा
दर्शाता है तो
अँगूठा चालक तार पर लगने वाले बल (F) की दिशा को व्यक्त करता है। “
2. दांये हाथ की हथेली का नियम (Right hand palm rule )
इस नियम के अनुसार हम “अपने दांये हाथ को पूरी तरह इस प्रकार फैलाते है की अंगुलियां और लंगूठा एक दूसरे के लंबवत हो
यदि अंगुलियाँ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा तथा अँगूठा धारावाही चालक में प्रवाहित धारा (I) की दिशा को दर्शाता है तो
चालक तार पर लगने वाला बल हथेली की लम्बवत दिशा में बाहर की तरफ होगा “
बल की दिशा
(direction of force) : चुम्बकीय क्षेत्र में रखे गए धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा निम्नलिखित दो नियमों द्वारा ज्ञात की जा सकती है –
(1)
फ्लेमिंग का बाएं हाथ का नियम
(flemings left hand rule in hindi) : इस नियम के अनुसार “यदि हम बायें हाथ के अंगूठे , मध्यिका और तर्जनी तीनों को एक दुसरे के लम्बवत समायोजित करे तथा तर्जनी द्वारा चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा और मध्यिका द्वारा चालक में प्रवाहित धारा (I) की दिशा व्यक्त होती है तो अंगूठे द्वारा चालक पर लगने वाले बल (F) की दिशा व्यक्त होंगी। “
नोट : फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम को याद रखने का तरीका
अंगूठा तर्जनी
माध्यिका
क्रम →
↓ – ↓ –
↓
Father – Mother – child
↓ –
↓ –
↓
Force
magnetic
field current
↓ – ↓ –
↓
बल चुम्बकीय क्षेत्र
धारा
(2)
दाहिने हाथ की हथेली का नियम नंबर 2
(right hand palm rule number 2) :
इस नियम के अनुसार , “यदि हम दाहिने हाथ का पूरा पंजा इस प्रकार फैलायें कि अंगुलियाँ , अंगूठे के लम्बवत रहे तथा यदि अंगुलियाँ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा और अँगूठे द्वारा चालक में प्रवाहित धारा (I) की दिशा व्यक्त होती है तो चालक पर लगने वाले बल की दिशा हथेली के लम्बवत बाहर की ओर होगी। “
दो
समान्तर धारावाही चालक
तारों
के
मध्य
चुम्बकीय बल
या
एम्पियर का
नियम
Magnetic force between two parallel current carrying conductor दो समान्तर धारावाही चालक तारों के मध्य चुम्बकीय बल या एम्पियर का नियम : जैसा की हम पढ़ चुके है की जब एक धारावाही चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित करते है तो इसके चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
जब दो धारावाही चालकों को एक दूसरे के निकट रखा जाता है तथा इनमे विद्युत धारा प्रवाहित करते है तो ये एक दूसरे पर अपने चारों तरफ उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल आरोपित करते है।
यहाँ हम इसकी गणना करेंगे की ये समीपवर्ती रखे दो समान्तर धारावाही चालक तार एक दूसरे पर कितना बल लगाते है तथा इनके मध्य में कितना बल कार्य करता है।
माना दो तार A तथा B परस्पर एक दूसरे के समान्तर में d दूरी पर स्थित है , जब दोनों तारों में विद्युत धारा क्रमशः I1 &
I2 प्रवाहित की जाती है तथा दोनों धाराएँ एक ही दिशा में बह रही है तो दोनों तारो के मध्य आकर्षण बल लगता है। जैसा चित्र A में दिखाया गया है।
जब दोनों तारों में विद्युत धारा क्रमशः I1 & I2 प्रवाहित धाराएँ एक दूसरे के विपरीत दिशा में बह रही है तो दोनों के मध्य प्रतिकर्षण बल कार्य करता है।
तार A के कारण d दुरी पर स्थित B तार पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र
B1=μ0I1/2πd
B1 की दिशा चित्रानुसार कागज के तल के लंबवत अंदर की तरफ होगी।
चूँकि तार B में I2 धारा प्रवाहित हो रही है , तार की लम्बाई l है तथा यह तार A के द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित है अतः B पर लगने वाला बल
ठीक इसी प्रकार तार B में प्रवाहित धारा I2 है अतः चालक B के कारण d दूरी पर स्थित तार A पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र
B2 =μ0I2 /2πd
B2 की दिशा चित्रानुसार कागज के तल के लंबवत बाहर की तरफ होगी।
ठीक इसी प्रकार धारावाही चालक तार B के कारण चालक A पर उत्पन्न चुम्ब्कीय बल
नोट : चूँकि यहाँ बायो सावर्ट का नियम तथा लॉरेन्ज बल दोनों का प्रयोग हुआ है अतः एम्पियर ने दोनों को मिलाकर यह गणना पूरी की थी इसलिए इसे एम्पियर का नियम भी कहते है।
मानक एम्पियर की परिभाषा (Definition of standard ampere )
चूँकि हम पढ़ चुके है की दो समान्तर धारावाही चालक तारों के मध्य चुम्बकीय बल या एम्पियर का नियम का मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है जबकि तार की लम्बाई l है।
अतः एकांक लम्बाई पर लगने वाला चुम्बकीय बल
जब I1 = I2 =
1 एम्पियर तथा दोनों तार के मध्य की दुरी d = 1 मीटर , तो एकांक तार पर लगने वाला चुंबकीय बल
F/l = 2 x 10-7 N/m
अतः
एम्पियर की परिभाषा
: निर्वात में 1 मीटर की दूरी पर रखे दो चालक तार द्वारा एक मीटर की लम्बाई पर उत्पन्न बल यदि 2 x 10-7 N/m है तो तार में प्रवाहित धारा का मान एक एम्पियर होगा।
एक
समान
चुम्बकीय क्षेत्र में
आयताकार धारावाही लूप
पर
बल
एवं
बल
आघूर्ण torque on loop in magnetic field
Force and torque on a current carrying rectangular loop in a uniform magnetic field एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में आयताकार धारावाही लूप पर बल एवं बल आघूर्ण : यहाँ हम यह अध्ययन करेंगे की जब किसी आयताकार धारावाही लूप को एक चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तथा इस लूप में विद्युत धारा प्रवाहित की जाए तो इस लूप पर एक बलाघूर्ण कार्य करता है हम इस बल आघूर्ण का अध्ययन करेंगे तथा इसके लिए सूत्र की स्थापना करेंगे।
चित्रानुसार माना एक ABCD
आयताकार लूप है , इस लूप में एक विद्युत धारा I प्रवाहित हो रही है , अब इस आयताकार लूप को एक समान या नियत चुम्बकीय क्षेत्र में रखते है , इस लूप की लम्बाई l तथा चौड़ाई b है जैसा चित्र में दर्शाया गया है। इस प्रकार ABCD को व्यवस्थित करने पर इस पर एक बल आघूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र B के लंबवत कार्य करता है।
चुंकि हमने पढ़ा कि यहाँ नेट बल ज़िरो होगा तथा इस ABCD आकृति पर एक बल आघूर्ण कार्य करता हैं। अब बात करते है की कुल या नेट बल शून्य कैसे होता है ?
मान लेते है कि किसी स्थिति जिस पर ABCD आयताकार आकृति का क्षेत्रफल A तथा चुम्बकीय क्षेत्र B के साथ θ कोण बना रहा है। इस स्थिति मे चारों भुजाओं पर चार परिस्थितियाँ बनती है
1. भुजा BC पर बल F1 = IbB , तथा इसकी दिशा ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर होगी ।
2. भुजा DA पर बल F2 = IbB , तथा इसकी दिशा ऊर्ध्वाधर नीचे की तरफ होगी ।
3. भुजा AB पर बल F3 = ILB , इसकी दिशा कागज के लम्बवत अंदर की तरफ होगी ।
4. भुजा CD पर बल F4 = ILB , इसकी दिशा कागज के लम्बवत बाहर की तरफ होगी ।
चुंकि बल F1 तथा F2 परिमाण मे समान है लेकिन इनकी दिशा विपरीत है तथा ये एक ही रेखा पर कार्य कर रहे है इससे ये एक दूसरे को निरस्त कर देते है और ABCD मे ऊर्ध्वाधर कोई विस्थापन उत्पन्न नहीं होता है तथा इनके कारण कोई बल आघूर्ण भी उत्पन्न नहीं होता।
बल F3 तथा F4 भी परिमाण मे समान है लेकिन इनकी दिशा विपरीत है अत: परिणामी बल तो शून्य होगा लेकिन ये बल संरेखिय नहीं है अत: इनके कारण एक बल युग्म बनता है जो लूप को घूर्णन कराता हैं अर्थात इनके कारण एक बल आघूर्ण कार्य करता है ।
अत: कुल बल F
= F1 + F2 + F3 + F4 = 0
चुम्बकीय क्षेत्र मे धारावाही लूप पर लगने वाला बल आघूर्ण
हम ऊपर पढ़ चुके है कि बल आघूर्ण F3 तथा F4 के कारण उत्पन्न हो रहा है , ये बल आपस मे विपरीत दिशा मे कार्यरत है लेकिन समांतर कार्य कर रहे है अत: बल आघूर्ण उत्पन्न होगा
बल आघूर्ण = बल युग्म का परिमाण x बलों के मध्य की दूरी
T
= ILB x b sinθ
चुंकि चित्रानुसार बलों के मध्य की दूरी b sin$ हैं ।
T
= ILBbsinθ
चूँकि हम जानते है की आयताकार क्षेत्र का शेत्रफल A
= लंबाई x चौड़ाई अर्थात A
= Lb
अत:
T
= IABsinθ
धारामापी क्या
है
गैल्वेनोमीटर , सिद्धान्त , कार्य
, प्रकार , उपयोग
Galvanometer in hindi
Galvanometer
in hindi धारामापी क्या है गैल्वेनोमीटर , सिद्धान्त , कार्य , प्रकार , उपयोग
: किसी विद्युत परिपथ में अल्प विद्युत धारा के मापन के लिए जिस युक्ति का उपयोग किया जाता है उसे धारामापी या गैल्वेनोमीटर कहते है।
धारामापी किस सिद्धान्त पर कार्य करती है (principle of galvanometer) ?
यह युक्ति इस सिद्धांत पर कार्य करती है की ” यदि किसी समान या नियत चुम्बकीय क्षेत्र में एक कुण्डली रखी जाए और इसमें धारा प्रवाहित की जाए तो कुंडली पर एक बल आघूर्ण कार्य करता है तथा इस बलाघूर्ण का मान कुण्डली में प्रवाहित धारा के परिमाण पर निर्भर करता है अर्थात जितनी ज्यादा धारा प्रवाहित होती है उतना ही अधिक कुंडली पर बलाघूर्ण का मान होता है “
धारामापी के प्रकार (types of Galvanometer ) ?
धारामापी को दो भागों में बाँटा गया है
1. चल कुण्डली धारामापी
2. चल चुम्बक धारामापी
चल कुण्डली धारामापी को भी आगे दो भागो में बांटा गया है
१. निलम्बित कुण्डली धारामापी
२. किलकित चुम्बक धारामापी
गैल्वेनोमीटर (धारामापी) का उपयोग करता है (use of galvanometer in hindi)
?
धारामापी या गैल्वेनोमीटर का उपयोग कर किसी परिपथ में विद्युत धारा का संसूचन किया जाता है।
इसका उपयोग करके अमीटर तथा वॉल्टमीटर भी बनाये जाते है , धारामापी का उपयोग करके अमीटर या वोल्टमीटर बनाने के लिए धारामापी का रूपान्तरण किया जाता है।
निलंबित कुण्डली धारामापी , त्रिज्य क्षेत्र suspended coil galvanometer in hindi Radial Field
निलंबित कुण्डली धारामापी (suspended coil galvanometer
) : हम यहाँ इसके बारे में विस्तार से पढ़ेंगे की इसकी बनावट या संरचना कैसी होती है , इसकी कार्यविधि , सिद्धान्त इत्यादि।
बनावट या संरचना (Construction) :
निलम्बित कुण्डली धारामापी की संरचना चित्र में दिखाई गयी है , इसमें एक अनुचुम्बकीय धातु (एल्युमिनियम) पर विद्युत रोधी तथा ताँबे के तार को लपेटकर कुण्डली बनाई जाती है।
इस कुण्डली को फॉस्फर ब्रॉन्ज (phosphor bronze) के तार की सहायता से दो प्रबल चुम्बकों के मध्य लटकाया जाता है।
कुण्डली के भीतर एक नरम लोहे की क्रोड़ रखी रहती है।
कुंडली का एक सिरा मरोड़ कुंजी (Torsion hand) से होता हुआ संयोजक पेच T1 से जुड़ा रहता है , यहाँ मरोड़ कुंजी (Torsion hand) कुण्डली को आवश्यकता पड़ने पर घूमने के लिए स्वतंत्र रखता है।
मरोड़ कुंजी तथा कुण्डली के मध्य फॉस्फर ब्रॉन्ज तार पर एक समतल दर्पण लगा रहता है जो तार के साथ आसानी से घूम सकता है।
यह दर्पण लैम्प व स्केल व्यवस्था द्वारा विक्षेप अध्ययन करने अर्थात देखने के काम आता है।
कुण्डली का नीचे वाला सिरा एक प्रत्यास्थ स्प्रिंग से जुड़ा रहता है तथा यह स्प्रिंग T2 से जुडी रहती है।
निलंबित कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त (principle of suspended coil galvanometer)
यह युक्ति इस सिद्धांत पर कार्य करती है कि ” जब किसी धारावाही कुण्डली को किसी समान या समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए और इसमें धारा प्रवाहित की जाये तो कुंडली पर एक एक बल आघूर्ण कार्य करता है जो कुण्डली को घुमाता है तथा यह घूर्णन विक्षेप (बल आघूर्ण) कुण्डली में प्रवाहित धारा के मान पर निर्भर करता है “
माना कुंडली में n फेरे लिपटे हुए है , क्षेत्रफल A , चुम्बकीय क्षेत्र B , तथा कोण θ है तो
बल आघूर्ण
T = nIAB sinθ
यदि चुम्बकीय क्षेत्र त्रिज्य है तो θ = 90′
अतः
T = nIAB
इस बल आघूर्ण के कारण कुण्डली घूमने लगेगी फलस्वरूप फॉस्फर ब्रॉन्ज़ तार में ऐंठन आने लगेगी
माना फॉस्फर ब्रॉन्ज़ (phosphor bronze) तार में ऐंठन कोण ϴ है तो
ऐंठन बल युग्म
Tr = Cϴ
यहाँ ध्यान दे की यह ऐंठन बल युग्म , बल आघूर्ण के विपरीत लगता है
यदि दोनों बल बराबर होंगे तो इसे संतुलन की स्थिति कहते है अतः सन्तुलन की स्थिति में
ऐंठन बल युग्म = बल आघूर्ण
Cϴ = nIAB
अतः
I = Cϴ / nAB
यहाँ C/ nAB को परिवर्तन गुणांक k कहते है
अतः
I = kϴ
त्रिज्य क्षेत्र (Radial Field )
त्रिज्य क्षेत्र का अभिप्राय है कुण्डली के क्षेत्रफल (A) तथा चुम्बकीय क्षेत्र (B) एक दूसरे के लंबवत है अर्थात क्षेत्रफल A तथा चुंबकीय क्षेत्र B के मध्य 90 डिग्री का कोण है। इस स्थिति को ही त्रिज्य क्षेत्र कहते है।
इस स्थिति में धारामापी की सुग्राहिता अधिक होती है।
कार्यविधि
(working)
जैसा की हमने देखा की इसमें लगा दर्पण का उपयोग कर हम कुण्डली में हुआ विक्षेप ज्ञात करते है। यहाँ विक्षेप ϴ मान रहे है।
जब तार में लगे दर्पण में ϴ कोण विक्षेप उत्पन्न होता है तो इस स्थिति में दर्पण में आपतित प्रकाश किरण का परावर्तन हो जाता है अतः परावर्तित होने से 2ϴ कोण घूम जाती है।
यदि स्केल पर प्रकाश बिंदु का विस्थापन d प्राप्त होता है तथा दर्पण से स्केल के मध्य की लंबवत दुरी D है तो
tan(2ϴ) = d/D
धारामापी की
सुग्राहिता , धारा
सुग्राहिता , वोल्टता सुग्राहिता , दक्षतांक , प्रभावी करने
वाले
कारक
Sensitivity of galvanometer
in hindi धारामापी की सुग्राहिता : अल्प से अल्प धारा को भी अच्छी सुग्राहिता वाली धारामापी द्वारा संसूचन कर सकते है। अतः हम कह सकते है की सुग्राहिता का तात्पर्य धारामापी की गुणवत्ता से है।
यदि किसी धारामापी की कुण्डली में एक बहुत अल्प धारा प्रवाहित की जाए तथा इस अल्प धारा का मापन धारामापी में अच्छा विक्षेप उत्पन्न कर उसका मान बता दे तो उस धारामापी को अच्छी सुग्राहिता वाली धारामापी कहते है। दूसरे शब्दों में जब कुण्डली के सिरों पर अल्प विभवान्तर आरोपित किया जाता है तो अच्छी सुग्राही धारा मापी द्वारा संसूचित किया जाता है।
धारा सुग्राहिता (current sensitivity)
किसी धारामापी की धारा सुग्राहिता का मापन कुण्डली में प्रति एकांक धारा के लिए उत्पन्न विक्षेप के आधार पर किया जाता है। इसको डिवीज़न/एम्पियर में मापा जा सकता है।
हम ज्ञात कर चुके है
धारा I =
Cϴ/nAB = kϴ
धारामापी की धारा सुग्राहिता की परिभाषा अनुसार
धारा सुग्राहिता SI = ϴ/I
= nAB/C = 1/k
सूत्र को देखकर हम स्पष्ट रूप से यह कह सकते है धारा मापी की सुग्राहिता बढ़ाने के लिए फेरों की संख्या n , कुण्डली का क्षेत्रफल A तथा चुम्बकीय क्षेत्र का मान बढ़ा सकते है या C का मान कम रख सकते है।
वोल्टता सुग्राहिता (Voltage sensitivity )
कुण्डली के सिरों पर वोल्टेज V है तो ϴ/V को वोल्टेज सुग्राहिता कहते है , माना कुण्डली का प्रतिरोध R है तो
वोल्टेज सुग्राहिता = nAB/CR
धारामापी का दक्षतांक (Figure of merit of galvanometer )
धारा मापी में जितनी धारा मान एकांक विक्षेप उत्पन्न करने के लिए चाहिए उसे धारामापी का दक्षतांक कहते है या धारामापी की सुग्राहिता के व्युत्क्रम को धारामापी का दक्षतांक कहते है।
X = 1/SI
धारामापी की धारा सुग्राहिता को प्रभावी करने वाले कारक
किसी भी धारामापी की धारा सुग्राहिता को निम्न प्रकार बढ़ाया जाता है
1. कुण्डली में फेरो की संख्या को बढाकर
2. कुंडली का क्षेत्रफल का मान बढाकर
3. चुम्बकीय क्षेत्रफल का मान बढाकर
4. मरोड़ी दृढ़ता (C) का मान घटाकर
शंट
प्रतिरोध की
परिभाषा क्या
है
, शण्ट
का
प्रयोग का
कारण
shunt resistance in galvanometer
shunt
resistance in galvanometer शंट प्रतिरोध की परिभाषा क्या है , शण्ट का प्रयोग का कारण : हमने धारामापी के अध्ययन में पढ़ा की इसमें एक कुण्डली का इस्तेमाल होता है , कभी कभी ऐसा होता है की धारामापी में इसकी क्षमता से अधिक धारा प्रवाहित हो जाती है , अधिक धारा प्रवाहित होने से इसमें अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है इस ऊष्मा के कारण धारा में उपयोग की गयी कुण्डली के जलने का खतरा बन जाता है।
या अचानक से धारामापी में अत्यधिक मात्रा में धारा प्रवाहित होने पर इसमें प्रयोग होने वाली संकेतक (सुई) पर झटके से परिवर्तन के कारण टूटने का खतरा रहता है।
इस प्रकार धारामापी में कई प्रकार की क्षतियाँ उत्पन्न हो सकती है , इस प्रकार की सभी समस्याओं से धारामापी को सुरक्षित रखने के लिए धारामापी के समान्तर क्रम में एक अल्प मान का प्रतिरोध जोड़ दिया जाता है , इस जोड़े गए अल्प प्रतिरोध को ही शंट (shunt) कहा जाता है।
शंट से सम्बन्धित कुछ तथ्य
धारामापी में शण्ट का प्रयोग करने से मुख्य धारा (I) का अधिकांश भाग शंट से होकर गुजरता है , ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रयोग किया गया शण्ट अल्प प्रतिरोध का होता है अतः यह मार्ग धारा के मार्ग कम प्रतिबाधा उत्पन्न करता है। यही कारण है की आवश्यकता से अधिक धारा प्रवाहित होने पर भी धारामापी सुरक्षित रहता है क्योंकि धारा शंट प्रतिरोध से होकर गुजर जाती है तथा धारामापी से उतनी ही धारा गुजरती है जितनी आवश्यक होती है।
अमीटर
क्या
है
, धारामापी का
अमीटर
में
रूपान्तरण , Ammeter in hindi
Ammeter in hindi अमीटर क्या है : यह एक ऐसी युक्ति है जिसका उपयोग किसी भी परिपथ में प्रवाहित धारा का मान ज्ञात करने या मापने के लिए होता है। अमीटर एक अत्यन्त कम प्रतिरोध वाली युक्ति है तथा इसकी सहायता से धारा का मापन करने के लिए इसको परिपथ में हमेशा श्रेणीक्रम में लगाया जाता है।
अमीटर का प्रतिरोध कम से कम रखा जाता है , इसका प्रतिरोध जितना कम रखा जाता है यह उतना ही सही धारा का मापन कर पाता है।
किसी भी आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य माना जाता है।
किसी भी धारामापी को अमीटर में बदलने के लिए धारामापी की कुण्डली के समान्तर क्रम में उचित मान का अल्प प्रतिरोध जोड़ देते है इसे धारामापी का अमीटर में रूपान्तरण भी कहते है तथा समान्तरक्रम में जोड़े गए प्रतिरोध को शण्ट (shunt) कहते है।
यहाँ समान्तर क्रम में प्रतिरोध जोड़ने का उद्देश्य धारामापी की कुंडली का प्रभावी प्रतिरोध कम करना है क्योंकि हम पढ़ चुके है की समांतर क्रम में प्रभावी प्रतिरोध 1/R =
1/R1 + 1/R2
अमीटर का संरचना चित्र (construction of ammeter)
हम धारामापी तथा इसकी संरचना के बारे में विस्तार से पढ़ चुके है , हम यहाँ ऊपर यह पढ़ चुके है की धारामापी की कुंडली में समान्तर क्रम में अल्प प्रतिरोध जोड़ने से यह अमीटर में बदल जाता है।
अतः अमीटर में धारामापी की कुण्डली के समान्तरक्रम में उचित प्रतिरोध जोड़कर अमीटर बनाया जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है
किसी भी अमीटर का प्रभावी प्रतिरोध का मान लगाए गए शंट प्रतिरोध के लगभग बराबर ही होता है।
वोल्टमीटर क्या
है
, धारामापी का
वॉल्ट
मीटर
में
रूपान्तरण , voltmeter in hindi
voltmeter in hindi वोल्टमीटर क्या है , धारामापी का वॉल्ट मीटर में रूपान्तरण : यह एक ऐसी युक्ति है जिसका प्रयोग दो बिंदुओं के मध्य विभवान्तर का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता है , अर्थात किन्हीं दो बिन्दुओ के बीच विभवान्तर का मापन करने के लिए वोल्टमीटर का उपयोग किया जाता है।
यदि किसी किलकित कुण्डली धारामापी के श्रेणीक्रम में उचित मान का उच्च प्रतिरोध जोड़ दिया जाए तो यह वोल्टमीटर बन जाता है। जितना उचित व उच्च मान का प्रतिरोध धारामापी के श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है यह उतना ही विभवान्तर का मापन सही करता है।
किसी धारामापी को वोल्टमीटर में बदलने के के धारामापी की कुण्डली के श्रेणीक्रम में उच्च मान का प्रतिरोध जोड़ा जाता है इसे धारामापी का वॉल्ट मीटर में रूपान्तरण कहते है।
इसकी आन्तरिक संरचना समझने के लिए चित्र में दिखाया गया है की एक गैल्वेनोमीटर (धारामापी) के श्रेणीक्रम में प्रतिरोध R जोड़ा गया है जिससे यह सम्पूर्ण परिपथ मिलकर
वोल्टमीटर का निर्माण करते है।
किसी परिपथ में विभवांतर का सही या त्रुटिमुक्त मान ज्ञात करने के लिए यह जरुरी है की वोल्टमीटर परिपथ से कोई धारा ग्रहण न करे , यही कारण है की श्रेणी क्रम में जोड़ा गया प्रतिरोध का मान उच्च रखा जाता है।
नोट : किसी भी आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध का मान अनन्त माना जाता है।
एम्पीयर का
नियम
चुम्बकीय क्षेत्र के
सम्बन्ध में
क्या
है
ampere’s law in hindi एम्पीयर का
नियम
किसे
कहते
हैं
लिखिए
ampere’s law in hindi एम्पीयर का नियम चुम्बकीय क्षेत्र के सम्बन्ध में क्या है एम्पीयर का नियम किसे कहते हैं लिखिए ? परिपथ
प्रस्तावना : हम बायो सावर्ट का नियम पढ़ चुके है , इस नियम में हमने देखा था की कैसे हम किसी धारा वितरण के लिए चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात कर सकते है। अर्थात जब किसी चालक तार इत्यादि में धारा समान रूप से प्रवाहित हो रही हो तो इस तार के कारण किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र का मान क्या होगा यह हमने पढ़ लिया था।
लेकिन
मान लीजिये चालक तार में विद्युत धारा का वितरण समान न हो अर्थात तार में एक समान धारा प्रवाहित न हो रही हो तो इस चालक तार के कारण किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करने में बायो सावर्ट का नियम कठिन पड़ जाता है , इस स्थिति में हम दूसरा नियम काम में लेते है इस नियम को एम्पीयर का नियम कहते है।
अतः एम्पीयर का नियम तब काम में लिया जाता है जब विद्युत धारा का वितरण असममित हो और हमें इस असममित धारा के कारण किसी बिन्दु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना हो।
एम्पीयर के नियम की परिभाषा
इस नियम के अनुसार ” निर्वात या वायु में किसी भी बंद पथ के अनुदिश चुम्बकीय क्षेत्र का रेखीय समाकलन (∫B.dl ) , निर्वात की चुंबकशीलता (μ0) व उस पथ से गुजरने वाली धाराओं के बीजगणितीय योग (ΣI) के बराबर होता है “
अतः इसको गणितीय रूप में निम्न प्रकार लिख सकते है
∫B.dl = μ0 ΣI
यहाँ ∫B.dl चुम्बकीय क्षेत्र का रेखीय समाकलन है , इसे ज्ञात करने के लिए तार को छोटे छोटे अल्पांश में मानकर जिनकी लम्बाई dl है के कारण चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात किया जाता है और फिर सबका योग किया जाता है।
μ0 निर्वात की चुंबकशीलता है।
ΣI पथ से गुजरने वाली धाराओं के बीजगणितीय योग है , इसका मान ध्यान पूर्वक ज्ञात किया जाता है क्योंकि इसमें धारा किदिशा भी ज्ञात करनी पड़ती है।
धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए दाहिने हाथ का नियम काम में लेते है तथा विद्युत धारा के मान के साथ दिशा का उपयोग करते हुए पथ से गुजरने वाली धाराओं के बीजगणितीय योग ज्ञात करते है।
दो समांतर धारावाही चालकों के मध्य बल :
ऐम्पियर का नियम
(force between two parallel current carrying conductors : ampere’s law in
hindi) : हम जानते है कि जब किसी चालक में धारा प्रवाहित की जाती है तो उसके चारों तरफ एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। अब यदि इस धारावाही चालक के पास एक अन्य धारावाही चालक रख दिया जाए तो इस चालक पर पहले चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के कारण एक बल आरोपित होता है। इसी प्रकार पहले वाले धारावाही चालक पर भी दूसरे धारावाही चालक से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के कारण एक बल आरोपित होता है। इस प्रकार दो समीपवर्ती समान्तर धारावाही चालक एक दूसरे पर चुम्बकीय बल आरोपित करते है।
माना दो लम्बे और सीधे तार AB और CD निर्वात (या वायु) में एक दूसरे के समान्तर पास पास रखे गये है। जब इन तारों में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो ये एक दूसरे पर चुम्बकीय बल आरोपित करते है। जब दोनों में धारा की दिशा एक ही होती है तो इनके मध्य आकर्षण बल लगता है तथा जब धारायें विपरीत दिशा में होती है तो इनके मध्य प्रतिकर्षण बल लगता है। ये दोनों स्थितियाँ क्रमशः चित्र में प्रदर्शित की गयी है।
बायो सावर्ट के नियम और लोरेन्ज बल को मिलाकर एम्पियर ने धारावाही चालकों के मध्य लगने वाले बल की गणना की थी इसलिए इसे एम्पियर का नियम भी कहते है। इसे निम्नलिखित प्रकार समझाया गया है –
माना कि AB और CD दो लम्बे , समान्तर और ऋजु धारावाही चालक तार कागज के तल में स्थित है जिनमें क्रमशः I1
और I2 धाराएँ बह रही है तथा तारों के बीच दूरी r है। चित्र (a) में धारायें समान दिशा में और चित्र (b) में धाराएँ विपरीत दिशा में बह रही है।
बायो सावर्ट के नियमानुसार चालक AB के कारण चालक CD के किसी बिंदु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र –
B1
= u0 I1/2πr
NA-1m-1
दायें हाथ की हथेली के नियम नंबर 1 के अनुसार इस चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा कागज के तल के लम्बवत नीचे की तरफ होगी। इस चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक CD की l लम्बाई पर लगने वाला लोरेन्ज बल –
F = I2B1l.sin90
F = I2.l.B1 = I2.l.( u0 I1/2πr)
F = u0.I1.I2.l/2πr न्यूटन
चूँकि u0/2π
= 2 x 10-7
या F = 2 x 10-7 I1.I2.l/r न्यूटन
अत: तार CD की एकांक लम्बाई पर लगने वाला बल –
F/l = 2
x 10-7 I1.I2/r न्यूटन/मीटर
इसी प्रकार चालक CD में धारा प्रवाह के कारण चालक AB की एकांक लम्बाई पर लगने वाला बल
F/l = 2
x 10-7 I1.I2/r न्यूटन/मीटर
इस बल की दिशा फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से दी जाती है। यदि धाराएँ समान दिशा में है। तो दोनों के मध्य आकर्षण बल तथा धाराएँ विपरीत दिशा में होने पर दोनों के बीच प्रतिकर्षण बल लगेगा।
यदि दोनों तारों में समान धारा बह रही हो अर्थात I1 = I2 = I हो तो
F/L =
u0.I2/2πr
एम्पियर की परिभाषा : दो समांतर सीधे धारावाही चालकों के मध्य लगने वाला बल
F = u0.I1.I2/2πr न्यूटन /मीटर
चूँकि u0/2π
= 2 x 10-7
या F = 2 x 10-7 I1.I2/r न्यूटन/मीटर
यदि I1 = I2 = 1 A , r = 1 m ,
तो
F = 2
x 10-7 न्यूटन /मीटर
अर्थात्र यदि एक मीटर दूरी पर रखे दो समांतर तारों में समान धारा बहने से उनके मध्य 2 x 10-7 न्यूटन /मीटर का बल (आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण) कार्य करे तो तारों में बहने वाली प्रत्येक धारा एक एम्पियर होगी।
नोट : दोनों चालकों की धारा विपरीत होती है तो बल प्रतिकर्षण का लगता है।
दोनों चालकों में धारा समान दिशा में होती है तो बल आकर्षण का होता है।
प्रश्न 1 : दिए गए चित्र में आयताकार लूप की गति किस दिशा में होती है ?
उत्तर : F ∝ 1/r
चूँकि आकर्षण बल > प्रतिकर्षण बल से
इसलिए आयताकार लूप सीधे धारावाही चालक की तरफ गति करेगा।
प्रायोगिक प्रदर्शन : दो समांतर तारों में एक ही दिशा में धारा बहने पर उनके मध्य आकर्षण बल लगता है। इसे प्रयोग द्वारा प्रदर्शित करने के लिए एक मुलायम तार का स्प्रिंग लेते है। चित्र की भाँती स्प्रिंग को एक दृढ आधार से इस प्रकार लटका देते है कि उसका निचला सिरा प्याली में भरे पारे को स्पर्श करता रहे। अब स्प्रिंग के ऊपरी सिरे और प्याली के पारे का सम्बन्ध एक कुंजी और एक बैटरी से कर देते है। जैसे ही कुंजी को दबाते है स्प्रिंग में धारा प्रवाहित होने लगती है। चूँकि स्प्रिंग के प्रत्येक फेरे में धारा की दिशा एक ही होती है , अत: फेरों में आकर्षण होता है जिससे स्प्रिंग सिकुड़ जाती है और स्प्रिंग के निचले सिरे का पारे से सम्पर्क समाप्त हो जाता है। इस प्रकार परिपथ टूट जाता है तथा स्प्रिंग पुनः फ़ैल जाती है जिससे उसके निचले सिरे का सम्पर्क पुनः पारे से हो जाता है तथा स्प्रिंग में धारा बहने लगती है। स्प्रिंग पुनः सिकुड़ जाती है तथा यही क्रिया बार बार दोहराई जाती है जिससे स्प्रिंग आवर्त करती रहती है।
प्रश्न 2 : दो समांतर तारों के मध्य की दूरी ज्ञात कीजिये जबकि उनमें क्रमश: 100A और 20A की विद्युत धाराएँ प्रवाहित है तथा वे एक दूसरे को 0.08 N/m के बल से आकर्षित करते है।
उत्तर : 0.5 सेंटीमीटर
प्रश्न 3 : दो समान्तर तारों में , जिनकी पारस्परिक दूरी 0.06 मीटर है , समान धारा एक ही दिशा में बह रही है। दोनों के मध्य प्रति मीटर लम्बाई पर लगने वाला आकर्षण बल 3 x 10-3
N है , प्रत्येक तार में बहने वाली धारा का मान ज्ञात कीजिये |
उत्तर : I1
= I2 = 30A
प्रश्न 4 : 20 सेंटीमीटर की दूरी पर रखे दो गए बहुत लम्बे समांतर तारों A और B में क्रमशः 10A और 20A की धारा बह रही है | यदि 10 एम्पीयर धारावाही 15 cm लम्बे एक तीसरे तार C को इनके बीच रखे तो C पर कितना बल लगेगा ? तीनों तारों में धाराओं की दिशा समान है |
उत्तर : C पर कुल नेट बल = 3 x 10-5
N (C से B की तरफ)
प्रश्न 5 : दो समांतर तारों PQ और RS के मध्य की लम्बवत दूरी 30 सेंटीमीटर है। तारों में 10 एम्पियर और 15 एम्पियर की विद्युत धाराएँ एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही है। तारों की 5 सेंटीमीटर लम्बाई पर लगने वाले बल की गणना कीजिये। यह बल किस प्रकार का होगा ?
उत्तर : बल F = 5 x 10-4
N (आकर्षणात्मक)
अनन्त
लम्बाई के
सीधे
धारावाही चालक
के
कारण
चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field due to infinite conductor
Magnetic field due to infinitely long and straight current
carrying conductor अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र : मान लीजिये हमारे पास कोई अनंत लम्बाई का तार है यहाँ अनन्त लम्बाई से तात्पर्य है की तार की लम्बाई अत्यधिक है , इस तार में विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है , हम पढ़ चुके है की किसी तार में तार प्रवाहित होने पर इसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होगा।
हमें इस अनन्त लम्बाई के तार में विद्युत धारा प्रवाहित होने पर तार से किसी दुरी पर स्थित किसी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना है।
माना चित्रानुसार एक चालक तार है जिसमे I परिमाण की धारा प्रवाहित हो रही है , चालक तार से r दूरी पर कोई बिंदु P स्थित है , हमें इस बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना है।
जैसा की हम सब जानते है की इस चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित होने पर इसके चारों ओर संकेन्द्रिय वृतों के रूप में चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इसलिए हम इस तार के चारों तरफ वृत्ताकार पथ की कल्पना करते है।
हम जो वृत्ताकार पथ की कल्पना कर रहे है इसकी त्रिज्या r मान रहे है।
एम्पीयर का नियम बताता है की
∫B.dl = μ0 ΣI
यदि B (चुम्बकीय क्षेत्र) तथा अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो
∫B.dl cosθ = μ0 ΣI
यहाँ मान लेते है की B तथा dl के मध्य कोण 0 है , तथा तार में प्रवाहित कुल धारा का मान I है तो
θ = 0 तथा ΣI = I
अतः
∫B.dl = μ0 I
चूँकि तार से दूरी r का मान नियत है अतः बिंदु P पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान नियत रहेगा अतः B को नियत मानकर समाकलन से बाहर ले सकते है
B∫dl = μ0 I
तथा ∫dl = l = 2πr
अतः
B.2πr = μ0 I
अतः
B = μ0 I /2πr
यदि हमें इस चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा भी ज्ञात करनी हो तो हम दक्षिण हस्त का नियम काम में ले सकते है।
सूत्र में हम देख सकते है की अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान दूरी r के व्युत्क्रमानुपाती होता है अतः B तथा r के मध्य निम्न ग्राफ प्राप्त होता है
ऐम्पियर के नियम के उपयोग
(application of ampere’s circuital law) :
(i) अनंत लम्बाई के सीधे धारावाही चालक तार के कारण चुम्बकीय क्षेत्र : माना XY एक लम्बा और सीधा धारावाही चालक है जिसमें I धारा बह रही है। तार से r दूरी पर स्थित बिंदु P पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है। इसके लिए तार को केंद्र मानकर r त्रिज्या का एक बन्द वृत्तीय पथ खींच लेते है तो बिन्दु P इसी पथ पर पड़ेगा। पूरे पथ पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान (परिमाण
) समान होगा तथा प्रत्येक बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा पथ की स्पर्श रेखा की दिशा में होगी। इस प्रकार P पर B और अल्पांश dl एक ही दिशा में होगा।
एम्पियर के परिपथीय नियम से –
∮B.dl = μ0I . .
. . . . . . समीकरण-1
या
∮B.dl.cos0 = μ0I
या
∮B.dl = μ0I
B.2πr = μ0I
B = μ0I/2πr
या
B
= μ0.2I/4πr . . . . . . . . समीकरण-2
यही अनंत लम्बाई के धारावाही तार के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का व्यंजक है।
(ii)
धारावाही परिनालिका के अन्दर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र :
माना बेलनाकार ढाँचे पर लपेटी गयी एक लम्बी परिनालिका है। जब इसमें I धारा बहायी जाती है तो एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
एक सीधी परिनालिका द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र एक दण्ड चुम्बक के द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के समान होता है। परिनालिका के अन्दर चुम्बकीय क्षेत्र समरूप होता है तथा परिनालिका की अक्ष के अनुदिश होता है। माना परिनालिका के काफी अन्दर किसी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र B है।
B का मान ज्ञात करने के लिए ABCD
एक आयताकार बंद पथ की कल्पना करते है। माना आयताकार पथ की लम्बाई AB = L है। स्वाभाविक है कि आयत द्वारा परिबद्ध फेरों की संख्या nL होगी , जहाँ n एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या है। चूँकि धारा आयताकार बंद पथ को nL बार काटती है। अत: बन्द लूप से गुजरने वाली कुल धारा = nLI होगी।
एम्पियर के परिपथीय नियमानुसार , चुम्बकीय क्षेत्र B का रेखीय समाकलन आयताकार पथ ABCD
के अनुदिश –
∮B.dl = μ0(nLI)
. . . . . . . . समीकरण-3
चूँकि ABCD
B.dl = A ∫BB.dl + B∫cB.dl
+ c∫DB.dl + D∫AB.dl .
. . . . . . . समीकरण-4
चूँकि B की दिशा BC और AD के लम्बवत है , अत:
B∫cB.dl = D∫AB.dl =
0
ऐसी परिनालिका , जिसकी लम्बाई उसके व्यास की तुलना में काफी अधिक है , के कारण परिनालिका के बाहर बिन्दुओं पर चुम्बकीय क्षेत्र शून्य होता है।
अत: c∫DB.dl =
0
अत: समीकरण-4 से –
ABCD∮B.dl = A∫B B.dl
= A∫B B.dl.cos0 = B A∫B dl
अत: A∫B dl
= L = आयताकार पथ ABCD की भुजा AB की लम्बाई
अत: ABCD∮B.dl = BL . . . . . . .
. समीकरण-5
समीकरण-3 का उपयोग करने पर –
μ0.nLI
= BL
अत: B
= μ0.nI
यह चुम्बकीय क्षेत्र एक लम्बी परिनालिका के अन्दर उसकी अक्ष लगभग केंद्र पर होता है अर्थात
Bc =
μ0.nI . . . . . . . . समीकरण-6
प्रयोगो से यह पाया गया कि लम्बी परिनालिका के किनारों पर उत्पन्न क्षेत्र उसके केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का आधा होता है। अत: परिनालिका के किनारे उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र
Be =
μ0.nI/2 . . . . . . . . समीकरण-7
यदि परिनालिका काफी लम्बी है तो इसके सिरों के पास के स्थानों को छोड़कर परिनालिका के भीतर सभी बिन्दुओं पर चुम्बकीय क्षेत्र एक समान होता है। चुम्बकीय क्षेत्र का मान परिनालिका की लम्बाई और परिच्छेद के क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता है। इस प्रकार धारावाही परिनालिका एक ज्ञात और एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करने का साधन है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा परिनालिका के अक्ष के अनुदिश होती है।
परिनालिका के अन्दर चुम्बकीय क्षेत्र B का परिवर्तन दूरी x के साथ चित्र में दिखाया गया है।
यदि परिनालिका की लम्बाई l हो तथा उसमें फेरो की संख्या N हो तो
n = N/l . . . . .
. . . समीकरण-8
अत: समीकरण-6 को निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते है –
Bc =
μ0.NI/l . . . . . . . . समीकरण-9
लम्बे
बेलनाकार धारावाही चालक
के
कारण
चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field due to cylindrical conductor
Magnetic field due to current carrying long cylindrical conductor लम्बे बेलनाकार धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र : हमने अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में अध्ययन कर लिया है , अब हम बात करते है की एक लम्बे बेलनाकार धारावाही चालक के कारण कितना चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है तथा इसके लिए हम सूत्र की स्थापना भी करेंगे।
माना चित्रानुसार एक बेलनाकार चालक है जिसकी त्रिज्या R है , इस धारावाही चालक में I परिमाण की विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है।
यह धारा धारावाही चालक के सम्पूर्ण काट क्षेत्रफल में समान रूप से वितरित है।
इस बेलनाकार धारावाही चालक से r दुरी पर किसी बिंदु पर हमें चुम्बकीय क्षेत्र की गणना करनी है।
चूँकि हमने बताया की सम्पूर्ण क्षेत्र में धारा का वितरण समान है अतः चुम्बकीय क्षेत्र वृत्ताकार रेखाओं के रूप में होगा , इन चुंबकीय क्षेत्र की वृत्ताकार रेखाओं का केंद्र चालक के अक्ष पर ही होगा।
हम इस बेलनाकार धारावाही चालक के कारण r दूरी पर स्थित बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात कर रहे , इस बिंदु की भी तीन स्थितियां हो सकती है , हम तीनों स्थितियों में चुंबकीय क्षेत्र की गणना करते है।
1. जब बिन्दु बेलनाकार चालक के बाहर स्थित हो
जब बिंदु चालक के बाहर स्थित हो तो इस स्थिति में r
> R होगा , इस स्थिति में हम r त्रिज्या के बन्द वृत्ताकार पथ की कल्पना करते है , चूँकि चालक में धारा नियत है अतः चुम्बकीय क्षेत्र भी नियत होगा अतः यहाँ एम्पीयर का नियम लगा सकते है
एम्पीयर का नियम लगाने पर
∫B.dl = μ0 ΣI
B (चुम्बकीय क्षेत्र) तथा अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो
∫B.dl cosθ
= μ0 ΣI
मान लेते है θ = 0 तथा ΣI =
I
अतः
∫B.dl = μ0 I
∫dl = l = 2πr (चूँकि वृत्ताकार पथ है तथा त्रिज्या r है )
अतः
B.2πr = μ0 I
अतः
B = μ0 I /2πr
2. जब बिन्दु बेलनाकार चालक की सतह पर स्थित हो
जिस बिंदु पर हमे चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करना है अगर वह बिंदु धारावाही चालक की सतह या परिधि पर स्थित हो तो इस स्थिति में R = r होगा।
अतः ऊपर ज्ञात समीकरण में r के स्थान पर R रखने पर
B = μ0 I /2πR
3. जब बिन्दु बेलनाकार धारावाही चालक के अन्दर स्थित हो
जब यह बिंदु बेलनाकार चालक के भीतर स्थित हो तो इस स्थिति में r < R होगा।
एम्पीयर के नियम से
∫B.dl = μ0 ΣI
B (चुम्बकीय क्षेत्र) तथा अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो
∫B.dl cosθ
= μ0 ΣI
ΣI लूप में परिबद्ध विद्युत धारा
ΣI = I
πr2
/πR2
ΣI का मान रखने पर
∫B.dl = μ0 ΣI
∫B.dl = μ0 I
r2 /R2
∫dl = l = 2πr (चूँकि वृत्ताकार पथ है तथा त्रिज्या r है )
B. 2πr = μ0 I r2 /R2
B = μ0 I
r /2πR2
परिनालिका की
परिभाषा क्या
है
solenoid (सोलेनोइड) in hindi परिनालिका किसे
कहते
है
? meaning
solenoid in hindi परिनालिका की परिभाषा क्या है परिनालिका किसे कहते है ?
meaning
परिभाषा :
जब किसी चीनी मिट्टी से बनी बेलनाकार नलिका जिसकी लम्बाई अधिक हो तथा त्रिज्या बहुत कम हो , पर ताँबे का तार लपेटा जाता है इस व्यवस्था को परिनालिका कहते है।
चीनी मिट्टी की बेलनाकार आकृति पर फेरे पास पास लपेटे जाते है अर्थात फेरों के मध्य जगह नहीं छोड़ी जाती है।
ऊपर दिखाया गया चित्र परिनालिका का है इसमें आप देख सकते है की एक चीनी मिट्टी की बनी हुई बेलनाकार आकृति पर तांबे का तार लम्बाई के अनुदिश लपेटा हुआ है।
जब किसी परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
जब किसी परिनालिका का सोलेनोइड में धारा I प्रवाहित की जाती है तो चित्रानुसार इसमें चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
इस चुंबकीय क्षेत्र की दिशा समान होती है तथा बाहर के बिन्दुओ पर चुंबकीय क्षेत्र एक दूसरे का विरोध करते है यही कारण है की बाहरी बिंदुओं पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान तुलनात्मक कम होता है।
ताम्बे के फेरे जितने ज्यादा पास पास होते है चुम्बकीय क्षेत्र बढ़ता जाता है , किसी भी आदर्श परिनालिका के अंदर चुम्बकीय क्षेत्र सभी जगह समान माना जाता है तथा परिनालिका का बाहर शून्य माना जाता है।
धारावाही परिनालिका का चुम्बकीय व्यवहार
(magnetic behaviour of a current carrying solenoid) :
यदि किसी चालकीय तार को बेलननुमा कुंडली के रूप में इस प्रकार लपेटा जाए कि उसका व्यास उसकी लम्बाई की तुलना में बहुत छोटा हो तो इस प्रकार की व्यवस्था को परिनालिका (solenoid) कहते है।
जब परिनालिका में धारा प्रवाहित की जाती है तो वह दण्ड चुम्बक की तरह व्यवहार करने लगती है अर्थात परिनालिका के परित: एक चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित हो जाता है। चित्र में एक धारावाही परिनालिका के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की चुम्बकीय बल रेखाएँ प्रदर्शित की गयी है। धारावाही कुंडली की भाँती परिनालिका के दो फलक (अर्थात दो सिरे) उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों में बदल जाते है। जिस फलक पर धारा वामावर्त प्रतीत होती है , वह फलक उत्तरी ध्रुव और जिस फलक पर धारा दक्षिणावर्त प्रतीत होती है , वह फलक दक्षिणी ध्रुव की भाँती कार्य करने लगता है।
परिनालिका के परित: चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होने की पुष्टि निम्नलिखित प्रयोगों से की जा सकती है –
1. यदि परिनालिका को एक पीतल की रकाब में रखकर उसे एक लम्बे और एंठन रहित धागे द्वारा एक सुदृढ़ आधार से इस प्रकार लटकाएं कि वह क्षैतिज तल में स्वतंत्रतापूर्वक घूम सके तो हम देखते है कि जब परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित नहीं की जाती है तब वह किसी भी स्थिति में ठहर सकती है लेकिन जैसे ही उसमें धारा प्रवाहित की जाती है तो वह उत्तर दक्षिण दिशा में ही ठहरती है। यदि इसे संतुलन की स्थिति से थोडा सा घुमा दे तो भी यह पुनः उत्तर दक्षिण दिशा में ही आकर ठहरती है। स्पष्ट है कि धारावाही परिनालिका में चुम्बकत्व है।
अब यदि सेल के सिरों को उलटकर परिनालिका में प्रवाहित होने वाली धारा की दिशा को उलट दे तो परिनालिका 180 डिग्री सेल्सियस के कोण से घूम जाती है अर्थात परिनालिका का जो सिरा पहले उत्तर की तरफ था अब वह दक्षिण की तरफ हो जाता है। स्पष्ट है कि परिनालिका में प्रवाहित धारा की दिशा उलट देने पर उसके सिरों की ध्रुवता भी उलट जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि परिनालिका के सिरों की ध्रुवता धारा की दिशा पर निर्भर करती है।
2. यदि हम परिनालिका को पीपल की रकाब में रखकर एक लम्बे और बिना बटे हुए धागे द्वारा एक सुदृढ़ आधार से लटका दे और इसी प्रकार की अन्य धारावाही परिनालिका को हाथ से पकड़कर उसके सिरों को बारी बारी से लटकी हुई परिनालिका के एक सिरे के पास लाये तो हम पाते है कि हाथ वाली परिनालिका के एक सिरे से आकर्षण लेकिन दुसरे सिरे से प्रतिकर्षण होता है। इससे स्पष्ट है कि दो धारावाही परिनालिकाओं के सजातीय ध्रुव एक दुसरे को प्रतिकर्षित करते है और विजातीय ध्रुव एक दुसरे को आकर्षित करते है। इस प्रकार धारावाही परिनालिका एक दण्ड चुम्बक की तरह व्यवहार करती है।
3. यदि धारावाही परिनालिका के समीप एक दिक् सूचक सुई लाये तो हम पाते है कि सुई अपनी सामान्य दिशा (उत्तर-दक्षिण) से विक्षेपित होकर एक नयी दिशा में आकर ठहरती है। परिनालिका में धारा की दिशा बदलने पर सुई के विक्षेप की दिशा उलट जाती है।
परिनालिका में धारा बढाने पर सुई का विक्षेप बढ़ जाता है और धारा घटाने पर सुई का विक्षेप घट जाता है। स्पष्ट है कि धारावाही परिनालिका में चुम्बकीय क्षेत्र की प्रबलता धारा की प्रबलता पर निर्भर करती है।
परिनालिका के परिपथ में लगी कुंजी का प्लग निकाल देने पर धारा का प्रवाह बंद हो जाता है और चुम्बकीय सुई तुरंत ही अपनी सामान्य दिशा में आ जाती है। स्पष्ट है कि परिनालिका में चुम्बकत्व का गुण तभी तक रहता है जब तक उसमें धारा प्रवाहित होती रहती है। धारा का प्रवाह बंद होते ही चुम्बकत्व नष्ट हो जाता है।
इसका अर्थ यह है कि परिनालिका में धारा प्रवाहित करने पर (अर्थात आवेश का प्रवाह होने पर ) ही चुम्बकत्व उत्पन्न होता है।
यद्यपि धारावाही परिनालिका दण्ड चुम्बक की तरह व्यवहार करती है लेकिन इन दोनों के चुम्बकीय क्षेत्रों में असमानता होती है। दण्ड चुम्बक के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता इसके सिरों पर अधिकतम और मध्य में शून्य होती है जब धारावाही परिनालिका का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक समान होता है। केवल परिनालिका के सिरों पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता थोड़ी कम होती है।
उपर्युक्त प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकलता है कि चुम्बकीय क्षेत्र की उत्पत्ति का मूल कारण धारा प्रवाह अर्थात गतिशील आवेश है।
अनन्त
लम्बाई की
परिनालिका में
चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field inside an infinitely long solenoid
Magnetic field inside an infinitely long solenoid अनन्त लम्बाई की परिनालिका में चुम्बकीय क्षेत्र : किसी आदर्श परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र एक समान रहता है तथा बाहर शून्य रहता है , अब हम बात करते है की आदर्श सोलेनॉइड (परिनालिका) के भीतर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का मान कितना होता है इसके लिए सूत्र स्थापित करके अध्ययन करते है।
चित्रानुसार एक आदर्श परिनालिका है जिसके भीतर B चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो रहा है तथा इसके बाहर चुंबकीय क्षेत्र का मान शून्य है।
, इसके भीतर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र B का मान ज्ञात करने के लिए हम एक आयताकार लूप ABCD पर चर्चा करते है।
हम चित्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है की ABCD का कुछ भाग परिनालिका के बाहर है तथा कुछ इसके अन्दर स्थित है।
AB भुजा परिनालिका की अक्ष के समान्तर है अतः हम कह सकते है की यह AB भुजा चुम्बकीय क्षेत्र B के समान्तर है यहाँ हम मान रहे है की AB भुजा की लम्बाई x है तथा परिनालिका (सोलेनोइड) की एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या n है और इसमें I परिमाण की विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है।
चूँकि AB की लम्बाई x है तथा n एकांक क्षेत्र में फेरो की संख्या है
अतः AB भुजा में कुल फेरों की संख्या nx होगी।
एम्पीयर का नियम लगाने पर
∫B.dl = μ0 ΣI
चूँकि CD भुजा परिनालिका के बाहर है अतः इसके कारण चुम्बकीय क्षेत्र शून्य होगा।
AD तथा BC भुजा चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत है अतः इनके कारण भी चुम्बकीय क्षेत्र शून्य होगा।
भुजा AB के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
B∫dl = μ0 ΣI
यहाँ ∫dl = x
ΣI = nxl
अतः
Bx = μ0 nxl
B = μ0 nl
दण्ड
चुम्बक एवं
धारावाही परिनालिका के
व्यवहार की
तुलना
bar magnet and current solenoid
Behavioral comparison of a bar magnet and current solenoid दण्ड चुम्बक एवं धारावाही परिनालिका के व्यवहार की तुलना : जब किसी धारावाही परिनालिका को धागे से लटकाया जाता है तो यह परिनालिका (सोलेनोइड) एक दंड चुम्बक की तरह व्यवहार करता है।
अर्थात जब धारावाही परिनालिका को धागे से स्वतंत्रता पूर्वक लटकाया जाए तो यह उत्तर दक्षिण दिशा में ठहरती है।
जब किसी परिनालिका में प्रवाहित धारा की दिशा को बदल दिया जाए तो इसके सिरों पर धुव्रता बदल जाती है अर्थात इसके सिरों के ठहरने की दिशा बदल जाती है।
हम पढ़ चुके है की परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह चुम्बक की तरह व्यवहार करती है अतः जब किसी अन्य परिनालिका को इसके पास लाया जाए तो समान ध्रुवित सिरे एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है तथा विपरीत ध्रुवित सिरे एक दूसरे को आकर्षित करते है जैसा चुम्बक में होता है।
चुम्बक की भाँति जब इसके पास लौह चुम्बकीय पदार्थ लेकर जाते है तो इनको परिनालिका आकर्षित करती है , इसी प्रकार जब किसी चुंबक को तोडा जाता है तथा प्रत्येक टुकड़ा एक चुम्बक की तरह व्यवहार करता है उसी प्रकार परिनालिका में प्रत्येक लूप चुंबक की तरह ही व्यवहार करता है।
इन सब को देखते हुए हम यह बात स्पष्ट रूप से कह सकते है की धारावाही परिनालिका एक दण्ड चुम्बक की तरह व्यवहार करती है।
धारावाही परिनालिका में चुम्बकीय रेखाएँ समांतर होती है लेकिन दण्ड चुम्बक में चुम्बकीय रेखाऐं वक्र होती है।
किसी भी धारावाही परिनालिका या सोलेनॉइड के बाहर चुम्बकीय क्षेत्र शून्य माना जाता है लेकिन दंड चुम्बक के बाहर स्थित बिन्दुओ पर कुछ चुम्बकीय क्षेत्र माना जाता है अर्थात शून्य नहीं माना जाता।
टोरॉइड (टोरोइड) की
अक्ष
पर
चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field on the axis of toroid in hindi
Magnetic field on the axis of
toroid in hindi टोरॉइड (टोरोइड) की अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र : जब एक लम्बी परिनालिका को मोड़ कर एक वृत्ताकार आकार दिया जाता है अर्थात मोड़कर दोनों सिरों को आपस में मिलाया जाता है तो बनी आकृति को टोरॉइड (टोरोइड) कहते है।
यह एक खोखले छल्ले की तरह आकृति का होता है जिस पर अत्यधिक पास में तार लिपटे हुए होते है।
जब तोरोइड (टोरॉइड ) में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो इसके भीतर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है लेकिन इसके अन्दर खाली जगह में तथा टोरॉइड के बाहर चुंबकीय क्षेत्र का मान शून्य होता है।
मान लेते है की टोरोइड पर N फेरे तार के लिपटे हुए है तथा इसमें I मान की धारा प्रवाहित हो रही है तो धारा प्रवाहित होने के कारण इसमें एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है
एम्पीयर के नियम से
∫B.dl = μ0 ΣI
B व अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो
∫B.dl cosθ = μ0 ΣI
θ = 0 तथा टोरॉइड में कुल धारा ΣI = NI
मान रखने पर
∫B.dl = μ0 NI
∫dl = 2πr
B.2πr = μ0 NI
B = μ0 NI /2πr
हम सूत्र से स्पष्ट रूप से देख सकते है की अक्ष पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र टोरॉइड की त्रिज्या पर निर्भर करता है।
चूँकि हम जानते है की एकांक लम्बाई में लपेटे गए फेरों की संख्या n है तो इसको निम्न सूत्र द्वारा लिखा जाता है
n = N/2πr
मान सूत्र में रखने पर
B = μ0nI
धारावाही टोरॉइड के कारण चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field due to a
toroid carrying current) : एक लम्बी परिनालिका को मोड़कर जब वृत्ताकार रूप दे दिया जाता है तो उसे टोरॉइड कहते है।
माना टोरॉइड की प्रति एकांक लम्बाई में n फेरे है और इसमें प्रवाहित धारा I है। धारा बहने के कारण टोरॉइड के फेरों के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। टोरॉइड के भीतर चुम्बकीय बल रेखायें संकेन्द्री वृत्तों के रूप में होती है। सममिति से पथ के प्रत्येक बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान समान रहता है और यह चुम्बकीय क्षेत्र प्रत्येक बिन्दु पर स्पर्श रेखा के अनुदिश है।
टोरॉइड की क्रोड़ के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र
माना r त्रिज्या का एक वृत्ताकार पथ है जो टोरॉइड के फेरों के बीच के क्षेत्र में स्थित है। इस वृत्तीय पथ पर एम्पियर के परिपथीय नियम से –
∮B.dl
= μ0I . . . . . . .
. समीकरण-1
बंद परिपथ में बहने वाली कुल धारा = टोरॉइड में फेरों की संख्या x प्रवाहित धारा
= n x 2πr x I
= 2πrnI
चूँकि समीकरण-1 से
∮B.dl
= μ0 2πrnI
चूँकि B और dl एक ही दिशा में है अत:
∮B.dl.COS0
= μ0 2πrnI
या
B∮dl = μ0 2πrnI
या
B.2πr = μ0 2πrnI
या
B = μ0nI
यदि टोरॉइड में फेरों की संख्या N हो तो –
n = N/2πr
अत: B = μ0.NI/2πr
टोरॉइड द्वारा घेरे गए रिक्त स्थान में –
(i) टोरॉइड द्वारा घेरे गए रिक्त स्थान में : माना r1 त्रिज्या का एक वृत्तीय पथ है जो टोरॉइड में प्रवाहित धारा से घिरे रिक्त स्थान में है और टोरॉइड के संकेन्द्रीय है। जब r1 का मान r से छोटा है तो धारा शून्य होगी अर्थात
I = 0
चूँकि एम्पियर के परिपथीय नियम से –
∮B.dl
= μ0 x (घिरे पथ द्वारा प्रवाहित धारा)
या
∮B.dl .cos0 = μ0 x 0 = 0
या
B.2πr1 = 0
B = 0
(ii) टोरॉइड के बाहर रिक्त स्थान में : माना r2 त्रिज्या का एक वृत्तीय पथ है जो टोरॉइड द्वारा घेरे गए क्षेत्र के बाहर रिक्त स्थान में है। इस बंद वृत्त से भी परिबद्ध नेट धारा शून्य होगी क्योंकि टोरॉइड का प्रत्येक फेरा r2 त्रिज्या के वृत्त से परिबद्ध क्षेत्र से होकर दो बार गुजरता है जबकि विद्युत धारा का मान समान लेकिन दिशाएं विपरीत होती है। अत: वृत्त द्वारा परिबद्ध नेट धारा I = 0
चूँकि एम्पियर के परिपथीय नियम से –
∮B.dl
= μ0 x पथ द्वारा परिबद्ध नेट धारा
= μ0 x 0
या
∮B.dl.cos0 = 0
या
B∮dl = 0
या
B.2πr2 = 0
B = 0
इस प्रकार टोरॉइड के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
B = 0 = टोरॉइड के भीतर रिक्त स्थान में
B = μ0.NI/2πr = टोरॉइड के भीतर उसकी अक्ष पर
B = 0 = टोरॉइड के बार किसी बिंदु पर
नोट :
(i) यदि परिनालिका निश्चित लम्बाई की है और बिंदु P से इसके सिरों F और E से मिलाने वाली रेखाएं परिनालिका की अक्ष से क्रमशः α और β कोण बनाती है तो अक्षीय बिंदु P पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B = μ0nI[cosα – cosβ]/2
(ii) यदि बिंदु P लम्बी परिनालिका के एक सिरे B पर है तो α = 0° और β = 90°
अत: B = μ0nI[cos0° – cos90°]/2
B = μ0nI/2
या
B = μ0nI/2
अर्थात परिनालिका के सिरे पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र परिनालिका के बीच के मध्य बिंदु पर उपस्थित चुम्बकीय क्षेत्र का आधा होता है।
(iii) जब टोरॉइड की बाहरी और आंतरिक त्रिजायें दी गयी हो तो प्रश्न हल करने के लिए उनका माध्य ले लेते है तथा सूत्र में r के स्थान पर इसी माध्य का प्रयोग करते है।
r = (r1 + r2)/2
प्रश्न : कोई परिनालिका जिसकी लम्बाई 0.5 मीटर और त्रिज्या 1 सेंटीमीटर है , में 500 फेरे है। इसमें 5 एम्पीयर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है ?
हल : दिया है –
परिनालिका लम्बाई l = 0.5m , प्रवाहित धारा i = 5A , फेरों की संख्या N = 500 , त्रिज्या r = 1 cm = 0.01 m , परिनालिका के भीतर B = ?
परिनालिका के भीतर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र B = μ0N.I/l
मान रखकर हल करने पर = B = 6.28 x 10-3 T
प्रश्न : एक 400 फेरों वाली टोरॉइड की बाह्य त्रिज्या 26 सेंटीमीटर तथा आंतरिक त्रिज्या 25 cm है। यदि तार में 20 एम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है तो टोरॉइड तथा इसके अन्दर के वायु रिक्त स्थान में चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कीजिये।
उत्तर : दिया है –
आंतरिक त्रिज्या r1 = 25 cm
बाह्य त्रिज्या r2 = 26 cm
प्रवाहित धारा I = 20A
फेरों की संख्या N = 400
चूँकि टोरॉइड की माध्य त्रिज्या r = (r1 + r2)/2
r = (25+26)/2 = 25.5 cm
अथवा r = 25.5 x 10-2 cm
अत: टोरॉइड के क्रोड़ के अन्दर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र
B = μ0N.I/2πr
मान रखकर हल करने पर = B = 6.27 x 10-3 T


































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