physics12th गतिमान आवेश एवं चुंबकत्व(part-1)

 

विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव नोट्स magnetic effects of electric current in hindi

ओरस्टेड का चुंबकीय क्षेत्र प्रयोग तथा निष्कर्ष oersted experiment and conclusion

ओरस्टेड का प्रयोग (oersted experiment) : ओरेस्टेड ने सन 1820 में एक प्रयोग किया , यह प्रयोग उन्होंने चालक तार में धारा प्रवाहित होने पर क्या होता है यह अध्ययन करने के उद्देश्य से किया था।
ओरस्टेड ने अपने प्रयोग से यह स्पष्ट सिद्ध किया कीजब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है अर्थात गतिमान आवेश के कारण उसके चारो ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है
इस प्रयोग में उन्होंने एक चालक तार (A-B ) लिया तथा एक धारा नियंत्रक (Rh) और बैटरी को चित्रानुसार जोड़ा।


चालक तार AB के नीचे समान्तर में एक चुंबकीय सुई (कम्पास) को उत्तर-दक्षिण में रखा गया जैसा चित्र में दिखाया गया है।
इस प्रकार परिपथ पूर्ण करने के बाद ओरस्टेड ने विभिन्न स्थितियों का अध्ययन किया।
1.
जब कुंजी K को खुला रखा जाता है अर्थात परिपथ में कोई धारा प्रवाहित होने की स्थिति में कम्पास या चुंबकीय सुई स्थिर बनी रहती है।
2.
जब कुंजी में डॉट लगाई जाती है तो परिपथ में धारा प्रवाहित होने लगती है और इस स्थिति में कम्पास में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है।
3.
जब तार AB में प्रवाहित धारा का मान बढ़ाया जाता है तो चुंबकीय सुई (कम्पास ) में विक्षेप भी अधिक होता है।
4.
यदि चालक तार AB में प्रवाहित धारा की दिशा बदल दी जाए अर्थात बैटरी के टर्मिनल विपरीत करने पर चुंबकीय सुई (कम्पास ) में विक्षेप भी विपरीत दिशा में होता है अर्थात विक्षेप की दिशा बदल जाती है।

ओरस्टेड के प्रयोग के निष्कर्ष (conclusion of oersted’s experiment)

ओरेस्टेड द्वारा किये गए निम्न प्रयोग से उन्होंने निष्कर्ष निकाले वे निम्न है

1. चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर इसके चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।

2. चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण तार में प्रवाहित धारा के परिमाण पर निर्भर करता है अर्थात विद्युत धारा का मान बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र भी बढ़ता है।

3. कम्पास को तार से दूर ले जाने पर चुंबकीय क्षेत्र कम होता जाता है।

4. जब चालक तार में प्रवाहित धारा दक्षिण-उत्तर दिशा में होती है तो चुंबकीय सुई (कम्पास ) का उत्तरी ध्रुव पश्चिम दिशा में विक्षेपित हो जाता है।

5. जब चालक तार में प्रवाहित धारा उत्तर-दक्षिण दिशा में होती है तो चुंबकीय सुई (कम्पास ) का उत्तरी ध्रुव पूर्व दिशा में विक्षेपित हो जाता है।

6. चालक तार में धारा प्रवाह के कारण चालक के ऊपर तथा नीचे चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है , उत्पन्न ऊपर नीचे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा परस्पर विपरीत होती है।

चुंबकीय क्षेत्र की परिभाषा क्या है ,मात्रक ,विमीय सूत्र Magnetic field in hindi चुंबकीय क्षेत्र किसे कहते हैं

Magnetic field in hindi चुंबकीय क्षेत्र की परिभाषा क्या होता है ? ,मात्रक ,विमीय सूत्र , चुंबकीय क्षेत्र किसे कहते हैं ?

परिभाषा : “ऐसा क्षेत्र जिसमे किसी बिंदु पर रखी गयी चुंबकीय सुई एक निश्चित दिशा में ठहरती है इसे क्षेत्र को चुंबकीय क्षेत्र कहते है।

चुंबकीय सुई जिस दिशा में ठहरती है इसे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा कहते है।

अतः यह एक सदिश राशि है इसेसे प्रदर्शित करते है इसका SI मात्रक वेबर/वर्गमीटर (Weber/m2) या टेसला (Tesla) है। तथा इसकी विमा (विमीय सूत्र ) M1L0T-2A-1 है।

चुंबकीय क्षेत्र में रखी हुई सुई उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र को प्रदर्शित करती है।

असमान चुंबकीय क्षेत्र में दिशा अलग अलग होती है जबकि समान चुंबकीय क्षेत्र में दिशा एक ही होती है।

स्थिर अवस्था में आवेश विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है जबकि गतिशील आवेश विद्युत क्षेत्र चुंबकीय क्षेत्र दोनों उत्पन्न करता है।

चुंबकीय क्षेत्र में किसी गतिमान आवेशित कण पर कार्य करने वाले बल को चुंबकीय बल कहते है।

माना कोई आवेश q किसी चुंबकीय क्षेत्रमें V वेग से गति कर रहा है अतः q आवेश पर लगने वाला चुंबकीय बल निम्न सूत्र से दिया जाता है (जबकि विद्युत क्षेत्र अनुपस्थित है )

F = qVB

यदि वेग V तथा चुंबकीय क्षेत्र B के मध्य कोण θ है तो

F = qVB sinθ

यदि कोण θ का मान 90 डिग्री है तो इस स्थिति में बल अधिकतम होगा जिसका मान निम्न सूत्र से दिया जाता है

Fmaximum = qVB

सूत्र से चुंबकीय क्षेत्र निकालने के लिए ]

B = Fmax/qV

यदि आवेशित कण पर 1 कूलॉम आवेश उपस्थित हो तथा आवेशित कण 1 मीटर प्रति सेकण्ड के वेग से गति कर रहा है अर्थात q = 1 C , V = 1 m/s

अतः B = F

अतः चुंबकीय क्षेत्र को निम्न प्रकार भी परिभाषित कर सकते है

किसी स्थान पर एक मीटर प्रति सेकंड से (एकांक) गतिमान एक कूलॉम (एकांक) आवेशित कण पर लगने वाले बल के परिमाण को चुंबकीय क्षेत्र कहते है जबकि आवेश चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत गतिशील है।  ”

चुंबकीय क्षेत्र को अन्य कई नामो से जाना जाता है जैसे चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता , चुंबकीय प्रेरण  चुम्ब्कीय फ्लक्स घनत्व आदि।

चुम्बकत्व

लगभग 600 ईसा पूर्व से ज्ञात है कि मैग्नेटाइट नामक खनिज पदार्थ के टुकड़ों में लोहे के पदार्थों को आकर्षित करने का गुण है। ऐसे पदार्थो को चुम्बक कहा गया एवं लोहे को आकर्षित करने के गुण को चुम्बकत्व कहा गया। प्रकृति में मिलने के कारण इन्हें प्राकृतिक चुम्बक कहते हैं। रासायनिक रूप से यह लोहे का ऑक्साइड होता है। इसकी कोई निश्चित आकृति नहीं होती है। कुछ पदार्थों को कृत्रिम विधियों द्वारा चुम्बक बनाया जा सकता है, जैसे लोहा, इस्पात, कोबाल्ट आदि। इन्हें कृत्रिम चुम्बक कहते हैं। ये विभिन्न आकृति की होती है, जैसे- छड़ चुम्बक, घोड़ा-नाल चुम्बक, चुम्बकीय सूई आदि।

चुम्बक के गुण

आकर्षण- चुम्बक में लोहे, इस्पात आदि धातुओं को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता होती है। यदि किसी चुम्बक को लौह बुरादों के पास लाया जाय, तो बुरादा चुम्बक में चिपक जाता है। चिपके हुए बुरादे की मात्रा, चुम्बक के दोनों सिरों पर सबसे अधिक एवं मध्य में सबसे कम होती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि चुम्बक की आकर्षण शक्ति उसके दोनों किनारों पर सबसे अधिक एवं मध्य में सबसे कम होती है। चुम्बक के किनारे के दोनों सिरों को चुम्बक के ध्रुव कहलाते हैं।

दिशात्मक गुणयदि किसी चुम्बक को धागे से बाँधकर मुक्त रूप से लटका दिया जाय, तो स्थिर होने पर उसका एक ध्रुव उत्तर की ओर और दूसरा ध्रुव दक्षिण की ओर हो जाता है। उत्तर दिशा सूचित करने वाले ध्रुव को चुम्बक का उत्तरी ध्रुव या धनात्मक ध्रुव (छवजी च्वसम वत अम च्वसम) तथा दक्षिण दिशा सूचित करने वाले ध्रुव को चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव या ऋणात्मक ध्रुव (ैवनजी च्वसम वत दृ अम च्वसम) कहते है। चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को से एवं दक्षिणी ध्रुव को से व्यक्त करते है। दंड चुम्बक के दोनों ध्रुव से होकर गुजरने वाली काल्पनिक सरल रेखा को उसे चुम्बक का चुम्बकीय अक्ष कहते है। दोनों ध्रुव के बीच की दूरी को चुम्बकीय लम्बाई कहते है। मुक्त रूप से लटकता हुआ दंड चुम्बक जब स्थिर होता है तब उसके अक्ष से होकर गुजरने वाली एक ऊर्ध्वाधर समतल को चुम्बकीय याम्योत्तर कहते है।

ध्रुवों का आकर्षण एवं प्रतिकर्षणदो चुम्बको के असमान ध्रुव (अर्थात उत्तरी दक्षिणी) एक दूसरे को आकर्षित करते है तथा दो समान ध्रुव (अर्थात उत्तरी-उत्तरी या दक्षिणी-दक्षिणी) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते है। एक विलग ध्रुव का कोई अस्तित्व नहीं होता है। किसी चुम्बक को बीच से तोड़ देने पर इसके ध्रुव अलग-अलग नहीं होते, बल्कि टूटे हुए भाग पुनः चुम्बक बन जाते है तथा प्रत्येक भाग में उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव उत्पन्न हो जाते है। अतरू एक अकेले चुम्बकीय ध्रुव का कोई अस्तित्व नही होता है।।

चुम्बकीय प्रेरणचुम्बक चुम्बकीय पदार्थों में प्रेरण द्वारा चुम्बकत्व उत्पन्न कर देता है। नर्म लोहे की छड़ को किसी शक्तिशाली चुम्बक के एक ध्रुव के समीप लायें, तो वह छड़ भी एक चुम्बक बन जाती है। छड़ के उस सिरे पर जो चुम्बक के ध्रुव के समीप है, विपरीत ध्रुव बनता है तथा छड़ के दूसरे छोर पर समान ध्रुव बनता है। इस घटना को चुम्बकीय प्रेरण कहते है।

चुम्बकीय क्षेत्रचुम्बक के चारों और का वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा चुम्बकीय सूई से निर्धारित की जाती हैं। चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक ब्ण्ळण्ैण् पद्धति में गौस तथा ैण्प्ण् पद्धति में टेसला होता है। (1 ळंनेे = 10-4 ज्मेसं)

चम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता या, चुम्बकीय तीव्रता- चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र के लम्बवत् एकांक लम्बाई का ऐसा चालक तार रखा जाए जिसमें एकांक प्रबलता की धारा प्रवाहित हो रही हो, तो चालक पर लगने वाला बल ही चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता की माप होगी। चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता एक सदिश राशि है। इसका मात्रक न्यूटर/ऐम्पीयर मीटर अथवा वेबर/मी.2- या टेसला (ज्) होता है।

चुम्बकीय क्षेत्र की अभिधारणा (concept of magnetic field) : वह क्षेत्र जिसमें एक छोटी चुम्बकीय सुई किसी बिंदु पर सदैव एक निश्चित दिशा में ठहरती है , चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है। यह एक सदिश राशि है अर्थात इसके बिंदु से एक वेक्टर राशि सम्बद्ध होती है। इस राशि को B से प्रदर्शित करते है। चुम्बकीय सुई चुम्बकीय क्षेत्र में किसी बिंदु पर इसी क्षेत्र B की दिशा में ठहरती है। स्पष्ट है कि चुम्बकीय क्षेत्र में रखी गयी चुम्बकीय सुई उस स्थान पर चुम्बकीय क्षेत्र B की दिशा का संकेत देती है। यदि किसी स्थान में चुम्बकीय क्षेत्र समान है तो चुंबकीय सुई उस स्थान पर एक ही दिशा में ठहरती है लेकिन असमान चुम्बकीय क्षेत्र में प्रत्येक बिंदु पर उसकी दिशा बदलती है।

चुम्बकीय क्षेत्र और चुम्बकीय बल रेखाएँ (magnetic field and magnetic field lines of forces)

जब चुम्बक के पास कोई दिक्सूची रखी जाती है तो यह एक निश्चित दिशा में ठहरती है लेकिन यदि दिक्सूची की स्थिति बदल दे तो उसके ठहरने की दिशा भी बदल जाती है।

स्पष्ट है कि चुम्बक चुम्बकीय सुई पर एक बल आघूर्ण के रूप में कार्य करता है जो सुई को घुमाकर निश्चित दिशा में ठहराता है अत: किसी चुम्बक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें उसके चुम्बकीय प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है , उस चुम्बक का चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। किसी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता एक सदिश राशि है। चुम्बकीय क्षेत्र के किसी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा , उस बिंदु पर स्वतंत्रतापूर्वक लटकाई गयी छोटी चुम्बकीय सुई की अक्षीय रेखा (दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर) द्वारा व्यक्त की जाती है।

हमारी पृथ्वी भी एक चुम्बक की भाँती व्यवहार करती है जिसका अपना चुम्बकीय क्षेत्र होता है। इसी चुम्बकीय क्षेत्र के कारण स्वतंत्रतापूर्वक लटकी चुम्बकीय सुई सदैव उत्तर दक्षिण दिशा में ठहरती है। सुई का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक उत्तर की ओर और दक्षिण ध्रुव भौगोलिक दक्षिण की ओर संकेत करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र भौगोलिक दक्षिण से उत्तर की ओर दिष्ट होता है तथा इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भू चुम्बक का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव की ओर तथा दक्षिणी ध्रुव भौगोलिक उत्तरी ध्रुव की ओर होता है।

चुम्बकीय क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा , चुम्बकीय बल रेखाओं द्वारा प्रदर्शित की जा सकती है। यदि किसी दिक्सूचक सुई को दण्ड चुम्बक के चुंबकीय क्षेत्र में रखकर चलाते है तो सुई के ठहरने की दिशा लगातार बदलती है .सुई के चलने का मार्ग एक निष्कोण अथवा चिकना वक्र होता है जो दण्ड चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से आरम्भ होकर दक्षिणी ध्रुव पर समाप्त होता है। इस वक्रीय मार्ग को चुम्बकीय बल रेखा कहते है। अत: किसी चुम्बकीय क्षेत्र में बल रेखाएँ वे काल्पनिक वक्र होती है जो उस स्थान पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा प्रदर्शित करती है। चुम्बकीय बल रेखा के किसी बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर परिणामी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा प्रदर्शित करती है।

चित्र (a) और (b) में क्रमशः दण्ड चुम्बक और धारावाही परिनालिका के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की बल रेखाएं प्रदर्शित की गयी है।

चुम्बकीय बल रेखाओं के गुण (properties of magnetic lines of force)

1. चुम्बकीय बल रेखाएं बंद वक्र होती है : इसका अर्थ यह हुआ कि चुम्बक के बाहर चुम्बकीय बल रेखाएँ उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर तथा चुम्बक के अन्दर दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर चलती है। स्पष्ट है कि चुंबकीय बल रेखाओं का तो आदि है और अंत।

नोट : चुम्बकीय बल रेखाएं बंद वक्र होती है जबकि विद्युत बल रेखाएं खुले वक्र के रूप में होती है अर्थात वैद्युत बल रेखाएँ धनावेश से प्रारंभ होकर ऋण आवेश पर समाप्त हो जाती है। यही इन दोनों प्रकार की क्षेत्र रेखाओं में मूल अंतर है।

2. चुम्बकीय बल रेखा के किसी बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिंदु पर परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा व्यक्त करती है।

3. चुम्बकीय बल रेखाएँ कभी भी एक दूसरे को काटती नहीं है : यदि दो बल रेखाएं एक दुसरे को काटेंगी तो कटान बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखाएं दो परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र व्यक्त करेंगी। चूंकि परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र एक ही संभव है अत: दो बल रेखाओं का काटना भी सम्भव नहीं है।

4. बल रेखाएँ इस प्रकार खिंची जाती है कि किसी स्थान पर उनका पृष्ठीय घनत्व उस स्थान पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के अनुपात में होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि सघन बल रेखाएं प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करती है तथा विरल बल रेखायें दुर्बल चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करती है। बल रेखाओं की संख्या के पदों में चुम्बकीय क्षेत्र की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार कर सकते है

चुम्बकीय बल रेखाओं की दिशा के लम्बवत एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या उस स्थान पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के बराबर होती है।

5. किसी स्थान पर समदूरस्थ और समान्तर बल रेखायें समरूप चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करती है। किसी सिमित स्थान में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को समरूप चुम्बकीय क्षेत्र मान सकते है।

बायो सावर्ट का नियम क्या है Biot Savart’s law in hindi , चुंबकशीलता या चुंबकीय पारगम्यता बायो सेवर्ट

Biot Savart’s law in hindi बायो सावर्ट का नियम क्या है बायो सेवर्ट का नियम का सूत्र किसे कहते है ? स्टेटमेंट formula , विमा और मात्रक लिखिए |

प्रस्तावना : हम ओरस्टेड का प्रयोग के बारे में पढ़ चुके है जिसमे उन्होंने यह बताया की जब किसी चालक में धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक के चारों पर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है तथा इस क्षेत्र की रेखाएं संकेन्द्रिय वृतो के रूप में होती है।

जब सम्पूर्ण चालक के कारण किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात करना होता है तब चालक को छोटे छोटे अल्पांश में बांटकर , सभी अल्पांश के कारण उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात किया जाता है तथा सभी को आपस में जोड़कर उस बिंदु पर सम्पूर्ण चालक के कारण चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात किया जाता है।

बायो-सावर्ट (Biot-Savart) ने 1820 में चालक के विभिन्न अल्पांश के कारण किसी बिंदु पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन किया और अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षो को एक नियम के रूप में प्रस्तुत किया इस नियम को ही बायो सावर्ट का नियम कहते है।

माना एक चालक तार है जिसमे I धारा प्रवाहित हो रही है , चालक के अल्पांश dL से r दूरी पर एक बिंदु P स्थित है जिस पर हमें चुंबकीय क्षेत्र की गणना करनी है , माना P बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र dB है। हम यहाँ अल्पांश dL की दिशा धारा की दिशा में मान रहे है।

बायो सावर्ट ने अल्पांश dL के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र dB का मान ज्ञात करने के लिए बताया की

1. dB का मान चालक में प्रवाहित विद्युत धारा के समानुपाती होता है

dB  I

2. चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता dB का मान अल्पांश dL के समानुपाती होता है

dB  dL

3. r तथा अल्पांश dL के मध्य बने कोण के समानुपाती होता है

dB  sinθ

4. अल्पांश dL तथा बिन्दु P के मध्य की दुरी (r) के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

dB  1/r2

अतः सम्मिलित रूप से


 या

यहां μ0/4π समानुपाती स्थिरांक है जिसका मान 10-7 N/A2 है तथा इसकी इकाई N/Aहोती है।

μ0 को निर्वात की चुंबकशीलता या चुंबकीय पारगम्यता कहते है।

धारावाही चालक पर चुम्बकीय क्षेत्र में बल के लिए व्यंजक (expression for the force in magnetic field due to current carrying conductor) : किसी चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या काफी अधिक होती है। ये इलेक्ट्रॉन चालक में प्रवाहित परम्परागत धारा की दिशा के विपरीत अनुगमन वेग vd से गति करते है। किसी समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में गति करने पर ये इलेक्ट्रॉन विक्षेपण बल का अनुभव करते है जो चालक को स्थानांतरित करता है।

माना l लम्बाई का एक चालक एक समान चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र की दिशा के साथ θ कोण पर स्थित है तथा चालक में I धारा प्रवाहित होती है।

चालक का अनुप्रस्थ काट परिच्छेद क्षेत्रफल A है तथा चालक के प्रति एकांक आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या n है।

चूँकि लोरेन्ज बल

Fm = q(v x B)

अत: चालक में गतिशील एक इलेक्ट्रॉन पर लोरेन्ज बल

Fm = -e(vd x B) . . . . . . .. . . समीकरण-1

चुम्बकीय बल Fm की दिशा v तथा B के तल के लम्बवत होती है।

यदि चालक के dl लम्बाई के अल्पांश पर विचार करे तो इस अल्पांश में।

मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या n’ = n x अल्पांश का आयतन

अथवा n’ = n x A.dl

या n’ = nA.dl

अत: समीकरण-1 से अल्पांश पर लगने वाला चुम्बकीय बल

dFm = n’e(vd x B)

या

dFm = -Ane.dl(Vd x B) . . . . . . .. . . समीकरण-2

अत: अनुगमन वेग Vd = -dl/dt

(यहाँ ऋण चिन्ह का प्रयोग इसलिए किया गया है क्योंकि dl और vd परस्पर विपरीत दिशा में है )

अत: समीकरण-2 से

dFm = -Ane.dl(-dl/dt  x B)

अथवा

dFm = Ane.dl/dt (dl x B) . . . . . . .. . . समीकरण-3

लेकिन धारा i = dq/dt

जहाँ dq अल्पांश का मुक्त आवेश है।

अत: I = Ane.dl/dt

अत: समीकरण-3 से ,

dFm = I.(dl x B)

अत: चालक इसी प्रकार के अनेकों अल्पांशों से मिलकर बना है अत: सम्पूर्ण चालक पर लगने वाला बल सभी अल्पांशो पर लगने वाले बलों का योग होगा।

अत: पूरे चालक पर लगने वाला बल

F = ∫dFm = ∫I.(dl x B) = ∫dI(l x B)

अत: चुम्बकीय क्षेत्र B नियत है अत: उसका अवकलन शून्य होगा।

अत: F = I.(l x B)

अथवा

F = I.lBsinθ.n

यहाँ n कैप = l और B के तल के लम्बवत दिशा में एकांक वेक्टर।

या

F = I.lBsinθ

चुम्बकीय क्षेत्र के साथ धारावाही चालक के कोण पर यह बल निर्भर करेगा।

(i) जब θ = 0 या θ = 180 डिग्री अर्थात धारावाही चालक चुम्बकीय क्षेत्र के अनुदिश है अथवा विपरीत दिशा में है तो

sinθ = 0

अत: F = 0

(ii) जब θ = 90 डिग्री अर्थात धारावाही चालक चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत स्थित है तो

sinθ = 1 जो कि sinθ का अधिकतम मान है।

Fmax = IBl

प्रश्न 1 : एक 2m लम्बे तार में 4A की धारा वह रही है। तार 2 wb.m-2 के चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र से 30 डिग्री के कोण पर रखा है , तार पर कितना बल लगेगा ?

उत्तर : धारावाही चालक पर चुम्बकीय क्षेत्र में बल  F = I.lBsinθ

मान रखकर हल करने पर

F = 8 N

प्रश्न 2 : 40 सेंटीमीटर लम्बे एक तार में 2.5 A की धारा बह रही है। तार 8 x 10-3 Wb.m-2 के चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत रखा गया है। इस पर लगने वाले बल का परिमाण ज्ञात कीजिये।

उत्तर : धारावाही चालक पर चुम्बकीय क्षेत्र में लगने वाला बल F = I.lBsinθ

F = 8 x 10-3 N

बायोसावर्ट का नियम (biot savart’s law statement)

ऑर्स्टेड के प्रयोग से ज्ञात हुआ कि जब किसी चालक में धारा बहाई जाती है तो चालक के परित: एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है जिसकी बल रेखाएं समकेन्द्रीय वृत्तों के रूप में होती है। किसी धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र को ज्ञात करने के लिए चालक को अनेक छोटे छोटे अल्पांशो में बाँट लेते है तथा सभी अल्पांशो के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्रों को जोड़कर कुल चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करते है। सन 1820 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक बायोसावर्ट ने किसी धारावाही चालक के विभिन्न अल्पांश के कारण किसी बिंदु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का अध्ययन किया तथा प्राप्त निष्कर्षों को एक नियम के रूप में प्रस्तुत किया जो बायो सावर्ट नियम के रूप में जाना गया।

माना एक धारावाही चालक XY में I धारा प्रवाहित हो रही है तथा उसके अल्पांश ab (जिसकी लम्बाई dl है) के कारण अल्पांश के मध्य बिंदु O से θ दिशा में r दूरी पर स्थित बिंदु P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र पर विचार करना है। बायो सावर्ट के नियमानुसार P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र dB निम्नलिखित चार बातों पर निर्भर करता है

(i) dB का मान चालक में प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है अर्थात

dB  I

(ii) dB का मान अल्पांश ab की लम्बाई के अनुक्रमानुपाती होता है , अर्थात

dB  dl

(iii) dB का मान अल्पांश के साथ P की दिशा बताने वाले कोण को ज्या (sinθ) के अनुक्रमानुपाती होता है

अर्थात

dB  sinθ

(iv) dB का मान अल्पांश से P की दूरी r के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है अर्थात

dB  1/r2

उक्त चारों समीकरणों को मिलाने पर

dB I.dl.sinθ/r2

dB = KI.dl.sinθ/r2

यहाँ K एक नियतांक है। यदि चालक निर्वात अथवा वायु में रखा है तो

K = u0/4π = 10-7

यहाँ  u0 = निर्वात की चुम्बकशीलता

अत:

dB = (u0/4π)I.dl.sinθ/r2

निम्न समीकरण को निम्नलिखित प्रकार से भी व्यक्त कर सकते है

dB = (10-7)I.dl.sinθ/r2

निम्न सम्बन्ध को ही बायो सावर्ट का नियम कहते है। 

धारावाही चालक और बिंदु P कागज के तल में है। धारावाही चालक के अल्पांश ab के कारण बिंदु P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा कागज के तल के लम्बवत नीचे की ओर होगी। इसे बिन्दु (x) द्वारा प्रदर्शित किया गया है और चिन्ह (.) चुम्बकीय क्षेत्र को लम्बवत बाहर की ओर प्रदर्शित करता है। 

बायो-सावर्ट के नियम को हीलाप्लास का नियम (laplace’s law) ” याएम्पियर का नियम (ampere’s law)” कहते है। 

धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के नियम हम पढ़ चुके है। 

सम्पूर्ण धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करने के लिए उसके समस्त अल्पांशो के कारण P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्रों को जोड़ना होगा अर्थात सम्पूर्ण चालक के कारण उत्पन्न क्षेत्र 

B = ∫dB = ∫(u0/4π)I.dl.sinθ/r2

निर्वात की चुम्बकशीलता (permeability of free space) (μ0)

(1) मात्रक =

चूँकि dB = (u0/4π)I.dl.sinθ/r2

u0  = dB4πr2/I.dl.sinθ

चूँकि 4π और sinθ के मात्रक नहीं है।

अत: निर्वात की चुम्बकशीलता (u0) का मात्रक = Kg.ms-2.A-2

(2) निर्वात की चुम्बकशीलता (u0) का विमीय सूत्र

चूँकि (u0) का मात्रक = Kg.ms-2.A-2

अत:  (u0) का विमीय सूत्र =  [M1L1T-2A-2]

(3) निर्वात की चुम्बकशीलता (u0) का आंकिक मान

चूँकि u0/4π = 10-7 (यदि i को एम्पियर और dl , r को मीटर में व्यक्त करे )

u0 = 4π x 10-7 N.A-2

चुंबकीय क्षेत्र की दिशा , स्नो नियम , दांये हाथ के अंगूठे , मैक्सवल का कार्क पेच नियम

चुंबकीय क्षेत्र की दिशा (Direction of Magnetic Field ) : चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए विभिन्न नियम है जो हर एक स्पेशल परिस्थिति के लिए काम में लिया जाता है , हम यहाँ कुछ नियमों का अध्ययन करते है जिनकी सहायता से हम चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात कर सकते है।

स्नो नियम (Snow rule )

हम अध्ययन कर चुके है की जब किसी चालक तार में विधुत धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक के चारों तरफ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिससे कम्पास सुई विक्षेपित हो सकती है , कम्पास सुई के उत्तरी ध्रुव के विक्षेप की दिशा को स्नो नियम (Snow rule ) से ज्ञात करते है।
स्नो नियम (Snow rule) के अनुसारजब चालक तार में धारा का प्रवाह दक्षिण से उत्तर की ओर हो रहा हो और कम्पास सुई चालक के नीचे स्थित है तो कम्पास या चुंबकीय सुई का उत्तरी ध्रुव पश्चिम की ओर विक्षेपित हो जाता है।
इसी प्रकार जब चालक में धारा का प्रवाह उत्तर से दक्षिण दिशा में हो रहा हो तो कम्पास सुई या चुंबकीय सुई का उत्तरी ध्रुव पूर्व की तरफ विक्षेपित हो जाता है।

दांये हाथ के अंगूठे का नियम (Right hand thumb rule)

यह नियम बताता है की जब चालक तार को दांए हाथ से इस प्रकार पकड़ा जाए की अंगूठा चालक में प्रवाहित धारा की तरफ हो तो मुड़ी हुई अंगुलियां चालक के चारो तरफ उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

वृतीय धाराओं के लिए दायीं हथेली का नियम (Right hand Palm Rule for circular current )

यह नियम बताता है की जब किसी चालक धारावाही वृताकार कुंडली को इस प्रकार पकड़ा जाए की मुड़ी हुई अंगुलियाँ धारा की दिशा में हो तो अंगूठा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को दर्शाता है जैसा चित्र में प्रदर्शित किया गया है।


मैक्सवल का कार्क पेच नियम (Maxwell’s Cark Screw rule )

इस नियमानुसार यदि धारावाही चालक के अक्ष पर दाहिने हाथ से एक दक्षिणावर्त पेच को घुमाया जाए तथा पेच की नोक धारा की दिशा में आगे बढे तो अंगूठे के घूमने की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करेगी।

लम्बे तथा सीधे धारावाही चालक तार के कारण चुंबकीय क्षेत्र Magnetic Field Due to Long Conductor

Magnetic Field Due to a Long and straight Current Carrying Conductor लम्बे तथा सीधे धारावाही चालक तार के कारण चुंबकीय क्षेत्र : चुंबकीय क्षेत्र का आधार हम पढ़ चुके है अर्थात यह क्या होता है , परिभाषा , सूत्र इत्यादि।

अब हम अध्ययन करते है विभिन्न प्रकार की आकृतियों के कारण किसी बिंदु पर चम्बकीय क्षेत्र कितना होता है तथा इनके लिए सूत्र भी स्थापित करेंगे।

1. परिमित लम्बाई का सीधा धारावाही चालक तार (Straight current carrying conducting wire of finite length )

यहाँ पहले यह समझ ले की परिमित लम्बाई का मतलब होता है सिमित लम्बाई वाला तार के कारण किसी बिंदु चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करेंगे।

माना एक चित्रानुसार AB चालक तार है जिसमेविद्युत धारा A से B की तरफ प्रवाहित हो रही है , चूँकि चालक तार में धारा बह रही है अतः इसके चारो ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जायेगा।
हमें तार AB के लंबवत दुरी R पर किसी बिंदु P पर चुंबकीय क्षेत्र की गणना करनी है।
इसके लिए हम तार पर एक अल्पांश dl की गणना करते है , हम बायो सावर्ट नियम का नियम पढ़ चुके है जिसके अनुसार इस अल्पांश dl के कारण चुंबकीय क्षेत्र निम्न होगा


हम चित्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है Idl तथा r वेक्टर के मध्य का कोण (180 – θ) होगा।
अतः सूत्र निम्न प्राप्त होता है


चूँकि हम जानते है की sin(180 – θ) = sinθ
अतः


डाइग्राम से
EG = EF sin
θ = dl sinθ तथा EG = EPsin dϕ = rsin dϕ
अतः समीकरण 1 में निम्न मान रखने पर समीकरण निम्न प्राप्त होता है

EQP से हम देख सकते है की 

अतः r का मान रखने पर 

यह चुंबकीय क्षेत्र dB मात्र अल्पांश dl कारण बिंदु P पर है अतः सपूर्ण चालक तार AB के कारण बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान 


2.अनंत लम्बाई के सीधे धारावाही चालक तार के कारण चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Field due to straight current carrying wire of infinite length )

हम सिमित लम्बाई के तार के कारण किसी बिंदु P पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात कर चुके है , हमने यह निम्न सूत्र प्राप्त किया है।


अब हम बात करते है जब तार अनन्त लम्बाई का है इस स्थिति में

Φ1 = Φ2 = π/2 =  90’

अतः यह मान सूत्र में रखने पर हमें अनन्त लम्बाई वाले चालक तार के कारण किसी बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र प्राप्त होता है जिसका मान निम्न होगा 


यदि इसकी दिशा भी ज्ञात करनी हो  हम चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के बारे में पहले पढ़ चुके है की किस प्रकार चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात की जाती है। 

लम्बे ऋजु धारावाही तार के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field due to a long straight current carrying wire) : माना AB एक अनंत लम्बाई का धारावाही ऋजु चालक है जिसमें I धारा प्रवाहित हो रही है। तार से x दूरी पर स्थित बिंदु P पर इसके कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना है। चालक पर एक छोटा खण्ड ab ले लेते है। इस खण्ड की बिंदु P से दूरी r है तथा इसके द्वारा P पर अंतरित कोण dɸ है। खंड ab का मध्य बिंदु O है तथा रेखा OP चालक AB के साथ θ कोण बनाती है। छोटे चालक खण्ड ab के लिए QOP = QbP = θ होगा। 

बायो सावर्ट के नियम से धारावाही चालक खण्ड ab के कारण P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

dB = (u0/4π)I.ab.sinθ/r2 . . . . . . . समीकरण-1

चित्र से

चूँकि ac/ab = sinθ

ac = sinθ.ab

अत: समीकरण-1 से

dB = (u0/4π).I.ac/r2 . . . . . . . समीकरण-2

चूँकि कोण = चाप/त्रिज्या

अत: dɸ = ac/r

ac = r.dɸ

अत: समीकरण-2 से

dB = (u0/4π).I.r.dɸ/r2

या

dB = (u0/4π).I.dɸ/r . . . . . . . समीकरण-3

चूँकि x/r = cosɸ

r = x/cosɸ

अत: समीकरण-3 से

dB = (u0/4π).I.cosɸ.dɸ./x

अत: सम्पूर्ण चालक AB के कारण P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = AB dB =  -ɸ1 +ɸ2 (u0/4π).I.cosɸ.dɸ./x

अनंत लम्बाई के चालक के लिए

ɸ1 = π/2 तथा ɸ2 = π/2

अत:

B = AB dB =  – π/2  +π/2 (u0/4π).I.cosɸ.dɸ./x

हल करने पर

B =(u0/4π) .2I/x

प्रश्न 1  : एक चालक में 90 एम्पियर धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है। धारा के कारण चालक से 1.5 m नीचे एक बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कीजिये।

उत्तर : I = 90A , x = 1.5 m , B = ?

अत: B = 2 x 10-7 .1/x

अत: Bp = 2 x 10-7 .1/1.5

Bp = 1.2 x 10-5 T

दिशा : दायें हाथ की हथेली के नियम से उक्त चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर होगी।

 प्रश्न 2  :  एक धारा खण्ड जिसकी लम्बाई 2 सेंटीमीटर है और उसमें 16 एम्पियर की धारा है , मूल बिन्दु पर x अक्ष के अनुदिश रखा हुआ है। इसके कारण y अक्ष पर मूलबिन्दु से 0.8 m की दूरी पर चुम्बकीय क्षेत्र कितना होगा ?

हल : I = 16A

y = r = 0.8m

dl = 2 cm = 2 x 10-2 m

बायो सावर्ट के नियम से P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता

dB = (u0/4π)I.dl.sinθ/r2

मान रखकर हल करने पर

dB = 0.5 x 10-7 T

या

5 x 10-8 Tesla (z दिशा में)

वृत्ताकार धारावाही कुण्डली के केंद्र पर चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field at the Centre of coil in hindi

magnetic field due to a circular coil in hindi वृत्ताकार धारावाही कुण्डली के कारण चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Field due to current carrying circular coil )

प्रस्तावना : हम पिछले टॉपिक में एक लम्बे सीधे धारावाही चालक तार के कारण चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कर चुके है और इसके लिए सूत्र भी स्थापित कर चुके है अब हम अध्ययन करते है जब एक वृत्ताकार कुण्डली हो तो इसके कारण कितना चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होगा साथ ही इसके लिए सूत्र भी स्थापित करेंगे।

 कुण्डली के केंद्र पर चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic field at the Centre of coil  )

जब हम किसी वृत्ताकार कुंडली में धारा प्रवाहित करते है तो इसके चारो ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , यदि यह वृत्ताकार कुण्डली कागज के तल में रखी हो तो इसके चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र कागज के तल के लंबवत होगा।

इस स्थिति में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा क्या होगी ?

वृताकार कुंडली के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा वृतीय धाराओं के लिए दायीं हथेली का नियम से ज्ञात कर सकते है। इसके अनुसार जब कुण्डली में धारा दक्षिणावर्त दिशा में बह रही हो तो चुंबकीय क्षेत्र कागज के तल के लंबवत नीचे की तरफ होगा।

तथा जब धारा वामावर्त दिशा में बह रही हो तो चुम्बकीय क्षेत्र कागज के तल के लंबवत दिशा में ऊपर की ओर होगा।  (कुंडली कागज के तल पर स्थित है )

माना एक कुण्डली में धारा I प्रवाहित हो रही है इसकी त्रिज्या r है।

हम कुंडली के केंद्र पर चुम्बकीय क्षेत्र की गणना करने के लिए कुण्डली की परिधि को अल्पांश में बाँट लेते है तथा सभी अल्पांश के कारण केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र की गणना करके सबको जोड़कर केंद्र पर कुल चुम्बकीय क्षेत्र की गणना करते है।


dl अल्पांश के कारण केंद्र o पर चुम्बकीय क्षेत्र dB है तो


चूँकि dl तथा r के मध्य 90 डिग्री का कोण है अतः θ = 90 अतः सूत्र में मान रखने पर sin90 = 1

अतः


अतः पूरे अल्पाँशो के कारण केंद्र पर उत्पन्न कुल चुम्बकीय क्षेत्र


यदि कुंडली में फेरो की संख्या N हो तो


वृत्ताकार कुण्डली के कारण चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field due to a circular coil) : यदि हम किसी चालक को एक वृत्ताकार कुंडली का रूप दे दे तथा उसमें विद्युत धारा प्रवाहित करे तो कुंडली एक चुम्बकीय द्विध्रुव की तरह कार्य करने लगती है। अर्थात उसका एक फलक चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव की तरह तथा दूसरा फलक चुम्बकीय दक्षिणी ध्रुव की भाँती व्यवहार करने लगता है। धारावाही कुण्डली की चुम्बकीय बल रेखाएं चित्र में प्रदर्शित की गयी है।

जिस फलक पर धारा वामावर्त (anti clockwise) दिशा में बहती हुई दिखाई देती है , वह फलक उत्तरी ध्रुव और जिस फलक पर धारा दक्षिणावर्त दिशा में बहती हुई प्रतीत होती है , वह फलक दक्षिणी ध्रुव की भाँती व्यवहार करता है।

यदि एक आवेश स्थिर रहता है तो उसके परित: केवल विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होगा। यदि आवेश चलने लगे (तार में नहीं) तो वह विद्युत और चुम्बकीय दोनों क्षेत्र उत्पन्न करता है। मान लीजिये कि तार में धारा बह रही है तो तार में जितना धन आवेश होगा , उतना ही ऋण आवेश भी होगा , अत: तार विद्युतत: उदासीन होगा। इस कारण तार में धारा बहने पर उसके चारों ओर कोई विद्युत क्षेत्र उत्पन्न नहीं होगा। इसके विपरीत चूँकि इलेक्ट्रॉन केवल एक ही दिशा में चल रहे है और धनावेश नहीं चल रहा है , अत: तार के चारों ओर सबल चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जायेगा। इस प्रकार यदि आवेशित कण वायु में चल रहा है तो विद्युत और चुम्बकीय दोनों क्षेत्र उत्पन्न होंगे और यदि तार में धारा बह रही है तो केवल चुम्बकीय क्षेत्र ही उत्पन्न होगा।

इसका अध्ययन सबसे पहले ऑसर्टेड ने किया था।

स्पष्ट है कि विद्युत क्षेत्र को बिना आवेश के उत्पन्न नहीं किया जा सकता जबकि चुम्बकीय क्षेत्र को बिना चुम्बक के उत्पन्न किया जा सकता है क्योंकि गतिशील आवेश चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है। चुम्बकत्व की व्याख्या इसी आधार पर की जाती है।

वृत्ताकार धारावाही कुण्डली के कारण चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field due to current carrying circular coil) :

(i) वृताकार कुंडली के केन्द्र पर : जब किसी वृत्ताकार कुंडली में धारा प्रवाहित की जाती है तो उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। वृत्ताकार कुंडली के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक समान होता है। हमें कुंडली के केंद्र O पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना है। यदि कुण्डली कागज के तल में स्थित है तो उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा कागज के तल के लम्बवत होगी। यदि धारा दक्षिणावर्त दिशा में प्रवाहित है तो चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा कागज के लम्बवत नीचे की ओर होगी तथा यदि धारा वामावर्त दिशा में प्रवाहित होती है तो चुम्बकीय क्षेत्र कागज के तल के लम्बवत ऊपर की ओर होगा।

कुंडली की त्रिज्या माना कि r है। केंद्र O पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करने के लिए पहले एक वृत्ताकार लूप पर विचार करते है। पूरी परिधि को अनेक अल्पांशो में बाँट लेते है तथा प्रत्येक के कारण O पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र को जोड़कर पूरे लूप के कारण O पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात कर लेते है।

dl लम्बाई के एक अल्पांश ab के कारण O पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

dB = (u0/4π)I.dl.sinθ/r2

अल्पांश के मध्य बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा त्रिज्या r के साथ 90 डिग्री का कोण बनाती है अत:

dB = (u0/4π)I.dl.sin90/r2

dB = (u0/4π)I.dl/r2

अत: पूरे लूप के कारण O पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = (u0/4π)2πI/r

या

B = (u0I/2r)

यदि लूप के स्थान पर N फेरों वाली कुंडली है तो उसके केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = B = (u0I.N/2r)

B = (u0/4π)2πI.N/r

(ii) किसी चाप के कारण केन्द्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र : माना r त्रिज्या के धारावाही चाप AB के कारण उसके केंद्र O पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करना है। बायो सावर्ट के नियम से वृत्ताकार चाप के अल्पांश के कारण केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

dB = (u0/4π)I.dl/r2

चूँकि

कोण = चाप/त्रिज्या

अत: चाप AB द्वारा केंद्र पर अन्तरित कोण

θ = AB/r

AB = r.θ

अत: पूरे चाप AB के कारण O पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = (u0/4π)I.θ/r

नोट : θ को रेडियन में अर्थात π के पदों में रखते है।

वृत्ताकार धारावाही कुण्डली की अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic Field on the axis of current carrying circular coil

Magnetic Field on the axis of current carrying circular coil in hindi वृत्ताकार धारावाही कुण्डली की अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र

प्रस्तावना : हम पिछले टॉपिक में वृत्ताकार कुण्डली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का अध्ययन कर चुके है और इसके सूत्र की स्थापना कर चुके है अब बात करते कुंडली के अक्ष पर चुंबकीय क्षेत्र कितना होगा और इसका सूत्र क्या होगा।

माना किसी a त्रिज्या वाली वृताकार कुंडली मेंविद्युत धारा प्रवाहित हो रही है , इस कुण्डली के कारण x दूरी पर स्थित किसी बिन्दु P पर हमें चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करना है।

कुण्डली द्वारा P बिंदु बनाया गया अंतरित अर्द्ध शीर्ष कोण θ है।  कुण्डली की व्यास AB की लम्बाई L है।

सम्पूर्ण वृत्ताकार कुंडली के कारण P पर चुंबकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करने के लिए कुण्डली को अल्पांश में विभाजित कर सभी अल्पांश के कारण P पर चुंबकीय क्षेत्र की गणना कर सबको आपस में जोड़ने से हमें P पर सम्पूर्ण कुंडली के कारण कुल चुंबकीय क्षेत्र का मान प्राप्त हो जायेगा।

हमने चित्रानुसार बिंदु A तथा B पर दो अल्पांश dl लिए है , तथा बिंदु A तथा B की P तक की दुरी r है।  हम बायो सावर्ट का नियम प्रयोग करके इन अल्पाँशो के कारण P पर चुंबकीय क्षेत्र की गणना करेंगे तत्पश्चात कुल चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करेंगे।


दोनों अल्पाँशो के कारण P पर चुंबकीय क्षेत्र


चूँकि यहाँ cos वाले घटक परिमाण में समान तथा दिशा में विपरीत है अतः ये एक दूसरे को निरस्त कर देते है।

अतः बायो सावर्ट का नियम से सम्पूर्ण कुण्डली के कारण बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करने के लिए अल्पांश वाले मान को 0 से 2πa तक समाकलन कर देते है क्योंकि कुंडली की परीधि 2πa है।

अतः P पर कुल चुम्बकीय क्षेत्र


यदि कुंडली में फेरों की संख्या N हो तो , P बिंदु पर उत्पन्न कुल चुम्बकीय क्षेत्र

वृत्ताकार धारावाही कुंडली के अक्ष पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र : माना a त्रिज्या की एक वृत्ताकार कुण्डली में I धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली में तार के N फेरे है। कुंडली के केंद्र O से x दूरी पर अक्षीय स्थिति में एक बिंदु P पर हमें चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करना है। P पर कुंडली द्वारा अंतरित अर्द्ध शीर्ष कोण θ है। पहले हम एक लूप पर विचार करते है। माना लूप के व्यास NM के बिन्दुओ N और M पर समान लम्बाई dl के दो अल्पांश है। इन अल्पांशों की बिंदु P से दूरी यदि r हो तो N पर स्थित अल्पांश के कारण P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

dB1 = (u0/4π)I.dl.sin90/r2

dB1 = (u0/4π)I.dl /r2

इसी प्रकार M पर स्थित समान लम्बाई के अल्पांश के कारण P पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

dB2 = (u0/4π)I.dl.sin90/r2

dB2 = (u0/4π)I.dl /r2

चित्र से स्पष्ट है कि केंद्र O के दोनों ओर सममित में लिए गए समान लम्बाई (dl) के दो अल्पांशों द्वारा बिंदु P पर समान परिमाण के चुम्बकीय क्षेत्र dB1 और dB2 उत्पन्न होते है। इन दोनों के निरक्षीय घटक dB1cosθऔर dB2cosθ परिमाण में समान और दिशा में विपरीत होने के कारण एक दुसरे को निष्प्रभावित कर देते है तथा अक्षीय घटक dB1sinθऔर dB2sinθ जुड़कर अक्षीय क्षेत्र प्रदान करते है। इस प्रकार अक्षीय क्षेत्र केवल अक्षीय घटक dBsinθ के कारण ही मिलता है।

चूँकि बिंदु P पर पूरी रिंग के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = u0.I.a2/2(a2 + x2)3/2

अत: कुण्डली में N फेरे है अत: कुंडली की अक्ष पर उसके केंद्र से x दूरी पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = u0.N.I.a2/2(a2 + x2)3/2

सामने से देखने पर यदि धारा वामावर्त दिशा में बहती हुई प्रतीत होती है तो उक्त क्षेत्र की दिशा कुंडली के तल के लम्बवत बाहर की तरफ होगी तथा यदि धारा दक्षिणावर्त दिशा में बहती हुई प्रतीत होती है तो उक्त क्षेत्र की दिशा कुंडली के तल के लम्बवत अन्दर की ओर होगी।

कुंडली के अक्षीय चुम्बकीय क्षेत्र का केंद्र O से दूरी के साथ परिवर्तन चित्र में दिखाया गया है।

B = u0.N.I.a2/2(a2 + x2)3/2  से स्पष्ट है कि

(i) जब x = 0 तो B =   u0.N.I/2a

जो कि चुम्बकीय क्षेत्र का अधिकतम मान है अत: चुम्बकीय क्षेत्र का मान कुंडली के केंद्र पर अधिकतम होता है।

(ii) केंद्र O से बिंदु P की दूरी x बढ़ने पर B का मान घटता है।

(iii) जब x = ± ∞ तो B = 0 अर्थात अनंत पर B का मान शून्य हो जाता है।

(iv) दूरी के साथ चुम्बकीय क्षेत्र के परिवर्तन की दर अर्थात dB/dx सभी स्थानों पर एक समान नहीं होती है।

x = ± a/2 पर dB/dx का मान अधिकतम होता है।

प्रश्न : 10 सेंटीमीटर त्रिज्या की 100 कसकर लपेटे गये फेरों की किसी ऐसी कुण्डली पर विचार कीजिये जिसमें एक एम्पियर विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली के केंद्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है ?

उत्तर : B = 6.28 x 10-4 T

प्रश्नएक वृत्ताकार खण्ड की त्रिज्या 20 सेंटीमीटर है और यह अपने केंद्र पर 45 डिग्री का कोण बनाता है। यदि खंड में 10 एम्पियर की धारा प्रवाहित की जाए तो केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान और दिशा ज्ञात कीजिये ?

उत्तर : चुंबकीय क्षेत्र B = 3.925 x 10-6 T

दिशा : चित्र के अनुसार वृत्तीय चाप में धारा दक्षिणावर्त है अत: केंद्र O पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा खंड के तल के लम्बवत निचे की ओर होगी। यदि धारा की दिशा वामावर्त होती है तो चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा खण्ड के तल के लम्बवत ऊपर की ओर होगी।

हैल्महोल्ट्ज कुण्डलियाँ क्या है Helnhottz Coils in hindi

Helnhottz Coils in hindi हैल्महोल्ट्ज कुण्डलियाँ क्या है : दो वृत्ताकार कुंडलियां जो समान अक्ष पर स्थित हो , जिनका आकार समान हो , दोनों कुंडलियों के मध्य की दुरी उनकी त्रिज्या के बराबर हो तथा दोनों कुण्डलियों में समान धारा समान दिशा में प्रवाहित हो रही हो , इस प्रकार के कुंडलियों के युग्म को हेल्महोल्ट्ज कुण्डलिया कहते है।


जहाँ एक समान चुम्बकीय क्षेत्र की आवश्यकता होती है वहां हेल्महोल्ट्ज कुण्डलियों का उपयोग किया जाता है क्योंकि दोनों कुण्डलियों के मध्य में उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का मान समान होता है यहाँ समान का तात्पर्य नियत से है। अतः नियत चुंबकीय क्षेत्र प्राप्त करने के लिए हेल्महोल्ट्ज कुण्डलिया बहुतायत से प्रयोग में आने वाली युक्ति है।


चित्रानुसार दोनों कुंडलियाँ एक ही स्टैण्ड पर लगी होती है जिससे इनको सेट करने में परेशानी आये तथा दोनों के मध्य चुम्बकीय क्षेत्र का मान नियत बना रहे , चित्र में आप यह भी देख सकते है की दोनों हैल्महोल्ट्ज कुण्डलियाँ समान्तर तल में स्थित है आपस में श्रेणी क्रम में जुडी हुई है , दोनों श्रेणीक्रम में इसलिए जुडी होती है ताकि दोनों कुंडलियों में समान परिमाण भी धारा समान दिशा में प्रवाहित हो सके।

हेल्महोल्ट्ज कुण्डलियों के मध्य भाग में उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field due to Helnhottz Coils)

चूँकि दोनों कुंडलियों द्वारा कुण्डली के मध्य में उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान परिमाण में समान होता है अतः दोनों कुंडलियों के मध्य में कुल चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण दोनों कुण्डलियों द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्रों के सदिश योग के बराबर होता है।

एक हैल्महोल्ट्ज कुण्डली के कारण मध्य में उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का मान


चूँकि दोनों हैल्महोल्ट्ज कुण्डलियाँ  परिमाण में समान चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है अतः दूसरी कुण्डली के कारण भी इतना ही चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होगा अतः दोनों कुंडलियों के मध्य उत्पन्न कुल चुम्बकीय क्षेत्र का मान 2B होगा अतः

हेल्महोल्ट्ज कुण्डलियों के मध्य भाग में उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

धारावाही चालक में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा Direction of Magnetic Field in current carrying conductor 

Direction of Magnetic Field in current carrying conductor धारावाही चालक में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा : हमने पिछले एक टॉपिक में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा का अध्ययन किया था , हमने वहाँ कुछ नियमों के बारे में पढ़ा था जिनकी सहायता से हम चुंबकीय क्षेत्र की दिशा का पता लगा सकते है वहां हमने स्नो नियम (Snow rule) , दांये हाथ के अंगूठे का नियम (Right hand thumb rule) , वृतीय धाराओं के लिए दायीं हथेली का नियम (Right hand Palm Rule for circular current ) , मैक्सवल का कार्क पेच नियम (Maxwell’s Cark Screw rule) नियमों का अध्ययन किया था।
अब हम यहाँ धारावाही चालक में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा का प्रायोगिक अध्ययन करेंगे अर्थात धारावाही में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए हम एक प्रयोग करेंगे।

प्रयोग (Experiment) :

चित्रानुसार एक PQRS कागज का बोर्ड लेते है तथा इसको क्षैतिज में स्थापित करके एक धारावाही चालक AB को इसके भीतर से गुजारते हुए ऊर्ध्वाधर स्थापित करते है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।

कागज के गत्ते पर लोहे का बुरादा डालकर एक हल्की पतली परत बना देते है तथा तार AB को बैटरी से जोड़ देते है जिससे धारावाही चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है।

धीरे धीरे गट्टे को हाथ से कम्पन्न करवाने से हम देखते है की लोहे का बुरादा वृत्तों का रूप ग्रहण कर लेता है जिसका केंद्र एक बिंदु पर प्राप्त होता है।

यदि हम चुम्बकीय सुई या कम्पास की सहायता से दिशा ज्ञात करने पर हम पाते है की सुई की दिशाचित्र में वृतों पर दर्शायी गए तीर के निशान के समान होती है।

तथा जब बैटरी के टर्मिनल आपस में बदल दिए जाए तो कार्डबोर्ड पर वृत्तों की दिशा बदल जाती है तथा चुम्बकीय सुई में सुई का विक्षेप भी विपरीत दिशा में प्राप्त होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बैटरी के टर्मिनल आपस में बदलने पर धारा दिशा बदल जाती है अर्थात पहले से विपरीत दिशा में बहने लग जाती है।

वृत्ताकार कुण्डली में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा (Direction of magnetic field in the circular Coil  )

वृत्ताकार कुण्डली में विद्युत धारा प्रवाहित करके अर्थात बैटरी से जोड़कर देखने पर यदि धारा वामावृत्त दिशा (Anti clock wise अर्थात घडी की विपरीत दिशा) में बहती हुई प्रतीत होती है तो कुण्डली (Coil) का वह सिरा उत्तरी ध्रुव (N) की भांति व्यवहार करता है।

यदि वृताकार कुण्डली में धारा दक्षिणा वृत दिशा (clock wise अर्थात घडी की दिशा) में बहती हुई प्रतीत होती है तो कुंडली का वह सिरा दक्षिणी ध्रुव (S) की तरह व्यवहार करता है।


धारावाही चालक पर चुम्बकीय क्षेत्र में बल (force on a current carrying conductor in a magnetic field) : यदि किसी चुम्बकीय क्षेत्र में एक धारावाही चालक को रखा जाए तो इस चालक पर एक बल आरोपित होता है और इस बल की दिशा , चुम्बकीय क्षेत्र और धारा दोनों की दिशा के लम्बवत होती है। यदि चालक गति करने के लिए स्वतंत्र है तो वह इस बल की दिशा में गति करने लगता है। इस तथ्य को निम्नलिखित साधारण प्रयोगों द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है

1. एक तार के टुकड़े को एक नाल चुम्बक के ध्रुवों N और S के मध्य इस प्रकार ढीला बाँधा जाता है कि तार की लम्बाई ध्रुवों के मध्य चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत हो। तार में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर हम देखते है कि तार ऊपर की ओर उठकर तन जाता है।

तार में धारा की दिशा उलट देने पर या चुम्बक को उलट कर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा उलट देने पर हम पाते है कि तार नीचे की तरफ तन जाता है। स्पष्ट है कि धारावाही तार पर चुम्बकीय क्षेत्र में बल लगता है।

2. बारलो का पहिया (barlow’s wheel principle) : इस प्रयोग की रूप रेखा में दिखाई गयी है। इसमें एक ताम्बे का हल्के पहिया W होता है जिसके दाँते लम्बे और नुकीले होते है। यह एक क्षैतिज चालक तार XX’ के परित: स्वतंत्रतापूर्वक घूम सकता है। पहिये के ठीक निचे एक आयताकार कटोरी रखी जाती है जिसमें पारा भरा होता है। पारा लेने का कारण इसका सुचालक होना है। इस व्यवस्था को इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि घूमते समय पहिये का दांता बारी बारी से पारे को स्पर्श करे। पारे से भरी कटोरी को एक शक्तिशाली नाल चुम्बक के ध्रुवों N और S के मध्य रखते है। जब पहिये की धुरी XX’ और पारे के बीच विद्युत धारा प्रवाहित करते है तब पहिया स्वत: ही घुमने लगता है। इसका कारण यह है कि जब पहिये का कोई दांता पारे के सम्पर्क में आता है तब विद्युत परिपथ पूरा हो जाता है है और चुम्बकीय क्षेत्र के कारण पहिये के उस दांते पर एक बल (माना F) कार्य करने लगता है। चित्र में बल की दिशा तीर से प्रदर्शित की गयी है। इस बल के कारण पहिया घूम जाता है। पहिये के घुमने पर अलग दांता पारे के सम्पर्क में आता है और विद्युत परिपथ पुनः पूरा हो जाता है और पहिया फिर से घूम जाता है। इस प्रकार पहिया लगातार घूमता रहता है।

उपर्युक्त प्रयोगों से स्पष्ट है चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित धारावाही चालक पर एक बल कार्य करता है जिसकी दिशा धारा की दिशा और चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दोनों के लम्बवत होती है।

चुम्बकीय क्षेत्र में आवेश की गति Motion of charge in a Magnetic Field in hindi आवेशित कण की गति

Motion of charge in a Magnetic Field in hindi चुम्बकीय क्षेत्र में आवेश की गति या आवेशित कण की गति : जब कोई गतिशील आवेश q किसी चुम्बकीय क्षेत्र B तथा विद्युत क्षेत्र E में v वेग से प्रवेश या गति करता है तो आवेश q पर दो प्रकार के बल कार्य करते है।

1. चुम्बकीय बल = qvB

2. विद्युत बल = qE

अतः आवेशपर कुल बल का मान दोनों बलों के योग के बराबर होता है।

अतः कुल बल (F) = चुम्बकीय बल + विद्युत बल

F = qvB + qE

इस बल के बारे में सबसे पहले एच..लोरेन्ज (H. A. Lorentz) ने बताया था इसलिए इसे लॉरेंज बल भी कहते है।

चूंकि हम यहाँ केवल चुम्बकीय बल का अध्ययन कर रहे है अतः आवेश पर लगने वाले चुंबकीय बल के बारे में विशेष अध्ययन करेंगे।

यदि v तथा B के मध्य θ कोण है तो आवेश पर लगने वाला लॉरेंज बल

F = qvB sinθ

यदि हमें चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करनी है तो उसके लिए हम पहले कई नियम पढ़ चुके है जैसे दक्षिण हस्त पेच का नियम इत्यादि।

यदि आवेश विराम अवस्था में अर्थात v = 0 होने से बल F = 0 अतः कह सकते है की केवल गतिशील आवेश ही चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है।

अधिक विस्तार से पढ़ने के लिए हम कुछ विशेष स्थितियों का अध्ययन करते है

1. जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में प्रवेश करता है

हम ऊपर पढ़ चुके है की किसी आवेशित कण पर लगने वाला बल

F = qvB sinθ

यदि आवेशित कण की गति चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में हो रही है तो V तथा B के मध्य कोण शून्य होगा

अर्थात θ = 0

अतः

 sin = 0

अतः आवेशित कण पर लगने वाला चुंबकीय बल का मान शून्य होगा। इस स्थिति में आवेशित कण सरल रेखीय पथ पर गति करता है।

2. जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत प्रवेश करता है

इस स्थिति में आवेशित कण चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत प्रवेश करता है अर्थात इस स्थिति में V तथा B के मध्य 90 डिग्री का कोण बनता है।

अर्थात

θ = 90

अतः

 sin9 = 1

 F = qvB sinθ

अतः इस स्थिति में sinθ  = 1 

अतः F = qvB

चूँकि यह बल आवेशित कण के वेग की दिशा के लम्बवत कार्य करता है अतः इस स्थिति में कण इस बल के कारण वृत्ताकार गति करता है , वृत्ताकार गति के लिए इस कण पर एक अभिकेंद्रीय बल भी कार्य करता है। 

वृताकार मार्ग में गति करवाने के लिए यह आवश्यक है की कण पर अभिकेंद्रिय बल तथा चुम्बकीय बल (लॉरेन्ज बल ) का मान समान होना चाहिए। 

चूँकि इस स्थिति में आवेशित कण वृत्ताकार गति कर रहा है अतः यहाँ 

अभिकेंद्रिय बल  =  चुम्बकीय बल (लॉरेन्ज बल )

अभिकेंद्रिय बल  = mv2/r

चुम्बकीय बल (लॉरेन्ज बल ) = qvB

अतः

mv2/r   = qvB


यहाँ r वृत्तीय पथ की त्रिज्या है

चूँकि यहाँ आवेशित कण वृतीय गति कर रहा है अतः कण की कोणीय आवृति (w) को निम्न प्रकार दर्शाया जाता है

चूँकि v = wr

तथा कोणीय आवृति (w) = 2πv

अतः

आवेशित कण को वृत्तीय पथ का एक चक्कर पूरा करने में लगा समय


नोट : अधिक वेग से गति करने वाले आवेशित कण बड़ी त्रिज्या के वृत्तीय पथ का अनुसरण करते है जबकि कम वेग से गति करने वाले आवेशित कण छोटी त्रिज्या के वृत्तीय पथ का अनुसरण करते है।

3. जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र से किसी कोण पर गति करता है

यहाँ किसी कोण पर गति करने का तात्पर्य है की आवेशित कण चुंबकीय क्षेत्र से 0 , 90 या 180 डिग्री के अतिरिक्त अन्य किसी θ कोण पर गति करता है।

इस स्थिति में आवेशित कण कुण्डलिनी मार्ग में गति करता है।

इस स्थिति में  कुण्डलिनी मार्ग में गति कर रहे कुण्डलिनी की त्रिज्या


कुण्डलिनी पथ का आवर्तकाल


चुम्बकीय क्षेत्र में आवेशित कण की गति (motion of a charged particle in a magnetic field) :

(i) जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में प्रवेश करता है – चुम्बकीय क्षेत्र में गतिशील आवेशित कण पर लगने वाला बल

F = qvBsinθ

जब आवेशित कण की गति चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में होती है तो

θ = 0 अत: sinθ = 0

अत: F = 0

अर्थात चुंबकीय क्षेत्र के समान्तर प्रवेश करने वाले आवेशित कण पर कोई बल नहीं लगता है , अत: कण का पथ ऋजुरेखीय होता है।

(ii) जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत प्रवेश करता है : जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र की लम्बवत दिशा में प्रवेश करता है तो

θ = 90 अत: sinθ = 1

अत: F = qvB

इस बल की दिशा हमेशा वेग की दिशा के लम्बवत होगी अत: इस बल के प्रभाव में कण का मार्ग वृत्ताकार होगा क्योंकि वृत्ताकार पथ पर गतिशील पिण्ड पर सदैव वेग की दिशा के लम्बवत एक अभिकेन्द्रीय बल कार्य करता है। अत: यही चुम्बकीय बल (F = qvB) आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल का कार्य करेगा तथा कण का मार्ग वृत्ताकार होगा।

चूँकि लोरेन्ज बल = अभिकेन्द्रीय बल

qvB = mv2/r

यहाँ r वृत्तीय पथ की त्रिज्या है।

या

r = mv/qB

स्पष्ट है कि mv (संवेग)

और r 1/q तथा r 1/B

अर्थात एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में आवेशित कण के वृत्ताकार मार्ग की त्रिज्या कण के संवेग (p = mv) के अनुक्रमानुपाती और आवेश (q) और चुम्बकीय क्षेत्र (B) के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

चूँकि कण की गतिज ऊर्जा Ek = mv2/2

या

p = √2mEk

अत: मार्ग की त्रिज्या

r = √2mEk/qB

आवर्तकाल और आवृत्तिवृत्तीय पथ पर कण का आवर्त काल

T = 2πm/qB

आवृत्ति

n = 1/T

n = qB/2πm

समीकरणों से स्पष्ट है कि आवर्तकाल और आवृति , कण की चाल v पर निर्भर नहीं करते है। कण का वेग बढाने पर भी T और n का मान नियत रहता है , केवल मार्ग की त्रिज्या (r) बढ़ जाती है।

अधिक वेग से गति करने वाले आवेशित कण बड़ी त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर और कम वेग से गति करने वाले आवेशित कण छोटी त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर परिक्रमा करते है।

(ii) जब आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र से किसी कोण पर गति करता है जो θ = 0 , 90 , 180 के अतिरिक्त हो : चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करते समय यदि आवेशित कण का वेग चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत नहीं है तब कण वृत्तिय पथ में गति करके कुण्डलिनी मार्ग (helix) के रूप में गति करता है।

वास्तव में जब कण चुम्बकीय क्षेत्र के साथ θ कोण पर प्रवेश करता है तो वेग का घटक v.cosθ चुम्बकीय क्षेत्र के अनुदिश होता है अत: इसके कारण कण का पथ ऋजुरेखीय होगा और लम्ब घटक v.sinθ चुंबकीय क्षेत्र के लम्बवत होगा।

अत: इसके कारण कण का पथ वृत्ताकार होगा। फलस्वरूप दोनों का परिणामी पथ कुंडलिनी पथ होगा। कुण्डलिनी पथ की अक्ष चुम्बकीय क्षेत्र के समान्तर होती है।

इस कुंडलिनी पथ की त्रिज्या

r = mv.sinθ/qB

आवर्तकाल T = 2πm/qB

आवृति n = 1/T

n = qB/2πm

कुण्डलिनी पथ का पिच : कुण्डलिनी पथ के अक्ष के अनुदिश एक आवर्तकाल में चली गयी दूरी को पिच कहते है।

पिच = v.cosθ x T

पिच = v.cosθ x (2πm/qB)

प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1 : 6 x 10-4 T के चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत 3 x 107 ms-1 की चाल से गतिमान किसी इलेक्ट्रॉन (द्रव्यमान = 9 x 10-31 Kg और आवेश = 1.6 x 10-19 C )  के पथ की त्रिज्या क्या होगी ? इसकी क्या आवृत्ति होगी ? इसकी ऊर्जा keV में परिकलित कीजिये। (1ev = 1.6 x 10-19 J)

उत्तर :

दिया गया है

चुम्बकीय क्षेत्र B = 6 x 10-4 T

चाल v = 3 x 107 ms-1

द्रव्यमान m = 9 x 10-31 Kg

आवेश = 1.6 x 10-19 C

1ev = 1.6 x 10-19 J

चुम्बकीय क्षेत्र में लम्बवत प्रवेश करने पर इलेक्ट्रॉन के वृत्तीय पथ की त्रिज्या r = 28 सेंटीमीटर

आवृत्ति n = 17 MHz

इलेक्ट्रॉन की गति ऊर्जा = 2.53 keV

प्रश्न 2 : किसी परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों तरफ 0.5 x 10-10 m त्रिज्या की वृत्ताकार कक्षा में 5 x 106 ms-1 की एक समान चाल से घूम रहा है। कक्षा के केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कीजिये।

उत्तर : वृत्तिय पथ में गतिशील आवेश के कारण पथ के केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र

B = 32 टेस्ला

प्रश्न 3 : एक α कण 12 Wb m-2 तीव्रता के एक चुम्बकीय क्षेत्र में 0.45 m त्रिज्या के वृत्ताकार मार्ग पर गति करता है।

(i) कण की चाल

(ii) आवर्तकाल

(iii) आवृत्ति की गणना कीजिये (प्रोटोन का द्रव्यमान = 1.67 x 10-27 Kg)

हल : (i) V = 2.58 x 108 ms-1

(ii) आवर्तकाल T = 2πr/v

T = 1.095 x 10-8 second

(iii) कण की आवृत्ति n = 1/T

n = 9.13 x 107 Hz

साइक्लोट्रॉन क्या है , परिभाषा , साइक्लोट्रोन सिद्धान्त , रचना चित्र , कार्यविधि cyclotron in hindi सीमाएं

cyclotron in hindi साइक्लोट्रॉन क्या है , परिभाषा , साइक्लोट्रोन सिद्धान्त , रचना चित्र , कार्यविधि किसे कहते है ? क्या काम आता है ? साइक्लोट्रॉन की सीमाएं इलेक्ट्रॉन साइक्लोट्रोन अनुनाद परिभाषा |

साइक्लोट्रॉन (cyclotron) : साइक्लोट्रोन एक ऐसी युक्ति है जिसका उपयोग आवेशित कणो या आयनों को उच्च वेगों में त्वरित करने में किया जाता है या आवेशित कणो को उच्च ऊर्जा तक त्वरित करने करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
इसकी खोज सन 1934 में ..लॉरेन्ज एम.एस.लिविंस्टन ने की थी , ..लॉरेन्ज एम.एस.लिविंस्टन को नाभिकीय संरचना पर शोध करते हुए आवश्यक ऊर्जा के आवेशित कण की आवश्यकता पड़ी और उन्होंने अपनी इस  आवश्यक ऊर्जा के आवेशित कण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए साइक्लोट्रॉन का निजात किया।

सिद्धान्त (principle)

साइक्लोट्रॉन इस सिद्धांत कर कार्य करता है की जब किसी धनावेशित कण को उच्च आवृति वाले विद्युत क्षेत्र में प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र का उपयोग करते हुए बार बार गति करवाई जाए तो आवेशित कण त्वरित हो जाता है तथा इसकी ऊर्जा बहुत अधिक बढ़ जाती है।

रचना (Construction)

साइक्लोट्रॉन में दो D आकृति के खोखले धातु के पात्र लगे होते है इन्हे डीज (dees) कहते है हमने चित्र में इन्हे D1 तथा D2 नाम से दिखाया है।
दोनों डीज एक दूसरे के अल्प दुरी पर स्थित होती है , दोनों dees के मध्य उच्च आवृत्ति का प्रत्यावर्ती विभवांतर उत्पन्न करने के लिए दोनों को A.C स्रोत से जोड़ा जाता है इससे दोनों डीज के मध्य उच्च आवृति का विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
धनावेशित कण को दोनों डीज के मध्य में अल्प स्थान में रखा जाता है जहां हमने उच्च आवृत्ति का विद्युत क्षेत्र उत्पन्न किया है तथा इस सम्पूर्ण व्यवस्था को दो प्रबल चुम्बकों के मध्य में रखा जाता है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।

कार्यप्रणाली (Working)

चूँकि दोनों डीज के मध्य प्रत्यावर्ती विभवान्तर उत्पन्न करने के लिए AC स्रोत लगाया गया है अतः हर आधे चक्कर के बाद डीज की ध्रुवता आपस में बदल जाती है।

माना s पर धनावेशित कण रखा हुआ है , माना प्रारम्भ में डीज D1 धनावेशित है और D2 ऋणावेशित।

अतः s पर रखा धनावेशित कण D2 की तरफ आकर्षित होगा और चूँकि चुम्बकीय क्षेत्र लंबवत लग रहा है अतः यह कण वृत्तीय पथ पर गति करता है।

जैसे ही आधा चक्कर (T/2) पूरा होता है डीज की आपस में ध्रुवता बदल जाती है अब D1 ऋणावेशित हो जाता है तथा D2 धनावेशित हो जाती है।  इस आधे चक्कर में धनावेशित कण की ऊर्जा में qv वृद्धि हो जाती है।

अब धनावेशित कण डीज D1 की तरफ आकर्षित होकर गति करता है जिससे इसकी ऊर्जा qv और वृद्धि हो जाती है।

अतः धनावेशित कण को पूरे 1 चक्कर में T समय लगता है तथा धनावेशित कण की ऊर्जा में 2qV वृद्धि हो जाती है।

यह घटना बार बार दोहराई जाती है जिससे कण की ऊर्जा के साथ वेग बढ़ता जाता है तथा वेग में वृद्धि के कारण उसके वृतीय पथ की त्रिज्या भी बढ़ती जाती है जैसा चित्र में दिखाया गया है।

जब वृत्तीय पथ की त्रिज्या डीज की त्रिज्या के बराबर हो जाती है तो धनावेशित कण साइक्लोट्रॉन में बने द्वार से बाहर निकल जाता है।

प्रत्यावर्ती विभवांतर की आवृत्ति , डीज के अंदर आवेशित कण की परिक्रमा आवृत्ति के बराबर होनी चाहिएइसे साइक्लोट्रॉन अनुनादी स्थिति कहते है।

साइक्लोट्रॉन (cyclotron in hindi) : साइक्लोट्रॉन एक ऐसी युक्ति है जो आवेशित कणों या आयनों को उच्च ऊर्जाओं तक त्वरित करने के लिए प्रयुक्त होती है। इसका आविष्कार . . लोरेन्ज और एम.एस. लिविंग्सटन द्वारा 1934 में नाभिकीय संरचना सम्बन्धित शोध कार्यो में आवश्यक उच्च ऊर्जा वाले आवेशित कणों को प्राप्त करने के लिए किया था।

साइक्लोट्रॉन का सिद्धान्त (principle of cyclotron)

साइक्लोट्रॉन की कार्य प्रणाली इस तथ्य पर आधारित है कि किसी दिए गए चुम्बकीय क्षेत्र में आयन अथवा धनावेश का परिक्रमण काल आयन की चाल और वृत्तीय पथ की त्रिज्या पर निर्भर नहीं करता अर्थात जब किसी धनावेशित कण को उच्च आवृत्ति के विद्युत क्षेत्र में प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र का प्रयोग करते हुए बार बार गति करायी जाती है तो यह त्वरित होने लगता है। और पर्याप्त मात्रा में बहुत अधिक ऊर्जा प्राप्त कर लेता है।

साइक्लोट्रॉन इस सिद्धांत पर कार्य करता है जब किसी गतिमान आवेश को चुम्बकीय और विद्युत दोनों क्षेत्रों में रख दिया जाता है जो एक दुसरे के लम्बवत होते है तो वह लोरेन्ज बल का अनुभव करते है।

Fnet = Fe + Fm

Fnet = qE + q(v x B)

Fnet = q[E + v xB]

साइक्लोट्रॉन का चित्र का संरचना (construction of cyclotron)

यह दो खोखले D आकृति के धात्विक कक्षों का बना होता है जिन्हें डीज (Dees) कहते है। इन डीज के मध्य कुछ अंतराल रखा जाता है जिसमें धनावेशित कणों के स्रोत (S) को रखा जाता है। डीज को उच्च आवृति दोलक से जोड़ा जाता है जो डीज के अंतराल में उच्च आवृत्ति का विद्युत क्षेत्र प्रदान करता है। इस व्यवस्था में प्रबल विद्युत चुम्बक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र अर्द्धचन्द्र के तल के लम्बवत होता है।

साइक्लोट्रॉन की कार्यप्रणाली (working of cyclotron)

साइक्लोट्रोन मशीन के कार्य करने का सिद्धांत ऊपर चित्र में प्रदर्शित है। डीज के बीच रखे गये स्रोत S से उत्पन्न धन आयन उस डीज की तरफ आकर्षित होते है जो उस क्षण ऋण विभव पर होती है। लम्बवत चुम्बकीय क्षेत्र के कारण धन आयन डीज के अन्दर वृत्ताकार पथ पर चलने लगते है। आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र और वोल्टता की रेडियो आवृति को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि जैसे ही आयन डीज से बाहर निकलता है तो डीज की ध्रुवता बदल जाती है। (अर्थात ऋण विभव से धन विभव या धन विभव से ऋण विभव हो जाता है।)

इससे आयन पुनः त्वरित होता। जैसे जैसे आयन का वेग बढ़ता है उसके पथ की त्रिज्या भी बढती जाती है। यह घटना बार बार दोहराई जाती है जब तक कि आयन डीज की परिधि पर नहीं पहुँच जाता है , जहाँ एक विक्षेपक प्लेट लगी रहती है जो आयन को उस लक्ष्य की तरफ विक्षेपित कर देती है , जिससे आयन को टकराना है।

अनुनादी प्रतिबन्ध (resonance condition in cyclotron)

साइक्लोट्रॉन के  कार्य करने का प्रतिबन्ध यह है कि रेडियो आवृत्ति प्रत्यावर्ती विभवान्तर की आवृति , डीज के अन्दर आवेशित कण की परिक्रमण आवृत्ति के बराबर होनी चाहिए। इस प्रतिबन्ध को अनुनादी प्रतिबन्ध कहते है।

जब कोई प्रोटोन (या अन्य धनावेशित कण) अर्द्ध चन्द्र में चुम्बकीय क्षेत्र (B) के लम्बवत गति करता है तो इस पर कार्यरत लोरेन्ज बल

F = qvBsin90 = qvB

यहाँ q आवेशित कण का आवेश है।

यही बल r त्रिज्या के वृत्तीय पथ के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल mv2/r प्रदान करता है।

अत: qvB = mv2/r या r = mv/qB  . . . . . . . . . . समीकरण-1

अर्द्धचन्द्र में कण द्वारा अर्द्धवृत्त पूर्ण करने में लगा समय

t = πr/v = (π/v) x (mv/qB)

या

t = πm/qB . . . . . . . . . . समीकरण-2

स्पष्ट है कि धनावेशित कण द्वारा अर्द्ध वृत्त पूर्ण करने में लगा समय समान होता है और त्रिज्या पर निर्भर नहीं करता है।

(i) आवर्तकाल (time period) : माना प्रत्यावर्ती विद्युत क्षेत्र का आवर्तकाल T है तो अर्द्धचन्द्रों की ध्रुवता T/2 समय के पश्चात् परिवर्तित होगी। यदि कण द्वारा अर्द्धवृत्त पूर्ण करने में लगा समय T/2 के बराबर होगा तो कण त्वरित होगा अर्थात

T/2 = t = πm/qB या T = 2πm/qB   . . . . . . . . . समीकरण-3

(ii) साइक्लोट्रॉन आवृत्ति (cyclotron frequency) : साइक्लोट्रॉन की आवृति यदि n है तो

n = 1/T = qB/2πm

या

n = qB/2πm . . . . . . . . . समीकरण-4

तथा साइक्लोट्रोन की कोणीय आवृत्ति

w = 2πn = 2π x qB/2πm = qB/m

या

w = qB/m . . . . . . . . . समीकरण-5

(iii) प्राप्त ऊर्जा (energy gained by cyclotron) : धनावेशित कण द्वारा प्राप्त ऊर्जा

E = mv2/2

समीकरण-1 से

V = qBr/m

अत: E = m x q2B2r2/2m2

या

E = q2B2r2/2m   . . . . . . . . समीकरण-6

अत: धनावेशित कण द्वारा प्राप्त की गयी अधिकतम ऊर्जा

Emax = (q2B2/2m)rmax2

अत: जब आवेशित कण अर्द्धचन्द्र की परिधि पर होगा (जहाँ त्रिज्या अधिकतम है) तो वह अधिकतम ऊर्जा ग्रहण कर चूका होगा।

साइक्लोट्रॉन की सीमाएं (limitations of cyclotron in hindi)

1.     साइक्लोट्रॉन अनावेशित कणों (जैसे न्यूट्रोन ) को त्वरित नहीं कर सकता है।

2.     साइक्लोट्रॉन इलेक्ट्रॉनों को त्वरित नहीं कर सकता क्योंकि उनका द्रव्यमान बहुत कम होता है। अतसाइक्लोट्रॉन में निम्न ऊर्जा ग्रहण करने पर भी वे बहुत अधिक वेग से गति करते है।

3.     साइक्लोट्रॉन से निकलने वाले आवेशित कणों की ऊर्जा सीमित होती है क्योंकि वेग के साथ साथ कण के द्रव्यमान में परिवर्तन निम्नलिखित प्रकार होता है

m = m0/ √(1 – v2/c2)

यहाँ m0 = कण का विराम द्रव्यमान ,

m  = गतिक द्रव्यमान ,

v = कण का वेग ,

c = प्रकाश की चाल (3 x 108 ms-1)

अत: आवेशित कण की परिक्रमण आवृति

n = qB/2πm = qB√(1 – v2/c2)/2πm0

स्पष्ट है कि वेग v के बढ़ने से कण की परिक्रमण आवृत्ति घटती है। इससे यह अर्द्ध वृत्ताकार पथ तय करने में अधिक समय लेता है और प्रत्यावर्ती विभवान्तर से कला में पीछे होता चला जाता है तथा एक स्थिति ऐसी जाती है कि वह और अधिक त्वरित नहीं हो सकता है। फलस्वरूप कण की अधिकतम ऊर्जा सिमित रहती है। इसी कारण सिंक्रोट्रॉन जैसी दूसरी त्वरण मशीनों का विकास किया गया है।

नोट :

§  विद्युत क्षेत्र का कार्य धनावेश को त्वरित करना होता है।

§  चुम्बकीय क्षेत्र का कार्य धनावेश को वृत्तीय गति प्रदान करना होता है।

प्रश्न : साइक्लोट्रॉन की दोलित्र आवृत्ति 10 MHz है। प्रोटोनों को त्वरित करने के लिए प्रचालन चुम्बकीय क्षेत्र का मान कितना होना चाहिए ? यदि डीज की त्रिज्या 60 सेंटीमीटर है तो त्वरक द्वारा उत्पन्न प्रोटोन पुंज की गतिज ऊर्जा MeV में परिकलित कीजिये।

हल : दोलित्र आवृत्ति प्रोटोन के साइक्लोट्रॉन की आवृति के बराबर होनी चाहिए।

अत: n == qB/2πm

B = n x 2πm/qमान रखकर हल करने पर

B = 6.55 x 10-1 = 0.655 = 0.66T

प्रोटोन पुंज की गतिज ऊर्जा

E = q2B2r2/2m

मान रखकर हल करने पर

E = 7.5 Mev

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