physics12th chapter-1 वैधुत आवेश तथा विधुत क्षेत्र(part-2)

 बहुल आवेशों के मध्य बल एवं अध्यारोपण का सिद्धान्त superposition principle of coulomb’s law in hindi

(force among many charges and superposition principal in hindi ) बहुल आवेशों के मध्य बल एवं अध्यारोपण का सिद्धान्त कूलाम नियम के लिए अध्यारोपण का सिद्धांत (superposition principle of coulomb’s law in hindi) :

हमने अब तक की चर्चा में चाहे वह कूलॉम का नियम हो या अन्य जैसे कूलॉम के नियम का सदिश निरूपण ,  इत्यादि में हमने केवल दो आवेशों पर बात की अर्थात हमने सिर्फ दो आवेशों q& q2 को ध्यान में रखकर अध्ययन किया।  लेकिन हमने आवेश के गुणों में यह पढ़ा था की दो आवेशों के मध्य लगने वाला बल चाहें वह आकर्षण का हो या प्रतिकर्षण का , अन्य आवेशों की उपस्थिति से अप्रभावित रहता है।

मान लीजिये किसी स्थिर बिंदु आवेश के आस पास बहुत सारे आवेश उपस्थित है , प्रत्येक आवेश के कारण स्थिर बिंदु आवेश कुछ कुछ बल महसूस करेगा।

अगर स्थिर बिंदु आवेश पर परिणामी बल ज्ञात करने के लिए अध्यारोपण के सिद्धान्त का उपयोग किया जाता है। अध्यारोपण का सिद्धान्त यह कहता है की किसी स्थिर बिंदु आवेश पर अन्य आवेशों (स्थिर ) के कारण लगने वाला परिणामी बल उस आवेश पर लगने वाले सभी बलों के सदिश योग के बराबर होता है।

माना n आवेश q, q2 , q3 , q4 …………qn उपस्थित है , कूलॉम के नियमानुसार प्रत्येक आवेश एक दूसरे पर बल आरोपित करेगा।

माना q1 पर q2 , q3 , q4 …………qद्वारा आरोपित बल है। F12 , F13 , F14 ……..F1n है।

अतः अध्यारोपण के सिद्धान्त के अनुसार q पर आरोपित परिणामी बल सभी आवेशों द्वारा आरोपित बल के सदिश योग के बराबर होगा।

अतः

अध्यारोपण का सिद्धान्त (principle of superposition in hindi) : स्थिर वैद्युत बल दो वस्तुओं के बीच अन्योन्य बल है अर्थात दो बिन्दुवत आवेशों के मध्य लगने वाला बल अन्य आवेशों की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर नहीं करता है। इसलिए अध्यारोपण का सिद्धांत लागू होता है अर्थात निकाय के कारण किसी एक आवेश पर बल व्यक्तिगत आवेशों के कारण लगे बलों का परिणामी होता है अर्थात अनेकों आवेशों के कारण एक बिंदुवत परिक्षण आवेश पर बल F = F1 + F2 + F3 + F4 + . . . . . द्वारा दिया जाता है।

कूलाम नियम के लिए अध्यारोपण का सिद्धांत (superposition principle of coulomb’s law in hindi)

इस सिद्धान्त को बहुल आवेशों के मध्य बल के नाम से भी जाना जाता है।

दो बिन्दु आवेशो के मध्य पारस्परिक विद्युत बल कुलाम के नियम द्वारा प्राप्त होता है। जब आवेशो का एक समूह किसी आवेश पर बल लगाता है तो अध्यारोपण का सिद्धांत उस आवेश पर लगने वाले बल को प्रदान करता है।

अध्यारोपण के सिद्धांत के अनुसार जब कई आवेश किसी आवेश विशेष पर बल लगाते है तो उस आवेश पर लगने वाला परिणामी बल उन सभी बलों का सदिश योग होता है जो वे सभी आवेश अलग अलग उस आवेश पर बल लगाते है। किसी एक आवेश द्वारा लगाया गया विशिष्ट बल अन्य आवेशो की उपस्थिति के कारण प्रभावित नहीं होता।

किन्ही दो आवेशों के मध्य लगने वाला बल अन्य आवेशों की उपस्थिति से प्रभावित नहीं होता है।

माना n बिंदु आवेशों का समूह क्रमशः q1 , q2 , q3 , q. . . . . . qn आकाश में वितरित है। सभी आवेश एक दुसरे पर बल लगाते है। माना q2 , q3 , q. . . . . . qn आवेशों द्वारा आवेश q1 पर आरोपित बल क्रमशः F12 , F13 , F14 , . . . . . F1n है तो अध्यारोपण के सिद्धांत के अनुसार आवेश q1 पर लगने वाला परिणामी बल निम्न समीकरण से प्राप्त होगा

 F1 = F12 + F13 + F14 + . . . . .+  F1n

विद्युत क्षेत्र की परिभाषा क्या है , विधुत क्षेत्र electric field in hindi , विधुत क्षेत्र का SI मात्रक क्या है , विमीय सूत्र

विधुत क्षेत्र का SI मात्रक क्या है , विमीय सूत्र , electric field in hindi विद्युत क्षेत्र की परिभाषा क्या है , विधुत क्षेत्र किसे कहते है ?

परिभाषा :  जब दो बिंदु आवेशों को आपस में पास लाया जाता है तो वे एक दूसरे पर विद्युत बल आरोपित करते है , यह बल प्रतिकर्षण या आकर्षण का हो सकता है इसे कूलॉम के नियम द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।

ठीक इसी प्रकार यदि आवेशों का निकाय उपस्थित है और हमें बहुत सारे आवेशों के कारण किसी स्थित बिंदु आवेश पर परिणामी बल ज्ञात करना चाहते है तो इसके लिए हम कूलॉम का अध्यारोपण का सिद्धान्त काम में लेते है।

अगर आपने ध्यान दिया हो तो दोनों ही स्थितियों में आवेश एक दूसरे को स्पर्श नहीं कर रहे है जिससे यह प्रश्न उजागर होता है की बिना स्पर्श किये आवेशों को एक दूसरे की उपस्थिति या अनुपस्थिति का कैसे पता चलता है।

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए विद्युत क्षेत्र अवधारणा दी गई।

इस विद्युत क्षेत्र अवधारणा में यह कल्पना की जाती है की प्रत्येक आवेश अपने चारों ओर एक क्षेत्र उत्पन्न करता है , जब आवेश के द्वारा उत्पन्न क्षेत्र में कोई अन्य आवेश रखा जाता है तो प्रथम आवेश दूसरे आवेश पर एक क्रिया करता है जिससे दूसरा आवेश प्रथम आवेश की उपस्थिति को अनुभव करता है।

परिभाषा :

अतः हम सीधे शब्दों में यह कह सकते है की विद्युत आवेश या आवेशों के निकाय के चारो ओर का वह क्षेत्र जिसमे कोई दूसरा आवेशित कण आकर्षण या प्रतिकर्षण बल महसूस करता है उस क्षेत्र को विद्युत क्षेत्र कहते है।

जब भी आवेश या कण किसी भी विद्युत क्षेत्र में तब कहा जाता है जब वह विद्युत बल का अनुभव करता है।

अर्थात वैधुत क्षेत्र किसी भी आवेश या आवेशों के निकाय द्वारा उत्पन्न वह क्षेत्र है जहाँ तक वह अन्य आवेश पर वैधुत बल लगा सकता है।

विद्युत क्षेत्र की अभिधारणा सबसे पहले फैराडे ने दी थी , यह एक सदिश राशि है तथा गणितीय रूप में इसे विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के रूप में समझाया जाता है।

आधुनिक इलेक्ट्रॉन सिद्धांत : इसे मॉडर्न इलेक्ट्रान थ्योरी भी कहा जाता है। इस सिद्धांत का विकास जेजे थोमसन , अर्नेस्ट रदरफोर्ड , नील्स बोर आदि वैज्ञानिको के दिए हुए इससे पहले विभिन्न सिद्धांतो के कारण हुआ है। आधुनिक इलेक्ट्रॉन सिद्धांत के अनुसार जब दो वस्तुएं आपस में रगड़ी जाती है तो उनमे से एक वस्तु के परमाणुओं की बाहरी कक्षा से भ्रमण कर रहे इलेक्ट्रॉन निकलकर दूसरी वस्तु के परमाणुओं में चले जाते है और इस कारण पहली वस्तु के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है और दूसरी वस्तु के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन की वृद्धि हो जाती है अत: पहली वस्तु धन आवेशित और दूसरी वस्तु ऋण आवेशित हो जाती है।

अर्थात पहली वस्तु पर इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है इसलिए वह धनावेशित हो जाती है और दूसरी वस्तु पर इलेक्ट्रॉन की अधिकता हो जाती है इसलिए वह ऋण आवेशित हो जाती है।

इसी को वस्तु के आवेशित होने के कारण माना जाता है।

विद्युत क्षेत्र : किसी जगह विद्युत से आविष्ट वस्तु अगर रहती है तो उस विद्युत का प्रभाव उसके चारों ओर सिमित क्षेत्र पर पड़ता है। इसी क्षेत्र को ही विद्युत क्षेत्र कहते है। सिद्धांत के अनुसार यह विद्युत क्षेत्र अन्नत दूरी तक फैला हुआ होना चाहिए परन्तु व्यवहारिक रूप से ऐसा देखने को नहीं मिल पाता है।

विद्युत बल रेखाएं : विद्युत बल रेखा वह पथ होता है जिस पर एक स्वतंत्र धन आवेश चलता या चलने की प्रवृत्ति रखता है।

अत: हम कह सकते है कि विद्युत बल रेखा वह वक्र होता है जिसके किसी भी बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा को बताती है। ये विद्युत बल रेखाएँ केवल एक समतल में होकर माध्यम में प्रत्येक दिशा में होती है।

विद्युत क्षेत्र की परिभाषा : किसी आवेश या आवेशो के समूह के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ तक उसके विद्युत् प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है अर्थात जहाँ तक वह आवेश या आवेशो का समूह किसी अन्य आवेश पर विद्युत बल लगा सकता है , उस आवेश अथवा आवेश समूह का विद्युत क्षेत्र कहलाता है। यह एक सदिश राशि है तथा विद्युत क्षेत्र की दिशा धन परिक्षण आवेश (+q0पर लगने वाले बल की दिशा से व्यक्त होती है। विद्युत क्षेत्र वैद्युत बल रेखाओ द्वारा व्यक्त किया जाता है।

यदि किसी बिंदु पर धन परिक्षण आवेश (+q0कोई बल अनुभव नहीं करता है तो उस बिन्दु पर अन्य किसी आवेश द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र शून्य होगा।

विद्युत क्षेत्र की अभिधारणा सर्वप्रथम फैराडे ने प्रस्तुत की थी।

आवेश Q जो विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है , उसे स्रोत आवेश कहा जाता है तथा धन परिक्षण आवेश (+q0) , जो स्रोत आवेश Q के प्रभाव का परिक्षण करता है , उसे परिक्षण आवेश कहते है।

स्रोत आवेश केवल एक आवेश हो सकता है आवेश समूह भी हो सकता है।

electric field in hindi : दो आवेशों के मध्य किसी दूरी पर क्रिया अर्थात बिना सम्पर्क के बल की व्याख्या करने के लिए हम जानते है कि आवेश या आवेश वितरण के चारों ओर आकाश में एक क्षेत्र उत्पन्न होता है। किसी आवेश या आवेश वितरण के चारों ओर वैद्युत बल उत्पन्न होने की घटना को हम दिए गए आवेश का विद्युत क्षेत्र कहते है। आवेश के कारण किसी बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र एक स्थिति में सदिश फलन E जिसे विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते है या स्थिति के अदिश फलन V जिसे विद्युत विभव कहा जाता हैविद्युत विभव को V द्वारा व्यक्त किया जाता है। आकाश के किसी विशिष्ट भाग में विद्युत क्षेत्र ग्राफीय रूप से विद्युत बल रेखाओं द्वारा भी व्यक्त किया जाता है अत: विद्युत तीव्रता , विभव और विद्युत बल रेखाएँ एक ही क्षेत्र को व्यक्त करने के भिन्न भिन्न तरीके है।

विद्युत क्षेत्र – किसी जगह विद्युत से आविष्ट वस्तु अगर रहती है, तो उसका प्रभाव उसके चारों ओर सीमित क्षेत्र पर पड़ता है। सही क्षेत्र को विद्युत क्षेत्र कहते है। सिद्धान्ततः यह क्षेत्र अनन्त दूरी तक फैला हुआ होना चाहिए, परन्तु व्यवहार मे ऐसा नहीं पाया जाता है।

विद्युत बल सेवा- विद्युत बल रेखा वह पथ है, जिस पर एक स्वतंत्र धन आवेश चलता है या चलने की प्रवृत्ति रखता है। अतः विद्युत बल रेखा वह वक्र है, जिसके किसी भी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बन्दु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा बताती है। ये बल रेखाएँ केवल एक समतल मे होकर माध्यम में प्रत्येक दिशा में होती है।

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता क्या है electric field intensity in hindi , विधुत क्षेत्र की तीव्रता का SI मात्रक , विमीय सूत्र

 (intensity of electric field in hindi) विद्युत क्षेत्र की तीव्रता : हमें पढ़ा की प्रत्येक आवेश या आवेशों का निकाय एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते है , अब हम बात करते है की विद्युत क्षेत्र की तीव्रता क्या है और इसे कैसे ज्ञात किया जाता है।

परिभाषा :

किसी विद्युत क्षेत्र में स्थित किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता उस बिंदु पर रखे गए इकाई धन परिक्षण आवेश पर लगने वाले बल के बराबर होती है।

अर्थात अगर विद्युत क्षेत्र में किसी बिंदु पर अगर हमें विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है तो उस बिंदु पर एक इकाई धन परीक्षण आवेश (q0) मानकर उस पर बल ज्ञात किया जाता है और इकाई धन परिक्षण आवेश पर बल को ही उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते है।

विद्युत क्षेत्र की दिशा इकाई धन परिक्षण आवेश पर लगने वाले परिणामी बल की दिशा में ही होती है।

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता एक सदिश राशि है इसे E से  दर्शाया जाता है।

तथा इकाई धन परिक्षण आवेश अत्यन्त अल्प धन आवेश होता है जिसका विद्युत क्षेत्र नगण्य या नहीं होता है अर्थात इसको किसी अन्य आवेश के विद्युत क्षेत्र में रखने पर अन्य आवेश के विद्युत क्षेत्र में परिवर्तन नहीं आता है।

माना किसी विद्युत क्षेत्र में धन परिक्षण आवेश (q0) रखने पर इस पर लगने वाला बल F है तो विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E को निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते है। E=F/q

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की धन परिक्षण आवेश (q0) का मान अत्यन्त अल्प होना चाहिए जिससे यह विद्युत क्षेत्र की तीव्रता को प्रभावित न। करे

विद्युत क्षेत्र की इकाई N/C या V/m होती है।

तथा इसका विमीय सूत्र (विमा)

[M1L1T-3A-1]

यदि विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E में रखे आवेशपर बल ज्ञात करना हो तो निम्न सूत्र की सहायता से ज्ञात कर सकते है। 

विद्युत क्षेत्र की दिशा (direction of electric field )

यदि कण धनावेशित है तो बल दिशा विद्युत क्षेत्र की दिशा में होगी तथा यदि कण ऋणात्मक है तो बल की दिशा विद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में होगी। 

धनात्मक स्रोत बिंदु से सम आवेशित गोलाकार आवेश वितरण के कारण विद्युत क्षेत्र आवेश से बाहर की तरफ तथा ऋणात्मक स्रोत आवेश के गोलाकार आवेश वितरण के कारण विद्युत क्षेत्र की दिशा अंदर की तरफ होती है।



 

विद्युत क्षेत्र की तीव्रतामाना किसी विद्युत क्षेत्र में किसी बिंदु पर धन परिक्षण आवेश (+q0) पर लगने वाला विद्युत बल F है तो उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E की परिभाषा निम्न प्रकार से दी जाती है – 

E = F/+q0

परिभाषा : किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता उस बिंदु पर स्थित आवेश पर लगने वाले बल और आवेश के अनुपात के बराबर होती है।

विद्युत क्षेत्र की दिशा धन आवेश से दूर की तरफ होती है और ऋण आवेश की तरफ होती है।

यदि +q0 = 1C तो E =  F/+q0

E =  F/1

अत: E = F

अर्थात किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता उस बल के तुल्य होती है जो उस बिंदु पर एकांक धन आवेश पर कार्य करता है।

E =  F/+q0

या 

E =  F/q

या

F = Eq

अर्थात यदि कोई आवेश किसी विद्युत क्षेत्र में रखा हुआ है तो उस पर एक F बल कार्य करता है जिसका मान F = Eq  होगा। यह बल धन आवेश पर विद्युत क्षेत्र की दिशा में होता है और ऋण आवेश पर यह बल विद्युत क्षेत्र की विपरीत दिशा में कार्य करता है।

विद्युत क्षेत्र का मात्रक :  E = F/+q0

E का मात्रक = न्यूटन/कूलाम 

न्यूटन.कुलाम-1 या NC-1

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता की परिभाषा (electric field intensity definition in hindi) : किसी विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर विधुत क्षेत्र की तीव्रता उस बिन्दु पर रखे गए एकांक परिक्षण  धन आवेश पर लगने वाले बल के तुल्य होती है। परिक्षण आवेश इस प्रकार रखा जाता है कि मूल आवेश वितरण अप्रभावित रहे।

यदि विद्युत क्षेत्र में बिंदु P पर स्थित परिक्षण आवेश q0 पर लगने वाला बल F है तो विद्युत क्षेत्र E = F/+q0

यदि बिंदु आवेश q के कारण क्षेत्र उत्पन्न हुआ है तो कुलाम के नियम से F = kqq0/r2 मुक्त आकाश में बिन्दु आवेश q के कारण

E = F/+q0

चूँकि F = kqq0/r2

मान रखकर हल करने पर

E = kq/r2

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता की परिभाषा से E = F/+q0  या F =  +q0E

विद्युत क्षेत्र में स्थिर या गतिशील आवेशित कण पर विद्युत बल लगता है यदि आवेश धनात्मक है तो इस पर बल , क्षेत्र की दिशा में और ऋणात्मक है तो क्षेत्र के विपरीत दिशा में बल लगता है।

यह एक सदिश राशि है जिसकी विमा = E = F/q = MLT-2/AT = M1L1T-3A-1

विद्युत क्षेत्र की SI इकाई न्यूटन/कूलाम या वोल्ट/मीटर होती है।

मुक्त आकाश में विद्युत क्षेत्र :

E0 = q/4π0 r2

 पैराविद्युतांक के माध्यम में क्षेत्र की तीव्रता E = q/4π r2

 अत: E/E0/  = 1/K

या

E = E0/K

पैरावैद्युत माध्यम की उपस्थिति में विद्युत क्षेत्र कम हो जाता है और मुक्त आकाश की तुलना में 1/K गुना रह जाता है।

बिन्दु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्र electric field due to a point charge in hindi बिंदु आवेश

बिंदु आवेश (electric field due to a point charge in hindi ) बिन्दु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्र  : माना किसी बिन्दु O पर एक +Q आवेश उपस्थित है , O बिंदु से r दूरी पर एक बिन्दु P स्थित है।  P बिंदु पर हमें विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात  करनी है , P बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करने के लिए P बिन्दु पर इकाई धन परिक्षण आवेश +qरखते है।

+q आवेश के कारण P बिंदु पर स्थित धन परिक्षण आवेश q0 पर विद्युत बलकूलॉम का नियम इस्तेमाल करने से )


विद्युत क्षेत्र की परिभाषा से

यहाँ F का मान रखने पर

P बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा OP सदिश होगी , यदि -q हो तो विद्युत क्षेत्र की दिशा विपरीत होगी।

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के ज्ञात सूत्र से हम यह देख सकते है की विद्युत क्षेत्र की तीव्रता दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती है।
अतः विद्युत क्षेत्र की तीव्रता एवं दुरी के मध्य ग्राफ खींचने पर वह निम्न प्रकार प्राप्त होता है।

यदि बिन्दु आवेश ε0 परावैद्युतांक माध्यम में उपस्थित हो तो
अतः विद्युत क्षेत्र की तीव्रता को निम्न प्रकार व्यक्त किया जाता है।

Em= E/ εr
अतः
Em < E
अतः हम यह कह सकते है की परावैद्युतांक माध्यम में विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मान निर्वात में उपस्थित विद्युत क्षेत्र की तीव्रता की अपेक्षा εr गुना कम होता है।

विद्युत बल रेखायें (ELOF) : विद्युत क्षेत्र में बल रेखाये, काल्पनिक रेखायें होती है। इस प्रदर्शित करने वाली रेखा पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

इसके गुण

§  बल रेखायें धनावेश से बाहर की ओर निकलती है तथा एक ऋणावेश पर समाप्त होती है। यदि केवल एक धनावेश है तो बल रेखायें धनावेश से निकलकर अनंत पर जाती है और केवल एक ऋणावेश है तो बल रेखायें अनंत से प्रारम्भ होकर ऋणावेश पर मिलती है।

§  दो बल रेखायें आपस में कभी एक दुसरे को नहीं कटती है क्योंकि किसी एक बिन्दु पर E की दो दिशा सम्भव नहीं हो सकती है।

§  स्थिर आवेश द्वारा बनने वाली विद्युत बल रेखायें , बंद लूप का निर्माण नहीं करते है। यदि बल रेखायें किसी बंद लूप का निर्माण करती है तब +q आवेश को लूप के अनुदिश गति कराने पर किया कार्य अशून्य होगा। अत: यह संरक्षित क्षेत्र नहीं है अत: इस तरह की बल रेखायें सम्भव नहीं है।

§  एकांक क्षेत्र फलन से गुजरने वाली रेखाओ की संख्या (रेखा घनत्व) विद्युत क्षेत्र के परिमाण को दर्शाता है।

§  यदि रेखायें सघन है => तो E अधिक होगा

§  यदि रेखायें विरल है => तो E कम होगा

§  और यदि E = 0 है तब कोई भी बल रेखा प्राप्त नहीं होगी

§  निकलने वाली या समाप्त होने वाली रेखाओं की संख्या , आवेश के समानुपाती होती है। +3q के आवेश से निकलने वाली कुल रेखाओं की संख्या = 9 है , -q पर समाप्त होने वाली कुल बल रेखायें = 3

§  विद्युत बल रेखाओं का प्रारंभ या अंत , चालक की सतह के लम्बवत होता है |

§  विधुत बल रेखायें कभी भी चालक में प्रवेश नहीं करती है |

 

आवेशों के निकाय के कारण विद्युत क्षेत्र electric field due to a system of charges , due to multiple charges in hindi

अनेक या कई (electric field due to a system of charges in hindi ) आवेशों के निकाय के कारण विद्युत क्षेत्र due to multiple charges in hindi : हम पिछले टॉपिक में सिर्फ एक आवेश को ध्यान में रखकर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात की।

अब हम बात करते है जब बहुत सारे आवेश उपस्थित हो और उन सब आवेशों के कारण किसी बिन्दु पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करेंगे।

आवेशों के निकाय के कारण किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करने के लिए जिस सिद्धांत का उपयोग किया जाता है उसे विद्युत क्षेत्र का अध्यारोपण का सिद्धान्त कहते है।

विद्युत क्षेत्र के अध्यारोपण के सिद्धान्त के अनुसारकिसी बिन्दु पर आवेशों के समूह के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता उस बिंदु पर सभी आवेशों के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के सदिश योग के बराबर होती है

माना एक आवेशों का निकाय है जिसमे q, q2 , q3 ……qn बिंदु आवेश उपस्थित है , इन आवेशों के कारण P बिंदु पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता क्रमशः E1 , E2 , E3……. En है तो सभी आवेशों के कारण बिन्दु P पर कुल विद्युत क्षेत्र की तीव्रता सभी के सदिश योग के बराबर होगी।

प्रश्न : यदि आवेश q से निकलने वाली विद्युत क्षेत्र बल रेखाओं की संख्या 10 है तो आवेश 2q से निकलने वाली बल रेखाओं की संख्या ज्ञात करो ?

उत्तर : विद्युत बल रेखाओं की संख्या  आवेश

10 q

20 2q

इसलिए आवेश 2q से निकलने वाली बल रेखाओं की संख्या 20 होगी।

प्रश्न : यदि किसी आवेश को विद्युत क्षेत्र में छोड़ा जाता है तो , क्या यह बल रेखाओं का अनुसरण करेगा ?

उत्तरस्थिति-1 : यदि आवेश के विद्युत बल रेखायें समान्तर है तो इस प्रकार के विद्युत क्षेत्र में यदि आवेश को छोड़ा जाता है तब इस पर लगने वाला बल q0होगा एवं इसकी दिशा E के अनुदिश होगी अत: आवेश सरल रेखा में बल रेखाओं के अनुदिश गति करेगा।

स्थिति-2 : यदि बल रेखाएं वक्र है तो , आवेश बल रेखाओं का अनुसरण नहीं करेगा।

प्रश्न : एक द्विध्रुव दो बिंदु आवेश जिनका आवेश -q और +q है और प्रत्येक का द्रव्यमान m1 है से बना है। दोनों बिंदु आवेश l लम्बाई एवं m1 द्रव्यमान की छड से जुड़े हुए है। यह द्विध्रुव समान विद्युत क्षेत्र E में रखा है। यदि द्विध्रुव को स्थायी साम्यावस्था से θ कोण से विक्षेपित किया जाता है तो सिद्ध करो कि इसकी गति लगभग S.H.M. होगी। इसका कालांतर भी ज्ञात करो ?

उत्तर : यदि द्विध्रुव को θ कोण से विक्षेपित करे तब

τnet = -PEsinθ (यहाँ ऋणात्मक चिन्ह यह दर्शाता है कि बलाघूर्ण θ के विपरीत है )

यदि θ बहुत छोटा है तो sinθ = θ

τnet = -PEθ

τnet  (-θ)

अत: , गति सरल आवर्त गति है।

T = 2π√I/K

प्रश्न : एक चालक को आवेश देने पर आवेश उसके पृष्ठ पर फ़ैल जाता है , ऐसा क्यों होता है ?

उत्तर : मुक्त आवेश प्रतिकर्षण के कारण अधिकतम दूरी अर्थात न्यूनतम ऊर्जा की स्थिति में रहते है इसलिए चालक को दिया गया आवेश उसके पृष्ठ पर फ़ैल जाता है।

प्रश्न : किसी यादृच्छिक स्थिर विद्युत क्षेत्र विन्यास पर विचार कीजिये। इस विन्यास की किसी शून्य विक्षेप स्थिति अर्थात जहाँ E = 0 पर कोई छोटा परिक्षण आवेश रखा गया है। यह दर्शाइए कि परिक्षण आवेश का संतुलन आवश्यक रूप से अस्थायी है।

उत्तर : माना शून्य विक्षेप स्थिति में रखे परिक्षण आवेश का संतुलन स्थायी है। अब यदि परिक्षण आवेश को संतुलन स्थिति से थोडा सा विस्थापित किया जाए तो परिक्षण आवेश पर एक प्रत्यानयन बल लगना चाहिए जो उसे वापस संतुलन स्थिति की ओर ले जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि उस स्थान पर शून्य विक्षेप बिंदु की ओर जाने वाली क्षेत्र रेखाएँ होनी चाहिए जबकि स्थिर विद्युत क्षेत्र रेखाएँ कभी भी शून्य विक्षेप बिन्दु तक नहीं पहुँचती। अत: हमारी यह परिकल्पना कि परिक्षण आवेश का सन्तुलन स्थायी है , गलत है। यह निश्चित रूप से अस्थायी संतुलन है।

 

विद्युत क्षेत्र रेखाएँ क्या है , परिभाषा रेखाओं गुण धर्म या विशेषताएं electric field lines of force in hindi ,

विद्युत क्षेत्र रेखाएँ (electric field lines in hindi) : हमने बात की थी की प्रत्येक आवेश अपने चारो ओर एक क्षेत्र उत्पन्न करता है जिससे वह अन्य आवेश की उपस्थिति तथा अनुपस्थिति महसूस करता है इस क्षेत्र को हमने विद्युत क्षेत्र कहा था।
यदि विद्युत क्षेत्र को ग्राफीय रूप में निरूपित किया जावे तो यह कुछ रेखाओं (सतत) के रूप में प्राप्त होता है इस ग्राफीय निरूपण को ही विद्युत क्षेत्र रेखाएँ कहते है।
विद्युत क्षेत्र की परिभाषा :
जब एक धन परिक्षण आवेश को विद्युत क्षेत्र में स्वतंत्रतापूर्वक छोड़ा जाता है तो वह जिस पथ का अनुसरण करता है उसे उस विद्युत क्षेत्र की बल रेखा कहते है।
19
वीं शताब्दी में फैराडे ने विद्युत क्षेत्र रेखाओं की अवधारणा दी थी।

विद्युत क्षेत्र रेखाओ से सम्बन्धित महत्वपूर्ण गुणधर्म या विशेषताएं :

1. विद्युत क्षेत्र रेखा या विद्युत बल रेखा के किसी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा , उस बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करती है।
अर्थात विद्युत क्षेत्र के किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र सदिश की दिशा ज्ञात करने के लिए उस बिन्दु पर निरूपित विद्युत क्षेत्र रेखा पर रेखा खींची जा सकती है और रेखा की परिणामी दिशा , विद्युत क्षेत्र (उस बिंदु पर) की दिशा होगी।
2.
विद्युत बल रेखाएं धनावेश से शुरू होकर ऋणावेश पर समाप्त हो जाती है।

3. एकल आवेश (एक ही आवेश) उपस्थित है तो क्षेत्र रेखाएं अनंत से शुरू होती है और अनन्त पर ही समाप्त होती हुई प्रतीत होती है।
4.
एक विलगित धनावेश के कारण विद्युत क्षेत्र रेखाएँ त्रिज्यत बाहर की तरफ तथा ऋणावेश के कारण क्षेत्र रेखाएं त्रिज्यत अंतर की तरफ होती है।
5.
दो विद्युत क्षेत्र रेखा कभी एक दूसरे को नहीं काटती है क्योंकि यदि ये एक दूसरे को काटे तो कटान बिंदु पर दोनों वक्रों पर खींची गयी स्पर्श रेखा दो परिणामी विद्युत क्षेत्रों को व्यक्त करती है जो की वास्तविकता में सम्भव नहीं है।
अतः दो बल रेखाओ का आपस में कटान संभव नहीं है।
6.
विद्युत बल रेखाएं खुले वक्र के रूप में होती है क्योंकि ये रेखाएं धन आवेश से शुरू होती है तथा ऋण आवेश पर समाप्त होती है।
7.
किसी भी आवेश से शुरू या समाप्त होने वाली बल रेखाओ की संख्या उस आवेश के परिमाण के समानुपाती होती है अर्थात जितनी ज़्यादा रेखाएं उतना ही अधिक परिमाण का आवेश।
8.
किसी स्थान पर विद्युत क्षेत्र के लंबवत रखे एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली बल रेखाओं की संख्या उस स्थान पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के तुल्य (समानुपाती) होती है।  अर्थात क्षेत्र रेखाएं जितनी पास पास होती है क्षेत्र उतना ही अधिक प्रबल होता है और यदि बल रेखाएं दूर दूर है तो विद्युत क्षेत्र दुर्बल है।
9.
एक क्षेत्र रेखा जिस बिंदु आवेश से प्रारम्भ होती है उसी आवेश पर समाप्त नहीं होती है।  विद्युत क्षेत्र रेखाएं कभी भी बंद लूप में नहीं होती।
10.
विद्युत क्षेत्र रेखाएं लम्बाई की दिशा में सिकुड़ने (संकुचित) का प्रयास करती है अतः कह सकते है की विपरीत आवेशों में आकर्षण होता है।
तथा क्षेत्र रेखाएं चौड़ाई की दिशा में फैलने का प्रयास करती है अतः कहा जा सकता है की समान प्रकृति के आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है।

11. विद्युत बल रेखाएं समविभव पृष्ठ (आवेशित चालक) के हमेशा लंबवत होती है।

विद्युत बल रेखाएँ (electric lines of force in hindi) : विद्युत बल रेखाओं की धारणा माइकल फैराडे द्वारा दी गयी थी। विद्युत बल रेखा एक काल्पनिक रेखा होती है जिसके किसी बिन्दु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर क्षेत्र की तीव्रता की दिशा को व्यक्त करती है।

एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली बल रेखाएँ उस बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के परिमाण को व्यक्त करती है।

विधुत बल रेखाओ से सम्बंधित महत्वपूर्ण बिंदु :

1.     विद्युत बल रेखाएँ धनावेश से प्रारंभ होती है या फैलती है और ऋण आवेश पर समाप्त होती है या एकत्रित होती है।

2.     किसी आवेश से उत्पन्न होने वाली बल रेखाएँ उस आवेश के परिमाण के समानुपाती होती है।

3.     SI मात्रक में एक कूलाम आवेश से सम्बद्ध बल रेखाओ की संख्या 1/0 होती है। अत: किसी वस्तु में यदि q आवेश है तो उससे निर्गमित कुल फ्लक्स रेखाएँ q/0 होगी। यदि वस्तु घनाकार है और आवेश इसके केंद्र पर स्थित है तो इसके प्रत्येक फलक से निर्गमित बल रेखाओं की संख्या q/60 होगी।

4.     विद्युत बल रेखायें कभी भी एक दुसरे को नहीं काटती है क्योंकि यदि वे एक दुसरे को कटेगी तो उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की दो दिशाएँ प्रदर्शित करती है तो की असंभव है।

5.     स्थिरवैद्युतिकी में विद्युत बल रेखाएं कभी भी बंद वक्र के रूप में नहीं होती है क्योंकि बल रेखा कभी भी एक ही आवेश से प्रारंभ तथा समाप्त नहीं होती है। यदि बल रेखा बंद वक्र के रूप में होगी तो बंद पथ के अनुदिश किया गया कार्य शून्य नहीं होगा और विद्युत क्षेत्र , संरक्षी क्षेत्र नहीं रहेगा।

6.     विद्युत बल रेखाएं तनी हुई प्रत्यास्थ डोरी की भाँती अनुदैर्ध्य दिशा में संकुचित होने की प्रवृत्ति रखती है। जिससे विपरीत आवेशो के मध्य आकर्षण होता है और पाशर्व में फैलने की प्रवृति होती है। जिससे समान आवेशो के मध्य प्रतिकर्षण होता है एवं आवेशित चालक के किनारों के पास बल रेखाओ के घुमाव (किनारा प्रभाव) होता है।

7.      यदि बल रेखाएँ समान दूरी पर सरल रेखाएँ है तो क्षेत्र समरूप है और यदि बल रेखाएँ समान दूरी पर या सरल रेखाएँ अथवा दोनों ही नहीं है तो क्षेत्र असमरूप होगा।

8.     किसी चालक की सतह से बल रेखाएँ लम्बवत आरम्भ या अंत होती है। यदि कोई बल रेखा चालक की सतह पर अभिलम्बवत नहीं होगी तो चालक की सतह समविभव नहीं होगी जो सम्भव नहीं है क्योंकि स्थिर वैद्युतिकी के अनुसार चालक की सतह समविभव पृष्ठ होती है।

9.     किसी बिंदु पर एकांक क्षेत्रफल से अभिलम्बवत गुजरने वाली बल रेखाओ की संख्या उस बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता को व्यक्त करती है। पास में स्थित अधिक बल रेखाएँ तीव्र क्षेत्र को और दूर स्थित कम बल रेखाएँ क्षीण क्षेत्र की प्रदर्शित करती है।

10.  यदि आकाश के किसी क्षेत्र में कोई विद्युत क्षेत्र नहीं है तो वहाँ बल रेखाएं भी नहीं होंगी। यही कारण है कि किसी चालक के अन्दर या उदासीन बिंदु पर जहाँ विद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होती है। कोई बल रेखा नहीं होती है।

11.  विद्युत बल रेखा के किसी बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता की दिशा को व्यक्त करती है। यह बल की दिशा को व्यक्त करती है अर्थात उस बिंदु पर धनावेश के त्वरण की दिशा को व्यक्त करती है कि गति की दिशा को। गति के लिए स्वतंत्र धनावेश बल रेखा का अनुगमन कर सकता है एवं नहीं भी। यदि बल रेखा , सरल रेखा है तो यह अनुगमन नहीं करेगा क्योंकि वेग और त्वरण एक ही दिशा में होंगे और यदि बल रेखा वक्राकार है तो यह उसका अनुगमन करेगा क्योंकि वेग और त्वरण अलग अलग दिशा में होंगे। कण की गति की दिशा में या त्वरण की दिशा में अर्थात बल रेखा की दिशा में गति नहीं करेगा लेकिन ये समय के साथ v = u + at के अनुसार परिवर्तित होगा।

विद्युत बल रेखाओं की परिभाषा (electric field lines definition in hindi)

विद्युत क्षेत्र में स्वतन्त्रता पूर्वक छोड़ा गया धन परिक्षण आवेश जिस मार्ग का अनुसरण करता है , उस मार्ग को उस क्षेत्र की वैद्युत बल रेखा कहा जाता है। वैद्युत बल रेखाओ की विशेषताएँ निम्न प्रकार है

§  वैद्युत बल रेखाएँ धन आवेश से ऋण आवेश की ओर चलती है।

§  विद्युत बल रेखा के किसी बिंदु पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिंदु पर परिणामी विद्युत क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

§  दो बल रेखाएँ कभी एक दुसरे को नहीं काटती है क्योंकि यदि वे काटेगी तो कटान बिंदु पर दोनों वक्रो पर खिंची गयी स्पर्श रेखाएं दो परिणामी विद्युत क्षेत्र प्रदर्शित करेंगी जो कि संभव नहीं है इसलिए बल रेखाओं का काटना कभी भी संभव नहीं है।

§  विद्युत बल रेखाएं जहाँ से चलती है तथा जहाँ पर मिलती है , दोनों जगह पृष्ठ के लम्बवत होती है।

§  विद्युत बल रेखाएं खुले वक्र के रूप में होती है क्योंकि ये धनावेश से चलकर ऋण आवेश पर समाप्त हो जाती है।

§  किसी स्थान पर विद्युत बल रेखाओ का पृष्ठ घनत्व अर्थात एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली बल रेखाओं की संख्या उस स्थान पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के अनुपात में होता है अर्थात बल रेखाएं जितनी सघन (अधिक) होंगी वहां विद्युत क्षेत्र उतना ही प्रबल होगा। बल रेखाओं की संख्या के पदों में विद्युत क्षेत्र की तीव्रता की परिभाषा को निम्न प्रकार दिया दी जा सकती है

किसी स्थान पर बल रेखाओ की दिशा के लम्बवत एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली बल रेखाओ की संख्या उस स्थान पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता के तुल्य होती है।

§  ये खिंची हुई लचकदार डोरी के समान लम्बाई में सिकुड़ने का प्रयत्न करती है , इसी कारण विपरीत आवेशो में आकर्षण होता है।

§  ये अपनी लम्बाई की लम्ब दिशा में एक दूसरे से दूर रहने का प्रयास करती है अत: समान आवेशो के मध्य प्रतिकर्षण होता है।

विद्युत द्विध्रुव की परिभाषा क्या है electric dipole in hindi , वैद्युत द्विध्रुव किसे कहते है , मात्रक ,आघूर्ण विमा

वैद्युत द्विध्रुव किसे कहते है , मात्रक ,आघूर्ण विमा (electric dipole and dipole moment in hindi) विद्युत द्विध्रुव तथा विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण : जब समान परिमाण के दो आवेशों जो प्रकृति में विपरीत हो अर्थात एक ऋणात्मक तथा दूसरा धनात्मक आवेश को अल्प दूरी पर रखा जाता है तो इस प्रकार के बने निकाय को विद्युत द्विध्रुव कहते है।
माना दो आवेश जिनका परिमाण q है , दोनों विपरीत प्रकृति के है अर्थात एक -q है तथा दूसरा +q है , को अल्प दूरी 2a पर रखा गया है तो चित्रानुसार एक द्विध्रुव का निर्माण करते है।

दोनों आवेश के मध्य बिंदु को द्विध्रुव का केन्द्र कहते है तथा दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा को अक्ष रेखा कहते है।
द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा :
विद्युत द्विध्रुव के किसी भी एक आवेश तथा दोनों आवेशों की मध्य की दूरी के गुणनफल को विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण कहते है।
विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण एक सदिश राशि है।
विद्युत द्विध्रुव में हमने आवेश का परिमाण q तथा दूरी 2a मानी थी अतः द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा के अनुसार



विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण का मात्रक = कुलाम x मीटर = C . m

तथा विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण की विमाM0L1T1Aहोती है।
विद्युत द्विध्रुव के उदाहरण :
HCl
ध्रुवी अणु है जिसमे एक H+ तथा दूसरा Cl आयन परस्पर विद्युत आकर्षण बल से बंधे रहते है , दोनों आवेश के मध्य लगभग 10-11 m  की दूरी होती है जो की अल्प है अतः यह एक विद्युत द्विध्रुव का निर्माण करते है।
इसी प्रकार H2O , NaCl , AgNO3 इत्यादि भी  विद्युत द्विध्रुव के उदाहरण है।
विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत क्षेत्र (electric field due to electric dipole ) :
विद्युत द्विध्रुव के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र प्रत्येक आवेश द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र के सदिश योग के बराबर होता है।
अर्थात अध्यारोपण सिद्धान्त के द्वारा विद्युत द्विध्रुव द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र ज्ञात किया जाता है।
सीधे शब्दों में कहे तो विद्युत क्षेत्र ज्ञात करने के लिए पहले -q द्वारा उत्पन्न विद्युत निकाला जाता है फिर +q द्वारा उत्पन्न क्षेत्र तथा दोनों आवेशों के द्वारा उत्पन्न क्षेत्रों के सदिश योग से हमें विद्युत द्विध्रुव के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र प्राप्त होता है।

वैद्युत द्विध्रुव : दो परमाणु में समान और विपरीत प्रकृति के आवेश अत्यल्प दूरी पर स्थित हो तो द्वैध्रुव कहलाते है।

उदाहरणNa+Cl , H+Cl आदि।

एक विलगित परमाणु द्विध्रुव नहीं होता है क्योंकि धनावेश एवं ऋण आवेश के केन्द्र एक स्थान पर होता है लेकिन परमाणु को किसी विद्युत क्षेत्र में रखने पर ऋणावेश तथा धनावेश के केंद्र पृथक पृथक हो जाते है एवं परमाणु द्विध्रुव बन जाता है।

द्विध्रुव आघूर्ण : आवेशों के परिमाण तथा उनके मध्य की दूरी के गुणनफल को द्विध्रुव आघूर्ण कहते है।

द्विध्रुव आघूर्ण एक सदिश राशि है जिसकी दिशा ऋण आवेश से धन आवेश की ओर रहती है।

द्विध्रुव आघूर्ण की इकाईकुलाम-मीटर” (C-m) होती है।

द्विध्रुव आघूर्ण कोके द्वारा व्यक्त किया जाता है। p = qd

यहाँ q = आवेश d = दोनों आवेशो के मध्य की दूरी।

इलेक्ट्रिक डाइपोल या विद्युत द्विध्रुव

जब परिमाण में समान लेकिन प्रकृति में विपरीत दो आवेश किसी अल्प दूरी पर रखे होते है तो वे वैद्युत द्विध्रुव की रचना करते है।

किसी आवेश तथा दोनों आवेशो के मध्य की दूरी का गुणनफल वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण कहलाता है।

 वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण को P द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण  एक सदिश राशि होती है इसकी दिशा ऋण से धन आवेश की तरफ होती है।

वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण P = q x 2a

वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण का मात्रक = कूलाम-मीटर

एवं वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण का विमीय सूत्र या विमा = [M0 L1 T1A1]

ध्रुवी और अध्रुवी अणु : जब किसी अणु में धन और ऋण आवेश अणु के सभी भागो में समान रूप से वितरित होते है तो दोनों आवेशो का प्रभावी केंद्र एक ही होता है। ऐसे अणु विद्युत उदासीन होते है एवं इन्हें अध्रुवी अणु कहते है।

कुछ पदार्थो के अणुओं में धन और ऋण आवेशों का वितरण समरूप नहीं होता है। इसमें धन एवं ऋण आवेशो के प्रभावी केन्द्र भिन्न होते है , ऐसे अणु ध्रुवी अणु कहलाते है।

उदाहरण : HCl अणु ध्रुवी होता है , इसमें एक H+ आयन दूसरा Cl आयन  परस्पर वैद्युत आकर्षण से बंधे रहते है। इसमें धन और ऋण आवेशों के प्रभावी केन्द्रों के मध्य लगभग 10-11 मीटर की दूरी रहती है। इसी प्रकार सभी विद्युत अपघट्य पदार्थों के अणु ध्रुवी होते है। सभी ध्रुवी अणु जैसे HCl , H2O , NaCl , AgNO3 आदि विद्युत द्विध्रुव के उदाहरण है।

विद्युत द्वि-ध्रुव (dipole moment in hindi)

परिभाषा : यदि समान परिमाण q और विपरीत चिन्ह के दो बिंदु आवेश एक दुसरे से a दूरी पर इस प्रकार रखे हुए हो की क्षेत्रीय बिंदु की दूरी r >> a है तो इस निकाय को विद्युत द्विध्रुव कहते है।

द्विध्रुव आघूर्ण को p = q x a परिमाण वाली सदिश राशि के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसकी दिशा ऋणावेश से धनावेश की ओर होती है।

नोट याद रखने तथ्य यह है कि रसायन विज्ञान में द्विध्रुव आघूर्ण की दिशा धनावेश से ऋण आवेश की ओर मानी जाती है।

विद्युत द्विध्रुव का C.G.S मात्रकडिबाइहोता है।

दो समान एवं 10-10 फ्रेंकलिन आवेश वाले बिंदु आवेश एक दुसरे सेदूरी पर रखे हो तो ऐसे निकाय के द्विध्रुव आघूर्ण को डिबाई कहते है।

1 डिबाई (D) = 10-10 x 10-8 = 10-18 Fr x cm

1D = 10-18 x C/3×109  x 10-2m = 3.3 x 10-30 c x m

S.I. मात्रक = कुलाम x मीटर = C x m

विद्युत द्विध्रुव के कारण उसकी अक्षीय रेखा पर स्थित बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता electric field at point on the axial line

(electric field at point on the axial line of an electric dipole in hindi)  विद्युत द्विध्रुव के कारण उसकी अक्षीय रेखा पर स्थित बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता :

हमने पढ़ा था की विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत क्षेत्र अध्यारोपण सिद्धान्त की सहायता से ज्ञात करते है।  अर्थात दोनों आवेशों के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र ज्ञात करके दोनों का सदिश योग करने पर दिए गए बिंदु पर परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता प्राप्त होती है।

माना एक विद्युत द्विध्रुव दिया गया है दोनों आवेशों के मध्य की दूरी 2a है , विद्युत द्विध्रुव का केंद्र बिंदु O है।

केंद्र बिन्दु O से r दुरी पर एक बिंदु P स्थित है (अक्ष पर ) जहाँ हमें विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।

+q आवेश के कारण P बिंदु पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

-q आवेश के कारण P बिंदु पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

अध्यारोपण सिद्धान्त (superposition theorem) से P बिंदु पर परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

E = E1 + E2

E1   Eकी दिशाएँ विपरीत है तथा E1 >  E

अतः

E = E1 –  E2

 यदि r >> l तो r2 >>> l2

अतः r2 को  lकी तुलना में नगण्य मानकर छोड़ने पर

अक्षीय रेखा में विद्युत क्षेत्र की दिशा (Direction of electric field in Axial line) :
p (
विद्युत आघूर्ण) की दिशा ऋण आवेश से धन आवेश की ओर होती है अतः p (विद्युत आघूर्ण) E (विद्युत क्षेत्र ) की एक ही दिशा दिशा होगी।

(1) अक्षीय स्थिति में वैद्युत द्विध्रुव के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता : विद्युत द्विध्रुव की अक्षीय स्थिति r दूरी पर स्थित बिंदु P पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।

+q आवेश के कारण P पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिमाण

E1 = q/4πε0(r-l) समीकरण-1

-q आवेश के कारण P पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिमाण

E2 = q/4πε0(r+l) समीकरण-2

अत: P पर उत्पन्न कुल परिणामी विद्युत क्षेत्र

E = E1 + E2

चूँकि E1  E2 की दिशाएँ परस्पर विपरीत है अत: E1 > E2

अत: P पर परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिमाण

E = E1 – E2

समीकरण-1 समीकरण-2 से मान रखने पर

E = q/4πε0(r-l)2 –  E2 = q/4πε0(r+l)2

E = q4rl/ 4πε0(r2-l2)2

E = q.2l.2r/ 4πε0(r2-l2)2

चूँकि विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p = q.2l

अत: E = p.2r/ 4πε0(r2-l2)2

द्विध्रुव आघूर्ण p की दिशा ऋण आवेश से धन आवेश की ओर होती है अत: p E एक ही दिशा में होंगे।

दीर्घ दूरियों के लिए r >> l

अत: r2 >> l2

अत: l2 को r2 की तुलना में नगण्य मानकर छोड़ने पर

 E = p.2r/ 4πε0r4

 E = 2p/ 4πε0r3

यह ध्यान देने योग्य बात है कि विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p एवं विद्युत क्षेत्र की E की दिशा एक ही होगी।

विद्युत द्विध्रुव के कारण उसकी निरक्ष रेखा या विषुवतीय रेखा पर स्थित बिंदु पर विद्युत क्षेत्र electric field

(electric field at point on the equatorial line of an electric dipole ) विद्युत द्विध्रुव के कारण उसकी निरक्ष रेखा या विषुवतीय रेखा (तल) पर स्थित बिंदु पर विद्युत क्षेत्र :-

हमने विद्युत द्विध्रुव के कारण उसकी अक्ष पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात की थी जिसमे हमने यह निष्कर्ष निकाला था की अक्ष पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता एकल आवेश की भाँती 1/r2 के समानुपाती होकर 1/r के समानुपाती होती है अर्थात एकल आवेश के कारण विद्युत क्षेत्र की तुलना में यह दूरी के साथ तेजी से घटती है।

अब हम बात करते है विद्युत द्विध्रुव के कारण इसकी निरक्ष रेखा पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कितनी होगी ?

माना एक द्विध्रुव आघूर्ण AB है , A बिंदु पर -q आवेश रखा है तथा B बिन्दु पर +q आवेश रखा है।  दोनों आवेशों के मध्य की दुरी 2a है।  द्विध्रुव आघूर्ण के केंद्र O से r दुरी पर निरक्ष पर एक बिंदु P स्थित है तथा हमें द्विध्रुव आघूर्ण के कारण इस P बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है।


बिंदु P से दोनों आवेशों की दुरी समान होगी और यह दूसरी (r2 + a2) होगी। 
+q आवेश के कारण बिन्दु P पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता 

इसकी दिशा BP के अनुदिश होगी। 
-q आवेश के कारण बिन्दु P पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता 

इसकी दिशा PA के अनुदिश होगी।
दोनों सूत्रों से यह स्पष्ट है की दोनों आवेशों के कारण P बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मान बराबर होता है किन्तु दोनों की दिशा भिन्न भिन्न है। 
E+q = E-q = E
चित्र से स्पष्ट है की E+q तथा  E-q के दो प्रकार के घटक बनते है , एक घटक बनता है अक्षीय रेखा के लंबवत तथा दूसरा घटक अक्षीय रेखा के अनुदिश। 
अक्षीय रेखा के लंबवत बने घटक E+q Sinθ   E-q Sinθ , परिमाण में बराबर है किन्तु दिशा में विपरीत है अतः ये एक दूसरे को निरस्त कर देते है।
अक्षीय रेखा के अनुदिश घटक E+q Cosθ   E-q Cosθ दोनों एक ही दिशा में अतः ये दोनों जुड़ जाते है।
अतः परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

Cosθ का मान रखने पर

मान रखने पर परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता 

चूँकि हम जानते है की 2qa = p (विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण) अतः इसका मान रखने पर 

माना a का मान r की तुलना में अत्यन्त कम है अतः r2 की तुलना में a2 का मान नगण्य मानकर छोड़ने पर  


अक्ष पर स्थित बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता उतनी ही दूरी पर निरक्षीय बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता की दो दोगुनी होती है।
(Eaxial) = 2(Eequatorial)
निरक्ष पर स्थित बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा विद्युत आघूर्ण के विपरीत दिशा में होती है। 

निरक्षीय स्थिति में विद्युत द्विध्रुव के कारण उत्पन्न वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता : विद्युत द्विध्रुव की निरक्षीय स्थिति में r दूरी पर स्थित बिंदु P पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है। बिंदु P से दोनों आवेशो की दूरियाँ समान (r2 + l2होंगी अत: P पर +q आवेश के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिमाण निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है

E1 = q/4πε0(r2 + l2)

तथा -q आवेश के कारण P पर उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिमाण

E2 = q/4πε0(r2 + l2)

अत: इस तरह |E1| = |E2|

बिंदु P पर परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

E = E+  E2

समान्तर चतुर्भुज के नियम से परिणामी विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का परिमाण

E = √(E12 + E22 + 2E1E2cos2θ)

चूँकि  |E1| = |E2|

E = √(E12 + E12 + 2E1E1cos2θ)

E = √(2E12 + 2E12cos2θ)

E = √(2E12(1 + cos2θ)

E = E1√2(1 + 2cos2θ – 1)

E = √2×2 cos2θ

E = 2E1cosθ

चूँकि चित्र से cosθ = l/(r2 + l2)

E1  cosθ का मान रखने पर

E = 2 x q/4πε0(r2 + l2) x l/(r2 + l2)

हल करने पर

E = q.2l/ 4πε0(r2 + l2)3/2

या

चूँकि q.2l = p

E = p/ 4πε0(r2 + l2)3/2

चित्र में E की दिशा द्विध्रुव की अक्ष के समान्तर होगी। चूँकि द्विध्रुव आघूर्ण p की दिशा ऋण आवेश से धन आवेश की ओर होती है अत: विद्युत क्षेत्र E एवं विद्युत द्विध्रुव p की दिशाएँ परस्पर विपरीत होंगी।

दीर्घ परास की दूरियों के लिए  r>> l

अत:  r2 >> l2

अत: l2 को r2 की तुलना में नगण्य मानकर छोड़ने पर

E = p/ 4πε0r3

याद रखे कि  विद्युत क्षेत्र E एवं विद्युत द्विध्रुव p की दिशा विपरीत होगी।

 

विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर बलाघूर्ण , एक समान , असमान torque on a dipole in a uniform electric field

 (torque on a dipole in a uniform electric field in hindi) एक समान विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर बलाघूर्ण  , एक समान असमान  वैद्युत क्षेत्र में वैद्युत द्विध्रुव पर बल आघूर्ण:

माना एक विद्युत द्विध्रुव AB है जो एक समान विद्युत क्षेत्र में उपस्थित है , विद्युत द्विध्रुव AB , θ कोण पर चित्रानुसार रखा गया है।


विद्युत द्विध्रुव के +q आवेश पर विद्युत क्षेत्र की दिशा में एक बल लगता है जिसका मान F = qE होगा , तथा विद्युत द्विध्रुव के -q आवेश पर विद्युत क्षेत्र की दिशा के विपरीत एक बल लगता है जिसका मान F = -qE होगा। अतः विद्युत द्विध्रुव पर लगने वाला परिणामी या कुल बल

F (कुल) = qE + (-qE) = 0

अतः एक समान विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर लगने वाला बल शून्य होगा , अतः विद्युत द्विध्रुव गति नहीं करेगा।

लेकिन -q तथा +q पर लगने वाला बल संरेखी नहीं है अतः विद्युत द्विध्रुव पर एक बलयुग्म बनता है जो द्विध्रुव को विद्युत क्षेत्र की दिशा में संरेखित करने की कोशिश करता है।

बल आघूर्ण = किसी एक आवेश पर लगने वाला बल x बलों की क्रिया रेखा के मध्य की लंबवत दूरी

Torque (τ)बल आघूर्ण बल आघूर्ण = qE (BC)

चित्र से

BC = 2a Sinθ

अतः सूत्र में BC का मान रखने पर 

Torque (τ) बल आघूर्ण = qE (2a Sinθ)

चूँकि 

p = 2qa 

अतः 

Torque (τ) बल आघूर्ण = E p Sinθ

बलाघूर्ण को सदिश रूप में निम्न प्रकार लिखा जा सकता है।

special case :

1. जब θ = 0

 Sinθ  = 0

Torque (τ) = E p Sin0 = 0 

अतः द्विध्रुव स्थायी साम्यावस्था में स्थित है। 

2. जब θ = 180

 Sin180  = 0

Torque (τ) = E p Sin180  = 0 

अतः द्विध्रुव अस्थायी साम्यावस्था में स्थित है।

3. जब θ = 90

 Sin90   = 1

Torque (τ) = E p  

इस स्थिति में (θ = 90) बलाघूर्ण का मान अधिकतम होता है। 

विद्युत क्षेत्र में विद्युत द्विध्रुव :

(1) समरूप विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर लगने वाले बल युग्म का आघूर्ण :-

एक समरूप वैद्युत क्षेत्र में एक वैद्युत द्विध्रुव θ विक्षेप की स्थिति में दिखाया गया है। द्विध्रुव के आवेशो +q एवं -q पर लगने वाले विद्युत बल qE परिमाण में , समान दिशा में विपरीत है और दोनों की क्रिया रेखाएँ अलग है। अत: ये दोनों बल बलयुग्म बनाते है , इस बल युग्म का आघूर्ण

T = बल x बलों की क्रिया रेखाओं के मध्य की दूरी

या

T = qE x BC

चित्र से , BC/AB = sinθ

या

BC = AB.sinθ

या

BC = 2l.sinθ

अत: T = qE x  2l.sinθ

T = q.2l.Esinθ

T = pEsinθ न्यूटन x मीटर

चित्र की सहायता से सदिश रूप में बल युग्म के आघूर्ण को निम्न तरह से लिखा जा सकता है

T = p x E (सदिश चिन्ह के साथ है सभी राशियाँ)

सदिश T की दिशा दक्षिणावर्त पेंच के नियम के अनुसार सदिश p एवं E के तल के लम्बवत होती है।

स्थिति 1 : जब θ = 0 तो sinθ =  0

अत: T = pEsinθ = 0

या

T = 0

यह स्थायी संतुलन की अवस्था होती है।

स्थिति 2 : जब θ = 90 तो sinθ = 1

अत: T = pEsinθ = pE

यह बल आघूर्ण का अधिकतम मान है।

स्थिति 3 : T = pEsinθ

यदि विद्युत क्षेत्र E = 1 न्यूटन/कुलाम , θ = 90 तो sinθ = 1

तो T = p

अर्थात वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण उस बलयुग्म के आघूर्ण के तुल्य है जो द्विध्रुव पर तब कार्य करता है जब वह एकांक तीव्रता के समरूप वैद्युत क्षेत्र में क्षेत्र के लम्बवत रखा होता है।

(2) असमान विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर लगने वाले बल युग्म का आघूर्ण :-

(i) जब विद्युत क्षेत्र E , विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p की दिशा में बढ़ता है

इस स्थिति में यदि -q आवेश की स्थिति में वैद्युत क्षेत्र E1 एवं + q आवेश की स्थिति में वैद्युत क्षेत्र Eहै।

तथा E1 > E2 अत: -q आवेश पर बल q

 

Comments