विद्युत क्षेत्र पाठ नोट्स 12 th कक्षा electric field notes class in hindi
विद्युत आवेश
की
परिभाषा क्या
है
electric charge in hindi , आवेश के गुण , SI , CGS इकाई मात्रक
आवेश के गुण , SI
, CGS इकाई मात्रक , विद्युत आवेश की परिभाषा क्या है electric charge in hindi , किसे कहते है ? विमा
:-
विद्युत आवेश :
प्रसिद्ध वैज्ञानिक थेल्स (thales) ने बताया की जब काँच की छड़ को रेशम के कपडे से रगड़ा जाता है तो कांच की छड़ रगड़न के बाद छोटे छोटे कणों , कागज़ के टुकड़े इत्यादि को चिपकाना प्रारम्भ कर देता है , घर्षण प्रक्रिया (रगड़ना) के बाद पदार्थ सामान्य की तुलना में कुछ अलग व्यवहार प्रदर्शित करता है और पदार्थ के इस विशेष गुण को ‘विधुत आवेश ‘ नाम दिया गया।
पदार्थ द्वारा आवेश (विशेष गुण) ग्रहण करने के पश्चात पदार्थ को आवेशित पदार्थ कहा जाता है।
आवेश क्या है ?
किसी भी पदार्थ के निर्माण के लिए मूल कणो में से आवेश भी एक है , हालांकि आवेश की कोई निर्धारित परिभाषा
(definition) नहीं है लेकिन आवेश को इसके (आवेश) के द्वारा उत्पन्न प्रभावों के माध्यम से समझाया जाता है।
आवेश एक द्रव्य पर उपस्थित वह गुण है जिसके कारण वह द्रव्य चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है या इन क्षेत्रों का अनुभव करता है।
उदाहरण :
कांच की छड़ को जब रेशम के कपडे से रगड़ा जाता है तो कांच की छड़ पर धन आवेश तथा रेशम के कपडे पर ऋण आवेश आ जाता है।
विद्युत आवेश
: द्रव्य के साथ जुड़ी हुई वह अदिश भौतिक राशि है जिसके कारण चुम्बकीय और वैद्युत प्रभाव उत्पन्न होते है , आवेश कहलाती है। किसी वस्तु में इलेक्ट्रॉनों को अधिकता अथवा कमी से आवेश की अभिधारणा प्राप्त होती है। ऋणावेशित वस्तु में इलेक्ट्रॉनों की अधिकता व धनावेशित वस्तु में इलेक्ट्रॉनो की कमी होती है।
आवेश के गुण
1. समान आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित तथा असमान आवेश आकर्षित करते है। वस्तुओं के आवेशित होने का सही परिक्षण प्रतिकर्षण के द्वारा ही होता है क्योंकि अनावेशित वस्तु और आवेशित वस्तु के मध्य आकर्षण हो सकता है तथा दो विपरीत आवेशित वस्तुओं के मध्य भी आकर्षण होता है।
2. आवेश एक अदिश राशि है।
3. आवेश सदैव द्रव्यमान से सम्बद्ध रहता है। आवेशित किये जाने पर वस्तु का द्रव्यमान परिवर्तित होता है। यदि वस्तु से इलेक्ट्रॉन हटा लिए जाए तो वस्तु धनावेशित हो जाएगी और उसका द्रव्यमान कम हो जायेगा तथा वस्तु में इलेक्ट्रॉन डाल दिए जाए तो वस्तु का द्रव्यमान बढ़ जायेगा और वस्तु ऋणावेशित हो जाएगी। इलेक्ट्रॉनों का द्रव्यमान अतिन्यून (9.1 x 10-31 किलोग्राम ) होने के कारण वस्तु के द्रव्यमान की तुलना में उसे आवेशित किये जाने पर द्रव्यमान में परिवर्तन नगण्य होता है।
4. आवेश क्वान्टीकृत होता है। अर्थात जब किसी भौतिक राशि के केवल विविक्त मान ही संभव होते है तो वह राशि क्वान्टीकृत कहलाती है।
मिलिकेन के तेल बूंद प्रयोग द्वारा यह सिद्ध हुआ कि आवेश का वह न्यूनतम मान जो प्रकृति में सम्भव है , मुक्त इलेक्ट्रॉन का आवेश है। यदि एक इलेक्ट्रॉन का आवेश (e = 1.6 x 10-19 कूलाम) एक प्राथमिक इकाई माना जाए अर्थात आवेश का क्वांटम तो किसी वस्तु पर आवेश e के पूर्णांको के गुणनफल के बराबर होगा अर्थात q = ± ne , यहाँ n = 1 , 2 , 3 , 4 . . . .. .
5. आवेश अचर है। अर्थात आवेश निर्देश तंत्र पर निर्भर नहीं करता है अर्थात वस्तु के वेग में परिवर्तन से आवेश परिवर्तित नहीं होता है। वस्तु का आवेश घनत्व एवं द्रव्यमान चाल पर निर्भर करता है और चाल में वृद्धि के साथ बढ़ता है।
6. आवेश की इकाई :
SI मात्रक या इकाई = कुलाम [1 कूलाम = 1 एम्पियर x 1 सेकंड]
CGS मात्रक = स्टेट कुलाम या फ्रेंकलाइन [1 कुलाम = 3 x 109 स्टेट कूलाम ]
1 कुलाम आवेश = 3 x 109 esu आवेश = 1/10 emu आवेश = 1/10 ऐब कुलाम
esu = स्थिर वैद्युत इकाई
emu = विद्युत चुम्बकी इकाई
विद्युत
लगभग 600 ईसा पूर्व में, यूनान के दार्शनिक थेल्स ने देखा कि जब अम्बर को बिल्ली की खाल से रगड़ा जाता है, तो उसमें कागज के छोटे-छोटे टुकड़े आदि को आकर्षित करने का गुण आ जाता है। यद्यपि इस छोटे से प्रयोग का स्वयं कोई विशेष महत्व नहीं था, परन्तु वास्तव में यही प्रयोग आधुनिक विद्युत युग का जन्मदाता माना जा सकता है। थेल्स के दो हजार वर्ष बाद तक इस खोज की तरफ किसी का ध्यान आकृष्ट नहीं हुआ। 16वीं श्ताब्दी में गैलीलियों के समकालीन डॉ. गिलबर्ट ने, जो उन दिनों इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ के घरेलू चिकित्सक थे, प्रमाणित किया कि अम्बर एवं बिल्ली के खाल की भाँति बहुत-सी अन्य वस्तुएँ-उदाहरणार्थ, काँच और रेशम तथा लाख और फलानेल- जब आपस में रगडे जाते है, तो उनमें भी छोटे-छोटे पदार्थो को आकर्षित करने का गुण आ जाता है।
घर्षण से प्राप्त इस प्रकार की विद्युत को घर्षण-विद्युत कहा जाता है। इसे स्थिर विद्युत भी कहा जाता है, बशर्ते पदार्थों को रगड़ने से उन पर उत्पन्न आवेश वहीं पर स्थिर रहे जहाँ वे रगड़ से उत्पन्न होते है। अतः स्थिर-विद्युतिकी भौतिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसकी विषय-वस्तु वैसे आवेशित पदार्थो के गुणों का अध्ययन है, जिन पर विद्युत आवेश स्थिर रहते है।
आवेशों के प्रकार– जब घर्षण से विद्युत उत्पन्न की जाती है, तो जिसमें वस्तु रगड़ी जाती है और जो वस्तु रगडी जाती है दोनों ही में समान परिमाण में विद्युत आवेश उत्पन्न होते है, लेकिन दोनों वस्तुओं पर उत्पन्न आवेशों की प्रकृति एक दूसरे के विपरीत होती है। एक वस्तु पर के आवेश को ऋण आवेश तथा दूसरी वस्तु पर के आवेश को धन आवेश कहते है। आवेशा के लिए ऋणात्मक एवं धनात्मक पदों का प्रयोग सर्वप्रथम बेंजामिन फ्रेंकलिन ने किया था। बेंजामिन फ्रेंकलिन के अनुसार (प) काँच को रेशम से रगड़ने पर काँच पर उत्पन्न विद्युत को धनात्मक विद्युत कहा गया और (पप) एबोनाइट, या लाख की छड़ को फलानेल या रोएँदार खाल-इन दोनों में से किसी से रगड़ने पर उन पर उत्पन्न विद्युत को ऋणात्मक विद्युत कहा गया। घर्षण के कारण दोनों प्रकार की विद्युत बराबर परिमाण में एक ही साथ उत्पन्न होती है। नीचे के सारणी में कुछ वस्तुएँ इस ढंग से सजायी गयी है कि यदि किसी वस्तु को, किसी दूसरी वस्तु से रगड़कर विद्युत उत्पन्न की जाय, तो सारणी में जो पहले (पूर्ववर्ती) है, उसमें धन आवेश तथा जो बाद मे (उत्तरवर्ती) है, उसमें ऋण आवेश उत्पन्न होता है
1. रोआँ 2.
फलानेल 3. चपड़ा4. मोम5. काँच
6. कागज
7. रेशम 8. मानव शरीर 9. लकड़ी 10. धातु
11. रबर
12. रेजिन 13. अम्बर 14. गंधक 15. एबोनाइट
उदाहरण- यदि काँच (5) को रेशम (7) के साथ रगड़ा जाय तो काँच में धन आवेश उत्पन्न होता है, लेकिन यदि काँच (5) को रोआँ (1) से रगडा जाय तो काँच में ऋण आवेश उत्पन्न होगा (उपर्युक्त सारणी के नियमानुसार)
सजातीय आवेशों में प्रतिकर्षण होता है अर्थात धन आवेशित वस्तुएँ एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती है और ऋण आवेशित वस्तुएँ भी एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती है। विजातीय आवेशों में आकर्षण होता है अर्थात एक धन आवेशित वस्तु और एक ऋण आवेशित वस्तु में आकर्षण होता है।
विद्युतीकरण का सिद्धान्त- घर्षण के कारण उत्पन्न आवेशों की घटना को समझाने के लिए भिन्न-भिन्न वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अनेक सुझाव दिए है। वर्तमान में आधुनिक इलेक्ट्रॉन सिद्धांत सर्वमान्य है।
इलेक्ट्रॉन सिद्धांत- इस सिद्धान्त का विकास थॉमसन, रदरफोर्ड, नील्स बोर आदि वैज्ञानिकों के कारण हुआ है। इस सिद्धान्त के अनुसार जब दो वस्तुएँ आपस में रगड़ी जाती है, तो उनमें से एक वस्तु के परमाणुओं की बाहरी कक्षा से भ्रमणशील इलेक्ट्रॉन निकलकर दूसरी वस्तु के परमाणुओं में चले जाते है। इससे पहले वस्तु के परमाणुओं में इलेक्ट्रॅनों की कमी तथा दूसरी वस्तु के परमाणुओं के इनेक्ट्रॉन की वृद्धि हो जाती है। अतः पहली वस्तु धन आवेशिक एवं दूसरी वस्तु ऋण आवेशित हो जाती है।
आवेश
के
प्रकार , आवेश
कितने
प्रकार का
होता
है
types of charge in hindi
types of charge in hindi आवेश के प्रकार :आवेश कितने प्रकार का होता है यह समझने के लिए पहले निचे दिए गए प्रयोग को ठीक से समझे।
आवेश का प्रायोगिक सत्यापन (experiment on charge) :
सर्वप्रथम हम दो कांच की छड़ लेते है दोनों छड़ो को रेशम (silk) के कपडे के रगड़कर चित्रानुसार एक दूसरे के पास ले जाते है तो ये एक दूसरे से दूर जाने का प्रयास करती है अर्थात एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है।
ठीक इसी प्रकार जब एबोनाइट की दो छड़ों को बिल्ली की खाल से रगड़कर एक दूसरे के पास लाते है तो ये भी एक दूसरे से दूर जानें का प्रयास करते है दूसरे शब्दों में कहे तो प्रतिकर्षित करते है।
लेकिन जब कांच की छड़ को रेशम के कपडे से रगड़कर तथा अन्य एबोनाइट की छड़ को बिल्ली की खाल से रगड़कर एक दूसरे के पास लाते है तो वे एक दूसरे के पास आने का प्रयास करती है अर्थात आकर्षित करती है।
types-of-charge-in-hindi
निम्न प्रयोग से यह स्पष्ट हुआ की प्रथम दशा में जब कांच की दो छड़ों को रेशम के कपडे से रगड़ा गया था उन दोनों छडो पर समान प्रकृति का आवेश उपस्थित था अतः हम यह कह सकते है की समान प्रकृति के आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है।
ठीक इसी प्रकार दो एबोनाइट की छड़ो को बिल्ली की खाल से रगड़ा जाता है तो उन दोनों पर भी समान आवेश उपस्थित रहता है और इसलिए वे एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है।
लेकिन जब एक काँच की छड़ को रेशम से रगड़कर तथा एक एबोनाइट की छड़ को बिल्ली की खाल से रगड़ा जाता है तो उन दोनों छड़ों पर विपरीत प्रकृति का आवेश उपस्थित होने के कारण वे एक दूसरे को आकर्षित करती है अतः विपरीत प्रकृति के आवेश एक दूसरे को आकर्षित करते है।
अतः हम कह सकते है की आवेश दो प्रकार का होता है , बेंजामिन फ्रेंकलिन ने इन दोनों आवेशों को धनात्मक आवेश तथा ऋणात्मक आवेश नाम दिया।
प्रयोगों द्वारा फ्रेंकलिन ने जब कांच की छड़ को रेशम के कपडे से रगड़ा इससे कांच की छड़ पर जो आवेश उत्पन्न हुआ उसे धनात्मक आवेश बताया।
इसी प्रकार फ्रेंकलिन ने एबोनाइट की छड़ को जब बिल्ली की खाल से रगड़ा जिससे एबोनाइट की छड़ पर जो आवेश उत्पन्न हुआ उसे ऋणात्मक आवेश कहा।
अतः कह सकते है की धनात्मक -धनात्मक आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है , ठीक इसी प्रकार ऋणात्मक – ऋणात्मक आवेश (समान प्रकृति) भी एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है लेकिन धनात्मक – ऋणात्मक आवेश (विपरीत प्रकृति के आवेश) एक दूसरे को आकर्षित करते है।
पदार्थ का धनावेशित या ऋणावेशित होने का कारण (reason of positive and negative charge things):
हम सभी जानते है की प्रत्येक द्रव्य (पदार्थ) परमाणुओं से मिलकर बना होता है तथा परमाणु नाभिक व इलेक्ट्रॉन (-) से मिलकर बना होता है।
परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन (+) तथा न्यूट्रॉन (0) से मिलकर बना होता है।
प्रोटॉन धनावेशित , इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित तथा न्यूट्रॉन उदासीन होता है।
सामान्य अवस्था में परमाणु में इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन की संख्या बराबर होती है अर्थात ऋणावेश तथा धनावेश बराबर मात्रा में होते है जिससे परमाणु या द्रव्य उदासीन (अनावेशित) अवस्था में होता है।
यदि किसी प्रयोग द्वारा द्रव्य इलेक्ट्रॉन त्याग देता है तो उस पर प्रोटॉन (+) की संख्या अधिक हो जाती है जिससे पदार्थ धनावेशित हो जाता है।
ठीक इसी प्रकार यदि पदार्थ इलेक्ट्रॉन (-) ग्रहण कर लेता है तो इस पर ऋणावेश अधिक हो जाता है तथा वस्तु ऋणावेशित होती है।
जब कांच की छड़ को रेशम से रगड़ा गया तो कांच की छड़ रेशम के कपडे को इलेक्ट्रॉन त्याग देती है अतः धनावेशित हो जाती है ठीक इसी प्रकार एबोनाइट की छड़ को बिल्ली की खाल से रगड़ा गया तो एबोनाइट की छड़ इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर लेती है अतः यह ऋणावेशित हो जाती है।
घर्षण
द्वारा आवेशन
क्या
है
charging by friction in hindi , उदाहरण , परिभाषा , चित्र किसे कहते है ?
उदाहरण , परिभाषा , चित्र घर्षण द्वारा आवेशन किसे कहते है ?
charging
by friction in hindi घर्षण द्वारा आवेशन
: घर्षण का तात्पर्य है रगड़ना , जब दो वस्तुओं को रगड़ा जाता है तो घर्षण के कारण उन वस्तुओं में विद्युत आवेश उत्पन्न हो जाता है क्यूँकि यह आवेश घर्षण द्वारा उत्पन्न होता है इसलिए इसे घर्षण विद्युत तथा इस प्रक्रिया को घर्षण द्वारा आवेशन कहते हैं।
जब दो वस्तुओं को रगड़ा जाता है तो उन दोनों में से एक वस्तु इलेक्ट्रॉन त्यागती है तथा अन्य दूसरी वस्तु इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करती है , जो वस्तु इलेक्ट्रॉन त्यागती है उस पर धनावेश आ जाता है तथा जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती है वह वस्तु ऋणावेशित हो जाती हैं।
घर्षण द्वारा आवेशन को निम्न उदाहरण द्वारा समझ सकते है
जब काँच की छड़ को रेशम के कपडे से रगड़ा जाता है तो काँच की छड़ घर्षण के कारण इलेक्ट्रॉन रेशम के कपडे पर स्थानान्तरित करता है अर्थात काँच की छड़ द्वारा रेशम के कपडे पर इलेक्ट्रॉन त्यागे जाते है अतः काँच की छड़ पर इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है और रेशम के ऊपर इलेक्ट्रॉन की अधिकता हो जाती है जिससे कांच की छड़ धनावेशित व रेशम का कपडा ऋणावेशित हो जाता हैं।
नोट : यदि हम तांबे की छड़ को हाथ से पकड़कर ऊनी वस्त्र से रगड़ा जाए तो ऊनी कपडे से ताम्बे की छड़ पर स्थानांतरित आवेश शरीर से होते हुए धरती में चला जाता है और फलस्वरूप छड़ आवेशित नहीं हो पाती है इसलिए चालक छड़ को एक कुचालक पदार्थ का हत्था लगाया जाता है या कुचालक स्टैंड पर रखा जाता है , जिससे वह कुचालक पदार्थ इलेक्ट्रॉन को धरती में प्रवाहित होने से रोकता हैं।
घर्षण द्वारा आवेशन : जब किसी उदासीन वस्तु को किसी दूसरी उदासीन वस्तु के साथ रगडा जाता है तो कुछ इलेक्ट्रॉन एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर चले जाते है। जो वस्तु इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती है ऋणावेशित हो जाती है जबकि दूसरी वस्तु धनावेशित हो जाती है। ये वस्तुएँ किसी भी पदार्थ की हो सकती है। उदाहरण के लिए जब कंघे को बालो में चलाया जाता है तो यह आयनित हो जाता है।
उदाहरण के लिए – जब एक सिल्क के कपड़े को काँच की छड से रगड़ते है तो क्योंकि सिल्क में इलेक्ट्रॉन ज्यादा मजबूती से बंधे रहते है और ग्लास में कम मजबूती से बंधे रहते है (इनके रासायनिक गुण के कारण ) , कुछ इलेक्ट्रोन सिल्क से छड में चले जाते है इसलिए काँच की छड़ में इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है और सिल्क के कपडे में इलेक्ट्रॉन अधिकता में हो जाते है अत: कांच धनावेशित एवं सिल्क का कपड़ा ऋण आवेशित हो जाता है।
घर्षणात्मक विद्युतीकरण या घर्षण के द्वारा आवेशन की विधि : दो उचित पदार्थों को उचित दशाओ में रगड़ने या घर्षण से उत्पन्न विद्युत को घर्षण विधुत कहते है।
उचित पदार्थो को जब रगडा जाता है तो वह विद्युतीकृत हो जाते है , इनमे से एक पदार्थ इलेक्ट्रॉनों का त्याग करता है और दूसरा पदार्थ इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करता है।
जो पदार्थ इलेक्ट्रोनों का त्याग करता है उस वस्तु को धनावेशित और जो पदार्थ इलेक्ट्रोनों को ग्रहण करता है उसे ऋणावेशित कहते है।
निचे एक सारणी दी गयी है जिसमे दर्शाया गया है कि उन्हें आपस में रगड़ने पर या घर्षण के कारण कौनसा पदार्थ धनावेशित होता है और कौनसा पदार्थ ऋणावेशित हो जाते है।
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ऋण आवेशित पदार्थ |
धन आवेशित पदार्थ |
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रेशम का कपड़ा |
कांच की छड |
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प्लास्टिक या कंघी |
सूखे बाल |
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प्लास्टिक |
ऊन |
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रबर या अम्बर या एबोनाईट |
फर |
चालन (स्पर्श) द्वारा आवेश , आवेशन क्या है charging by conduction (contact)
in hindi
charging by conduction
(contact) in hindi चालन (स्पर्श) द्वारा आवेशन : चालन द्वारा आवेश को समझने से पूर्व यह समझ ले की चालक व कुचालक होते क्या है ?
वे पदार्थ जिनमें विद्युत आवेश का मुक्त प्रवाह होता है उन पदार्थों को चालक कहते है जैसे तांबा।
वे पदार्थ जिनमें आवेश का प्रवाह नहीं होता हैं उन्हें कुचालक कहते है जैसे काँच , एबोनाइट।
आइये अब जानते हैं स्पर्श द्वारा आवेशन किस तरह होता है , जब किसी चालक को आवेश दिया जाता है तो वह आवेश चालक के बाहरी पृष्ठ पर फैल जाता है (पुनर्वितरण द्वारा)
लेकिन कुचालक पदार्थों में वस्तु को जिस जगह पर आवेश दिया जाता है वह वही ठहरा रहता है अर्थात पृष्ठ पर वितरित नहीं होता हैं।
स्पर्श द्वारा आवेशन :
जब दो वस्तुओं को आपस में संपर्क कराया जाता है तो आवेश का स्थानांतरण एक चालक से दूसरे चालक में स्थानांतरित होता है। इस प्रकार आवेश के स्थानांतरण को स्पर्श (संपर्क) या चालन आवेशन कहते हैं।
चित्रानुसार दो गोले लेते हैं एक आवेशित (धनायन या ऋणायन) तथा एक अनावेशित , दोनों गोलों को कुचालक स्टैंड पर सेट कर देते है।
अब दोनों गोलों को आपस में सम्पर्क में लाते है तो जो आवेश , आवेशित गोले पर है वह आवेश उदासीन गोले पर भी स्थान्तरित हो जाता है और दोनों गोलों पर समान प्रकृति का आवेश हो जाता है चूँकि इस विधि में अनावेशित गोले को सम्पर्क (स्पर्श) द्वारा आवेशित किया गया है अतः इसे सम्पर्क या स्पर्श या चालन द्वारा आवेशन कहते है।
चालन विधि द्वारा एक पिण्ड का आवेशित होना : जब एक पृथक चालक किसी आवेशित वस्तु के सम्पर्क में लाया जाता है तो यह चालन क्रिया द्वारा आवेशित वस्तु पर स्थित आवेश की प्रकृति का आवेश ग्रहण कर लेता है। चालन क्रिया केवल चालकों में ही संभव है , कुचालकों में चालन क्रिया नहीं होती है।
चालन प्रक्रिया में हम एक आवेशित चालक A तथा एक उदासीन चालक B लेते है। जब दोनों को जोड़ा जाता है तो कुछ आवेश आवेशित चालक से उदासीन चालक में प्रवाह होता है। यदि दोनों चालक समान तथा अधिक दूरी पर है तो दोनों पर आवेश बराबर वितरित होगा वरना जब तक दोनों का विभव समान हो जाए तब तक प्रवाह होता है।
प्रेरण द्वारा आवेशन
क्या
है
, कैसे
होता
है
charging by induction in hindi , उदाहरण , चित्र , परिभाषा
उदाहरण , चित्र , परिभाषा सहित इंडक्शन के द्वारा चार्ज ?
charging
by induction in hindi प्रेरण द्वारा आवेशन :
जब अनावेशित वस्तु से स्पर्श कराये बिना ही अनावेशित वस्तु को आवेशित करने की विधि को प्रेरण द्वारा आवेशन कहते है , प्रेरण द्वारा आवेशन विधि में अनावेशित वस्तु पर आवेशित वस्तु का विपरीत आवेश उत्पन्न होता है।
इस प्रेरण द्वारा आवेशन को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट रूप रूप से समझा जा सकता है :
एक अनावेशित गेंद को कुचालक स्टैंड पर सेट करते है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
charging-by-conduction-contact
जब एक ऋणावेशित छड़ को इस अनावेशित गेंद के पास ले जाते है (स्पर्श किये बिना) अनावेशित गेंद में उपस्थित इलेक्ट्रॉन छड़ पर उपस्थित ऋणावेश से प्रतिकर्षित होते है और दूसरी तरफ विस्थापित हो जाते है , गेंद का जो हिस्सा ऋणावेशित छड़ के पास रहता है वहा धनावेश आ जाता है क्यूँकि प्रतिकर्षण के कारण ऋणावेश दूसरी तरफ (दायी तरफ) विस्थापित या इकट्ठा हो जाता है।
यदि अब चालक तार की सहायता से गेंद के दायें हिस्से को भू-सम्पर्कित कर दे तो दायी तरफ इकठ्ठा (-) आवेश चालक तार के माध्यम से धरती में चला जाता है तथा गोले पर अब बायीं तरफ वाला धनावेश शेष रह जाता है अब अगर ऋणावेशित छड़ को गेंद के पास से हटा भी लिया जाए तो भी गोले पर धनावेश उपस्थित रहेगा क्यूँकि यह आवेश प्रेरण द्वारा (छड़ को बिना स्पर्श किये) उत्पन्न हुआ है अतः इस आवेश को प्रेरण आवेश व इस प्रक्रिया को प्रेरण द्वारा आवेशन कहते है।
नोट : यदि दो गोलों पर समान मात्रा में Q धनात्मक व ऋणात्मक आवेश दिया जाए तो ऋणात्मक Q आवेश वाला गोले का द्रव्यमान धनात्मक Q आवेश वाले गोले से अधिक होगा , क्यूँकि ऋणावेशित गोले ने इलेक्ट्रॉन ग्रहण किये है अतः इसके द्रव्यमान में उन इलेक्ट्रोनो का द्रव्यमान भी जुड़ जायेगा जो उसने ग्रहण किये है इसी प्रकार धनावेशित गोले में इलेक्ट्रॉन त्यागे है अतः इसके द्रव्यमान से उन इलेक्ट्रोनो का भार घट जायेगा जो उसने त्यागे है।
नोट : एक आवेशित वस्तु , अनावेशित वस्तु को आकर्षित कर सकती है यह प्रेरण द्वारा संभव हो सकता है क्यूंकि जब एक अनावेशित वस्तु के पास आवेशित वस्तु लायी जाती है तो प्रेरण द्वारा निकट वाले स्थान पर विपरीत प्रकृति का आवेश उत्पन्न हो जाता है।
प्रेरण द्वारा आवेशन :
इस विधि में किसी आवेशित वस्तु को अनावेशित वस्तु से स्पर्श किये बिना विपरीत प्रकृति का आवेश उत्पन्न किया जा सकता है।
प्रेरण द्वारा आवेशन की घटना में आवेशित वस्तु A जब अनावेशित वस्तु B के समीप लायी जाती है तो दोनों के सम्पर्क के बिना अनावेशित वस्तु B में वस्तु A के पास वाले भाग पर विपरीत प्रकृति का कुछ आवेश उत्पन्न हो जाता है |
क्योंकि दोनों वस्तुएँ संपर्क में नहीं लाई जाती है अत: A के आवेश में कोई कमी नहीं आती है |
1. एक चालक गोला (B) एक अचालक स्टैंड पर स्थित है।
2. जब एक धनावेशित कांच की छड A गोले B के निकट लायी जाती है तो छड़ के पास वाले गोलीय पृष्ठ पर ऋण आवेश प्रेरित हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि छड A का धनावेश गोले B के मुक्त इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करता है जिससे गोले के दूर वाले पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन A के निकट वाले पृष्ठ पर एकत्र होने लगते है और यह क्षणिक क्रिया जैसे ही गोले के इलेक्ट्रॉनों पर परिणामी बल शून्य हो जाता है तुरंत बंद हो जाती है | इस प्रकार गोले B का छड़ A के पास वाला पृष्ठ ऋण आवेशित एवं दूर वाला पृष्ठ धनावेशित हो जाता है।
3. जब गोले B को पृथ्वी से सम्बंधित कर देते है तो उसका समस्त धनावेश पृथ्वी में चला जाता है अर्थात पृथ्वी से इलेक्ट्रॉन आकर गोले के धन आवेश को उदासीन कर देते है। इस तरह अब गोले B पर A के पास वाला ऋण आवेश रह जाता है।
4. अब गोले B का संपर्क पृथ्वी से हटा देते है तो भी ऋणावेश A के पास वाले भाग पर ही रहता है।
5. जब कांच की छड को हटा लेते है तो गोले B का ऋण आवेश पूरे पृष्ठ पर समान रूप से फ़ैल जाता है अर्थात वितरित हो जाता है।
इसी तरह यदि गोले B को प्रेरण द्वारा धनावेशित करना है तो हमें उसके निकट ऋणावेशित छड लानी चाहिए।
आगे अब हम आवेशन की प्रेरण विधि द्वारा दो गोलों को आवेशित करने के बारे में अध्ययन करते है।
1. A व B दो चालक गोले परस्पर स्पर्श करते हुए दो अचालक स्टैण्ड पर रखे हुआ है।
2. अब एक अनावेशित काँच की छड गोले A के निकट लायी जाती है तो दोनों गोलों के मुक्त इलेक्ट्रॉन इस छड़ द्वारा आकर्षित होंगे। फलस्वरूप गोले A की बायीं ओर वाली सतह ऋण आवेशित और गोले B की दाई ओर वाली सतह धनावेशित होने लगेगी। इलेक्ट्रॉनों का यह क्षणिक स्थानान्तरण तब रुक जायेगा जब गोले A के इलेक्ट्रॉनों पर नेट बल शून्य हो जायेगा।
3. अब यदि दोनों गोलों को अलग कर दिया जाए तो काँच की छड की उपस्थिति में दोनों गोलों के आवेश पूर्ववत बने रहेंगे।
4. अब काँच की छड़ को हटा ले तो दोनों गोलों के आवेश पास वाले पृष्ठों पर आ जायेंगे।
5. यदि दोनों गोलों को अब काफी दूर हटा दिया जाये तो दोनों गोलों के आवेश उनके पृष्ठों पर समान रूप से फ़ैल जायेगा।
और इस तरह दोनों गोले प्रेरण विधि द्वारा आवेश से आवेशित हो जाते है।
याद रखिये कि यहाँ कांच की छड का आवेश कम नहीं होगा।
प्रेरण के द्वारा आवेशन :
आवेशन की इस विधि को समझने के लिए एक निम्न प्रयोग करते है –
हम यह जानते है कि चालक में बहुत अधिक संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते है। माना एक +Q आवेश उदासीन चालक के पास लाया जाता है। +Q आवेश के आकर्षण के कारण कई इलेक्ट्रॉन या ऋण आवेश पास की सतह पर आ जाते है। दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉन की कमी के कारण धनात्मक आवेश उत्पन्न होता है। यह प्रवाह जब तक चलता है जब तक चालक के मुक्त इलेक्ट्रॉन पर परिणामी बल शून्य न हो जाए। इसको प्रेरण कहा जाता है और उत्पन्न आवेश प्रेरित आवेश कहलाता है।
एक वस्तु को निम्न दो तरीके से प्रेरण विधि द्वारा आवेशित कर सकते है –
विधि-I :
§ एक उदासीन विलगित चालक लेते है।
§ आवेशित छड़ इसके पास ले जाते है। आवेशित छड के कारण गोले पर आवेश प्रेरित हो जाता है।
§ एक दूसरे उदासीन चालक गोले को इससे जोड़ते है। छड़ के आकर्षण के कारण मुक्त इलेक्ट्रॉन दाए गोले में बायीं तरफ जाएँगे और इलेक्ट्रोन की कमी के कारण दाए गोले पर धनात्मक आवेश आयेगा और बाएँ गोले पर दाए गोले से इलेक्ट्रॉन के स्थानान्तरण के कारण इलेक्ट्रॉन अधिक हो जायेंगे जिससे ऋणात्मक आवेश आएगा।
§ अब जोड़ने वाले तार को काट देते है तथा छड को हटा देते है।
§ इस तरह पहला गोला ऋणात्मक और दूसरा गोला धनात्मक आवेशित होगा।
विधि-II :
§ एक उदासीन विलगित चालक गोला लेते है।
§ आवेशित छड इसके पास लाते है। आवेशित छड़ के कारण गोले पर प्रेरण उत्पन्न होगा।
§ गोले को पृथ्वी से जोड़ देते है। इस प्रक्रिया को भू सम्पर्कित करना कहते है। छड के आकर्षण के कारण कुछ मुक्त इलेक्ट्रॉन पृथ्वी से चालक पर आयेंगे इसलिए चालक पर इलेक्ट्रॉन अधिक होंगे इसलिए चालक पर ऋणात्मक आवेश होगा।
§ अब तार को काट दो व
छड़ को हटा दो , अब गोले पर कुल ऋणात्मक आवेश होगा।
विद्युतदर्शी क्या
है
, चित्र
, बनावट
व कार्यविधि electroscope in hindi , working स्वर्ण पत्र gold leaf
gold
leaf electroscope in hindi ,working स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी यंत्र : किसी वस्तु पर उपस्थित आवेश के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए जैसे की उस वस्तु पर कितना (अनुमानित) आवेश उपस्थित है , यदि दो आवेशित वस्तु दी गयी है तो उन दोनों वस्तुओं पर आवेश की प्रकृति समान है या विपरीत इस प्रकार की जानकारी हमें जिस उपकरण से प्राप्त होती है उसे स्वर्ण पत्र विधुतदर्शी (gold
leaf electroscope) कहते है।
विद्युतदर्शी उपकरण का निर्माण या संरचना या बनावट (structure) :
यह यंत्र एक काँच की बोतल के समान (जार जैसा) होता है , इसमें एक धातु की छड़ चित्रानुसार खड़ी सेट रहती है , इस धातु की छड़ का ऊपरी सिरे पर धातु की डिस्क लगी होती हैं तथा इस छड़ के निचे वाले सिरे पर अर्थात दूसरे छोर पर सोने (स्वर्ण) की दो पत्तियाँ लगी रहती हैं।
कार्यविधि (working) :
जब किसी आवेशित वस्तु की धातु की डिस्क से सम्पर्क कराया जाता हैं तो वस्तु पर उपस्थित कुछ आवेश की मात्रा धातु की छड़ से होती हुई सोने की पत्तियों तक पहुँच जाता है तथा प्रतिकर्षण बल के कारण पत्तियाँ फैल जाती है।
स्वर्ण (सोने) की पत्तियों में फैलाव वस्तु पर आवेश की मात्रा का एक अनुमानित मान प्रदान करता है अर्थात पत्तियों में यदि फैलाव अधिक है तो वस्तु पर उपस्थित आवेश अधिक है तथा फैलाव कम है तो इसका अभिप्राय है की वस्तु उपस्थित आवेश की मात्रा कम है।
यदि दो आवेशित वस्तु दी गयी है और आवेश के बारे में जानकारी प्राप्त करनी है तो पहले एक वस्तु को धात्विक छड़ से संपर्क कराया जाता है जिससे स्वर्ण पत्तियों में फैलाव आता है अब दूसरी वस्तु को स्पर्श करवाते है यदि दोनों वस्तुओं पर समान प्रकृति का आवेश होगा तो पत्तियों में और अधिक फैलाव आएगा और यदि दूसरी वस्तु पर विपरीत प्रकृति का आवेश है तो सोने की पत्तियों में फैलाव में कमी आएगी।
इस प्रकार यह भी पता लगाया जा सकता है की दो वस्तुओं पर उपस्थित आवेश समान प्रकृति का हैं या विपरीत प्रकृति का।
स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी का कार्य बताइये (gold leaf electroscope in
hindi)
यह एक ऐसा उपकरण होता है जिसकी सहायता से किसी भी आवेशित वस्तु पर आवेश की उपस्थिति तथा आवेश की प्रकृति का पता लगाया जा सकता है। स्वर्णपत्र वैद्युतदर्शी की सहायता से विभवान्तर की माप भी की जा सकती है।
कार्यविधि एवं संरचना : इसमें चित्रानुसार काँच का जार होता है जिसके मुख में एक अचालक पदार्थ का ढक्कन लगा रहता है तथा इस ढक्कन से होकर एक धातु की छड जार के अन्दर जाती है।
इस छड़ के निचले सिरे पर अत्यधिक पतले दो स्वर्ण पत्र (सोने की पत्तियां) लगे रहते है एवं ऊपरी सिरे पर एक धातु की चकती लगी रहती है। विधुतदर्शी की सुग्राहिता बढाने के लिए स्वर्ण पत्रों के सामने जार की दिवार में दो टिन की पत्तियाँ चिपका दी जाती है।
स्वर्ण पत्र अत्यंत हल्के होते है एवं चालक होने के कारण वे बहुत कम स्थिर विद्युत बल का भी शीघ्रता से प्रभाव प्रदर्शित करने लगते है। जब कोई आवेशित छड़ धातु की चकती से स्पर्श करायी जाती है तो छड का आवेश छड के माध्यम से स्वर्ण पत्रों तक पहुँच जाता है तथा स्वर्ण पत्र एक दुसरे को प्रतिकर्षित करने लगते है तथा वे फ़ैल जाते है। स्वर्ण पत्रो का फैलना चकती से स्पर्श करायी गयी छड के आवेशित होने का प्रमाण है। स्वर्ण पत्रों का फैलाव आवेश के परिमाण के अनुपात में होता है।
स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी के स्वर्ण पत्रों को ज्ञात प्रकार का आवेश देने के बाद यदि कोई अन्य छड चकती स्पर्श करायी जाती है एवं पत्तियों का फैलाव बढ़ता है तो छड़ पर समान प्रकार का आवेश होगा तथा यदि पत्तियों का फैलाव कम होता है तो छड़ पर आवेश विपरीत प्रकृति का होगा।
आवेश
का
मात्रक क्या
है
, विमा
, परिभाषा तथा
सूत्र
unit of charge in hindi
आवेश का मात्रक
(unit of charge) : विद्युत धारा को
S.I (system international) (अंतर्राष्ट्रीय पद्धति) में मूल राशि के रूप में माना जाता है तथा विधुत धारा का मात्रक एम्पियर
(A) होता हैं।
आवेश का S.I पद्धति में मात्रक कूलम्ब
(Coulomb) (कूलॉम) होता है।
1C = 1 AS
विद्युत आवेश की विमा निम्न प्रकार लिखी जाती है।
[Q] =
M0L0T1A1
अन्य मात्रक निम्न प्रकार भी लिखे जाते हैं।
1 PC
= 10-12 C
1 nC
= 10-9 C
1 μC
= 10-6 C
आवेश का CGS
(centimetre–gram–second) (सेन्टीमीटर – ग्राम – सेकण्ड )
पद्धति में मात्रक फ्रैंकलिन या स्टेट कूलाम है।
1 C
= 3 x 109 esu
आवेश का मात्रक फैराडे भी होता हैं।
1 फैराडे =
96500 C
आवेश की परिभाषा (definition of charge) :
आवेश का मात्रक कूलाम होता है इसको निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है –
किसी तार में एक बिंदु से गुजरने वाले आवेश की प्रति सेकंड की मात्रा जबकि धारा 1 एम्पियर रखी जाये , आवेश की इस मात्रा को
1 कूलॉम आवेश कहते है।
इसको निम्न सूत्र द्वारा भी समझा जा सकता है –
चूँकि हम जानते है
विद्युत धारा (I)
= गुजरने वाला आवेश (Q) (कूलॉम में) / समय (T) (सेकंड में)
अतः
Q (आवेश) =
IT
यदि I =
1 ऐम्पियर रखा जाए तथा समय 1 सेकण्ड रखी जाये तो आवेश (Q) का मान 1 कूलॉम होगा।
Q = 1 x 1
Q = 1 A
विद्युत आवेश : किसी वस्तु के पदार्थ या कण का आवेश , वह प्रकृति (ग्रहण की गयी या प्राकृतिक) है जिसके कारण यह वैद्युत व चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न और महसूस करता है। कुछ प्राकृतिक आवेशित कणों के उदाहरण – इलेक्ट्रॉन , प्रोटोन , एल्फा कण आदि।
आवेश एक व्युत्पन्न भौतिक राशि है। S.I पद्धति में आवेश कुलाम में मापा जाता है।
अभ्यास में इसे मिलीकुलाम (mC) = 10-3C
माइक्रोकुलाम (uC) = 10-6C
नैकोकुलाम (nC) = 10-9C आदि काम में लेते है।
आवेश का C.G.S मात्रक = स्थिर वैद्युत इकाई = esu
1 कूलाम = 3 x 109 स्थिर वैद्युत इकाई का आवेश
आवेश की विमा = M0L0T1I1
आवेश के गुण :
1. आवेश एक अदिश राशि है :- आवेश को बीजगणितीय रूप में जोड़ा जाता है और इलेक्ट्रॉनो की न्यूनता या अधिकता को प्रदर्शित करता है।
2. आवेश दो प्रकार का है :- (i) ऋणात्मक आवेश , (ii) धनात्मक आवेश। किसी वस्तु का आवेशन एक वस्तु से दूसरी वस्तु में आवेश का स्थानान्तरण है। धनात्मक आवेश से तात्पर्य इलेक्ट्रानों की हानि से है अर्थात इलेक्ट्रॉनों की न्यूनता। ऋणात्मक आवेशित वस्तु से तात्पर्य इलेक्ट्रॉनों की अधिकता है। इससे यह भी प्रदर्शित होता है कि एक ऋण आवेशित वस्तु का द्रव्यमान > समान धन आवेशित वस्तु का द्रव्यमान।
3. आवेश संरक्षित रहता है : एक विलगित निकाय में कुल आवेश (धनात्मक व ऋणात्मक का जोड़) नियत रहता है , चाहे उस निकाय में कुछ भी परिवर्तन हो।
5. समान प्रकृति के आवेश एक दुसरे को प्रतिकर्षित करते है जबकि विपरीत प्रकृति के आवेश परस्पर आकर्षित होते है।
6. आवेश सदैव द्रव्यमान से सम्बद्ध होता है अर्थात द्रव्यमान के बिना आवेश का अस्तित्व नहीं होता यद्यपि आवेश के बिना द्रव्यमान का अस्तित्व संभव है। कुछ कण जैसे फोटोन , न्यूट्रीनो इनका द्रव्यमान (विराम) नहीं होता , अत: इन पर कोई आवेश भी नहीं होता है।
7. आपेक्षिकता के सन्दर्भ में अपरिवर्तित है : इसका तात्पर्य यह है कि आवेश निर्देश तन्त्र पर निर्भर नहीं करता है अर्थात किसी वस्तु का आवेश परिवर्तित नहीं होता है , चाहे इसकी चाल कुछ भी हो , इसके विपरीत वस्तु का द्रव्यमान वस्तु की चाल पर निर्भर करता है और चाल के साथ बढ़ता है।
8. एक स्थिर आवेश इसके चारों ओर केवल विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है , एक समान रूप से गति करने वाला आवेश इसके चारो ओर विद्युत क्षेत्र व चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है जबकि त्वरित गति करता हुआ एक आवेश व चुम्बकीय विद्युत चुम्बकीय तरंगे उत्पन्न करता है।
विद्युत आवेशों की
योज्यता additivity of electric charges in hindi
additivity of electric
charges in hindi विद्युत आवेशों की योज्यता : कोई भी आवेश एक अदिश राशि होता है अर्थात आवेश को लिखने व दर्शाने के लिए केवल मान की आवश्यकता होती है दिशा की नहीं।
विद्युत आवेश योगात्मक प्रकृति का होता है अर्थात किसी भी निकाय पर उपस्थित कुल आवेश का मान सभी आवेशों के बीजगणितीय योग के बराबर होता है।
अर्थात निकाय पर कुल आवेश का मान निकालने के लिए सभी आवेशों को धनात्मक या ऋणात्मक चिन्ह के साथ लिखकर जोड़ा जाता है।
यहाँ ध्यान देने वाली यह बात है की ऋणात्मक आवेश को ऋणात्मक चिह्न के साथ तथा धनात्मक आवेश को धनात्मक चिह्न के साथ लिखा है तथा इस प्रकार लिखकर उनका योग किया जाता है।
विद्युत आवेशों की योज्यता का उदाहरण :
किसी वस्तु पर चार आवेश उपस्थित है +8q , +3q , -7q तथा +2q , बताइये की उस वस्तु पर उपस्थित कुल आवेश कितना होगा।
हल : वस्तु पर कुल आवेश = सभी आवेशों का बीजगणितीय योग
कुल आवेश (Q) = (+8q) +
(+3q) + (-7q) + (+2q)
Q = +8q +3q -7q +2q
Q = +6q
नोट : यदि किसी वस्तु पर कुल आवेश का मान शून्य प्राप्त होता है तो इसका अभिप्राय है की वस्तु अनावेशित अर्थात उदासीन है।
विद्युत आवेश
की
निश्चरता invariance of electric charge in hindi
invariance of
electric charge in hindi विद्युत आवेश की निश्चरता : विद्युत आवेश निर्देश तंत्र पर निर्भर नहीं करता है अर्थात निर्देश तंत्र के चुनाव से स्वतंत्र रहता है।
यहाँ आवेश का निर्देश तंत्र पर निर्भर न करने का अभिप्राय यह है की आवेश का मान भिन्न भिन्न स्थानों पर भी समान रहता है।
आवेश का मान वस्तु की चाल से भी स्वतंत्र होता है अर्थात किसी वस्तु पर विद्युत आवेश (q) का मान सभी दशाओं में समान (q) बना रहता है चाहे वस्तु विराम अवस्था में हो या गतिशील अवस्था में।
विराम अवस्था में आवेश = गतिशील अवस्था में आवेश का मान
Qrest = Qmotion
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुसार द्रव्यमान (m) , वेग पर निर्भर करता है , यदि एक वस्तु बहुत अधिक मान से गतिशील है तो इसका भार (m) (द्रव्यमान) , विराम अवस्था में स्थित उसी वस्तु के द्रव्यमान से भिन्न होता है।
लेकिन आवेश के साथ यह संभव नहीं है , आवेश का मान वस्तु की गति से स्वतंत्र रहता है।
लेकिन किसी वस्तु के आवेश (q) तथा द्रव्यमान (m) के अनुपात को विशिष्ट आवेश कहते है।
विशिष्ट आवेश = q/m
चूँकि हम पढ़ चुके है की गतिमान अवस्था में m परिवर्तित होता है अतः सूत्रानुसार विशिष्ठ आवेश भी परिवर्तित होगा।
अर्थात विशिष्ट आवेश वस्तु की गति पर निर्भर करता है।
विद्युत आवेश संरक्षण का नियम क्या है conservation of electric charge in hindi
विद्युत आवेश संरक्षण (conservation of
electric charge) : आवेश के इस गुणधर्म के अनुसार आवेश को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है।
किसी भी वस्तु पर उपस्थित कुल आवेश संरक्षित रहता है , किन्ही भी प्रक्रिया या विधियों द्वारा कुल आवेश को परिवर्तित अर्थात कम या अधिक नहीं किया जा सकता है।
आवेश को केवल एक वस्तु से दूसरी वस्तु पर स्थान्तरित किया जा सकता है।
विद्युत आवेश संरक्षण नियम को अधिक समझने के लिए निम्न उदाहरणों पर ध्यान दीजिये –
1. घर्षण द्वारा आवेशन प्रक्रिया में हमने देखा था की जब एक काँच की छड़ व रेशम के कपडे में घर्षण से पूर्व कोई आवेश उपस्थित नहीं था अर्थात दोनों वस्तुऐ उदासीन थी , लेकिन घर्षण प्रक्रिया के बाद काँच की छड़ धनावेशित तथा रेशम का कपड़ा ऋणावेशित (समान मात्रा में) हो जाता है , दोनों वस्तुओं पर आवेश स्वतः उत्पन्न नहीं हुआ है यह आवेश स्थानांतरण प्रक्रिया से आया है।
जब काँच की छड़ को रेशम के कपड़े से रगड़ा जाये तो काँच की छड़ से इलेक्ट्रॉन रेशम के कपड़े में स्थानांतरित हो जाता है , इलेक्ट्रॉन की अधिकता के कारण रेशम का कपड़ा ऋणावेशित हो जाता है , जितनी मात्रा में रेशम के कपड़े पर इलेक्ट्रॉन की अधिकता हुई है उतनी मात्रा में कांच की छड़ पर कमी हुई है जिससे काँच की छड़ पर धनावेश आ जाता है (समान मात्रा में )
परन्तु अगर पूरे निकाय के कुल आवेश की बात करे तो वह शून्य होगा अर्थात यदि रेशम के कपड़े पर -q आवेश उत्पन्न हुआ है तो कांच की छड़ पर +q आवेश उत्पन्न होगा और कुल आवेश = +q + (-q) = 0
अर्थात शून्य होगा।
2. जब electron व पॉज़िट्रॉन आपस में टकराते है तो फलस्वरूप चुंबकीय विकिरण उत्पन्न होती है , चुंबकीय विकिरण पर आवेश शून्य होता है तथा प्रारम्भ में भी इलेक्ट्रॉन व पॉज़िट्रान दोनों का कुल आवेश शून्य होता है यहाँ आवेश संरक्षण गुणधर्म देखा जा सकता है।
(इलेक्ट्रॉन)e– + (पॉज़िट्रॉन)e+ → y
(1.02 Mev)
ठीक इसी प्रकार चुंबकीय विकिरण द्वारा इलेक्ट्रॉन व पॉजिट्रॉन उत्पन्न किये जा सकते है जिसमे भी आवेश संरक्षित रहता है।
Y (1.02 Mev) → (इलेक्ट्रॉन)e– + (पॉज़िट्रॉन)e+
3. नाभिक अभिक्रिया तथा रेडियो धर्मी क्षय में भी आवेश संरक्षण का नियम कार्य करता है।
92U238 → 90Th234 + 2He4 (अल्फा कण)
7N14 + 2He4 → 9F18 → 8O17 + 1H1
आवेश
का
क्वांटीकरण क्या
है
quantization of charge in hindi , आवेश क्वान्टीकृत है , charge is quantised meaning
आवेश क्वान्टीकृत है ,
charge is quantised meaning ,
quantization
of charge in hindi आवेश का क्वांटीकरण : आवेश का स्थानान्तरण जब एक वस्तु से दूसरी वस्तु में किया जाता है तो यह इलेक्ट्रॉन के पूर्ण गुणन के रूप में होता है अर्थात स्थानांतरित आवेश को इलेक्ट्रॉन के पूर्ण गुणज जैसे e ,
2e , 3e इत्यादि लिखा जाता है।
आवेश का स्थानांतरण भिन्न के रूप में संभव नहीं है अर्थात e/2 , e/3 इत्यादि संभव नहीं है।
आवेश का वह न्यूनतम मान (e) जिसका आदान-प्रदान प्रक्रिया में उपयोग किया जा सकता है उसे उस भौतिक राशि का क्वाण्टम तथा इस प्रक्रिया को क्वांटीकरण कहते है।
आवेश का स्थानांतरण e के गुणज के रूप में होता है तथा न्यूनतम मान 1e होता है।
उदाहरण :
जब काँच की छड़ को रेशम के कपड़े से रगड़ा गया तो काँच की छड़ से इलेक्ट्रॉन रेशम की छड़ पर स्थानांतरित होते है यहाँ स्थानांतरित इलेक्ट्रॉन पूर्ण संख्या (गुणज) के रूप में होते है तथा न्यूनतम स्थानांतरण 1 इलेक्ट्रॉन (1e) का हो सकता है इस गुण को ही आवेश का क्वांटीकरण नियम कहते है।
अतः स्थानांतरित आवेश को (उत्पन्न आवेश) को निम्न सूत्र द्वारा लिखा जा सकता है।
Q = ± ne
यहाँ n = 1 , 2 , 3 , 4 …….
e = 1.6 x 10-19 कूलॉम
यदि n = 1
Q = ± e
अर्थात न्यूनतम संभव स्थानांतरण आवेश 1e = 1.6 x 10-19 कूलॉम होगा।
नोट : आवेश सदैव द्रव्यमान से सम्बन्धित है अर्थात बिना द्रव्यमान के आवेश का कोई अस्तित्व नहीं है अर्थात यदि किसी वस्तु पर आवेश उपस्थित है तो उस वस्तु का कुछ न कुछ द्रव्यमान है।
लेकिन द्रव्यमान आवेश से सम्बन्धित नहीं भी हो सकता , अर्थात यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान है तो यह आवश्यक नहीं की उस पर आवेश उपस्थित हो ही।
उदाहरण : न्यूट्रॉन का द्रव्यमान है पर आवेश शून्य होता है।
नोट : स्थिर अवस्था में आवेश विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है।
एक समान वेग से गतिशील आवेश वैधुत क्षेत्र तथा चुंबकीय क्षेत्र दोनों उत्पन्न करता है।
त्वरित गति से गतिमान आवेश वैधुत क्षेत्र , चुंबकीय क्षेत्र के साथ साथ विद्युत चुंबकीय विकिरण भी उत्सर्जित करता है।
आवेश क्वान्टीकृत है (charge is quantised) : किसी भी आवेशित वस्तु पर आवेश सदैव वैद्युत आवेश की मूल इकाई का पूर्ण गुणज होता है। यह इकाई एक इलेक्ट्रॉन के आवेश के परिमाण के बराबर है। (1 e = 1.6 x 10-19कूलाम ) इसलिए किसी वस्तु पर आवेश Q = ± ne , जहाँ n एक पूर्णांक है और e एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश है। मिलिकन के तेल बूंद प्रयोग से आवेश का क्वान्टीकरण या आवेश की परमाणुकता सिद्ध होती है।
अपवाद : हाल ही में ±e/3 व ±2e/3 आवेश के कणों की परिकल्पना की गयी है , इन कणों को क्वार्क्स कहते है लेकिन इसे आवेश का क्वान्टम नहीं माना गया है क्योंकि यह अस्थायी है।
कूलाम
नियम
क्या
है
, कूलॉम
का
नियम
, coulomb’s law in hindi , सूत्र स्थापना या व्युत्पन्न , महत्व
coulomb’s law in hindi , सूत्र स्थापना या व्युत्पन्न , महत्व , कूलाम नियम क्या है , कूलॉम का नियम , कुलाम का नियम किसे कहते है , सूत्र स्थापना , विमा :-
परिभाषा :
सन 1785 में प्रसिद्ध फ्रांसीसी वैज्ञानिक कूलॉम ने आवेशित वस्तुओं या दो बिंदु आवेशों के मध्य लगने वाले आकर्षण या प्रतिकर्षण के सन्दर्भ में एक नियम दिया जिसे कूलॉम का नियम कहते है।
कूलॉम ने अपना यह नियम ऐंठन तुला प्रयोग द्वारा किये गए आवेशों पर प्रयोग के आधार पर दिया। कूलॉम ने दो बिंदु आवेशों के मध्य लगने वाले बल के परिमाण को ज्ञात करने के लिए ऐंठन तुला प्रयोग की सहायता ली और विभिन्न प्रकार के प्रयोग करने के बाद अपना नियम प्रतिपादित किया , कूलॉम के नियम को कूलॉम का व्युत्क्रम वर्ग नियम भी कहते है।
कूलॉम ने अपने नियम में बताया की
” दो स्थिर बिंदु आवेशों के मध्य लगने वाला आकर्षण या प्रतिकर्षण बल का मान दोनों आवेशों के परिमाणों के गुणनफल के समानुपाती होता है तथा दोनों आवेशों के मध्य दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
आवेशों पर कार्यरत बल दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कार्यकारी होता है। कूलॉम के अनुसार दोनों आवेशों पर लगने वाला बल माध्यम की प्रकृति (medium) पर भी निर्भर करता है।
कूलॉम के नियम का गणितीय निरूपण :
माना दो आवेश q1 तथा q2 , r दूरी पर स्थित है तो उनके मध्य लगने वाला आकर्षण या प्रतिकर्षण बल F है तो
लगने वाला बल दोनों आवेशों के परिमाणों के गुणनफल के समानुपाती होता है अर्थात
F ∝ q1 . q2
तथा कार्यरत बल दोनों आवेशों के आवेशों के मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
F ∝ 1/r2
अतः
समानुपाती चिन्ह हटाने पर
यहाँ k = समानुपाती नियतांक कहते है।
k का मान आवेशों के मध्य उपस्थित माध्यम की प्रकृति और मात्रक पर निर्भर करता है।
शर्तें :
1. यदि आवेश निर्वात (वायु) में रखे है और बल न्यूटन (मात्रक ) में तथा दूरी (r) मीटर में है तथा आवेश कूलॉम में दिए गए है तो k (समानुपातिक नियतांक) का निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है।
k = K
= 9 x 109
यहाँ ε0 (एप्साइलन जीरो )
को निर्वात की विद्युतशीलता कहते है।
निर्वात (वायु) में आवेशों के मध्य लगने वाला बल F0 है तो निम्न प्रकार से व्यक्त करते है।
2. यदि दो आवेश निर्वात (वायु) के अतिरिक्त अन्य किसी माध्यम में रखे है तो
यहाँ ε = माध्यम की विधुतशीलता कहलाता है।
अतः लगने वाला बल
कूलाम का नियम :
फ़्रांसिसी वैज्ञानिक कूलॉम ने सन 1785 में आवेशित वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले आकर्षण एवं प्रतिकर्षण बलों का परिमाणात्मक अध्ययन एंठन तुला के प्रयोग द्वारा किया और इस प्रयोग से प्राप्त प्रेक्षणों के आधार पर एक नियम की स्थापना की जिसे कूलॉम का व्युत्क्रम वर्ग नियम कहते है।
कूलॉम के नियम के अनुसार “दो स्थिर बिंदु आवेशों के मध्य कार्य करने वाले आकर्षण या प्रतिकर्षण बल दोनों आवेशों की मात्राओं के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती और उनके मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यह बल दोनों आवेशो को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होता है। ”
इस प्रकार यदि बिंदु आवेशो q1 व q2 के मध्य की दूरी r हो तो कूलाम के नियम के अनुसार उनके मध्य लगने वाला आकर्षण या प्रतिकर्षण बल
F ∝ q1q2
तथा F ∝ 1/r2
अत: F ∝ q1q2/r2
F = k q1q2/r2
यहाँ
k समानुपातिक नियतांक है।
1. जब दोनों आवेशों को कुलाम में व्यक्त किया जाए और दोनों आवेश निर्वात या वायु में रखे हो व बल को न्यूटन में , दूरी को मीटर में व्यक्त किया जाए तो k
= 1/4πε0= 9 x 109 न्यूटन.मीटर2/कूलाम2
यहाँ एप्साइलन जीरो (ε0 ) , निर्वात की विद्युतशीलता है।
जब निर्वात अथवा वायु में आवेशों के मध्य लगने वाला बल F0 से व्यक्त करे तो कुलाम के नियमानुसार –
F0 = (1/4πε0) (q1q2/r2) न्यूटन
2. यदि आवेश किसी अन्य माध्यम में रखे हो तो –
k = 1/4πε
यहाँ ε
, माध्यम की विद्युतशीलता है।
अत: कुलाम के नियमानुसार –
F = (1/4πε)
(q1q2/r2) न्यूटन
प्रयोगों से यह देखा गया कि दो बिंदु आवेशों के मध्य किसी निश्चित दूरी के लिए कार्य करने वाला बल निर्वात में सबसे अधिक होता है , किसी माध्यम के लिए –
F
= F0/F = नियतांक = K = माध्यम का पराविद्युतांक
F0 व F का मान रखने पर –
ε/ε0 = K =
माध्यम का पराविद्युतांक
ε = ε0 K
यह निर्वात की विद्युतशीलता (ε0) और माध्यम की निरपेक्ष
विधुतशीलता (ε) के बीच सम्बन्ध पाया जाता है।
अत: कूलाम बल के लिए व्यापक सूत्र निम्न प्राप्त होता है –
K का मान निर्वात के लिए 1 होता है जो कि K का न्यूनतम मान है। वायु के लिए K का मान
1.00054 होता है। K का मान सभी कुचालक पदार्थों के लिए 1 से अधिक होता है उदाहरण के लिए पानी के लिए K का मान 80 तथा कागज के लिए K का मान 3.5 होता है। धातुओं के लिए K का मान अन्नत होता है क्योंकि आवेशों के मध्य धातु रखने पर उन आवेशो के मध्य कार्यरत बल का मान शून्य होता है।
आवेश के मात्रक (कुलाम) की परिभाषा :
कुलाम के नियम के अनुसार निर्वात में दो आवेशो के बीच लगने वाला बल –
F =
Kq1q2/r2
माना q1 = q2 =
1C तथा r = 1 मीटर
तो F =
K
चूँकि K
= 9 x 109 न्यूटन.मीटर2/कूलाम2
अर्थात F
= 9 x 109
अत: यदि निर्वात में एक मीटर की दूरी पर रखे दो समान परिमाण के आवेशो के बीच 9
x 109 न्यूटन का वैद्युत बल कार्य करे तो प्रत्येक आवेश एक कुलाम के बराबर होगा।
कुलाम के नियम का महत्व :
कूलाम के नियम के द्वारा निम्नलिखित बलों को सफलता पूर्वक समझाया जा सकता है –
1. अणु बनाने वाले परमाणुओं के मध्य बंधन बल की व्याख्या इसके द्वारा की जा सकती है।
2. किसी परमाणु के नाभिक और उसके चारों ओर घुमने वाले इलेक्ट्रॉनों के बीच लगने वाला बल को कुलाम के नियम से समझाया जा सकता है।
3. अणुओं अथवा परमाणुओं को परस्पर सम्बद्ध कर द्रव या ठोस बनाने वाले बल।
निर्वात की विद्युतशीलता (ε0) का मात्रक
= C2N-1m-2 या कुलाम2/न्यूटन.मीटर2
निर्वात की विद्युतशीलता (ε0)
की विमा (विमीय सूत्र) = [M-1L-3T4A2]कुलॉम का नियम :
दो स्थिर बिंदु आवेशो के मध्य आकर्षण या विकर्षण का बल , आवेशो के गुणनफल के समानुपाती और उनके मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यह बल दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश लगता है।
यदि आवेशो का परिमाण q1 व q2 एवं उनके मध्य की दूरी r है तो उनके मध्य लगने वाला बल F है तो –
F ∝ q1q2
F ∝ 1/r2
अत: F ∝ q1q2/r2
अर्थात
F = C q1q2/r2
यहाँ C नियतांक है जो दोनों आवेशों के मध्य स्थित माध्यम तथा चयन की गयी इकाइयों पर निर्भर करता है।
C
= 1/4πε0 = 9 x 109 न्यूटन.मीटर2/कूलाम2
(SI मात्रक)
C = 1 (esu मात्रक या स्थिर वैद्युत मात्रक में)
ε0 =
8.85 x 10-12 कूलाम2/न्यूटन.मीटर2 =
मुक्तावकाश की पारगम्यता
माध्यम का प्रभाव :
किसी माध्यम का परावैद्युतांक किसी निश्चित दूरी पर स्थित बिंदु आवेशों के मध्य वायु में लगने वाले बल तथा समान दूरी पर स्थित उस माध्यम में उन आवेशों पर लगने वाले बल का अनुपात के तुल्य होता है।
Fवायु = q1q2/4π ε0r2
Fमाध्यम = q1q2/4π ε0εrr2
Fमाध्यम/ Fवायु = 1/εr =
K
εr या K = परावैद्युतांक या सापेक्ष पारगम्यता या माध्यम की विशिष्ट प्रेरणिक क्षमता है।
पारगम्यता :
माध्यम के चारों ओर स्थित विद्युत आवेशो के कारण माध्यम से गुजरने वाली विद्युत बल रेखाओ के माध्यम से गुजरने की क्षमता उस माध्यम की पारगम्यता का मापदण्ड होती है , यह आवेशो के मध्य लगने वाले बलों को व्यक्त करती है।
आपेक्षिक पारगम्यता :
किसी माध्यम की आपेक्षिक पारगम्यता या परावैध्युतांक (εr या K ) माध्यम की पारगम्यता ε तथा मुक्तावकाश की पारगम्यता ε0 के अनुपात के तुल्य होती है।
εr या K
= ε/ε0
पारगम्यता की विमाएँ ε0 = आवेश2/बल x लम्बाई2
= T2A2/MLT-2L2
= M-1L-3T4A2
विभिन्न माध्यमों के पराविद्युतांक :
निर्वात = 1
वायु =
1.00059
जल = 80
अभ्रक = 6
टेफ़लोन = 2
काँच
= 5 से 10
प्लास्टिक =
4.5
धातुएँ
= ∞
विद्युत बल के नियम या कूलम्ब का नियम– दो समान आवेशों के बीच प्रतिकर्षण और दो असमान आवेशों के बीच आकर्षण का बल कार्य करता है। यह बल दोनों आवेशों के परिमाण, उनके बीच की दूरी तथा उनके बीच के माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करता है। कुलम्ब ने अपने प्रयोगों के आधार पर दो आवेशों के बीच कार्य करने वाले बल के लिए दो नियम प्रतिपादित किए
– दो आवेशों के बीच आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण का बल उनके आवेशों के गुणनफल का अनुक्रमानुपाती होता है।
– दो आवेशों के बीच आकर्षण या विकर्षण का बल आवेशो के बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है। यह नियम व्युत्क्रम-वर्ग-नियम कहलाता है।
विद्युत विभव- एकांक धन आवेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में जो कार्य करना पड़ता है, उसे विद्युत विभव कहते है। अर्थात विद्युत विभव किसी धनात्मक परीक्षण आवेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में किए गए कार्य (ॅ) एवं परीक्षण आवेश के मान (ु0) की निष्पत्ति है। अतः
विद्युत विभव, ट = ॅध् ु0
विद्युत विभव का ैप् मात्रक जूल प्रति कूलम्ब होता है, जिसे वोल्ट भी कहते हैं। विभव का मात्रक वोल्ट इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलसेन्ड्रो वोल्टा के सम्मान में रखा गया है। विभव एक अदिश राशि है।
विभवान्तर– एक कूलम्ब धनात्मक आवेश को विद्युत क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने मे किए गए कार्य को उन बिन्दुओं में मध्य विभवान्तर कहते है। विभवान्तर का मात्रक भी वोल्ट होता है तथा यह भी एक अदिश राशि हैं।
परावैद्युतांक की
परिभाषा क्या
है
dielectric constant in hindi , relative permittivity meaning
relative permittivity meaning
in hindi , परावैद्युतांक की परिभाषा क्या है
dielectric constant in hindi , आपेक्षिक विद्युत शीलता , वैद्युतशीलता , विशिष्ट परावैधुतता :-
dielectric
constant in hindi परावैद्युतांक
: जब दो समान परिमाण वाले आवेशों को एक समान दूरी पर रखकर विभिन्न माध्यमों में कार्यरत विद्युत बल का मान ज्ञात किया तो कूलॉम ने यह पाया की भिन्न भिन्न माध्यमों में विद्युत बल का मान अलग अलग प्राप्त होता है अर्थात दोनों आवेशों के मध्य का माध्यम बदलने पर विद्युत बल का मान भी भिन्न होता है।
कूलॉम ने अपने प्रयोगों से यह पाया की निर्वात (वायु ) में विद्युत बल का मान सबसे अधिक व कुचालक माध्यम में विद्युत बल अपेक्षाकृत कम होता है तथा दोनों आवेशों के मध्य सुचालक माध्यम होने पर बल का मान शून्य प्राप्त होता है।
अतः यह कहा जा सकता है की ” किसी माध्यम की उपस्थिति में आवेशों के मध्य विद्युत बल , निर्वात (वायु ) की तुलना में जितने गुना कम प्राप्त होता है उसे उस माध्यम का परावैद्युतांक (dielectric constant) या आपेक्षिक विद्युत शीलता (relative
permittivity ) अथवा विशिष्ट परावैधुतता कहा जाता है।
परावैद्युतांक या आपेक्षिक विद्युत शीलता अथवा विशिष्ट परावैधुतता
εr = F/Fm
चूँकि हम जानते है की
तथा
अतः
εr = ε/ε0
εr की विमा :
εr (आपेक्षिक परावैद्युतांक) एक विमाहीन राशि है अर्थात इसकी कोई विमा नहीं है।
कुछ माध्यम व उनके आपेक्षिक विद्युत शीलता के मान दिए गए है।
|
माध्यम |
परावैद्युतांक |
|
हवा |
1.00059 |
|
काँच |
5 – 10 |
|
अभ्रक |
3 – 6 |
|
पैराफीन मोम |
2 – 2.5 |
|
आसुत जल |
80 |
|
निर्वात |
1 |
|
ग्लिसरीन |
42.5 |
|
रबर |
7 |
|
ऑक्सीजन |
1.00053 |
|
सुचालक |
अनंत |
कूलाम का नियम या व्युत्क्रम वर्ग नियम :
प्रयोगों के आधार पर कूलॉम ने निम्न परिणाम दिए जिन्हें सम्मिलित रूप से कुलाम का नियम कहते है | दो बिन्दुवत आवेशों के बीच लगने वाले स्थिर वैद्युत बल का परिमाण दोनों आवेशो के गुणनफल के समानुपाती व दोनों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है |
F ∝ q1q2
तथा F ∝ 1/r2
अत: F ∝ q1q2/r2
F = Kq1q2/r2
यह केवल बिंदु आवेशो पर ही लागू होता है।
समानुपाती नियतांक (K) का मान निर्वात में SI पद्धति में
1/4πε0 द्वारा दिया जाता है और किसी अन्य माध्यम में
1/4πε द्वारा।
यदि आवेशों को किसी माध्यम में रखा जाए तो किसी एक आवेश पर स्थिर वैद्युत बल
= (1/4πε0ε) (q1q2/r2) न्यूटन होगा। ε0 व ε क्रमशः
निर्वात एवं माध्यम की विद्युतशीलता है। अनुपात ε/ε0 = εr को माध्यम की आपेक्षिक वैद्युतशीलता कहते है जो कि एक विमाहीन राशि है।
आपेक्षिक विद्युत शीलता εr का मान 1 से अन्नत के बीच होता है। परिभाषा से निर्वात के लिए यह 1 होता है। हवा के लिए लगभग 1 (गणनाओं के लिए एक के बराबर लिया जा सकता है। ) धातुओं के लिए εr का मान अन्नत होता है। तथा पानी के लिए 81 होता है। जिस पदार्थ में अधिक आवेश प्रेरित हो सकता है उसका εr अधिक होगा।
1/4πε0 का मान = 9
x 109 न्यूटन.मीटर2/कूलाम2
ε0 का मान =
8.85 x 10-12 कूलाम2/न्यूटन.मीटर2
ε का विमीय सूत्र = M-1L-3T4A2 है।
किसी एक आवेश द्वारा दुसरे आवेश पर बल सदैव दोनों आवेशो को जोड़ने वाली रेखा के अनुदिश होता है। यह दोनों आवेशो पर समान परिमाण में किन्तु विपरीत दिशा में लगता है। उस माध्यम पर आधारित नहीं है। जिसमे वे दोनों रहते है।
बल संरक्षी है अर्थात किसी भी आकृति के बंद लूप के अनुदिश एक बिन्दुवत आवेश को गति कराने में स्थिर विद्युतिकी बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।
चूँकि यह बल केन्द्रीय बल है अत: बाह्य बलों की उपस्थिति में एक कण का दुसरे कण के सापेक्ष कोणीय संवेग (द्वि-कण निकाय) संरक्षित रहता है।
कूलॉम
के
नियम
का
सदिश
निरूपण (vector representation of coulomb’s law) , कूलाम नियम का सदिश रूप
(vector
representation of coulomb’s law form in hindi) कूलॉम के नियम का सदिश निरूपण : कूलॉम के नियम के अनुसार दो बिंदु आवेश q1 &
q2 के मध्य लगने वाला विद्युत बल दोनों के परिमाण (मान) के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
चूँकि आवेश धनात्मक या ऋणात्मक कुछ भी हो सकता है अतः आवेशों के परिमाण को |q1| & |q2| में प्रयोग किया गया है।
क्योंकि हम जानते है की बल एक सदिश राशि है अतः कूलॉम के नियम को सदिश रूप में लिखा जा सकता है , माना दो आवेश q1 &
q2 है तथा दोनों की प्रकृति समान है ये आवेश बिंदु A तथा B पर चित्रानुसार रखे है।
चूँकि दोनों आवेश समान प्रकृति के है अतः ये एक दूसरे को प्रतिकर्षित करेंगे।
A के स्थिति सदिश को निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते है
F12→
F12→
F12→
ठीक इसी प्रकार
आवेश q1 से q2 की ओर वेक्टर को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है।
ठीक इसी प्रकार आवेश q2 से q1 की ओर वेक्टर को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है।
एकांक वेक्टर के रूप में लिखने पर दोनों को निम्न प्रकार व्यक्त किया जाता है
माना q2 से q1 आवेश पर आरोपित बल F12 vector है तथा आवेश q1 से q2 पर आरोपित बल F21 vector है तो
चूँकि हम जानते है की r12 =
r21 = r
अतः
सदिश रूप में कूलाम का नियम
(Coulomb’s law in vector form in hindi) : कूलाम के नियम के अनुसार दो बिंदु आवेशों q1 व q2 के बीच लगने वाला वैद्युत बल आवेशों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है अर्थात यहाँ पर आवेशो के परिमाण |q1| एवं |q2| का प्रयोग किया गया है क्योंकि आवेश ऋणात्मक और धनात्मक कुछ भी हो सकते है एवं उसके अनुसार बल भी आकर्षण या प्रतिकर्षण प्रकृति का हो सकता है।
अत: F =
K|q1||q2|/r2
यहाँ K , स्थिर वैद्युत बल नियतांक है।
चूँकि बल सदिश राशि है अत: कुलाम बल को सदिश रूप में लिखना बेहतर होगा। माना समान प्रकृति के दो आवेश q1 व q2 बिदुओं
A व B पर रखे है। ये दोनों आवेश एक दुसरे पर प्रतिकर्षण बल आरोपित करेंगे।
बिंदु A का स्थिति वेक्टर r1 =
OA
बिंदु B का स्थिति वेक्टर r2 =
OB
इसलिए q1 व q2 की ओर अर्थात A से B की ओर वेक्टर –
AB
= r12 = r2 – r2
इसी प्रकार BA
= r21 = r1 – r2
r12 का परिमाण r12 एवं r21 का परिमाण |r21| होगा।
क्योंकि किसी वेक्टर की दिशा एकांक वेक्टर द्वारा निर्धारित होती है , जिसकी दिशा उसी वेक्टर के अनुदिश होती है अत:
एकांक वेक्टर r12 = r12/ |r12|
एकांक वेक्टर r21 = r21/ |r21|
अथवा
एकांक वेक्टर r12 = r12/ |r12|
एकांक वेक्टर r21 = r21/ |r21|
हम जानते है कि एकांक सदिश = स्थिति सदिश/सदिश का परिमाण
परिमाण को सदैव || मोड़ में लिखते है।
यदि q1 व q2 पर बल F12 हो और q1 व q2 पर बल F21 हो तो –
F12 =
q1q2 r21/4πE0|r21|2
और
F21 =
q1q2 r12/4πE0|r12|2
यदि q1 व q2 के मध्य दूरी r हो तो r12 = r21 = r
चूँकि F12 = q1q2 r21/4πE0|r21|2 समीकरण-1
और
F21 =
q1q2 r12/4πE0|r12|2 समीकरण-2
समीकरण-1 और समीकरण-2 कुलाम के नियम को सदिश रूप में व्यक्त करते है।
चूँकि r21 =
-r12
F12 =
-F21
इसी प्रकार यदि q1 व q2 विपरीत प्रकृति के आवेश है तो वे एक दुसरे को आकर्षित करेंगे।
इस दशा में कुलाम बल –
F12 =
q1q2.r12/4πE0.r122
और
F21 =
q1q2.r21/4πE0.r212
r12 का स्थिति सदिश = B का स्थिति सदिश – A का स्थिति सदिश
r12 का स्थिति सदिश = r2 – r1
r12 का परिमाण = |r2 – r1|
इसी प्रकार
r21 का स्थिति सदिश = A का स्थिति सदिश – B का स्थिति सदिश
r21 का स्थिति सदिश
= r1 – r2
r21 का परिमाण
= |r1 – r2|
यदि कोई वेक्टर निम्न प्रकार लिखा है –
r = xi + yj + zk
अत: |r|
= √(i का गुणांक)2 + (j का गुणांक)2 + (k का गुणांक)2
|r|
= √(x2 + y2 + z2)
answer -
F21 =
q2 पर q1 के कारण बल F21 =
q1q2.r21/4πE0.r212
F12 =
q1 पर q2 के कारण बल F12 = q1q2.r12/4πE0.r122
F12 =
-F21
इसी तरह r12 =
-r21
या F12 +
F21 = 0

















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