physics12th 7. प्रत्यावर्ती धारा

 प्रत्यावर्ती धारा नोट्स कक्षा 12 ac notes class 12 in hindi

प्रत्यावर्ती धारा तथा प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल की परिभाषा क्या है alternating current in hindi

alternating current in hindi प्रत्यावर्ती धारा तथा प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल की परिभाषा क्या है : ऐसी धारा जिसका परिमाण तथा दिशा दोनों समय के साथ बदलते रहते है तथा एक निश्चित अन्तराल बाद उसी परिमाण से अपना चक्कर शुरू करते है उसी दिशा में आरम्भ करते है अर्थात एक निश्चित समय बाद अपना पूरा चक्कर करने के बाद दूसरा चक्कर शुरू कर देते है इस धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहते है।

प्रत्यावर्ती धारा को आसानी से तथा कम खर्च में उत्पन्न किया जा सकता है।

प्रत्यावर्ती धारा का नियंत्रण प्रतिरोध (R) , प्रेरकत्व (L) तथा धारिता (C) का उपयोग परिपथ में करके किया जा सकता है। यही कारण होता है की जब हम प्रत्यावर्ती धारा पर कार्य करने वाले उपकरणों को खोलकर देखते है तो हमें सामान्यत: R , L , C देखने को मिल जाते है।

ठीक इसी प्रकार

ऐसा विद्युत वाहक बल जिसका परिमाण तथा दिशा दोनों समय के साथ बदलते रहते है तथा एक निश्चित अन्तराल बाद उसी परिमाण से अपना चक्कर शुरू करते है उसी दिशा में आरम्भ करते है जिस दिशा में पहले कर रहे थे अर्थात एक निश्चित समय में अपना पूरा चक्कर करने के बाद दूसरा चक्कर शुरू कर देते है इस प्रकार के विद्युत वाहक बल को ही प्रत्यावर्ती वि.वा.बल कहा जाता है।

प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल के तात्क्षणिक वेग को निम्न सूत्र द्वारा लिखा जाता है

E = E0Sin(wt)

यहाँ E = प्रत्यावर्ती वि.वा.बल

Eप्रत्यावर्ती वि.वा.बल का अधिकतम या शिखर मान

w = घूर्णन का कोणीय वेग

हम सूत्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है की प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल का मान समय (t) पर निर्भर करता है।

दिष्ट धारा , प्रत्यावृति , वर्गाकार , त्रिकोणीय तरंग , ज्यावक्रिय तरंग धारा परिभाषा क्या है

1. दिष्ट धारा (direct current ) : जब किसी धारा का मान तथा दिशा समय के साथ परिवर्तित हो रही हो तो ऐसी धारा को दिष्ट धारा कहते है।

अत: हम कह सकते है की दिष्ट धारा का मान समय के साथ नियत बना रहता है तथा दिशा भी समान रहती है।

इस प्रकार की धारा प्राप्त करने के लिए ऐसी युक्तियाँ काम में ली जाती है जिनके सिरों पर वोल्टता का मान नियत बना रहता है।


यहाँ चित्र में धारा तथा समय के मध्य ग्राफ दिखाया गया है , हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की धारा का मान समय के हर मान के लिए नियत बना हुआ है अर्थात इसका मान समय के साथ परिवर्तित नहीं हो रहा है अत: यह दिष्ट धारा का समय के साथ ग्राफ है।

चूँकि इस धारा का मान समय के साथ नियत बना रहता है इसलिए इसकी आवृति f भी शून्य होती ही।

2. प्रत्यावर्ती धारा (alternating current )

जब किसी धारा का मान समय के साथ परिवर्तित होता रहता है तथा जिसकी दिशा भी एक बदलती रहती है अर्थात आधे चक्र के लिए इसका मान धनात्मक होता है तथा आधे चक्कर के लिए इसका मान ऋणात्मक होता है इस प्रकार की धारा को प्रत्यावृति धारा कहते है।


यहाँ चित्र में समय तथा धारा के मध्य ग्राफ दिखाया गया है इसमें हम देखते है की समय के हर मान के लिए धारा का अलग मान है अर्थात समय के साथ धारा का मान बदल रहा है।

हम यह भी देखते है की आधे चक्कर के बाद धारा का मान ऋणात्मक प्राप्त हो रहा है अर्थात इसकी दिशा भी परिवर्तित हो रही है अत: ग्रफित धारा प्रत्यावृति धारा है।

3. वर्गाकार धारा (square wave current )

ऐसी धारा जिसका समय के सापेक्ष ग्राफ खीचने पर यह वर्गो के रूप में प्राप्त होता है उन्हें वर्गाकार धारा कहते है।
यह धारा शून्य से T/2 समय तक अधिकतम मान दर्शाती है तथा T/2 से T समय पर ऋणात्मक में अधिकतम मान देती है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
0
से T समय में यह अपना एक चक्कर पूरा करती है तथा इसी प्रकार आगे पुनरावृति करती है।


4. त्रिकोणीय तरंग धारा (triangular wave current )

इस प्रकार की धारा को समय के साथ ग्राफ पर बनाने पर ये त्रिकोण के रूप में प्राप्त होती है।

0 से इसका मान रेखिक रूप से बढ़ता है तथा T/4 समय पर अधिकतम हो जाता है।

T/4 समय से यह मान रेखिक रूप से कम होता है तथा T/2 समय पर मान शून्य हो जाता है।

इसी प्रकार T/2 से यह ऋणात्मक दिशा में बढ़ता है तथा 3T/4 समय पर ऋणात्मक दिशा में इसका मान अधिकतम हो जाता है तथा 3T/4 से T समय पर ऋणात्मक में रेखिक रूप से कम होकर शून्य पर जाता है। जैसा चित्र में दर्शाया गया है।


5. ज्यावक्रिय तरंग धारा (sinusoidal wave current )

इस प्रकार की धारा में परिवर्तन ज्या या कोज्या फलन के रूप में होता है।  भारत में 50 हर्ट्ज़ की धारा काम में ली जाती है तथा अमेरिका में 60 हर्ट्ज़ की आवृति की धारा।

इसको निम्न प्रकार लिखा जाता है

धारा I = Imsin(wt
ϴ)

वोल्टेज V = Vmsin(wt)

यहाँ

Im तथा Vक्रमशः धारा तथा वोल्टेज के अधिकतम मान है।

प्रत्यावर्ती धारा और वोल्टता के तात्क्षणिक , शिखर , औसत और वर्ग माध्य मूल मान

(Instantaneous , peak , average and root mean square values of alternating current and voltage) प्रत्यावर्ती धारा और वोल्टता के तात्क्षणिक , शिखर , औसत और वर्ग माध्य मूल मान : यहाँ हम कुछ परिभाषाओ के बारे में पढ़ते है जिनका उपयोग हम सामान्यत: करते है जिससे हम पाठ में आगे इनको उपयोग करे तो आप समझ सके साथ ही हम इन सबके लिए सूत्र की स्थापना भी करेंगे।

तात्क्षणिक मान (Instantaneous value )

किसी भी क्षण मापे गए या लिए गए प्रत्यावर्ती धारा के मान को चाहे यह धारा के रूप में हो या वोल्टेज के रूप में तो इसे प्रत्यावर्ती धारा का क्रमश: धारा तथा वोल्टेज के तात्क्षणिक मान कहते है।

 यह शून्य , ऋणात्मक या धनात्मक कुछ भी हो सकता है। निचे दिखाए चित्र में 1 , 2 , 3 सेकंड पर धारा का तात्क्षणिक मान क्रमशः I1
, I
2 , I3 है।

शिखर मान (peak value )

जब प्रत्यावर्ती धारा अपना एक पूर्ण चक्कर पूरा कर लेती है अब इस पूर्ण चक्कर में जो धारा या वोल्टता का अधिकतम मान प्राप्त होता है इसे ही शिखर मान कहते है।


चित्र में बिन्दु P पर हमें अधिकतम मान प्राप्त हो रहा है अत: यह धारा का शिखर मान है।

प्रत्यावर्ती धारा काऔसत मान (Average value of alternating current )

चूँकि हम पढ़ चुके है की प्रत्यावर्ती धारा अपने एक पूर्ण चक्कर में आधे चक्कर में धनात्मक दिशा में अधिकतम मान तक पहुंच कर शून्य हो जाती है तथा आधे चक्कर में ऋणात्मक दिशा में अधिकतम मान तक पहुंच कर पुन: शून्य हो जाती है।

अतः एक पूर्ण चक्कर में प्रत्यावर्ती धारा का औसत मान शून्य होता है क्यूंकि जितना मान धनात्मक होता है उतना ही ऋणात्मक होता है।

यही कारण है की जब एक धारामापी को प्रत्यावर्ती धारा के परिपथ में जोड़ा जाता है तो इसमें शून्य विक्षेप दिखता है क्यूंकि धारामापी में विक्षेप इसमें बहने वाली धारा के समानुपाती होता है और प्रत्यावर्ती धारा 50 हर्ट्ज़ की भारत में प्रयोग होती है अर्थात 1 सेकण्ड में प्रत्यावर्ती धारा अपने 50 चक्कर पूरे करती है।

अतः 1 सेकंड में 50 धनात्मक अर्द्ध चक्कर होते है तथा 50 ऋणात्मक अर्द्ध चक्कर।

अतः परिपथ में लगी धारामापी इतनी जल्दी विक्षेप उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाती है और इस पर हमें शून्य विक्षेप दिखाई देता है।

अतः हम प्रत्यावर्ती धारा के लिए आधे चक्कर के लिए औसत मान ज्ञात करते है

प्रत्यावर्ती धारा के आधे चक्कर के लिए औसत मान

माना प्रत्यावर्ती धारा का शिखर मान Iहै अतः धारा का तात्क्षणिक मान

I = Isin wt

प्रत्यावर्ती धारा के आधे चक्कर का  औसत मान = आधे चक्कर में घेरा क्षेत्रπ


इसी प्रकार वोल्टेज के लिए यहाँ I के स्थान पर V कर दीजिये बाकी चीजे समान रहती है।

प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान 

हमने देखा की जब प्रत्यावर्ती धारा के लिए पूर्ण चक्कर का औसत मान ज्ञात किया जाता है तो यह शून्य प्राप्त होता है इसलिए पूर्ण चक्कर के लिए वर्ग माध्य मूल मान ज्ञात करना पड़ता है।

एक पूरे चक्र के लिए प्रत्यावर्ती धारा के वर्ग के औसत मान के वर्गमूल को ही धारा का वर्ग मध्य मूल मान कहते है।

अर्थात इसमें पहले धारा का वर्ग किया जाता है , फिर औसत और फिर इसका वर्गमूल किया जाता है प्राप्त मान को धारा का वर्ग मध्य मूल मान कहते है।


पूर्ण चक्कर के लिए सूत्र स्थापना




प्रत्यावर्ती धारा की विशेषताएँ , नुकसान या दोष properties of alternating current in hindi

properties of alternating current in hindi प्रत्यावर्ती धारा की विशेषताएँ : यहाँ हम प्रत्यावर्ती धारा की कुछ खास बातों के बारे में अध्ययन करते है , जिससे हमको इसके बारे बेहतरीन तरीके से और गहन जानकारी प्राप्त होती है जिससे इसका अध्ययन अधिक गहन और सुलभ हो जाता है।

तो आइयें प्रत्यावर्ती धाराके बारे में कुछ और अधिक जानकारी या अध्ययन प्राप्त करते है।

1. जब हमें प्रत्यावर्ती धारा को अधिक दूरी तक भेजने की आवश्यकता होती है तो हम ट्रांसफॉर्मर का उपयोग करते है , ट्रांसफोर्मर के माध्यम से प्रत्यावर्ती धारा को कम शक्ति हास या नुकसान के साथ भी अधिक दूरी तक भेजा जा सकता है।  ट्रांसफोर्मर निम्न वोल्टेज को उच्च वोल्टेज में परिवर्तित कर देता है जिससे यह अधिक दूरी तक जा सके।

2. जब हमें दिष्ट धारा की आवश्यकता पड़ती है और हमारे पास प्रत्यावर्ती धारा उपलब्ध होती है तो इस प्रत्यावर्ती धारा को दिष्टकारी युक्ति का इस्तेमाल करके प्रत्यावर्ती धारा से दिष्ट धारा में बदला जा सकता है।  यही कारण होता है की दिष्ट धारा पर चलने वाले उपकरण में भी प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग किया जा सकता है क्यूंकि इनमे अन्दर दिष्टकारी युक्ति लगी रहती है जो प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में बदल देता है और उपकरण को दिष्ट धारा मिलती है जिससे यह ठीक से कार्य करता है।

3. दिष्ट धारा जनित्र मोटर महंगा होता है इसलिए इसका उपयोग सामान्यत: नही किया जाता है इसके स्थान पर प्रत्यावर्ती धारा जनित्र मोटर का उपयोग किया जाता है क्यूंकि यह सस्ता होता है।

प्रत्यावर्ती धारा के नुकसान या दोष

हमने यहाँ प्रत्यावर्ती धारा की विशेषताओं के बारे में अध्ययन किया , अब हम बात करते है इसके क्या क्या नुकसान हो सकते है।

1. जब आपसे कोई पूछे की प्रत्यावर्ती धारा तथा दिष्ट धारा में कौनसी अधिक खतरनाक या नुकसान दायक है तो आपका उत्तर होगा की प्रत्यावर्ती धारा अधिक जानलेवा है क्यूंकि समान मान की प्रत्यावर्ती वोल्टेज का शिखर मान इसके rms मान का 2  गुना होता है।

2. प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग सीधे विद्युत अपघटन तथा चुम्बक बनाने में नहीं कर सकते।

शुद्ध प्रतिरोधीय परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख

(Circuit contains pure ohmic resistance in hindi ) शुद्ध प्रतिरोधीय परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख  : जब किसी परिपथ में चित्रानुसार एक वोल्टता स्रोत तथा एक ओमीय प्रतिरोध जुड़ा हुआ हो तो जितना विभवान्तर इस प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न होगा यह वोल्टता स्रोत के विभवान्तर के बराबर होगा।


ओम का नियम हम पढ़ चुके है जिसके अनुसार
V = IR
सूत्र को देखकर हम स्पष्ट रूप से कह सकते है की धारा का मान सीधे विभवान्तर के समानुपाती है अत: जब धारा का मान शून्य होगा तो विभवान्तर का मान भी शून्य होगा , इसी प्रकार जब धारा का मान अधिकतम होगा तो विभवान्तर भी अधिकतम होगा तथा धारा का मान जब न्यूनतम होगा तो विभवान्तर का मान भी न्यूनतम होगा।
इसी तरह जब धारा का मान ऋणात्मक होगा तो विभवान्तर का मान भी ऋणात्मक प्राप्त होता है।
इससे हम कह सकते है प्रतिरोध में प्रवाहित धारा तथा विभवान्तर के मध्य समान कला है अर्थात यहाँ धारा तथा विभवान्तर समान कला में उपस्थित है।


हम बात कर चुके है की यहाँ धारा तथा विभवान्तर दोनों समान कला में है अत: दोनों को ग्राफीय रूप में निम्न प्रकार निरूपित किया गया है।
अब इसे फेजर आरेख के रूप में व्यक्त करने के लिए , हम फेजर डायग्राम बनाते है तो पाते है की फेजर आरेख में धारा तथा विभवान्तर दोनों एक ही अक्ष पर आरोपित प्राप्त होते है जैसा यहाँ दिखाया जा रहा है


शुद्ध प्रेरकीय परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख

(Circuit contains pure inductor circuit  ) शुद्ध प्रेरकीय परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख  : जब किसी परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा स्रोत के साथ एक नगण्य प्रतिरोध वाला प्रेरकत्व कुण्डली को जोड़ा जाता है तो इस परिपथ को शुद्ध प्रेरकीय प्रत्यावर्ती परिपथ कहा जाता है।
यहाँ हम इस प्रेरकत्व कुण्डली का प्रतिरोध शून्य (नगण्य) मानकर चलते है तथा इस कुण्डली का प्रेरकत्व L मानते है।

चित्रानुसार परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा स्रोत लगा हुआ है अत: धारा की दिशा तथा परिमाण समय के साथ परिवर्तित होगा जिससे कुण्डली में स्वप्रेरण के कारण प्रत्यावर्ती विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है , यह उत्पन्न स्वप्रेरण प्रत्यावर्ती विभवान्तर आरोपित वोल्टेज का विरोध करता है अर्थात प्रत्यावर्ती धारा के मार्ग में प्रेरकत्व रुकावट डालता है , किसी प्रेरकत्व द्वारा प्रत्यावर्ती धारा के मार्ग में डाली गयी रुकावट को ही प्रेरणिक प्रतिघात कहते है तथा इसे XL द्वारा व्यक्त किया जाता है।
माना परिपथ में आरोपित वोल्टता का मान निम्न है
V = Vmsinwt
माना परिपथ में आरोपित वोल्टता के कारण i धारा बहती है तो स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल का मान निम्न होगा

 = -Ldi/dt

किरचॉफ का द्वितीय नियम बताता है की परिपथ में सभी विद्युत वाहक बलों का बीजगणितीय योग शून्य होता है।

V + e = 0
या
V = -e
यहाँ e का मान रखने पर
V = – (-Ldi/dt)
V = Ldi/dt
यहाँ आरोपित वोल्टता
V = Vsinwt

V का मान समीकरण में रखने पर 

Vsinwt  = Ldi/dt

di/dt = Vsinwt /L


दोनों तरफ समाकलन करने पर


यहाँ Xप्रेरकत्व द्वारा प्रत्यावर्ती धारा के मार्ग में डाली गयी रुकावट को व्यक्त करता है इसे प्रेरणिक प्रतिघात कहते है

निम्न समीकरण को देखकर कह सकते है की यहाँ धारा कला में आरोपित वोल्टता से π/2 पीछे है।

या

धारा कला में π/2 आगे है।

इसे निम्न प्रकार ग्रफित किया जा सकता है


फेजर डायग्राम को निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है या वेक्टर रूप में


शुद्ध धारितीय परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख

(Circuit contains pure capacitance circuit  ) शुद्ध धारितीय परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख  : पहले हम बात करते है की जब किसी संधारित्र को जब किसी दिष्टकारी स्रोत से जोड़ा जाता है तो संधारित्र की एक प्लेट धनावेशित हो जाती है तथा दूसरी प्लेट ऋणावेशित हो जाती है तथा दोनों प्लेटो के मध्य विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है , यह क्रिया तब तक होती रहती है जब तक की प्लेटों के मध्य उत्पन्न विभवांतर आरोपित विभवान्तर के बराबर हो जाए। बराबर होने के पश्चात् परिपथ में धारा रुक जाती है।
लेकिन जब संधारित्र से कोई प्रत्यावर्ती स्रोत को जोड़ा जाता है तो यह आवेशन वाली क्रिया होती है और दोनों प्लेटे आवेशित हो जाती है जिससे एक प्लेट धनावेशित हो जाती है तथा दूसरी प्लेट ऋणावेशित हो जाती है और इन दोनों प्लेटों के मध्य एक विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है।
प्रत्यावर्ती स्रोत लगाने पर यह प्रक्रिया लगातार होती रहती है क्यूंकि प्रत्यावर्ती धारा में स्रोत की ध्रुवता लगातार बदलती रहती है जिससे प्लेटों की ध्रुवता भी लगातार बदलती रहती है और परिपथ में लगातार धारा बहती रहती है। अत: संधारित्र प्रत्यावर्ती धारा में कोई बाधा नहीं डालता है और एक सुचालक की भांति व्यवहार करता है।
क्यूंकि प्रत्यावर्ती स्रोत लगाने से संधारित्र की प्लेटे लगातार आवेशित तथा अनावेषित होती रहती है जिससे प्लेटों के मध्य एक विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है यह विभवान्तर परिपथ में धारा के प्रवाह का विरोध करता है या रुकावट डालता है , संधारित्र द्वारा डाली गयी इस रुकावट या विरोध को धारितीय प्रतिघात कहते है , इसे Xc द्वारा व्यक्त किया जाता है तथा इसका मात्रक ओम (‎Ω) होता है।


माना परिपथ में आरोपित वोल्टता का मान निम्न है
V = Vmsinwt
माना t समय में संधारित्र पर q आवेश संचित हो जाता है अत:  
q =  CV
यहाँ V का मान रखने पर
q = C 
Vmsinwt
हम जानते है की परिपथ में प्रवाहित धारा
i = dq/dt
यहाँ q का मान रखने पर
i = d(C 
Vmsinwt)/dt
अवकलन हल करने पर


यहाँ Xc = 1 /cw , इसे धारितीय प्रतिघात कहते है।
यहाँ सूत्र समीकरण को देखकर हम स्पष्ट रूप से यह कह सकते है की संधारित्र में प्रत्यावर्ती धारा विभवान्तर से कला में π/2 आगे है
धारा तथा विभवान्तर में कला सम्बन्ध को निम्न प्रकार ग्राफीय रूप में निरुपित करते है।


इसे ही फेसर डायग्राम के रूप में निम्न प्रकार निरूपित किया जा सकता है

L-R परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख

(Circuit contains L-R circuit ) L-R परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख :  जब किसी परिपथ में प्रतिरोध (R) तथा प्रेरकत्व (L) जुड़े हुए हो और इसमें कोई प्रत्यावर्ती स्रोत जुड़ा हुआ हो तो इस प्रकार बने परिपथ को LR परिपथ कहते है।
यहाँ हम ज्ञात करेंगे की इस परिपथ में वोल्टता तथा धारा के मध्य कला में क्या सम्बन्ध होगा तथा साथ ही इस परिपथ के लिए वोल्टता तथा धारा के मध्य फेजर डायग्राम भी आरेखित करेंगे।


प्रत्यावर्ती स्रोत को चालू करने से प्रतिरोध R के सिरों पर तथा प्रेरकत्व के सिरों पर विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है , माना प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर का मान VR है तथा प्रेरकत्व के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर VL है।
हम पढ़ चुके है की जब प्रतिरोध परिपथ में अकेला लगा हो तो प्रत्यावर्ती धारा तथा विभवान्तर समान कला में रहते है।
तथा जब प्रेरकत्व परिपथ में अकेला लगा हो तो विभवान्तर धारा से कला में π/2 आगे रहता है।
माना प्रत्यावर्ती धारा I = I0sinwt है।
प्रतिरोध के सिरों के मध्य विभवान्तर VR
= V
0sinwt है।
तथा प्रेरकत्व के सिरों के मध्य विभवान्तर VL
= V
0sin(wt + π/2 ) है।
इन तीनो मानो को जब सदिश आरेख पर प्रदर्शित करेंगे तो यह निम्न प्रकार प्राप्त होगा


यहाँ परिणामी V का मान निम्न होगा तथा इससे प्रतिरोध तथा प्रेरकत्व के सिरों के मध्य उत्पन्न विभवान्तर का मान निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है


परिपथ में आरोपित प्रत्यावर्ती स्रोत का विद्युत वाहक बल तथा धारा का मान निम्न होगा


LR प्रत्यावर्ती धारा स्रोत में हम कह सकते है की यहाँ परिणामी विभवान्तर V , धारा I से कला में आगे है।

R-C परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेख

(Circuit contains RC circuit ) R-C परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा प्रत्यावर्ती धारा के मध्य कला संबंध तथा फेजर आरेखचित्रानुसार जब किसी परिपथ में एक प्रत्यावर्ती स्रोत V के साथ संधारित्र C तथा प्रतिरोध R जुड़ा हो तो इस प्रकार के परिपथ को RC परिपथ कहते है।


इस परिपथ के लिए धारा तथा वोल्टता की कला में क्या सम्बन्ध होगा इसकी गणना हम यहाँ करने वाले है।
जब स्विच SW को चालु करते है तो परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होना शुरू हो जाती है जिससे प्रतिरोध तथा संधारित्र के सिरों पर विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है।
माना प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर VR है तथा संधारित्र के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर का मान VC है।
यदि परिपथ में सिर्फ प्रतिरोध होता तो धारा तथा वोल्टता समान कला में होते तथा यदि परिपथ में सिर्फ संधारित्र होता तो विभवान्तर (वोल्टता) धारा से कला में π/2 पीछे होता , ऐसा हम पीछे अध्ययन कर चुके है।
मान लेते है  प्रत्यावर्ती धारा I = I0sinwt है।
प्रतिरोध के सिरों के मध्य विभवान्तर V= V0sinwt उत्पन्न होता है।
तथा संधारित्र के सिरों के मध्य विभवान्तर V= V0sin(wt – π/2 ) है।
इन तीनो मानों को लेकर यदि इसे सदिश निरुपित किया जाए तो यह निम्न प्रकार प्राप्त होता है


हल करने पर हमें धारितीय प्रतिघात का मान निम्न प्राप्त होता है


RC परिपथ में विभवान्तर का वर्ग माध्य मूल मान निम्न होगा


ऊपर निरुपित किये गए सदिश डायग्राम को देखकर यह स्पष्ट होता है की RC परिपथ में विभवान्तर , धारा से कला में पीछे है।

LCR श्रेणी परिपथ LCR series circuit in hindi

(LCR series circuit in hindi ) LCR श्रेणी परिपथ : जब दिए गए परिपथ में एक प्रेरकत्व L , प्रतिरोध R तथा संधारित्र C आपस में श्रेणी क्रम में जुड़े हुए हो तथा इन तीनो के साथ कोई प्रत्यावर्ती धारा स्रोत जुड़ा हो तो इस प्रकार बने परिपथ को LCR श्रेणी परिपथ कहते है।


जैसा चित्र में दिखाया गया है की तीनों LCR आपस में श्रेणी क्रम में जुड़े है तथा एक प्रत्यावर्ती स्रोत भी श्रेणी क्रम में जुड़ा हुआ है अत: यह LCR परिपथ है।

जब प्रत्यावर्ती धारा स्रोत को चालू किया जाता है तो प्रतिरोध , प्रेरकत्व तथा संधारित्र इन तीनो के सिरों पर अलग अलग विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है माना यह क्रमशः VR
, V
L , VC है।

माना  प्रत्यावर्ती धारा I = I0sinwt

प्रतिरोध के सिरों के मध्य विभवान्तर V= V0sinwt 

तथा संधारित्र के सिरों के मध्य विभवान्तर V= V0sin(wt – π/2 ) है।

तथा प्रेरकत्व के सिरों के मध्य विभवान्तर V= V0sin(wt + π/2 ) है।

अकेले प्रतिरोध के लिए धारा तथा विभवान्तर दोनों समान कला में होते है।

अकेले प्रेरकत्व के लिए विभवान्तर धारा से कला में π/2 आगे रहता है।

अकेले संधारित्र के लिए विभवान्तर धारा से कला में π/2 पीछे रहता है।

अत: तीनों के लिए अलग लग फेजर डायग्राम निम्न प्रकार होगा


 चूँकि यहाँ तीनो साथ में लगे हुए है तो RLC परिपथ के लिए फेजर डायग्राम निम्न प्रकार प्राप्त होता है


निम्न फेजर डायग्राम को हल करने पर अर्थात परिणामी मान निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है


हम ऊपर इन तीनो के कला के बारे में बात कर चुके है तो इन तीनो को कला के साथ लिखकर इनके सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर का मान निम्न होता है


तीनों के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर का मान फेजर वाली समीकरण में रखकर हल करने पर


श्रेणी L-C-R अनुनादी परिपथ Series LCR resonance circuit in hindi

Series LCR resonance circuit in hindi श्रेणी L-C-R अनुनादी परिपथ : हमने श्रेणीक्रम LCR परिपथ के बारे में पढ़ चुके है अब हम बात करते है की इसमें अनुनाद कैसे और कब उत्पन्न होता है तथा इसके लिए सूत्र की स्थापना भी करेंगे।
जब एक परिपथ में प्रेरकत्व L , प्रतिरोध R तथा संधारित्र C को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है तो इस परिपथ को श्रेणी LCR परिपथ कहते है।
जब इसमें एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत लगाया जाता है तो इसमें विभवान्तर तथा धारा के मध्य कलांतर प्राप्त होता है और यह कला अंतर प्रेरकीय प्रतिघात तथा धारितीय प्रतिघात के कारण उत्पन्न हो जाता है।
जब प्रत्यावर्ती वोल्टता की आवृति में परिवर्तन किया जाता है तो इस परिवर्तन से प्रेरकीय प्रतिघात तथा धारितीय प्रतिघात में भी परिवर्तन होता है और फलस्वरूप परिपथ के कलांतर में भी परिवर्तन जाता है।
जब परिपथ में आरोपित प्रत्यावर्ती स्रोत की वोल्टता की आवृति को बढाया जाता है तो प्रेरकीय प्रतिघात Lw में वृद्धि होती है तथा धारितीय प्रतिघात 1/Cw में कमी हो जाती है।
इसी प्रकार जब जब परिपथ में आरोपित प्रत्यावर्ती स्रोत की वोल्टता की आवृति को कम किया जाता है तो प्रेरकीय प्रतिघात Lw का मान कम हो जाता है तथा धारितीय प्रतिघात 1/Cw का मान बढ़ता है।
लेकिन परिपथ में एक स्थिति ऐसी आती है जब किसी आवृति जब प्रेरकीय प्रतिघात Lw का मान तथा धारितीय प्रतिघात 1/Cw का मान बराबर हो जाता है तथा वोल्टता तथा धारा दोनों समान कला में जाते है अर्थात कलान्तर शून्य हो जाता है , इस स्थिति को ही L-C-R अनुनादी की स्थिति कहते है
श्रेणी L-C-R अनुनादी की स्थिति में XL  =  XC होता है।
चूँकिअनुनाद की स्थिति में दोनों प्रतिघात बराबर हो जाते है अतXL – X= 0 , इसलिए परिपथ में परिणामी प्रतिघात न्यूनतम हो जाता है अत: संधारित्र तथा प्रेरकत्व शोर्ट सर्किट की भांति व्यवहार करते है जैसा चित्र में दर्शाया गया है अर्थात दोनों शून्य प्रतिरोध की तरह कार्य करते है। जैसा चित्र में दर्शाया गया है


अर्द्ध शक्ति बिन्दु या आवृत्तियाँ Half power frequencies in hindi

Half power frequencies in hindi अर्द्ध शक्ति बिन्दु या आवृत्तियाँ : हम यहाँ श्रेणी LCR अनुनादी परिपथ की अर्द्धशक्ति बिन्दु आवृत्तियो के बारे में अध्ययन करने वाले है।


श्रेणी LCR परिपथ के लिए जब आवृति f में परिवर्तन किया जाता है तो उसके अनुसार परिपथ में प्रवाहित धारा के मान में भी परिवर्तन आता है।

जब हम परिवर्तनशील आवृत्ति f तथा परिपथ में प्रवाहित धारा I के मध्य ग्राफ खीचते है तो यह चित्र के अनुसार प्राप्त होता है।

LCR परिपथ जब अनुनाद की स्थिति में होता है उस स्थिति में धारा का मान अधिकतम प्राप्त होता है , यहाँ परिपथ की अनुनादी आवृत्ति f0 है , यहाँ अनुनादी आवृत्ति f0 पर धारा का मान अधिकतम प्राप्त होता है जिसे ग्राफ में Imax से व्यक्त किया गया है। इसी स्थिति में परिपथ में शक्ति क्षय का मान भी अधिकतम होगा जिसका मान I2max R होगा।

LCR पारपथ में अनुनादी स्थिति से पूर्व की आवृति f1 तथा बाद की स्थिति की आवृत्ति f2 पर परिपथ में शक्ति क्षय का मान आधा रहता है जैसा ग्राफ में दर्शाया गया है इन दोनों आवृत्ति बिन्दुओ  f1 , f2 को अर्द्ध शक्ति बिन्दु या आवृत्तियाँ कहते है।

परिभाषा : L-C-R अनुनादी परिपथ में ऐसे बिन्दु या आवृत्तियाँ जिन पर शक्ति क्षय का मान इसके अधिकतम मान से आधा रह जाए उन बिन्दुओ या आवृतियों को अर्द्ध शक्ति बिन्दु या आवृत्तियाँ कहते है।


श्रेणी अनुनादी परिपथ में बैण्ड चौड़ाई Band width in RLC series resonance circuit in hindi

Band width in RLC series resonance circuit in hindi श्रेणी अनुनादी परिपथ में बैण्ड चौड़ाईश्रेणी LCR अनुनादी परिपथ में दो आवृत्तियाँ ऐसी होती है जिनके मध्य शक्ति क्षय का मान कुल शक्ति क्षय का आधा होता है इन आवृतियों को अर्द्ध शक्ति आवृत्तियाँ कहते है तथा इन दोनों आवृत्तियों के अन्तर को  श्रेणी अनुनादी परिपथ में बैण्ड चौड़ाई कहते है।

माना f1 तथा f2 दो ऐसी आवृत्तियाँ जिनके मध्य शक्ति क्षय का मान परिपथ में कुल क्षय का आधा होता है अतf1 तथा f2  को अर्द्ध शक्ति आवृत्तियाँ कहते है तथा f1 तथा f2 के अंतर को श्रेणी अनुनादी परिपथ में बैण्ड चौड़ाई कहते है।

अत:

बैण्ड चौड़ाईf2 –  f1


 

श्रेणी अनुनादी परिपथ में बैण्ड चौड़ाई ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र काम में लिया जाता है


 

श्रेणी अनुनादी परिपथ में विशेषता गुणांक Quality factor in LCR resonance circuit in hindi

Quality factor in LCR resonance circuit in hindi श्रेणी अनुनादी परिपथ में विशेषता गुणांक : जब किसी LCR अनुनादी परिपथ में अर्द्ध शक्ति आवृत्ति f0 के मान में थोडा सा भी परिवर्तन किया जाता है तो इस थोड़े से परिवर्तन से भी परिपथ की धारा में बहुत अधिक परिवर्तन आता है।
जब अर्द्ध शक्ति आवृत्ति f0 के मान में इस प्रकार परिवर्तन किया जाए की धारा का मान अत्यधिक कम हो जाए अनुनाद (ग्राफ) तीक्ष्ण हो जाता है इसे अनुनाद तीक्ष्ण कहते है।
अनुनाद की इस तीक्ष्णता को जिस राशि द्वारा व्यक्त किया जाता है उसे विशेषता गुणांक कहते है इसे Q से दर्शाया जाता है तथा यह एक विमाहीन राशि है।
किसी भी LCR अनुनादी परिपथ में प्रतिरोध R की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है , जब परिपथ में R का मान परिवर्तित किया जाता है तो हम पाते है अनुनाद ग्राफ भी बदल जाता है।
जब R का मान कम किया जाता है तो ग्राफ तीक्ष्ण हो जाता है तथा जब प्रतिरोध R का मान बढाया जाता है तो अनुनाद ग्राफ चपटा प्राप्त होता है अर्थात इसका शीर्ष मान कम होता है।
अत: ग्राफ की तीक्ष्णता का माप हम Q गुणांक या विशेषता गुणांक की सहायता से करते है की यह कितना तीक्ष्ण है और कितना चपटा है और इससे हम यह भी बताने में समर्थ होते है की यहाँ R के मान में कितना परिवर्तन किया जा रहा है क्यूंकि इसका मान प्रतिरोध R के मान पर निर्भर करता है। तथा निम्न आवृति उच्च आवृत्ति में कितना अंतर है। साथ ही यहाँ प्रेरकत्व तथा संधारित्र का मान क्या है क्यूंकि Q का मान इन सभी चीजो पर निर्भर करता है।


चित्र में हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की यहाँ Q के भिन्न भिन्न मनो के लिए अनुनाद वक्र या ग्राफ की तीक्ष्णता या चपटापन भिन्न भिन्न है।
श्रेणी RLC अनुनादी परिपथ का विशेषता गुणांक या Q factor ज्ञात करने के लिए सामान्यत: निम्न सूत्र काम में लिया जाता है।


प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति average power in ac circuit in hindi

average power in ac circuit in hindi प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति : किसी भी विद्युत परिपथ में ऊर्जा व्यय होने की दर को हीशक्तिकहा जाता है।
यदि किसी दिष्ट धारा परिपथ हो तथा इसमेंधारा t समय तक प्रवाहित हो रही हो तथा विभवान्तर V हो तो परिपथ में व्यय उर्जा को निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है
व्यय उर्जा (W) = V.i.t
लेकिन जब हम प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में व्यय उर्जा (शक्ति) की बात करे तो इसका मान परिपथ में प्रवाहित धारा i तथा विभवान्तर V के परिमाण साथ साथ कलान्तर पर भी निर्भर करता है।
चूँकि प्रत्यावर्ती धारा में धारा i तथा विभवान्तर का मान समय के साथ हर क्षण बदलता रहता है इसलिए इस परिपथ में व्यय उर्जा का मान ज्ञात करने के लिए हम दिष्ट परिपथ में व्यय उर्जा (शक्ति) का सूत्र काम में नहीं ले सकते।
प्रत्यावर्ती स्रोत के लिए वोल्टता (विभवान्तर) तथा धारा का मान हर समय परिवर्तित होता रहता है जैसा चित्र में स्पष्ट किया हुआ है


यदि धारा तथा वोल्टता के मध्य कलान्तर ϴ है तो प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति का मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है


यहाँ वोल्टता (विभवान्तर) तथा धारा का वर्ग मध्य मूल मान उपयोग में लाया जाता है

विशेष स्थितियाँ

1. जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में केवल प्रतिरोध हो तो

कलान्तर = 0 होगा

अत:

P = VI

2. जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में सिर्फ प्रेरकत्व L है तो

कलान्तर = 90′

अत:

P = 0

शक्ति गुणांक की परिभाषा क्या है power factor in hindi

power factor in hindi शक्ति गुणांक की परिभाषा क्या है : हमने प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति में हम पढ़ चुके है की औसत शक्ति का मान धारा तथा विभवान्तर (वोल्टता) के वर्ग मध्य मूल तथा दोनों के मध्य कलान्तर की कोज्या के गुणनफल के बराबर होता है।


यहाँ कलान्तर की कोज्या को ही शक्ति गुणांक कहते है।
शक्ति गुणांक की परिभाषा :
किसी भी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा तथा विभवान्तर (वोल्टता) के मध्य कलान्तर की कोज्या को शक्ति गुणांक कहते है अर्थात यदि वोल्टता तथा धारा के मध्य कलान्तर ϴ है तो
शक्ति गुणांक = cosϴ  होगा।
यदि प्रत्यावर्ती धारा परिपथ का प्रतिरोध R है तथा प्रतिबाधा Z है तो तो
शक्ति गुणांक = cosϴ  = R/Z
यह एक मात्रक हीन राशि है इसका मान 0 से लेकर 1 तक कुछ भी हो सकता है , यदि किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ का शक्ति गुणांक 0 है तो इस परिपथ की उर्जा हानि का मान भी शून्य होगा।
जब किसी परिपथ के लिए धारा तथा वोल्टता के मध्य कलान्तर का मान बढ़ता है तो शक्ति गुणांक cosϴ का मान कम होता है इससे परिपथ में कम शक्ति के साथ कार्य होगा।

स्पेशल स्थितियाँ

1. जब परिपथ में केवल शुद्ध प्रतिरोध हो : जब किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में सिर्फ प्रतिरोध उपस्थित होता है तो इस स्थिति में धारा तथा वोल्टता के मध्य कलान्तर शून्य होता है अर्थात ϴ= 0

अत: cosϴ = 1

हम ऊपर पढ़ चुके है की शक्ति गुणांक का मान 0 से 1 तक होता है अत: इस स्थिति में इसका मान अधिकतम है इसलिए इस स्थिति में शक्ति व्यय का मान भी अधिकतम होगा।

2. जब परिपथ में शुद्ध प्रेरकत्व हो : इस प्रकार के परिपथ के लिए जब सिर्फ शुद्ध प्रेरकत्व उपलब्ध हो तो धारा तथा वोल्टता के मध्य कलान्तर 90 डिग्री का होता है अर्थात इस स्थिति में वोल्टता धारा से 90 डिग्री आगे होती है।  अत: शक्ति गुणांक का मान शून्य होगा।

cos90 = 0

इस स्थिति में शक्ति व्यय का मान भी शून्य होगा जो की न्यूनतम है।

3. जब परिपथ में शुद्ध संधारित्र हो : इस प्रकार के प्रत्यावर्ती परिपथ में वोल्टता का मान धारा से कला में 90 डिग्री पीछे रहती है अर्थात दोनों के मध्य 90 डिग्री का कलान्तर होता है अत: शक्ति गुणांक शून्य होगा

cos90 = 0

अत: जब परिपथ में शुद्ध संधारित्र हो तो शक्ति गुणांक का मान शून्य होता है जो की न्यूनतम मान है।

4. जब परिपथ में LCR उपस्थित हो : जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रतिरोध R , संधारित्र C तथा प्रेरकत्व L उपस्थित हो तो इस स्थिति में प्रत्यावर्ती धारा तथा वोल्टता के मध्य कलान्तर शून्य होगा अत: शक्ति गुणांक cos0= 1

अत: हम कह सकते है की LCR अनुनादी स्थिति में परिपथ के शक्ति गुणांक का मान अधिकतम होता है।

वाटहीन धारा की परिभाषा क्या है wattless current in hindi

wattless current in hindi वाटहीन धारा की परिभाषा क्या है : हम यह पढ़ चुके है की किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में औसत शक्ति क्षय या व्यय उर्जा का मान परिपथ में प्रवाहित धारा तथा विभवांतर के वर्ग  माध्य मूल के दोनों के मध्य कलान्तर की कोज्या के , तीनों के गुणनफल के बराबर होता है।

अर्थात प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में व्यय ऊर्जा या औसत शक्ति क्षय को निम्न प्रकार दर्शाया जाता है


जब किसी परिपथ में केवल प्रेरकत्व उपस्थित हो तो इस स्थिति में प्रत्यावर्ती वोल्टता धारा से π/2 आगे होती है अतः इस स्थिति में p = 0

इसी प्रकार जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में केवल संधारित्र उपस्थित हो तो वोल्टता धारा से π/2 पीछे रहता है अर्थात दोनों के मध्य π/2 कलांतर होता है अतः इस स्थिति में भी p = 0 होगा।

इन दोनों स्थितियों में परिपथ में प्रवाहित धारा को वाटहीन धारा कहते है।

वाटहीन धारा की परिभाषा

जब किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में केवल प्रेरकत्व उपस्थित हो या केवल संधारित्र उपस्थित हो या प्रेरकत्व संधारित्र एक साथ उपस्थित हो तो इस स्थिति में प्रत्यावर्ती धारा वोल्टता के मध्य π/2 कलांतर उत्पन्न होता है जिससे परिपथ में औसत शक्ति क्षय या व्यय ऊर्जा का मान शून्य होता है

अर्थात

p = VI(cosπ/2) = 0

P = 0

अतः हम कह सकते है की इन स्थितियों में परिपथ में धारा तो प्रवाहित हो रही है लेकिन औसत शक्ति क्षय का मान शून्य होता है अत: परिपथ में प्रवाहित इस प्रकार की धारा को वाटहीन धारा कहते है।

अर्थात हम कह सकते है की प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रवाहित वह धारा जिसका औसत शक्ति क्षय में कोई योगदान नहीं होता वाटहीन धारा कहलाती है।

चोक कुंडली की परिभाषा क्या है , सिद्धान्त , कार्यविधि choke coil in hindi 

choke coil in hindi  चोक कुंडली की परिभाषा क्या है , सिद्धान्त , कार्यविधि : ऐसी युक्ति जिसका उपयोग प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में बिना ऊर्जा क्षय के धारा को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है उसे चोक कुंडली कहा जाता है।

चोक कुंडली का सिद्धांत

हम पढ़ चुके है की प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में व्यय उर्जा का मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है



यहाँ θ विद्युत वोल्टता तथा धारा के मध्य का कलान्तर है।

जब किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में केवल प्रेरकत्व (L) लगा हुआ हो तो इस स्थिति में प्रत्यावर्ती धारा तथा वोल्टता के मध्य कलान्तर का मान 90 डिग्री या π/2 होता है अत:

P = VIcos90 = 0

अत: इस स्थिति में व्यय उर्जा का मान शून्य होगा।

अत: हम कह सकते है की जब प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में केवल प्रेरकत्व लगा हुआ हो तो परिपथ में व्यय उर्जा का मान शून्य होता है लेकिन प्रेरकत्व के कारण प्रत्यावर्ती धारा के मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है अर्थात प्रेरकत्व के द्वारा परिपथ में प्रवाहित धारा को बिना किसी व्यय उर्जा के नियंत्रित किया जा सकता है।

चोक कुण्डली इसी सिद्धांत पर कार्य करती है।

चोक कुण्डली की रचना तथा कार्यविधि

यह एक ऐसी युक्ति होती है स्वप्रेरकत्व L बहुत अधिक होता है तथा प्रतिरोध R अत्यधिक अल्प होता है।

इसे बनाने के लिए एक लोह क्रोड पर विद्युतरोधी तांबे के तार के बहुत सारे फेरे लिपेटे जाते है , यहाँ कुण्डली के प्रतिरोध R को कम रखने के लिए तांबे का मोटा तार इस्तेमाल किया जाता है।


हमें जितना ज्यादा प्रेरकत्व चाहिए हम क्रोड़ को कुण्डली में उतना ही अधिक अंतर प्रविष्ट करवाते है , और इसी के द्वारा प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के अंतर धारा को नियंत्रित किया जाता है।

इसका उपयोग दिष्ट धारा को नियंत्रित करने के लिए नहीं किया जा सकता क्यूंकि दिष्ट धारा में f = 0 , w = 0 अत: wL = 0 जिससे परिपथ में केवल ओमीय प्रतिरोध R रह जाता है जिससे इसमें ऊष्मा हानि होती है।

ट्रांसफार्मर क्या है , सिद्धांत , रचना , कार्यविधि , परिभाषा transformer in hindi प्रिन्सिपले ऑफ़ ट्रान्सफार्मर

प्रिन्सिपले ऑफ़ ट्रान्सफार्मर , transformer in hindi , ट्रांसफार्मर की परिभाषा क्या है , सिद्धांत , रचना , कार्यविधि : यह एक एक ऐसी युक्ति है जो अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर आधारित है तथा इसका उपयोग प्रत्यावर्ती धारा वोल्टता में परिवर्तन के लिए किया जाता है अर्थात प्रत्यावर्ती धारा की वोल्टता को कम या अधिक करने के लिए किया जाता है।

ट्रांसफार्मर का सिद्धांत (principle of transformer in hindi)

यह अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है जिसके अनुसार जब एक कुण्डली में प्रवाहित धारा के मान में परिवर्तन किया जाता है तो इसके पास रखी अन्य कुण्डली में प्रेरण के कारण विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जिससे दूसरी कुण्डली में भी धारा बहने लग जाती है।

transformer की संरचना

चित्रानुसार इसमें नर्म लोहे की बनी पटलित आयताकार क्रोड़ होती है , इस क्रोड़ के एक तरफ तांबे के तार लपेटकर प्राथमिक कुण्डली बनाई जाती है तथा दूसरी तरफ ताम्बे के तार लपेटकर इसे द्वितीयक कुण्डली बनाई जाती है।


यहाँ क्रोड़ को पटलित बनाने का कारण भंवर धाराओ के प्रभाव को कम करना होता है।

जिस प्रत्यावर्ती को बदलना है उसे प्राथमिक कुण्डली के सिरों पर लगाया जाता है तथा बदलने के बाद वोल्टता प्राप्त करने के लिए द्वितीयक कुण्डली के सिरों को काम में लिया जाता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है की प्राथमिक कुण्डली तथा द्वितीयक कुण्डली में लिपटे तांबे के फेरे यह निर्धारित करते है की वोल्टता को कम किया जा रहा है या अधिक।

अर्थात जब प्राथमिक कुण्डली में फेरो की संख्या द्वितीयक कुण्डली से अधिक है तो कम वोल्टता प्राप्त होती है और जब प्राथमिक कुण्डली में फेरों की संख्या द्वितीयक से कम रखी जाती है तो हमें आउटपुट में अधिक वोल्टता की प्रत्यावर्ती धारा प्राप्त होती है।

ट्रांसफ़ॉर्मर की कार्यविधि

जिस प्रत्यावर्ती धारा की वोल्टता का मान बदलना होता है उसे प्राथमिक कुण्डली के सिरों पर आरोपित करते है जिससे प्राथमिक कुण्डली में धारा प्रवाहित होने लगती है , चूँकि प्रत्यावर्ती धारा का मान तथा दिशा समय के साथ परिवर्तित होती रहती है जिससे स्वप्रेरण के कारण एक वोल्टता उत्पन्न हो जाती है।

अत: प्राथमिक कुण्डली में उत्पन्न फ्लक्स का मान भी समय के साथ परिवर्तित होगा फलस्वरूप यह चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन द्वितीयक कुण्डली से गुजरेगा और द्वितीयक कुण्डली में फ्लक्स में परिवर्तन के कारण अन्योन्य प्रेरण से एक विद्युत वाहक बल प्रेरित हो जाता है इससे द्वितीयक कुण्डली के सिरों पर विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है जिसे आउटपुट के रूप में प्राप्त कर लिया जाता है।

यदि प्राथमिक कुण्डली की वोल्टता VP हो।

द्वितीयक कुण्डली की वोल्टता VS हो

प्राथमिक कुण्डली में फेरो की संख्या NP हो

द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्य NS हो

तथा

फ्लक्स Φ हो तो इनको निम्न सम्बन्ध से दर्शाया जाता है


ट्रांसफार्मर

सिद्धांत : ट्रान्सफार्मर अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर आधारित होता है।

ट्रांसफार्मर की सहायता से प्रत्यावर्ती धारा को बढाया या कम किया जा सकता है।

ट्रांसफार्मर में एक नर्म लोहे की पतली रोड होती है जिस पर ताम्बे के मोटे तारो की बनी दो कुण्डली लपेटी होती है। एक कुंडली में फेरों की संख्या कम तथा दूसरी कुण्डली में फेरो की संख्या ज्यादा होती है जिस कुंडली के सिरों से प्रत्यावर्ती धारा स्रोत जोड़ दिया जाता है उसे प्राथमिक कुंडली कहते है।

कार्यप्रणाली : जब प्राथमिक कुंडली में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित की जाती है तो इसके चारो ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है और प्राथमिक कुंडली से चुम्बकीय बल रेखाएँ निकलती है। वे चुम्बकीय बल रेखाएँ द्वितीय कुण्डली से होकर गुजरती है अत: द्वितीयक कुंडली से गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है अत: द्वितीयक कुंडली के सिरों के बीच प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।

प्राथमिक कुण्डली में फेरो की संख्या N1 एवं द्वितीय कुंडली में फेरो की संख्या N2 है।

प्राथमिक एवं द्वितीयक कुंडली में प्रवाहित धारा क्रमशः i1  i2 है एवं प्राथमिक कुण्डली के सिरों पर निवेश वोल्टता Vp एवं द्वितीयक कुंडली के सिरों पर निर्गत वोल्टता Vs है।

आदर्श : ट्रांसफार्मर के लिए प्राथमिक एवं द्वितीयक कुंडली के लिए चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर dʘ/dt समय रहती है।

फैराडे लेन्ज के नियम से

Vp = -Npdʘ/dt समीकरण-1

Vs = -Nsdʘ/dt समीकरण-2

समीकरण-1 में समीकरण-2 का भाग देने पर

Vp/Vs  = [-Npdʘ/dt]/[ -Nsdʘ/dt]

Vp/Vs  = Np/Ns  समीकरण-3

आदर्श ट्रान्सफार्मर के लिए प्राथमिक द्वितीयक कुण्डली की शक्ति बराबर होती है।

Pp = Ps

Vpip = VSis

Vp/Vs = is/ip

समीकरण-3 समीकरण-4 से

Vp/V  =  is/ip  = Np/Nसमीकरण-5

यदि द्वितीयक कुंडली में फेरो की संख्या (Ns) , प्राथमिक कुंडली में फेरो की संख्या (Np) से अधिक हो तो निर्गत वोल्टता (Vs) , निवेशी वोल्टता (Vp) से अधिक होती है इसे उच्चायी ट्रांसफार्मर कहते है।

यदि द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या (Ns) , प्राथमिक कुण्डली में फेरो की संख्या (Np) से कम हो तो निर्गत वोल्टता (Vs) , निवेशी वोल्टता (Vp) से कम होगी इसे अपचायी ट्रान्सफार्मर कहते है।

आदर्श ट्रांसफार्मर : आदर्श ट्रान्सफार्मर की दक्षता 100% होती है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता है , कुछ कारणों से ऊर्जा की हानि हो जाती है अत: वास्तविक ट्रांसफार्मर की दक्षता लगभग 95% रह जाती है।

ट्रांसफार्मर में ऊर्जा हानि के कारण एवं उन्हें कम करने के उपाय :

1.     चुम्बकीय फ्लक्स में क्षरण: प्राथमिक कुंडली से निकलने वाला चुम्बकीय फ्लक्स पूर्ण रूप से द्वितीय कुंडली को प्राप्त नहीं होता अर्थात कुछ फ्लक्स क्षरित हो जाता है। इस हानि को कम करने के लिए प्राथमिक कुंडली के ऊपर ही द्वितीयक कुंडली लपेटी जाती है।

2.     कुंडली का प्रतिरोध: ट्रांसफार्मर की कुंडली ताम्बे के तारों की बनी होती है। इन तारों के प्रतिरोध के कारण i2Rमान की विद्युत ऊर्जा हानि के रूप में खर्च हो जाती है , इसे कम करने के लिए कुण्डली ताम्बे के मोटे तारों की बनाई जाती है।

3.     भंवर धाराओ के कारण: चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन के कारण क्रोड़ की धातु में भँवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती है। इन भंवर धाराओं के कारण क्रोड़ की धातु गर्म हो जाती है अत: विद्युत ऊर्जा का कुछ भाग ऊर्जा के रूप में व्यय होता है इस हानि को कम करने के लिए क्रोड़ को पटलीत कर दिया जाता है।

4.     शैथिल्य हानि: प्रत्यावर्ती धारा के एक पूर्ण चक्र में चुम्बकन का एक चक्र भी पूर्ण हो जाता है तथा चुम्बकन के एक पूर्ण चक्र में शैथिल्य पास के क्षेत्रफल के बराबर ऊर्जा की हानि होती है इस हानि को कम करने के लिए नर्म लोहे की क्रोड़ बनाई जाती है।

दूरस्थ स्थानों पर विद्युत ऊर्जा का संचरण : दूरस्थ स्थानों तक विद्युत ऊर्जा को भेजने के लिए जिन तारो का उपयोग किया जाता है उन्हें संचरण लाइन कहते है। इन तारों के प्रतिरोध के कारण i2मान की विद्युत ऊर्जा ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है , इस हानि को न्यूनतम करने के लिए विद्युत उत्पादन केंद्र पर उच्चायी ट्रांसफार्मर की सहायता से प्रत्यावर्ती वोल्टता को बढ़ा दिया जाता है।

जिससे धारा का मान कम हो जाता है तथा उच्च वोल्टता पर धारा को दूसरे स्थान तक भेज दिया जाता है। दुसरे स्थान पर लगे विद्युत सब स्टेशन के उच्चायी ट्रांसफार्मर के द्वारा वोल्टता को घटा दिया जाता है तथा इसे उपभोक्ता के घर के समीप लगे ट्रांसफार्मर तक भेज दिया जाता है , यह ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती वोल्टता को 230 वोल्ट में परिवर्तित कर घरो तक भेजता है।

ट्रांसफार्मर के प्रकार , उच्चायी , अपचायी ट्रांसफॉर्मर हानि types of transformer and losses in hindi

types of transformer and losses in hindi ट्रांसफार्मर के प्रकार , उच्चायी , अपचायी ट्रांसफॉर्मर हानि : हम सबसे पहले बात करते है की ट्रांसफार्मर कितने भागों में बांटा गया है।

कार्य के आधार पर इनको दो भागो में विभाजित किया गया है

1. उच्चायी ट्रांसफार्मर (step up transformer) :

जैसा की हम बात कर चुके है की इसमें प्राथमिक तथा द्वितीयक दो कुण्डलियाँ होती है तथा दोनों पर तांबे के तार लिपटे होते है।

जब प्राथमिक कुण्डली में फेरों की संख्या द्वितीयक कुण्डली में लिपटे फेरो की संख्या से कम हो तो प्राथमिक कुण्डली पर आरोपित विभवान्तर का मान हमें द्वितीयक कुण्डली पर अधिक बढ़कर प्राप्त होता है अर्थात हमे आरोपित विद्युत वाहक बल से अधिक मान का वि.वा.बल आउटपुट (द्वितीयक कुण्डली) पर प्राप्त होता है।

दूसरे शब्दों में कहे तो द्वितीयक कुण्डली पर प्राप्त धारा का मान प्राथमिक कुण्डली में धारा के मान से कम प्राप्त होता है।

 इसे चित्र के माध्यम से समझ सकते है


2. अपचायी ट्रांसफार्मर (step in transformer )

जब प्राथमिक कुण्डली में लिपटे फेरों की संख्या द्वितीयक कुण्डली में लिपटे फेरो की संख्या से अधिक हो तो इस प्रकार बने ट्रांसफार्मर को अपचायी ट्रांस्फोर्मेर कहते है।

इसका प्रयोग तब किया जाता है जब हमें वोल्टता के मान को कम करना होता है अर्थात इसमें प्राथमिक कुण्डली में आरोपित विभवान्तर का मान द्वितीयक कुण्डली पर प्राप्त विभवान्तर के मान से अधिक होता है अर्थात द्वितीयक कुण्डली में आरोपित विद्युत वाहक बल से कम वि.वा.बल की वोल्टता प्राप्त होती है।

इसमें आउटपुट में प्राप्त धारा का मान निवेशित धारा के मान से अधिक होता है।

जैसा चित्र में दर्शाया गया है

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ट्रांसफार्मर में ऊर्जा हानि

किसी भी ट्रांसफॉर्मर में ऊर्जा की हानि किसी किसी रूप में अवश्य होती है , इसका अभिप्राय यह है की इसमें 100% दक्षता नहीं होती है , हम बात करते है की ऊर्जा हानि किस किस रूप में होती है।

1. ताम्र हानि (copper loss ) 

ट्रांसफार्मर की कुंडलियों में जब धारा प्रवाहित की जाती है तो ओमीय प्रतिरोध के कारण ट्रांसफार्मर में ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है और इस ऊष्मा के रूप में इसमें ऊर्जा का क्षय होता है , इस प्रकार की हानि को ताम्र हानि कहते है।

इस हानि को कम करने के लिए कुंडलियों में लिपटे ताम्बे के तारों का प्रतिरोध कम रखने का प्रयास किया जाता है।

2. भँवर धाराओं के कारण हानि 

ट्रांसफार्मर की क्रोड में उत्पन्न भंवर धाराओं के कारण जो ऊर्जा की हानि होती है , इस हानि को कम करने के लिए क्रोड़ को पटलित बनाया जाता है।

3. चुम्बकीय फ्लक्स क्षरण के कारण हानि 

प्राथमिक कुण्डली में उत्पन्न चुम्बकीय फ्लक्स का पूरा हिस्सा द्वितीयक कुण्डली में पूर्ण रूप से नहीं पहुच पाता अर्थात जितना फ्लक्स प्राथमिक कुण्डली में उत्पन्न हो रहा है वो पूरा द्वितीयक कुण्डली में गुजर नहीं पाता जिससे उर्जा की हानि होती है इसे कम करने के लिए प्राथमिक कुण्डली तथा द्वितीयक कुण्डली को एक दूसरे के ऊपर बनाया जाता है।

4. शैथिल्य हानि 

ट्रांसफार्मर की क्रोड़ बार बार चुम्बकित तथा विचुम्बकित होती है क्यूंकि प्रत्यावर्ती धारा का मान दिशा समय के साथ परिवर्तित होते रहते है।  इससे इससे डोमेन बार बार घूर्णन करते और इस घूर्णन के कारण इसमें एक ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है और उर्जा का हास् होता है इसे शैथिल्य के कारण उर्जा हानि कहते है।

इसे कम करने के लिए क्रोड़ को नर्म लोहे या सिलिकोन स्टील की बनाई जाती है।

 

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