physics12th 13. इलेक्ट्रॉनिक उपकरण 12th notes in hindi Semiconductor Electronic: Material, Devices And Simple Circuits

 इलेक्ट्रॉनिक उपकरण 12th notes in hindi Semiconductor Electronic: Material, Devices And Simple Circuits

ऊर्जा बैण्ड की परिभाषा क्या है , चालक , अर्धचालक , कुचालक को समझाइये

प्रश्न 1 : ऊर्जा किसे कहते है ऊर्जा बैण्ड के आधार पर पदार्थों का वर्गीकरण कीजिए?

उत्तर :  ऊर्जा बैण्ड (Energy band):- जब एक परमाणु दूसरे परमाणु के सम्पर्क में आता है तो अन्योण क्रिया के करण प्रत्येक ऊर्जा स्तर दो ऊर्जा स्तरों में विभाजित हो जाता है। एक ऊर्जा स्तर मूल ऊर्जा स्तर के नीचे और एक थोड़ा ऊपर होता है। किस्टलीय सरंचना में एक परमाणु का सम्बद्व n – परमाणुओं से होता है। इसलिए प्रत्येक ऊर्जा स्तर n – ऊर्जा स्तरों में विभाजित हो जाता है। ये ऊर्जा स्तर इतने नजदीक नजदीक होते है कि इनमें विभेद करना सम्भव नहीं है। इसलिए ये एक बैण्ड बनाते है। जिसे ऊर्जा बैण्ड कहते है। संयोजकता ऊर्जा स्तर से सम्बन्धित बैण्ड को संयोजकता बैण्ड कहते है। संयोजकता बैण्ड से ऊपर के ऊर्जा स्तर से सम्बन्धित बैण्ड को चालान बैण्ड से ऊपर के ऊर्जा स्तर से सम्बन्धित बैण्ड को चालान बैण्ड कहते है जो साधारणतया रिक्त होता है ऊर्जा बैण्ड के आधार पर पदार्थों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से करहते है।

1. चालक (conductor):- ये ऐसे पदार्थ है जिनमें वर्जित ऊर्जा अन्तराल Eg का मान शून्य होता है या तो चालान बैण्ड और संयोजकता बैण्ड में कोई गेप नहीं होता है या इनमें अतिव्यापन हो जाता है। जैसे Na , Mg आदि।

डाईग्राम

2. अर्धचालक (Semiconductor):- ये ऐसे पदार्थ हैं जिनमें वर्जित ऊर्जा अन्तराल 3ev से कम होता है। साधारण ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन तापीय ऊर्जा ग्रहण करके चालान बैण्ड में पहुॅच जाते है इसलिए इनमें स्वतंत्र ele की संख्या चालकों से कम होकती है जैसेसिलिकन के लिए Eg का मान 1.1  ev और जर्मनियम के लिए .72 ev होता है।

डाईग्राम

अर्द्धचालक दो तत्व है – Si Ge

आकार्बनिक यौगिक – InP , CdS , GaAs

कार्बनिक यौगिक –  एन्थ्रासीन , मादित थैलोश्यानीस

कार्बनिक बहुलकपाॅली पाइराॅल, पाॅली एनीलीन, पाॅली थायोपिफन

3. कुचालक (insulator):- ये ऐसे पदार्थ है जिनमें वर्जित ऊर्जा अन्तराल Eg का मान 3ev से अधिक होता है जैसे हीरे के लिए 5.4 ev होता है।

डाईग्राम

प्रश्न 2 :  प्रतिरोधकता के आधार पर पदार्थों का वर्गीकरण कीजिए?

उत्तरप्रतिरोधकता के आधार:-

1. चालक:- ये ऐसे पदार्थ है जिनकी प्रतिरोधकता का मान 10-2 से 10-8 ΩXm होता है।

2. अर्द्धचालक:- ये ऐसे पदार्थ है जिनकी प्रतिरोधकता का मान 10-5 से लेकर 10 ΩXm होता है।

3. कुचालक:- ये ऐसे पदार्थ है जिनकी प्रतिरोधकता का मान 1011  से 1019  ΩXm होता है।

नेज अर्धचालक , n –  प्रकार के अर्द्धचालक , p- प्रकार का अर्धचालक 

प्रश्न 1 : नेज अर्धचालक की संरचना समझाइये एवं इसमें धारा प्रवाह किस प्रकार होता है।

उत्तर :  नेज अर्धचालक (pure semiconductor) की संरचना सम चतुष्फलकीय होती है किसी अर्द्धचालक की संरचना समझने के लिए जर्मेनियम (Ge) का उदाहरण लेते है जिसका इलेक्ट्रोनिक विन्यास 2,8,18,4 होता है। इसके बाहरी कोश में ele  की संख्या 4 होती है। अतः यह अष्टक बनाने के लिए अन्य जर्मेनियम परमाणु के 4 इलेक्ट्रॉन से सह संयोजक बंध बना लेते है। इस प्रकार एक भीस्वतंत्र नहीं है। अतः शून्य कैल्विन ताप पर पूर्ण कुचालक होता है। जैसे जैसे ताप बढ़ाते है वैसे वैसेतापीय ऊर्जा ग्रहण करके चालन बैण्ड में पहुच जाते है। इस प्रकार संयोजकता बैण्ड में इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है इस कमी को कोटर कहते है। जो धनावेशित कण की तरह व्यवहार करती है। इस प्रकार नेज अर्द्धचालक में स्वतंत्रकी संख्या ne और स्वतंत्र कोटरों की संख्या n दोनों बराबर होते है।

ne =  nn

जब नेजअर्द्धचालक को जब किसी बैटरी से जोड़ते है तो स्वतंत्रबैटरी के धन सिरे की ओर कोटर ऋण सिरे की ओर गति करते है। परन्तु दोनों के कारण धारा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है यदि इलेक्ट्रॉन के कारण धारा Ie और कोटर के कारण धारा I है तो

Ie = In

डाईग्राम

प्रश्न 2 :  n – प्रकार के अर्द्धचालक का निर्माण चित्र बनाकर समझाइये?

उत्तर :  n –  प्रकार के अर्धचालक (n – type semiconductor):-  यदि शुद्व अर्द्धचालक जैसे Ge में ऐसे अशुद्वि मिलाये जिसके बाहरी कोश में 5 e हो जैसे कि आर्सेनिक, एंटीमनी, फासफोरस आदि। इस प्रकार की अशुद्वि मिलाने से अशुद्वि के 5 e से 4 ele जर्मेनियम परमाणु के 4 e से सहसंयोजक बंध बना लेते है। अशुद्धि का 5 वाॅ इलेक्ट्रॉन सहसंयोजक बंध बनाने में काम में ही आता है अतः ऊष्मीय ऊर्जा ग्रहण करके अर्द्धचालक के चालन बैण्ड में पहँुच जाता है और धारा प्रवाह में सयंोग करता है इस प्रकार इसमें धारा प्रवाह स्वतंत्रके कारण होताहै इसलिए इसे  n- प्रकार का अर्द्धचालक कहते है। इसमें ताप जनित कोटर भी होते है परन्तु इनकी संख्या बहुत कम होती है। इसलिए इन्हें अल्प संख्यक धारावाहक कहते है तथा स्वतंत्रको बहु संख्यक धारावाहक कहते है। इसमें अशुद्वि धारा प्रवाह के लिए 1 e का त्याग करती है। इसलिए अशुद्वि को दाता प्रकार की अशुद्वि कहते है।

डाईग्राम

प्रश्न 3 :  p- प्रकार के अर्द्धचालक  का निर्माण चित्र बनाकर समझाइये?

उत्तर :  p –  प्रकार के अर्धचालक (p – type semiconductor):-  यदि शुद्ध अर्द्धचालक जैसे जर्मेनियम में ऐसी अशुद्वि मिलाये जिसके बाहरी  कोश में 3 e है जैसे बोराॅन, इण्डियम, एलयुमिनियम आदि तो जर्मेनियम के 4e मेंसे 3 e अशुद्धि के 3 el से सहसंयोजक बंध बना लेते है। जर्मेनियम के चौथे इलेक्ट्रॉन को संहसयोजक बंध बनाने के लिए 1e  की कमी है इस कमी को कोटर कहते है जो धनावेशित कण की तरह व्यवहार करती है धारा प्रवाह इन कोटर के द्वारा होता है इसलिए इसे p – प्रकार का अर्द्धचालक कहते है इसमें ताप जनित electron भी होते है। जिन्हें अल्प संख्यक धारा वाहक कहते है जबकि स्वतंत्र कोटरों को बहुसंख्यक धारा वाहक कहते है। अशुद्धि 1 e को ग्रहण करती है इसलिए अशुद्धि को ग्राही प्रकार की अशुद्धि कहते है।

p – n  संधि का निर्माण समझाइये formation of pn junction in hindi

प्रश्न 1 : p – n  संधि का निर्माण समझाइये। p-n संधि बनने में होने वाली दो क्रियाओं को समझाइये ह्यासी क्षेत्र और रोधी का विभव को परिभाषित कीजिए?

डाईग्राम

उत्तर :  p-n संधि का निर्माण (formation of pn junction):-  यदि अर्द्ध चालक में एकल क्रिस्टल में एक तरफप्रकार का अर्द्धचालक बनाने के लिए पंच सयोजी अशुद्धि और दूसरी तरफप्रकार का अर्द्धचालक बनाने के लिए त्रिंसयोजी अशुद्धि को मिश्रित करत है। इस प्रकार p-n संधि के निर्माण में दो महत्वपूर्ण घटनायें घटित होती है।

1. विसरण

2. अपवाह

n भाग में स्वतंत्रकी सान्द्रता अधिक होती है जबकिभाग में कोटरों की सान्द्रता अधिक होती है। इसलिएके कोटरभाग की ओर तथाके इलेक्ट्रॉन p  भाग कीओर विसरण गति करते है जिससे विसरण द्वारा बहती है। जबभाग के कोटरभाग की ओर जाते है तो निश्चल ऋणायन पिछे छोड़ते है इसी प्रकारभाग के इलेक्ट्रॉन p  भाग की ओर जाते है तो निश्चल धनायन पीछे छोड़ते है। इस प्रकार संधि तल पर एक ओर धनावेश और दूसरी ओर ऋणावेश उत्पन्न होते लगता है जिससे संधि तल परसेकी ओर विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। जिससेभाग के अल्पसंख्यक electron  n  भाग की ओर तथाभाग के कोटरभाग की ओर अपवाह गति करते है। जिससे अपवाह धारा बहती है। विसरण धारा और अपवाह धारा दोनों एक दूसरे के विपरित होते है। प्रारम्भमें विसरण धारा अधिक होती है परन्तु बाद में अपवाह धारा के मान में तब तक वृद्वि होती है जब दोनों का मान समान हो जाये इस अवस्था में संधि तल पर कोई धारा नहीं बहती है इस प्रकार p-n  संधि का निर्माण हो जाता है। संधि तल के दोनों ओर कुछ भाग में तो स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन  होते है और ही कोटर होते है। इस भाग को हासी क्षेत्र कहते है। संधि तल के एक ओर धनावेश और दूसरी ओर नहणवेश उत्पन्न होने से संधि तल पर एक विभव उत्पन्न हो जाता है जिसे रोधिका विभव कहते है। क्योंकि यह विभवभाग के कोटर औरभाग के मप  को संधि तल पर आने से रोकता है।

p-n  संधि डायोड में अग्र बायस और पश्च बायस , PN संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र

प्रश्न 1 : p – n  संधि डायोड में अग्र बायस और पश्च बायस में धारा प्रवाह समझाइये?

उत्तर :  अग्र बायस (forward bias):-  यदि pn संधि डायोड केभाग का सम्बन्ध बैटरी के धन टर्मेनल से ओरभाग का सम्बन्ध बैटरी के ऋण टर्मिनल से कर दे तो इसे अग्र वायस कहते है।

डाईग्राम

इस प्रकार से जोड़ने परभाग के कोटर बैटरी के धन टर्मिनल से प्रतिकर्षित होकर औरकेबैटरी के ऋण टर्मिनल से प्रतिकर्षित होकर संधि तल की ओर गति करती है इस प्रकार संधि तल पर electron और कोटर दोनों ही पहुँचने से यह चालक की तरह व्यवहार करता है परन्तु इसके लिए बैटरी की वोल्टता का मान रोधिका विभव से अधिक होना चाहिए।

पश्य वायस/उत्क्रम बायस (backward bias):- यदि pn संधि डायोड को बैटरी से इस प्रकार जोड़े कीभाग का सम्बन्ध बैटरी के ऋण टर्मिनल से औरभाग का सम्बन्ध बैटरी के धन टर्मिनल से हो तो इसे पश्य बायस कहते है।

डाईग्राम

इस प्रकार से जोड़ने परभाग के कोटर बैटरी के ऋण टर्मिनल से आकर्षित होकर संधि तल से दूर औरभाग के इलेक्ट्रॉन  बैटरी के धन टर्मिनल से आकर्षित होकर संधि तल से दूर गति करते है। इस प्रकार संधि तल पर तो कोटर पहुचते है और हीपहुँचते है। इस प्रकार संधि तल कुचालक की तरह कार्य करता है और हासी क्षेत्र की चैड़ाई बढ़ जाती है। परन्तु अल्पसंख्यक धारावाहकों के कारण संधि तल पर कोटर और ele  कुछ मात्रा में पहुँचते है जिससे अतिअल्प धारा बहती है। जिसे प्रति संतृप्त धारा कहते है।

प्रश्न 2 :  PN संधि डायोड को अभिलाक्षणिक वक्र खिचने केलिए परिपथ चित्र बनाइये औश्र लेखाचित्र खीचिए और गतिक प्रतिरोध को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : p-n संधि डायोड के अभिलाक्षणिक वक्र खीचने के लिए इसे परिपथ में दो प्रकार से जोड़ते है।

अग्र बायस:- pn संधि डायोड को परिवर्ति वोल्टता की बैटरी से इस प्रकार जोड़ते है कि बैटरी के धन टर्मिनल का सम्बन्धभाग से हो धारा नापने के लिए मिली आमीटर और विभवान्तर नापने के लिए वोल्ट मीटर परिपथ में जोड़ देते है।

डाईग्राम

वोल्टता का मान बदल बदलकर धारा का मान ज्ञात करते है तो यह पाते है कि एक निश्चित वोल्टता जिसे देहली वोल्टता तक धारा का मान समान होता है।  उसके आगे वोल्टता बढ़ाने पर धारा चर धातांकि रूप से बढ़ती है।

पश्च बायस:- pn संधि डायोड को परिवर्ति वोल्टता की बैटरी से इस प्रकार से जोड़ते है कि बैटरी का ऋण टर्मिनल सम्बन्धभाग से हो धारा नापने के लिए माइक्रोआमीटर और विभवान्तर नापने के लिए वोल्ट मीटर जोड़ देते है।

डाईग्राम

वोल्टता का मान बदल बदलकर धारा का मान ज्ञात करते है। धारा अति अल्प बहती है। जो वोल्टता बढ़ाने पर भी बढ़ती नहीं है। इसे प्रतिप संतृप्त धारा कहते है। परन्तु जेनर वोल्टता Vके बाद धारा का मान तेजी से बढ़ता है।

डाईग्राम

गतिक प्रतिरोध:- वोल्टता में परिवर्तन और धारा में परिवर्तन के अनुपात को गतिक प्रतिरोध कहते है।

सूत्र

अग्र बायस में इसक प्रतिरोध बहुत कम 10 ओम कोटी का होता है।  जबकि पश्च बायस में इसका प्रतिरोध बहुत अधिक लगभग 106   ओम कोटी का होता है।

 

दिष्ट करण , कार्यप्रणाली , पूर्ण तरंग दिष्टकारी , शुद्ध दिष्टधारा के लिए फिल्टर परिपथ

प्रश्न 1 : दिष्ट करण किसे कहते है परिपथ चित्र बनाकर अर्द्धतंरग दिष्ट कारी की कार्य प्रणाली समझाइये? और प्राप्त निर्गत वोल्टता का तरंग चित्र दीजिए?

उत्तर :  दिष्ट करण :-प्रत्यावृत्ति धारा को दिष्ट धारा में बदलना दिष्टकरण कहलाता है और जिस परिपथ के द्वारा दिष्टकरण किया जाता है। उसे दिष्टकारी कहते है। इसके लिए प्रत्यावृत्ति का सम्बद्व ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुण्डली से कर देते है और द्वितीयक कुण्डली के साथ एक डायोड और लोड RL जोड़ देते हैं।

डाईग्राम

कार्यप्रणाली:- जब द्वितीयक कुण्डली कासिरा धनात्मक औरसिरा ऋणात्मक होता है तो डायोडपर अग्र बायस लगता है और परिपथ में धारा बहती है। परन्तु शेष आधे चक्र मेंऋणात्मक औरधनात्मक होता है जिससे डायोड पर पश्य बायस लगता है और परिपथ में धारा नहीं बहती है। इस प्रकार पुनः धनात्मक आधे चक्र में धारा प्रवाहित होती है। इस प्रकार अर्द्धतरंग का दिष्टिकरण होता है।

डाईग्राम

प्रश्न 2 :  पूर्ण तरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र बनाइये औंस इसकी कार्य प्रणाली समझाइये और निर्गत वोल्टता के लिए तरंग चित्र दीजिए।

डाईग्राम

उत्तरइसके लिए प्रत्यावृत्ति स्त्रोत को ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुण्डली से जोड़ देते है और द्वितीयक कुण्डली के साथ डायोड D1  D2  जोड़ते है इसके मध्य निष्कासि ट्रांसफार्मर काम में लेते है। इस ट्रांसफार्मर के मध्य बिन्दु डायोडों के उभयनिष्ठ बिन्दु और लोड RL जोड़ देते है।

कार्य प्रणाली:- जब द्वितीयक कुण्डली पर प्रत्यावृत्ति वोल्टता आरोपित होती है तो अर्द्धचक्र मेंसिरा धनात्मक औरसिरा ऋणात्मक होता है। जिससे डायोड D1 पर अग्र बायस और D2 पर पश्य बायस लगता है। जिससे डायोड D1 में धारा का प्रचालन होता है जबकि D2 में नहीं होता है जिससे लोड RL में धारासेकीओर बहती है। दूसरे अर्द्धचक्र में  a सिरा ऋणात्मक औरसिरा धनात्मक बनता है। जिससे डायोड D1 पर पश्च बायस और D2 पर अग्र बायस लगता है। जिससे डायोड D2 में धारा का प्रचालन होता है और D1 में नहीं होता परन्तु धारा लोड RL में अब भीसेकी ओर बनती है। इस  प्रकार पूर्ण तरंग का दिष्टीकरण हो जाता है।

डाईग्राम

प्रश्न 3 :  शुद्ध दिष्टधारा प्राप्त करने के लिए फिल्टर परिपथ की कार्य प्रणाली समझाइये?

उत्तरपूर्ण दिष्टकारी से प्राप्त वोल्टता में उच्चावचन होते रहते है। अतः इस धारा को दिष्ट और प्रत्यावृत्ति धारा का मिश्रण मान सकते है। इसमें से शुद्व दिष्ट धारा प्राप्त करने के लिए समानान्तर क्रम में एक संधारितएवं श्रेणीक्रम में प्रेरकत्वजोड़ देते है जो फिल्टर परिपथ की तरह कार्य करता है। संधारित्र में से प्रत्यावृत्ति धारा गुजर जाती है दिष्ट धारा नहीं तथा प्रेरक में से प्रत्यावृत्ति धारा नहीं गुजरती है और दिष्ट धारा गुजरने से लोड़ RL पर शुद्ध दिष्ट धारा प्राप्त होती है।

 

जेनर डायोड (Zener diode) , फोटो डायोड (Photo diode)

प्रश्न 1 : जेनर डायोड किसे कहते है इसकी कार्य प्रणाली समझाइये?

उत्तर :  जेनर डायोड (Zener diode):- यह ऐसा डायोड है जो वोल्टता नियंत्रण में काम आता है। इसकेऔरभाग में अधिक मात्रा में अशुद्वि अपमिश्रित करते है ताकि ह्यसी क्षेत्र की चैड़ाई कम हो इससे कम वोल्टता आरोपित करने पर ही संधि तल पर उच्च विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है इसे परिपथ में पश्च बायस में जोड़ते है और इसे निम्न प्रतीक चिन्ह से प्रदर्शित करते है।

प्रतीक चिन्ह:- डाइग्राम

कार्य प्रणाली:- डाइग्राम

परिवर्ति दिष्ट विद्युत आपूर्ति स्त्रोत xy के साथ प्रतिरोध Rs और जेनर डायोड जोड़ देते है। जेनर डायोड पश्य बायस में जोड़ना चाहिए। जेनर डायोड के समानान्तर क्रम में लोड RL जोड़ देते है। यदि विद्युत आपूर्ति स्त्रोत से अधिक वोल्टता आती है तो भी डायोड पर वोल्टता का मान Vz के बराबर ही होता है और शेष वोल्टता प्रतिरोध Rs पर आरोपित होती है। लोड RL डायोड के समानान्तर क्रम में होने से इस पर वोल्टता Vz ही प्राप्त होगी। यदि विद्युत आपूर्ति से वोल्टता में कमी होती है तो जेनर डायोड पर वोल्टता Vz ही रहेगी और यह कमी प्रतिरोध Rs की वोल्टता में आयेगी। इस प्रकार लोड RL पर वोल्टता का मान Vz ही बना रहता है।

प्रश्न 2 :  फोटो डायोड का परिपथ चित्र बनाकर कार्य प्रणाली समझाइये?

उत्तरफोटो डायोड (Photo diode):- ये ऐसे डायोड है जो प्रकाशीय सिग्नल को विद्युत सिग्नल में परिवर्तित करते है ये परिपथ में पश्च बायस में जोड़ देते है इसका ऊपरी भाग पारदर्शी बनाया जाता है ताकि प्रकाशीय सिग्नल संधि क्षेत्र में प्रवेश कर सकें।

डाइग्राम

कार्य प्रणाली:-  जब संधि तल पर कोटोन आपतित कराते हैं तो इले. फोटोन का अवशोषण करके चालन बैण्ड में पहुँच जाते है। इस प्रकार इले. हाॅल युग्म का उत्पादन होता है। इसके लिए जरूरी है कि कि फोटोन की ऊर्जा वर्जित ऊर्जा अन्तराल से अधिक होनी चाहिए। (Hv > Eg)ये इले. हाॅल पुनः संयोजित हुए बिना ही ह्यासी क्षेत्र पर विद्युत तीव्रता के कारण पृथक पृथक हो जाते है इले. n भाग की ओर तथा कोटरभाग की ओर गति करते है। जिससे दोनों सीरों पर विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। जिससे परिपथ में धारा बहती है यह धारा प्रकाशीय तीव्रता के समानुपाती होती है।

प्रकाश उत्सर्जन डायोड (LED) , सौर सेल की बनावट कार्य प्रणाली

प्रश्न 1 : प्रकाश उत्सर्जन डायोड (LED) का परिपथ का चित्र बनाकर कार्यप्रणाली समझाइये?

उत्तर :  प्रकाश उत्सर्जक डायोड (Light emitting diode):- ये ऐसे डायोड है जो परिपथ में अग्र बायस में जोड़ने पर प्रकाश उत्सर्जन करते है इन्हें अत्याधिक मात्रा में अशुद्वि को अपमिश्रण करके बनाया जाता है तथा इन्हें पारदर्शी आवरण में बन्द कर देते हैं ताकि प्रकाश का उत्सर्जन हो सके।

डाइग्राम

कार्य प्रणाली (working):- जब pn संधि डायोड को अग्र बायसीत करते है तोभाग के कोटर औरभागसंधि तल की ओर गति करते है जहाँ इनका पुनः संयोजन होता है। जिससे फोटोन का उत्सर्जन होता है। उत्सर्जित कोटोन प्रकाश के रूप में प्राप्त हो इसके लिए बैण्ड अन्तराल का मान 1.8 ev से अधिक होना चाहिए। यदि Ga , As , P अर्द्धचालक ले तो इनका वर्जित ऊर्जा अन्तराल 1.9 ev होता है और प्राप्त प्रोटोन लाल रंग के होंगे यदि अर्द्धचालक गौलियम आर्सेमाइड ले तो इनका वर्जित ऊर्जा Eg का मान 1.43 ev होता है इससे प्राप्त प्रोटाॅन अवरक्त तरंग के होते है ऐसे डायोड सुदूर निंयत्रण चोर घण्टी संयंत्र बनने में उपयुक्त होते है।

प्रश्न 2 :  LED ताप द्धिप्त लेम्बों की तुलना में क्यों लाभकारी है।

उत्तर :  1. कम वोल्टता एवं कम क्षति पर कार्य करते है।

2. तुरन्त क्रिया होती है इन्हें गर्म करने की आवश्यकता नहीं।

3. ये एक वर्णी प्रकाश का उत्सर्जन करते है।

4. इनमें तुरन्त बंद शुरू होने की सुविधा होती है।

5. इनकी आयु अधिक एवं ये सुदृढ़ होते है।

प्रश्न 3 :  सौर सेल की बनावट कार्य प्रणाली समझाइये। ये फोटो डायोड से किस प्रकार भिन्न है इसमें होने वाली मूल क्रियाओं को लिखिए तथा इसके लिए काम में लेने वाले अर्द्धचालक की विशेषताएँ बताइए।

उत्तरसौर सैल:- यह ऐसा डायोड है जो विद्युत चुम्बकीय विकिरण ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करा है यह फोटो डायोड की तरह है लेकिन कुछ भिन्नाऐं है।

1. इसमें फोटो डायोड की तरह बाहरी बायस की आवश्यकता नही है।

2. इसमें संधि क्षेत्र का क्षेत्रफल अधिक रखा जाता है क्योंकि अधिक विकिरण को अवशोषित करके अधिक मात्रा में विद्युत धारा प्राप्त कर सकें।

जब संधि तल पर विकिरण आपतित हो तो तीन महत्वपूर्ण क्रियाऐं होती है

1. जननजब संधि तल पर विकिरण के फोटोन आपतित होते है तो इलेक्ट्रान हाॅल युग्म का उत्पादन होता है।

2. पृथक्करण :- संधि तल परहाॅल युग्म उत्पन्न स्त्रोत है ये ह्यासी क्षेत्र के विद्युत क्षेत्र के द्वारा पृथक हो जाते है। इलेक्ट्रॉनभाग की ओर तथा हाॅलभाग की ओर गति करते है।

3. संग्रह:- electron अग्र सम्पर्क पर संग्रह किये जाते है। जबकि हाॅल पश्च सम्पर्क पर संग्रह किये जाते है इस प्रकार एक सिरा धनात्मक तथा दूसरा सीरा ऋणात्मक बनने से विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जिससे परिपथ में धारा बहती है।

डाइग्राम

प्रश्न 4 : सौर सैल (Solar cell) बनाने के लिए अर्द्धचालक में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए

उत्तर :  1. बैण्ड अन्तराल का मान एक इलेक्ट्रॉन  वोल्ट से 1.8 ev के मध्य होना चाहिए।

2. प्रकाश अवशोषण क्षमता अधिक होनी चाहिए।

3. विद्युत चालकता अधिक होनी चाहिए।

4. कच्चे माल की उपलब्धता अधिक होनी चाहिए।

5. लागत कम होनी चाहिए।

ट्रांजिस्टर (Transistor) in hindi , ट्रांजिस्टर में धारा प्रवाह

question : ट्रांजिस्टर की संरचना समझाइए? इसके प्रतिक चिन्ह दीजिए। ट्रांजिस्टर के प्रकार लिखिए और n-p-n & p-n-p ट्रांजिस्टर में धारा प्रवाह समझाइए?

उत्तर :  ट्रांजिस्टर (Transistor):- इनमें तीन अपमिश्रित क्षेत्र होते है तथा इसमें दो pn संधि होती है तीन भाग निम्न है।

1. उत्सर्जक (Emitter):- यह अधिक मादित क्षेत्र होता है। जिसका कार्य अधिक मात्रा में आवेश वाहक प्रदान करता है।

2. आधार (base):- यह सबसे पतला और सबसे कम मादित क्षेत्र होता है इसका कार्य उत्सर्जक से प्राप्त आवेश वाहकों को आधार प्रदान करता है।

3. संग्राहक (Collector):- यह उत्सर्जक से कम और आधार से अधिक मादित क्षेत्र होता है इसका आकार उत्सर्जक से बढ़ा होता है इसका कार्य उत्सर्जक से प्राप्त आवेश वाहकों का संग्रह करता है।

1. npn ट्रांजिस्टर:

2. pnp ट्रांजिस्टर:

ट्रांजिस्टर में धारा प्रवाह:- ट्रांजिस्टर में धारा प्रवाह के लिए आवश्यक हैं कि उत्सर्जक आधार संधि को अग्र बायरा तथा आधार संधि को पश्च बाय करना चाहिए। चित्र में n-p-n ट्रांजिस्टर को उत्सर्जक आधार संधि को बैट्री Vee से अग्र बायस तथा आधार संग्राहक संधि को बैट्री Vcc से पश्च बायस किया गया है।

डाईग्राम

npn ट्रांजिस्टर को परिपथ में इस प्रकार से जोड़ने पर उत्सर्जक के स्वतंत्र इलेक्ट्रान बैट्री Vee के ऋण टर्मिनल से प्रतिकर्षित होकर आधार की ओर गति करते है। आधार पतला और कम मादित होने के कारण ये इलेक्ट्रान आधार के कोटर से संयोजित हुए बिना ही संग्राहक में पहुँच जाते है। उत्सर्जक में electron के गति करने से उत्सर्जक धारा Ie बहती है तथा कुछ e आधार के कोटर से संयोजित हो जाते है। जिससे आधार धारा Ib बहती है। अधिकांश electron  संग्राहक में पहुँच जाते है जो बैट्री Vcc के धन टर्मिनल से आकर्षित कर लिए जाते है इसे प्रकार संग्राहक में संग्राहक धारा Ic बहती है किरखोफ के नियम सेका

Ie = Ib + Ic

Iका मान बहुत कम होने पर उसे नगण्य मानकर छोड़ने पर

Ie =  Ic

N-P-N ट्रांजिस्टर परिपथ चित्र बनाइये और कार्यविधि , npn ट्रांजिस्टर को स्वीच के रूप में

प्रश्न 1 : N-P-N ट्रांजिस्टर (N-P-N transistor) के अभिलाक्षणिक वक्र खीचने के लिए परिपथ चित्र बनाइये और कार्यविधि समझाइए निवेशी और निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र खीचिए

उत्तर : 1. निवेशी

2 . निर्गत प्रतिरोध

3 . धारा लब्धि या धारा गुणांक

डाईग्राम

कार्यविधि (working):- अभिलाक्षणिक वक्र खीचने के लिए npn ट्रांजिस्टर को उत्सर्जक आधार संधि को बैटरी Vbb से अग्र बायसित किया गया है। जबकि आधार संग्राहक संधि को बैटरी Vcc से पश्च बायसित किया गया है। वोल्टता Vce को नियत रखकर निवेशी धारा Ib और निवेशी वोल्टता Vb में लेखा चित्र खीचते है। जिससे निवेशी अभिलाक्षणिक वक्र कहते है। जो चित्र में दिखाये अनुसार प्राप्त होता है।

डाईग्राम

निवेशी धारा Ib को नियत रखकर निर्गत धारा Ic और निर्गत वोल्टता Vce में लेखाचित्र खींचते है जिसे निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र कहते है। जो चित्र में दिखाए अनुसार प्राप्त होता है।

निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र – डाइग्राम

निवेशी प्रतिरोध:- निवेशी वोल्टता में परिवर्तन Vbe और निवेशी धारा में परिवर्तन Ib के अनुपात को निवेशी प्रतिरोध ri कहते है।

ri = Vbe / Ib

निर्गत प्रतिरोध – निर्गत वोल्टता में परिवर्तन Vce  और निर्गत धारा में परिवर्तन Ic के अनुपात को निर्गत प्रतिरोध ro कहते है।

ro = Vce / Ic

धारा लब्धि या धारा प्रवर्धन गुणांक:- निर्गत धारा में परिवर्तन Ic और निवेशी धारा में परिवर्तन Ib के अनुपात को धारा गुणांक बीटा कहते है।

प्रश्न 2 :  N-P-N ट्रांजिस्टर स्वीच आॅन आॅफ के रूप में किस प्रकार कार्य करता है समझाइये? परिपथ बनवाकर अन्तरण वक्र खीचिए?

उत्तर :  npn ट्रांजिस्टर को स्वीच आॅन आॅफ के रूप में कार्य करने के लिए परिपथ में जोड़ा गया है।

डाइग्राम

किरखोफ के नियम से

निवेशी वोल्टता Vbb = IbRb + Vbe

निर्गत वोल्टता:- Vce = Vcc + IcRe

यदि अर्द्धचालक  के रूप में सिलिकन अर्द्धचालक काम में लिया गया है तो निवेशी वोल्टता का मान .6 वोल्ट से कम होने पर ट्रांजिस्टर में धारा का प्रचालन नहीं होगा जिससे Ic का मान शून्य होने के कारण निर्गत वोल्टता उच्च Vcc के बराबर होगी। जिसे लेखाचित्र में अतंरक क्षेत्र से व्यक्त किया गया है। यदि निवेशी वोल्टता का मान .6 वोल्ट से अधिक करें तो ट्रांजिस्टर में धारा का प्रचालक होगा और Ic का मान बढ़ने पर निर्गत वोल्टता का मान रेखिक रूप से घटता है जिसे सक्रिय क्षेत्र से व्यक्त किया गया है। यदि निवेशी वोल्टता का मान और अधिक बढ़ाये तो निर्गत वोल्टता का मान शून्य की ओर अग्रसर होता है। परन्तु शून्य होता नहीं है इसे संतृप्त क्षेत्र से व्यक्त किया गया है निर्गत वोल्टता V0 और निवेशी वोेल्टता Vi में लेखाचित्र जिसे अन्तरण वक्र कहते है चित्र में प्रदर्शित है।

डाइग्राम

जब निवेशी वोल्टता लघु है तो ट्रांजिस्टर में धारा का प्रचालन नहीं होता है निर्गत वोल्टता उच्च होती है इसे ट्रांजिस्टर की आॅफ अवस्था कहते है। जब निवेश उच्च होता है तो ट्रांजिस्टर में धारा का प्रचालन होता है और निर्गत का मान निम्न होता है इसे ट्रांजिस्टर की आॅन अवस्था कहते है। ट्रांजिस्टर इस प्रकार बनाया जाता है कि ये अन्तक और संतृप्त क्षेत्र में कार्य करें तो इस प्रकार से बनाया गया ट्रांजिस्टर स्विच आॅन आॅफ के रूप में कार्य करता है।

ट्रांजिस्टर के प्रवर्धक के रूप में , ट्रांजिस्टर दोलित्र के रूप में कार्य विधि , परिपथ चित्र

प्रश्न 1 : प्रवर्धन किसे कहते है ट्रांजिस्टर के प्रवर्धक के रूप में कार्य करने की विधि को परिपथ चित्र बनाकर समझाइये। वोल्टता प्रवर्धन शक्ति प्रवर्धन का सूत्र ज्ञात कीजिए तथा निर्गत तथा निवेशी वोल्टता में कलान्तर लिखिए?

उत्तर :  प्रवर्धन (Amplification):- निवेशी सिग्नल के आयाम में वृद्वि करने को प्रर्वान कहते है।  एक npn ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में कार्य करने के लिए परिपथ में जोड़ा गया है। इससे निवेशी सिग्नल Vi और बैटरी Vbb के श्रेणीक्रम में आरोपित करते है।  बैअरी Vbb का मान सक्रिय क्षेत्र के मध्य में रखना चाहिए और ट्रांजिस्टर ऐसा लेना चाहिए जिसका सक्रिय क्षेत्र बड़ा होता है यानि की ट्रांजिस्टर सक्रिय क्षेत्र में कार्य करें।

जब निवेशी सिग्नल वोल्टता Vi के ज्यावक्रीय है आरोपित करते हैं तो आधार धारा में परिवर्तन होता है उसी के अनुरूप संग्राहक धारा में अधिक परिवर्तन होने से निर्गत वोल्टता में भी ज्यावक्रीय अधिक परिवर्तन होगा।

माना कि प्रारम्भ में निवेशी सिग्नल वोल्टता Vi का माल शून्य हो तो

Vbb = IbRb + Vbe

प्रश्न 2 :  ट्रांजिस्टर दोलित्र के रूप में कार्य करने की विधि को परिपथ चित्र बनाकर समझाइये।

उत्तरएक NPN ट्राजिस्टर को दोलित्र के रूप में कार्य करने के लिए परिपथ  में जोड़ा गया है टैक परिपथ को (L.C परिपथ) निर्गत में जोड़ा गया है जबकि निवेश में प्रेरक कुण्डलजी T2 को जोड़ा गया है। प्रेरक कुण्डली T1 , T2 , T3 को एक ही कोड पर लपेटा गया है।

जब स्विचको आॅन करते हैं तो संग्राहक द्वारा शून्य से बढ़ती है प्रेरक T1 से चुम्बकीय क्षेत्र में वृद्वि होने से चुम्बकीय फ्लक्स में वृद्वि होती है जिससे प्रेरक कुण्डली T के चुम्बकीय फ्लक्स में वृद्वि होती है। जिससे प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है तो उत्सर्जक आधार संधि को अग्रबायस प्रदान करता है जिससे संग्राहक धारा में वृद्वि होती है जिससे T1 के चुम्बकीय क्षेत्र में वृद्वि होने से चुम्बकीय फ्लक्स में वृद्वि होती है और प्रेरक T2 में भी चुम्बकीय फ्लक्स में वृद्वि होने से अग्रबायस में और वृद्वि होती है और यह क्रिया तब तक चलती है जब तक धारा सतृप्त अवस्था में पहुॅच जाए। अब चुम्बकीय फ्लक्स में वृद्वि रूक जाती है जिससे T2 के द्वारा अग्रबायस नहीं लगता है और संग्राक धारा में कमी आती है जिससे  T1 के चुम्बकीय फ्लक्स में कमी होती है और उसी के अनुरूप T2 में भी चुम्बकीय फ्लक्स में कमी होगी। जिससे उत्सर्जक आधर संधि को पश्च बायस लगने से संग्राहक धारा में कमी होगी और यह कमी शून्यतक होगी। अब प्रारम्भिक अवस्था में प्राप्त हो जाती है और पूर्ण की प्रक्रिय पुनदोहराई जाती है इस  प्रकार प्रत्यावृत्ति धारा प्राप्त होती है।

 

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