अध्याय - 1
सत्ता की साझेदारी
सत्ता की साझेदारी :-
🔹 जब किसी शासन व्यवस्था में हर सामाजिक समूह और समुदाय की भागीदारी सरकार में होती है तो इसे सत्ता की साझेदारी कहते हैं । लोकतंत्र का मूलमंत्र है सत्ता की साझेदारी । किसी भी लोकतांत्रिक सरकार में हर नागरिक का हिस्सा होता है । यह हिस्सा भागीदारी के द्वारा संभव हो पाता है । इस प्रकार की शासन व्यवस्था में नागरिकों को इस बात का अधिकार होता है कि शासन के तरीकों के बारे में उनसे सलाह ली जाये ।
बेल्जियम के समाज की जातीय बनावट :-
🔹 बेलजियम यूरोप का एक छोटा सा देश है जिसकी आबादी हरियाणा से भी आते हैं परंतु इसके समाज की बनावट बड़ी जटिल है। इसमें रहने वाले 59 % लोग डच भाषा बोलते हैं 40 % लोग फ्रेंच बोलते हैं बाकी 1 % लोग जर्मन बोलते हैं ।
बेल्जियम की समझदारी :-
🔹 ऐसे भाषाई विविधताओं कई बार सांस्कृतिक और राजनीतिक झगड़े का कारण बन जाती है परंतु बेल्जियम के लोगों ने एक नवीन प्रकार कि शासन पद्धति अपना कर सांस्कृतिक विविधताओं एवं क्षेत्रीय अंतरों से होने वाले आपसी मतभेदों को दूर कर लिया उन्हें बार बार संविधान में संशोधन इस संसार से किया कि किसी भी व्यक्ति को बेगानेपन का एहसास न हो और सभी मिलजुल कर रह सकें । सारा विश्व बेल्जियम की इस समझदारी की दाद देता है ।
श्रीलंका के समाज की जातीय बनावट :-
🔹 श्रीलंका एक द्वीपीय देश है जो भारत के दक्षिण तट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । इसकी आबादी कोई दो करोड़ के लगभग है अर्थात हरियाणा के बराबर । बेल्जियम की भांति यहां भी कई जातिय समूहों के लोग रहते हैं । देश की आबादी का कोई 74 % भाग सिहलियों का है जबकि कोई 18 % लोग तमिल हैं।बाकी भाग अन्य छोटे -छोटे जातीय समूहों जैसे ईसाइयों और मुसलमानों का है देश युद्ध पूर्वी भागों में तमिल लोग अधिक है जबकि देश के बाकी हिस्सों में सिहलीं लोग बहुसंख्या में हैं।यदि श्रीलंका में लोग चाहते तो वे भी बेल्जियम की भांति अपनी जातिय मसले का कोई उचित हल निकाल सकते थे परन्तु वहाँ के बहुसंख्यक समुदाय अथार्थ सिहलियों ने अपने बहुसंख्यकवाद को दूसरों पर थोपने का प्रयत्न किया जिससे वहां ग्रह युद्ध शुरू हो गया और आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है ।
श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद :-
🔹 बहुसंख्यक वाद का अर्थ है बहुसंख्यक समुदाय मनचाहे ढंग से देश का शासन चला सकता है । अल्पसंख्यक समुदाय की अवहेलना करके ।
🔹 सिहंलियों को विश्व विद्यालयों और सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी गई ।
🔹सिहंलियों को एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया गया जिससे तमिलों की अवहेलना हुई ।
🔹
1956 में एक कानून पास किया गया सिहली समुदाय की सर्वोच्चता स्थापित करने हेतु ।
🔹 नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि सरकार बौद्ध मठ कोसंरक्षण और बढ़ावा देगी ।
भारत में सत्ता की साझेदारी :-
🔹
भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है । यहाँ के नागरिक सीधे मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं । लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि एक सरकार को चुनते हैं । इस तरह से एक चुनी हुई सरकार रोजमर्रा का शासन चलाती है और नये नियम बनाती है या पुराने नियमों और कानूनों में संशोधन करती है ।
🔹 किसी भी लोकतंत्र में हर प्रकार की राजनैतिक शक्ति का स्रोत प्रजा होती है । यह लोकतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत है । ऐसी शासन व्यवस्था में लोग स्वराज की संस्थाओं के माध्यम से अपने आप पर शासन करते हैं । एक समुचित लोकतांत्रिक सरकार में समाज के विविध समूहों और मतों को उचित सम्मान दिया जाता है । जन नीतियों के निर्माण में हर नागरिक की आवाज सुनी जाती है । इसलिए लोकतंत्र में यह जरूरी हो जाता है कि राजनैतिक सत्ता का बँटवारा अधिक से अधिक नागरिकों के बीच हो ।
सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता :-
🔹 समाज में सौहार्द्र और शांति बनाये रखने के लिये सत्ता की साझेदारी जरूरी है । इससे विभिन्न सामाजिक समूहों में टकराव को कम करने में मदद मिलती ।
🔹 किसी भी समाज में बहुसंख्यक के आतंक का खतरा बना रहता है । बहुसंख्यक का आतंक न केवल अल्पसंख्यक समूह को तबाह करता है बल्कि स्वयं को भी तबाह करता है । सत्ता की साझेदारी के माध्यम से बहुसंख्यक के आतंक से बचा जा सकता है ।
🔹 लोगों की आवाज ही लोकतांत्रिक सरकार की नींव बनाती है । इसलिये यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की आत्मा का सम्मान रखने के लिए सत्ता की साझेदारी जरूरी है ।
🔹 सत्ता की साझेदारी के दो कारण होते हैं । एक है समझदारी भरा कारण और दूसरा है नैतिक कारण । सत्ता की साझेदारी का समझदारी भरा कारण है समाज में टकराव और बहुसंख्यक के आतंक को रोकना । सत्ता की साझेदारी का नैतिक कारण है लोकतंत्र की आत्मा को अक्षुण्ण रखना ।
सत्ता की साझेदारी के रूप :-
शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा :-
🔹 लोकतंत्र में शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा होता है । उदाहरण के लिए ; विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का बँटवारा । इस प्रकार के बँटवारे में सत्ता के विभिन्न अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं । इसलिए इस प्रकार के बँटवारे को क्षैतिज बँटवारा कहते हैं ।
🔹 शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता के बँटवारे से यह सुनिश्चित हो जाता है कि शासन के किसी भी एक अंग के पास असीमित शक्ति न हो । यह विभिन्न संस्थानों के बीच शक्ति के संतुलन को सुनिश्चित करता है ।
🔹 कार्यपालिका सत्ता का उपयोग करती है लेकिन वह संसद के अधीन होती है । संसद को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त होता है लेकिन उसे जनता को जवाब देना होता है । न्यायपालिका इन दोनों से स्वतंत्र होती है । न्यायपालिका का काम होता है यह देखना कि विधायिका और कार्यपालिका सभी नियमों का सही ढंग से पालन कर रही है या नहीं ।
विभिन्न स्तरों पर सत्ता का बँटवारा :-
भारत जैसे विशाल देश में सरकार चलाने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो । भारत सरकार को दो मुख्य स्तरों में बाँटा गया है ; केंद्र सरकार और राज्य सरकार । केंद्र सरकार पर पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी होती है । गणराज्य की विभिन्न इकाइयों की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर होती है । दोनों सरकारों के अधिकार क्षेत्र में अलग अलग विषय आते हैं । कुछ ऐसे विषय भी होते हैं जो साझा लिस्ट में रहते हैं और जिनपर राज्य और केंद्र सरकारों दोनों का अधिकार होता है ।
सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा :-
🔹 भारत विविधताओं से भरा देश है । यहाँ अनेक सामाजिक , भाषाई और जातीय समूह हैं । इन विभिन्न समूहों के बीच भी सत्ता का बँटवारा होता है । समाज के पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाता है ताकि सरकारी तंत्र में उनका सही प्रतिनिधित्व हो सके । उदाहरण के लिए ; अल्पसंख्यक समुदाय , अन्य पिछड़ी जातियों , अनुसूचित जाति और अनुसूचिक जनजाति के लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्राप्त है ।
विभिन्न प्रकार के दबाव समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा :-
🔹 सत्ता का बँटवारा विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के बीच होता है । सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी या सबसे बड़े राजनैतिक गठबंधन को शासन करने का मौका मिलता है । बची हुई पार्टियाँ विपक्ष का निर्माण करती हैं । विपक्ष का काम होता है यह सुनिश्चित करना कि सत्तारूढ़ पार्टी लोगों की इच्छा के अनुसार काम करे । विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के लोग विभिन्न कमेटियों के अध्यक्ष बनते हैं । यह राजनैतिक पार्टियो 6 के बीच सत्ता की साझेदारी का एक अच्छा उदाहरण है ।
🔹 राजनैतिक पार्टियों के अलावा देश में कई दबाव समूह होते हैं । उदाहरण के लिए ; एसोचैम , छात्र संगठन , मजदूर यूनियन , आदि । ऐसे संगठनों के प्रतिनिधि कई नीति निर्धारक अंगों के भाग बनते हैं । इस तरह से दबाव समूहों को भी सत्ता में साझेदारी मिलती है ।
अध्याय - 2
संघवाद
संघवाद :- संघवाद से अभिप्राय है कि एक ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें देश की सर्वोच्च सत्ता केंद्र सरकार और उसके विभिन्न आनुषागिक सादिक इकाइयों राज्य सरकारों के बीच बंटी होती है ।
संघीय व्यवस्था की विशेषता है :- संवाद या संघीय शासन व व्यवस्था है जिसमें देश की सरोज सत्ता केंद्र सरकार और उसके विभिन्न अनुषांगिक इकाइयों के बीच में बंट जाती है ।
संघीय व्यवस्था या संवाद की महत्वपूर्ण विशेषताएँ :-
👉 संघीय व्यवस्था या संघवाद की कुछ महत्वपूर्ण विशेषता है निम्नलिखित हैं :-
🔹 सघ सरकार दो या अधिक स्तरों वाली होती है ।
🔹 अलग - अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं पर कानून बनाने , कर वसूलने और प्रशासन का उनका अपना - अपना अधिकार क्षेत्र होता है ।
🔹 विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकार क्षेत्र संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित होते हैं ।
🔹 संविधान के मौलिक प्रावधानों को किसी एक स्तर की सरकार अकेले नहीं बदल सकती ।
🔹 अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तर की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है ।
🔹 केन्द्र और विभिन्न राज्य सरकारों के बीच सत्ता का बँटवारा हर संघीय सरकार में अलग - अलग किस्म का होता है ।
🔹 पहला तरीका है दो या अधिक स्वतंत्र राष्ट्रों को साथ लाकर एक बड़ी इकाई गठित करने का ।
🔹 संघीय शासन व्यवस्था के गठन का दूसरा तरीका है बड़े देश द्वारा अपनी आंतरिक विविधता को ध्यान में रखते हुए राज्यों का गठन करना और फिर राज्य और राष्ट्रीय सरकार के बीच सत्ता का बँटवारा कर देना ।
भारतीय गणराज्य :-
🔹 हालांकि भारत के संविधान में ' गणराज्य ' शब्द का उल्लेख नहीं है , लेकिन भारतीय राष्ट्र का निर्माण संघीय व्यवस्था पर हुआ था ।
🔹 भारत के संविधान में मूल रूप से दो स्तर के शासन तंत्र का प्रावधान रखा गया था । एक स्तर पर केंद्रीय सरकार होती है जो भारतीय संघ का प्रतिनिधित्व करती है । दूसरे स्तर पर राज्य सरकारें होती हैं जो राज्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं । बाद में इस व्यवस्था में एक तीसरे स्तर को जोड़ा गया , जो पंचायत और नगरपालिका के रूप में है ।
संघीय व्यवस्था के मुख्य लक्षण :-
🔹 इस प्रकार की शासन व्यवस्था में दो या दो से अधिक स्तर होते हैं ।
🔹 शासन के विभिन्न स्तरों द्वारा नागरिकों के एक ही समूह पर शासन किया जाता है । हर स्तर का अधिकार क्षेत्र अलग होता है ।
🔹 संविधान में सरकार के विभिन्न स्तरों के अधिकार क्षेत्रों के बारे में साफ साफ उल्लेख किया गया है । हर स्तर की सरकार का अस्तित्व और अधिकार क्षेत्र को संविधान से गारंटी मिली होती है ।
🔹 संविधान के मूलभूत प्रावधानों को बदलना सरकार के किसी भी स्तर द्वारा अकेले संभव नहीं होता है । यदि ऐसे किसी बदलाव की जरूरत होती है तो इसके लिए सरकार के दोनों स्तरों की सहमति की आवश्यकता पड़ती है ।
🔹 न्यायालय का यह अधिकार होता है कि वह संविधान का अर्थ निकाले और सरकार के विभिन्न स्तरों के कार्यों का व्याख्यान करे । जब कभी सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच अधिकारों को लेकर कोई मतभेद होता है तो ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय का काम किसी अम्पायर की तरह होता है ।
🔹 सरकार के हर स्तर के लिए वित्त के स्रोत का स्पष्ट विवरण दिया गया है । इससे विभिन्न स्तर के सरकारों की वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित होती है । संघीय ढाँचे के दो उद्देश्य होते हैं ।
👉 पहला उद्देश्य है देश की एकता को बल देना ।
👉 दूसरा उद्देश्य है क्षेत्रीय विविधता को सम्मान देना ।
🔹 किसी भी आदर्श संघीय व्यवस्था के दो पहलू होते हैं , पारस्परिक विश्वास और साथ रहने पर सहमति । ये दोनों पहलू संघीय व्यवस्था के गठन और कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होते हैं ।
🔹 सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता की साझेदारी के नियमों पर सहमति होना जरूरी होता है । विभिन्न स्तरों में परस्पर यह विश्वास भी होना चाहिए के वे अपने अपने अधिकार क्षेत्रों को मानेंगे और एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों में दखलंदाजी नहीं करेंगे ।
सत्ता का संतुलन :
🔹 अलग अलग संघीय ढाँचे में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता के संतुलन अलग अलग प्रकार के होते हैं । यह संतुलन उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है जिसपर उस संघ का निर्माण हुआ था ।
संघों के निर्माण के दो तरीके हैं जो निम्नलिखित हैं :-
सबको साथ लाकर संघ बनाना :- इस प्रकार की व्यवस्था में स्वतंत्र राज्य स्वत : एक दूसरे से मिलकर एक संघ का निर्माण करते हैं । ऐसा इसलिए किया जाता है कि वैसे राज्य अपनी स्वायत्तता बनाये रखने के साथ साथ अपनी सुरक्षा बढ़ा सकें । इस प्रकार की व्यवस्था में केंद्र की तुलना में राज्यों के पास अधिक शक्ति होती है । इस प्रकार की संघीय व्यवस्था के उदाहरण हैं , संयुक्त राज्य अमेरिका , स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया ।
✴️ सबको जोड़कर संघ बनाना :- इस प्रकार की संघीय व्यवस्था में एक बहुत बड़ी विविधता वाले क्षेत्रों को एक साथ रखने के लिए सत्ता की साझेदारी होती है । इस प्रकार की व्यवस्था में राज्यों की तुलना में केंद्र अधिक शक्तिशाली होता है । हो सकता है कुछ इकाइयों को अन्यों के मुकाबले अधिक शक्ति मिली हुई हो । उदाहरण के लिए ; भारत में जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक शक्ति मिली हुई है । इस प्रकार की संघीय व्यवस्था के उदाहरण हैं : भारत , स्पेन , बेल्जियम , आदि ।
भारत में संघीय व्यवस्था :-
🔹 भारतीय संविधान ने यहां की सरकार को एक संघात्मक रूप प्रदान किया है । यहाँ विकेंद्रीकरण के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं ।
🔹 संविधान ने मौलिक रूप से दो स्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया था । संघ सरकार और राज्य सरकारें । केन्द्र सरकार को पूरे भारतीय संघ का प्रतिनिधित्व करना था । बाद में पंचायत और नगरपालिकाओं के रूप में संघीय शासन का एक तीसरा स्तर भी जोड़ा गया ।
🔹 भारतीय संविधान लिखित एवं कठोर है एवं राज्यों के मध्य शक्ति के विभाजन स्पष्ट रूप से लिखे हैं ।
🔹 भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका अथवा सर्वोच्च न्यायपालिका की स्थापना की गई है ताकि केन्द्र एवं राज्यों अच्छा दो या दो से अधिक राज्यों के बीच उठने वाले विवादों को आसानी से निपटाया जा सके ।
🔹 भारत में संघीय शासन व्यवस्थाओं के अपने अलग - अलग अधिकार क्षेत्र है ।
विषयों की सूची :-
संघ सूची :- इस सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय आते हैं । कुछ विषयों पर पूरे देश में एक जैसी नीति की जरूरत होती है , इसलिए उन्हें संघ सूची में रखा जाता है । ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है । संघ सूची के कुछ विषय हैं ; देश की सुरक्षा , विदेश नीति , बैंकिंग , सूचना प्रसारण और मुद्रा ।
राज्य सूची :- जो विषय स्थानीय महत्व के होते हैं उन्हें राज्य सूची में रखा जाता है । ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास होता है । उदाहरण ; पुलिस , व्यापार , वाणिज्य , कृषि और सिंचाई ।
समवर्ती सूची :- इस सूची को कॉनकरेंट लिस्ट भी कहते हैं । वैसे विषय जो साझा महत्व के होते हैं , इस सूची में आते हैं । समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास होता है । यदि केंद्र और राज्य द्वारा बनाये गये नियमों में टकराव की स्थिति होती है तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है । उदाहरण ; शिक्षा , वन , ट्रेड यूनियन , विवाह , दत्तक अभिग्रहण , उत्तराधिकार , आदि ।
बची हुई लिस्ट :- वैसे विषय जो ऊपर दी गई किसी भी लिस्ट में न हो तो उन्हें बचे हुए विषयों की लिस्ट में रखा जाता है । ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है ।
विशेष दर्जा :- जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया है । इस राज्य का अपना अलग संविधान है । भारत के संविधान के कई प्रावधान इस राज्य में तब तक लागू नहीं किये जा सकते जब तक कि उन्हें राज्य की विधान सभा की अनुमति न मिले । यदि कोई भारतीय इस राज्य का स्थाई नागरिक नहीं है तो वह इस राज्य में जमीन या मकान नहीं खरीद सकता है । कुछ अन्य राज्यों को भी विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है ।
केंद्र शासित प्रदेश :- भारतीय गणराज्य की कुछ इकाइयों का क्षेत्रफल इतना कम है कि उन्हें एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है । कुछ अन्य कारणों से इन्हें किसी अन्य राज्य में मिलाया भी नहीं जा सकता है । इन इकाइयों के पास बहुत ही कम शक्ति होती है । इन्हें केंद्र शाषित प्रदेश कहते हैं । ऐसे क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केंद्र सरकार के पास विशेष अधिकार होते हैं । उदाहरण ; दिल्ली , चंडीगढ़ , अंडमान निकोबार , आदि ।
✴️ भारत में सत्ता की साझेदारी की यह प्रणाली हमारे संविधान की मूलभूत संरचना में है । इस प्रणाली को बदलना बहुत कठिन है । अकेले संसद् द्वारा यह संभव नहीं है । इस प्रणाली में कोई भी बदलाव लाने के लिए पहले तो उसे संसद के दोनों सदनों से दो तिहाई बहुमत से पास कराना होगा । उसके बाद कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं से सहमति लेनी होगी ।
भारत में संघीय व्यवस्था की सफलता के कारण :-
भाषायी राज्य : भारत एक विशाल देश है जहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं । इसके अलावा यहाँ भौगोलिक , जातीय , सांस्कृतिक , आदि विविधताएँ भी हैं । कुछ राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया गया ताकि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक ही राज्य में रह सकें । उदाहरण ; तामिल नाडु , पश्चिम बंगाल , उड़ीसा , महाराष्ट्र , आदि । कुछ राज्यों का गठन भूगोल , जातीयता , संस्कृति आदि के आधार पर हुआ । उदाहरण ; नागालैंड , उत्तराखंड , झारखंड , आदि ।
भाषा नीति : भारत के संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है । हिंदी को आधिकारिक भाषा की मान्यता दी गई है । लेकिन हिंदी केवल 40 % लोगों की मातृभाषा है । इसलिए दूसरी भाषाओं की रक्षा करना अनिवार्य हो जाता है । इसके लिए कई प्रावधान बनाये गये । हिंदी के अलावा , 21 अन्य भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है ।
केंद्र और राज्य के रिश्ते : केंद्र और राज्य के बीच के रिश्तों के पुनर्गठन से हमारी संघीय व्यवस्था को और बल मिला है ।
कांग्रेस की मोनोपॉली के समय :-
🔹 आजादी के बाद एक लंबे समय तक भारत के अधिकांश हिस्सों में केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हुआ करती थी । यह कांग्रेस की मोनोपॉली का दौर था । उस दौर में ऐसा अक्सर होता था जब केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार के अधिकारों की अवहेलना की जाती थी । छोटी से छोटी बात पर किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता था ।
गठबंधन सरकार के दौर की स्थिति :-
🔹 1989 के बाद कांग्रेस की मोनोपॉली का दौर समाप्त हुआ । उसके बाद केंद्र में गठबंधन सरकार का दौर शुरु हुआ । इससे राज्य सरकार की स्वायत्तता को अधिक सम्मान मिलने लगा और सत्ता में साझेदारी भी बढ़ी । इससे भारत में संघीय व्यवस्था को और अधिक बल मिला ।
भारत में भाषायी विविधता :-
🔹 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 1500 अलग - अलग भाषाएँ हैं । इन भाषाओं को कुछ मुख्य भाषाओं के समूह में रखा गया है । उदाहरण के लिये भोजपुरी , मगधी , बुंदेलखंडी , छत्तीसगढ़ी , राजस्थानी , भीली और कई अन्य भाषाओं को हिंदी के समूह में रखा गया है । विभिन्न भाषाओं के समूह बनाने के बाद भी भारत में 114 मुख्य भाषाएँ हैं । इनमें से 22 भाषाओं को संविधान के आठवें अनुच्छेद में अनुसूचित भाषाओं की लिस्ट में रखा गया है । अन्य भाषाओं को अ - अनुसूचित भाषा कहा जाता है । इस तरह से भाषाओं के मामले में भारत दुनिया का सबसे विविध देश है ।
भारत में विकेंद्रीकरण :-
🔹 भारत एक विशाल देश है , जहाँ दो स्तरों वाली सरकार से काम चलाना बहुत मुश्किल काम है । भारत के कुछ राज्य तो यूरोप के कई देशों से भी बड़े हैं । जनसंख्या के मामले में उत्तर प्रदेश तो रूस से भी बड़ा है । इस राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बोली , खानपान और संस्कृति की विविधता देखने को मिलती है ।
🔹 कई स्थानीय मुद्दे ऐसे होते हैं जिनका निपटारा स्थानीय स्तर पर ही क्या जा सकता है । स्थानीय सरकार के माध्यम से सरकारी तंत्र में लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होती है । इसलिए भारत में सरकार के एक तीसरे स्तर को बनाने की जरूरत महसूस हुई ।
🔹 1992 में विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया । संविधान में संशोधन किया गया ताकि लोकतंत्र के तीसरे स्तर को अधिक कुशल और शक्तिशाली बनाया जा सके । स्थानीय स्वशासी निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया ।
🔹 अब स्थानीय निकायों के नियमित चुनाव करवाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो गया है ।
🔹 इन निकायों में अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के लिये सदस्यों और पदाधिकारियों के सीट रिजर्व होते हैं ।
🔹 सभी सीटों का कम से कम एक तिहाई महिलाओं के लिये आरक्षित होता है ।
🔹 पंचायत और म्यूनिसिपल के चुनावों को सुचारु रूप से करवाने के लिये हर राज्य में एक स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग का गठन किया गया है ।
पंचायती राज :-
🔹 राज्य सरकारों को अपने राजस्व में से कुछ हिस्सा इन स्थानीय निकायों को देना होगा । यह हिस्सा अलग अलग राज्यों में अलग - अलग हो सकता है । ग्रामीण स्थानीय स्वशाषी निकाय को आम भाषा में पंचायती राज कहते हैं ।
🔹 हर गाँव ( कुछ राज्यों में गाँवों का एक समूह ) में एक ग्राम पंचायत होती है । यह कई वार्ड सदस्य ( पंच ) का एक समूह होता है । पंचायत के अध्यक्ष को सरपंच कहते हैं ।
🔹 पंचायत के सदस्यों का चुनाव उस पंचायत में रहने वाले वयस्कों द्वारा किया जाता है । स्थानीय स्वशासी संरचना जिला के स्तर तक होती है ।
पंचायत समिति : कुछ ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पंचायत समिति या प्रखंड या मंडल बनता है । इस मंडली के सदस्यों का चुनाव उस क्षेत्र के सभी पंचायतों के सदस्यों द्वारा किया जाता है ।
जिला परिषद : एक जिले की सारी पंचायत समितियाँ मिलकर जिला परिषद का निर्माण करती हैं । जिला परिषद के अधिकतर सदस्य चुनकर आते हैं । उस जिले के लोक सभा के सदस्य , विधान सभा के सदस्य और जिला स्तर के अन्य निकायों के कुछ अधिकारी भी जिला परिषद के सदस्य होते हैं । जिला परिषद का राजनैतिक मुखिया जिला परिषद का अध्यक्ष होता है ।
नगरपालिका : इसी तरह से शहरी क्षेत्रों में भी स्थानीय स्वशासी निकाय होती है । शहरों में नगरपालिका का गठन होता है । बड़े शहरों में म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का गठन होता है । इनके सदस्य ( वार्ड काउंसिलर ) लोगों द्वारा चुने जाते हैं । फिर ये सदस्य अपने चेअरमैन का चुनाव करते हैं । म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में इसे मेयर कहा जाता है ।
अध्याय - 3
लोकतंत्र और विविधता
समरूप समाज :-
🔹 एक ऐसा समाज जिसमें सामुदायिक , सांस्कृतिक या जातीय विभिन्नताएँ ज्यादा गहरी नहीं होती ।
एफ्रो - अमेरिकी :-
🔹 उन अफ्रीकी लोगों की संतानें जिन्हें 17 वीं सदी में अमेरिका में लाकर गुलाम बनाया गया था ।
नस्लभेद :-
🔹 किसी देश अथवा समाज में नस्ल के आधार पर कुछ लोगों को नीच या हीन समझना ।
रंगभेद :-
🔹 रंग के आधार पर भेदभाव करना ।
अनु . जाति अनु . जनजाति :-
🔹 भारत के निर्धन , भूमिहीन और सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोग ।
अश्वेत शक्ति आंदोलन :-🔹 नस्ल आधारित भेदभाव के उन्मूलन के लिए अमेरिका में 1966 से 1975 के बीच चलाया गया हिंसक आंदोलन ।
प्रवासी :-
🔹 अस्थाई तौर पर आर्थिक अवसरों के लिए दूसरे देशों या नगरों में जाकर बसने वाले लोग ।
विभाजित समाज :-
🔹 एक ऐसा समाज जिसमें सामुदायिक , सांस्कृतिक या जातीय विभिन्नताएँ बहुत गहरी होती हैं ।
बहुल समाज :-
🔹 विभिन्न विचारों एवं पंथो वाला समाज ।
अपवर्जक भेदभाव :-
🔹 समाज के किसी वर्ग या जाति से दूरी बनाए रखना या अपने समूह से निष्कासित करना ।
अलगाववाद :- एक क्षेत्र या जन - समूह का अपने बड़े समूह या देश से अलग होकर स्वतंत्र अस्तित्व बनाने की इच्छा ।
समाज में विविधता :-
🔹 किसी भी समाज में विविधता तभी आती है जब उस समाज में विभिन्न आर्थिक तबके , धार्मिक समुदायों , विभिन्न भाषाई समूहों , विभिन्न संस्कृतियों और जातियों के लोग रहते हैं ।
🔹 भारत देश विविधताओं का एक जीता जागता उदाहरण है । इस देश में दुनिया के लगभग सभी मुख्य धर्मों के अनुयायी रहते हैं । यहाँ हजारों भाषाएँ बोली जाती हैं , अलग - अलग खान पान हैं , अलग - अलग पोशाक और तरह तरह की संस्कृति दिखाई देती है ।
सामाजिक विभाजन :-
🔹 जो विभाजन क्षेत्र , जाति , रंग , नस्ल , लिंग आदि के भेद पर किया जाए उसे सामाजिक विभाजन कहते हैं ।
🔹 जब किसी सामाजिक समूह के साथ कोई घोर अन्याय किया जाता है तो यह सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं जैसे अमेरिका में दोनों श्वेत और अश्वेत जातियों के लोग अमेरिका के नागरिकों के रूप में रहते हैं परन्तु यदि अश्वेत अमेरिकनो से नस्लवाद के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजन में भी बादल जाते हैं जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं । सामाजिक अंतर होना तो स्वाभाविक है परन्तु यदि उनके साथ और तत्व जुट जाते हैं तो उन्हें सामाजिक विभाजन का रूप लेते देर नहीं लगती ।
अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन ( 1954-1968 ) : -
🔹 घटनाओं और सुधार आंदोलनों का एक सिलसिला जिनका उद्देश्य एफ्रो - अमेरिकन लोगों के विरुद्ध होने वाले नस्ली भेदभाव को मिटाना था ।
एफ्रो - अमेरिकी :-
🔹 यह शब्द उन अफ्रीकी लोगों के वंशजों के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें 17 वि शताब्दी से 19 वि शताब्दी की शुरुआत तक गुलाम बनाकर अफ्रीका से लाया गया था । एफ्रो अमेरिकन काले अमेरिकी या काले अफ्रीकियों के वंशज हैं ।
अश्वेत शक्ति आंदोलन ( 1966-1975 ) :-
🔹 यह आंदोलन काले अमेरिकी या एस्ट्रो अमेरिकन लोगों ने शुरू किया गया था यह अमेरिका के नस्लभेद को मिटाने के लिए शुरू हुआ था । इस आंदोलन में अश्वेत लोग नस्लवाद को अमेरिका से मिटाने में हिंसा के प्रयोग से भी नहीं हिचकिचा रहे थे ।
प्रवासी :-
🔹 जो कोई भी व्यक्ति काम के तलाश में या आर्थिक प्रयोजन हेतु किसी एक देश से दूसरे देश में आता है या जाता है उसे प्रवासी कहा जाता है ।
समरूप समाज :-
🔹 समरूप समाज का अर्थ है एक ऐसा समाज जहाँ पर सांप्रदायिकता , जाति वादिता या नस्ल भेद आदि की जडे ज्यादा गहरी ना हो ।
🔹 दो एफ्रो - अमेरीकी खिलाड़ी जो नस्लवाद की नीति के विरुद्ध 1968 मैक्सिको में होने वाले ओलंपिक मुकाबलों में अपना विरोध प्रकट कर रहे थे उनके नाम थे टॉमी स्मिथ और जान कार्लोस । ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पीटर नॉर्मल ने भी प्रॉमिस मिथ और जान कार्लोस के पक्ष में विरोध प्रदर्शन किया ।
समानताएँ , असमानताएँ और विभाजन :-
🔹 समाजिक भेदभाव की उत्पत्ति - जन्म के आधार पर - चमड़ी के आधार पर
सामाजिक विभाजन और राजनीति :-
🔹 आपने जीव विज्ञान की कक्षा में डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत के बारे में पढ़ा होगा । इस सिद्धांत के अनुसार जो सबसे फिट होता है वही जिंदा रह पाता है । मनुष्यों को अपना जीवन सही तरीके से जीने के लिए आर्थिक रूप से तरक्की करनी होती है । जब कोई व्यक्ति आर्थिक तरक्की कर लेता है तो उसे समाज में ऊँचा स्थान मिल जाता है । हर देश के इतिहास में यह देखने को मिलता है कि आर्थिक रूप से संपन्न समूह ने आर्थिक रूप से कमजोर समूह पर शासन किया है । इससे यह सुनिश्चित हो जाता था कि संसाधन और शक्ति के स्रोतों पर किसी खास समूह का एकाधिकार कायम हो सके ।
सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तीन बातों पर निर्भर करता है , जो निम्नलिखित हैं :-
🔹 लोग अपनी सामाजिक पहचान को किस रूप में लेते हैं इससे सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तय होता है । यदि किसी खास समूह के लोग अपने को विशिष्ट मानने लगते हैं तो फिर वे सामाजिक विविधता को गले नहीं उतार पाते हैं ।
🔹 किसी समुदाय की मांगों को राजनेता द्वारा किस तरह से पेश किया जाता है । यह इस पर भी निर्भर करता है कि किसी समुदाय की मांग पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया होती है । यदि सरकार किसी समुदाय की मांग को उचित तरीके से मान लेती है तो फिर उस समुदाय की राजनीति सबल हो जाती है ।
🔹 प्राचीन भारत में समाज को कार्य के आधार पर चार समूहों में बाँटा गया था । समय बीतने के साथ इन चार समूहों का स्थान जाति व्यवस्था ने ले लिया । जाति व्यवस्था में जन्म को ही किसी व्यक्ति के कर्म का आधार मान लिया जाता है । कुछ काम ऊँची जाति के लोग ही कर सकते हैं , जबकि कुछ काम केवल नीची जाति के लोगों के लिए तय होते हैं । आजादी के कुछ वर्षों पहले तक सभी आर्थिक संसाधन ऊँची जाति के लोगों के हाथों में थे । इन लोगों ने नीची जाति के लोगों को दबाकर रखा था ताकि नीची जाति के लोग सामाजिक व्यवस्था में ऊपर न उठ सकें ।
🔹 अंग्रेजी हुकूमत ने भारत में आधुनिक शिक्षा पद्धति की शुरुआत की थी । आजादी के बाद की सरकारों ने भी शिक्षा को बढ़ावा दिया । इससे पिछड़े वर्गों के लोग भी आधुनिक शिक्षा का लाभ उठाने लगे । मीडिया ने भी समाज में जागरूकता फैलाने का काम किया । धीरे - धीरे समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों में जागरूकता फैलने लगी । इसके दूरगामी परिणाम हुए हैं ।
🔹 आज लगभग हर क्षेत्र में नीची जाति के लोगों का प्रतिनिधित्व देखने को मिलता है । आज नीची जाति के लोग ऊँचे पदों पर आसीन दिखते हैं । आज सरकारी तंत्र में समाज के लगभग हर वर्ग का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है । इससे यह पता चलता है कि समाज के हर वर्ग को सत्ता में साझेदारी मिलने लगी है । भारत एक मजबूत लोकतंत्र बनने की दिशा में अग्रसर है ।
हासिये पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिये सरकार के प्रयास :-
🔹 आजादी के बाद संविधान में दो ऐसे अहम प्रावधान किये गये जो भारत को सही दिशा में ले जा सकें ।
👉 पहला प्रावधान था देश के हर वयस्क नागरिक को मताधिकार देना । उस जमाने में कई जानकारों ने इस बात की हँसी उड़ाई थी । उनका मानना था कि अशिक्षित लोगों में इतना विवेक नहीं हो सकता कि वे अपने मताधिकार का सही उपयोग कर पाएँ । लेकिन गांधीजी का मानना था कि यदि कोई आदमी इतना विवेकपूर्ण हो सकता है कि अपने परिवार का भरण - पोषण कर ले तो फिर उसमें सरकार चुनने लायक विवेक भी अवश्य ही होगा ।
👉 दूसरा प्रावधान था अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण देना ताकि उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके । आज एक दलित का बेटा भी आइआईएम और आइआइटी जैसी शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर पाता है और भारतीय प्राशासनिक सेवा में कार्य कर पाता है । यह सब आरक्षण के कारण ही संभव हो पाया है ।
🔹 इसका सही महत्व समझने के लिए हमें विश्व के अन्य देशों के उदाहरणों को देखना होगा । यूरोप के देशों में महिलाओं को मताधिकार मिलने में कई सौ साल लग गये थे । अमेरिका जैसे अति विकसित देश में भी आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई है । बारक ओबामा से पहले तक कोई भी अश्वेत अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं बन पाया था ।
🔹 हमारे देश में लाखों समस्याओं के बावजूद अल्पसंख्य समुदाय और दलित समुदाय के लोग ऊँचे पदों पर पहुँच चुके हैं । भारत में महिला प्रधानमंत्री और महिला राष्ट्रपति भी बन चुकी हैं । भारत के राष्ट्रपति के पद पर सिख , मुसलमान और दलित भी आसीन हो चुके हैं । सिख समुदाय से एक व्यक्ति तो प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं ।
✳️ 4. सामाजिक विभाजनों के राजनीतिक तय करने वाले तीन कारक :-
👉 1 . पहला फरक है लोगों में राज्य पहचान की भावना के प्रति विश्वास जिसके परिणाम स्वरूप लोग अपने सामाजिक विभाजन को पीछे रखते हुए राष्ट्रीय पहचान को पहले रखते हैं । ऐसे में कोई समस्या पैदा नहीं होती । जैसे बर्जन के लोग अपने आपको डच , फ्रेंच या जर्मन न मानते हुए अपने आपको बेलजियाइ मानते हैं भले ही वे डच , फ्रेंच या जर्मन भाषा में बोलते हैं ऐसे में कोई समस्या नहीं है ऐसा सोचने मे उन्हें साथ साथ रहने में मदद मिलेगी ।
👉 2 . सामाजिक विभाजन की राजनीति को प्रभावित करने वाला दूसरा कारक है राजनीतिक दलों के संविधान के दायरे में रहकर कार्य करना और दूसरे समुदाय को नुकसान पहुंचाने वाली किसी मांग को न उठाना । यदि श्रीलंका की भांति एक ही सामाजिक वर्ग अर्थात सिहलियों के हितों की बात ही की जाएगी और दूसरे सामाजिक वर्ग था तमिलों की अवहेलना की जाएगी तो सदा संघर्ष पूर्ण वातावरण बना रहेगा । ऐसे में राजनीतिक दलों का है कब से है कि वे सभी सामाजिक वर्गों के हितों का ध्यान रखें ।
👉 3 . तीसरे सामाजिक विभाजन की राजनीति को प्रभावित करने वाला अन्य महत्वपूर्ण कारक यह है कि सरकार विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रति कैसा रूप अपनाती हैं । यदि बेल्जियम की भांति सरकार के सत्ता भागीदारी पर विश्वास रखती है और प्रशासनिक तंत्र में सभी सामाजिक वर्गों को हिस्सेदार बनती है तो कोई समस्या पैदा नहीं होती । परन्तु यदि श्रीलंका या यूगोस्लाविया की भांति सरकारी यदि एक से सामाजिक वर्गों के अतिरिक्त अनेक वर्गों को शासन तंत्र से अलग रखती है तो संघर्ष , कलह , गृहयुद्ध और यहां तक कि देश का बटवारा भी हो सकता है ।
अध्याय - 4
जाति , धर्म और लैंगिक मसले
श्रम का लैंगिक विभाजन :- लिंग के आधार पर काम का बँटवारा। श्रम का लैंगिक विभाजन एक कटु सत्य है जो हमारे घरों और समाज में प्रत्यक्ष दिखाई देता है । घर के कामकाज महिलाओं द्वारा किये जाते हैं या महिलाओं की देखरेख में नौकरों द्वारा किये जाते हैं । पुरुषों द्वारा बाहर के काम काज किये जाते हैं । एक ओर जहाँ सार्वजनिक जीवन पर पुरुषों का वर्चस्व रहता है वहीं दूसरी ओर महिलाओं को घर की चारदीवारी में समेट कर रखा जाता है ।
नारीवादी आंदोलन :-
🔹 महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से होने वाले आंदोलन को नारीवादी आंदोलन कहते हैं ।
🔹 हाल के वर्षों में लैंगिक मसलों को लेकर राजनैतिक गतिविधियों के कारण सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की स्थिति काफी सुधर गई है । भारत का समाज एक पितृ प्रधान समाज है । इसके बावजूद आज महिलाएँ कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं । महिलाओं को अभी भी कई तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ता है ।
🔹 इसके कुछ उदाहरण नीचे दिये गये हैं :-
👉 पुरुषों में 76 % के मुकाबले महिलाओं में साक्षरता दर केवल 54 % है ।
👉 ऊँचे पदों पर महिलाओं की संख्या काफी कम है ।
👉 कई मामलों में ये भी देखा गया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम वेतन मिलता है । जबकि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ प्रतिदिन अधिक घंटे काम करती हैं ।
👉 आज भी अधिकाँश परिवारों में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को अधिक प्रश्रय दिया जाता है ।
👉 ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं जिसमें कन्या को भ्रूण अवस्था में ही मार दिया जाता है ।
👉 भारत का लिंग अनुपात महिलाओं के पक्ष में दूर दूर तक नहीं है । महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के कई मामले सामने आते हैं और ये घटनाएँ घर में और घर के बाहर भी होती हैं ।
नारीवादी आंदोलनों की आवश्यकता :-
🔹 नारीवादी आंदोलनों की आवश्यकता औरतों की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए , शिक्षा के लिए , मतदान के लिए महिलाओं की राजनीतिक स्थिति एवं सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए है। इन आंदोलनों में महिलाओं के राजनीतिक और वैधानिक दर्जे को ऊँचा उठाने और उनके लिए शिक्षा तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने की माँग की गई मूलगामी बदलाव की माँग करने वाली महिला आंदोलनों ने औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाई ।
समाज में महिलाओं की भूमिका :-
🔹 1 . यह प्रचलित विश्वास है या चलन है कि औरतों का काम केवल बच्चों की देखभाल करना और घर की देखभाल करना है ।
🔹 2 . उनके कार्य को ज्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता है ।
🔹 3 . आबादी में औरतो का हिस्सा आता है परंतु राजनीतिक जीवन या सामाजिक जीवन में उनकी भूमिका न के बराबर ही है ।
सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भूमिका का परिदृश्य बदल रहा है :-
🔹 1. आज सार्वजनिक जीवन के परिदृश्य में औरतों की भूमिकाएं काफी बदल गई हैं । वे एक वैज्ञानिक , डॉक्टर , शिक्षक आदि के रूप में सार्वजनिक जीवन में भूमिका निभाती दिखाई देती हैं ।
🔹 2. सार्वजनिक जीवन में औरतों की भागीदारी फिनलैंड , स्वीडन , नार्वे जैसे देशों में अधिक है ।
महिलाओं के साथ भेदभाव तथा अत्याचार होते हैं :-
🔹 महिलाओं में साक्षरता की दर 54 % है जबकि पुरुषों में 76 % |
🔹 इसी प्रकार अब भी स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर कदम कदम बढ़ा पाई है क्योंकि माँ बाप लड़कियों की जगह लड़कों की शिक्षा पर ज्यादा खर्च करना पसंद करते हैं ।
🔹 पहुंचे पदों तक बहुत ही कम महिलाएं पहुंच पाई है । उच्च भुगतान अनुपात में औरतों की संख्या बहुत ही कम है। अभी महिला सांसदों की लोकसभा में संख्या 100 % तक नहीं पहुंची और प्रांतीय विधानसभाओं में उनकी संख्या 50 % से भी कम है ।
🔹 महिलाओं को ज्यादातर काम पैसे के लिए नहीं मिलते , पुरुषों की अपेक्षा उनको मजदूरी भी कम मिलती है , भले ही दोनों ने समान कार्य किया हो ।
🔹 लड़की का जन्म परिवार पर एक बोझ समझा जाता है क्योंकि उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक परिवार को कुछ न कुछ देना ही पड़ता है । शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कियों से भेदभाव किया जाता है । जहां लड़कों को जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई काम सिखाया जाता है वही लड़कियों को रसोई तक ही सिमित रखा जाता है ।
पितृ प्रधान समाज :-
🔹 हमारा समाज पुरूष प्रधान समाज है । दिन प्रति महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है , इसके बावजूद महिलाएँ अभी पीछे हैं । इसलिए हमारे समाज को पितृ प्रधान समाज माना जाता है ।
निजी और सार्वजनिक विभाजन :-
🔹 श्रम के लैंगिक विभाजन अधिकतर महिलाएँ अपने घरेलू काम के अतिरिक्त अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ काम करती हैं लेकिन उनके काम को ज्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता और उन्हें दिन रात काम करके भी उसका श्रेय नहीं मिलता ।
🔹 मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का हिस्सा आधा है पर सार्वजनिक जीवन में खासकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य ही है ।
🔹 विभिन्न देश में महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान करने के लिए आंदोलन हुए । इन आंदोलनों को नारीवादी आंदोलन कहा जाता है ।
जीवन के विभिन्न पहलू जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है वे निम्नलिखित हैं :-
🔹1. समाज में महिलाओं का निम्न स्थान- भारतीय समाज में महिला को सदा पुरुष के दिन ही रखा गया है उससे कभी भी स्वतंत्र रूप से रहने का अवसर नहीं दिए गए हैं ।
🔹2. बालिकाओं के प्रति उपेक्षा - आज भी बालिकाओं की अनेक प्रकार से अवहेलना की जाती है लड़के के जन्म पर आज भी सभी बड़े खुश होते हैं और अन्य जेसन बनाते हैं परन्तु लड़की के जन्म पर परिवार में चुपचाप हो जाता है दूसरी लड़की का जन्म परिवार पर एक बोझ समझा जाता क्योंकि उसे जन्म से लेकर मिलते हैं तो परिवार को कुछ न कुछ देना ही पड़ता है तीसरे शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कियों से भेदभाव किया जाता है चौथे जबकि लड़कों का जीवन यापन के लिए कोई न कोई काम सिखाया जाता है लड़कियों को रसोई तक ही सीमित रखा जाता है ।
🔹 साक्षरता दर के आधार पर
🔹 ऊँची तनख्वाह वाले और ऊँचे पदों पर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या कम है ।
🔹 महिलाओं के घर के काम को मूल्यवान नहीं माना जाता ।
🔹 पुरूषों की तुलना में कम मजदूरी
🔹 लड़की को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देना ।
🔹 महिलाओं के उत्पीड़न , शोषण और उन पर होने वाली हिंसा ।
सांप्रदायिकता :-
🔹 अपने धर्म को ऊंचा समझना तथा दूसरे धर्मों को नीचा समझना और अपने धर्म से प्यार करना और दूसरे धर्मों से घृणा करने की प्रवृत्ति को सांप्रदायिकता कहते हैं।ऐसी भावना आप से जंगलों का मुख्य कारण बन जाती है और इस प्रकार प्रजातंत्र के मार्ग में एक बड़ी बाधा उपस्थित हो जाती है देश का बटवारा इसी भावना का परिणाम था । इस बुराई को निम्नलिखित विधियों से दूर किया जा सकता है :-
1. शिक्षा द्वारा - शिक्षा के पाठ्यक्रम में सभी धर्मों की अच्छा है बताया जाए और विद्यार्थियों को सहिष्णुता एवं सभी धर्मों के प्रति आदर भाव सिखाया जाए ।
2. प्रचार द्वारा- समाचार - पत्र रेडियो टेलीविजन आदि से जनता को धार्मिक सहिष्णुता की शिक्षा दी जाए ।
धर्म और सांप्रदायिकता और राजनीति :-
🔹 लैंगिक विभाजन के विपरीत धार्मिक विभाजन अक्सर राजनीति के मैदान में अभिव्यकत होता है ।
🔹 धार्मिक विभाजन को सम्प्रदायवाद कहते हैं । सम्प्रदायवाद के कारण देश में झगड़े होते हैं और शांति भंग होती है । ऐसे वातावरण में लोकतंत्र पनप नहीं सकता है ।
🔹 समुदायवाद के कारण देश के अंदर घृणा व मतभेद उत्पन्न होते हैं और देश की एकता समाप्त हो जाती हैं । इस प्रकार लोकतंत्र को खतरा पैदा हो जाता है ।
🔹 जब एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है और कोई एक धार्मिक समूह अपनी माँगों को दूसरे समूह के विरोध में खड़ा करने लगता है । इस प्रक्रिया में जब राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है तो स्थिति और विकट होने लगती है । राजनीति से धर्म और इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता या सम्प्रदायवाद है ।
🔹 लोकतंत्र की सफलता का आधार है जनता में सहनशीलता , साझेदारी , बंधुत्व , सभी के विचारों के प्रति सहिष्णुता आदि । परन्तु सम्प्रदायवाद के कारण इन सभी के मार्ग में बाधा उत्पन्न हो जाती है ।
सांप्रदायिकता के रूप :-
🔹 एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानना ।
🔹 अलग राजनीतिक इकाई बनाने की इच्छा ।
🔹 धर्म के पवित्र प्रतिकों , धर्मगुरूओं की भावनात्मक अपीलों का प्रयोग ।
🔹 संप्रदाय के आधार पर हिंसा , दंगा और नरसंहार .
धर्मनिरपेक्ष शासन :-
🔹 भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता ।
🔹 किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आजादी ।
🔹 धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित ।
🔹शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार ।
🔹संविधान में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है ।
जातिवाद :-
🔹 जाति प्रथा आज भी भारतीय समाज का अभिन्न अंग है । समय समय पर इसमें अनेक बदलाव आते गए और अनेक सुधार को नहीं से सुधारने का प्रयत्न किया। भारतीय संविधान ने किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव का निश्चित किया है और जाति व्यवस्था से पैदा होने वाले अन्याय को समाप्त करने पर जोर दिया है । परन्तु इतना सब कुछ होने पर भी समकालीन भारत से जाति प्रथा विदा नहीं हुई है जाति व्यवस्था के कुछ पुराने पहलू आज भी विद्यमान है। अभी भी अधिकतर लोग अपनी जाति या कबीले में नहीं विवाह करते हैं सदियों से जिन जातियों का पढ़ाई लिखाई के क्षेत्रों में प्रभुत्व स्थापित था वह आज भी है और आधुनिक शिक्षा में उन्हीं का बोल बाला है । जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा गया था उनके सदस्य अभी तक स्वाभाविक रूप से पिछड़े हुए हैं । जिन लोगों का आर्थिक क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित था वे आज भी थोड़े बहुत अंतर के बाद मौजूद है । जाति और आर्थिक हैसियत मे काफी निकट का संबंध माना जाता है । देश में सवैधानिक प्रावधान के बावजूद युवा छोटी प्रथा अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है ।
राजनीति में जाति :-
🔹 चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखना ।
🔹 समर्थन हासिल करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाना ।
🔹 देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है ।
🔹 कोई भी पार्टी किसी एक जाति या समुदाय के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती ।
जातिगत असामनता :-
🔹 जाति के आधार पर आर्थिक विषमता अभी भी देखने को मिलती है । ऊँची जाति के लोग सामन्यतया संपन्न होते है । पिछड़ी जाति के लोग बीच में आते हैं , और दलित तथा आदिवासी सबसे नीचे आते हैं । सबसे निम्न जातियों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है ।

अध्याय - 5
जन - संघर्ष और आन्दोलन
लोकतंत्र का अर्थ :-
🔹 लोकतंत्र का अर्थ है एक ऐसा शासन जो लोगों का शासन हो , लोगों के लिए हो और लोगों के द्वारा चुनी गई सरकार का शासन हो ।
नेपाल में उठे आंदोलन का उद्देश्य :-
🔹 नेपाल में 1990 के दशक में लोकतंत्र स्थापित हुआ।राजा को औपचारिक रूप से इस राज्य का प्रधान बना रहा परन्तु वास्तविक सत्ता का प्रयोग लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि करते थे नेपाल के राजा वीरेंद्र ने देश का संवैधानिक नेता बनना स्वीकार कर लिया था । परन्तु एक रहस्यमय कटने के बाद जब वहां के राजा वीरेंद्र की हत्या हो गई तो नेपाल में एक राजनीतिक संकट पैदा हो गया नया शासक राजा ज्ञानेन्द्र लोकतान्त्रिक शासन को स्वीकार करने को तैयार नहीं था इसलिए फरवरी 2005 एसपी को उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री को अपदस्थ करके जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को भंग कर दिया । अप्रैल 2006 में नेपाल में एक जन आंदोलन शुरू हो गया है क्योंकि वहां के लोग लोकतंत्र बारी चाहते थे और सत्ता की बागडोर राजा के हाथ से लेकर दोबारा जनता के हाथ में सौंपना चाहते थे।इस आंदोलन ने राजा को अपने उन आदेशों को वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया , जिन आदेशों के द्वारा राजा ने लोकतान्त्रिक सरकार को समाप्त कर दिया था ।
नेपाल में लोकतंत्रा की स्थापना :-
🔹 नेपाल में लोकतंत्रा 1990 के दशक में कायम हुआ ।
🔹 राजा वीरेन्द्र ने संवैधानिक राजतंत्र को स्वीकार लिया ।
🔹 राजा वीरेन्द्र की हत्या के बाद राजा ज्ञानेंद्र ने लोकतंत्र को स्वीकार नहीं किया ।
🔹 राजा वीरेंद्र ने जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को भंग कर दिया गया ।
🔹 2006 में जो आंदोलन चला उसका लक्ष्य शासन की भागडोर राजा के हाथ में से लेकर दोबारा जनता के हाथों में सौंपना था , यानि कि लोकतंत्र की पुनः स्थापना करना । संसद की बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर एक सेवेनपार्टी अलायंस बनाया और नेपाल की राजधानी काठमांडू में चार दिन के बंद का ऐलान किया ।
🔹 21 अप्रैल के दिन आंदोलनकारियों ने राजा को अल्टीमेटम दे दिया ।
🔹 24 अप्रैल 2006 अल्टीमेटम का अंतिम दिन था । इस दिन राजा तीनों माँगों को मानने के लिए बाध्य हुआ ।
🔹 एस.पी.ए. ने गिरिजा प्रसाद कोइराला को अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री चुना गया । राजा की समस्त शक्तियाँ वापस ले ली गई । इस संघर्ष को नेपाल का लोकतंत्र के लिए दूसरा संघर्ष कहा गया है ।
बोलीविया में आंदोलन :-
🔹 बोलीविया लातिनी अमेरिका का एक गरीब देश है । सन 2000 में वहां एक जन संघर्ष शुरू हुआ जो जन साधारण में ' जल युद्ध ' के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
🔹 वहां की सरकार ने 1999 कोचबामबा नामक नगर में जलापूर्ति का अधिकारिक बहुराष्ट्रीय कंपनी को बेच दिया । इस कंपनी ने शीघ्र ही पानी की कीमत में चार गुना इजाफा कर दिया । इससे सब ओर त्राही त्राही मच गई ।
🔹 फिर क्या था लोगों ने शीघ्र ही सन 2000 में एक जन संघर्ष छेड़ दिया । देखते ही देखते अनेक श्रमिक संगठनों , सामुदायिक नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने एक गठबंधन की स्थापना की ।
🔹 पहले शहर भर में चार दिन की हड़ताल की गई परन्तु जब कुछ हाथ न लगा तो हड़तालों का ताता लग गया।फरवरी 2000 और फिर अप्रैल 2000 में हड़तालें हुई । जैसे जैसे सरकार बर्बरता पर उतर आई वैसे वैसे ही है संघर्ष और तीव्र होता चला गया । लोगों ने बहुराष्ट्रीय कंपनी के कर्मचारियों का ऐसा घेराव किया और उन्हें ऐसा डराया कि वे शहर छोड़कर भाग गए । विवश होकर सरकार को दोबारा जलापूर्ति का काम नगर पालिका को सौंपना पड़ा । पानी का यह संघर्ष बोलीविया के जल युद्ध के नाम से जाना जाता है ।
लामबंदी और संगठन :-
राजनैतिक पार्टियाँ :- जो संगठन राजनैतिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से भागीदारी करते हैं उन्हें राजनैतिक पार्टी कहते हैं । राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव लड़ती हैं ताकि सरकार बना सकें ।
दबाव समूह :- जो संगठन राजनैतिक प्रक्रिया में परोक्ष रूप से भागीदारी करते हैं उन्हें दबाव समूह कहते हैं । सरकार बनाना या सरकार चलाना कभी भी दबाव समूह का लक्ष्य नहीं होता है ।
दबाव समूह और आंदोलन :-
🔹 दबाव समूह का निर्माण तब होता है जब समान पेशे , रुचि , महात्वाकांछा या मतों वाले लोग किसी समान लक्ष्य की प्राप्ति के लिये एक मंच पर आते हैं । इस प्रकार के समूह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये आंदोलन करते हैं । यह जरूरी नहीं कि हर दबाव समूह जन आंदोलन ही करे । कई दबाव समूह केवल अपने छोटे से समूह में ही काम करते हैं ।
🔹 जन आंदोलन के कुछ उदाहरण हैं
:- नर्मदा बचाओ आंदोलन , सूचना के अधिकार के लिये आंदोलन , शराबबंदी के लिये आंदोलन , नारी आंदोलन , पर्यावरण आंदोलन ।
वर्ग विशेष के हित समूह और जन सामान्य के हित समूह
वर्ग विशेष के हित समूह :-
🔹 जो दबाव समूह किसी खास वर्ग या समूह के हितों के लिये काम करते हैं उन्हें वर्ग विशेष के समूह कहते हैं ।
🔹 उदाहरण : ट्रेड यूनियन , बिजनेस एसोसियेशन , प्रोफेशनल ( वकील , डॉक्टर , शिक्षक , आदि ) के एसोसियेशन । ऐसे समूह किसी खास वर्ग की बात करते हैं ; जैसे मजदूर , शिक्षक , कामगार , व्यवसायी , उद्योगपति , किसी धर्म के अनुयायी , आदि । ऐसे समूहों का मुख्य उद्देश्य होता है अपने सदस्यों के हितों को बढ़ावा देना और उनके हितों की रक्षा करना ।
जन सामान्य के हित समूह :-
🔹 जो दबाव समूह सर्व सामान्य जन के हितों की रक्षा करते हैं उन्हें जन सामान्य के हित समूह कहते हैं । ऐसे दबाव समूह का उद्देश्य होता है पूरे समाज के हितों की रक्षा करना ।
🔹 उदाहरण : ट्रेड यूनियन , स्टूडेंट यूनियन , एक्स आर्मीमेन एसोसियेशन , आदि ।
राजनीति पर दबाव समूह और आंदोलन का प्रभाव :-
जन समर्थन :- दबाव समूह और उनके आंदोलन अपने लक्ष्य और क्रियाकलापों के लिये जनता का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं । इसके लिये वे तरह तरह के रास्ते अपनाते हैं , जैसे कि जागरूकता अभियान , जनसभा , पेटीशन , आदि । कई दबाव समूह जनता का ध्यान खींचने के लिए मीडिया को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं ।
प्रदर्शन :- प्रदर्शन करना किसी भी दबाव समूह का एक आम तरीका है । प्रदर्शन के दौरान हड़ताल भी किये जाते हैं ताकि सरकार के काम में बाधा उत्पन्न की जा सके । हड़ताल और बंद के द्वारा सरकार पर दबाव बनाया जाता है ताकि सरकार किसी मांग की सुनवाई करे ।
लॉबी करना :- कुछ दबाव समूह सरकारी तंत्र में लॉबी भी करते हैं । इसके लिये अक्सर प्रोफेशनल लॉबिस्ट की सेवा ली जाती है । कई बार इश्तहार भी चलाये जाते हैं । इन समूहों में से कुछ लोग आधिकारिक निकायों और कमेटियों में भी भाग लेते हैं ताकि सरकार को सलाह दे सकें । इस तरह के समूह के उदाहरण हैं : एसोचैम और नैसकॉम ।
राजनैतिक पार्टियों पर प्रभाव :-
🔹 दबाव समूह और आंदोलन राजनैतिक पार्टियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं । किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर उनका एक खास राजनैतिक मत और सिद्धांत होता है । हो सकता है कि कोई दबाव समूह किसी राजनैतिक पार्टी से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भी जुड़ा हुआ हो ।
🔹 भारत के अधिकांश ट्रेड यूनियन और स्टूडेंट यूनियन किसी न किसी मुख्य पार्टी से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं । इस तरह के समूहों के कार्यकर्ता सामान्यतया किसी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता भी होते हैं ।
🔹 कई बार किसी जन आंदोलन से राजनैतिक पार्टी का भी जन्म होता है । इसके कई उदाहरण हैं ; जैसे असम गण परिषद , डीएमके , एआईडीएमके , आम आदमी पार्टी , आदि ।
👉 असम गण परिषद का जन्म असम में बाहरी लोगों के खिलाफ चलने वाले छात्र आंदोलन के कारण 1980 के दशक में हुआ था । डीएमके और एआईडीएमके का जन्म तामिलनाडु में 1930 और 1940 के दशक में चलने वाले समाज सुधार आंदोलन के कारण हुआ था । आम आदमी पार्टी का जन्म सूचना के अधिकार और लोकपाल की मांग के आंदोलन के कारण हुआ था ।
🔹 अधिकांश मामलों में दबाव समूह और किसी राजनैतिक पार्टी के बीच का रिश्ता उतना प्रत्यक्ष नहीं होता है । अक्सर यह देखा जाता है कि दोनों एक दूसरे के विरोध में ही खड़े होते हैं । राजनैतिक पार्टियाँ भी दबाव समूहों द्वारा उठाये जाने वाले अधिकांश मुद्दों को आगे बढ़ाने का काम करती हैं । कई बड़े राजनेता किसी दबाव समूह से ही निकलकर आये हैं ।
दबाव समूह के प्रभाव का मूल्यांकन :-
🔹 कई लोग दबाव समूहों के खिलाफ तर्क देते हैं । कई विचारक ऐसा मानते हैं कि दबाव समूह को सुनने में सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि ऐसे समूह समाज के एक छोटे से वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
🔹 ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र किसी छोटे वर्ग के संकीर्ण हितों के लिये काम नहीं करता बल्कि पूरे समाज के हितों के लिये काम करता है । राजनैतिक पार्टी को तो जनता को जवाब देना होता है लेकिन दबाव समूह पर यह बात लागू नहीं होती है ।
🔹 इसलिए कुछ विचारकों का मानना है कि दबाव समूह की सोच का दायरा बड़ा नहीं हो सकता है । कई बार कोई बिजनेस लॉबी या अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी भी कुछ दबाव समूहों को हवा देती रहती हैं । इसलिए दबाव समूह की बात को नाप तौलकर ही सुनना चाहिए । कई लोग दबाव समूह का समर्थन करते हैं ।
🔹 कुछ विचारकों का मानना है कि लोकतंत्र की जड़ें जमाने के लिये सरकार पार दबाव डालना उचित होता है । ऐसा माना जाता है कि राजनैतिक पार्टियाँ सत्ता हथियाने के चक्कर में अक्सर जनता के असली मुद्दों की अवहेलना करती हैं । उनको नींद से जगाने का काम दबाव समूह का ही होता है । ऐसा कहा जा सकता है कि दबाव समूह विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं में संतुलन का काम करते हैं और सामान्यतया लोगों की असली समस्याओं को उजागर करते हैं ।
अध्याय - 6
राजनीतिक दल
राजनीतिक पार्टी :-
🔹 एक ऐसा समूह जिसका निर्माण चुनाव लड़ने और सरकार बनाने के उद्देश्य से हुआ हो , राजनीतिक पार्टी या दल कहलाता है । किसी भी राजनीतिक पार्टी में शामिल लोग कुछ नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमत होते हैं जिसका लक्ष्य समाज का भलाई करना होता है ।
🔹 एक राजनीतिक पार्टी लोगों को इस बात का भरोसा दिलाती है उसकी नीतियाँ अन्य पार्टियों से बेहतर हैं । वह चुनाव जीतने की कोशिश करती है ताकि अपनी नीतियों को लागू कर सके ।
🔹 विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ हमारे समाज के मूलभूत राजनैतिक विभाजन का प्रतिबिंब होते हैं । कोई भी राजनीतिक पार्टी समाज के किसी खास पार्ट का प्रतिनिधित्व करती इसलिए इसमें पार्टिजनशिप की बात होती है । किसी भी पार्टी की पहचान इससे बनती है कि वह समाज के किस पार्ट की बात करती है , किन नीतियों का समर्थन करती है और किनके हितों की वकालत करती है ।
एक राजनैतिक पार्टी के तीन अवयव होते हैं :-
👉 नेता
👉 सक्रिय सदस्य
👉 अनुयायी
राजनीतिक पार्टी के कार्य :-
🔹 राजनैतिक पदों को भरना और सत्ता का इस्तेमाल करना ही किसी पार्टी का मुख्य कार्य होता है । इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये राजनीतिक पार्टियाँ निम्नलिखित कार्य करती हैं :-
चुनाव लड़ना :- राजनीतिक पार्टी चुनाव लड़ती है । एक पार्टी अलग अलग निर्वाचन क्षेत्रों के लिये अपने उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारती है ।
नीति बनाना :- हर राजनीतिक पार्टी जनहित को लक्ष्य में रखते हुए अपनी नीति बनाती है । वह अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को जनता के सामने प्रस्तुत करती है । इससे जनता को इस बात में मदद मिलती है कि वह किसी एक पार्टी का चुनाव कर सके । एक राजनीतिक पार्टी एक ही मानसिकता वाले लाखों करोड़ों मतदाताओं को एक ही छत के नीचे लाने का काम करती है । जब किसी पार्टी को जनता सरकार बनाने के लिये चुनती है तो वह उस पार्टी से अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को मूर्त रूप देने की अपेक्षा रखती है ।
कानून बनाना :- हम जानते हैं कि विधायिका में समुचित बहस के बाद ही कोई कानून बनता है । विधायिका के ज्यादातर सदस्य राजनीतिक पार्टियों के सदस्य होते हैं इसलिए किसी भी कानून के बनने की प्रक्रिया में राजनीतिक पार्टियों की प्रत्यक्ष भूमिका होती है ।
सरकार बनाना :- जब कोई राजनीतिक पार्टी सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव जीतती है तो वह सरकार बनाती है । सत्ताधारी पार्टी के लोग ही कार्यपालिका का गठन करते हैं । सरकार चलाने के लिये विभिन्न राजनेताओं को अलग अलग मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी जाती है ।
विपक्ष की भूमिका :- जो पार्टी सरकार नहीं बना पाती है उसे विपक्ष की भूमिका निभानी पड़ती है ।
जनमत का निर्माण :- राजनीतिक पार्टी का एक महत्वपूर्ण काम होता है जनमत का निर्माण करना । इसके लिये वे विधायिका और मीडिया में ज्वलंत मुद्दों को उठाती हैं और उन्हें हवा देती हैं । पार्टी के कार्यकर्ता पूरे देश में फैलकर अपने मुद्दों से जनता को अवगत कराते हैं ।
सरकारी मशीनरी तक लोगों की पहुँच बनाना :- राजनीतिक पार्टी लोगों और सरकारी मशीनरी के बीच एक कड़ी का काम करती है । वे जनकल्याण योजनाओं को लोगों तक पहुँचाती हैं ।
राजनीतिक पार्टी की जरूरत :- लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टी एक अभिन्न अंग होती है । यदि कोई पार्टी न हो तो हर उम्मीदवार एक स्वतंत्र उम्मीदवार होगा । भारत में लोकसभा में कुल 543 सदस्य हैं । यदि हर सदस्य स्वतंत्र रूप से चुनाव जीत कर आयेगा तो स्थिति बड़ी भयावह हो जायेगी । कोई भी दो सदस्य किसी एक मुद्दे पर एक ही तरह से सोचने में असमर्थ होगा । एक सांसद हमेशा अपने चुनावी क्षेत्र के बारे में सोचेगा और राष्ट्र हित को दरकिनार कर देगा । राजनीतिक पार्टी विभिन्न सोच के राजनेताओं को एक मंच पर लाने का काम करती ताकि वे सभी मिलकर किसी भी बड़े मुद्दे पर एक जैसी सोच बना सकें ।
🔹 आज पूरे विश्व में प्रतिनिधित्व पर आधारित लोकतंत्र को अपनाया गया है । ऐसे लोकतंत्र में नागरिकों द्वारा चुने गये प्रतिनिधि सरकार चलाते हैं । यथार्थ में यह संभव नहीं है कि हर नागरिक प्रत्यक्ष रूप से सरकार चलाने में योगदान दे पाये । इसी सिस्टम ने राजनीतिक पार्टियों को जन्म दिया है ।
कितने राजनीतिक दल :- कुछ देशों में एक ही पार्टी होती है , जबकि कुछ देशों में दो पार्टियाँ होती हैं तो कुछ देशों में अनेक पार्टियाँ होती हैं । किसी भी देश में प्रचलित पार्टी सिस्टम के कई ऐतिहासिक और सामाजिक कारण होते हैं । हर तरह के सिस्टम के अपने गुण और दोष होते हैं ।
🔹 चीन में एकल पार्टी सिस्टम है । लेकिन लोकतंत्र के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है क्योंकि एकल पार्टी सिस्टम में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता है ।
🔹 संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में दो पार्टी सिस्टम है । ऐसे सिस्टम में लोगों के पास विकल्प होता है ।
🔹 भारत में मल्टी पार्टी सिस्टम है और यहाँ कई राजनीतिक पार्टियाँ हैं । भारत के समाज में भारी विविधता है । इसलिए यहाँ मल्टी पार्टी सिस्टम विकसित हुई है । मल्टी पार्टी सिस्टम में कई खामियाँ लगती हैं । कई बार इससे राजनैतिक अस्थिरता का माहौल बन जाता है और साल दो साल में ही सरकार बदल जाती है । लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में अलग अलग हितों और मतधारणाओं का सही प्रतिनिधित्व मल्टी पार्टी सिस्टम से ही संभव हो पाता है ।
🔹 आजादी के बाद के शुरुआती दिनों से लेकर 1977 भारत में केंद्र में केवल कांग्रेस पार्टी की सरकार बनती थी । 1977 से 1980 के बीच जनता पार्टी की सरकार बनी । उसके बाद 1980 से 1989 तक कांग्रेस की सरकार बनी । फिर दो साल के अंतराल के बाद फिर से 1991 से 1996 तक कांग्रेस की सरकार रही । फिर अगले 8 वर्षों तक गठबंधन की सरकारों का दौर चला । 2004 से लेकर 2014 तक कांग्रेस पार्टी की ऐसी सरकार रही जिसमें अन्य पार्टियों का गठबंधन था । 2014 में 18 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और वह अपने दम पर सरकार बना पाई ।
राजनैतिक दलों में जन - भागीदारी :- लोगों में एक आम धारणा बैठ गई है कि लोग राजनीतिक पार्टियों के प्रति उदासीन हो गये हैं । लोग राजनीतिक पार्टियों पर भरोसा नहीं करते हैं ।
🔹 जो सबूत उपलब्ध हैं वो ये बताते हैं कि यह धारणा भारत के लिये कुछ हद तक सही है । पिछले कई दशकों में किये गये सर्वे से प्राप्त सबूतों के आधार पर निम्न बातें सामने आती हैं :
🔹 पूरे दक्षिण एशिया में लोगों का विश्वास राजनीतिक पार्टियों पर से उठ गया है । सर्वे में पूछा गया कि वे राजनीतिक पार्टियों पर ' एकदम भरोसा नहीं या ' बहुत भरोसा नहीं ' या ' कुछ भरोसा ' या ' पूरा भरोसा करते हैं । ऐसे लोगों की संख्या अधिक थी जिन्होंने कहा कि वे एकदम भरोसा नहीं ' या ' बहुत भरोसा नहीं करते हैं । जिन्होंने यह कहा कि वे ' कुछ भरोसा ' या ' पूरा भरोसा ' करते हैं उनकी संख्या कम थी ।
🔹 पूरी दुनिया में लोग राजनीतिक दलों पर कम ही भरोसा करते हैं और उन्हें संदेह की दृष्टि से देखते हैं ।
🔹 लेकिन जब बात लोगों द्वारा राजनीतिक दलों के क्रियाकलापों में भाग लेने की आती है तो स्थिति अलग हो जाती है । कई विकसित देशों की तुलना में भारत में ऐसे लोगों का अनुपात अधिक है जिन्होंने माना कि वे किसी राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं ।
🔹 पिछले तीन दशकों में ऐसे लोगों का प्रतिशत बढ़ा है जिन्होंने यह माना कि वे किसी राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं । इस अवधि में ऐसे लोगों का अनुपात भी बढ़ा है जिन्हें ऐसा लगता है कि वे किसी राजनीतिक पार्टी के करीब हैं ।
राष्ट्रीय पार्टी :-
🔹 भारत में निष्पक्षष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए एक स्वतंत्र संस्था जिसका नाम चुनाव आयोग है । हर राजनीतिक पार्टी को चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन करवाना होता है । चुनाव आयोग की नजर में हर पार्टी समान होती है । लेकिन बड़ी और स्थापित पार्टियों को कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं । इन पार्टियों को अलग चुनाव चिह्न दिया जाता है , जिसका इस्तेमाल उस पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार ही कर सकता है । जिन पार्टियों को यह विशेषाधिकार मिलता है उन्हें मान्यताप्राप्त पार्टी कहते हैं ।
राज्य स्तर की पार्टी :- जिस पार्टी को विधान सभा के चुनाव में कुल वोट के कम से कम 6 % वोट मिलते हैं और जो कम से कम दो सीटों पर चुनाव जीतती है उसे राज्य स्तर की पार्टी कहते हैं ।
राष्ट्रीय स्तर की पार्टी :- जिस पार्टी को लोक सभा चुनावों में या चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कम से कम 6 % वोट मिलते हैं और जो लोकसभा में कम से कम चार सीट जीतती है उसे राष्ट्रीय स्तर की पार्टी की मान्यता मिलती है ।
👉 इस वर्गीकरण के अनुसार 2006 में देश में छ : राष्ट्रीय पार्टियाँ थीं । इनका वर्णन नीचे दिया गया है ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस :- इसे कांग्रेस पार्टी के नाम से भी जाना जाता है । यह एक बहुत पुरानी पार्टी है जिसकी स्थापना 1885 में हुई थी । भारत की आजादी में इस पार्टी की मुख्य भूमिका रही है । भारत की आजादी के बाद के कई दशकों तक कांग्रेस पार्टी ने भारतीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई है । आजादी के बाद के सत्तर वर्षों में पचास से अधिक वर्षों तक इसी पार्टी की सरकार रही है ।
भारतीय जनता पार्टी :- इस पार्टी की स्थापना 1980 में हुई थी । इस पार्टी को भारतीय जन संघ के पुनर्जन्म के रूप में माना जा सकता है । इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य है एक शक्तिशाली और आधुनिक भारत का निर्माण । भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व पर आधारित राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहती है । यह पार्टी जम्मू कश्मीर का भारत में पूर्ण रूप से विलयं चाहती है । यह धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना चाहती है और एक यूनिफॉर्म सिविल कोड लाना चाहती है । 1990 के दशक में इस पार्टी का जनाधार तेजी से बढ़ा । यह पार्टी पहली बार 1998 में सत्ता में आई और 2004 तक शासन किया । उसके बाद यह पार्टी 2014 में सत्ता में आई है ।
बहुजन समाज पार्टी :- इस पार्टी की स्थापना कांसी राम के नेतृत्व में 1984 में हुई थी । यह पार्टी बहुजन समाज के लिये सत्ता चाहती है । बहुजन समाज में दलित , आदिवासी , ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग आते हैं । इस पार्टी की पकडू उत्तर प्रदेश में बहुत अच्छी है और यह उत्तर प्रदेश में दो बार सरकार भी बना चुकी है ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी - मार्क्सवादी :- इस पार्टी की स्थापना 1964 में हुई थी । इस पार्टी की मुख्य विचारधारा मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों पर आधारित है । यह पार्टी समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करती है । इस पार्टी को पश्चिम बंगाल , केरल और त्रिपुरा में अच्छा समर्थन प्राप्त है ; खासकर से गरीबों , मिल मजदूरों , किसानों , कृषक श्रमिकों और बुद्धिजीवियों के बीच । लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस पार्टी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई है और पश्चिम बंगाल की सत्ता इसके हाथ से निकल गई है ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :- इस पार्टी की स्थापना 1925 में हुई थी । इसकी नीतियाँ सीपीआई ( एम ) से मिलती जुलती हैं । 1964 में पार्टी के विभाजन के बाद यह कमजोर हो गई । इस पार्टी को केरल , पश्चिम बंगाल , पंजाब , आंध्र प्रदेश और तामिलनाडु में ठीक ठाक समर्थन प्राप्त है । लेकिन इसका जनाधार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से खिसका है । 2004 के लोक सभा चुनाव में इस पार्टी को 1.4 % वोट मिले और 10 सीटें मिली थीं । शुरु में इस पार्टी ने यूपीए सरकार का बाहर से समर्थन किया था लेकिन 2008 के आखिर में इसने समर्थन वापस ले लिया ।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी :- कांग्रेस पार्टी में फूट के परिणामस्वरूप 1999 में इस पार्टी का जन्म हुआ था । यह पार्टी लोकतंत्र , गांधीवाद , धर्मनिरपेक्षता , समानता , सामाजिक न्याय और संघीय ढाँचे की वकालत करती है । यह महाराष्ट्र में काफी शक्तिशाली है और इसको मेघालय , मणिपुर और असम में भी समर्थन प्राप्त है ।
क्षेत्रीय पार्टियों का उदय :- पिछले तीन दशकों में कई क्षेत्रीय पार्टियों का महत्व बढ़ा है । यह भारत में लोकतंत्र के फैलाव और उसकी गहरी होती जड़ों को दर्शाता है । कुछ क्षेत्रीय नेता अपने अपने राज्यों में काफी शक्तिशाली हैं । समाजवादी पार्टी , बीजू जनता दल , एआईडीएमके , डीएमके , आदि क्षेत्रीय पार्टी के उदाहरण हैं ।
राजनीतिक दलों के लिये चुनौतियाँ :-
🔹 आम जनता इस बात से नाराज रहती हैं कि राजनीतक दल अपना काम ठीक ढंग से नहीं करते । जनता हमेशा राजनीतिक दलों की आलोचना करती हैं । राजनीतिक दलों को अपना काम प्रभावी ढंग से चलाने के लिए कड़ी चुनौतियों का सामना करना पडता है । ये चुनौतियां हैं :-
👉 1. पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का न होना : - लोकतन्त्र का अर्थ कि कोई भी फेसला लेने से पहले कार्यकर्ताओ से परामर्श किया जाये परन्तु वास्तव मे ऐसा कुछ नहीं होता । ऊपर के कुछ नेता हि सभी फेसले ले लेते हैं।इस से कार्यकर्ताओं में नाराजगी बनी रहती है जो दोनो पार्टी और जनता के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकती है ।
👉 2. पार्टी के बीच आंतरिक चुनाव भी नहीं होते ।
👉 3. पार्टी के नाम पर सारे फैसले लेने का अधिकार उस पार्टी के नेता हथिया लेते है ।
वंशवाद की चुनौती :-अधिकाश राजनीतिक दल पारदर्शी ढंग से अपना काम नहीं करते इस लिए उनके नेता इस बात का अनुचित लाभ लेते हुए अपने नजदीकी लोगों और यहाँ तक कि अपने ही परिवार के लोगों को आगे बढ़ाते है ।
पैसा और अपराधी तत्वों की बढ़ती घुसपैठ :- राजनितिक दलो के सामने आने वाली तिसरी चुनौती , विशेषकर चुनाव के दिनों मे , और अपराधिक ततवो कि बढती घुसपैठ कि है । चुनाव जितने कि होड मे राजनितिक दल पैसे का अनुचित प्रयोग करके अपने दल का बहुमत सिद्ध करने का प्रयत्न करती हैं । राजनितिक दल उसी उम्मीदवार को टिकट देते हैं जिसके पास पैसा होता है , क्योंकि चुनाव में बहुत पैसा खर्च होता है । राजनितिक दल यह नहीं देखते कि वो व्यक्ति अपराधी तो नहीं है ।
पार्टियों के बीच विकल्पहीनता की स्थिति :- आज के युग मे भारत मे हि नहीं वरन् विश्व - भर मे राजनितिक दलों के पास विकल्प कि कमी है । उनके पास नई - नई चिीजे पेश करनेखे लिए कुछ नहीं होता है ।
👉 राजनितिक दलों में सुधार लाने के लिये विभिन्न दलों की नीतियों और कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण अंतर लाना ही सार्थक विकल्प है ।
🔹 1. आजकल दलों के बीच वैचारिक अंतर कम होता है ।
🔹 2. हमारे देश में भी सभी बड़ी पार्टियों के बीच आर्थिक मामलों पर बड़ा कम अंतर रह गया है ।
🔹 3. जो लोग इससे अलग नीतियाँ चाहते है उनके लिए कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है ।
🔹 4. अच्छे नेताओं की कमी ।
राजनीतिक दलों को सुधारने के उपाय :-
🔹 हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों और नेताओं में सुधार लाने के लिये कुछ उपाय नीचे दिये गये हैं :-
दलबदल कानून :- इस कानून को राजीव गांधी की सरकार के समय पास किया गया था । इस कानून के मुताबिक यदि कोई विधायक या सांसद पार्टी बदलता है तो उसकी विधानसभा या संसद की सदस्यता समाप्त हो जायेगी । इस कानून से दलबदल को कम करने में काफी मदद मिली है । लेकिन इस कानून ने पार्टी में विरोध का स्वर उठाना मुश्किल कर दिया है । अब सांसद या विधायक को हर वह बात माननी पड़ती है जो पार्टी के नेता का निर्णय होता है ।
नामांकण के समय संपत्ति और क्रिमिनल केस का ब्यौरा देना :- अब चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार के लिये यह अनिवार्य हो गया है कि वह नामांकण के समय एक शपथ पत्र दे जिसमें उसकी संपत्ति और उसपर चलने वाले क्रिमिनल केस का ब्यौरा हो । इससे जनता के पास अब उम्मीदवार के बारे में अधिक जानकारी होती है । लेकिन उम्मीदवार द्वारा दी गई सूचना की सत्यता जाँचने के लिये अभी कोई भी सिस्टम नहीं बना है ।
अनिवार्य संगठन चुनाव और टैक्स रिटर्न :- चुनाव आयोग ने अब पार्टियों के लिये संगठन चुनाव और टैक्स रिटर्न को अनिवार्य कर दिया है । राजनीतिक पार्टियों ने इसे शुरु कर दिया है लेकिन अभी यह महज औपचारिकता के तौर पर होता है ।
अध्याय - 7
लोकतंत्र के परिणाम
🔹 आज विश्व के 100 से अधिक देश किसी ना किसी तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने का दावा करते हैं । इनका औपचारिक संविधान है । इनके यहां चुनाव होते हैं और राजनीतिक दल भी हैं । साथ ही वे अपने नागरिकों को कुछ बुनियादी अधिकारों की गारंटी भी देते है ।
🔹 लोकतंत्र में इस बात की पक्की व्यवस्था होती है कि फैसले कुछ कायदे कानूनों के अनुसार हों ।
पारदर्शिता :-
🔹 कोई नागरिक यह जानना चाहे कि फैसले लेने में नियमों का पालन हुआ है या नहीं तो वह इसका पता लगा सकता है । उसे न सिर्फ यह जानने का अधिकार है बल्कि उसके पास इसके साधन भी उपलब्ध हैं , इसे पारदर्शिता कहते हैं ।
लोकतंत्र शासन सबसे बेहतर है क्योंकि :-
🔹 लोकतंत्र नागरिकों में समानता के भाव को बढ़ावा देता है । 🔹 लोकतंत्र व्यक्ति की गरिमा को बढ़ावा देता है ।
🔹 लोकतंत्र बेहतर फैसले लेने कि ताकत देता है ।
🔹 लोकतंत्र टकरावों को टालने का तरीका प्रदान करता है ।
🔹 लोकतंत्र मे गलतियों को सुधारने की गुंजाईश होती है ।
🔹 लोकतंत्र ही बुनियादी संविधान होता है , जिसमें सरकार के निर्माण और चुनाव की क्रिया का वर्णन होता है ।
🔹 लोकतंत्र में नागरिकों को अधिकारों की सुरक्षा कि गारंटी होती है ।
🔹 लोकतंत्र में सभी सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान किया जाता है ।
लोकतान्त्रिक शासन उत्तरदायी , ज़िम्मेदार और वैध शासन होता है :-
उत्तरदायी सरकार :- यह लोकतन्त्र ही है जो एक उत्तरदायी सरकार को संभव बनाता है । ऐसी सरकार कायदे - कानूनो को मानती है और लोगों के लिये जवाबदेह होती है ।क्योंकि यह लोगों की सरकार है , लोगों के द्वारा बनाई गई है तथा लोगों के लिए है । लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि लोगों के प्रति उत्तरदायी है , अगर लोग उनके कामों से खुश नहीं है , तो लोग अगले आम चुनाव मे अपने नेता बदल सकते हैं । हर काम का उत्तर देना जनप्रतिनिधियों के लिए जरूरी है ।
जिम्मेदार सरकार :- लोकतांत्रिक सरकार अधिक पारदर्शी होती है । जनता के पास यह जानने का अधिकार होता है कि फैसले किन तरीकों से लिये गये या सरकार ने कोई कार्य कैसे किया । इसलिए एक लोकतांत्रिक सरकार जनता के लिये उत्तरदायी होती है और जनता का ध्यान रखती है ।
वैध सरकार :- यह वैध शासन व्यवस्था है । यह सुस्त हो सकती है , कम कार्यकुशल हो सकती है , उसमें भ्रष्टाचार हो सकता है , लेकिन यह लोगों की जरूरतों को अनदेखा नहीं कर सकती । इसी कारण पूरी दुनिया में लोकतान्त्रिक सरकार के विचार के प्रति जबरदस्त समर्थन का भाव है । लोग अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का शासन चाहते हैं ।
आर्थिक संवृद्धि और विकास :-
🔹 यदि आर्थिक समृद्धि की बात की जाये तो इसमें तानाशाही शासन लोकतंत्र के मामले में आगे दिखता है । 1950 से 2000 तक के पचास वर्षों के आँकड़ों का अध्ययन करने से पता चलता है कि तानाशाही शासन व्यवस्था में आर्थिक समृद्धि बेहतर हुई है । लेकिन कई लोकतांत्रिक देश हैं जो दुनिया की आर्थिक शक्तियों में गिने जाते हैं । इसलिये यह कहा जा सकता है कि सरकार का प्रारूप किसी देश की आर्थिक समृद्धि को निर्धारित करने वाला अकेला कारक नहीं है ।
🔹 इसके अन्य कारक भी होते हैं , जैसे : जनसंख्या , वैश्विक स्थिति , अन्य देशों से सहयोग , आर्थिक प्राथमिकताएँ , आदि । इसलिए हमें आर्थिक संवृद्धि के साथ अन्य सकारात्मक पहलुओं को भी देखना पड़ेगा । इस दृष्टिकोण से लोकतंत्र हमेशा तानाशाही से बेहतर होता है
असमानता और गरीबी में कमी :-
🔹 आर्थिक असमानता पूरी दुनिया में बढ़ रही है । भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा गरीब है । गरीबों और अमीरों की आय के बीच एक बहुत बड़ी खाई है । लोकतंत्र अधिकांश देशों में आर्थिक असमानता मिटाने में असफल ही रहा है ।
सामाजिक विविधताओं में सामंजस्य :-
🔹 हर देश सामाजिक विविधताओं से भरा हुआ है । इसलिए विभिन्न वर्गों के बीच टकराव होना स्वाभाविक है । लोकतंत्र ऐसे तरीकों का विकास करने में मदद करता है जिनसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो सके । लोकतंत्र में लोग विविधता का सम्मान करना और मतभेदों के समाधान निकालना सीख जाते हैं । अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में सामाजिक विविधता में तालमेल बना रहता है । इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं , जैसे : श्रीलंका ।
नागरिकों की गरिमा और आजादी :-
🔹 लोकतंत्र ने नागरिकों को गरिमा और आजादी प्रदान की है । भारत में कई सामाजिक वर्ग हैं जिन्होंने वर्षों तक उत्पीड़न झेला है । लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के फलस्वरूप इन वर्गों के लोग भी आज सामाजिक व्यवस्था में ऊपर उठ पाये हैं और अपने हक को प्राप्त किया है ।
महिलाओं की समानता :-
🔹 लोकतंत्र के कारण ही यह संभव हो पाया है कि महिलाएँ समान अधिकारों के लिये संघर्ष कर पाईं । आज अधिकांश लोकतांत्रिक देशों की महिलाओं को समाज में बराबर का दर्जा मिला हुआ है । तानशाह देशों में आज भी महिलाओं को समान अधिकार नहीं प्राप्त हैं ।
जातिगत असमानता :-
🔹 जातिगत असामनता भारत में जड़ जमाये बैठी है । लेकिन लोकतंत्र के कारण इसकी संख्या काफी कम है । आज पिछड़ी जाति और अनुसूचित जाति के लोग भी हर पेशे में शामिल होने लगे हैं ।
अध्याय - 8
लोकतंत्र की चुनौतियाँ
चुनौती का मतलब :-
🔹 वैसी समस्या जो महत्वपूर्ण हो , जिसे पार पाया जा सके और जिसमें आगे बढ़ने के अवसर छुपे हुए हों , चुनौती कहलाती है । जब हम किसी चुनौती को जीत लेते हैं तो हम आगे बढ़ पाते हैं ।
चुनौतियाँ :- दुनिया के एक चैथाई हिस्से में अभी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था नहीं है । इन इलाकों में लोकतंत्र के लिए बहुत ही मुश्किल चुनौतियाँ है । इन देशों में लोकतांत्रिक सरकार गठित करने के लिए जरूरी बुनियादी आधार बनाने की चुनौती है ।
लोकतंत्र की मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :-
👉 आधार तैयार करने की चुनौती
👉 विस्तार की चुनौती
👉 लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करना
आधार तैयार करने की चुनौती :-
🔹 अभी भी दुनिया के 25 % हिस्से में लोकतंत्र नहीं है । ऐसे हिस्सों में लोकतंत्र की चुनौती है वहाँ आधार बनाने की । ऐसे देशों में अलोकतांत्रिक सरकारें हैं । वहाँ से तानाशाही को हटाना होगा और सरकार पर से सेना के नियंत्रण को दूर करना होगा । उसके बाद एक स्वायत्त राष्ट्र की स्थापना करनी होगी जहाँ लोकतांत्रिक सरकार हो ।
🔹 इसे समझने के लिये नेपाल का उदाहरण लिया जा सकता है । नेपाल में अभी हाल तक राजतंत्र का शासन हुआ करता था । लोगों के वर्षों के आंदोलन के फलस्वरूप नेपाल में लोकतंत्र ने राजतंत्र को विस्थापित कर दिया । अभी नेपाल के लिये लोकतंत्र नया है इसलिए वहाँ लोकतंत्र का आधार बनाने की चुनौती है ।
विस्तार की चुनौती :-
🔹 जिन देशों में लोकतंत्र वर्षों से मौजूद है वहाँ लोकतंत्र के विस्तार की चुनौती है । लोकतंत्र के विस्तार का मतलब होता है कि देश के हर क्षेत्र में लोकतांत्रिक सरकार के मूलभूत सिद्धांतो को लागू करना तथा लोकतंत्र के प्रभाव को समाज के हर वर्ग और देश की हर संस्था तक पहुँचाना ।
🔹 लोकतंत्र के विस्तार की चुनौती के कई उदाहरण हो सकते हैं , जैसे कि स्थानीय स्वशाषी निकायों को अधिक शक्ति प्रदान करना , संघ के हर इकाई को संघवाद के प्रभाव में लाना , महिलाओं और अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से जोड़ना , आदि ।
🔹 लोकतंत्र के विस्तार का एक और मतलब यह है कि ऐसे फैसलों कि संख्या कम से कम हो जिन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से परे हटकर लेना पड़े । आज भी हमारे देश में समाज में कई ऐसे वर्ग हैं जो मुख्यधारा से पूरी तरह से जुड़ नहीं पाये हैं । आज भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो भारत राष्ट्र की मुख्यधारा से कटे हुए हैं । ये सभी चुनौतियाँ लोकतंत्र के विस्तार की चुनौती के उदाहरण हैं ।
लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करना :-
🔹 हर लोकतंत्र को इस चुनौती का सामना करना पड़ता है । लोकतंत्र की प्रक्रियाओं और संस्थानों को मजबूत करने से लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं । लोकतंत्र की प्रक्रियाओं और संस्थानों को मजबूत करने से लोगों को लोकतंत्र से अपनी अपेक्षाओं के बारे में सही जानकारी मिल सकती है । जन साधारण की लोकतंत्र से अपेक्षाएँ अलग - अलग समाज में अलग - अलग तरह की होती हैं ।
🔹 अस्सी के दशक तक भारत में होने वाले चुनावों में बूथ लूटने और फर्जी मतदान की घटना आम बात हुआ करती थी । नब्बे के दशक की शुरुआत में टी एन शेषण मुख्य चुनाव आयुक्त बने । उन्होंने कई ऐसे क्रांतिकारी कदम उठाए जिनसे राजनितिक दलों में अनुशासन आया और बूथ लूटने की घटनाएँ नगण्य हो गईं । इससे चुनाव आयोग को काफी मजबूती मिली और इसपर लोगों का विश्वास बढ़ गया ।
🔹 अलग - अलग देश लोकतंत्र की अलग - अलग चुनौतियों का सामना करते हैं । किसी भी देश के समक्ष आने वाली एक खास चुनौती इस बात पर निर्भर करती है कि वह देश लोकतांत्रिक विकास के किस चरण पर है । किसी खास चुनौती से निबटने के तरीके भी अलग - अलग परिस्थितियों में भिन्न हो सकते हैं ।
लोकतंत्र में राजनीतिक सुधार :-
अर्थ :- लोकतंत्र की विभिन्न चुनौतियों के बारे में दिए गये सभी सुझाव या प्रस्ताव लोकतांत्रिक सुधार या राजनीतिक सुधार कहे जाते हैं ।
🔹कानून बनाकर राजनीति को सुधारना ।
🔹 सावधानी से बनाए गए कानून गलत राजनीतिक आचरणों को हतोत्साहित और अच्छे कामकाज को प्रोत्साहित करेंगे ।
🔹 कानूनी बदलाव करते समय इस बात पर भी विचार करना होगा कि राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा । कई बार प्रभाव एकदम उलटे निकलते हैं , जैसे कई राज्यों ने दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों के पंचायत चुनाव लडने पर रोक लगा दी है ।इसके कारण गरीब लोग और महिलाएँ चुनाव लडने के लोकतांत्रिक अवसर से वंचित हुए हैं ।
🔹 सबसे बढ़िया कानून है वह कानून है जो लोगों के लोकतांत्रिक , अधिकारो मे सुधार करने की ताकत देते हैं ।
🔹 सूचना का अधिकार कानून लोगों को जानकार बनाने और लोगों को लोकतंत्र के रखवाले के तौर पर सक्रिय करने का अच्छा उदाहरण है ।
🔹 लोकतांत्रिक सुधार राजनीतिक दल ही करते है । इसलिए राजनीतिक सुधारों का जोर मुख्यत : लोकतांत्रिक कामकाज को ज्यादा मजबूत बनाने पर होना चाहिए ।
🔹 राजनीतिक सुधार के किसी भी प्रस्ताव में यह सोच भी होनी चाहिए कि इन्हें कौन लागू करेगा और क्यों लागू करेगा । .
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