अध्याय - 1
विकास
अर्थव्यवस्था :-
🔹 एक ढाँचा जिसके अन्तर्गत लोगों की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है ।
आर्थिक विकास :- एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक अर्थव्यवस्था की वास्तविक ' प्रति व्यक्ति आय ' दीर्घ अवधि में बढ़ती है ।
विकास :-
🔹 विकास के लक्ष्य विभिन्न लोगों के लिये विभिन्न हो सकते हैं। हो सकता है कि कोई बात किसी एक व्यक्ति के लिये विकास हो लेकिन दूसरे के लिये नहीं। उदाहरण के लिये किसी नये हाइवे का निर्माण कई लोगों के लिये विकास हो सकता है। लेकिन जिस किसान की जमीन उस हाइवे निर्माण के लिये छिन गई हो उसके लिये तो वह विकास कतई नहीं हो सकता।
🔹 विभिन्न लोगों के लिये विकास की विभिन्न आवश्यकताएँ हो सकती हैं। किसी भी व्यक्ति की जिंदगी की परिस्थिति इस बात को तय करती है उसके लिये किस प्रकार के विकास की आवश्यकता है। इसे समझने के लिये दो लोगों का उदाहरण लेते हैं।
👉 एक व्यक्ति ऐसे गाँव में रहता है जहाँ से किसी भी जगह के लिये बस पकड़ने के लिये पाँच किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। यदि उसके गाँव तक पक्की सड़क बन जाये और उसके गाँव तक छोटी गाड़ियाँ भी चलने लगें तो यह उसके लिये विकास होगा।
👉 एक अन्य व्यक्ति दिल्ली राजधानी क्षेत्र की बाहरी सीमा पर रहता है। उसे अपने दफ्तर जाने के लिये पहले तो पैदल एक किलोमीटर चलकर ऑटोरिक्शा स्टैंड तक जाना होता है। उसके बाद ऑटोरिक्शा पर कम से कम एक घंटे की सवारी के बाद वह मेट्रो स्टेशन पहुँचता है। उसके बाद मेट्रो में एक घंटा सफर करने के बाद वह अपने ऑफिस पहुँच पाता है। यदि मेट्रो रेल की लाइन उसके घर के आस पास पहुँच जाये तो यह उस व्यक्ति के लिये विकास होगा।
🔹 ऊपर दिये गये उदाहरण ये बताते हैं कि विकास के अनेक लक्ष्य हो सकते हैं। लेकिन नीति निर्धारकों और सरकार को विकास के ऐसे लक्ष्य बनाने होते हैं जिससे अधिक से अधिक लोगों को फायदा पहुँच सके।
आय और अन्य लक्ष्य : -
🔹 ज्यादा आय , बराबरी का व्यवहार , स्वतंत्रता , काम की सुरक्षा , सम्मान व आदर , परिवार के लिए सुविधाएँ , वातावरण आदि , राष्ट्रीय विकास की धारणाएँ निम्नलिखित हैं :-
👉 विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट 2006 के अनुसार , " 2004 में प्रतिव्यक्ति आय जिन देशो में 453000 रूपये प्रति वर्ष या उससे अधिक है वह समृद्ध या विकसित राष्ट्र कहलाते है ।जिनकी आय 37000 रूपये प्रति वर्ष या उससे कम है वह विकासशील / निम्न आय वाले देश कहलाते हैं ।
👉 यू . एन . डी . पी . द्वारा प्रकाशित मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार , “ राष्ट्रीय विकास का अनुमान लोगों के शैक्षिक स्तर , उनकी स्वास्थय स्थिति तथा प्रति व्यक्ति आय के आधार पर होता है ।
विकास के लक्ष्य :-
प्रति व्यक्ति आय :-
🔹 जब देश की कुल आय को उस देश की जनसंख्या से भाग दिया जाता है तो जो राशि मिलती है उसे हम प्रति व्यक्ति आय कहते हैं। वर्ष 2006 की विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आय 28,000 रुपये है।
सकल राष्ट्रीय उत्पाद :-
🔹 किसी देश में उत्पादित कुल आय को सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं। सकल राष्ट्रीय उत्पाद में हर प्रकार की आर्थिक क्रिया से होने वाली आय की गणना की जाती है।
सकल घरेलू उत्पाद :-
🔹 किसी देश में उत्पादित कुल आय में से निर्यात से होने वाली आय को घटाने के बाद जो बचता है उसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।
शिशु मृत्यु दर :-
🔹 हर
1000 जन्म में एक साल की उम्र से पहले मरने वाले बच्चों की संख्या को शिशु मृत्यु दर कहते हैं। यह आँकड़ा जितना कम होगा वह विकास के दृष्टिकोण से उतना ही बेहतर माना जायेगा। शिशु मृत्यु दर एक महत्वपूर्ण पैमाना है। इससे किसी भी क्षेत्र में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता का पता चलता है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में शिशु मृत्यु दर 30.15 है। इससे यह पता चलता है कि भारत में आज भी स्वास्थ्य सेवाएँ अच्छी नहीं हैं।
पुरुष और महिला का अनुपात :-
🔹 प्रति हजार पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या को लिंग अनुपात कहते हैं। यदि यह आँकड़ा कम होता है तो इससे यह पता चलता है कि उस देश या राज्य में महिलाओं के खिलाफ कितना खराब माहौल है। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति हजार पुरुषों की तुलना में केवल 940 महिलाएँ हैं।
जन्म के समय संभावित आयु :-
🔹 एक औसत वयस्क अधिकतम जितनी उम्र तक जीता है उसे संभावित आयु कहते हैं। सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में पुरुषों की संभावित आयु 67 साल है और महिलाओं की संभावित आयु 72 साल है। इससे देश में व्याप्त जीवन स्तर का पता चलता है। यदि किसी देश में मूलभूत सुविधाएँ बेहतर होंगी, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ होंगी और लोगों की आय अच्छी होती तो वहाँ संभावित आयु भी अधिक होगी। दूसरे शब्दों में वहाँ एक औसत वयस्क लंबी जिंदगी जिएगा।
साक्षरता दर :- 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में साक्षर जनसंख्या का अनुपात को साक्षरता दर कहते हैं । निवल उपस्थिति [ अनुपात :
6-10 वर्ष की आयु के स्कूल जाने वाले कुछ बच्चों का उस आयु वर्ग के कुल बच्चों के साथ प्रतिशत उपस्थिति अनुपात कहलाता है ।
राष्ट्रीय आय :-
🔹 देश के अंदर उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य तथा विदेशों से प्राप्त आय के जोड को राष्ट्रीय आय कहते है ।
बी . एम . आई :-
🔹 शरीर का द्रव्यमान सूचकांक पोषण वैज्ञानिक , किसी व्यस्क के अल्पपोषित होने की जाँच कर सकते हैं । यदि यह 18.5 से कम है तो व्यक्ति कुपोषित है अगर 25 से ऊपर है तो वह मोटापे से ग्रस्त हैं ।
आधारभूत संरचना :-
🔹 आधारभूत संरचना किसी देश की अर्थव्यवस्था के लिये रीढ़ की हड्डी का काम करती है। सड़कें, रेल, विमान पत्तन, पत्तन और विद्युत उत्पादन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की जान होते हैं। अच्छी आधारभूत संरचना से आर्थिक गतिविधियाँ बेहतर हो जाती हैं जिससे हर तरफ समृद्धि आती है।
मानव विकास सूचकांक :-
🔹 आय व अन्य कारकों की समाकेतिक सूची इसके आधार पर किसी देश को उसकी गुणवत्ता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है । यह विभिन्न देशों में विकास के स्तर का मूल्यांकन करने का मापदंड है । इसमें देशों की तुलना लोगों के शैक्षिक स्तर , स्वास्थ्य स्थिति और प्रति व्यक्ति आय के आधार पर होती है ।
विकास के जरूरी लक्ष्यों का मिश्रण :-
ऊपर दी गई लिस्ट को परिपूर्ण नहीं माना जा सकता है। लेकिन इस लिस्ट में दिये गये लक्ष्य अन्य लक्ष्यों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन लक्ष्यों के द्वारा कई अन्य लक्ष्यों की प्राप्ति होती है।
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राज्य
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प्रति व्यक्ति आय (2003)
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शिशु मृत्यु दर (2003)
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साक्षरता दर (2001)
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कक्षा 1 से 4 तक निवल उपस्थिति अनुपात (1995 – 96)
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पंजाब
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26000
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49
|
70
|
81
|
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केरल
|
22800
|
11
|
91
|
91
|
|
बिहार
|
5700
|
60
|
47
|
41
|
🔹 इस टेबल में दिये गये आँकड़े विकास के कुछ रोचक पहलुओं को दिखाते हैं। ये आँकड़े विकास के अलग अलग पहलुओं के बीच के रिश्ते को दिखाते हैं।
🔹 प्रति व्यक्ति आय के मामले में पंजाब सबसे ऊपर है और बिहार सबसे नीचे।
🔹 शिशु मृत्यु दर के मामले में केरल की तुलना में पंजाब की स्थिति खराब है। इससे यह पता चलता है कि केरल में स्वास्थ्य सुविधाएँ पंजाब से बेहतर हैं।
🔹 केरल और पंजाब में अधिकांश बच्चे स्कूल भी जाते हैं। लेकिन बिहार के स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बहुत खराब है।
🔹 इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इन तीन राज्यों में केरल सबसे विकसित राज्य है और बिहार सबसे पिछड़ा राज्य।
अध्याय - 2
भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक
आर्थिक गतिविधि :-
🔹 ऐसे क्रियाकलाप जिनको करके जीवनयापन के लिए आय की प्राप्ति की जाती है ।
✳️ किसी भी अर्थव्यवस्था को तीन क्षेत्रक या सेक्टर में बाँटा जाता है
:-
👉 प्राथमिक या प्राइमरी सेक्टर
👉 द्वितीयक या सेकंडरी सेक्टर
👉 तृतीयक या टरशियरी सेक्टर
प्राइमरी सेक्टर :-
🔹 इस सेक्टर में होने वाली आर्थिक क्रियाओं में मुख्य रूप से प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से उत्पादन किया जाता है। उदाहरण: कृषि और कृषि से संबंधित क्रियाकलाप, खनन, आदि।
सेकंडरी सेक्टर :-
🔹 इस सेक्टर में प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली के द्वारा अन्य रूपों में बदला जाता है। उदाहरण: लोहा इस्पात उद्योग, ऑटोमोबाइल, आदि।
टरशियरी सेक्टर :-
🔹 इस सेक्टर में होने वाली आर्थिक क्रियाओं के द्वारा अमूर्त वस्तुएँ प्रदान की जाती हैं। उदाहरण: यातायात, वित्तीय सेवाएँ, प्रबंधन सलाह, सूचना प्रौद्योगिकी, आदि।
सार्वजनिक क्षेत्र :-
🔹 जिसमें अधिकांश परिसम्पतियों पर सरकार का स्वामित्व होता है और सरकार ही सभी सेवाएँ उपलब्ध करवाती है ।
निजी क्षेत्र :-
🔹 वह क्षेत्र जिसमें परिसम्पत्तियों का स्वामित्व और सेवाओं का वितरण एक व्यक्ति या कम्पनी के हाथों में होती है ।
सकल घरेलू उत्पाद :-
🔹 किसी विशेष वर्ष में प्रत्येक क्षेत्रक द्वारा उत्पादित अंतिम वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य उस वर्ष में देश के कुल उत्पादन की जानकारी प्रदान करता है ।
उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्व :-
🔹 भारत में पिछले चालीस वर्षों में सबसे अधिक वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई है ।
🔹 इस तीव्र वृद्धि के कई कारण हैं जैसे - सेवाओं का समुचित प्रबंधन , परिवहन , भंडारण की अच्छी सुविधाएँ , व्यापार का अधिक विकास , शिक्षा की उपलब्धता आदि ।
🔹 किसी भी देश में अनेक सेवाओं जैसे अस्पताल परिवहन बैंक , डाक तार आदि की आवश्यकता होती है । कृषि एवं उद्योग के विकास में परिवहन व्यापर भण्डारण जैसी सेवाओं का विकास होता है ।
🔹 आय बढ़ने से कई सेवाओं जैसे रेस्तरा , पर्यटन , शापिंग निजी अस्पताल तथा विद्यालय आदि की मांग शुरू कर देते है । सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित कुछ नवीन सेवाएँ महत्वपूर्ण एवं अपरिहार्य हो गई है ।
अल्प बेरोजगारी :-
🔹 जब किसी काम में जितने लोगो की जरूरत हो उससे ज्यादा लोग काम में लगे हो और वह अपनी उत्पादन क्षमता कम योग्यता से काम कर रहे है । प्रच्छन्न तथा छुपी बेरोजगारी भी कहते है ।
🔹 कृषि क्षेत्र में अल्प बेरोजगारी की समस्या अधिक है अर्थात् यदि हम कुछ लोगों को कृषि क्षेत्र से हटा भी देते हैं तो उत्पादन में विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
शिक्षित बेरोज़गारी :-
🔹 जब शिक्षित , प्रशिक्षित व्यक्तियों को उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिलता ।
कुशल श्रमिक :-
🔹 जिसने किसी कार्य के लिए उचित प्रशिक्षण प्राप्त किया है ।
अकुशल श्रमिक :-
🔹 जिन्होंने कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है ।
संगठित क्षेत्रक :-
🔹 इसमें वे उद्यम या कार्य आते हैं , जहाँ रोजगार की अवधि निश्चित होती है । ये सरकार द्वारा पंजीकृत होते हैं तथा निर्धारित नियमों व विनियमों का अनुपालन करते हैं ।
असंगठित क्षेत्रक :-
🔹 छोटी - छोटी और बिखरी हुई ईकाइयाँ , जो अधिकाशंतः सरकारी नियंत्रण से बाहर रहती हैं , से निर्मित होता है । यहाँ प्रायः सरकारी नियमों का पालन नहीं किया जाता ।
दोहरी गणना की समस्या :- ये समस्या तब उत्पन्न होती है जब राष्ट्रीय आय की गणना के लिए सभी उत्पादों के उत्पादन मूल्य को जोड़ा जाता है । क्योंकि इसमें कच्चे माल का मूल्य भी जुड़ जाता है । अतः समाधान के लिए केवल अंतिम उत्पाद के मूल्य की गणना की जानी चाहिए ।
असंगठित क्षेत्रक :-
🔹 भूमिहीन किसान , कृषि श्रमिक , छोटे व सीमान्त किसान , काश्तकार , बँटाईदार , शिल्पी आदि । शहरी क्षेत्रों में औद्योगिक श्रमिक , निमार्ण श्रमिक , व्यापार व परिवहन में कार्यरत , कबाड़ व बोझा ढोने वाले लोगों को संरक्षण की आवश्यकता होती है ।
ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 :-
🔹 केन्द्रीय सरकार ने भारत के 200 जिलों में काम का अधिकार लागू करने का एक कानून बनाया है ।
काम का अधिकार :-
🔹 सक्षम व जरूरतमंद बेरोज़गार ग्रामीण लोगों को प्रत्येक वर्ष 100 दिन के रोजगार की गारन्टी सरकार के द्वारा । असफल रहने पर बेरोज़गारी भत्ता दिया जाएगा ।
अर्थव्यवस्था का प्राथमिक क्षेत्रक से द्वितीयक क्षेत्रक की तरफ का क्रमिक विकास :-
🔹 प्राचीन सभ्यताओं में सभी आर्थिक क्रियाएँ प्राइमरी सेक्टर में होती थीं। समय बदलने के साथ ऐसा समय आया जब भोजन का उत्पादन सरप्लस होने लगा। ऐसे में अन्य उत्पादों की आवश्यकता बढ़ने से सेकंडरी सेक्टर का विकास हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में होने वाली औद्योगिक क्रांति के बाद सेकंडरी सेक्टर का तेजी से विकास हुआ।
🔹 सेकंडरी सेक्टर के विकसित होने के बाद ऐसी गतिविधियों की जरूरत होने लगी जो औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सके। उदाहरण के लिये ट्रांसपोर्ट सेक्टर से औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है। औद्योगिक उत्पादों को ग्राहकों तक पहुँचाने के लिये हर मुहल्ले में दुकानों की जरूरत पड़ती है। लोगों को अन्य कई सेवाओं की आवश्यकता होती है, जैसे कि एकाउंटेंट, ट्यूटर, मैरेज प्लानर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, आदि की सेवाएँ। ये सभी टरशियरी सेक्टर में आते हैं।
अध्याय - 3
मुद्रा व साख
वस्तु विनिमय प्रणाली :-
🔹 वस्तुओं के बदले वस्तुओं का लेन - देन वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है ।
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग :-
🔹 जब एक व्यक्ति किसी चीज को बेचने की इच्छा रखता हो , वही वस्तु दूसरा व्यक्ति भी खरीदने की इच्छा रखता हो अर्थात् मुद्रा का उपयोग किये बिना , तो उसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहा जाता है ।
👉 मुद्रा के अविष्कार से वस्तु विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कठिनाई आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का समाधान हुआ ।
मुद्रा :-
🔹 मुद्रा एक माध्यम है जिसके जरिये हम किसी भी चीज को विनिमय द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में मुद्रा के बदले में हम जो चाहें खरीद सकते हैं। मुद्रा के तौर पर सबसे पहले सिक्कों का प्रचलन शुरु हुआ। शुरु में सिक्के सोने-चांदी जैसी महँगी धातु से बनाये जाते थे। जब महंगी धातु की कमी होने लगी तो साधारण धातुओं से सिक्के बनाये जाने लगे। बाद में सिक्कों के स्थान पर कागज के नोटों का इस्तेमाल होने लगा। आज भी कम मूल्य वाले सिक्के इस्तेमाल किये जाते हैं।
🔹 सिक्कों और नोटों को सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसी द्वारा जारी किया जाता है। भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा इन नोटों को जारी किया जाता है। भारत के करेंसी नोट पर आपको एक वाक्य लिखा हुआ मिलेगा जो उस करेंसी नोट के धारक को उस नोट पर लिखी राशि देने का वादा करता है।
रिर्जव बैंक के कार्य :-
🔹 मुद्रा जारी करना ।
🔹 बैंक व स्वयं सहायता सूमहों की कार्यप्रणाली पर नजर रखना ।
🔹 ब्याज की दरों को निर्धारित करना ।
🔹 मौद्रिक नीति की समीक्षा करना ।
🔹 बैंको की कुछ राशि का नकद संचयन करना ।
मुद्रा के आधुनिक रूप :-
🔹 कागज के नोट
🔹 सिक्के
🔹 मोबाईल एवं नेट बैंकिग
🔹 चेक
🔹 यू.पी. आई
🔹 क्रेडिट कार्ड
🔹 डेबिट कार्ड
मुद्रा का प्रयोगः- मुद्रा का प्रयोग एक प्रकार की चीजें खरीदने और बेचने में किया जाता है ।
🔹 मुद्रा का प्रयोग विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्राप्त करने में भी किया जा सकता है जैसे वकील से परामर्श लेने में या डॉक्टर की सलाह लेने में अदि ।
🔹 मुद्रा की सहायता से कोई भी अपनी चीजें बेच भी सकता है और हमसे एक दूसरी चीजें खरीद भी सकता है ।
🔹 इसी प्रकार में मुद्रा से सेवाओं का भी लेनदेन कर सकता है मुद्रा में भुगतान करने में बड़ी आसानी रहती है ।
🔹 लोग बैंकों में अतिरिक्त नकद अपने नाम से खाता खोलकर जमा कर देते है । खातों में जमा धन की मांग जरिए निकाला जा सकता है जिसे मांग जमा कहाँ जाता है ।
🔹 चेक एक ऐसा कागज है जो बैंक को किसी के खाते से चेक पर लिखे नाम के किसी दूसरे व्यक्ति को एक खास रकम का भुगतान करने का आदेश देता है ।
मुद्रा के लाभ :-
🔹 यह आवश्यकताओं के दोहरे संयोग से छुटकारा दिलाती है।
🔹 यह कम जगह लेती है और इसे कहीं भी लाना ले जाना आसान होता है।
🔹 मुद्रा को आसानी से कहीं भी और कभी भी विनिमय के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है।
🔹 आधुनिक युग में कई ऐसे माध्यम उपलब्ध हैं जिनकी वजह से अब करेंसी नोट को भौतिक रूप में ढ़ोने की जरूरत नहीं है।
साख :-
🔹 साख एक ऐसा समझौता है जिसके तहत ऋणदाता उधारकर्ता को धनराशि , वस्तु एवं सेवाएँ इस आश्वासन पर उधार देता है कि वह भविष्य में उसका भुगतान कर देगा ।
साख संपत्ति के रूप में :-
🔹 त्यौहारों के दौरान जूता निर्माता सलीम , को एक महीने के अंदर भारी मात्रा में जूता बनाने का आदेश मिलता है । इस उत्पादन को पूरा करने के लिए वह अतिरिक्त मजदूरों को काम पर ले आता है और उसे कच्चा माल खरीदना पड़ता है । वह आपूर्तिकता को तत्काल चमड़ा उपलब्ध कराने के लिए कहता है और उसके बाद में भुगतान करने का आश्वासन देता है । उसके बाद वह व्यापारी से कुछ उधार लेता है । महीने के अंत तक वह ओदश पूरा कर पाता है , अच्छा लाभ कमाता है और उसने जो भी उधार लिया होता है , उसका भुगतान कर देता है ।
साख ऋणजाल के रूप में :-
🔹 एक किसान स्वप्ना कृषि के खर्च को वहन करने के लिए साहुकार से उधार लेती है । लेकिन दुर्भाग्य से फसल कीडों या किसी अन्य वजह से बर्बाद हो जाती है । ऐसे में वह ऋण का भुगतान नहीं कर पाती है और ऋण ब्याज के साथ बढ़ता जाता है ।
समर्थक ऋणाधार :-
🔹 उधारदाता , उधार प्राप्तकर्ता से समर्थक ऋणाधार के रूप में ऐसी परिसम्पतियों की माँग करता है जिन्हें बेचकर वह अपनी ऋण राशि की वसूली कर सके । ये परिसम्पत्तियों की माँग करता है जिन्हें बेचकर वह अपनी ऋण राशि की वसूली कर सके । ये परिसम्पत्तियाँ ही समर्थक ऋणाधार कहलाती हैं ।
🔹 उदाहरणः कृषि भूमि , जेवर , मकान पशुधन व बैंक जमा ।
बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ :-
🔹 भारत में बैंक जमा का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखते है ।
🔹 इसे किसी एक दिन में जमाकर्ताओं द्वारा धन निकालने की संभावना को देखते हुए यह प्रावधान किया जाता है ।
🔹 बैंक जमा राशि के एक बड़े भाग को ऋण देने के लिए इस्तेमाल करते है ।
🔹 ब्याज के बीच का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है ।
ऋण की शर्ते :-
👉 ब्याज की दर
👉 समर्थक ऋणाधार
👉 आवश्यक कागजात
👉 भुगतान के तरीके
🔹 विभिन्न ऋण व्यवस्थाओं में ऋण की शर्ते अलग - अलग है ।
भारत में औपचारिक क्षेत्रक में साख :-
🔹 बैंक और सहकारी समितियों से लिए कर्ज औपचारिक क्षेत्रक ऋण कहलाते है ।
अनौपचारिक क्षेत्रक में साख :-
🔹 साहूकार , व्यापारी , मालिक , रिश्तेदार , दोस्त इत्यादि ऋण उपलब्ध कराते है ।
🔹 ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है ।
🔹 ऋणदाता ऐच्छिक दरों पर ऋण देते है ।
🔹 नाजायज तरीकों से अपना ऋण वापिस लेते है ।
सेल्फ हेल्प ग्रुप :-
🔹 सेल्फ हेल्प ग्रुप का प्रचलन अभी नया नया है। इस प्रकार के ग्रुप में लोगों का एक छोटा समूह होता है; जैसे 15 से 20 सदस्य। सभी सदस्य अपने जमा किये हुए पैसे को इकट्ठा करते हैं। उस जमा रकम में से किसी भी सदस्य को छोटी राशि का कर्ज दिया जाता है। फिर वह सेल्फ हेल्प ग्रुप उस राशि पर ब्याज लेता है। इस तरह के कर्ज के सिस्टम को माइक्रोफिनांस कहते हैं।
🔹 सबसे पहले बंगलादेश के ग्रामीण बैंक ने माइक्रोफिनांस की परिपाटी शुरु की। ग्रामीण बैंक के संस्थापक मुहम्मद यूनुस ने इस दिशा में काफी काम किया है और गरीबों की मदद की है। उनके प्रयासों के लिये उन्हें 2006 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
🔹 सेल्फ हेल्प ग्रुप ने ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक कर्ज दाताओं के प्रकोप को काफी हद तक कम किया है। आज भारत में कई बड़ी कंपनियाँ सेल्फ हेल्प ग्रुप को प्रश्रय दे रही हैं।
अध्याय - 4
वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था
वैश्वीकरण :-
🔹 वैश्वीकरण अपने देश की अर्थव्यवस्था का संसार के अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के साथ सामंजस्य स्थापित करना ।
उदारीकरण :-
🔹 उदारीकरण सरकार द्वारा अवरोधों और प्रतिबंधो को हटाने की प्रक्रिया को उदारीकरण कहा जाता है ।
निजीकरण :-
🔹 सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को चरणबद्ध तरीके से निजी क्षेत्र में बेचना ।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ :-
🔹 वह कंपनी जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण रखती है ।
निवेश :-
🔹 परिसंपत्तियों जैसे - भूमि , भवन , मशीन और अन्य उपकरणों की खरीद में व्यय की गई मुद्रा को निवेश कहते हैं ।
विदेशी निवेश :-
🔹 बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए गए निवेश को विदेशी निवेश कहते हैं ।
मुक्त व्यापार :-
🔹 जब दो देशों के बीच व्यापार बिना किसी प्रतिबंध के होता है तो उसे मुक्त व्यापार कहते हैं ।
विश्व व्यापार संगठन ( डब्लू . टी . ओ . ) :-
🔹 इसका उद्देश्य अंर्तराष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना है ।
विश्व व्यापार संगठन मुख्य उद्धेश्य :-
🔹 विदेशी व्यापार को उदार बनाना ।
🔹 विकसित देशों की पहल पर शुरू किया गया ।
🔹 अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित नियमों को निर्धारित करता है । 🔹 विकासशील देशों को व्यापार अवरोधक हटाने के लिए विवश करता है ।
🔹 विकसित देशों ने अनुचित ढंग से व्यापार अवरोधकों को बरकरार रखा है ।
विश्व बैंक :-
🔹 विश्व बैंक अपने सदस्य राष्ट्रों को वित्तीय सहायता देने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ।
सेज ( SEZ )
:-
🔹 किसी विशेष क्षेत्र में अतिरिक्त सुविधाएँ प्रदान कर विदेशी कम्पनियों को निवेश के लिए आकर्षित करना ।
विश्व भर के उत्पादन को एक दूसरे से जोड़ना :-
🔹 बहुराष्ट्रीय कपंनियाँ उसी स्थान पर उत्पादन इकाई स्थापित करती हैं जो बाजार के नजदीक हो , जहाँ कम लागत पर कुशल और अकुशल श्रम उपलब्ध हो तथा सरकारी नीतियाँ अनुकूल हो ।
🔹 इनके द्वारा निवेश किए गए धन को विदेशी निवेश कहते हैं ।
🔹 कभी कभी इन देशों की स्थानीय कपंनियों के साथ संयुक्त रूप से उत्पादन करती हैं ।
🔹 स्थानीय कपंनियों को अतिरिक्त निवेश के लिए धन तथा उत्पादन की नवीनतम प्रौधोगिकी प्रदान करती है ।
🔹 कभी कभी स्थानीय कपंनियों को खरीदकर उत्पादन का प्रसार करती है ।
🔹 छोटे उत्पादकों को उत्पादन का ऑर्डर देती है । खास - तौर से वस्त्र , जूते - चप्पल एवं खेल का सामान ।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादन या उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित करने के तरीके :-
👉 स्थानीय कंपनियों के साथ संयुक्त रूप से उत्पादन करना । संयुक्त उत्पादन से स्थानीय कंपनी को अतिरिक्त निवेशक के धन तथा उत्पादन की नवीनतम प्रौद्योगिकी भी प्राप्त हो जाती है ।
👉 स्थानीय कंपनियों को खरीदना और उसके बाद उत्पादन का प्रसार करना ।
👉 छोटे उत्पादकों को उत्पादन का ऑर्डर देना ।
🔹 स्थानीय कंपनियों के साथ सांझेदारी द्वारा आपूर्ति के लिए स्थानीय कंपनियों का इस्तेमाल करके और स्थानीय कंपनियों से निकट प्रतिस्पर्धा करके अथवा उन्हें खरीद कर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दूरस्थ स्थानों के उत्पादन पर अपना प्रभाव जमा रही है जिससे दूर दूर स्थानों पर फैला उत्पादन परस्पर संबंधित हो रहा है ।
विदेश व्यापार कैसे बाजारों का एकीकरण करता है ?
🔹 विदेश व्यापार उत्पादकों को अपने देश के बाजार से बाहर के बाजारों में पहुँचने का अवसर प्रदान करता है ।
🔹 खरीददारों के समक्ष दूसरे देश में उत्पादित वस्तुओं के आयात से विकल्पों का विस्तार होता है ।
🔹 दो देशों के उत्पादक एक दूसरे से दूर होते हुए भी प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं जिससे दो बाजारों में एक ही वस्तु का मूल्य सामान होने लगता है ।
वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक :-
🔹 प्रौधौगिकी का विकास
🔹 परिवहन में सुधार
🔹 सूचना प्रौधाोगिकी
🔹 दूरसंचार एवं संचार उपग्रह
🔹 सरकार द्वारा अवरोधों की समाप्ति
🔹 इंटरनेट
वैश्वीकरण का प्रभाव :-
🔹 उपभोक्ता के लिए : पहले से अधिक विकल्प , उत्पादों की उत्कृष्ट गुणवत्ता , कम कीमत तथा अपेक्षाकृत उच्च जीवन स्तर ।
🔹 नए रोजगार के अवसर
🔹 बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कच्चा माल आपूर्ति कराने वाली स्थानीय कंपनियाँ समृद्ध हुईं ।
🔹 अनेक शीर्ष भारतीय कंपनियाँ बहुराष्ट्रीय कंपनी के रूप में उभरी हैं जैसेः टाटा मोटर्स , इंफोसिस , रैनबैक्सी एशियन पेंट्स इत्यादि ।
न्याय संगत वैश्वीकरण के लिए प्रयास :-
🔹 न्याय संगत वैश्वीकरण सभी के लिए अवसर प्रदान करेगा ।
🔹 सरकार की नीतियाँ सबको सरंक्षण प्रदान करने वाली होनी चाहिए ।
🔹 सरकार सुनिश्चित कर सकती है कि श्रमिक कानूनों का उचित कार्यान्वयन हो और श्रमिकों को उनके अधिकार मिलें ।
🔹 सरकार न्यायसंगत नियमों के लिए विश्व व्यापार संगठन से समझौते कर सकती है ।
🔹 समान हित वाले विकासशील देशों से गठबंधन कर सकती है ।
भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव :-
🔹 स्थानीय एवं विदेशी उत्पादकों के बीच बेहतर प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ताओं को लाभ हुआ है ।
🔹 उपभोक्ताओं के समक्ष पहले से अधिक विकल्प है और वे अब अनेक उत्पादों की उत्कृष्ट गुणवत्ता और कम कीमत से लाभान्वित हो रहे है ।
🔹 विदेशी निवेश में वृद्धि हुई है ।
🔹 उद्योगों और सेवाओं में नये रोज़गार उत्पन्न हुए है ।
🔹 शीर्ष भारतीय कंपनियाँ बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा से लाभानिवत हुई है और इन कंपनियों ने नवीनतम् प्रौद्योगिकी और उत्पदान प्रणाली में निवेश कर अपने उत्पादन - मानकों को ऊँचा उठाया है ।
🔹 बडी भारतीय कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में उभरने के योग्य बनाया है ।
🔹 सेवा प्रदाता क्रपनियों विशेषकर सूचना और संचार प्राद्योगिकी वाली कंपनियों के लिए नये अवसरों का सृजन किया है ।
व्यापार अवरोधक तथा इनका महत्व :-
🔹 वे नियम तथा कानून जो देशों के आयात - निर्यात पर अंकुश लगाते है ।
🔹 सरकार व्यापर अवरोधक का प्रयोग विदेशी व्यापार में वृद्धि या कटौती करने तथा देश में किस प्रकार की वस्तुएँ कितनी मात्र में आयातित होनी चाहिए , यह निर्णय करने के लिए कर सकती है ।
विशेष आर्थिक क्षेत्र :-
🔹 केन्द्र एवं राज्य सरकारें द्वारा भारत में विदेशी निवेश हेतु विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना जहाँ विश्व स्तरीय सुविधाएँ - बिजली , पानी , सड़क , परिवहन , भण्डारण , मनोरंजन और शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध हो ।
अध्याय - 5
उपभोक्ता अधिकार
उपभोक्ता :-
🔹 बाजार से अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुएं खरीदने वाले लोग ।
उत्पादक :-
🔹 दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं का निर्माण या उत्पादन करने वाले लोग ।
उपभोक्ताओं के अधिकार :-
🔹 उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए कानून द्वारा दिए गए अधिकार जैसे :-
👉 सुरक्षा का अधिकार
👉 सूचना का अधिकार
👉 चुनने का अधिकार
👉 क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार
👉 उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
✳️ उपभोक्ताओं के शोषण के कारण :-
🔹 सीमित सूचना
🔹 सीमित आपूर्ति
🔹 सीमित प्रतिस्पर्धा
🔹 साक्षरता कम होना
उपभोक्ताओं के कर्त्तव्य :-
🔹 कोई भी माल खरीदते समय उपभोक्ताओं को सामान की गुणवत्ता अवश्य देखनी चाहिए । जहां भी संभव हो गारंटी कार्ड अवश्य लेना चाहिए ।
🔹 खरीदे गए सामान व सेवा की रसीद अवश्यक लेनी चाहिए ।
🔹 अपनी वास्तविक समस्या की शिकायत अवश्यक करनी चाहिए ।
🔹 आई.एस.आई. तथा एगमार्क निशानों वाला सामान ही खरीदे ।
🔹 अपने अधिकारों की जानकारी अवश्यक होनी चाहिए और
🔹 आवश्यकता पड़ने पर उन अधिकारों का प्रयोग भी करना चाहिए ।
उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया की सीमाएँ :-
🔹 उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया जटिल , खर्चीली और समय साध्य साबित हो रही है ।
🔹 कई बार उपभोक्ताओं को वकीलों का सहारा लेना पडता है । यह मुकदमें अदालती कार्यवाहियों में शामिल होने और आगे बढ़ने आदि में काफी समय लेते है ।
🔹अधिकांश खरीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं ? ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता है ।
🔹 बाज़ार में अधिकांश खरीददारियाँ छोटे फुटकर दुकानों से होती है ।
🔹 श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए कानूनों के लागू होने के बावजूद खास तौर से असंगठित क्षेत्रा में ये कमजोर है ।
🔹 इस प्रकार बाज़ारों के कार्य करने के लिए नियमों और विनियमों का प्रायः पालन नहीं होता ।
उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम 1986 ( कोपरा ) :-
🔹 उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया कानून ।
🔹 कोपरा के अंतर्गत उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए जिला राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्रा स्थापित किया गया है ।
🔹 जिला स्तर पर 20 लाख राज्य स्तर पर 20 लाख से एक करोड तक तथा राष्ट्रीय स्तर की अदालतें 1 करोड से उपर की दावेदारी से संबंधित मुकदमों को देखती है ।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन :-
🔹 भारत के व्यापारियों के बीच मिलावट, कालाबाजारी, जमाखोरी, कम वजन, आदि की परंपरा काफी पुरानी है। भारत में उपभोक्ता आंदोलन 1960 के दशक में शुरु हुए थे। 1970 के दशक तक इस तरह के आंदोलन केवल अखबारों में लेख लिखने और प्रदर्शनी लगाने तक ही सीमित होते थे। लेकिन हाल के वर्षों में इस आंदोलन में गति आई है।
🔹 लोग विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं से इतने अधिक असंतुष्ट हो गये थे कि उनके पास आंदोलन करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। एक लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने भी उपभोक्ताओं की सुधि ली। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने 1986 में कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट (कोपरा) को लागू किया।
कंज्यूमर फोरम :-
🔹 भारत में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिये स्थानीय स्तर पर कई संस्थाओं का गठन हुआ है। इन संस्थाओं को कंज्यूमर फोरम या कंज्यूमर प्रोटेक्शन काउंसिल कहते हैं। इन संस्थाओं का काम है किसी भी उपभोक्ता को कंज्यूमर कोर्ट में मुकदमा दायर करने में मार्गदर्शन करना। कई बार ऐसी संस्थाएँ कंज्यूमर कोर्ट में उपभोक्ता की तरफ से वकालत भी करती हैं। ऐसे संस्थानों को सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जाता है ताकि उपरोक्ता जागरूकता की दिशा में ठोस काम हो सके।
🔹 आजकल कई रिहायशी इलाकों में रेजिडेंट वेलफेअर एसोसियेशन होते हैं। यदि ऐसे किसी एसोसियेशन के किसी भी सदस्य को किसी विक्रेता या सर्विस प्रोवाइडर द्वारा ठगा गया हो तो ये उस सदस्य के लिये मुकदमा भी लड़ते हैं।
कंज्यूमर कोर्ट :-
🔹 यह एक अर्ध-न्यायिक व्यवस्था है जिसमें तीन लेयर होते हैं। इन स्तरों के नाम हैं जिला स्तर के कोर्ट, राज्य स्तर के कोर्ट और राष्ट्रीय स्तर के कोर्ट। 20 लाख रुपये तक के क्लेम वाले केस जिला स्तर के कोर्ट में सुनवाई के लिये जाते हैं। 20 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के केस राज्य स्तर के कोर्ट में जाते हैं। 1 करोड़ से अधिक के क्लेम वाले केस राष्ट्रीय स्तर के कंज्यूमर कोर्ट में जाते हैं। यदि कोई केस जिला स्तर के कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया जाता है तो उपभोक्ता को राज्य स्तर पर; और उसके बाद; राष्ट्रीय स्तर पर अपील करने का अधिकार होता है।
राष्ट्रीय कंज्यूमर दिवस :-
🔹 24 दिसंबर को राष्ट्रीय कंज्यूमर दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह वही दिन है जब भारतीय संसद ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट लागू किया था। भारत उन गिने चुने देशों में से है जहाँ उपभोक्ता की सुनवाई के लिये अलग से कोर्ट हैं। हाल के समय में उपभोक्ता आंदोलन ने भारत में अच्छी पैठ बनाई है। ताजा आँकड़ों के अनुसार भारत में 700 से अधिक कंज्यूमर ग्रुप हैं। उनमे से 20 – 25 अच्छी तरह से संगठित हैं और अपने काम के लिये जाने जाते हैं।
🔹 लेकिन उपभोक्ता की सुनवाई की प्रक्रिया जटिल, महंगी और लंबी होती जा रही है। वकीलों की ऊँची फीस के कारण अक्सर उपभोक्ता मुकदमे लड़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता है।
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