चुम्बकत्व एवं चुम्बकीय पदार्थों के गुण magnetism and properties of magnetic substances
चुम्बक की
परिभाषा क्या
है
, प्राकृतिक , कृत्रिम चुम्बक , स्थाई
, अस्थाई चुंबक
Definition of magnet in hindi
what is Definition of magnet
in hindi meaning चुम्बक की परिभाषा क्या है , प्राकृतिक चुम्बक , कृत्रिम चुम्बक , किसे कहते है ?
परिभाषा :
धातुओं जैसे लोहा , कोबाल्ट आदि को आकर्षित करने के गुण को चुम्बकत्व तथा जो पदार्थ चुंबकत्व गुण दर्शाते है उसे चुम्बक कहते है।
चुम्बक को दो भागों में अध्ययन किया जाता है
1. प्राकृतिक चुम्बक
2. कृत्रिम चुंबक
इन दोनों के बारे में हम यहाँ विस्तार से अध्ययन करते है।
1. प्राकृतिक चुम्बक (Natural magnets) :
प्रकृति में कुछ ऐसे पदार्थ पाए जाते है जिनमे लोहा , कोबॉल्ट इत्यादि को आकर्षित करने की क्षमता पायी जाती है , चूँकि ये पदार्थ सबसे पहले ग्रीस में एशिया माइनर के मैग्नीशिया में खोजे गए इसलिए इन पदार्थों को मैग्नेटाइड नाम से जाना जाता है तथा पदार्थो के इस गुण को चुम्बकत्व कहते है। प्राचीन समय में इनका उपयोग दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता था क्योंकि चुम्बक स्वतंत्रता पूर्वक लटकने पर हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है। मैग्नेटाइड का सूत्र Fe3O4 होता है जो की एक लोहे का अयस्क है। चूँकि इन पदार्थो में चुंबकत्व गुण बहुत कम पाया जाता है इसलिए इन्हे अधिक उपयोग में नहीं लिया जाता है।
2. कृत्रिम चुंबक (artificial magnet )
हमने प्राकृतिक चुम्बक में पढ़ा की इनमे चुम्बकत्व अत्यधिक अल्प होता है अतः चुंबकत्व को बढ़ाने के लिए कृत्रिम चुम्बक बनाई जाती है। ये वो चुम्बक है जिनको कृत्रिम रूप से बनाया जाता है।
कृत्रिम चुंबक बनाने के लिए लोह चुम्बकीय पदार्थ को अत्यधिक चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है जिससे लोह चुम्बकीय पदार्थों में चुंबकीय गुण आ जाते है।
कृत्रिम चुम्बक को दो प्रकार की हो सकती है
§ स्थाई चुम्बक
§ अस्थाई चुंबक
इनके बार में अब हम विस्तार से अध्ययन करते है
§ स्थाई चुम्बक (Permanent magnet )
वे लोह चुम्बकीय पदार्थ जिनको एक बार चुम्बकित करने के बाद वे एक लम्बे समय तक चुंबकीय गुण दर्शाती है उन्हें स्थाई चुम्बक कहते है। जैसे टंगस्टन , कोबाल्ट स्टील एलनिको इत्यादि।
§ अस्थाई चुंबक
(Temporary magnets )
वे चुम्बक जो तब तक चुम्बकत्व गुण दर्शाती है जब तक की वे चुम्बकीय बल में उपस्थित हो , जैसे ही इस चुम्बककारी बल को हटा लिया जाता है इनमे चुम्बकत्व गुण समाप्त हो जाता है। अस्थाई चुंबक का उपयोग प्राय: जनित्र , मोटर इत्यादि में किया जाता है।
चुम्बक के प्रकार
चुम्बक दो प्रकार के होते है- अस्थायी तथा स्थायी।
अस्थायी चुम्बक- नर्म लोहा शीघ्र ही चुम्बक बन जाता है और शीघ्र ही इसका चुम्बकत्व समाप्त भी हो जाता है। इसीलिए अस्थायी चुम्बक बनाने के लिए नर्म लोहे का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए विद्युत घण्टी, ट्रांसफॉर्मर क्रोड, डायनेमो आदि के अस्थायी चुम्बक नर्म लोहे के बनाये जाते है।
स्थायी चुम्बक – फौलाद या इस्पात कठिनता से चुम्बक बनता है और कठिनता से ही इसका चुम्बकत्व समाप्त होता है। उदाहरण के लिए लाउडस्पीकर, दिक्सूचक, गैल्वेनोमीटर आदि के स्थायी चुम्बक इस्पात के ही बनाये जाते है।
चुम्बक
(magnet in hindi) : प्राचीन काल में एशिया माइनर के मैग्नीशिया नामक स्थान पर एक गहरे भूरे रंग का पत्थर पाया गया जिसका नाम उसी स्थान के आधार पर मैग्नेटाइड रखा गया। मैग्नेटाइड लोहे का एक ऑक्साइड (Fe3O4) होता है। मैग्नेटाइड धातु में लोहे के छोटे छोटे टुकड़ों को आकर्षित करने का गुण होता है। मैग्नेटाइड धातु के नाम से ही आधुनिक अंग्रेजी शब्द मैगनेट (magnet) की उत्पत्ति हुई जिसका हिंदी रूपांतरण चुम्बक है। चूँकि उपरोक्त धातु प्रकृति में पायी जाती है , अत: मैग्नेटाइड पत्थर को प्राकृतिक चुम्बक कहते है। प्राकृतिक चुम्बकों की कोई निश्चित आकृति नहीं होती है और उनकी आकर्षण शक्ति बहुत कम होती है , अत: इन्हें प्रायोगिक कार्यों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है। प्रयोगशाला में और अन्य कार्यों के लिए लोहे , निकिल और फौलाद के बने शक्तिशाली चुम्बकों को ही प्रयोग किया जाता है। इन्हें कृत्रिम चुम्बक कहते है। इनकी आकृति आवश्यकतानुसार किसी भी प्रकार की रखी जा सकती है ; जैसे दण्ड चुम्बक (bar
magnet) , नाल चुम्बक (horse shoe magnet) , चुम्बकीय सुई
(magnetic needle) , गोल सिर वाले चुम्बक (ball ended magnet) आदि।
यदि किसी चुम्बक को उसके गुरुत्व केन्द्र पर धागे से बाँधकर स्वतंत्रतापूर्वक लटकाया जाए तो वह सदैव उत्तर दक्षिण दिशा में ठहरता है। इसी गुण के आधार पर चुम्बकीय सुई का आविष्कार हुआ जो गुरुत्व केंद्र पर किलकित एक अत्यंत छोटा चुम्बक है। यदि चुम्बकीय सुई को किसी चुम्बक के निकट लाया जाए तो चुम्बक इसके झुकाव को परावर्तित कर देता है। चौदहवीं शताब्दी में पिटर पेरेग्रिनज (peter peregrinus) और सौलहवीं शताब्दी में डॉ. गिलबर्ट ने चुम्बकीय गुणों का अध्ययन किया .सौलहवीं शताब्दी में ही थैलेस ने भौतिकी की वैद्युत शाखा की खोज की।
सन 1820 तक विज्ञान की इन दोनों शाखाओं (वैद्युत और चुम्बकत्व) का विकास बिल्कुल स्वतंत्र रूप से हुआ।
सन 1820 में डेनमार्क में भौतिकी प्राध्यापक “हेन्स क्रिश्चियन ऑस्ट्रेड” ने विद्युत और चुम्बकत्व के मध्य सम्बन्ध की खोज की। उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि धारावाही तार भी चुम्बकीय प्रभाव प्रदर्शित करता है अर्थात चुम्बक की भाँती यह भी इसके निकट रखी गयी चुम्बकीय सुई को विक्षेपित कर देता है। इस प्रकार “वैद्युत” और “चुम्बकत्व” के परस्पर सम्बन्ध ने भौतिकी की नयी शाखा “वैद्युत चुम्बकत्व (electromagnetism)” को जन्म दिया।
इसके पश्चात् अनेक वैज्ञानिकों ने इसका विकास किया।
उदाहरण के लिए माइकल फैराडे और जेम्स क्लार्क मैक्सवेल का इस क्षेत्र में योगदान विशेष उल्लेखनीय है।
दण्ड
चुम्बक के
गुण
क्या
है
, चुम्बकीय प्रेरण , विचुंबकन Properties of Bar magnet in hindi
Properties of Bar magnet in hindi दण्ड चुम्बक के गुण क्या है : दंड चुंबक लोहे , स्टील या फेरोमैग्नेटिक पदार्थ की बनी हुई आयताकार चुम्बक होती है। इसका उपयोग बहुतायत से विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है।
यहाँ हम दण्ड चुम्बक के गुणों के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे
1. पदार्थों को आकर्षित करने की प्रवृत्ति
दण्ड चुम्बक में लोह पदार्थों जैसे लोहा , कोबाल्ट को आकर्षित करने का गुण पाया जाता है , चूँकि चुंबक के सिरों पर चुम्बकत्व गुण अधिकतम होता है इसलिए पदार्थो को आकर्षित करने की प्रवृत्ति भी सिरों (ध्रुवों) पर सबसे ज्यादा होती है।
2. दिशा बताने का गुण
यदि हम किसी दंड चुम्बक को स्वतंत्रता पूर्वक लटकाये तो इस चुम्बक के ध्रुव एक निश्चित दिशा उत्तर-दक्षिण में ही ठहरते है , अर्थात चुम्बक का एक ध्रुव उत्तर में ठहरता है तथा दूसरा सिरा (ध्रुव) दक्षिण दिशा में ठहरता है। जो सिरा उत्तर की तरफ ठहरता है उसे चुम्बक का उत्तरी ध्रुव (N) तथा जो सिरा (ध्रुव) दक्षिण की तरफ ठहरता है उसे चुंबक का दक्षिणी ध्रुव कहते है
3. ध्रुवों की युग्म प्रवृत्ति
जैसा की हम सब जानते है की चुम्बक में दो ध्रुव उत्तरी तथा दक्षिणी पाए जाते है लेकिन यह याद रखे की ये हमेशा एक चुंबक में दोनों ध्रुव एक साथ मिलते है अर्थात किन्ही भी तरीकों से चुम्बक के ध्रुवों को अलग अलग नहीं किया जा सकता , जब एक चुम्बक को तोडा भी जाता है तो दोनों चुंबक अलग अलग चुंबक की तरह व्यवहार करती है लेकिन दोनों में दोनों ध्रुव एक साथ पाए जाते है अर्थात दक्षिण तथा उत्तरी ध्रुव दोनों चुंबक में मिलते है इनको किसी विधि से अलग नहीं किया जा सकता।
4. समान ध्रुवों में प्रतिकर्षण तथा असमान ध्रुवो में आक्रषण
चुम्बक के समान ध्रुवों जब पास में लाया जाता है तो दोनों सिरे एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है इसी प्रकार जब असमान ध्रुवों को आपस में लाया जाता है तो दोनों ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते है।
5. ध्रुवों को तोड़ने या विभक्त करने पर प्रबलता गुण
जब किसी दण्ड चुम्बक को इसकी अक्ष के लंबवत दो समान भागों में काटा जाए या तोडा जाए तो प्रत्येक भाग के ध्रुवों की प्रबलता पहले के समान ही रहती है।
जब किसी दंड चुंबक को इसकी अक्ष के अनुदिश दो भागों में बांटा जाए तो ध्रुव प्रबलता पहले की तुलना में आधी रह जाती है।
6. चुम्बकीय प्रेरण का गुण
जब किसी दण्ड चुम्बक के पास में कोई चुम्बकीय पदार्थ लाया जाता है तो चुम्बकीय पदार्थ में चुंबकत्व का गुण आ जाता है इसे चुम्बकीय प्रेरण का गुण कहते है।
7. विचुंबकन का गुण
किसी चुम्बक से चुम्बकत्व गुणों को नष्ट करना विचुंबकन कहलाता है , विचुंबकन के लिए चुम्बक को गरम किया जाता है या पिटाई की जाती है जिससे उसके चुम्बकीय गुण नष्ट हो जाते है।
चुम्बक की
प्रभावी लम्बाई , चुम्बकीय ध्रुव
, चुंबकीय अक्ष
, प्रबलता , आघूर्ण important definitions in hindi
important definitions in
hindi महत्वपूर्ण परिभाषा : यहाँ हम चुम्बक से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाओं का अध्ययन करते है जिनका प्रयोग प्राय: हम करते है।
1. चुम्बक की प्रभावी लम्बाई (magnet Effective length)
क्या होती है
चुंबक के दोनों ध्रुवों या सिरों के मध्य की दूरी को चुम्बक की लम्बाई कहते है , इसे चित्र में 2l से प्रदर्शित किया गया है।
2. चुम्बकीय ध्रुव
हमने दण्ड चुम्बक में पढ़ा की सिरों पर चुंबकत्व अधिकतम होता है , अतः हम कह सकते है की दंड चुम्बक में जहाँ चुम्कत्व का मान अधिकतम होता है उन्हें चुंबक के ध्रुव कहते है।
3. चुंबकीय अक्ष
चुम्बक के दोनों ध्रुवों
(N-S) के मध्य खींची गयी काल्पनिक रेखा को चुम्बक की अक्ष कहते है।
4. चुम्बकीय प्रबलता
किसी भी चुम्बक के ध्रुवों द्वारा चुम्बकीय पदार्थों को अपनी तरफ आकर्षित करने की क्षमता को उस चुम्बक की चुंबकीय प्रबलता कहते है।
5. चुम्बकीय आघूर्ण
किसी चुम्बक की ध्रुव प्रबलता (m) तथा चुंबक की प्रभावी लम्बाई के गुणनफल को चुंबकीय आघूर्ण कहते है।
माना चुम्बक के ध्रुवों की प्रबलता m है तथा दोनों ध्रुवों के मध्य की दुरी 2l है तो चुम्बकीय आघूर्ण M =
m x 2l , यह एक सदिश राशि है इसकी दिशा दोनों ध्रुवो को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश दक्षिण से उत्तर ध्रुव की ओर होती है।
चुम्बकीय ध्रुवों के
मध्य
कार्यरत बल
कुलॉम
का
नियम
Coulomb’s law for the force between magnetic poles
Coulomb’s law for the force
between magnetic poles in hindi चुम्बकीय ध्रुवों के मध्य कार्यरत बल कुलॉम का नियम : यह नियम बताता है की ” दो चुम्बकीय ध्रुवों के बीच लगने वाला आकर्षण या प्रतिकर्षण का बल दोनों चुम्बक की ध्रुव प्रबलता के गुणनफल के समानुपाती तथा दोनों ध्रुवों के मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है ”
माना किसी चुम्बक के ध्रुवों की प्रबलताओं का मान m1 तथा m2 है। तथा दोनों ध्रुवों के मध्य की दूरी r है तो कुलॉम के नियम के अनुसार दोनों ध्रुवों के मध्य लगने वाला बल
F ∝ m1m2
F ∝ 1/r2
F ∝ m1m2/r2
समानुपाती का चिह्न हटाने पर
F =
K m1m2/r2
यहाँ K एक स्थिरांक है जिसे चुम्बकीय बल नियतांक कहते है।
K
= μ0/4π
SI मात्रक पद्धति में K का मान
K
= μ0/4π = 10-7 Wb
A-1 m-1
अतः
F =
(μ0/4π ) m1m2/r2
इस नियम को कूलॉम का नियम कहते है यह चुम्बकीय बल से सम्बन्धित है यह अवश्य याद रखे क्योंकि कुलॉम का नियम कुछ ऐसा ही हमने स्थिर वैद्युतिकी में भी पढ़ा था।
CGS मात्रक पद्धति में का मान 1 होता है।
यदि m1 = m2 =
1 तथा r = 1 तो F = 10-7 N
अतः
हम कह सकते है की एकांक दूरी पर रखे समान प्रबलता के दो ध्रुवो के मध्य लगने वाला बल 10-7 N होता है।
नोट : चुम्बक के ध्रुव की प्रबलता का मात्रक एम्पीयर-मीटर (Am)
होता है।
चुम्बक में उत्तरी ध्रुव की प्रबलता (m) धनात्मक होती है अतः यह धन आवेश की भांति व्यवहार करता है ठीक इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव की प्रबलता (m) ऋणात्मक होती है अतः यह ऋण आवेश की भाँति व्यवहार करता है।
चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ या
चुंबकीय बल
रेखाएं क्या
है
, परिभाषा , गुण
Magnetic field lines in hindi
Magnetic field lines or
magnetic lines of force in hindi चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ या चुंबकीय बल रेखाएं क्या है , किसे कहते है , परिभाषा , गुण बताइये ? चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण 2 गुणों को लिखें ? की सूची बनाइए ?
परिभाषा :
यदि एक चुम्बक के पास कोई चुम्बकीय सुई (कम्पास सूई ) लायी जाए तो चुंबकीय सुई एक निश्चित दिशा में ठहरती है , अब यदि चुम्बकीय सुई की स्थिति बदल दी जाए तो इसके ठहरने की दिशा भी बदल जाती है इसी प्रकार सुई एक वक्र पथ में विचलित होती रहती है।
इससे यह सिद्ध होता है की चुम्बकीय क्षेत्र की रेखा वक्र के रूप में होती है इन्हीं वक्र रेखाओं को चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ या बल रेखाएं कहते है।
परिभाषा : किसी भी चुम्बक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमे चुम्बकीय प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है उसे क्षेत्र को उस चुंबक का क्षेत्र कहते है।
दूसरे शब्दों में कहे
” जब किसी चुम्बकीय क्षेत्र में एकांक उत्तरी ध्रुव को रखा जाए तो तो इस एकांक ध्रुव पर एक बल कार्य करता है , इस बल के कारण यह ध्रुव गति करता है , गति करने के लिए यह जिस पथ का अनुसरण करता है इस पर काल्पनिक रेखाएं खींचने पर यह पथ वक्र के रूप में प्राप्त होता है , इन वक्र रेखाओ को ही चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएं कहते है “
चुम्बकीय क्षेत्र रेखा या चुंबकीय बल रेखाओं के गुण (Properties of magnetic field line or magnetic force lines)
1. चुम्बकीय रेखाएं बंद वक्र के रूप में होती है
किसी भी चुम्बक के बाहर चुम्बकीय रेखाएं उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर चलती है तथा चुम्बक के भीतर दक्षिण ध्रुव से उत्तर ध्रुव की ओर चलती है , चुम्बकीय क्षेत्र बल रेखाओ का अंत नहीं है।
2. किसी भी चुम्बकीय बल रेखा पर खिंची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करती है।
3. दो चुम्बकीय बल रेखाये कभी भी एक दूसरे को नही काटती है , क्योंकि अगर ये एक दूसरे को काटे तो कटान बिन्दु पर चुंबकीय क्षेत्र की दो दिशाएं प्राप्त होती है जो की असंभव है।
4. जिस स्थान पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता अधिक होती है वहां सघन रेखाओ से दर्शाया जाता है तथा जहाँ चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता का मान कम होता है वहाँ कम रेखाओ से प्रदर्शित किया जाता है।
चुम्बकीय बल रेखाएँ– चुम्बकीय क्षेत्र में बल रेखाएँ वे काल्पनिक रेखाएँ है, जो उस स्थान मे चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा का सतत प्रदर्शन करती हैं। चुम्बकीय बल-रेखा के किसी भी बिन्दु पर खीची गई स्पर्श-रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।
चुम्बकीय बल-रेखाओ के गुण
– चुम्बकीय बल-रेखाएँ सदैव चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से निकलती है तथा वक्र बनाती हुई दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश कर पाती है और चुम्बक के अन्दर से होती हुई पुनः उत्तरी ध्रुव पर वापस आती है।
– दो बल-रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटती है।
– चुम्बकीय क्षेत्र जहाँ प्रबल होती है, वहाँ बल-रेखाएँ पास-पास होती है।
– एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र की बल-रेखाएँ परस्पर समान्तर एंव बराबर-बराबर दुरियों पर होती हैं।
चुम्बकशीलता- जब किसी चुम्बकीय क्षेत्र में कोई चुम्बकीय पदार्थ रखा जाता है, तो उससे होकर अधिक-से-अधिक चुम्बकीय बल रेखाएँ गुजरती हैं। जैसे- यदि एक कच्चे लोहे की छड़ को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रख दिया जाता है, तो क्षेत्र की बल रेखाएँ, जो लोहे के छड़ के अगल-बगल की हवा में रहती है, मुड़कर लोहे के छड़ से होकर जाती है। अर्थात लोहे की छड़ जितना स्थान छेकती है, उस स्थान पर हवा रहने तक जितनी बल रेखाएँ रहती है, उनसे अधिक बल रेखाएँ उस स्थान पर लोहे की छड़ के रहने से रहती है। इससे स्पष्ट है कि लोहा बल-रेखाओं का बहुत अच्छा चालक है। पदार्थ की इस चालक-शक्ति को चुम्बकशीलता कहते हैं। अतः किसी पदार्थ की चुम्बकशीलता हवा की तुलना में बल-रेखाओं के चालन की उसकी शक्ति है। अर्थात पदार्थ का वह गुण जिसके कारण उसके भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बढ़ या घटा जाती है चुम्बकशीलता कहलाती है। चुम्बकशीलता को (म्यू) से निरूपित करते है।
जहाँ भ् = हवा में प्रति वर्ग मी. बल रेखाओं की संख्या।
ठ = चम्बकीय पदार्थ में प्रति वर्ग मी. से गुजरने वाली बल रेखाएँ।
चुम्बकशीलता का मात्रक हेनरी/मी. होता है।
नोट- ऐलुमिनियम की चुम्बकशीलता लोहे से कम होती है।
गतिमान आवेश से चुम्बकीय क्षेत्र की उत्पत्ति
(production of magnetic field due to moving charge) :
प्रयोगों से यह देखा गया है कि जिस प्रकार एक चुम्बक के चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित हो जाता है , ठीक उसी प्रकार एक धारावाही चालक के चारों ओर भी एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। चूँकि विद्युत धारा गतिशील आवेश का परिणाम होती है अत: हम कह सकते है कि गतिशील आवेश के कारण एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। यह तथ्य आगे दिए गए प्रयोगों द्वारा पुष्ट हो जाता है –
(1) ऑसर्टेड का प्रयोग (oersted experiment) : डेनमार्क के एक स्कूल अध्यापक ऑर्सटेड ने सन 1819 में यह ज्ञात किया कि किसी तार में धारा बहाने पर उसके चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। जब एक लोहे की कील पर पृथक्कृत तांबे के तारों को लपेटकर धारा प्रवाहित की जाती है तो यह कील चुम्बकित होकर लोहे की छोटी छोटी अन्य कीलों को अपनी ओर आकर्षित करने लगती है। जब किसी तार में धारा प्रवाहित की जाती है तो उस तार के निचे रखी दिक्सूचक सुई में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है। तार में धारा का मान शून्य हो जाने पर सुई में विक्षेप भी शून्य हो जाता है और धारा की दिशा विपरीत कर देने पर विक्षेप भी विपरीत दिशा में हो जाता है।
उक्त प्रयोग से यह निष्कर्ष निकलता है कि तार में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर , इसके चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिसकी दिशा धारा की दिशा पर निर्भर करती है और चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता धारा की प्रबलता पर निर्भर करती है।
नोट : धारावाही चालक में ध्रुवों को पहचानना –
(i) जब किसी चालक में धारा प्रवाहित होती है तो उसका प्रत्येक बिंदु उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की भाँती कार्य करता है।
(ii) उत्तरी ध्रुव धनात्मक आवेश की तरह कार्य करेगा। N → (+)
(iii) दक्षिणी ध्रुव ऋणात्मक आवेश की तरह कार्य करेगा। S → (-)
(iv) धारा की दिशा S-ध्रुव से N-ध्रुव की तरफ होती है।
(v) अर्थात जहाँ धारा प्रवेश करती है वहां दक्षिणी ध्रुव और जहाँ धारा निकलती है वहां उत्तरी ध्रुव बनता है।
उदासीन बिन्दु चुम्बक तथा
चुम्बकीय क्षेत्र के
सन्दर्भ में
Neutral point in hindi
Neutral point in hindi उदासीन बिन्दु चुम्बक तथा चुम्बकीय क्षेत्र के सन्दर्भ में : हम जानते है की पृथ्वी भी चुम्बक की भाँति व्यवहार करती है अतः जब किसी चुम्बक के पास कोई चुम्बकीय सुई रखी जाती है तो उस पर दो चुम्बकीय क्षेत्र कार्य करते है पहला चुम्बक के कारण उत्पन्न तथा दूसरा पृथ्वी के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र।
जिस बिन्दु पर दोनों चुम्बकीय क्षेत्र का मान बराबर तथा विपरीत होकर एक दूसरे को निरस्त कर देता है या जिस बिंदु पर चुम्बकीय सुई शून्य विक्षेप देती है उस बिन्दु को उदासीन बिन्दु कहते है।
1. जब किसी चुम्बक को इस प्रकार रखा जाए की चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव भौगोलिक उत्तर की तरफ हो : चूँकि हम जानते है की पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर होती है तथा चुम्बक के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र इसके लंबवत उत्पन्न होता है जैसा चित्र में दिखाया गया है , इस स्थिति में उदासीन बिंदु चुम्बक के अक्षीय बिंदु पर प्राप्त होता है। इन बिन्दुओ को चित्र में X निशान से दर्शाया गया है।
2. जब चुम्बक इस प्रकार स्थित हो की चुम्बक का उत्तर ध्रुव पृथ्वी के उत्तर की ओर स्थित हो :
ऐसी स्थिति में चुम्बक तथा पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र दोनों की दिशा समान होती है , इस स्थिति में उदासीन बिन्दु चुम्बक के निरक्ष रेखा पर प्राप्त होते है जैसा चित्र में दिखाया गया है , चित्र में इनको x चिन्ह से दर्शाया गया है।
चुम्बकीय द्विध्रुव तथा
चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण की
परिभाषा क्या
है
,सूत्र
, मात्रक magnetic dipole moment
Magnetic dipole and magnetic
dipole moment in hindi चुम्बकीय द्विध्रुव किसे कहते है ? और चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा क्या है , विमा , मात्रक
प्रस्तावना :
यहाँ हम इन दोनों के बारे में विस्तार से अध्ययन करने जा रहे है की ये दोनों क्या होते है साथ ही इनके लिए सूत्र की स्थापना भी करेंगे।
चुम्बकीय द्विध्रुव
(Magnetic dipole ) : हमने विद्युत क्षेत्र का अध्ययन करते समय पढ़ा था की विद्युत द्विध्रुव को किसी विधुत क्षेत्र में रखने पर विधुत द्विध्रुव पर एक बलयुग्म कार्य करता है।
ठीक इसी प्रकार “जब किसी वस्तु को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए और इस वस्तु पर बल युग्म कार्य करे तो यह वस्तु चुंबकीय द्विध्रुव कहलाती है। ”
जब दण्ड चुम्बक , धारावाही कुण्डली अथवा धारावाही परिनालिका को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तो इन पर एक बलयुग्म कार्य करता है अतः ये सब चुम्बकीय द्विध्रुव के उदाहरण है।
जब किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में दंड चुम्बक को रखा जाता है तो इस दंड चुंबक पर एक बल युग्म कार्य करता है जिसके कारण यह चुम्बक अपनी माध्य स्थिति से विचलित होकर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में हो जाती है , जिससे यह सिद्ध होता है की दण्ड चुम्बक भी चुम्बकीय द्विध्रुव का उदाहरण है।
चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण (magnetic dipole moment)
चुम्बक की ध्रुव प्रबलता तथा उसी चुंबक की प्रभावी लम्बाई के गुणनफल को चुंबक का चुम्बकीय आघूर्ण कहते है।
माना किसी चुम्बक के ध्रुव की प्रबलता m है तथा प्रभावी लम्बाई 2L है तो परिभाषा से चुम्बकीय आघूर्ण (M)
M = m x 2L
हम यह भी पढ़ चुके है की एक धारावाही कुण्डली भी द्विध्रुव का उदाहरण है इसके लिए चुम्बकीय द्विध्रुव का मान निम्न प्रकार ज्ञात करते है।
माना एक A क्षेत्रफल धारावाही कुंडली है जिसमे N फेरे लिपटे हुए है तथा I धारा प्रवाहित हो रही है और B तथा इसकी दिशा में θ कोण बन रहा है तो बल आघूर्ण (T)
T = NIABsinθ
यहाँ
NIA को चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण कहते है।
यह एक सदिश राशि है तथा इसका मात्रक Am2 होता है।
संक्रमण धातु संकुलों के चुम्बकीय गुण :
संक्रमण तत्वों के संकुलों के अध्ययन में इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रोस्कोपी का काफी महत्व है। इसके साथ ही चुम्बकीय गुणों का भी इसमें काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। चूँकि संक्रमण तत्व संकुलों में आंशिक रूप से भरे हुए d कक्षक विद्यमान होते है अत: इनमे चुम्बकीय गुण पाए जाते है। केन्द्रीय धातु परमाणु के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास , ऑक्सीकरण अवस्था और उपसह्संयोजन संख्या के अनुसार संक्रमण धातु संकुलों में चुम्बकीय गुणों की विविधता पाई जाती है।
चुम्बकीय गुणों का अध्ययन करने से पहले हम चुम्बकत्व और चुम्बकीय गुणों से सम्बन्धित कुछ पदों की व्याख्या करेंगे :
1.
ध्रुव शक्ति : एक इकाई ध्रुव उसे कहा जाता है जो वायु या निर्वात में रखने पर दूसरे इकाई शक्ति वाले ध्रुव को एक डाइन बल से प्रतिकर्षित करे या आकर्षित करे।
2.
चुम्बकीय आघूर्ण :
किसी छड चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण उसके दोनों सिरों की ध्रुव शक्ति और उनके मध्य की दूरी का गुणनफल होता है अर्थात
चुम्बकीय आघूर्ण
= m x l
यहाँ m = ध्रुव शक्ति
l = दो ध्रुवों के मध्य की दूरी
3.
चुम्बकन की तीव्रता या इकाई आयतन चुम्बकीय आघूर्ण :
चुम्बकन की तीव्रता I से तात्पर्य है प्रति इकाई क्षेत्रफल में प्रेरित ध्रुव शक्ति। अत: यदि किसी चुम्बकीय पदार्थ की ध्रुव शक्ति m हो , दोनों ध्रुवों के मध्य की दूरी l हो और ध्रुव का क्षेत्रफल A हो तो –
I = m/A = m.l/V = चुम्बकीय आघूर्ण/आयतन
4.
गॉस का नियम और कुल चुम्बकीय प्रेरण :
किसी चुम्बकीय क्षेत्र की एक इकाई तीव्रता होती है , यदि एक इकाई क्षेत्रफल (1 वर्ग सेंटीमीटर) में से एक इकाई बल गुजरता हो। यदि किसी पदार्थ को H गॉस की शक्ति वाले चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तो उस पदार्थ में चुम्बकीय प्रभाव प्रेरित हो जाता है। कुल चुम्बकीय प्रेरण B या चुम्बकीय फ्लक्स , पदार्थ के इकाई क्षेत्रफल में से गुजरने वाली बल रेखाओं की कुल संख्या को कहा जाता है। इसे ज्ञात करने के लिए गॉस ने निम्नलिखित सूत्र दिया :-
B = H + 4πI
समीकरण में H का भाग देने पर ,
B/H = 1 + 4πI/H . . . .
.. . . . .. . . . . समीकरण-1
5.
चुम्बकीय पारगम्यता : किसी पदार्थ के इकाई क्षेत्रफल में चुम्बकीय बल रेखाओं की कुल संख्या तथा निर्वात में चुम्बकीय क्षेत्र की बल रेखाओं की संख्या के अनुपात B/H को उस पदार्थ की चुम्बकीय पारगम्यता P कहते है , अत:
P = B/H . . . . .. . .
. .. . . . . समीकरण-2
6.
चुम्बकीय प्रवृति :
इसे हम इकाई आयतन की प्रवृत्ति या आयतन प्रवृति कहते है तथा इसे काई (chi) χ द्वारा प्रदर्शित करते है। किसी पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृति से तात्पर्य है कि वह पदार्थ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र के प्रति कितना संवेदनशील है अर्थात चुम्बकन से कितना प्रभावित होता है। यह निम्नलिखित समीकरण द्वारा ज्ञात किया जा सकता है –
χ = I/H . . . . ..
. . . .. . . . . समीकरण-3
P और χ
चुँकि चुम्बकीय क्षेत्र के पदों के अनुपात है अत: इन दोनों का कोई मात्रक अथवा इकाई नहीं होती बल्क़ि इनके मान केवल प्राकृतिक संख्याओं के रूप में प्रदर्शित किये जाते है।
समीकरण 1 ,
2 , और 3 से ,
P = 1 + 4πχ
चुम्बकीय प्रवृति को हम सामान्यतया ग्राम प्रवृत्ति या विशिष्ट प्रवृत्ति के रूप में या मोलर प्रवृत्ति के रूप में प्रदर्शित करते है .प्रति इकाई संहति चुम्बकीय प्रवृत्ति को ग्राम प्रवृति कहते है तथा इसे χg द्वारा प्रदर्शित करते है।
अत:
ग्राम प्रवृत्ति = आयतन प्रवृति/घनत्व
या
χg =
χ/d तथा मोलर प्रवृति = χg x
M
यहाँ M = पदार्थ का अणुभार
7.
चुम्बकीय दृष्टि से तनु पदार्थ :
वे पदार्थ जिनके क्रिस्टल जालक में उनके चुम्बकीय केंद्र दूर दूर स्थित हो चुम्बकीय दृष्टि से तनु पदार्थ कहलाते है। इसके विपरीत वे पदार्थ जिनके क्रिस्टल जालक में चुम्बकीय केंद्र इतने नजदीक हो कि वे एक दूसरे में चुम्बकीय अंतर्क्रिया को प्रारंभ कर सके , चुम्बकीय दृष्टि से सान्द्र पदार्थ कहलाते है।
चुम्बकीय आघूर्ण में कक्षकीय योगदान
(orbital contribution to magnetic moment) :
संक्रमण तत्वों के संकुल आयनों के चुम्बकीय आघूर्ण के मान केवल चक्रण मात्र सूत्र के आधार पर परिकलित किये जा सकते है , क्योंकि संक्रमण तत्वों में कक्षकीय गति से उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण को शून्य मान लिया जाता है। संक्रमण तत्वों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन d कक्षकों में विद्यमान होते है जो संकुल आयन के घेरे में ही होते है अत: उनके कक्षकीय गति के कारण उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण उनके चारों ओर विद्यमान लिगेंडो द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण द्वारा उदासीन कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त इनमें कक्षीय योगदान का शमन भी होता है। इसे क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के आधार पर आसानी से समझा जा सकता है।
यदि समान ऊर्जा स्तर पर हो तो z अक्ष पर 45°C के घूर्णन से dx2–
y2 कक्षक dxy में परिवर्तित हो सकता है तथा dxy कक्षक यदि z अक्ष के प्रति 90°C का घूर्णन करे तो इसे dyz कक्षक में परिवर्तित किया जा सकता है।
किसी इलेक्ट्रॉन के अपनी अक्ष के प्रति कक्षकीय कोणीय आघूर्ण होने के लिए यह आवश्यक है कि वह कक्षक जिसमें यह इलेक्ट्रॉन गति कर रहा है उसके अक्ष के प्रति घूर्णन से वह किसी अन्य समान और समभ्रंश कक्षक में परिवर्तित हो जाए। चूँकि dz2 कक्षक का z अक्ष पर घूर्णन द्वारा किसी अन्य समभ्रंश कक्षक में परिवर्तन नहीं होता अत: इलेक्ट्रॉन के इस कक्षक में होने पर कोई कक्षकीय कोणीय आघूर्ण नहीं होता। लिगेंड क्षेत्र की उपस्थिति में यदि कक्षकों का अंतर्परिवर्तन सम्भव हो तो उनका कुछ कक्षकीय आघूर्ण होता है , अन्यथा उसका शमन हो जाता है।
उपर्युक्त के विपरीत अंतर संक्रमण तत्वों (लेन्थेनाइड) में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन 4f कक्षकों में विद्यमान होते है। ये भीतर के कक्षक होने के कारण बाहर के 5d ,
6s और 6p कक्षकों द्वारा ढके रहते है , अत: इन 4f इलेक्ट्रॉनों की कक्षकीय गति के कारण उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण लिगेंडो के इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण द्वारा उदासीन नहीं हो पाता , फलत: इनके चुम्बकीय आघूर्ण में इलेक्ट्रॉनों के चक्रण के साथ साथ कक्षकीय योगदान भी होता है।
अत: लेंथेनाइडो के चुम्बकीय आघूर्ण के परिकलन में L-S युग्मन से प्राप्त रूजल सोंडर्स की –
μ =
g[J(J+1)]1/2
का उपयोग किया जाता है। इस समीकरण में समीकरण –
g = [1 + J(J+1) + S(S+1) –
L(L+1)]/2J(J+1)
से g का मान रखने पर निम्नलिखित समीकरण प्राप्त होगी –
μ =
[3/2 + S(S+1) – L(L+1)/2J(J+1)][J(J+1)]1/2
उपर्युक्त सूत्र के आधार पर हम किसी भी लैन्थेनाइड आयन के लिए चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कर सकते है।
उदाहरण
: Ce3+ और Pr3+ के लिए S ,
L और J के मान निम्न है। इन मानों को समीकरण में रखकर गणना करने पर इन आयनों के चुम्बकीय आघूर्ण के मान परिकलित किये जा सकते है। हुंड ने इन मानों का सब लेंथेनाइडो के लिए परिकलन किया ,
उदाहरण :
|
आयन |
S |
L |
J |
μ |
|
Ce3+ |
½ |
3 |
5/2 |
2.54 BM |
|
Pr3+ |
1 |
5 |
4 |
3.58 BM |
हुन्ड ने लेंथेनाइडो के लिए चुम्बकीय और कक्षीय गति को ध्यान में रखकर चुम्बकीय आघूर्ण के जो मान परिकलित किये वे प्रायोगिक मानों से दो अपवादों को छोड़कर काफी समानता रखते है। ये दो अपवाद है Sm3+ और Eu3+ ,
इनके लिए हुन्ड द्वारा परिकलित मान प्रायोगिक न्यूनतम मानों से भी न्यून आते है।
Eu3+ के लिए तो हुंड ने शून्य मान ही परिकलित किया। हुंड ने यह माना कि रुजल सोंडर्स के S-L युग्मन प्रभाव को पूरी श्रेणी में समान रूप से लागू किया जा सकता है। वैन लेक और फ्रैंक ने हुन्ड के सिद्धान्त पर एक द्वितीय कोटि का संशोधन किया जिससे मल्टीप्लेट अवस्थाओं को पृथक होने का अवसर मिल सकता है। इस प्रकार के संशोधन से उन्होंने जो मान प्राप्त किये वे प्रायोगिक मानों से बहुत अधिक समानता रखते है। लैंथेनाइडो के विभिन्न मानों को सारणी में दिया जा रहा है। इन मानों से हम स्पष्ट रूप से देख सकते है कि लैंथेनाइडो में इलेक्ट्रॉनों की कक्षीय गति और घूर्णन गति दोनों ही इनके चुम्बकीय आघूर्ण के लिए उत्तरदायी है तथा दोनों को ध्यान में रखकर इनके चुम्बकीय आघूर्ण को परिकलित किया जाए तो वे प्रायोगिक मानों के एकदम समान आते है।
|
तत्व |
परमाणु संख्या |
Ln3+ का विन्यास |
अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या |
चुम्बकीय आघूर्ण μB (प्रेक्षित) |
हुंड |
वैन लेक |
|
La |
57 |
4f0 |
0 |
0.00 |
0.00 |
0.00 |
|
Ce |
58 |
4f1 |
1 |
2.39 |
2.54 |
2.56 |
|
Pr |
59 |
4f2 |
2 |
3.60 |
3.58 |
3.62 |
|
Nd |
60 |
4f3 |
3 |
3.62 |
3.62 |
3.68 |
|
Pm |
61 |
4f4 |
4 |
– |
2.68 |
2.83 |
|
Sm |
62 |
4f5 |
5 |
1.54 |
0.84 |
1.60 |
|
Eu |
63 |
4f6 |
6 |
3.61 |
0.00 |
3.45 |
|
Gd |
64 |
4f7 |
7 |
8.2 |
7.94 |
7.94 |
|
Tb |
65 |
4f8 |
6 |
9.6 |
9.7 |
9.7 |
|
Dy |
66 |
4f9 |
5 |
10.5 |
10.6 |
10.6 |
|
Ho |
67 |
4f10 |
4 |
10.5 |
10.6 |
10.6 |
|
Er |
68 |
4f11 |
3 |
9.5 |
9.6 |
9.6 |
|
Tm |
69 |
4f12 |
2 |
7.2 |
7.6 |
7.6 |
|
Yb |
70 |
4f13 |
1 |
4.4 |
4.5 |
4.5 |
|
Lu |
71 |
4f14 |
0 |
– |
0.0 |
0.0 |
दण्ड चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण Magnetic moment of bar magnetic in
hindi
Magnetic
moment of bar magnetic in hindi दण्ड चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण : हमने चुम्बकीय द्विध्रुव के बारे में अध्ययन करते समय यह पढ़ा था की जब किसी दंड चुंबक को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तो यह एक द्विध्रुव की भांति व्यवहार करता है तथा इस पर एक बल आघूर्ण कार्य करता है।
अब हम यहाँ अध्ययन करते है की दण्ड चुम्बक के कारण कितना चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न होता है इसके लिए सूत्र क्या होता है।
दण्ड चुम्बक का चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण उसी चुम्बक की ध्रुव प्रबलता (m) तथा इसकी प्रभावी लम्बाई के गुणनफल के बराबर होता है।
माना एक दंड चुंबक है जिसके ध्रुव की प्रबलता का मान m है तथा प्रभावी लम्बाई 2L है तो
चुम्बकीय द्विध्रुव (M) = m x 2L
अब हम बात करते है की जब चुम्बक को तोडा जाए तो इसकी चुंबकीय आघूर्ण पर क्या प्रभाव पड़ता है इसका अध्ययन करते है।
1. जब किसी दण्ड चुम्बक को इसकी लम्बाई के लंबवत दो भागो में काटा जाता है या तोडा जाता है तो दोनों टुकड़ो की ध्रुव प्रबलता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात पूर्व के समान ही रहती है , लेकिन प्रभावी लम्बाई का मान पहले के तुलना में आधी रह जाती है अतः चुम्बकीय आघूर्ण
M1 = m x L
अतः
M1 = M /2
2. जब किसी दण्ड चुम्बक को इसकी अक्ष के अनुदिश दो समान पार्ट्स में काटा जाए या तोडा जाए तो , दोनों भागों के ध्रुव की प्रबलता पहले की आधी रह जाती है , इस स्थिति में प्रभावी लम्बाई पहले के समान बनी रहती है अतः चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण
M2 = ( m/2 ) x 2L
M2 = m x L
अतः
M2 = M/2
3. जब एक 2L लम्बाई की दण्ड चुम्बक को मोड़कर r त्रिज्या की वृताकार रूप दे दिया जाए तो इसकी चुंबकीय आघूर्ण पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? आइये देखते है
M3 = m x 2r
हम जानते है की अर्द्ध वृत्त की परिधि का सूत्र πr होता है जो की इसकी लम्बाई के बराबर होगा अतः
πr = 2L
यहाँ से r = 2L / π
यह मान ऊपर M3 में रखने पर
M3 = 2M/π
कक्षीय इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण (Magnetic moment of orbital
moment ) : हम जानते है किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते रहते है , चूँकि ये गतिशील है इसलिए चक्कर लगा रहे है और हम यह भी जानते है की गतिशील इलेक्ट्रॉन धारा प्रवाह का कारण होता है अतः इलेक्ट्रॉन का नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाना धारा प्रवाह के समान होता है इसलिए परमाणु की प्रत्येक कक्षा चुम्बकीय द्विध्रुव की तरह व्यवहार करती है
चुंबकीय आघूर्ण
M = NIA
चूँकि यहाँ N = 1 तथा A = Πr2
तथा
धारा I = e/T
मान M के सूत्र में रखने पर
M = Πr2e/T
चुम्बकीय क्षेत्र की
तीव्रता , दण्ड
चुम्बक के
अक्ष
, निरक्ष पर
चुम्बकीय क्षेत्र Intensity of magnetic field
Intensity of magnetic field in hindi चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता : जब एक एकांक परिक्षण उत्तरी ध्रुव को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो इस एकांक उत्तरी ध्रुव द्वारा किसी बिंदु पर महसूस किये जाने वाले बल को ही चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता कहते है।
अर्थात किसी बिंदु पर जितना बल इस एकांक परिक्षण ध्रुव पर लगता है उसे ही उस बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता कहते है।
यह एक सदिश राशि है तथा इसका SI मात्रक टेसला या N/Am है।
दण्ड चुम्बक के अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (Magnetic field at axial point of bar magnet )
माना एक दंड चुम्बक है जिसकी ध्रुव प्रबलता m है तथा इस चुम्बक की प्रभावी लम्बाई 2L है , इसकी अक्षीय स्थिति पर इससे d दुरी पर कोई बिंदु P स्थित है , इस बिंदु P पर हमें चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता की गणना करनी है तथा इसके लिए सूत्र की स्थापना करनी है।
चुम्बक के उत्तरी ध्रुव N कारण बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता
ठीक इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव S के कारण P बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता
चूँकि दोनों ध्रुव प्रकृति में विपरीत है अतः इनके द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा भी विपरीत होगी , अतः दोनों के कारण एक साथ उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता
यहां M को दण्ड चुम्बक का आघूर्ण कहते है , M
= m x 2L
माना 2L की तुलना में d का मान अत्यधिक हो इस स्थिति में
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की दण्ड चुम्बक के कारण अक्षीय स्थिति में उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता की दिशा वही होती है जो चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण की होती है।
दण्ड चुम्बक के निरक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic field at equilateral point of bar magnet )
माना एक दंड चुम्बक है जिसकी ध्रुव प्रबलता का मान m है तथा प्रभावी लंबाई का मान 2L है।
इस चुंबक के निरक्ष पर d दुरी पर कोई बिंदु P स्थित है जिस पर हमें चुम्बकीय क्षेत्र की गणना करनी है।
दोनों ध्रुवों S-N से P बिन्दु की दुरी समान है , माना यह r है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
P बिंदु पर चुंबक के उत्तरी ध्रुव के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता
इसकी दिशा NP की तरफ होगी।
इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव के कारण P बिन्दु पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता
इसकी दिशा PS की तरफ होगी।
B1 तथा B2 चुम्बकीय क्षेत्र का परिणामी क्षेत्र ज्ञात करने के लिए दोनों में समान्तर चतुर्भुज नियम लगाने पर
चूँकि यहाँ B1 = B2 है अतः
यहाँ इसकी दिशा चुम्बक के अक्ष के समांतर तथा उत्तर से दक्षिण ध्रुव की तरफ है
अगर 2L की तुलना में d दुरी अत्यधिक हो तो l को नगण्य माना जा सकता है
चुम्बकीय क्षेत्र में
दण्ड
चुम्बक पर
बल
आघूर्ण या
चुम्बकीय द्विध्रुव तथा
घुमाने में
किया
गया
कार्य
एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में दण्ड चुम्बक पर बल आघूर्ण या चुम्बकीय द्विध्रुव तथा घुमाने में किया गया कार्य (Torque on a magnetic dipole in a uniform field and potential energy ) : माना किसी चुम्बकीय क्षेत्र B में एक दण्ड चुम्बक ab रखी हुई है , इस चुम्बक के ध्रुव की प्रबलता m है तथा प्रभावी लम्बाई का मान 2L है। इसके अलावा दण्ड चुम्बक तथा चुम्बकीय क्षेत्र के मध्य कोण θ है जैसा चित्र में दिखाया गया है
चुम्बकीय क्षेत्र में रखे इस दंड चुम्बक के उत्तरी ध्रुव पर एक बल
mB कार्य करेगा जिसकी दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में है।
इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव पर भी इतना ही बल mB कार्य करता है लेकिन इसकी दिशा चुम्बकीय क्षेत्र के विपरीत दिशा में होगी।
ये दोनों बल मिलकर एक बलयुग्म का निर्माण करते है।
इस बल युग्म का बल आघूर्ण (T) = बल x बलों की क्रियारेखा के मध्य लम्बवत दूरी
T = mB x bn
यहाँ bn = 2lsinθ
T = mB 2LBsinθ
चूँकि हम जानते है की चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण M = m2L
अतः
T = MBsinθ
कुछ विशेष स्थिति
1. जब θ = 0 है तो sinθ = 0 अत: T = 0 होगा
इस स्थिति को स्थायी संतुलन की अवस्था कहते है।
2. जब θ = 90 है तो sin90 = 1 अत: T = MB होगा
इस स्थिति में बल आघूर्ण का मान सबसे अधिक होता है।
चुम्बकीय क्षेत्र में चुम्बकीय द्विध्रुव को घुमाने में किया गया कार्य (work done in
rotating a magnetic dipole in a magnetic field)
हमने ऊपर ज्ञात किया है की कोई चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण θ कोण पर किसी चुम्बकीय क्षेत्र B में रखा हुआ है तो इस द्विध्रुव पर एक बलयुग्म कार्य करता है जिसका आघूर्ण
T =
MBsinθ
माना हमें इस चुम्बक को dθ विक्षेपित करनी है तो इसमें किया गया कार्य
dW = Tdθ
इसी प्रकार θ1 से θ2 स्थिति तक चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण को घुमाने में कृत कार्य
भू
चुम्बकत्व की
परिभाषा क्या
है
, पृथ्वी के
चुम्बकत्व की
पुष्टि Magnetic field of earth in hindi
Magnetic field of earth and
earth’s magnetism in hindi भू चुम्बकत्व की परिभाषा क्या है , पृथ्वी के चुम्बकत्व की पुष्टि भू चुंबकत्व किसे कहते हैं ?
परिभाषा :
वैज्ञानिकों द्वारा किये गए कई प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकाला गया की पृथ्वी भी एक चुम्बक की तरह व्यवहार करती है , ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी के गर्भ में कोई चुम्बक रखी गयी और इस चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव भौगोलिक उत्तर दिशा में हो तथा उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण दिशा में हो। पृथ्वी के इस चुंबकत्व को ही भू (पृथ्वी) चुम्बकत्व कहते है।
पृथ्वी के चुम्बकीय व्यवहार की पुष्टि निम्न प्रयोगों से हुई है
1. स्वतन्त्रता पूर्वक लटकी हुई चुम्बकीय सुई सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है : जब चुम्बकीय सुई को किसी धागे से इस प्रकार स्वतंत्रता पूर्वक लटकाया जाए की यह घूम सके तो चुम्बक सुई का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक उत्तर दिशा में तथा दक्षिणी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण दिशा में ठहरता है। इससे यह सिद्ध होता है की पृथ्वी में दक्षिण से उत्तर की तरफ कोई चुम्बकीय क्षेत्र उपस्थित है।
2. पृथ्वी में गाडी गयी लोहे की छड का चुम्बक बन जाना : जब किसी लोहे की छड को पृथ्वी में उत्तर दक्षिण दिशा में गाड़ा जाता है तो यह लोहे की छड कुछ समय बाद चुम्बक की भांति व्यवहार करती है , यह चुम्बकीय गुण कहा से आया ? , ऐसा तभी संभव है जब पृथ्वी एक शक्तिशाली चुम्बक हो और लोहे की छड जब इसके संपर्क में आती है तो इसमें कुछ चुम्बकीय गुण आ जाते है।
3. दण्ड चुम्बक के लिए बल रेखाएं खीचने पर उदासीन बिन्दु का प्राप्त होना : जब किसी दण्ड चुम्बक को इस प्रकार रखा जाए की इसका उत्तरी ध्रुव भोगोलिक उत्तर की तरफ हो , इस स्थिति में चुम्बक की चुम्बकीय बल रेखाएं खीचने पर निरक्ष बिन्दु पर दोनों तरफ उदासीन बिन्दु प्राप्त होता है।
इसी प्रकार यदि चुम्बक को इस प्रकार रखा जाए की चुंबक का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण की तरफ हो तो इस स्थिति में चुम्बकीय रेखायें खींचने पर अक्षीय बिन्दु पर दोनों तरफ उदासीन बिंदु प्राप्त होता है।
ऐसा तभी संभव है जब पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र , चुम्बक के चुम्बकीय क्षेत्र को उदासीन कर दे और उदासीन बिन्दु प्राप्त हो।
4. स्वतंत्रता पूर्वक लटकायी गयी चुम्बकीय सुई भिन्न भिन्न स्थानों पर अलग व्यवहार करती है , ऐसा इसलिए हो सकता है की पृथ्वी का भू चुम्बकत्व अलग अलग स्थानों पर अलग अलग होताहै।
पर्थिव चुम्बकत्व या भू-चुम्बकत्व– जब किसी चुम्बकीय सूई को स्वतंत्रतापूर्वक उसके गुरूत्व केन्द्र से लटकाया जाता है, तो वह हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थिर होता है। इस तरह से चुम्बकीय सूई को एक निश्चित दिशा में स्थिर होना, पृथ्वी की सतह पर चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति को बताता है। पृथ्वी के चुम्बकीय बल क्षेत्र के अध्ययन से पता चलता है कि पृथ्वी का आचरण एक विशाल चुम्बक जैसा है, जिसका चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण ध्रुव की ओर और चुम्बकीय दक्षिणी ध्रुव भौगोलिक उत्तरी ध्रुव की ओर होता है। मुक्त रूप से निलंबित सुई को यदि पृथ्वी पर उत्तर से दक्षिण की ओर ले जाया जाए तो ऐसे दो स्थान मिलते है, जहाँ सूई की दिशा उर्ध्वाधर हो जाता है। इन दो स्थानों में एक स्थान पर उर्ध्वाधर सूई का उत्तरी ध्रुव पृथ्वी की ओर हो जाता है। इस स्थान को पृथ्वी का चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव कहते हैं। दूसरे स्थान पर ऊर्ध्वाधर सूई का दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी की ओर हो जाता है। इस स्थान को पृथ्वी का चुम्बकीय दक्षिणी ध्रुव कहते है। पृथ्वी के केन्द्र से होकर एक सरल रेखा की कल्पना करें, तो पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों से गुजरती है। इस सरल रेखा को पृथ्वी का चुम्बकीय अक्ष कहते है। पृथ्वी के भौगोलिक अक्ष एवं चुम्बकीय अक्ष के बीच का कोण लगभग 17 होता है। अतः पृथ्वी के भौगोलिक तथा चुम्बकीय ध्रुव एक-दूसरे से अलग होते है।
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को तीन तत्वों द्वारा व्यक्त किया जाता है- दिक्पात् कोण, नमन कोण तथा चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक।
– दिकपात कोण- किसी स्थान पर भौगोलिक याम्योत्तर तथा चुम्बकीय याम्योत्तर के बीच के कोण को दिकपात कोण कहते है।
नोट- किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर वह ऊर्ध्वाधर समतल है, जो पृथ्वी के चुम्बकीय अक्ष से गुजरता है और भौगोलिक याम्योत्तर वह ऊर्ध्वाधर समतल है, जो पृथ्वी के भौगोलिक अक्ष से गुजरता है।
– नमन कोण- किसी स्थान पर पृथ्वी का सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र क्षैतिज तल के साथ जितना कोण बनाता है, उसे उस स्थान का नमन कोण कहते हैं। पृथ्वी के ध्रुव पर नमन कोण का मान 90° तथा विषुवत रेखा पर 00 होता है।
– चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक – पृथ्वी के सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (भ्) अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग होता है। परन्तु इसका औसत मान लगभग 0.4 गॉस या 0.4 ग 104 टेसला माना जाता है।
भू
चुम्बकत्व , पृथ्वी के
चुम्बकत्व का
कारण
Cause (reason) of earth’s magnetism
Cause
of earth’s magnetism in hindi भू चुम्बकत्व , पृथ्वी के चुम्बकत्व का कारण
: हमने यह भू चुम्बकत्व के बारे में अध्ययन कर चुके है की पृथ्वी भी एक चुम्बक की तरह व्यवहार करती है। पर ऐसा क्यों होता है अर्थात पृथ्वी चुम्बक के भांति व्यवहार क्यों करती है इसके बारे में यहाँ अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी के चुम्बकत्व के बारे में पता लगाने के लिए विभिन्न वैज्ञानिको में अध्ययन करके अपने अपने मत रखे और इसके अलग अलग कारण बताएं
1. जर्मनी के वैज्ञानिक एलसेसर ने भू चुम्बकत्व का कारण यह बताया की पृथ्वी के अन्दर इसके केंद्र क्रोड़ में अनेको चालक पदार्थ पिघली हुई अवस्था में रहते है जिनमे लोहा तथा निकल अधिक है। पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन से इसके अर्ध द्रव क्रोड़ में धीमी संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती है , जिससे पृथ्वी में स्व-उत्तेजित जनित्र (जनरेटर) की क्रियाएं होने लगती है जिससे पृथ्वी में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है और इस धारा के कारण चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
2. भू चुम्बकत्व के सन्दर्भ में यह मत भी है की वायुमंडल में गैसे आयनित अवस्था में रहती है , सूर्य से आने वाली उच्च उर्जा की किरणें वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर परमाणुओं से टक्कर करके उन्हें आयनित कर देती है , इसी प्रकार वायुमंडल की रडियो एक्टिव व कोस्मिक किरणें भी गैसों का आयनीकरण कर देती है।
पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है , आयनित कणों के कारण पृथ्वी के घूर्णन से विद्युत धाराएँ उत्पन्न हो जाती है और इस धारा से चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
3. ग्रोवर (वैज्ञानिक) ने पृथ्वी के चुम्बकत्व के सम्बन्ध में अपना मत रखा और कहा पृथ्वी की सतह के बाहर धाराएँ बहती है , ये धाराएँ सूर्य के कारण उत्पन्न होती है।
भौगोलिक निरक्ष के पास के स्थानों से गर्म हवा ऊपर उठती है तथा उत्तरी व दक्षिणी गोलार्धो की तरफ जाती है और जाते हुए विधुन्मय हो जाती है।
इन धाराओ के कारण पृथ्वी की बाहरी सतह पर उपस्थित लोह चुम्बकीय पदार्थ चुम्बकित हो जाते है।
वर्तमान समय में भी पृथ्वी के चुम्बकीय प्रभाव का पता लगाने के लिए विभिन्न उपग्रह छोड़े गए पर अभी तक पृथ्वी के चुम्बकत्व का वास्तविक कारण पता नही लग पाया है , अभी तक प्रतावित सभी मतों से इसका इसका सही कारण पता नहीं लग पाया है।
भू
चुम्बकत्व , पृथ्वी के
चुम्बकीय क्षेत्र के
अवयव
, दिक्पात का ,
नमन
, नति
कोण
, क्षैतिज घटक
elements of earth’s magnetism in hindi भू चुम्बकत्व , पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के अवयव , दिक्पात का , नमन , नति कोण , क्षैतिज घटक ( ) : किसी भी स्थान पर भू चुम्बकत्व अर्थात पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का पूर्ण अध्य्यन करने के लिए कुछ राशियों का उपयोग किया जाता है , इन राशियों को ही भू चुम्बकत्व (पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र) के अवयव कहते है।
भू चुम्बकत्व (पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र) के निम्न तीन अवयव है
1. दिक्पात का कोण
2. नमन या नति कोण
3. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक
1. दिक्पात का कोण (angle of declination)
किसी भी स्थान पर स्वतंत्रता पूर्वक लटके हुए चुम्बक की अक्ष से गुजरने वाले उर्ध्वाधर तल को चुम्बकीय याम्योत्तर कहा जाता है , ठीक इसी तरह किसी स्थान पर पृथ्वी के भौगोलिक अक्ष से गुजरने वाले उर्ध्वाधर तल को भौगोलिक याम्योत्तर कहते है।
किसी भी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर तथा भौगोलिक याम्योत्तर के मध्य जो न्यून कोण बनता है , इस न्यून कोण को उस स्थान पर दिक्पात का कोण कहते है , इसे ϴ से दर्शाया जाता है।
2. नमन या नति कोण (angle of dip )
जब किसी चुम्बकीय सुई को स्वतंत्रता पूर्वक इस प्रकार लटकाया जाए की यह ऊर्ध्वाधर में स्वतंत्रता पूर्वक गति कर सके तो जब सुई स्थिर अवस्था में आती है तो हम सुई को क्षैतिज में कुछ झुकी हुई पाते है ,चुम्बकीय सुई की अक्ष जिस कोण से क्षैतिज के साथ झुकी रहती है इस कोण को नमन या नति कोण कहते है , इसे θ से व्यक्त किया जाता है।
3. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (horizontal component of
earth’s magnetic field )
भूमध्य तथा ध्रुवों के अतिरिक्त पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र क्षैतिज के साथ θ नमन या नति कोण बनाता है , इसको दो घटको में विभक्त किया जा सकता है
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक
H = B.cosθ
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का उर्ध्वाधर घटक
V = B.sin θ
दोनों समीकरणों से
V/H = B.sin θ/B.cosθ
V = H.tanθ
चुम्बकत्व में
गाउस
का नियम क्या है , सूत्र gauss’s law in magnetism in hindi
gauss’s law in magnetism in hindi चुम्बकत्व में गाउस का नियम क्या है , सूत्र : हम जानते है की चुम्बक में दो ध्रुव पाए जाते है तथा इन दोनों ध्रुवों को अलग नहीं किया जा सकता अर्थात किसी एक ध्रुव का अस्तित्व संभव नहीं है तथा धारावाही लूप या चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकत्व का सबसे छोटा रूप माना जाता है यही कारण है की चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं सतत तथा बंद वक्र के रूप में होती है।
चित्रानुसार माना एक बंद लूप है जिसका क्षेत्रफल S है , हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की बंद पृष्ठ (S) से बाहर निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या , बंद पृष्ठ(S) में प्रवेश करने वाली चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या के बराबर होगी।
अर्थात पृष्ठ में जितनी बल रेखाएं प्रवेश करती है उतनी बल रेखाएं बाहर निकलती है।
यदि प्रवेश करने वाली बल रेखाओ को धनात्मक चिह्न के साथ लिखे तथा बाहर निकलने वाली बल रेखाओ को ऋणात्मक चिह्न के साथ लिखे तो
प्रवेश करने वाली बल रेखायें = बाहर निकलने वाली बल रेखायें
अर्थात
प्रवेश करने वाली बल रेखायें – बाहर निकलने वाली बल रेखायें = 0
अतः हम कह सकते है की नेट क्षेत्र रेखाओं की संख्या शून्य होगी इसे चुम्बकत्व के सम्बन्ध में गाउस का नियम कहते है।
अर्थात
अतः चुम्बकत्व के सन्दर्भ में गाउस के नियमानुसार ” किसी भी बन्द पृष्ठ से गुजरने वाला नेट चुम्बकीय फ्लक्स शून्य होता है। “
पदार्थों का
चुम्बकीय क्षेत्र में
व्यवहार Behaviour of substances in magnetic field
Behaviour of substances in magnetic field in hindi पदार्थों का चुम्बकीय क्षेत्र में व्यवहार : हम पढ़ चुके है की एक धारावाही परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह एक दण्ड चुम्बक की तरह व्यवहार करती है
पदार्थों के चुम्बकीय प्रभाव के सन्दर्भ में फैराडे ने बताया की जब भिन्न भिन्न पदार्थों को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो इनका व्यवहार भिन्न भिन्न होता है , इसको समझाने के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया
जैसा की हमने ऊपर बताया की धारावाही परिनालिका में धारा प्रवाहित करने पर यह एक चुंबक की भांति व्यवहार करती है
चित्रानुसार फैराडे ने एक परिनालिका ली और इसमें विद्युत धारा प्रवाहित की , जैसे ही इसमें धारा प्रवाहित होने लगी इसके भीतर एक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो गया
चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होने के बाद फैराडे ने अलग अलग पदार्थ इसके पास लाये तो उन्होंने पाया की
1. लोहा , कोबाल्ट जैसे कई पदार्थ ऐसे थे जो परिनालिका के भीतर उपस्थित प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र की तरफ आकर्षित होकर गति करने लगे
2. एलुमियम जैसे कई पदार्थ दुर्बल बल से चुम्बकीय क्षेत्र से आकर्षित होते है
3. जिंक , सोना जैसे कई पदार्थ ऐसे भी थे जो प्रबल चुंबकीय क्षेत्र से आकर्षित नहीं होते , बल्कि ऐसे पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित भी हो सकते है
उपरोक्त प्रयोग से फैराडे ने यह बताया की चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में अलग अलग पदार्थों का व्यवहार अलग अलग हो सकता है , इसी प्रयोग के आधार पर फैराडे ने पदार्थों को तीन भागों में विभक्त किया
1. लोहचुम्बकीय – जो चुम्बकीय क्षेत्र से आकर्षित होते है
2. अनुचुम्बकीय – जो चुंबकीय क्षेत्र से कम आकर्षित होते है
3. प्रतिचुम्बकीय – जो पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित होते है
चुम्बकन की
तीव्रता , क्षेत्र , चुम्बकीय प्रवृति , पारगम्यता की
परिभाषा , सूत्र
, विमा
magnetic susceptibility in hindi
यहाँ हम चुम्बकत्व (
magnetic susceptibility in hindi , चुम्बकन की तीव्रता , क्षेत्र , चुम्बकीय प्रवृति , पारगम्यता की परिभाषा , सूत्र , विमा) से सम्बधित कुछ परिभाषाओं के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे तथा इनके सूत्र , विमा इत्यादि को भी पढेंगे।
1. चुम्बकन की तीव्रता (Intensity of magnetism)
हम जानते है की जब किसी पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो वह पदार्थ चुम्बकित होने लगता है अत: ” किसी भी पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखकर अधिकतम कितना चुम्बकित किया जा सकता है उस अधिकतम सीमा को चुम्बकन की तीव्रता कहते है “
इसको इस प्रकार से भी परिभाषित किया जा सकता है ” किसी भी पदार्थ के एकांक आयतन में उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण को ही चुम्बकन की तीव्रता कहते है “
माना चुम्बकीय आघूर्ण M है तथा पदार्थ का आयतन V है तो परिभाषा से
चुम्बकन की तीव्रता (I) = चुम्बकीय आघूर्ण/आयतन
I = M/V
इसका मात्रक A/m होता है तथा विमा [M0L-1T0A1] होती है , यह एक सदिश राशि भी है
2. चुम्बकन क्षेत्र H (Magnetizing field)
जब किसी चुम्बकीय पदार्थ को किसी क्षेत्र में चुम्बकन के लिए रखा जाता है तो उस क्षेत्र को चुम्बकन क्षेत्र कहते है , अर्थात वह क्षेत्र जिसमे किसी चुम्बकीय पदार्थ को रखने पर वह चुंबकीय पदार्थ चुम्बकित हो जाता है उस क्षेत्र को चुम्बकन क्षेत्र कहते है
, इसे H से प्रदर्शित किया जाता है
गणितीय रूप में चुम्बकन क्षेत्र की तीव्रता (B0) तथा निर्वात की पारगम्यता (μ0) के अनुपात को चुम्बकन क्षेत्र कहते है
H = B0/μ0
यह एक सदिश राशि भी है , इसका मात्रक A/m होता है
3. चुम्बकीय प्रवृति (magnetic susceptibility)
किसी भी पदार्थ का वह गुण जो यह बताता है की जब उस पदार्थ को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जायेगा तो वह कितनी आसानी से चुम्बकित हो जायेगा , पदार्थ के इस गुण को चुम्बकीय प्रवृति कहते है इसे जाई (x) से प्रदर्शित किया जाता है
अत: किसी पदार्थ के चुम्बकन की तीव्रता I , चुम्बकीय क्षेत्र H के समानुपाती होता है
I ∝ H
I = x. H
यहाँ X चुम्बकीय प्रवृति है
अत:
x = I/H
अत: हम कह सकते है की चुम्बकन की तीव्रता I तथा चुम्बकीय क्षेत्र H के अनुपात को ही चुम्बकीय प्रवृति (X) कहा जाता है
4. चुम्बकीय पारगम्यता (magnetic permeability)
चुम्बकीय बल रेखाएं जिस अधिकतम सीमा या कोटि तक किसी पदार्थ में प्रवेश कर पाती है उस अधिकतम सीमा के मान को उस चुम्बकीय पदार्थ की चुंबकीय पारगम्यता कहते है
इसको μ से दर्शाया जाता है।
इसको निम्न प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है
” चुम्बकीय प्रेरण B तथा चुंबकीय क्षेत्र H के अनुपात को चुम्बकीय पारगम्यता कहते है”
μ = B/H
इसका SI मात्रक TmA-1 होता है।
चुम्बकीय प्रवृत्ति
किसी पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति से यह समझा जाता है कि वह पदार्थ कितनी सुगमता से कितना अधिक चुम्बकत्व ग्रहण करता है। यदि चुम्बकन क्षेत्र
अर्थात पदार्थ की चुम्बकित करने वाले बल का मान भ् हो और वह पदार्थ में चुम्बकन तीव्रता प् उत्पन्न कर सकें, तो चुम्बकीय प्रवृत्ति-
= ज्ञ (नियतांक)
यहाँ c को काई पढ़ा जाता है। ज्ञ (नियतांक) को पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते है। अतः एकांक चुम्बकन-क्षेत्र के कारण किसी पदार्थ मे जो चुम्बकन-तीव्रता उत्पन्न होती है, उसे उस पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं।
चुम्बकीय पदार्थ : चुम्बकीय पदार्थों का
वर्गीकरण या
प्रकार magnetic material in hindi , types
classification or types of
magnetic material in hindi चुम्बकीय पदार्थ चुम्बकीय पदार्थों का वर्गीकरण या प्रकार
परिभाषा :
फैराडे के परिनालिका वाले प्रयोग को हम विस्तार से पढ़ चुके है जिसमे उन्होंने धारावाही परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित करके एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न किया और पाया की कुछ पदार्थ इस क्षेत्र से आकर्षित होते है , कुछ प्रतिकर्षित तथा कुछ पदार्थों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता
इस प्रयोग के आधार पर फैराडे ने पदार्थों को तीन भागों में वर्गीकृत किया
1. प्रतिचुम्बकीय पदार्थ
2. लोह चुंबकीय पदार्थ
3. अनु चुम्बकीय पदार्थ
यहाँ हम इन तीनों की परिभाषा पढ़ते है , आगे इनको विस्तार से पढेंगे
1. प्रतिचुम्बकीय पदार्थ (Diamagnetic substances)
वे पदार्थ जो अधिक चुम्बकीय क्षेत्र से कम चुंबकीय क्षेत्र की ओर गति करते है तथा इनकी उपस्थिति से चुम्बकीय क्षेत्र का मान कम हो जाता है
2. अनु चुम्बकीय पदार्थ (Paramagnetic substance )
वे पदार्थ जो कम चुम्बकीय क्षेत्र से अधिक चुम्बकीय क्षेत्र की ओर थोड़े से गति करते है , इनकी उपस्थिति से चुंबकीय क्षेत्र का मान कुछ बढ़ जाता है
3. लोह चुंबकीय पदार्थ (Ferromagnetic substances )
वे पदार्थ जो कम चुंबकीय क्षेत्र से अधिक चुंबकीय क्षेत्र की ओर शीघ्रता से गति करते है , इनकी उपस्थिति से चुंबकीय क्षेत्र का मान काफी अधिक बढ़ जाता है
चुम्बकीय पदार्थ के प्रकार
सभी पदार्थो मे थोड़ बहुत चुम्बकीय गुण पाया जाता है, क्योंकि प्रयोग से यह देखा गया है कि जब पदार्थों को शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उन पर कुछ न कुछ अंश तक चुम्बकीय प्रभाव अवश्य ही पड़ता है। इस प्रभाव के आधार पर पदार्थ को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है
– अनुचुम्बकीय– कुछ पदार्थ ऐसे है, जिन्हें चुम्बकीय क्षेत्र में लटका देने पर विक्षेप की दिशा समानान्तर हो जाती है। इन पदार्थों के अन्दर प्रेरित चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बाह्य आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में ही होती है। इस श्रेणी के पदार्थों की चम्बकशीलता m और चम्बकीय प्रवृत्ति ज्ञ का मान बहुत कम होता है। ऐसे पदार्थो को जब समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो हवा की अपेक्षा पदार्थ से होकर अधिक बल रेखाएँ गुजरती है। इन पदार्थो के उदाहरण है- प्लैटिनम, क्रोमियम, सोडियम, पोटाशियम, ऑक्सीजन, ऐल्युमिनियम आदि।
– लौह-चुम्बकीय– उन पदार्थों को लौह-चुम्बकीय कहते हैं, जो चुम्बकों द्वारा आकर्षित होते है तथा जिन्हें चुम्बकित भी किया जा सकता है। वास्तव में ये पदार्थ अनुचुम्बकीय ही है, लेकिन इनमें अनुचुम्बकीय पदार्थो के गुण इतने अधिक परिमाण में पाए जाते हैं कि इन्हें एक अलग श्रेणी में रखा जाता है। लौह चुम्बकीय पदार्थों के लिए m एवं ज्ञ का मान बहुत अधिक होता है। लौह चुम्बकत्व उन्हीं पदार्थों में पाया जाता है, जिनकी बनावट विशेष प्रकार से क्रिस्टलीय होती है। द्रव और गैस की कोई विशेष बनावट नहीं होती, इसीलिए वे कभी लौह-चुम्बकीय नहीं होते हैं। इस श्रेणी में तीन तत्व लोहा, कोबाल्ट और निकेल तथा उनके मिश्रधातु आते है।
– प्रतिचुम्बकीय– कुछ पदार्थ ऐसे भी है, जिन्हें चुम्बकीय क्षेत्र में लटका देने पर वे क्षेत्र के समकोणिक दिशा में आ जाते हैं। इस श्रेणी के पदार्थो की चुम्बकशीलता m का मान बहुत कम और चुम्बकीय प्रवृत्ति ज्ञ का मान ऋणात्मक होता है, ऐसे पदार्थो को जब समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो हवा की अपेक्षा पदार्थ से होकर कम बल रेखाएँ गुजरती हैं। बिस्मथ, एण्टीमनी, चाँदी, ताँबा, जिंक, सोना, सीसा, जल, अल्कोहल, हवा, हाइड्रोजन आदि इस श्रेणी के पदार्थ है।
प्रतिचुम्बकीय पदार्थ , प्रतिचुम्बकत्व की
परिभाषा क्या
है
, उदाहरण , व्याख्या , गुण
Diamagnetic substances in hindi
Diamagnetic substances in
hindi प्रतिचुम्बकीय पदार्थ की परिभाषा क्या है , उदाहरण , व्याख्या
diamagnetism meaning in hindi प्रतिचुम्बकत्व किसे कहते है ?
परिभाषा:
जब इन पदार्थों को असमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तो ये पदार्थ अधिक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र से कम चुंबकीय क्षेत्र की ओर गति करते है
दूसरे शब्दों में कहे तो
इन पदार्थों की उपस्थिति से चुम्बकीय क्षेत्र का मान कम हो जाता है
अत: हम इनको निम्न प्रकार परिभाषित कर सकते है ” वे पदार्थ जो अधिक चुम्बकीय क्षेत्र से कम चुंबकीय क्षेत्र की ओर गति करते है तथा जिनकी उपस्थिति से चुंबकीय क्षेत्र का मान कम हो जाता है उन पदार्थों को प्रतिचुम्बकीय पदार्थ कहते है “
उदाहरण : सोना , चांदी , ताम्बा आदि
प्रतिचुम्बकीय पदार्थों की व्याख्या
वे पदार्थ यह गुण दर्शाते है जिनमे इलेक्ट्रान युग्मित अवस्था में पाए जाते है इस इलेक्ट्रॉनों के युग्म में दोनों इलेक्ट्रोनो का चक्रण एक दूसरे के विपरीत दिशा में है जिससे दोनों इलेक्ट्रॉन आपस में एक दूसरे के चुम्बकीय आघूर्ण को नष्ट कर देते है जिससे परिणामी आघूर्ण का मान शून्य होता है।
जब इलेक्ट्रान किसी वृताकार कक्षा में उपस्थित है तथा इसे बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में इस प्रकार रखा जाए की चुंबकीय क्षेत्र इस वृताकार कक्षा के तल के लम्बवत हो , इस दशा में युग्म के कारण उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण का मान एक दूसरे को नष्ट नहीं करता है जिससे पदार्थ कुछ चुम्बकित हो जाती है।
प्रति चुंबकीय पदार्थ के गुण
1. जब किसी प्रतिचुंबकीय पदार्थ की छड को चुम्बक के ध्रुवों N-S के मध्य रखा जाता है तो प्रतिचुम्बकीय पदार्थ अपने गुण के कारण स्वत: चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत स्थापित हो जाता है।
2. जब एक प्रति चुम्बकीय पदार्थ के घोल को नली में भरकर इसके एक सिरे को चुम्बकीय क्षेत्र में रखते है तो जिस तल पर चुम्बकीय क्षेत्र आरोपित किया गया है उसका तल गिर जाता है।
3. प्रति चुम्बकीय पदार्थ को असमान चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर यह अधिक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र से कम क्षेत्र की ओर गति करने लगता है।
जब प्रतिचुम्बकीय पदार्थ को किसी प्याली में रखकर दो पास पास रखी चुम्बको के मध्य रखते है तो यह कुछ दब जाता है तथा दूर दूर रखी चुम्बको के मध्य रखने पर यह कुछ ऊपर उठ जाता है क्यूंकि चुम्बकीय क्षेत्र का मान दोनों चुम्बको के मध्य अधिक होता है।
4. इनकी चुम्बकित होने की प्रवृति ऋणात्मक होती है।
पदार्थों में चुम्बकत्व का कारण निम्नलिखित होता है –
परमाणु के रुढ़ यांत्रिकी के अनुसार परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन दो प्रकार की गति करते है –
1.
कक्षीय गति : प्रत्येक इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर उपस्थित कक्षों में वृत्ताकार गति करते है। अत: उनकी तुलना एक वृत्ताकार तार में बहती हुई विद्युत धारा से की जा सकती है जिसके परिणामस्वरूप उस क्षेत्र में एक चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार से उत्पन्न चुम्बकीय आघूर्ण को हम कक्षीय चुम्बकीय आघूर्ण या कक्षीय आघूर्ण कहते है।
2.
चक्रण गति : प्रत्येक इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर गति करने के साथ साथ अपने अक्ष पर भी चक्रण करता है। बिल्कुल उसी भाँती जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने के साथ साथ अपनी धुरी पर भी घुमती रहती है। इलेक्ट्रॉनों के इस प्रकार के चक्रण के फलस्वरूप भी कुछ चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न होता है जिसे चक्रण चुम्बकीय आघूर्ण या चक्रण आघूर्ण भी कहा जाता है।
इस प्रकार इन दोनों प्रकार के चुम्बकीय आघूर्ण के कारण प्रत्येक परमाणु एक छोटे चुम्बक की भाँती व्यवहार करता है।
जब किसी चुम्बक को दो चुम्बकीय ध्रुवों के मध्य रखा जाता है या यदि किसी चुम्बक को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए या किसी चुम्बक पर यदि बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र लगा दिया जाए तो दोनों के चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर अंतर्क्रिया करेंगे।
चूँकि पदार्थ के परमाणु छोटे चुम्बक की भांति व्यवहार करते है , अत: यदि किसी पदार्थ पर बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र लगा दिया जाए तो पदार्थ अपने अक्षीय आघूर्ण और चक्रण आघूर्ण के कारण उस चुम्बकीय क्षेत्र के साथ अंतर्क्रिया करेगा।
चुम्बकीय व्यवहार के प्रकार
संक्रमण धातु संकुलों को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर ये भिन्न भिन्न प्रकार का व्यवहार दर्शाते है। किस प्रकार के यौगिक कैसा व्यवहार दर्शाते है , इसका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार है –
1.
प्रतिचुम्बकत्व (diamagnetism) :
यदि किसी पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर उस क्षेत्र की तीव्रता निर्वात की तुलना में कम हो जाए तो ऐसा पदार्थ प्रतिचुंबकीय और पदार्थ के इस गुण को प्रतिचुम्बकत्व कहते है। ऐसे पदार्थ से चुम्बकीय चुम्बकीय बल रेखाएँ दूर होने लगती है अत: ऐसा पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित होने लगता है , इसी कारण से यदि ऐसे पदार्थ की एक छड को चुम्बकीय क्षेत्र में मुक्त अवस्था में लटकाया जाए तो वह चुम्बकीय क्षेत्र से लम्बवत दिशा में व्यवस्थित होने लगती है।
यदि किसी कक्षक में दो युग्मित इलेक्ट्रॉन हो तो उनका चक्रण विपरीत दिशा में होता है
(+1/2 , -1/2) अत: ऐसी स्थिति में एक इलेक्ट्रॉन द्वारा उत्पन्न किया हुआ चुम्बकीय आघूर्ण दूसरे इलेक्ट्रॉन द्वारा उत्पन्न किये गए चुम्बकीय आघूर्ण को उदासीन कर देता है क्योंकि दोनों इलेक्ट्रॉनों द्वारा उत्पन्न किये हुए चुम्बकीय आघूर्ण एकदम समान और विपरीत होते है फलस्वरूप ऐसे यौगिकों का परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण का मान शून्य होता है एवं ऐसे पदार्थ प्रतिचुम्बकीय व्यवहार प्रदर्शित करते है।
प्रतिचुम्बकत्व का गुण प्रत्येक पदार्थ में पाया जाता है क्योंकि यह युग्मित इलेक्ट्रॉन का गुण है तथा युग्मित इलेक्ट्रॉन प्रत्येक पदार्थ में होते है लेकिन यह प्रदर्शित केवल उन कार्यों में होता है जिनमे केवल युग्मित इलेक्ट्रॉन हो क्योंकि जिनमे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भी होंगे उनमे अनुचुम्बकत्व भी होगा। अनुचुम्बकत्व और प्रतिचुम्बकत्व दो विपरीत दिशा में कार्य करने वाले गुण है तथा अनुचुम्बकत्व की तुलना में प्रतिचुम्बकत्व सदैव ही बहुत दुर्बल होता है , स्वाभाविक है कि ऐसी दिशा में अनुचुम्बकत्व की उपस्थिति में पदार्थ में प्रतिचुम्बकत्व प्रदर्शित नहीं होगा।
प्रतिचुम्बकत्व का गुण ताप और चुम्बकीय क्षेत्र की शक्ति (H) पर निर्भर नहीं करता है। यह पदार्थ के इकाई आयतन की चुम्बकीय प्रवृत्ति काई (χ =
I/H) पर निर्भर करता है , जहाँ I इकाई आयतन का चुम्बकीय आघूर्ण है।
अनुचुम्बकीय पदार्थ , अनुचुम्बकत्व की
परिभाषा क्या
है
, गुण
, उदाहरण तथा
व्याख्या Paramagnetic substances in hindi
Paramagnetic substances in hindi अनुचुम्बकीय पदार्थ की परिभाषा क्या है , अनुचुम्बकत्व गुण , उदाहरण तथा व्याख्या , paramagnetism in hindi किसे कहते है ?
परिभाषा : इन पदार्थों को जब चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो ये कम चुंबकीय क्षेत्र से अधिक चुंबकीय क्षेत्र की ओर कम गति से गति करते है अर्थात ये पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र से कम आकर्षित रहते है।
इन पदार्थो की उपस्थिति से चुंबकीय क्षेत्र का मान कुछ बढ़ जाता है।
परिभाषा : वे पदार्थ जो कम से ज्यादा चुम्बकीय क्षेत्र की ओर गति करते तथा जिनकी उपस्थिति से चुंबकीय क्षेत्र का मान कम हो जाता है , उन पदार्थों को अनुचुम्बकीय पदार्थ कहते है।
उदाहरण : एलुमिनियम , सोडियम , ऑक्सीजन आदि।
अनु चुंबकीय पदार्थ की व्याख्या
अनुचुम्बकीय प्रभाव वे पदार्थ दर्शाते है जिनके परमाणु या अणु में उपस्थित इलेक्ट्रान सम संख्या में नहीं होते है , अत: युग्म बनाने के बाद भी कुछ इलेक्ट्रान शेष रह जाते है , ये शेष इलेक्ट्रॉन एक दिशा में चक्रण करते है , जिससे एक परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न हो जाता है।
साधारणतया: बाह्य चुंबकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में सभी परमाणु अनियमित रूप से अभिविन्यासित रहते है जिससे परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण शून्य रहता है जिससे पदार्थ चुम्बकत्व का गुण नहीं दर्शाते है।
लेकिन बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में ये सभी परमाणु एक निश्चित दिशा में अभिविन्यासित हो जाते है जिससे परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न हो जाता है जिससे पदार्थ चुम्बकित हो जाता है।
नोट : पदार्थ का चुम्बकीय क्षेत्र तथा बाह्य चुंबकीय क्षेत्र आपस में मिलकर कुछ चुंबकीय क्षेत्र के मान को बढ़ा देते है जैसा हमने परिभाषा में पढ़ा था।
अनुचुम्बकीय पदार्थों के गुण
1. जब दो चुम्बक के बीच अनुचुम्बकीय पदार्थ की छड को रखा जाता है तो यह पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र के समान्तर हो जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
2. जब एक U आकार की नली में अनुचुंबकीय पदार्थ का तरल भरकर इसके एक सिरे पर चुम्बक रखी जाती है तो जिस सिरे पर चुम्बक रखी जाती है उसका तल ऊपर उठ जाता है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
3. चित्रानुसार जब अनु चुंबकीय पदार्थ को कटोरी में लेकर दो चुम्बको के मध्य रखा जाता है तो यह बीच में से कुछ ऊपर की ओर उठ जाता है ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि अनु चुंबकीय पदार्थ कम चुम्बकीय क्षेत्र से अधिक चुम्बकीय क्षेत्र की ओर जाते है और क्यूंकि चुम्बक के ध्रुवों के मध्य में चुंबकीय क्षेत्र का मान अधिक होता है।
4. अनु चुंबकीय पदार्थ की चुंबकीय प्रवृति धनात्मक होती है लेकिन इसका मान अत्यधिक कम होता है।
अनुचुम्बकत्व (paramagnetism)
वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर चुम्बकीय बल रेखाओं को अपने में से शून्य की तुलना में अधिक गुजरने दे अर्थात जो चुम्बकीय बल रेखाओं को अपनी ओर आकर्षित करते हो ऐसे पदार्थ अनुचुम्बकीय पदार्थ और पदार्थो के इस गुण को अनुचुम्बकत्व कहते है। अत: एक अनुचुम्बकीय पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होता है तथा यदि ऐसे पदार्थ की एक छड को मुक्त अवस्था में दो चुम्बकीय ध्रुवों के बीच में लटका दिया जाए तो वह दोनों ध्रुवों के मध्य में व्यवस्थित होने का प्रयास करेगी।
जिन पदार्थो में एक अथवा अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते है उनमें उन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन द्वारा उत्पन्न किया हुआ चुम्बकीय आघूर्ण उदासीन नहीं हो पाता जिससे इनमे कुछ स्थायी और निश्चित मात्रा में चुम्बकीय आघूर्ण पाया जाता है। ऐसे पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र में प्रतिकर्षित नहीं होते वरन आकर्षित होते है अर्थात अनुचुम्बकीय व्यवहार प्रदर्शित करते है।
अनुचुम्बकीय अणु स्वयं को एक आदर्श स्थिति में अभिविन्यासित करने के लिए मुक्त होते है। इन अणुओं पर दो प्रकार के विपरीत बल कार्य करते है –
(i) चुम्बकीय क्षेत्र , H जो अणुओं को अपनी दिशा में व्यवस्थित करने का प्रयास करता है और
(ii) उष्मीय ऊर्जा kT , जो अणुओं को बेतरतीब करने का प्रयत्न करती है। कम ताप पर चुम्बकीय क्षेत्र प्रभावी हो जाता है अर्थात अणुओं का अनुचुम्बकत्व ताप और चुम्बकीय क्षेत्र दोनों के द्वारा प्रभावित होता है।
लोह
चुम्बकीय पदार्थ की
परिभाषा क्या
है
, गुण
, व्याख्या , उदाहरण ferromagnetic substances in hindi
ferromagnetic substances in hindi लोह चुम्बकीय पदार्थ की परिभाषा क्या है , गुण , व्याख्या , उदाहरण : ऐसे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र से आकर्षित होते है तथा जिनकी उपस्थिति से चुंबकीय क्षेत्र का मान बहुत अधिक बढ़ जाता है उनको लौह चुम्बकीय पदार्थ कहते है।
इन पदार्थों को जब असमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो ये कम चुंबकीय क्षेत्र से अधिक चुंबकीय क्षेत्र की तरफ शीघ्रता से गति करते है।
जब इन पदार्थों को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो ये पदार्थ प्रबल रूप से चुम्बकित हो जाते है।
उदाहरण : लोहा , निकल , मैग्नेटाइड आदि।
लोह चुम्बकीय पदार्थों की व्याख्या
इस प्रकार के पदार्थों के परमाणुओं या अणुओ में इलेक्ट्रॉन युग्म के अन्दर कम तथा एकल इलेक्ट्रॉन बहुत अधिक पाए जाते है , इन एकल इलेक्ट्रॉनों का चक्रण एक ही दिशा में होता है जिससे पदार्थ में चुम्बकीय आधूर्ण काफी अधिक उत्पन्न हो जाता है।
अतः पदार्थ का हर परमाणु एक चुम्बक बन जाता है , इस पदार्थ के परमाणु आपस में अन्योन्य क्रिया करते है जिससे परमाणु प्रभावी क्षेत्र उत्पन्न करते है और इनको डोमेन कहा जाता है।
इन डोमेनो की व्यवस्था इस प्रकार होती है की बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में सभी डोमेन अनियमित रूप से अभिविन्यासित रहते है जिससे ये एक दूसरे के चुंबकीय आघूर्ण को नष्ट कर देते है जिससे सम्पूर्ण पदार्थ का चुम्बकीय आघूर्ण शून्य प्राप्त होता है।
लेकिन बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में सभी डोमेन एक निश्चित दिशा में अर्थात चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में व्यवस्थित हो जाते है जिससे पदार्थ का चुम्बकीय आघूर्ण काफी अधिक प्राप्त होता है।
बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र हटाने पर डोमेन पुन: अपनी अवस्था में आ जाते है अत: हम कह सकते है की यह उत्क्रमणीय होती है।
लौह चुम्बकीय पदार्थों के गुण
1. लोह चुंबकीय पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र से आकर्षित होते है।
2. अनु चुम्बकीय पदार्थ के सभी गुण लोह चुम्बकीय पदार्थ में पाए जाते है और ये अधिक प्रबलता के साथ पाए जाते है अर्थात जैसे अनु चुम्बकीय पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र से आकर्षित होते है उसी प्रकार लोह चुम्बकीय पदार्थ भी चुम्बकीय क्षेत्र से आकर्षित होते है लेकिन लोह चुम्बकीय पदार्थ अधिक प्रबलता के साथ आकर्षित होते है।
क्यूरी नियम
तथा
क्युरी ताप
की
परिभाषा क्या
है
curie’s law , curie temperature in hindi क्यूरी ताप किसे कहते हैं
curie’s law and curie
temperature in hindi क्यूरी नियम तथा क्युरी ताप की परिभाषा क्या है , क्यूरी ताप किसे कहते हैं ?
परिभाषा :
हम अध्ययन कर चुके है की जब किसी पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो यह कितनी सरलता से चुम्बकित हो जाता है इसे चुम्बकीय प्रवृति कहते है।
क्यूरी ने प्रयोग किये और पदार्थों के वर्गीकरण के अनुसार उन पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृति ताप के प्रभाव के बारे में बताया।
उन्होंने बताया की प्रतिचुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृति ताप से अप्रभावित रहती है अर्थात प्रति चुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृति ताप पर निर्भर नहीं करती है।
अनुचुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृति (X) , इसके परम ताप (T) के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
X ∝ 1/T
समानुपाती चिन्ह हटाने पर
X = C/T
दो वैज्ञानिकों क्यूरी व वाइस ने मिलकर लोह चुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृति समझाने के लिए एक नियम दिया जिसे क्यूरी-वाइस नियम कहते है , उन्होंने अपने इस नियम में कहा की ” परम ताप T पर चुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृति का मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है ”
TC को लौह चुम्बकीय पदार्थ का क्यूरी ताप कहते है।
क्यूरी ताप
जब लौह चुम्बकीय पदार्थ को गरम किया जाता है तो ऊष्मा के कारण लौह चुम्बकीय पदार्थ में पाए जाने वाले डोमेन संरचना नष्ट होने लगती है , अगर ताप को और अधिक बढाया जाए तो डोमेन पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते है तथा पदार्थ अनुचुम्बकीय पदार्थ बन जाते है।
अब यदि ताप को हटा लिया जाये और पदार्थ को ठंडा किया जाए तो पदार्थ पुन: लौह चुम्बकीय पदार्थ बन जाता है अर्थात इसमें पुन: अपने गुण वापस आ जाते है।
अत: हम क्यूरी ताप की परिभाषा निम्न प्रकार दे सकते है ” वह ताप जिस पर कोई लौह चुम्बकीय पदार्थ पूर्ण रूप से अनुचुम्बकीय पदार्थ बन जाता है उस ताप को क्यूरी ताप कहते है “
क्यूरी ताप– जब किसी लौह-चुम्बकीय पदार्थ को गर्म किया जाता है, तो उसकी चुम्बकीय प्रवृत्ति ज्ञ परत ताप ज् के व्युत्क्रमानुपाती होती है, अर्थात इसे क्यूरी का नियम कहते हैं। ताप बढ़ने से ज्ञ का मान घटता है। ताप बढ़ाते जाने पर एक ऐसा ताप आता है, जिस पर यह लौह चुम्बकीय पदार्थ अनुचुम्बकीय पदार्थ बन जाता है। इस ताप को क्यूरी ताप कहते हैं। क्यूरी ताप से ऊपर लौह-चुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति उस ताप का व्युत्क्रपाती होता है, जितना ताप क्यूरी बिन्दु से ऊपर रहता है। कोबाल्ट, निकेल और लोहा के क्यूरी बिन्दु क्रमशः लगभग 373 K, 673 K और 973 K है।
चुम्बकीय शैथिल्य वक्र
क्या
है
, निग्राहिता , धारणशीलता की
परिभाषा Magnetic Hysteresis curve in hindi
Magnetic Hysteresis curve in hindi चुम्बकीय शैथिल्य वक्र क्या है : हम अध्ययन कर चुके है की जब एक धारावाही परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर उसके अन्दर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , माना धारावाही परिनालिका में n फेरे लिपटे हुए है तथा I धारा प्रवाहित हो रही है तो परिनालिका में अक्ष के अनुदिश चुम्बकीय क्षेत्र B = nI होगा।
परिनालिका के भीतर एक लोह चुम्बकीय पदार्थ रखते है जो की चुम्बकीय क्षेत्र के कारण चुम्बकित हो जाता है। अब धीरे धीरे धारा के मान को परिवर्तित करते है तथा दिशा परिवर्तित करते है तथा इससे चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन होता है इस परिवर्तन से चुम्बकीय तीव्रता में क्या परिवर्तन होता है इसके लिए हम ग्राफ खीचकर अध्ययन करेंगे।
चुम्बकीय क्षेत्र B तथा चुंबकीय तीव्रता H के मध्य खिंचा गया ग्राफ ही B-H वक्र या चुम्बकीय शैथिल्य वक्र कहते है।
जब धारा I का मान बढाया जाता है तो चुम्बकीय तीव्रता H का मान बढ़ता है जिससे पदार्थ में चुम्बकत्व B का मान भी बढ़ता है यह ग्राफ सीधी रेखा में न आकार कुछ टेढ़ा प्राप्त होता है जिसे चित्र में डैश लाइन (—) से प्रदर्शित किया गया है , बिन्दु a पर जाकर इसका मान अधिकतम हो जाता है।
अब धारा धीरे धीरे कम करने पर तीव्रता कम होती जाती है लेकिन लोह चुम्बकीय पदार्थ में चुम्बकत्व बना रहता है इसलिए यह कुछ बना रहता है अब चुम्बकीय क्षेत्र शून्य पर भी पदार्थ में चुम्बकन का मान कुछ मान बना रहता है इससे हमें b बिन्दु प्राप्त होता है।
अब हम दिशा को परिवर्तित कर देते है।
अब उल्टे दिशा में धारा का मान बढ़ाते है जिससे चुम्बकीय क्षेत्र का मान बढ़ता है जिससे वस्तु पर चुम्बकत्व का मान घटता जाता है , H के एक निश्चित मान के लिए चुम्बकत्व का मान शून्य हो जाता है जिसे बिन्दु c प्राप्त होता है।
अभी भी धारा का मान बढ़ाने पर भी चुम्बकीय क्षेत्र बढ़ता है जिससे पदार्थ चुम्बकित होता है बिन्दु d पर चुम्बकन का मान अधिकतम हो जाता है।
अब धारा धीरे धीरे घटाने पर चुंबकीय क्षेत्र कम होता जाता है लेकिन पदार्थ पर चुम्बकत्व का मान लगभग बना रहता है , चुम्बकीय क्षेत्र शून्य की उपस्थिति में भी पदार्थ चुम्बकित रहता है जिससे हमें e बिन्दु प्राप्त होता है।
अब धारा का मान पुन: बदलने पर धारा का मान बढ़ाने पर हमें चुम्बकीय तीव्रता के किसी मान पर पदार्थ पर शून्य चुम्बकत्व प्राप्त होता है जिससे बिन्दु f मिलता है।
अत: शैथिल्य वक्र abcdefa प्राप्त होता है।
कुछ परिभाषाएं :
निग्राहिता
: जब चुम्बकीय क्षेत्र को हटाया जाता है तथा विपरीत दिशा में बढाया जाता है तो चुम्बकीय क्षेत्र के एक निश्चित मान पर चुम्बकत्व का मान शून्य हो जाता है , चुम्बकीय क्षेत्र के इस मान को ही निग्रहिता कहते है।
धारणशीलता : चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से हटाने या शून्य करने के बाद भी पदार्थ में चुम्बकत्व का गुण बना रहता है इस गुण को धारणशीलता कहते है।
शैथिल्य हास
क्या
है
Hysteresis loss in hindi
Hysteresis
loss in hindi शैथिल्य हास क्या है : हम सब लोह चुम्बकीय पदार्थ के चुंबकन तथा विचुम्बकन के बारे में पढ़ चुके है और इसके लिए ग्राफ भी बनाया था जिसे हमने शैथिल्य वक्र कहा था।
जब प्राप्त शैथिल्य ग्राफ द्वारा घेरा गया क्षेत्रफल अधिक प्राप्त होता है तो ऊर्जा का हास् भी अधिक होता है इसी प्रकार जब क्षेत्रफल कम होता है तो ऊर्जा हास कम होता है।
यहाँ दो पदार्थों के लिए प्राप्त शैथिल्य ग्राफ को दर्शाया गया है , जिसमे पहले शैथिल्य ग्राफ का क्षेत्रफल अधिक है अत: यहाँ ऊर्जा का हास् भी अधिक होता है , दूसरे शैथिल्य ग्राफ में क्षेत्रफल कम है अत: इस स्थिति में ऊर्जा हास कम होता है।
जब लौह चुम्बकीय पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है जिससे यह चुम्बकित होने लगता है , चुंबकन की दशा में पदार्थ द्वारा ऊर्जा ग्रहण की जाती है ठीक इसी प्रकार जब लोह चुम्बकीय पदार्थ को विचुम्बकित किया जाता है तो ऊर्जा बाहर निकलती है।
पदार्थ को जितनी ऊर्जा चुम्बकित करने के लिए दी जाती है उतनी ऊर्जा विचुंबकन के समय बाहर नही निकलती अत: यहाँ उर्जा का हास् होता है जिसे शैथिल्य हास कहते है।







































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