अध्याय - 1
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
राष्ट्रवाद क्या है ?
🔹 अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना को राष्ट्रवाद कहते हैं ।
राष्ट्र क्या है ?
🔹 अरनेस्ट रेनर ( ERNEST RENER ) के अनुसार समान भाषा नस्ल धर्म से बने क्षेत्र को राष्ट्र कहते हैं ।
🔹 एक राष्ट्र लंबे प्रयासों त्यागो और निष्ठा का चरम बिंदु होता है ।
✴️ 18 वीं सदी में कई देश जैसे जर्मनी , इटली तथा स्विटजरलैंड आदि उस रूप में नहीं थे जैसा कि आज हम इन्हें देखते हैं । ये छोटे - छोटे राज्यों में विभाजित थे जिनका अपना एक स्वतंत्र शासक था ।
1804 की नेपोलियन संहिता :-
🔹 इसे 1804 में लागू किया गया । इसने जन्म पर आधारित विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया । इसने न केवल न्याय के समक्ष समानता स्थापित की बल्कि सम्पत्ति के अधिकार को भी सुरक्षित किया ।
वियना कांग्रेस :-
🔹
1815 में ब्रिटेन , प्रशा , रूस और ऑस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियों ( जिन्होंने मिलकर नेपोलियन को हराया था ) के प्रतिनिधि यूरोप के लिए एक समझौता तैयार करने के लिए वियना में इकट्ठा हुए जिसकी अध्यक्षता आस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की ।
नेपोलियन कौन था ?
🔹 नेपोलियन ( 15 AUG 1769 ) एक महान सम्राट था जिसने अपने व्यक्तित्व एवं कार्यों से पूरे यूरोप के इतिहास को प्रभावित किया ।
🔹 अपनी योग्यता के बल पर 24 वर्ष की आयु में ही सेनापति बन गया ।
🔹 उसने कई युद्धों में फ्रांसीसी सेना को जीत दिलाई और अपार लोकप्रियता हासिल कर ली फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और फ्रांस का शासक बन गया ।
उदारवाद :-
🔹 यानि Liberalism शब्द लातिनी भाषा के मूल शब्द liber पर आधारित है । जिसका अर्थ है स्वतंत्रता । नए मध्यम वर्ग के लिए उदारवाद का अभिप्राय था व्यक्ति के लिए आज़ादी व कानून के समक्ष समानता ।
रूढ़िवाद :-
🔹 एक ऐसा राजनीतिक दर्शन जो पंरपरा , स्थापित संस्थानों , पौराणिक परंपराओं और रिवाजों पर बल देता है ।
कुलीन वर्ग :- ये जमीन के मालिक थे । यह यूरोपीय महाद्वीप का सबसे शक्तिशाली वर्ग था ।
निरंकुशवाद :-
🔹 एक ऐसी सरकार या शासन व्यवस्था जिसकी सत्ता पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होता ।
जनमत संग्रह :-
🔹 एक प्रत्यक्ष मतदान जिसके द्वारा एक क्षेत्र की सारी जनता से किसी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए पूछा जाता है ।
यूटोपिया ( कल्पनादर्श ) :-
🔹 एक ऐसे समाज की कल्पना जो इतना आदर्श है कि उसका साकार होना लगभग असंभव होता है ।
रूमानीवाद :-
🔹 एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन जो एक खास तरह की राष्ट्रीय भावना का विकास करना चाहता था ।
नारीवाद स्त्री :-
🔹 पुरूष को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक समानता की सोच के आधार पर महिलाओं के अधिकारों और हितों का बोध नारीवाद है ।
जुंकर्स :- प्रशा की एक सामाजिक श्रेणी का नाम जिसमें बड़े - बड़े ज़मींदार शामिल थे ।
यूरोप में राष्ट्रवाद :-
🔹 यूरोप में राष्ट्रवादी चेतना की शुरुआत फ्रांस से होती है
1789 की फ्रांसीसी क्रांति :-
🔹1789
की फ्रांसीसी क्रांति राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति थी । इसने फ्रांस में राजतंत्र समाप्त कर प्रभुसत्ता फ्रांसीसी नागरिकों को सौंपी । इस क्रांति से पहले फ्रांस एक ऐसा राज्य था जिसके संपूर्ण भू - भाग पर एक निरंकुश राजा का शासन था ।
सामूहिक पहचान बनाने के लिए उठाये गए कदम :-
🔹1. प्रत्येक राज्य से एक स्टेट जनरल चुना गया और उसका नाम बदलकर नेशनल असेंबली कर दिया गया ।
🔹 2. फ्रेंच भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया गया ।
🔹 3. एक प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई जिससे सबको समान कानून का अनुभव हो ।
🔹 4. आंतरिक आयात निर्यात , सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया और भार तथा माफ की एक समान व्यवस्था लागू की गई ।
🔹 स्कूल और कॉलेज की छात्राओं द्वारा भी समर्थन के रूप में क्लब का गठन किया गया जिनका नाम दिया गया जैकोबिन क्लब ।
🔹फ्रांस की आर्मी ने समर्थन के तौर पर हर विदेशी क्षेत्र में भेज दिए गए जिससे राष्ट्रवादी भावना और बढ़ती चली गई ।
नेपोलियन का शासन काल :-
🔹 जब नेपोलियन फ्रांस पर अपना शासन चलाना शुरू किया तो उन्होंने प्रजातंत्र को हटाकर उन्हें राजतंत्र को स्थापित कर दिया ।
✴️ नागरिक संहिता या नेपोलियन की संहिता 1804
🔹 कानून के समक्ष सबको बराबर रखा गया ।
🔹 संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया ।
🔹 भू - दासत्व और जागीरदारी शुल्क से मुक्ति दिलाई ।
जागीरदारी :- इसके तहत किसानों जमींदारों और उद्योगपतियों द्वारा तैयार समान का कुछ हिस्सा कर के रूप में सरकार को देना पड़ता था ।
🔹 नेपोलियन के समय ही व्यापार आवागमन एवं संचार में बहुत ज्यादा विकास हुआ ।
🔹 राष्ट्रीयवादी विचार को बांटने के लिए उन्होंने कुछ क्षेत्रों में कब्जा कर लिया और कर को बढ़ाना और जबरन भर्ती जैसे अनेक कानून व्यवस्था स्थापित कर दिया ।
यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण :-
🔹 किसी भी राष्ट्र के निर्माण के लिए एक सामूहिक पहचान , संस्कृति परंपरा आदि का समान होना जरूरी है ।
🔹यूरोप में अलग - अलग समाज था ।
🔹 जैसे : - हैब्सबर्ग साम्राज्य में लोग जर्मन , अंग्रेजी , फ्रेंच , इटली आदि अलग - अलग भाषाएं बोलते ।
यूरोपीय समाज की संरचना ( 19 शताब्दी के पहले )
🔹 यूरोपियन समाज असमान रूप से दो भागों में विभाजित था।
🔹 1. उच्च वर्ग ( कुलीन वर्ग )
🔹 2. निम्न वर्ग ( कृषक वर्ग )
उच्च वर्ग कुलीन वर्ग :-
🔹कम जनसंख्या ।
🔹 उच्च वर्ग तथा वर्चस्व जमाने वाला ।
🔹 जमींदार यानी ढेर सारे खेतों के मालिक ।
🔹 सभी अधिकार दिए जाते थे ।
निम्न वर्ग कृषक वर्ग :-
🔹 अधिक जनसंख्या ।
🔹 निम्न वर्ग
🔹 जमीन हीन यानी या तो जमीन न थी या तो किराए पर रहते थे ।
🔹 किसी भी प्रकार के अधिकार नहीं दिए जाते थे ।
✴️ यानी यूरोपियन समाज असमान रूप से विभाजित ।
✴️ उन्नीसवीं सदी के बाद एक नया वर्ग जुड़ गया वह था नया मध्यवर्ग ।
नया मध्यवर्ग :-
🔹 इसमें सभी पढ़े - लिखे लोग थे जैसे शिक्षक , डॉ , उद्योगपति , व्यापारी आदि ।
🔹 पढ़े - लिखे होने के नाते उन्होंने एक समान कानून की मांग की यानी उदारवादी राष्ट्रवाद ।
उदारवादी राष्ट्रवाद :-
🔹 व्यक्तिगत स्वतंत्रता
🔹 कानून के समक्ष सब एक समान
🔹 सरकार का पक्षधर
🔹 बाजार की स्वतंत्रता
🔹 इस उदारवादी राष्ट्रवाद के चलते राष्ट्रवाद का विचार सब जगह फैलने लगा ।
🔹इसी वजह से 1789 में फ्रांस की क्रांति हुई ।
🔹 इससे एक राज्य के अंदर जो भी नियंत्रण ( चीजों तथा पूंजी के आगमन पर ) था उसे खत्म कर दिया गया लेकिन अलग - अलग राज्यों के बीच के नियंत्रण यानी सीमा शुल्क को खत्म नहीं कर पाया ।
🔹
इसके लिए एक संगठन बनाया गया जिसका नाम था " जॉलबेराइन
" ( zollverein )
👉 जितने भी शुल्क अवरोध थे उसे समाप्त कर दिया गया ।
👉 मुद्राओं की संख्या दो कर दी , इससे पहले 30 से ज्यादा थी
🔹 नेपोलियन के समय केवल पुरुष जिनके पास धन है वही वोट दे सकते थे ।
जॉलवेराइन :-
🔹 यह एक जर्मन शुल्क संघ था जिसमें अधिकांश जर्मन राज्य शामिल थे । यह संघ 1834 में प्रशा की पहल पर स्थापित हुआ था । इसमें विभिन्न राज्यों के बीच शुल्क अवरोधों को समाप्त कर दिया गया और मुद्राओं की संख्या दो कर दी गइ । जो पहले बीस से भी अधिक थीं यह संघ जर्मनी के आर्थिक एकीकरण का प्रतीक था ।
रूढ़ीवाद ( 1815 के बाद नया रूढ़िवादी )
🔹
1815 में नेपोलियन को हरा दिया गया इसके लिए ऑस्ट्रिया , प्रशा , रूस , ब्रिटेन ने मिलकर काम किया ( वाटर लू की लड़ाई में )
🔹 इसके बाद यूरोपीय सरकार पारंपरिक संस्थाएं और परिवार को बनाए रखना चाहते थे ।
🔹
इसके लिए उन्होंने नेपोलियन के समय जितने भी बदलाव हुए थे उन सब को खत्म कर दिया गया जिसके लिए एक समझौता किया गया जिसका नाम था वियना समझौता या वियना संधि ।
संधि के तहत मुख्य 3 निर्णय लिया गया :-
🔹 पहला फ्रांस की सीमाओं पर कई राज्य कायम कर दिया गया ताकि भविष्य में फ्रांस अपना विस्तार ना कर सके ।
🔹 फ्रांसीसी क्रांति के दौरान हटाए गए बूर्वो वंश को सत्ता में बहाल किया गया।
🔹 तीसरा राजतंत्र को जारी रखा गया ।
यूरोप में क्रांतिकारियों :-
🔹 यूरोपियन सरकार के इन सारे निर्णय के विरोध में क्रांतिकारी ने जन्म लिया ।
🔹 क्रांतिकारियों ने अंदर ही अंदर कुछ खुफिया समाज का निर्माण किया ।
🔹 जिनका मुख्य मकसद ( लक्ष्य ) था ।
👉
राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना ।
👉 वियना संधि की विरोध करना ।
👉 स्वतंत्रता के लिए लड़ना ।
ज्युसेपी मेसिनी एक क्रांतिकारी :-
🔹 इटली का एक महान क्रांतिकारी जिसने “ यंग इटली ' नामक आंदोलन चलाया और जिसके फलस्वरूप इटली में एकीकरण की भावना को बल मिला । वह राजतन्त्र के घोर विरोधी थे ।
सभी रूढ़ीवादी ज्युसेपी मेसिनी से डरते थे क्योंकि वह इटली का एकीकरण चाहते थे ।
भूख कठिनाई और जन विद्रोह :-
🔹
1830 को कठिनाइयों का महान साल भी कहा जाता है।
✴️ कारण
🔹 जबरदस्त जनसंख्या वृद्धि
🔹 लोग गांव से शहर की ओर रुख कर दिए
🔹 बेरोजगारी में वृद्धि
🔹 गरीबी में वृद्धि
🔹इसी सालों के दौरान फसल बर्बाद हो गई जिससे खाने की सामग्री की कीमत बढ़ने लगी और छोटे - छोटे फैक्ट्रियां बंद होने लगी ।
🔹 खाने पीने की कमी और व्यापक बेरोजगारी ,
✴️ इन सभी कारणों से लोगों ने सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया लोग सड़कों पर उतर आएँ जगह - जगह अवरोध लगाया गया । जिसे कृषक विद्रोह के नाम से जाना गया ।
🔹 जिससे यूरोपियन सरकार को गणतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया ।
गणतंत्र के बाद कानून में आये बदलाव :-
🔹 21 साल से अधिक उम्र के लोगों को वोट डालने का अधिकार ।
🔹 सभी नागरिकों को काम के अधिकार की गारंटी दि गई ।
🔹 रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कारखाने उपलब्ध कराए गए ।
🔹 इन सभी से धीरे - धीरे गरीबी और बेरोजगारी कम होने लगी ।
जर्मनी और इटली का निर्माण
जर्मनी का एकीकरण :-
🔹
1848 में यूरोपियन सरकार ने बहुत कोशिश किया कि वे जर्मनी का एकीकरण कर दे परंतु वह ऐसा नहीं कर पाए ।
🔹 क्योंकि , राष्ट्र निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फौज की ताकत ने मिलकर दबा दी ।
🔹 उसके बाद प्रशा ने यह भार अपने ऊपर लेते हुए कहा कि वे जर्मनी का एकीकरण करके ही रहेंगे ।
🔹 उस समय प्रशा का मुख्यमंत्री ऑटोमन बिस्मार्क था ( जनक
)
🔹 प्रशा ने एक राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व किया ।
🔹 7 वर्ष के दौरान ऑस्ट्रिया , डेनमार्क और फ्रांस से तीन युद्ध में प्रशा की जीत हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई ।
🔹 जनवरी 1871 में , वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया ।
इटली का एकीकरण :-
🔹 इटली अनेक वंशानुगत राज्य तथा बहुराष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य में बिखरा हुआ था ।
🔹 केवल एक सार्डिया पीडमॉण्ड में एक इतालवी राजघराने का शासन था ।
🔹 इटली एकीकरण के प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिए हमें तीन लोगों पर विचार करना होगा ।
👉 ज्युसेपे मेसिनी
👉 कावूर
👉 ज्युसेपे गैरीबॉल्डी
ज्यूसेपे मेत्सिनी :-
🔹 इटली का एक महान क्रांतिकारी जिसने “ यंग इटली ' नामक आंदोलन चलाया और जिसके फलस्वरूप इटली में एकीकरण की भावना को बल मिला । वह राजतन्त्र के घोर विरोधी थे ।
🔹 1831
और 1848 में क्रांतिकारी विद्रोह की असफलता से युद्ध के जरिए इतालवी राज्यों को जोड़ने की जिम्मेदारी सार्डिया - पीडमॉण्ड के शासक विक्टर इमेनुएल द्वितीय पर आ गई ।
गैरीबाल्डी :-
🔹 इटली का महान क्रांतिकारी जो मेत्सिनी का सहयोगी व समकालीन था । उसने लाल कुर्ती नामक सेना तैयार की जिसकी सहायता से उसने ऑस्ट्रिया को हराया । उसने इटली की स्वतंत्रता के लिए कई आंदोलन किए ।
कावूर :-
🔹कावूर को इटली का बिस्मार्क माना जाता है । वह इटली के सार्जीनिया राज्य का प्रधानमंत्री था । उसने सर्वप्रथम अपने राज्य को इटली में मिलाने का कार्य किया ।
ब्रिटेन ( ब्रितानी ) की एकीकरण :-
🔹 ब्रिटेन साम्राज्य में - अंग्रेज , वेल्श , स्कॉट या आयरिश जैसे ढेर सारा समाज था जिसे नृजातीय कहते थे ।
🔹 औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन की आर्थिक शक्ति बहुत ज्यादा बढ़ गई थी ।
🔹 इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच एक्ट ऑफ यूनियन से " यूनाइटेड किंग्डम आफ ग्रेट ब्रिटेन " का गठन हुआ ।
🔹 कुछ साल बाद इसके अंदर आयरलैंड को भी जोड़ दिया गया ब्रिटेन एक नया राष्ट्र का निर्माण हुआ ।
✳️ इंग्लैंड + स्कॉटलैंड + आयरलैंड = यूनाइटेड किंग्डम
✴️ राष्ट्र के निर्माण के बाद
🔹 1. राष्ट्रगान लिखी गई ।
🔹
2. अङ्ग्रेजी को मुख्य भाषा बनाया गया
🔹 3. ब्रिटेन का राष्ट्रध्वज भी बनाया गया ।
राष्ट्रीय की दृश्य कल्पना
रूपक : -
🔹
जब किसी अमूर्त विचार ( जैसे- लालच , स्वतंत्रता , ईर्ष्या , मुक्ति ) को किसी व्यक्ति या किसी चीज के जरिए इंगित किया जाता है तो रूपक कहते हैं ।
🔹 18 वीं और 19 वीं शताब्दी में रूपक का प्रयोग राष्ट्रवादी भावना के विकास और मजबूत बनाने में किया जाता था।
राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद :-
🔹 19 वीं सदी तक जो राष्ट्रवाद की भावना थी अब वह साम्राज्यवाद में बदलने लगा ।
🔹 साम्राज्यवाद : - जब कोई देश , अपने देश की शक्ति को बढ़ाता है , आर्मी और अन्य साधन का प्रयोग करके उसे साम्राज्यवाद कहते हैं ।
🔹
1871 के बाद यूरोप में गंभीर राष्ट्रवादी तनाव का स्रोत बाल्कन क्षेत्र था ।
🔹 इस क्षेत्र में भौगोलिक और जातीय भिन्नता थी ।
🔹 इसमें आधुनिक - रोमानिया , बुल्गारिया , अल्बेनिया , यूनान , क्रोएशिया बोस्निया , हर्जेगोविना , स्लोवेनिया सर्बिया और सर्बिया शामिल थे।
🔹 बाल्कन क्षेत्र में रोमानी राष्ट्रवाद के विचार फैलने और ऑटोमन साम्राज्य के विघटन से स्थिति काफी विस्फोटक हो गई ।
🔹 उस समय जितने भी बड़ी शक्तियां थी जैसी जर्मन ब्रिटेन रूस अपनी शक्तियों को बढ़ाना चाहते थे ।
🔹 बाल्कन क्षेत्र को अपने - अपने में शामिल करना चाहते थे ।
🔹 इसके लिए अनेक युद्ध हुए जिनके नतीजे कुछ भी नहीं निकला और प्रथम विश्व युद्ध हुआ जिससे राष्ट्रवाद की भावना पूरे विश्व में फैल गई ।
अध्याय - 2
भारत में राष्ट्रवाद
प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव :- युद्ध के कारण रक्षा संबंधी खर्चे में बढ़ोतरी हुई थी । इसे पूरा करने के लिए कर्जे लिये गए और टैक्स बढ़ाए गए । अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए कस्टम ड्यूटी और इनकम टैक्स को बढ़ाना पड़ा । युद्ध के वर्षों में चीजों की कीमतें बढ़ गईं । 1913 से 1918 के बीच दाम दोगुने हो गए । दाम बढ़ने से आम आदमी को अत्यधिक परेशानी हुई । ग्रामीण इलाकों से लोगों को जबरन सेना में भर्ती किए जाने से भी लोगों में बहुत गुस्सा था ।
🔹 भारत के कई भागों में उपज खराब होने के कारण भोजन की कमी हो गई । इंफ्लूएंजा की महामारी ने समस्या को और गंभीर कर दिया । 1921 की जनगणना के अनुसार , अकाल और महामारी के कारण 120 लाख से 130 लाख तक लोग मारे गए
प्रथम विश्व युद्ध द्वारा भारत में निर्मित नई आर्थिक स्थिति : -
1 . भारत में मैनचेस्टर आयात में गिरावट आई क्योंकि ब्रिटिश मिलें युद्ध उत्पादन के साथ व्यस्त थीं ताकि भारतीय मिलों को विशाल घरेलू बाजार के लिए आपूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त हो सके ।
2 . जैसे - जैसे युद्ध लंबा होता गया , भारतीय कारखानों को युद्ध की जरूरतों की आपूर्ति करने के लिए बुलाया गया । परिणामस्वरूप नए कारखाने स्थापित किए गए , नए श्रमिकों को नियुक्त किया गया और सभी को लंबे समय तक काम करने के लिए बनाया गया ।
3 . युद्ध के बाद ब्रिटेन से सूती कपड़े का उत्पादन ढह गया और नाटकीय ढंग से निर्यात में गिरावट आई , क्योंकि यह अमेरिका , जर्मनी , जापान के साथ आधुनिकीकरण और प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ था । इसलिए भारत जैसे उपनिवेशों के भीतर , स्थानीय उद्योगपतियों ने धीरे - धीरे अपनी स्थिति को घरेलू बाजार पर कब्जा कर लिया ।
सत्याग्रह का अर्थ :-
🔹 महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के रूप में जनांदोलन का एक नायाब तरीका अपनाया । यह तरीका इस सिद्धांत पर आधारित था कि यदि कोई सही मकसद के लिए लड़ रहा हो तो उसे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले से लड़ने के लिए ताकत की जरूरत नहीं होती है । गांधीजी का विश्वास था कि एक सत्याग्रही अहिंसा के द्वारा ही अपनी लड़ाई जीत सकता है ।
महात्मा गांधी और सत्याग्रह का विचार :- महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे । गांधीजी की जन आंदोलन की उपन्यास पद्धति को ' सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है । सत्याग्रह ने सत्य पर बल दिया । गांधीजी का मानना था कि यदि कारण सत्य है , यदि संघर्ष अन्याय के विरुद्ध है , तो अत्याचारी से लड़ने के लिए शारीरिक बल आवश्यक नहीं था । अहिंसा के माध्यम से एक सत्याग्रही लड़ाई जीत सकता है । उत्पीड़कों सहित लोगों को सच्चाई देखने के लिए राजी होना पड़ा । सत्य अंततः जीत के लिए बाध्य था ।
🔹 भारत में सबसे पहले 1916 में चंपारण में वृक्षारोपण
अध्याय - 3
भूमंडलीकृत विश्व का बनना
यह अध्याय वैश्वीकरण पर आधारित है ।
वैश्वीकरण :-
🔹 वैश्वीकरण एक आर्थिक प्रणाली है और यह 50 वर्षों से उभरती है।
🔹 वैश्विक दुनिया के निर्माण को समझने के लिए हमें व्यापार के इतिहास, प्रवासन और लोगों को काम की तलाश और राजधानियों की आवाजाही को समझना होगा।
पूर्व आधुनिक दुनिया :-
🔹 दुनिया के विभिन्न देश व्यापार और विचारों तथा संस्कृति के आदान प्रदान के कारण एक दूसरे से आपस में जुड़े हुए हैं । आधुनिक युग में आपसी संपर्क तेजी से बढ़ा है लेकिन सिंधु घाटी की सभ्यता के युग में भी विभिन्न देशों के बीच आपसी संपर्क हुआ करता था ।
·
मानव समाजों में लगातार अधिक अंतर है।
·
यात्रियों, व्यापारियों, पुजारी और तीर्थयात्रियों ने सामान, पैसा, विचार, कौशल, आविष्कार और यहां तक कि रोगाणु और बीमारी को ले जाने के लिए बड़ी दूरी तय की।
·
सिंधु वैली सभ्यता पश्चिम एशिया से जुड़ी हुई थी।
·
मालदीव से मुद्रा का एक रूप है।
सिल्क रूट लिंक द वर्ल्ड :-
🔹 सिल्क रूट : चीन को पश्चिमी देशों और अन्य देशों से जोड़ने वाला व्यापार मार्ग सिल्क रूट कहलाता है । उस जमाने में कई सिल्क रूट थे । सिल्क रूट ईसा युग की शुरुआत के पहले से ही अस्तित्व में था और पंद्रहवीं सदी तक बरकरार था ।
🔹 इस सिल्क रूट से होकर चीन के बर्तन दूसरे देशों तक जाते थे । इसी प्रकार यूरोप से एशिया तक सोना और चाँदी इसी सिल्क रूट से आते थे ।
🔹 सिल्क रूट के रास्ते ही ईसाई , इस्लाम और बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न भागों में पहुँच पाए थे ।
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रेशम मार्गों को दुनिया के सबसे दूर के हिस्सों को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता था।
·
क्रिश्चियन युग से पहले भी रूट्स अस्तित्व में थे और 15 वीं शताब्दी तक विकसित हुए।
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बौद्ध उपदेशक, ईसाई मिशनरियाँ और बाद में मुस्लिम उपदेशक मार्गों से यात्रा करते थे।
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रूट दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों का एक बड़ा स्रोत साबित हुआ।
भोजन की यात्रा :-
🔹 नूडल चीन की देन है जो वहाँ से दुनिया के दूसरे भागों तक पहुँचा । भारत में हम इसके देशी संस्करण सेवियों को वर्षों से इस्तेमाल करते हैं । इसी नूडल का इटैलियन रूप है स्पैगेटी ।
🔹 आज के कई आम खाद्य पदार्थ ; जैसे आलू , मिर्च टमाटर , मक्का , सोया , मूंगफली और शकरकंद यूरोप में तब आए जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिकी महाद्वीपों को खोज निकाला ।
🔹 आलू के आने से यूरोप के लोगों की जिंदगी में भारी बदलाव आए । आलू के आने के बाद ही यूरोप के लोग इस स्थिति में आ पाए कि बेहतर खाना खा सकें और अधिक दिन तक जी सकें । आयरलैंड के किसान आलू पर इतने निर्भर हो चुके थे कि 1840 के दशक के मध्य में किसी बीमारी से आलू की फसल तबाह हो गई तो कई लाख लोग भूख से मर गए । उस अकाल को आइरिस अकाल के नाम से जाना जाता है ।
विजय, रोग और व्यापार :-
🔹 सोलहवीं सदी में यूरोप के नाविकों ने एशिया और अमेरिका के देशों के लिए समुद्री मार्ग खोज लिया था । नए समुद्री मार्ग की खोज ने न सिर्फ व्यापार को फैलाने में मदद की बल्कि विश्व के अन्य भागों में यूरोप की फतह की नींव भी रखी ।
🔹 अमेरिका के पास खनिजों का अकूत भंडार था और इस महाद्वीप में अनाज भी प्रचुर मात्रा में था । अमेरिका के अनाज और खनिजों ने दुनिया के अन्य भाग के लोगों का जीवन पूरी तरह से बदल दिया ।
🔹 सोलहवीं सदी के मध्य तक पुर्तगाल और स्पेन द्वारा अमेरिकी उपनिवेशों की अहम शुरुआत हो चुकी थी । लेकिन यूरोपियन की यह जीत किसी हथियार के कारण नहीं बल्कि एक बीमारी के कारण संभव हो पाई थी । यूरोप के लोगों पर चेचक का आक्रमण पहले ही हो चुका था इसलिए उन्होंने इस बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधन क्षमता विकसित कर ली थी । लेकिन अमेरिका तब तक दुनिया के अन्य भागों से अलग थलग था इसलिए अमेरिकियों के शरीर में इस बीमारी से लड़ने के लिए प्रतिरोधन क्षमता नहीं थी । जब यूरोप के लोग वहाँ पहुँचे तो वे अपने साथ चेचक के जीवाणु भी ले गए । इस का परिणाम यह हुआ कि चेचक ने अमेरिका के कुछ भागों की पूरी आबादी साफ कर दी । इस तरह यूरोपियन आसानी से अमेरिका पर जीत हासिल कर पाए ।
🔹 उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में कई समस्याएँ थीं ; जैसे गरीबी , बीमारी और धार्मिक टकराव । धर्म के खिलाफ बोलने वाले कई लोग सजा के डर से अमेरिका भाग गए थे । उन्होंने अमेरिका में मिलने वाले अवसरों का भरपूर इस्तेमाल किया और इससे उनकी काफी तरक्की हुई ।
🔹 अठारहवीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे धनी देश हुआ करते थे । लेकिन पंद्रहवीं सदी से ही चीन ने बाहरी संपर्क पर अंकुश लगाना शुरु किया था और दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग थलग हो गया था । चीन के घटते प्रभाव और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व के व्यापार का केंद्रबिंदु यूरोप की तरफ शिफ्ट कर रहा था ।
एक विश्व अर्थव्यवस्था आकार लेती है :-
🔹 मकई कानून का उन्मूलन।
🔹 भूस्वामी समूहों के दबाव में सरकार ने खाद्यान्न के आयात को प्रतिबंधित कर दिया।
🔹 कार्ने कानूनों के खत्म हो जाने के बाद, देश में जितना उत्पादन हो सकता था, उससे अधिक सस्ते में भोजन ब्रिटेन में आयात किया जा सकता था।
🔹 ब्रिटिश किसान आयात के साथ प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ थे। भूमि के विशाल क्षेत्रों को असिंचित छोड़ दिया गया था।
🔹 जैसे ही खाद्य पदार्थों की कीमतें गिरीं, ब्रिटेन में खपत बढ़ गई।
🔹 ब्रिटेन में तेजी से औद्योगिक विकास के कारण उच्च आय और अधिक खाद्य आयात हुए।
प्रौद्योगिकी की भूमिका :-
🔹 19 वीं सदी की दुनिया जैसे रेलवे, स्टीमशिप और टेलीग्राफ के परिवर्तन पर प्रौद्योगिकी का बहुत प्रभाव पड़ा।
🔹 तकनीकी विकास अक्सर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों के परिणाम थे।
🔹 प्रशीतित जहाजों ने लंबी दूरी पर खाद्य पदार्थों को नष्ट करने में मदद की।
🔹 इसने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड से विभिन्न यूरोपीय देशों में जमे हुए मांस के लदान की सुविधा प्रदान की।
उन्नीसवीं शताब्दी (1815 से 1914) :-
🔹 उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही थी । इस अवधि में सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक और तकनीकी के क्षेत्र में बड़े जटिल बदलाव हुए । उन बदलावों की वजह से विभिन्न देशों के रिश्तों के समीकरण में अभूतपूर्व बदलाव आए ।
🔹 अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक आदान प्रदान तीन प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं :
👉 व्यापार का आदान प्रदान
👉 श्रम का आदान प्रदान
👉 पूँजी का आदान प्रदान
विश्व अर्थव्यवस्था का उदय :-
🔹 आइए इन तीनों को समझने के लिए ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर नजर डालें ।
🔹 18 वीं सदी के आखिरी दशक तक ब्रिटेन में “ कॉर्न लॉ
"
👉 इस कानून के तहत कोई भी देश अपने भोज्य पदार्थ को ब्रिटेन निर्यात नहीं कर सकता है ।
🔹 कुछ दिन बाद ब्रिटेन में जनसंख्या का बहुत ज्यादा बढ़ गई , जैसे ही जनसंख्या बढ़ी भोजन की मांग में वृद्धि हो गई ।
🔹 भोजन की मांग बढ़ी तो कृषि आधारित सामानों में भी वृद्धि हो गई।
🔹 इससे पहले की ब्रिटेन में भुखमरी आती , सरकार ने कॉर्न लॉ को समाप्त कर दिया ।
🔹 जिस से अलग अलग देश के व्यापारियों ने ब्रिटेन में भोजन का निर्यात किया ।
🔹 भोजन की कमी में बदलाव आया और विकास होने लगा ।
कॉर्न लॉ हटने के प्रभाव :-
🔹 कॉर्न लॉ के हटने का मतलब था कि ब्रिटेन में जिस भाव पर भोजन का उत्पादन होता था उससे कहीं सस्ते दर पर उसे आयात किया जा सकता था । ब्रिटेन के किसानों द्वारा उगाए जाने वाले अनाज इस स्थिति में नहीं थे कि सस्ते आयात के आगे टिक सकें ।
🔹 खेती की जमीन का एक बड़ा हिस्सा खाली छोड़ दिया गया और लोग भारी संख्या में बेरोजगार हो गए । लोग एक बड़ी संख्या में काम कि तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगे । कई लोग विदेशों की तरफ भी पलायन कर गए ।
🔹 गिरते दामों की वजह से ब्रिटेन में खाने पीने की चीजों की माँग बढ़ने लगी । साथ में औद्योगीकरण से लोगों की आमदनी भी बढ़ने लगी । इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन को और भोजन आयात करने की जरूरत पड़ने लगी । इस मांग को पूरा करने के लिए पूर्वी यूरोप , अमेरिका , रूस और ऑस्ट्रेलिया में जमीन का एक बड़ा भाग साफ किया जाने लगा ।
🔹 अनाज को बंदरगाहों तक सही समय पर पहुँचाना भी जरूरी हो गया था । इसके लिए रेल लाइनें बिछाई गईं ताकि खेत से अनाज को सीधा बंदरगाहों तक पहुँचाया जा सके । खेत पर काम करने के लिए आसपास नई आबादी बसाने की जरूरत भी महसूस हुई । इन सब जरूरतों को पूरा करने के लिए लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से इन भागों तक पूँजी भी आने लगी ।
🔹 अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मजदूरों की कमी पड़ रही थी । इस कमी को पूरा करने के लिए भारी संख्या में लोग पलायन करके वहाँ पहुँचने लगे । उन्नीसवीं सदी में लगभग पाँच करोड़ लोग यूरोप से अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया पहुँच चुके थे । इस दौरान पूरी दुनिया के विभिन्न भागों से लगभग 15 करोड़ लोगों का पलायन हुआ । 1890 का दशक आते - आते कृषी क्षेत्र में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो चुका था । इसके साथ श्रम के प्रवाह , पूँजी के प्रवाह और तकनीकी बदलाव के क्षेत्र में बड़े ही जटिल परिवर्तन हुए ।
तकनीक का योगदान :-
🔹 इस दौरान विश्व की अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में टेकनॉलोजी ने एक अहम भूमिका निभाई । इस युग के कुछ मुख्य तकनीकी खोज हैं रेलवे , स्टीम शिप और टेलिग्राफ । रेलवे ने बंदरगाहों और आंतरिक भूभागों को आपस में जोड़ दिया । स्टीम शिप के कारण माल को भारी मात्रा में अतलांतिक के पार ले जाना आसान हो गया । टेलीग्राफ की मदद से संचार व्यवस्था में तेजी आई और इससे आर्थिक लेन देन बेहतर रूप से होने लगे ।
मीट का व्यापार :-
🔹 मीट का व्यापार इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण है कि नई टेक्नॉलोजी से किस तरह आम आदमी का जीवन बेहतर हो जाता है । 1870 के दशक तक जानवरों को जिंदा ही अमेरिका से यूरोप ले जाया जाता था । जिंदा जानवरों को जहाज से ले जाने में कई परेशानियाँ होती थीं । वे ज्यादा जगह लेते थे और कई जानवर रास्ते में बीमार हो जाते थे या मर भी जाते थे । इसके कारण यूरोप के ज्यादातर लोगों के लिए मीट एक विलासिता की वस्तु ही थी ।
🔹 रेफ्रिजरेशन टेक्नॉलोजी ने तस्वीर बदल दी । अब जानवरों को अमेरिका में हलाल किया जा सकता था और प्रोसेस्ड मीट को यूरोप ले जाया जा सकता था । इससे शिप में उपलब्ध जगह का बेहतर इस्तेमाल संभव हो पाया । इससे यूरोप में मीट अधिक मात्रा में उपलब्ध होने लगा और कीमतें गिर गईं । अब आम आदमी भी नियमित रूप से मीट खा सकता था ।
🔹 लोगों का पेट भरा होने के कारण देश में सामाजिक शाँति आ गई । अब ब्रिटेन के लोग देश की उपनिवेशी महात्वाकाँछा को गले उतारने को तैयार लगने लगे ।
उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और उपनिवेशवाद :-
🔹 एक तरफ व्यापार के फैलने से यूरोप के लोगों की जिंदगी बेहतर हो गई तो दूसरी तरफ उपनिवेशों के लोगों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा ।
🔹 जब अफ्रिका के आधुनिक नक्शे को गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखा में हैं । ऐसा लगता है जैसे किसी छात्र ने सीधी रेखाएँ खींच दी हो । 1885 में यूरोप की बड़ी शक्तियाँ बर्लिन में मिलीं और अफ्रिकी महादेश को आपस में बाँट लिया । इस तरह से अफ्रिका के ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में बन गईं ।
रिंडरपेस्ट या मवेशियों का प्लेग :-
🔹 रिंडरपेस्ट मवेशियों में होने वाली एक बीमारी है । अफ्रिका में रिंडरपेस्ट के उदाहरण से पता चलता है कि किस तरह से एक बीमारी किसी भूभाग में शक्ति के समीकरण को भारी तौर पर प्रभावित कर सकती है ।
🔹 अफ्रिका वैसा महादेश था जहाँ पर जमीन और खनिजों का अकूत भंडार था । यूरोपीय लोग खनिज और बागानों से धन कमाने के लिए अफ्रिका पहुंचे थे । लेकिन उन्हें वहाँ मजदूरों की भारी कमी झेलनी पड़ी । वहाँ एक और बड़ी समस्या ये थी कि स्थानीय लोग मेहनताना देने के बावजूद काम नहीं करना चाहते थे । दरअसल अफ्रीका की आबादी बहुत कम थी और वहाँ उपलब्ध संसाधनों की वजह से लोगों की जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती थी । उन्हें इस बात की कोई जरूरत ही नहीं थी कि पैसे कमाने के लिए काम करें ।
🔹 यूरोपीय लोगों ने अफ्रिका के लोगों को रास्ते पर लाने के लिए कई तरीके अपनाए । उनमें से कुछ नीचे दिये गये हैं ।
👉 लोगों पर इतना अधिक टैक्स लगाया गया कि उसे केवल वो ही अदा कर पाते थे । जो खानों और बागानों में काम करते थे ।
👉 उत्तराधिकार के कानून को बदल दिया गया । अब किसी भी परिवार का एक ही सदस्य जमीन का उत्तराधिकारी बन सकता था । इससे अन्य लोगों को मजदूरी करने पर बाध्य होना पड़ा ।
👉 खान में काम करने वाले मजदूरों को कैंपस के भीतर ही रखा जाता था और उन्हें खुला घूमने की छूट नहीं थी ।
रिंडरपेस्ट का प्रकोप :-
🔹 रिंडरपेस्ट का अफ्रिका में आगमन 1880 के दशक के आखिर में हुआ था । यह बीमारी उन घोड़ों के साथ आई थी जो ब्रिटिश एशिया से लाए गए थे । ऐसा उन इटैलियन सैनिकों की मदद के लिए किया गया था जो पूर्वी अफ्रिका में एरिट्रिया पर आक्रमण कर रहे थे । रिंडरपेस्ट पूरे अफ्रिका में किसी जंगल की आग की तरह फैल गई । 1892 आते आते यह बीमारी अफ्रिका के पश्चिमी तट तक पहुँच चुकी थी । इस दौरान रिंडरपेस्ट ने अफ्रिका के मवेशियों की आबादी का 90 % हिस्सा साफ कर दिया ।
🔹 अफ्रिकियों के लिए मवेशियों का नुकसान होने का मतलब था रोजी रोटी पर खतरा । अब उनके पास खानों और बागानों में मजदूरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं था । इस तरह से मवेशियों की एक बीमारी ने यूरोपियन को अफ्रिका में अपना उपनिवेश फैलाने में मदद की ।
भारत से बंधुआ मजदूरों का पलायन :-
🔹 वैसे मजदूर जो किसी खास मालिक के लिए खास अवधि के लिए काम करने को प्रतिबद्ध होते हैं बंधुआ मजदूर कहलाते हैं । आधुनिक बिहार , उत्तर प्रदेश , मध्य भारत और तामिल नाडु के सूखाग्रस्त इलाकों से कई गरीब लोग बंधुआ मजदूर बन गए । इन लोगों को मुख्य रूप से कैरेबियन आइलैंड , मॉरिशस और फिजी भेजा गया । कई को सीलोन और मलाया भी भेजा गया । भारत में कई बंधुआ मजदूरों को असम के चाय बागानों में भी काम पर लगाया गया ।
🔹 एजेंट अक्सर झूठे वादे करते थे और इन मजदूरों को ये भी पता नहीं होता था कि वे कहाँ जा रहे हैं । इन मजदूरों के लिए नई जगह पर बड़ी भयावह स्थिति हुआ करती थी । उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होते थे और उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता था ।
🔹 1900 के दशक से भारत के राष्ट्रवादी लोग बंधुआ मजदूर के सिस्टम का विरोध करने लगे थे । इस सिस्टम को 1921 में समाप्त कर दिया गया ।
भारत से प्रेरित श्रम प्रवासनइं डेंटेड लेबर का मतलब :-
🔹 इंडेंटेड लेबर का अर्थ है एक विशिष्ट समय के लिए एक नियोक्ता के लिए काम करने के लिए अनुबंध के तहत एक बंधुआ मजदूर।
🔹 यह कुछ के लिए उच्च आय लाया और दूसरों के लिए गरीबी।
भारतीय प्रेरित श्रमिकों के प्रवास का कारण :-
1.
अधिकांश पूर्वी यूटर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के वर्तमान क्षेत्रों से आया है।
2.
भारत के इन क्षेत्रों में कई सामाजिक परिवर्तनों का अनुभव हुआ जैसे कुटीर उद्योग में गिरावट आई, भूमि के किराए में वृद्धि हुई और खानों और वृक्षारोपण के लिए भूमि को मंजूरी दी गई।
3.
19 वीं शताब्दी में इंडेंट्योर को गुलामी की एक नई प्रणाली के रूप में वर्णित किया गया।
4.
होसे, त्रिनिदाद में एक दंगाई कार्निवल जब सभी जातियों और धर्मों के कार्यकर्ता जश्न मनाने में शामिल होते हैं।
विदेशों में भारतीय उघमी :-
🔹 भारत के नामी बैंकर और व्यवसायियों में शिकारीपुरी श्रौफ और नटुकोट्टई चेट्टियार का नाम आता है । वे दक्षिणी और केंद्रीय एशिया में कृषि निर्यात में पूँजी लगाते थे । भारत में और विश्व के विभिन्न भागों में पैसा भेजने के लिए उनका अपना ही एक परिष्कृत सिस्टम हुआ करता था ।
🔹 भारत के व्यवसायी और महाजन उपनिवेशी शासकों के साथ अफ्रिका भी पहुंच चुके थे । हैदराबाद के सिंधी व्यवसायी तो यूरोपियन उपनिवेशों से भी आगे निकल गये थे । 1860 के दशक तक उन्होंने पूरी दुनिया के महत्वपूर्ण बंदरगाहों फलते फूलते इंपोरियम भी बना लिये थे ।
भारतीय व्यापार , उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था :-
🔹 भारत से उम्दा कॉटन के कपड़े वर्षों से यूरोप निर्यात होता रहे थे । लेकिन इंडस्ट्रियलाइजेशन के बाद स्थानीय उत्पादकों ने ब्रिटिश सरकार को भारत से आने वाले कॉटन के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने के लिए बाध्य किया । इससे ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में भारी मात्रा में आने लगे । 1800 में भारत के निर्यात में 30 % हिस्सा कॉटन के कपड़ों का था । 1815 में यह गिरकर 15 % हो गया और 1870 आते आते यह 3 % ही रह गया । लेकिन 1812 से 1871 तक कच्चे कॉटन का निर्यात 5 % से बढ़कर 35 % हो गया । इस दौरान निर्यात किए गए सामानों में नील ( इंडिगो ) में तेजी से बढ़ोतरी हुई । भारत से सबसे ज्यादा निर्यात होने वाला सामान था अफीम जो मुख्य रूप से चीन जाता था ।
🔹 भारत से ब्रिटेन को कच्चे माल और अनाज का निर्यात बढ़ने लगा और ब्रिटेन से तैयार माल का आयात बढ़ने लगा । इससे एक ऐसी स्थिति आ गई जब ट्रेड सरप्लस ब्रिटेन के हित में हो गया । इस तरह से बैलेंस ऑफ पेमेंट ब्रिटेन के फेवर में था । भारत के बाजार से जो आमदनी होती थी उसका इस्तेमाल ब्रिटेन अन्य उपनिवेशों की देखरेख करने के लिए करता था और भारत में रहने वाले अपने ऑफिसर को ' होम चार्ज ' देने के लिए करता था । भारत के बाहरी कर्जे की भरपाई और रिटायर ब्रिटिश ऑफिसर ( जो भारत में थे ) का पेंशन का खर्चा भी होम चार्ज के अंदर ही आता था ।
द इंटर वॉर इकोनॉमिक :-
1.
प्रथम विश्व युद्ध मुख्य रूप से यूरोप में लड़ा गया था।
2.
इस समय के दौरान, दुनिया ने आर्थिक, राजनीतिक अस्थिरता और एक और दयनीय युद्ध का अनुभव किया।
3.
प्रथम विश्व युद्ध टो पावर ब्लॉक के बीच लड़ा गया था। एक पर सहयोगी थे - ब्रिटान, फ्रांस, रूस और बाद में अमेरिका में शामिल हो गए। और विपरीत दिशा में -गर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी और ओटोमन और तुर्की।
4.
यह युद्ध 4 वर्षों तक चला ।
युद्ध काल की अर्थव्यवस्था :-
🔹 पहले विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को कई मायनों में झकझोर कर रख दिया था । लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ लोग घायल हो गये ।
🔹 मरने वाले या अपाहिज होने वालों में ज्यादातर लोग उस उम्र के थे जब आदमी आर्थिक उत्पादन करता है । इससे यूरोप में सक्षम शरीर वाले कामगारों की भारी कमी हो गई । परिवारों में कमाने वालों की संख्या कम हो जाने के कारण पूरे यूरोप में लोगों की आमदनी घट गई ।
🔹 ज्यादातर पुरुषों को युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य होना पड़ा लिहाजा कारखानों में महिलाएं काम करने लगीं । जो काम पारंपरिक रूप से पुरुषों के काम माने जाते थे उन्हें अब महिलाएँ कर रहीं थीं ।
🔹 इस युद्ध के बाद दुनिया की कई बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच के संबंध टूट गये । ब्रिटेन को युद्ध के खर्चे उठाने के लिए अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा । इस युद्ध ने अमेरिका को एक अंतर्राष्ट्रीय कर्जदार से अंतर्राष्ट्रीय साहूकार बना दिया । अब विदेशी सरकारों और लोगों की अमेरिका में संपत्ति की तुलना मंअ अमेरिकी सरकार और उसके नागरिकों की विदेशों में ज्यादा संपत्ति थी ।
युद्ध के बाद के सुधार :-
🔹 जब ब्रिटेन युद्ध में व्यस्त था तब जापान और भारत में उद्योग का विकास हुआ । युद्ध के बाद ब्रिटेन को अपना पुराना दबदबा कायम करने में परेशानी होने लगी । साथ ही ब्रिटेन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जापान से टक्कर लेने में अक्षम पड़ रहा था । युद्ध के बाद ब्रिटेन पर अमेरिका का भारी कर्जा लद चुका था ।
🔹 युद्ध के समय ब्रिटेन में चीजों की माँग में तेजी आई थी जिससे वहाँ की अर्थव्यवस्था फल फूल रही थी । लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद माँग में गिरावट आई । युद्ध के बाद ब्रिटेन के 20 % कामगारों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा ।
🔹 युद्ध के पहले पूर्वी यूरोप गेहूँ का मुख्य निर्यातक था । लेकिन युद्ध के दौरान पूर्वी यूरोप के युद्ध में शामिल होने की वजह से कनाडा , अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया गेहूँ के मुख्य निर्यातक के रूप में उभरे थे । जैसे ही युद्ध खत्म हुआ पूर्वी यूरोप ने फिर से गेहूँ की सप्लाई शुरु कर दी । इसके कारण बाजार में गेहूँ की अधिक खेप आ गई और कीमतों में भारी गिरावट हुई । इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तबाही आ गई ।
बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत :-
🔹 अमेरिका की अर्थव्यवस्था में युद्ध के बाद के झटकों से तेजी से निजात मिलने लगी । 1920 के दशक में बड़े पैमाने पर उत्पादन अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मुख्य पहचान बन गई । फोर्ड मोटर के संस्थापक हेनरी फोर्ड मास प्रोडक्शन के जनक माने जाते हैं । बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से उत्पादन क्षमता बढ़ी और कीमतें घटीं । अमेरिका के कामगार बेहतर कमाने लगे इसलिए उनके पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे थे । इससे विभिन्न उत्पादों की माँग तेजी से बढ़ी ।
🔹 कार का उत्पादन 1919 में 20 लाख से बढ़कर 1929 में 50 लाख हो गया । इसी तरह से बजाजी सामानों ; जैसे रेफ्रिजरेटर , वाशिंग मशीन , रेडियो , ग्रामोफोन , आदि की माँग भी तेजी बढ़ने लगी । अमेरिका में घरों की माँग में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई । आसान किस्तों पर कर्ज की सुविधा के कारण इस माँग को और हवा मिली ।
🔹 इस तरह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था खुशहाल हो गई । 1923 में अमेरिका ने दुनिया के अन्य हिस्सों को पूँजी निर्यात करना शुरु किया और सबसे बड़ा विदेशी साहूकार बन गया । इससे यूरोप की अर्थव्यवस्था को भी सुधरने का मौका मिला और पूरी दुनिया का व्यापार अगले छ : वर्षों तक वृद्धि दिखाता रहा ।
ब्रेटन वुड्स संस्थान :-
1.
बाहरी अधिशेष और घाटे से निपटने के लिए जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन जंगल में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था।
2.
युद्ध के बाद के पुनर्गठन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की स्थापना की गई।
3.
पिछले युद्ध अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली को ब्रेटन वुड्स सिस्टम के रूप में जाना जाता है।
4.
यह प्रणाली निश्चित विनिमय दरों पर आधारित थी।
5.
आईएमएफ और विश्व बैंक को ब्रेटन वुड्स ट्विन्स के रूप में जाना जाता है।
6.
यूएस के प्रमुख आईएमएफ और विश्व बैंक पर वीटो का प्रभावी अधिकार है।
विश्वव्यापी मंदी
जरूरत से ज्यादा कृषि उत्पादन :-
🔹 1920 के दशक में कृषि क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा उत्पादन एक अहम समस्या थी । कृषि उत्पादों की अत्यधिक सप्लाई के कारण कीमतें गिर रही थीं । किसानों ने इसकी भरपाई के लिए और भी अधिक उत्पादन करना शुरु किया । इसके कारण बाजार में कृषि उत्पादों की बाढ़ आ गई , जिससे कीमतें और नीचे गिरी । खरीददारों की कमी के कारण कृषि उत्पाद सड़ने लगे ।
आर्थिक मंदी और भारत :-
🔹 आर्थिक मंदी से भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा । 1928 से 1934 के बीच भारत का आयात और निर्यात घटकर आधा हो गया । इसी दौरान भारत में गेहूँ की कीमतों में 50 % की कमी आई ।
🔹 कृषि उत्पादों की घटती कीमतों के बावजूद सरकार किसानों से पहले दर पर ही लगान वसूलना चाहती थी । इस तरह से इस स्थिति में किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब थी । कई किसानों को अपनी जमापूँजी निकालना पड़ा और जमीन और जेवर भी बेचने पड़े । इस तरह से भारत महँगी धातुओं का निर्यातक बन गया ।
🔹 भारत के शहरी क्षेत्रों में आर्थिक मंदी का उतना असर नहीं पड़ा । कीमतें घटने के कारण शहर में रहने वाले लोगों का जीवन पहले से आसान हो गया था । भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के दवाब के कारण उद्योगों को अधिक संरक्षण मिलने लगा जिससे उद्योग में अधिक निवेश हुआ ।
युद्ध के बाद के समझौते :-
🔹 दूसरा विश्व युद्ध पहले के युद्धों की तुलना में बिलकुल अलग था । इस युद्ध में आम नागरिक अधिक संख्या में मारे गये थे और कई महत्वपूर्ण शहर बुरी तरह बरबाद हो चुके थे । दूसरे विश्व युद्ध के बाद की स्थिति में सुधार मुख्य रूप से दो बातों से प्रभावित हुए थे ।
·
पश्चिम में अमेरिका का एक प्रबल आर्थिक , राजनैतिक और सामरिक शक्ति के रूप में उदय ।
·
सोवियत यूनियन का एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तन ।
🔹 विश्व के नेताओं की मीटिंग हुई जिसमें युद्ध के बाद के संभावित सुधारों पर चर्चा की गई । उन्होंने दो बातों पर ज्यादा ध्यान दिया जिन्हें नीचे दिया गया है ।
·
औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन को बरकरार रखना और पूर्ण रोजगार दिलवाना ।
·
पूँजी , सामान और कामगारों के प्रवाह पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना ।
नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक आदेश - NIEO
1.
ज्यादातर विकासशील देशों को 1950 और 60 के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के तेज विकास से लाभ नहीं हुआ।
2.
उन्होंने खुद को एक समूह के रूप में संगठित किया। नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक आदेश (NIEO) की मांग के लिए 77 या G-77 का समूह।
3.
यह एक ऐसी प्रणाली थी जो उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक विकास सहायता, कच्चे माल के लिए उचित मूल्य और विकसित देशों के बाजारों में उनके निर्मित सामानों के लिए बेहतर पहुंच पर वास्तविक नियंत्रण प्रदान करेगी।
चीन में नई आर्थिक नीति :-
1.
चीन जैसे देशों में मजदूरी बहुत कम थी।
2.
चीनी अर्थव्यवस्था की कम लागत वाली संरचना ने इसके उत्पादों को सस्ता कर दिया।
3.
चीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए निवेश का एक पसंदीदा स्थान बन गया।
4.
चीन की नई आर्थिक नीति विश्व अर्थव्यवस्था की तह में लौट गई।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां :-
1.
बहुराष्ट्रीय निगम बड़ी कंपनियां हैं जो एक ही समय में कई देशों में काम करती हैं।
2.
एमएनसी का विश्व व्यापी प्रसार 1950 और 1960 के दशक में एक उल्लेखनीय विशेषता थी क्योंकि दुनिया भर में अमेरिकी व्यापार का विस्तार हुआ था।
3.
विभिन्न सरकारों द्वारा लगाए गए उच्च आयात शुल्क ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी विनिर्माण इकाइयों का पता लगाने के लिए मजबूर किया।
निष्कर्ष :-
पिछले दो दशकों में, दुनिया की अर्थव्यवस्था बहुत बदल गई है क्योंकि चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों ने तेजी से आर्थिक विकास हासिल किया है।
अध्याय - 4
औद्योगीकरण का युग
इस अध्याय की मुख्य बातें :-
👉 पूर्व औद्योगीकरण
👉 औद्योगीकरण की गति
👉 श्रमिकों का जीवन
👉 भारत में कपड़ा उद्योग
👉 औद्योगीकरण की अनूठी बात
औद्योगीकरण का युग :-
🔹 जिस युग में हस्तनिर्मित वस्तुएं बनाना कम हुई और फैक्ट्री , मशीन एवं तकनीक का विकास हुआ उसे औद्योगीकरण का युग कहते हैं ।
🔹 इसमें खेतिहर समाज औद्योगिक समाज में बदल गई ।
🔹 1760 से 1840 तक के युग को औद्योगीकरण युग कहा जाता है जो मनुष्य के लिए खेल परिवर्तन नियम जैसा हुआ
पूर्व औद्योगीकरण :-
🔹 यूरोप में औद्योगीकरण के पहले के काल को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यूरोप में सबसे पहले कारखाने लगने के पहले के काल को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहते हैं। इस अवधि में गाँवों में सामान बनते थे जिसे शहर के व्यापारी खरीदते थे।
औद्योगिक क्रांति से पहले :-
🔹 औद्योगिक क्रांति मध्य 18 वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ था । परंतु इससे पहले भी इंग्लैंड और यूरोप में अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था ।
🔹 परंतु इसे फैक्ट्रियों में नहीं बनाया जाता था बल्कि हाथों से बनाया जाता था और व्यापारियों द्वारा बेचा जाता । यानी तभी यह सब व्यापारियों के नियंत्रण में था ।
🔹 औद्योगीकरण के इसी चरण को इतिहासकार आदि औद्योगीकरण कहते हैं । यहां आदि का अर्थ किसी भी वस्तु की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत ।
🔹 17
वीं और 18 वीं सदी में क्या हुआ :-
👉 आबादी
👉 भूमंडलीकरण
👉 मांग
🔹 अब शाहरी इलाके के जो व्यापारी , जनसंख्या के मांग के अनुसार उत्पादन को नहीं बढ़ा पा रहे थे । जिसकी वजह से वे ग्रामीण इलाकों में जाना प्रारंभ कर दिया वहां पर उन्होंने किसानों को रोजगार दिया और उत्पादन में वृद्धि कि ।
🔹 अब सवाल आता है कि किसानों ने नया रोजगार स्वीकार क्यों किया गांव के गरीब काश्तकार और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करने लगे क्योंकि अब खुले खेत जा रहे थे और कॉमनस की बाड़ाबंदी की जा थी । छोटे किसान की जमीन खत्म हो रहे थी इसलिए गरीब किसान आमदनी के नए स्रोत ढूंढ रहे थे ।
व्यापारियों का गाँवों पर ध्यान देने का कारण :-
🔹 शहरों में ट्रेड और क्राफ्ट गिल्ड बहुत शक्तिशाली होते थे। इस प्रकार के संगठन प्रतिस्पर्धा और कीमतों पर अपना नियंत्रण रखते थे। वे नये लोगों को बाजार में काम शुरु करने से भी रोकते थे। इसलिये किसी भी व्यापारी के लिये शहर में नया व्यवसाय शुरु करना मुश्किल होता था। इसलिये वे गाँवों की ओर मुँह करना पसंद करते थे।
ब्रिटेन में पूर्व औद्योगीकरण के लक्षण :-
🔹 शहर के व्यापारी गाँवों के किसानों को पैसे देते थे। वे किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिये उत्पाद बनाने के लिये प्रोत्साहित करते थे।
🔹 गाँवों में जमीन कम पड़ने लगी थी। जनसंख्या बढ़ रही थी जिसकी जरूरत जमीन के छोटे टुकड़ों से पूरी नहीं होती थी। इसलिये किसानों को आय के अतिरिक्त साधनों की तलाश थी।
🔹 पूर्व औद्योगीकरण के समय विनिमयों का एक जाल फैला हुआ था जिसे व्यापारी लोग नियंत्रित करते थे। सामान का उत्पादन वैसे किसान करते थे जो कारखानों में काम करने की बजाय अपने खेतों में काम करते थे। अंतिम उत्पाद कई हाथों से होता हुआ लंदन के बाजारों तक पहुँचता था। फिर इन उत्पादों को लंदन से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भेजा जाता था।
कारखानों की शुरुआत :-
🔹 सबसे पहले इंगलैंड में कारखाने 1730 के दशक में बनना शुरु हुए। अठारहवीं सदी के आखिर तक पूरे इंगलैड में जगह जगह कारखाने दिखने लगे। 1760 में ब्रिटेन में 2.5 मिलियन पाउंड का कपास आयातित होता था। 1787 तक यह मात्रा बढ़कर 22 मिलियन पाउंड हो गई थी।
कारखानों से लाभ :-
🔹 कारखानों के खुलने से कई फायदे हुए। श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ गई। अब नई मशीनों की सहायता से प्रति श्रमिक आधिक मात्रा में और बेहतर उत्पाद बनने लगे। औद्योगीकरण की शुरुआत मुख्य रूप से सूती कपड़ा उद्योग में हुई। कारखानों में श्रमिकों की निगरानी और उनसे काम लेना अधिक आसान हो गया।
औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार :-
🔹 ब्रिटेन में सूती कपड़ा और धातु उद्योग सबसे गतिशील उद्योग थे। औद्योगीकरण के पहले दौर में (1840 के दशक तक) सूती कपड़ा उद्योग अग्रणी क्षेत्रक था। रेलवे के प्रसार के बाद लोहा इस्पात उद्योग में तेजी से वृद्धि हुई। रेल का प्रसार इंगलैंड में 1840 के दशक में हुआ और उपनिवेशों में यह 1860 के दशक में हुआ। 1873 आते आते ब्रिटेन से लोहा और इस्पात के निर्यात की कीमत 77 मिलियन पाउंड हो गई। यह सूती कपड़े के निर्यात का दोगुना था।
🔹 लेकिन औद्योगीकरण का रोजगार पर खास असर नहीं पड़ा था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक पूरे कामगारों का 20% से भी कम तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्रक में नियोजित था। इससे यह पता चलता है कि नये उद्योग पारंपरिक उद्योगों को विस्थापित नहीं कर पाये थे।
🔹 सूती कपड़ा और धातु उद्योग पारंपरिक उद्योगों में बदलाव नहीं ला पाये। लेकिन पारंपरिक उद्योगों में भी कई परिवर्तन हुए। ये परिवर्तन बड़े ही साधारण से दिखने वाले लेकिन नई खोजों के कारण हुए। इस तरह के उद्योगों के उदाहरण हैं; खाद्य संसाधन, भवन निर्माण, बर्तन निर्माण, काँच, चमड़ा उद्योग, फर्नीचर, आदि।
🔹 जैसा कि आज भी हम देखते हैं; नई तकनीकों को पैर जमाने में काफी वक्त लगा। मशीनें महंगी होती थीं और उनके मरम्मत में भी काफी खर्च लगता था। इसलिये व्यापारी और उद्योगपति नई मशीनों से दूर ही रहना पसंद करते थे। आविष्कारकों या निर्माताओं के दावों के विपरीत नई मशीनें बहुत कुशल भी नहीं थीं।
🔹 इतिहासकार इस बात को मानते हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य का एक आम श्रमिक कोई मशीन चलाने वाला नहीं बल्कि एक पारंपरिक कारीगर या श्रमिक होता था।
मानव शक्ति और भाप की शक्ति :-
🔹 उस जमाने में श्रमिकों की कोई कमी नहीं होती थी। इसलिये श्रमिकों की किल्लत या अधिक पारिश्रमिक की कोई समस्या नहीं थी। इसलिये महंगी मशीनों में पूँजी लगाने की अपेक्षा श्रमिकों से काम लेना ही बेहतर समझा जाता था।
🔹 मशीन से बनी चीजें एक ही जैसी होती थीं। वे हाथ से बनी चीजों की गुणवत्ता और सुंदरता का मुकाबला नहीं कर सकती थीं। उच्च वर्ग के लोग हाथ से बनी हुई चीजों को अधिक पसंद करते थे।
🔹 लेकिन उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में स्थिति कुछ अलग थी। वहाँ पर श्रमिकों की कमी होने के कारण मशीनीकरण ही एकमात्र रास्ता बचा था।
श्रमिकों का जीवन :-
🔹 काम की तलाश में भारी संख्या में लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। नौकरी मिलना इस बात पर निर्भर नहीं करता था कि किसी को क्या काम आता है। यह इस बात पर निर्भर करता था कि किसी के कितने अधिक दोस्त या रिश्तेदार पहले से ही वहाँ काम पर लगे हैं। जान पहचान के बगैर नौकरी मिलना बहुत मुश्किल होता था। किसी किसी को महीनों तक नौकरी पाने का इंतजार करना होता था। ऐसे लोग बेघर होते थे जिन्हें पुलों या रैन बसेरों में अपनी रातें बितानी पड़ती थी। कई निजी लोगों ने भी रैन बसेरे बनवाये थे। गरीबों के लिए बनी पूअर लॉ अथॉरिटी ऐसे लोगों के लिए कैजुअल वार्ड की व्यवस्था करती थी।
🔹 कई नौकरियाँ साल के कुछ गिने चुने महीनों में ही मिलती थीं। जैसे ही वे व्यस्त महीने समाप्त हो जाते थे तो बेचारे गरीब फिर से सड़क पर आ जाते थे। उनमें से कुछ तो अपने गाँव लौट जाते थे लेकिन ज्यादातर शहर में ही रुक जाते थे ताकि छोटे मोटे काम पा सकें।
स्पिनिंग जेनी मशीन का विरोध :- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में पारिश्रमिक में थोड़ा सा इजाफा हुआ था। लेकिन विभिन्न क्षेत्रकों के आँकड़े प्राप्त करना मुश्किल है क्योंकि उनमें हर साल काफी उतार चढ़ाव होता था। किसी भी श्रमिक के जीवन स्तर पर नियोजन की अवधि का पूरा असर पड़ता था। यदि किसी को साल के बारहों महीने काम मिल जाता था तो उसका जीवन सुखी रहता था। यदि किसी को साल के दो चार महीने ही काम मिलता था उसकी समस्याएँ जैसी की तैसी रहती थीं। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अच्छे दौर में भी शहरों की आबादी का लगभग 10% अत्यधिक गरीब हुआ करता था। आर्थिक मंदी के दौर में बेरोजगारी बढ़कर 35 से 75% के बीच हो जाती थी।
🔹 कई बार बेरोजगारी के डर से श्रमिक लोग नई तकनीक का जमकर विरोध करते थे। उदाहरण के लिए जब स्पिनिंग जेनी को लाया गया तो महिलाओं ने इन नई मशीनों को तोड़ना शुरु किया। उन महिलाओं को अपना रोजगार छिन जाने का डर था।
🔹 1840 के दशक के बाद शहरों में भवन निर्माण में तेजी आई। इससे रोजगार के नये अवसर पैदा हुए। 1840 में यातायात के क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या दोगुनी हो गई जो आने वाले तीस वर्षों में फिर से दोगुनी हो गई।
उपनिवेशो में औद्योगीकरण :- आइए अब भारत पर नजर डाले और देखे की उपनिवेश में औद्योगीकरण कैसे होता है
भारत का कपड़ा उद्योग का युग :-
🔹 अठारहवीं सदी के मध्य तक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में अपना बिजनेस जमा लिया था। इस अवधि में व्यापार के पुराने केंद्रों (जैसे सूरत और हुगली) का पतन हो चुका था, और व्यापार के नये केंद्रों (जैसे कलकत्ता और बम्बई) का उदय हुआ।
🔹 जब एक बार ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी राजनैतिक प्रभुता स्थापित कर ली तो इसने व्यापार पर अपने एकाधिकार को जताना शुरु कर दिया।
🔹 कम्पनी ने कपड़ा व्यवसाय से जुड़े हुए पारंपरिक व्यापारियों और दलालों को उखाड़ना शुरु किया। उसके बाद कम्पनी ने बुनकरों पर सीधा नियंत्रण बनाने की कोशिश की। इस काम के लिए लोगों को वेतन पर रखा गया। ऐसे लोगों को गुमाश्ता कहा जाता था। गुमाश्ता का काम था बुनकरों के काम की निगरानी करना, आने वाले माल का संग्रहण करना और कपड़े की क्वालिटी की जाँच करना।
🔹 कम्पनी यह कोशिश भी करती थी कि बुनकर किसी दूसरे ग्राहक के साथ डील न कर लें। इस काम को पुख्ता करने के लिये एडवांस के सिस्टम का सहारा लिया जाता था। इस सिस्टम के तहत बुनकरों को कच्चे माल खरीदने के लिए कर्ज दिया जाता था। जब कोई बुनकर कर्ज ले लेता था तो इस बात के लिये बाध्य हो जाता था कि किसी अन्य व्यापारी को अपना माल न बेचे।
🔹 एडवांस के इस नये सिस्टम ने बुनकरों के लिए कई समस्याएँ खड़ी कर दी। पहले वे खाली समय में थोड़ी बहुत खेती कर लेते थे ताकि परिवार का पेट भरने के लिये काम भर का अनाज उगा सकें। अब उनके पास खाली समय नहीं बचता था। उन्हें अपनी जमीन काश्तकारों को देनी पड़ती थी।
🔹 पारंपरिक व्यापारियों के विपरीत गोमाश्ता बाहरी आदमी होता था। उसका गाँव में कोई नातेदार रिश्तेदार नहीं होता था। वह सिपाहियों और चपरासियों के साथ आता था। समय पर काम न पूरा होने की स्थिति में बुनकरों को दंड भी देता था। गोमाश्ता अक्सर हेकड़ी दिखाया करता था। कई बार गोमाश्ता और बुनकरों के बीच लड़ाई भी हो जाती थी।
एडवांस के सिस्टम के कारण आये बदलाव :-
🔹 एडवांस के सिस्टम के कारण कई बुनकर कर्ज के जाल में फँस गये। कर्णाटक और बंगाल के कई स्थानों पर तो बुनकर अपने गाँव छोड़कर दूसरे गाँवों में चले गये ताकि अपना करघा लगा सकें। कई बुनकरों ने एडवांस लेने से मना कर दिया, अपनी दुकान बंद कर दी और खेती करने लगे।
मैनचेस्टर का भारत में प्रकोप :-
🔹 उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही भारत से कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी। 1811 – 12 में भारत से होने वाले निर्यात में सूती कपड़े की हिस्सेदारी 33% थी जो 1850 – 51 आते आते मात्र 3% रह गई।
🔹 ब्रिटेन के निर्माताओं के दबाव के कारण सरकार ने ब्रिटेन में इंपोर्ट ड्यूटी लगा दी ताकि इंगलैंड में सिर्फ वहाँ बनने वाली वस्तुएँ ही बिकें। ईस्ट इंडिया कम्पनी पर भी इस बात के लिए दबाव डाला गया कि वह ब्रिटेन में बनी चीजों को भारत के बाजारों में बेचे। अठारहवीं सदी के अंत तक भारत में सूती कपड़ों का आयात न के बराबर था। लेकिन 1850 आते-आते कुल आयात में 31% हिस्सा सूती कपड़े का था। 1870 के दशक तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 70% हो गई।
🔹 भारत में हाथ से बने सूती कपड़ों की तुलना में मैनचेस्टर की मशीन से बने हुए कपड़े अधिक सस्ते थे। इसलिये बुनकरों का मार्केट शेअर गिर गया। 1850 का दशक आते आते भारत के सूती कपड़े के अधिकांश केंद्रों में भारी गिरावट आ गई।
🔹 1860 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका में गृह युद्ध शुरु हो चुका था। इसलिए वहाँ से ब्रिटेन को मिलने वाले कपास की सप्लाई बंद हो चुकी थी। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन को भारत की ओर मुँह करना पड़ा। अब भारत से कपास ब्रिटेन को निर्यात होने लगा। इससे भारत के बुनकरों के लिए कच्चे कपास की भारी कमी हो गई।
🔹 उन्नीसवीं सदी के अंत तक भारत में भी सूती कपड़े के कारखाने खुलने लगे। भारत के पारंपरिक सूती कपड़ा उद्योग के लिए यह किसी आखिरी आघात से कम न था।
भारत में कारखानों की शुरुआत :-
🔹 बम्बई में पहला सूती कपड़ा मिल 1854 में बना और उसमें उत्पादन दो वर्षों के बाद शुरु हो गया। 1862 तक चार मिल चालू हो गये थे। उसी दौरान बंगाल में जूट मिल भी खुल गये। कानपुर में 1860 के दशक में एल्गिन मिल की शुरुआत हुई। अहमदाबाद में भी इसी अवधि में पहला सूती मिल चालू हुआ। मद्रास के पहले सूती मिल में 1874 में उत्पादन शुरु हो चुका था।
शुरु के व्यवसायी :-
🔹 भारत के कई बिजनेस ग्रुप के इतिहास में चीन के साथ होने वाला व्यापार छुपा हुआ है। अठारहवीं सदी के आखिर से ब्रिटिश भारत ने अफीम का निर्यात चीन को करना शुरु किया और वहाँ से चाय का आयात करना शुरु किया। इस काम में कई भारतीय व्यापारियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। वे पूँजी लगाते थे, माल मंगवाते थे और फिर माल को भेजते थे। जब उन व्यापारियों ने अच्छी पूँजी जमा कर ली तो वे भारत में औद्योगिक उपक्रम बनाने के सपने भी देखने लगे।
🔹 ऐसे लोगों में द्वारकानाथ टैगोर एक अग्रणी व्यक्ति थे जिन्होंने 1830 और 1840 के दशक में उद्योग लगाने शुरु किये। टैगोर का उद्योग 1840 के व्यापार संकट के दौर में तबाह हो गया। लेकिन उन्नीसवीं सदी के आखिरी दौर में कई व्यापारी सफल उद्योगपति हो गये। बम्बई में दिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नसेरवनजी टाटा जैसे पारसी लोगों ने बड़े बड़े उद्योग स्थापित किये। कलकत्ता में पहला जूट मिल 1917 में एक मारवाड़ी उद्यमी सेठ हुकुमचंद द्वारा खोला गया था। इसी तरह से चीन से सफल व्यापार करने वालों ने बिड़ला ग्रुप को बनाया था।
🔹 बर्मा, खाड़ी देशों और अफ्रिका के व्यापार नेटवर्क के रास्ते भी पूँजी जमा की गई थी।
🔹 भारत के व्यवसाय पर अंग्रेजों का ऐसा शिकंजा था कि उसमें भारतीय व्यापारियों को बढ़ने के लिए अवसर ही नहीं थे। पहले विश्व युद्ध तक भारतीय उद्योग के के अधिकतम हिस्से पर यूरोप की एजेंसियों की पकड़ हुआ करती थी।
मजदूर कहाँ से आते थे?
🔹 ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों में आस पास के जिलों से मजदूर आते थे। इनमें से अधिकांश मजदूर आस पास के गाँवों से पलायन करके आये थे। फसल की कटाई और त्योहारों के समय वे अपने गाँव भी जाते थे ताकि अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें। ऐसा आज भी देखने को मिलता है। दिल्ली और पंजाब में काम करने वाले मजदूर छुट्टियों में बिहार और उत्तर प्रदेश वापस जाते हैं।
🔹 कुछ समय बीतने के बाद, लोग काम की तलाश में अधिक दूरी तक भी जाने लगे। उदाहरण के लिए यूनाइटेड प्रोविंस के लोग भी बम्बई और कलकत्ता की तरफ पलायन करने लगे।
🔹 लेकिन काम मिलना आसान नहीं होता था। उद्योगपति अक्सर लोगों को काम पर रखने के लिए जॉबर की मदद लेते थे जो किसी प्लेसमेंट कंसल्टेंट की तरह काम करता था। अक्सर कोई पुराना और भरोसेमंद मजदूर जॉबर बन जाता था। जॉबर अक्सर अपने गाँव के लोगों को प्रश्रय देता था। वह उन्हें शहर में बसने में मदद करता था और जरूरत के समय कर्ज भी देता था। इस तरह से जॉबर एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गया था। वह लोगों से बदले में पैसे और उपहार माँगता था और मजदूरों के जीवन में भी दखल देता था।
औद्योगिक विकास का अनूठापन :-
🔹 यूरोप की मैनेजिंग एजेंसी कुछ खास तरह के उत्पादों में ही रुचि दिखाती थी। वे अपना ध्यान चाय और कॉफी के बागानों, खनन, नील और जूट पर लगाती थीं। ऐसे उत्पाद की जरूरत मुख्य रूप से निर्यात के लिए होती थी और उन्हें भारत में बेचा नहीं जाता था।
🔹 भारत के व्यवसायी यहाँ के बाजार में मैनचेस्टर के सामानों से प्रतिस्पर्धा से बचना चाहते थे। उदाहरण के लिए वे सूत के मोटे कपड़े बनाते थे जिनका इस्तेमाल या तो हथकरघा वाले करते थे या जिनका निर्यात चीन को होता था।
🔹 बीसवीं सदी के पहले दशक तक औद्योगीकरण के ढ़र्रे पर कई बदलावों का प्रभाव पड़ चुका था। यह वह समय था जब स्वदेशी आंदोलन जोर पकड़ रहा था। औद्योगिक समूहों ने संगठित होना शुरु कर दिया था ताकि सरकार से अपने सामूहिक हितों की बात कर सकें। उन्होंने सरकार पर आयात शुल्क बढ़ाने और अन्य रियायतें देने के लिए दबाव डाला। यह वह समय था जब भारत से चीन को होने वाला भारतीय धागे का निर्यात घट रहा था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीनी और जापानी मिलों के उत्पाद ने चीन के बाजार को भर दिया था। भारतीय उत्पादकों ने सूती धागे को छोड़कर वस्त्र बनाने पर अधिक जोर दिया। 1900 और 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।
🔹 पहले विश्व युद्ध तक उद्योग के विकास की दर धीमी थी। युद्ध ने स्थिति बदल दी। ब्रिटेन की मिलें सेना की जरूरतें पूरा करने में व्यस्त हो गईं। इससे भारत में आयात घट गया। भारत की मिलों के सामने एक बड़ा घरेलू बाजार तैयार था। भारत की मिलों को ब्रिटेन की सेना के लिए सामान बनाने के लिए भी कहा गया। इस तरह से घरेलू और विदेशी बाजारों में माँग बढ़ गई। इससे उद्योग धंधे में तेजी आ गई।
🔹 युद्ध खत्म होने के बाद भी मैनचेस्टर यहाँ के बाजार में अपनी खोई हुई पकड़ दोबारा नहीं बना पाया। अब ब्रिटेन के उद्योग संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी और जापान से टक्कर लेने की स्थिति में नहीं थे।
लघु उद्योगों का वर्चस्व :-
🔹 उद्योग में वृद्धि के बावजूद अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का शेअर बहुत कम था। लगभग 67% बड़े उद्योग बंगाल और बम्बई में थे। देश के बाकी हिस्सों में लघु उद्योग का बोलबाला था। कामगारों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही रजिस्टर्ड कम्पनियों में काम करता था। 1911 में यह शेअर 5% था और 1931 में 10%.
🔹 बीसवीं सदी में हाथ से होने वाले उत्पाद में इजाफा हुआ। हथकरघा उद्योग में लोगों ने नई टेक्नॉलोजी को अपनाया। बुनकरों ने अपने करघों में फ्लाई शटल का इस्तेमाल शुरु किया। 1941 आते आते भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लग चुका था। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचिन और बंगाल जैसे मुख्य क्षेत्रों में तो 70 से 80% हथकरघों में फ्लाई शटल लगे हुए थे। इसके अलावा और भी कई नये सुधार हुए जिससे हथकरघा के क्षेत्र में उत्पादन क्षमता बढ़ गई थी।
बाजार में होड़ :-
🔹 ग्राहकों को रिझाने के लिए उत्पादक कई तरीके अपनाते थे। ग्राहक को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन एक जाना माना तरीका है।
🔹 मैनचेस्टर के उत्पादक अपने लेबल पर उत्पादन का स्थान जरूर दिखाते थे। ‘मेड इन मैनचेस्टर’ का लबेल क्वालिटी का प्रतीक माना जाता था। इन लेबल पर सुंदर चित्र भी होते थे। इन चित्रों में अक्सर भारतीय देवी देवताओं की तस्वीर होती थी। स्थानीय लोगों से तारतम्य बनाने का यह एक अच्छा तरीका था।
🔹 उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक उत्पादकों ने अपने उत्पादों को मशहूर बनाने के लिए कैलेंडर बाँटने भी शुरु कर दिये थे। किसी अखबार या पत्रिका की तुलना में एक कैलेंडर की शेल्फ लाइफ लंबी होती है। यह पूरे साल तक ब्रांड रिमाइंडर का काम करता था।
🔹 भारत के उत्पादक अपने विज्ञापनों में अक्सर राष्ट्रवादी संदेशों को प्रमुखता देते थे ताकि अपने ग्राहकों से सीधे तौर पर जुड़ सकें।
अध्याय - 5
मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया :-
🔹 मुदित या छापी हुई सामग्री के बगैर हमारे लिए इस दुनिया की कल्पना करना भी मुश्किल है ।
🔹 आज हमारे पास हर जगह मुदित वस्तुएं है ।
🔹 उदाहरण के लिए किताबें , अखबार , पत्र पत्रिकाएं , कैलेंडर , सरकारी सूचनाएं डायरी सड़क के किनारे विज्ञापन और क्या नहीं है ।
🔹हम कभी कबार इस मुद्दत दुनिया को अति आवश्यक भी मान लेते हैं ।
🔹 इस छपाई के पहले भी एक दुनिया थी इस छपाई के पहले भी लोग जीते थे ।
🔹 परंतु इस छपाई के इतिहास ने इस दुनिया को एक नया आकार दिया ।
👉 तो क्या है यह छपाई की दुनिया और इस छपाई की दुनिया ने इस आधुनिक युग को एक नया आकार कैसे दिया ?
इन्हीं सभी के विषय में हम लोग इस अध्याय में पढ़ेंगे :-
🔹 शुरुआती छपी किताबें
🔹 यूरोप में मुद्रण का आना
🔹 मुद्रण क्रांति और उसका असर
🔹 पढ़ने का जुनून
🔹 उन्नीसवीं सदी
🔹 भारत का मुद्रण संसार
🔹 धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें
🔹 प्रकाशन के नए रुप
🔹 प्रिंट और प्रतिबंधो
शुरुआती छपी किताबें :-
🔹 प्रिंट टेक्नॉलोजी का विकास सबसे पहले चीन , जापान और कोरिया में हुआ ।
🔹 चीन में 594 इसवी के बाद से ही लकड़ी के ब्लॉक पर स्याही लगाकर उससे कागज पर प्रिंटिंग की जाती थी 🔹 उस जमाने में कागज पतले और झिरीदार होते थे । ऐसे कागज पर दोनों तरफ छपाई करना संभव नहीं था । कागज के दोनों सिरों को टाँके लगाकर फिर बाकी कागज को मोड़कर एकॉर्डियन बुक बनाई जाती थी ।
उस जमाने मे किस तरह की किताबें छापी जाती थी और उन्हें को पढ़ता था ?
🔹 एक लंबे समय तक चीन का राजतंत्र ही छपे हुए सामान का सबसे बड़ा उत्पादक था । चीन के प्रशासनिक तंत्र में सिविल सर्विस परीक्षा द्वारा लोगों की बहाली की जाती थी ।
🔹 इस परीक्षा के लिये चीन का राजतंत्र बड़े पैमाने पर पाठ्यपुस्तकें छपवाता था । सोलहवीं सदी में इस परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या बहुत बढ़ गई । इसलिये किताबें छपने की रफ्तार भी बढ़ गई ।
तो क्या केवल विद्यार्थी ही किताब पढ़ते थे ।
🔹 सत्रहवीं सदी तक चीन में शहरी परिवेश बढ़ने के कारण छपाई का इस्तेमाल कई कामों में होने लगा । अब छपाई केवल बुद्धिजीवियों या अधिकारियों तक ही सीमित नहीं थी ।
🔹 अब व्यापारी भी रोजमर्रा के जीवन में छपाई का इस्तेमाल करने लगे ताकि व्यापार से जुड़े हुए आँकड़े रखना आसान हो जाये ।
🔹 कहानी , कविताएँ , जीवनी , आत्मकथा , नाटक आदि भी छपकर आने लगे । इससे पढ़ने के शौकीन लोगों के शौक पूरे हो सकें ।
🔹 खाली समय में पढ़ना एक फैशन जैसा बन गया था । रईस महिलाओं में भी पढ़ने का शौक बढ़ने लगा और उनमें से कईयों ने तो अपनी कविताएँ और कहानियाँ भी छपवाईं ।
जापान में छापाई कैसे आया :-
🔹 प्रिंट टेक्नॉलोजी को बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने 768 से 770 इसवी के आस पास जापान लाया ।
🔹 बौद्ध धर्म की किताब डायमंड सूत्र ; जो 868 इसवी में छपी थी ; को जापानी भाषा की सबसे पुरानी किताब माना जाता है ।
🔹 उस समय पुस्तकालयों और किताब की दुकानों में हाथ से छपी किताबें और अन्य सामग्रियाँ भरी होती थीं ।
🔹 किताबें कई विषयों पर उपलब्ध थीं ; जैसे महिलाएँ , वाद्य यंत्र , गणना , चाय समारोह , फूल सज्जा , शिष्टाचार , पाककला , प्रसिद्ध स्थल , आदि ।
यूरोप में मुद्रण का आना :-
🔹 जैसा कि हम जानते हैं रेशम मार्ग से चीन से यूरोप में रेशम और मसाले आते - जाते थे ।
🔹 ग्यारवी सदी में चीन से यूरोप में रेशम मार्ग के जरिए कागजों का भी आयात हो रहा था जैसे - जैसे यूरोप में कागज आने लगे वैसे वैसे वहां पर मुंशियों के द्वारा पांडुलिपियां लिखी जाने लगी ।
🔹 लोगों ने जिसे बहुत पसंद किया जिसकी वजह से जब मार्को पोलो नमक महान खोजी यात्री 1295 में चीन से लौटा तो अपने साथ ब्लॉक प्रिंटिंग की जानकारी लेकर आया ।
🔹 इस तरह इटली में प्रिंटिंग की शुरुआत हुई । उसके बाद प्रिंट टेक्नॉलोजी यूरोप के अन्य भागों में भी फैल गई ।
🔹 उस जमाने में कागज पर छपी हुई किताबों को सस्ती चीज समझा जाता था और हेय दृष्टि से देखा जाता था । इसलिए कुलीन और रईस लोगों के लिए किताब छापने के लिए वेलम का इस्तेमाल होता था ।
🔹 वेलम चमड़े से बनाया जाता है और पतली शीट की तरह होता है । वेलम पर छपी किताब को रईसी की निशानी माना जाता था ।
🔹 पंद्रह सदी के शुरुआत तक यूरोप में तरह तरह के सामानों पर छपाई करने के लिए लकड़ी के ब्लॉक का जमकर इस्तेमाल होने लगा । इससे हाथ से लिखी हुई किताबें लगभग गायब ही हो गईं ।
गुटेनबर्ग का प्रिंटिंग प्रेस :-
🔹 गुटेनबर्ग के प्रिंटिंग प्रेस ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी । गुटेनबर्ग किसी व्यापारी के बेटे थे । अपने बचपन से ही उन्होंने जैतून और शराब की प्रेस देखी थी ।
🔹 उसने पत्थरों पर पॉलिस करने की कला भी सीखी थी । उसे सोने के जेवर बनाने में भी महारत हासिल थी और वह लेड के साँचे भी बनाता था जिनका इस्तेमाल सस्ते जेवरों को ढ़ालने के लिए किया जाता था ।
🔹 इस तरह से गुटेनबर्ग के पास हर वह जरूरी ज्ञान था जिसका इस्तेमाल करके उसने प्रिंटिंग टेक्नॉलोजी को और बेहतर बनाया ।
🔹 उसने जैतून के प्रेस को अपने प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल बनाया । उसने अपने साँचों का इस्तेमाल करके छापने के लिए अक्षर बनाये ।
🔹 1448 इसवी तक गुटेनबर्ग ने अपने प्रिंटिंग प्रेस को दुरुस्त बना लिया था । उसने अपने प्रेस में सबसे पहले बाइबिल को छापा ।
🔹 शुरु शुरु में छपने वाली किताबें डिजाइन के मामले में पांडुलिपी जैसी ही लगी थीं । उसके बाद 1450 से 1550 के बीच के एक सौ सालों में यूरोप के अधिकाँश हिस्सों में प्रेस लगाये गये ।
🔹 प्रिंट उद्योग में इतनी अच्छी वृद्धि हुई कि पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोप के बाजारों में लगभग 2 करोड़ किताबें छापी गईं । सत्रहवीं सदी में यह संख्या बढ़कर 20 करोड़ हो गई ।
मुद्रण क्राँति और उसके प्रभाव :-
पाठकों का एक नया वर्ग
🔹 प्रिंट टेक्नॉलोजी के आने से पाठकों का एक नया वर्ग उदित हुआ । अब आसानी से किसी भी किताब की अनेक कॉपी बनाई जा सकती थी , इसलिये किताबें सस्ती हो गईं । इससे पाठकों की बढ़ती संख्या को संतुष्ट करने में काफी मदद मिली ।
🔹 अब किताबें सामान्य लोगों की पहुँच में आ गईं । इससे पढ़ने की एक नई संस्कृति का विकास हुआ । बारहवीं सदी के यूरोप में साक्षरता का स्तर काफी नीचे था । प्रकाशक ऐसी किताबें छापते थे जो अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सकें । लोकप्रिय गीत , लोक कथाएँ और अन्य कहानियों को इसलिए छापा जाता था ताकि अनपढ़ लोग भी उन्हें सुनकर ही समझ लें । पढ़े लिखे लोग इन कहानियों को उन लोगों को पढ़कर सुनाते थे जिन्हें पढ़ना लिखना नहीं आता था ।
धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर :-
🔹 प्रिंट के आने से नये तरह के बहस और विवाद को अवसर मिलने लगे । धर्म के कुछ स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठने लगे । पुरातनपंथी लोगों को लगता था कि इससे पुरानी व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी हो रही थी । ईसाई धर्म की प्रोटेस्टैंट क्राँति भी प्रिंट संस्कृति के कारण ही संभव हो पाई थी । धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाने वाले नये विचारों से रोम के चर्च को परेशानी होने लगी । 1558 के बाद तो चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की लिस्ट भी रखनी शुरु कर दी ।
पढ़ने का जुनून :-
🔹 सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में यूरोप में साक्षरता के स्तर में काफी सुधार हुआ । अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ भागों में साक्षरता का स्तर तो 60 से 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका था ।
🔹 साक्षरता बढ़ने के साथ ही फेरीवालों को बहाल करते थे । ऐसे फेरीवाले गाँवों में घूम घूम कर किताबें बेचा करते थे । पत्रिकाएँ , उपन्यास , पंचांग , आदि सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबें थीं ।
🔹 छपाई के कारण वैज्ञानिकों और तर्कशास्त्रियों के नये विचार और नई खोज सामान्य लोगों तक आसानी से पहुँच पाते थे । किसी भी नये आइडिया को अब अधिक से अधिक लोगों के साथ बाँटा जा सकता था और उसपर बेहतर बहस भी हो सकती थी ।
प्रिंट संस्कृति और फ्रांसीसी क्राँति :-
🔹 कई इतिहासकारों का मानना है कि प्रिंट संस्कृति ने ऐसा माहौल बनाया जिसके कारण फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत हुई । इनमें से कुछ कारण निम्नलिखित हैं : -
🔹 प्रिंट के कारण ज्ञानोदय के विचारकों के विचार लोकप्रिय हुए । इन विचारकों ने परंपरा , अंधविश्वास और निरंकुशवाद की कड़ी आलोचना की । वॉल्तेअर और रूसो को ज्ञानोदय का अग्रणी विचारक माना जाता है ।
🔹 प्रिंट के कारण संवाद और वाद - विवाद की नई संस्कृति का जन्म हुआ । अब आम आदमी भी मूल्यों , संस्थाओं और प्रचलनों पर विवाद करने लगा । अब आम आदमी स्थापित मान्यताओं पर सवाल करने लगा ।
🔹 1780 के दशक आने तक ऐसे साहित्य की बाढ़ आ गई जिसमें राजशाही का मखौल उड़ाया जाने लगा और उनकी नैतिकता की आलोचना होने लगी । प्रिंट के कारण राजशाही की ऐसी छवि बनी जिसमें यह दिखाया गया कि आम जनता की कीमत पर राजशाही के लोग विलासिता करते थे ।
उन्नीसवीं सदी :-
🔹 उन्नीसवीं सदी में यूरोप में साक्षरता में जबरदस्त उछाल आया । इससे पाठकों का एक ऐसा नया वर्ग उभरा जिसमें बच्चे , महिलाएँ और मजदूर शामिल थे ।
🔹 बच्चों की कच्ची उम्र और अपरिपक्व दिमाग को ध्यान में रखते हुए उनके लिये अलग से किताबें लिखी जाने लगीं । कई लोककथाओं को बदल कर लिखा गया ताकि बच्चे उन्हें आसानी से समझ सकें ।
🔹 कई महिलाएँ पाठिका के साथ साथ लेखिका भी बन गईं और इससे उनका महत्व और बढ़ गया ।
🔹 किराये पर किताब देने वाले पुस्तकालय सत्रहवीं सदी में ही प्रचलन में आ गये थे । अब उस तरह के पुस्तकालयों में व्हाइट कॉलर मजदूर , दस्तकार और निम्न वर्ग के लोग भी अड्डा जमाने लगे ।
प्रिंट तकनीक में अन्य सुधार :-
🔹 न्यू यॉर्क के रिचर्ड एम . हो ने उन्नीसवीं सदी के मध्य तक शक्ति से चलने वाला सिलिंडरिकल प्रेस बना लिया था । इस प्रेस से एक घंटे में 8,000 पेज छापे जा सकते थे ।
🔹 उन्नीसवीं सदी के अंत में ऑफसेट प्रिंटिंग विकसित हो चुका था । ऑफसेट प्रिंटिंग से एक ही बार में छ : रंगों में छपाई की जा सकी थी ।
🔹 बीसवीं सदी के आते ही बिजली से चलने वाले प्रेस भी इस्तेमाल में आने लगे । इससे छपाई के काम में तेजी आ गई ।
🔹 इसके अलावा प्रिंट की टेक्नॉलोजी में कई अन्य सुधार भी हुए । सभी सुधारों का सामूहिक सार हुआ जिससे छपी हुई सामग्री का रूप ही बदल गया ।
किताबें बेचने के नये तरीके :-
🔹 उन्नीसवीं सदी में कई पत्रिकाओं में उपन्यासों को धारावाहिक की शक्ल में छापा जाता था । इससे पाठकों को उस पत्रिका का अगला अंक खरीदने के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता था ।
🔹 1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय साहित्य को शिलिंग सीरीज के नाम से सस्ते दर पर बेचा जाता था ।
🔹 किताब के ऊपर लगने वाली जिल्द का प्रचलन बीसवीं सदी में शुरु हुआ ।
🔹 1930 के दशक की महा मंदी के प्रभाव से पार पाने के लिए पेपरबैक संस्करण निकाला गया जो कि सस्ता हुआ करता था ।
भारत में प्रिंटिंग की दुनिया :-
🔹 भारत में प्रिंटिंग प्रेस सबसे पहले सोलहवीं सदी के मध्य में पुर्तगाली धर्मप्रचारकों द्वारा लाया गया ।
🔹 भारत में छपने वाली पहली किताबें कोंकणी भाषा में थी । 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं ।
🔹 तमिल भाषा की पहली पुस्तक को कैथोलिक पादरियों ने कोचीन में 1759 में छापा था । उन्होंने मलयालय भाषा की पहली पुस्तक को 1713 में छापा था ।
🔹 1780 से बंगाल गैजेट को जेम्स ऑगस्टस हिकी ने संपादित करना शुरु किया । यह एक साप्ताहिक पत्रिका थी । हिकी ने कम्पनी के बड़े अधिकारियों के बारे में गॉशिप भी छापे ।
🔹 गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने हिकी को इसके लिये सजा भी दी । उसके बाद वारेन हेस्टिंग्स ने सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अखबारों को प्रोत्साहन दिया ताकि सरकार की छवि ठीक की जा सके ।
🔹 बंगाल गैजेट ही पहला भारतीय अखबार था ; जिसे गंगाधर भट्टाचार्य ने प्रकाशित करना शुरु किया था । प्रिंट संस्कृति से भारत में धार्मिक , सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर बहस शुरु करने में मदद मिली । लोग कई धार्मिक रिवाजों के प्रचलन की आलोचना करने लगे ।
🔹 1821 से राममोहन राय ने संबाद कौमुदी प्रकाशित करना शुरु किया । इस पत्रिका में हिंदू धर्म के रूढ़िवादी विचारों की आलोचना होती थी । ऐसी आलोचना को काटने के लिए हिंदू रूढ़ीवादियों ने समाचार चंद्रिका नामक पत्रिका निकालना शुरु किया ।
मुस्लिमों ने मुद्रण संस्कृति को कैसे लिया :-
🔹 1822 में फारसी में दो अखबार शुरु हुए जिनके नाम थे जाम - ए - जहाँ - नामा और शम्सुल अखबार । उसी साल एक गुजराती अखबार भी शुरु हुआ जिसका नाम था बम्बई समाचार ।
🔹 उत्तरी भारत के उलेमाओं ने सस्ते लिथोग्राफी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्मग्रंथों के उर्दू और फारसी अनुवाद छापने शुरु किये । उन्होंने धार्मिक अखबार और गुटके भी निकाले ।
🔹 देवबंद सेमिनरी की स्थापना 1867 में हुई । इस सेमिनरी ने एक मुसलमान के जीवन में सही आचार विचार को लेकर हजारों हजार फतवे छापने शुरु किये ।
🔹 1810 में कलकत्ता में तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस को छापा गया । 1880 के दशक से लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बम्बई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस ने आम बोलचाल की भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों को छापना शुरु किया ।
🔹 इस तरह से प्रिंट के कारण धार्मिक ग्रंथ आम लोगों की पहुँच में आ गये । इससे नई राजनैतिक बहस की रूपरेखा निर्धारित होने लगी । प्रिंट के कारण भारत के एक हिस्से का समाचार दूसरे हिस्से के लोगों तक भी पहुंचने लगा । इससे लोग एक दूसरे के करीब भी आने लगे ।
प्रकाशन के नये रूप :-
🔹 शुरु शुरु में भारत के लोगों को यूरोप के लेखकों के उपन्यास ही पढ़ने को मिलते थे । वे उपन्यास यूरोप के परिवेश में लिखे होते थे । इसलिए यहाँ के लोग उन उपन्यासों से तारतम्य नहीं बिठा पाते थे । बाद में भारतीय परिवेश पर लिखने वाले लेखक भी उदित हुए । ऐसे उपन्यासों के चरित्र और भाव से पाठक बेहतर ढंग से अपने आप को जोड़ सकते थे । लेखन की नई नई विधाएँ भी सामने आने लगीं ; जैसे कि गीत , लघु कहानियाँ , राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर निबंध , आदि ।
🔹 उन्नीसवीं सदी के अंत तक एक नई तरह की दृश्य संस्कृति भी रूप ले रही थी । कई प्रिंटिंग प्रेस चित्रों की नकलें भी भारी संख्या में छापने लगे । राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों की कलाकृतियों को अब जन समुदाय के लिये प्रिंट किया जाने लगा ।
🔹 1870 आते आते पत्रिकाओं और अखबारों में कार्टून भी छपने लगे । ऐसे कार्टून तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर कटाक्ष करते थे ।
प्रिंट और महिलाएँ :-
🔹 कई लेखकों ने महिलाओं के जीवन और संवेदनाओं पर लिखना शुरु किया । इससे मध्यम वर्ग की महिलाओं में पढ़ने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी । कई ऐसे पुरुष आगे आये जो स्त्री शिक्षा पर जोर देते थे । कुछ महिलाओं ने घर पर रहकर ही शिक्षा प्राप्त की , जबकि कुछ अन्य महिलाओं ने स्कूल जाना भी शुरु किया ।
🔹 लेकिन पुरातनपंथी हिंदू और मुसलमान अभी भी स्त्री शिक्षा के खिलाफ थे । उनका मानना था कि शिक्षा से लड़कियों के दिमाग पर बुरे प्रभाव पड़ेंगे । लोग चाहते थे कि उनकी बेटियाँ धार्मिक ग्रंथ पढ़ें लेकिन उसके अलावा और कुछ न पढ़ें ।
🔹 उर्दू , तमिल , बंगाली और मराठी में प्रिंट संस्कृति का विकास पहले ही हो चुका था , लेकिन हिंदी में ठीक तरीके से प्रिंटिंग की शुरुआत 1870 के दशक में ही हो पाई थी ।
प्रिंट और गरीब जनता :-
🔹 मद्रास के शहरों में उन्नीसवीं सदी में सस्ती और छोटी किताबें आ चुकी थीं । इन किताबों को चौराहों पर बेचा जाता था ताकि गरीब लोग भी उन्हें खरीद सकें । बीसवीं सदी के शुरुआत से सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना शुरु हुई । इन पुस्तकालयों के कारण लोगों तक किताबों की पहुँच बढ़ने लगी । कई अमीर लोग पुस्तकालय बनाने लगे ताकि उनके क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ सके ।
प्रिंट और सेंसर :-
🔹 1798 के पहले तक उपनिवेशी शासक सेंसर को लेकर बहुत गंभीर नहीं थे । शुरु में जो भी थोड़े बहुत नियंत्रण लगाये जाते थे वे भारत में रहने वाले ऐसे अंग्रेजों पर लगायें जाते थे जो कम्पनी के कुशासन की आलोचना करते थे ।
🔹 1857 के विद्रोह के बाद प्रेस की स्वतंत्रत के प्रति अंग्रेजी हुकूमत का रवैया बदलने लगा । वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को 1878 में पारित किया गया । इस कानून ने सरकार को वर्नाकुलर प्रेस में समाचार और संपादकीय पर सेंसर लगाने के लिए अकूत शक्ति प्रदान की । राजद्रोही रिपोर्ट छपने पर अखबार को चेतावनी दी जाती थी । यदि उस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था तो फिर ऐसी भी संभावना होती थी कि प्रेस को बंद कर दिया जाये और प्रिंटिंग मशीनों को जब्त कर लिया जाये ।
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