chemistry12th chapter-14 जैविक अणु (Biomolecules)

 जैविक अणु

कार्बोहाइड्रेट की परिभाषा क्या है , Carbohydrate in hindi वर्गीकरण या प्रकार , उदाहरण ,सूत्र , किसमे होता है ?

Carbohydrate in hindi , कार्बोहाइड्रेट की परिभाषा क्या है  किसे कहते हैं , वर्गीकरण या प्रकार , उदाहरण ,सूत्र , किसमे होता है ? , कार्बोहाइड्रेट का पाचन कहाँ होता है , भोजन के उदाहरण ? सबसे ज्यादा कार्बोहाइड्रेट किस चीज में होता है ? कमी से होने वाले रोग कौन कौन से है ?

जैव अणुवे कार्बनिक पदार्थ जो पेड़ पौधे जीव जन्तु की वृद्धि के लिए आवश्यक होते है , उन्हें जैव अणु कहते है। 

उदाहरण : कार्बोहाइड्रेट न्यूक्लिक अम्ल आदि।

कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate) – 

1 . कार्बोहाइड्रेट का शाब्दिक अर्थ है कार्बन के हाइड्रेट।

2.     C , H , O से बने वे यौगिक जिनमे H O का अनुपात 2:1 होता है उन्हें कार्बोहाइट्रेट कहते है।

3.     इनका सामन्य सूत्र Cx(H2O)yहोता है यहाँ x तथा y संख्याएँ समान तथा भिन्न भिन्न हो सकती है इनके अंत में प्राय ose (ओस) लगाते है।

उदाहरण – glucose , fructose , glactose , mannose (C6H12O6 या C6(H2O)2)

उदाहरण – sucros , maltose , lactose (C12H22O11 या C12(H2O)11)

उदाहरण –  cellulose , starch (C6H10O5)n or (C6(H2O)5)n

नोट : कुछ यौगिकों में से H O का अनुपात 2:1 है परन्तु वे कार्बोहाइड्रेट नहीं है।

जैसेऐसिटिक अम्ल CH3-COOH or C2H4O2

लैक्टिक अम्ल C3H6O3

कुछ पदार्थ कार्बोहाइड्रेट होते हुए भी उनमे H O का अनुपात 2:1 नहीं होता है।

उदाहरण : रैमनोस C6H12O

कार्बनिक हाइड्रेट की आधुनिक परिभाषा (Modern definition of organic hydrate):

वे ध्रुवण घूर्णक यौगिक जो पॉलीहाइड्रोक्सी ऐल्डीहाइड या कीटोन होते है या वे पदार्थ जिनके जल अपघटन से पॉलीहाइड्रोक्सी एल्डिहाइड या कीटोन बनते है उन्हें कार्बोहाइड्रेट कहते है।

कार्बोहाइट्रेट का वर्गीकरण (Classification of Carbohydrates):

A . भौतिक गुण के आधार पर –

1.     शर्करा : ये स्वाद में मीठी जल में विलेय ठोस क्रिस्टलीय होती है।  जैसे सुक्रोस

2.     अशर्करा : ये स्वादहीन जल में अविलेय तथा अक्रिस्टलीय ठोस है।  जैसे सेल्यूलोस , स्टार्च

B . जल अपघटन के आधार पर :

इस आधार पर उन्हें तीन भागों में बांटा गया है।

1.     मोनो सैकेराइड (Mono Sacride):

§  ये जल में विलेय होती है परन्तु इनका जल अपघटन नहीं होता

§  ये ठोस क्रिस्टलीय है

§  इनका सामान्य सूत्र CnH2nOn होता है

§  कार्बन परमाणु की संख्या के आधार पर इन्हे निम्न प्रकार से वर्गीकृत करते है।

§   

 triose

 trtorse

pentose

 hexose

 C3H6O3

 C4H8O4

 C5H10O5

 C6H12O6

§   

§  यदि एल्डिहाइड समूह उपस्थित है तो एल्डोस तथा कीटोन समूह उपस्थित है तो कीटोस कहते है।

प्रश्न : एलडोहेक्सोज का उदाहरण दीजिये

उत्तर : gulcose

प्रश्नकीटो हैक्सोज का उदाहरण दीजिये

उत्तर – fructose

2.     ओलिगो सैकेराइड (Oligo Saccharide): वे कार्बोहाइड्रेट जिनके जल अपघटन से दो से लेकर 10 तक मोनो सैकेराइड बनते है , उन्हें ओलिगो सैकेराइड कहते है।

यदि किसी कार्बोहाइड्रेट के जल अपघटन से 2,3,4 मोनो सैकेराइड बनते है तो उन्हें क्रमशः डाई , ट्राई , टेट्रा सैकेराइड कहते है।

सुक्रोस , माल्टोस , लेक्टोस सभी डाइसैकेराइड है क्योंकि इनके जल अपघटन  मोनो सैकेराइड बनते है।

3.     पॉलिसैकेराइड (Polysaccharide):

वे कार्बोहाइड्रेट जिनके जल अपघटन से अनेक मोनो सैकेराइड बनते है उन्हें पॉलिसैकेराइड कहते है।

उदाहरण : स्टार्च , सेलुलोस

कोशिका के अणु :

कार्बोहाइड्रेट : कार्बोहाइड्रेट कार्बनिक एल्डिहाइड या कीटोन रखने वाले पोलीहाइड्रोक्सी कार्बनिक यौगिक होते है। इनमे कार्बन , हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात 1:2:1 होता है।

[ सामान्य सूत्रCn(H2O) ]

इनको कार्बन जल योजित भी कहते है।

क्योंकि इनमे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात वही होता है जो जल में होता है , इन्हें सैकेराइड और शर्करा भी कहा जाता है।

कार्बोहाइड्रेट को तीन प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया गया है

1. मोनोसैकेराइड

2. ओलीगोसैकेराइड

3. पोलीसैकेराइड

कार्बोहाइड्रेट : यह C:H:O से मिलकर बना होता है जिसमे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात 2:1 होता है और इनका साधारण सूत्र (CH2O)n होता है , ये ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है।

भोजन में मुख्य कार्बोहाइड्रेट का स्रोत अनाज और दालें होती है।

कार्बोहाइड्रेट के प्रकार तथा उदाहरण

 कार्बोहाइड्रेट जा प्रकार

 उदाहरण

 1. मोनोसैकेराइड

 ग्लूकोज (मुख्य रक्त शर्करा)

फ्रक्टोज (फलों में उपस्थित)

गेलेक्टोज (दुग्ध में पाई जाने वाली शर्करा)

डी ऑक्सीराइबोज (डीएनए में)

राइबोज (RNA में)

 2. डाइ सैकेराइड

 सुक्रोज (टेबिल शर्करा) = ग्लूकोज + फ्रक्टोज

लेक्टोज (दुग्ध शर्करा) = ग्लूकोज + गेलैक्टोज

माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज

3. पोलीसैकेराइड

 ग्लाइकोजन जंतुओं में कार्बोहाइड्रेट का जमा रूप

स्टार्चपौधों में कार्बोहाइड्रेट का जमा रूप

सेल्युलोजपौधों में कोशिका भित्ति का भाग , मनुष्यों के द्वारा पाचन नहीं होता है , परन्तु आंतो में भोजन की गति को बढाता है।

विशिष्ट लक्षण :

1.     संचित मात्रा : 900 ग्राम लगभग

2.     संचय स्थल : यकृत और पेशियाँ

3.     प्रतिदिन की आवश्यकता : 500 ग्राम लगभग

4.     स्रोत : मुख्यतःअनाज (चावल , गेहूँ , मक्का) , दालें , टमाटर , फल , गन्ना , दूध , शहद , शर्करा आदि।

5.     कैलोरी वैल्यू : 4.1 किलो कैलोरी / ग्राम

6.     फिजियोलॉजिकल वैल्यू : 4 किलो कैलारो/ग्राम

कार्बोहाइड्रेट के कार्य

§  कार्बोहाइड्रेट में ग्लूकोज मुख्य रूप से श्वसन ईंधन है।

§  राइबोज तथा डिऑक्सीराइबोज न्यूक्लिक अम्ल के प्रमुख घटक है। (डीएनए तथा RNA) गेलैक्टोज मेड्युलरी शिथ का रचनात्मक घटक है।

§  मोनोसैकेराइड मोनोमर्स की तरह आपस में मिलकर डाइसैकेराइड एवं पोलीसैकेराइड का निर्माण करते है।

§  स्टार्च एवं ग्लाइकोजन , संचित इंधन के रूप में कार्य करते है।

§  अधिक मात्रा में उपस्थित ग्लूकोज को लाइपोजिनेसिस द्वारा वसा में परिवर्तित करके एडीपोज उत्तक एवं मिसेन्टरीज में संचित कर लिया जाता है।

§  ग्लूकोज एंटीकीटोजेनिक कार्य करता है और वसा के अपूर्ण ऑक्सीकरण तथा रक्त में कीटोनिक बॉडी के निर्माण को रोकता है।

§  ग्लूकोज प्रोटीन संश्लेषण के लिए अमीनो अम्ल को सुरक्षित रखता है।

§  सुक्रोज पौधों से प्राप्त होने वाली मुख्य शर्करा है जो गन्ने और चुकंदर में पाई जाती है।

§  सेल्युलोज और हेमीसेल्युलोज पौधों की कोशिका भित्ति के मुख्य घटक है।

§  काइटिन क्रस्टेशियन के बाह्य कवच और फंजाई की कोशिका भित्ति का मुख्य घटक है।

§  हिपेरिन रक्त वाहिकाओ के अन्दर रक्त का थक्का बनने से रोकता है। (प्रतिजामक)

§  ग्लाइकोप्रोटीन एक सुरक्षा आवरण बनाती है , ग्लाइकोकैलिक्स आंत के विलाई में पाई जाती है।

§  हायल्यूरोनिक एसिड साइनोवियल फ्लूड के रूप में जोड़ो पर चिकनापन प्रदान करता है।

§  रक्त में पाए जाने वाली एंटीजन A , B और Rh- फैक्टर जो जंतुओं को प्रतिरोधकता प्रदान करते है , ये ग्लाईकोप्रोटीन होते है और जन्तुओं को प्रतिरक्षा प्रदान करते है।

§  शर्करा कुछ ग्लाइकोप्रोटीन हार्मोनों जैसे – FSH (फोलीक्युलर स्टीमुलेटिंग हार्मोन) और LH (ल्यूटीनाइजिंग हार्मोन) की प्रमुख घटक है। FSH गैमीटोजैनेसिस को नियंत्रित करता है जबकि LH अण्डोत्सर्ग की प्रक्रिया तथा कार्पस ल्युटियम के निर्माण को प्रेरित करता है।

§  कार्बोहाइड्रेट अमीनो अम्ल में परिवर्तित हो सकता है।

§  कोशिका झिल्ली में पाए जाने वाले ओलिगोसैकेराइड कोशिकाओं को पहचानने में सहायक होते है।

§  सेल्युलोज भोजन में रेशों के रूप में होती है। यह पाचक रस के स्त्रवण को उत्प्रेरित करती है और क्रमाकुंचन में सहायक होती है।

§  सेल्युलोज नाइट्रेट विस्फोटक के रूप में उपयोग किया जाता है

§  कार्बोक्सी मैथिल सेल्युलोज का उपयोग कोस्मेटिक और दवाओं में किया जाता है।

§  सेल्युलोज एसिटेट का उपयोग सेल्युलोज प्लास्टिक , फेब्रिक्स और शटर प्रूफ ग्लास के निर्माण में होता है।

कार्बोहाइड्रेट

ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बने कार्बनिक तत्व होते हैं। इसका फार्मूला Cm(H2O)n है। इसके स्रोत आलू, चावल, मक्का, गेहूं, इत्यादि हैं। इसको तीन भागों में बांटा जाता है- शर्करा (सुगर), स्टार्च सेलूलोज

1. मोनोसैकेराइडः यह सबसे सरल शर्करा होती है।

उदाहरणः पेन्टोजेज, ग्लूकोज, राइबोज, फ्रक्टोज आदि।

2. डाइसैकेराइडः ये दो मोनोसैकेराइड इकाइयों के जोड़ से बनते हैं।

उदाहरणः लेक्टोज, सुक्रोज आदि

3. पॉलीसैकेराइडः ये बहुत सारी मोनोसैकेराइड इकाइयों के जोड़  से बनते हैं।

उदाहरणः स्टार्च, ग्लाइकोजेन, सैल्युलोज

शर्कराः ग्लूकोजफ्रक्टोज (फलों में शर्करा), सुक्रोज (टेबल सुगर), लैक्टोज (दूध में), मैल्टोज (जौं में)

स्टार्चः यह ब्रेड, आलू, चावल आदि में मौजूद होता है। पादप भोजन को स्टार्च के रूप में संग्रहित करते हैं।

सेलूलोजः यह अपरिष्कृत पादप खाद्य में पाया जाता है। फाइबर इसका एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

कार्बोहाइड्रेड की अधिकता से मोटापा और इसकी कमी से शरीर का वजन कम हो जाता है। इससे कार्य करने की क्षमता घट जाती है।

glucose (C6H12O6) , ग्लुकोस बनाने की विधि , अपचायी अनअपचायी शर्करा

प्रश्न : अपचायी अनअपचायी शर्करा किसे कहते है ?

उत्तर : वे शर्कराएं जो टोलेन अभिकर्मक तथा फेलिंग विलयन को अपचयित कर देती है उन्हें अपचायी शर्करा कहते है जैसे : सभी मोनो सैकेराइड तथा माल्टोस और लैक्टोस

वे शर्कराएं जो टोलेन अभिकर्मक फेलिंग विलयन को अपचयित नहीं करती उन्हें अनअपचायी शर्करा कहते है।

जैसे सुक्रोस

glucose ग्लूकोस (C6H12O6) :

aldo hexose

डेक्ट्रोस

शहद और पके अंगूर से

ग्लूकोस बनाने की विधि (Glucose Method) :

1. इक्षु शर्करा से या सुक्रोस

C12H22O11 + H2O  →  C6H12O6 + C6H12O6

2 . औद्योगिक विधि :

(C6H10O5)n + nH2O → nC6H12O6

ग्लुकोस की विवृत श्रृंखला संरचना (glucose की open chain structure) :

1. ग्लूकोस का अणुसूत्र C6H12O6 है

2. ग्लूकोस को लाल फास्फोरस HI के साथ गरम करने पर n-hexane बनता है जिससे सिद्ध होता है की ग्लूकोस में 6 कार्बन की सीधी श्रृंखला है।

3. ग्लुकोस हाइड्रोक्सिल एमिन HCN से क्रिया कर लेता है जिससे सिद्ध होता है की इसमें कार्बोनिल समूह उपस्थित है।

4. ग्लूकोस टॉलेन अभिकर्मक अथवा ब्रोमीन जल द्वारा ऑक्सीकृत हो जाता है जिससे सिद्ध होता है की इसमें एल्डिहाइड समूह उपस्थित है।

5. ग्लूकोस एसिटिक एनहाइड्राइड से क्रिया करके ग्लूकोस पेंटा ऐसिटेट बनाता है जिससे सिद्ध होता है की पांच OH समूह उपस्थित है।

6. ग्लूकोस का HNO3 द्वारा ऑक्सीकरण करने पर सैकेरिक अम्ल बनता है जिससे सिद्ध होता है की इसमें एक एल्कोहल है।

ग्लूकोज की विवृत श्रृंखला संरचना , चक्रीय संरचना , α  β- D glucose , ऐनोमर

ऐमिल फिशर ने ग्लूकोज की निम्न विवृत श्रृंखला संरचना दी :

 

इसे निम्न नाम से व्यक्त करते है।

D-(+) – glucose

यहाँ D = विन्यास को व्यक्त करता है।

जबकि (+) चिन्ह घूर्णन की दिशा अर्थात दक्षिण ध्रुवण घूर्णता को व्यक्त करता है।

नोट : यदि ग्लूकोस में सबसे निचे स्थित असममित कार्बन परमाणु से -OH समूह दाएं हाथ की ओर हो तो इसका विन्यास D जबकि बायीं ओर होने पर इसका विन्यास L होगा।

ग्लूकोज की चक्रीय संरचना

ग्लुकोस की ओपन चैन स्ट्रक्चर निम्न गुणों की व्याख्या नहीं करती

1. ग्लुकोस सोडियम बाई सल्फाइड , 2-4 DNP से क्रिया नहीं करती जबकि इसमें कार्बोनिल समूह उपस्थित है।

2. यह शिफ़ अभिकर्मक से क्रिया नहीं करती जबकि इसमें एल्डिहाइड समूह उपस्थित है।

3. ग्लुकोस पेंटा एसिटेट में C , H , O समूह होते हुए भी यह हाइड्रोक्सिल ऐमिन से क्रिया नहीं करता।

4. α – D glucose   β – D – glucose के बनने को नहीं समझाया जा सकता।

उपरोक्त गुणों की व्याख्या करने के लिए ग्लुकोस की चक्रीय संरचना दी गयी।

ग्लुकोस में C-1 C-5 कार्बन के मध्य अन्तः क्रिया से चक्रीय संरचना का निर्माण होता है , चक्रीय संरचना में दो C-1 कार्बन अन्य कार्बनों से भिन्न होता है यह कार्बन परमाणु दो ऑक्सीजन परमाणुओं से जुड़ा होता है यदि C-1 कार्बन पर -OH समूह दायी ओर है तो उसे α – D glucose , यदि बायीं ओर है तो उसे  β – D – glucose कहते है।

ऐनोमर :

ग्लुकोस की चक्रीय संरचना में C-1 कार्बन 2 ऑक्सीजन परमाणुओं से जुड़ा होता है इसे ऐनोमरी कार्बन कहते है यदि C-1 कार्बन पर -OH समूह दायीं ओर है तो इसे α – D glucose परन्तु बाई ओर होने पर β – D – glucose .

α  β- D glucose एक दूसरे के ऐनोमर कहलाते है।

ग्लूकोस की चक्रीय संरचना में C-1 कार्बन पर -H -OH का अभिविन्यास अलग अलग होने के कारण जो समावयवी बनते है उन्हें एनोमर कहते है।

हावर्थ सूत्र :

ग्लुकोस की चक्रीय संरचना में पांच कार्बन एक ऑक्सीजन परमाणु मिलकर 6 सदस्यी वलय का निर्माण करते है , ग्लूकोस की यह चक्रीय संरचना पाइरेन के समान होती है अतः ग्लूकोस को पाइराइनोस भी कहते है।

fructose की चक्रीय संरचना , हावर्थ सूत्र , डाइसैकेराइड , सुक्रोज , माल्टोज , लैक्टोज

हावर्थ सूत्र , डाइसैकेराइड , सुक्रोज , माल्टोज , लैक्टोज , fructose की चक्रीय संरचना

फ्रक्टोज (fructose) की open chain structure :

fructose की चक्रीय संरचना :

1. fructose में C-2 C-5 कार्बन के मध्य अन्तः क्रिया से चक्रीय संरचना का निर्माण होता है , यदि C-2 कार्बन पर -OH समूह दाई ओर है तो उसे α – D -(-) fructose  जबकि -OH समूह बाई ओर है तो β – D -(-) fructose कहते है।

हावर्थ सूत्र :

फ्रक्टोज में चार कार्बन एक ऑक्सीजन परमाणु मिलकर पांच सदस्यी वलय का निर्माण करते है , fructose की यह संरचना फ्यूरेन के समान है अतः फ्रक्टोज को फ्यूरैनोस भी कहते है।

furanose

 

डाइसैकेराइड (Dysaccharide):

वे कार्बोहाइड्रेट जिनके जल अपघटन से दो मोनो सैकेराइड बनते है उन्हें डाइसैकेराइड कहते है।

उदाहरण : सुक्रोज , माल्टोस , लैक्टोस।

सुक्रोज(Sucrose) : इसे इक्षु शर्करा भी कहते है।

सुक्रोज दक्षिण ध्रुवण घूर्णक होता है इसके जल अपघटन से α – D – ग्लूकोज  β – D – fructose बनते है , α – D – ग्लूकोज के घूर्णन कोण का मान कम जबकि β – D – fructose के घूर्णन कोण का मान अधिक होता है , जिससे जल अपघटन के बाद घूर्णन की दिशा बदल जाती है क्योंकि बना मिश्रण वाम ध्रुवण घूर्णक होता है अतः सुक्रोज के जल अपघटन को इक्षु शर्करा का प्रतिपन कहते है जबकि ग्लूकोज तथा फ्रुक्टोज के मिश्रण को प्रतीप शर्करा या अपवृत शर्करा कहते है।

सुक्रोज यह अनअपचायक शर्करा है।

माल्टोज (Maltose) :

इसे माल्ट शर्करा कहते है।

इसके जल अपघटन से α – D – ग्लूकोज के दो अणु बनते है।

यह अपचायी शर्करा है।

lactose (लैक्टोज) :

इसे दुग्ध शर्करा भी कहते है।

इसके जल अपघटन से β – D – ग्लैक्टोज   β – D – ग्लूकोज बनते है।

यह अपचायी शर्करा है।

नोट : दो मोनो सैकेराइड की इकाइयां जिस ऑक्साइड बंध द्वारा जुडी होती है उसे ग्लाइकोसाइडी बंध कहते है।

पॉली सेकेराइड क्या है ,पॉलीसैकेराइड (polysaccharide in hindi) , म्यूको पॉलीसैकेराइड , संचायक , संरचनात्मक 

(polysaccharide in hindi) म्यूको पॉलीसैकेराइड , संचायक , संरचनात्मक किसे कहते है , पॉली सेकेराइड क्या है ,पॉलीसैकेराइड ?

पॉली सेकेराइड : वे कार्बोहाइड्रेट जिनके जल अपघटन से अनेक मोनो सैकेराइड बनते है उन्हें पॉलीसैकेराइड कहते है।

म्यूको पॉलीसैकेराइड , संचायक , संरचनात्मक  , पॉलीसैकेराइड क्या है (polysaccharide meaning in hindi) : यह अनेक मोनोसेकेराइड (9 से अधिक) के संघनन से बनता है। इस अभिक्रिया में एक जल के अणु की हानि होती है।

पोलीसैकेराइड को संरचनात्मक रूप से होमोपोलीसैकेराइड तथा हिटरोपोलीसैकेराइड में विभाजित किया गया है। होमोपोलीसेकेराइड में एक ही प्रकार की मोनोसेकेराइड इकाइयाँ होती है। उदाहरण : स्टार्च , ग्लाइकोजन सेल्यूलोज आदि। हिटरोपोलीसैकेराइड में दो या अधिक प्रकार के मोनोसैकेराइड इकाइयां पाई जाती है। उदाहरण : agar , काइटिन , अरेबिनोज आदि।

पॉलीसेकेराइड मीठे नहीं होते है तथा जल में अघुलनशील होते है। ये कोशिका झिल्ली को पार नहीं कर सकते है। ये सक्रीय विधि से विसरित होते है।

पॉलीसैकेराइड मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते है

1. संचायक पॉलीसैकेराइड

2. संरचनात्मक पॉलीसैकेराइड

3. म्यूको पॉलीसैकेराइड

1. भोजन संचायक पॉलीसैकेराइड

(i) स्टार्च : यह अधिकांश पादपों का संचय किया हुआ पोलीसैकेराइड होता है। यह अनाजों जैसे चावल , गेहूँ ,मक्का , बाजरा , आलू , केला , tapioca , legumes में प्रचुर मात्रा में मिलता है। यह क्लोरोप्लास्ट या एमाइलोप्लास्ट में संचयित होते है। स्टार्च के दो घटक होते है। एमाइलोज (अशाखित बहुलक जल में घुलनशील , स्टार्च का 20-30% भाग बनाता है) और एमाइलोपेक्टिन (शाखित बहुलकजल में अघुलनशील स्टार्च का 70-80% भाग बनाती है) | एमाइलोज एक निरंतर सीधी लेकिन हेलीकल आकार में व्यवस्थित श्रृंखला होती है जिसमे प्रत्येक turn (चक्र) में लगभग : ग्लूकोज इकाई होती है। ये निरंतर ग्लूकोज की इकाइयाँ आपस में α (1 → 4) लिंकेज द्वारा जुडी होती है। एमाइलोपेक्टिन स्टार्च अणु का बाह्य शाखित भाग होता है। इसमें 25-30 ग्लूकोज इकाइयों की छोटी श्रृंखला  α (1 → 4) बंध द्वारा जुडी होती है जबकि आपस में  α (1 → 6) बंध द्वारा जुड़ते है। स्टार्च आयोडीन के साथ नीला रंग देता है , यह एमाइलोज भाग के कारण होता है जबकि एमाइलोपेक्टिन आयोडीन के साथ लाल रंग देता है। स्टार्च छोटे छोटे Granules के रूप में होता है जिन्हें स्टार्च ग्रेन्स कहते है।

स्टार्च grains कई प्रकार के हो सकते है।

(a) साधारण परिसरिय स्टार्च ग्रेनउदाहरण : आलू

(b) साधारण एककेन्द्रिक स्टार्च ग्रेनउदाहरण : मक्का , मटर , गेहूँ

(c) कंपाउंड स्टार्च ग्रेन्सउदाहरण : चावल , ओट

(d) डम्ब-बैल आकारीय स्टार्च ग्रेन्सउदाहरण : युफोर्बिया

(ii) ग्लाइकोजन : यह जंतुओं , जीवाणुओं कवकों का संचयित भोजन होता है। इसका संचय आदमी की पेशियों और यकृत में होता है। ग्लाइकोजन अणु में लगभग 30,000 ग्लूकोज इकाइयाँ होती है। ग्लाइकोजन का निर्माण ग्लूकोज से यथावत ग्लाइकोजेनेसिस द्वारा होती है। दो प्रकार के बंध पाए जाते है। सीधे भाग में α (1 → 4) बंध , और शाखित भाग में α (1 → 6) बन्ध पाए जाते। यह आयोडीन विलयन में लाल रंग देता है।

(iii) इन्युलिन : यह सबसे छोटे पोलीसैकेराइड होते है। एक फ्रक्टोज का बना हुआ , असामान्य पोलीसैकेराइड होता है। यह β (2→1) ग्लाईकोसिडिक बंध का बना होता है। इन्युलिन का मानव शरीर में उपापचय नहीं होता है। एवं यह लगातार किडनी में होकर फ़िल्टर की जाती है। इसलिए इसे वृक्क (किडनी) के function (कार्य) की टेस्टिंग में उपयोग करते है। यह कम्पोजिटी फैमिली की जड़ो में संचयित भोजन होता है।  उदाहरण : Dahlia

2. संरचनात्मक पॉलीसैकेराइड

(i) सेल्यूलोज : यह सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला कार्बनिक यौगिक है। यह उच्च तन्यता वाला तन्तुमय होमोपॉलीसैकेराइड है जो कि सभी पादपों कुछ कवकों और प्रोटिस्टस की कोशिका भित्ति के संरचनात्मक तत्व बनाता है। कॉटन फाइबर में लगभग 90% सेल्यूलोज होता है जबकि लकड़ी में 25-50% सेल्युलोज होता है। कोशिका के अन्य पदार्थो में लिग्निन , हेमीसेल्यूलोज , पेक्टिन , मोम आदि शामिल है।

यह सेल्युलोज की श्रृंखला में 6000 या अधिक ग्लूकोज अवशेष होते है , ये क्रमिक ग्लूकोज अवशेष β (1 → 4) बंध द्वारा आपस में जुड़े होते है।

सेल्यूलोज श्रृंखला एक बंद असामानांतर रूप में व्यवस्थित होती है। अणु अन्तराण्विक हाइड्रोजन बंध द्वारा बंधे होते है। यह बंध एक अणु के ग्लूकोज अवशेष के 6th स्थान (पोजीशन) पर उपस्थित हाइड्रोक्सिल समूह एवं दो समीपस्थ अणुओं के ग्लूकोज अवशेष के ग्लाइकोसिडिक ऑक्सीजन के मध्य में होता है। एक माइक्रो फिब्रिल जो इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में दिख सके के निर्माण के लिए लगभग 2000 सेल्युलोज इकाइयाँ तथा अणुओं को साथ में पैक किया जाता है। एक कॉटन फाइबर , 1500 सूक्ष्म तंतुको का बना होता है। सेल्यूलोज , आयोडीन विलयन से अभिक्रिया नहीं करता है।

महत्व :

§  सेल्यूलोज , चतुष्पादी पशुओं जैसे गाय और भैंसों के भोजन का महत्वपूर्ण घटक है। दीमक और घोंघे अपनी आंतो में इस उद्देश्य के लिए सूक्ष्मजीवी को रखते है। ट्राइकोनिम्फा तथा लोफोमोनास सेल्युलोज के पाचन में मदद करते है एवं वे क्रमशः दीमक तथा कोकरोच की आंत में पाया जाता है।

§  सूक्ष्मजीवों का उपयोग सेल्यूलोज से विलेय शर्करा उत्पन्न करने में किया जाता है। फिर शर्कराओं का किण्वन होता है , जिससे एथेनोल , ब्युटेनोल , एसीटोन और मेथेन प्राप्त होता है।

§  मानव भोजन में सेल्युलोज मुख्य घटक होता है , इसमें रफेज वैल्यू होती है जो कि पाचन तंत्र की क्रियाशीलता को बनाये रखने में सहायक है।

§  सेल्यूलोज की अधिकता वाली लकड़ी से कागज का निर्माण होता है।

§  सेल्युलोज की अधिकता वाली लकड़ी को बिल्डिंग फर्नीचर , टूल्स , स्पोर्ट्स आर्टिकल्स आदि बनाने में उपयोग में लिया जाता है।

§  सेल्यूलोज का उपयोग टेक्सटाइल में (उदाहरण : कॉटन , लिनन) , बैग बनाने में (उदाहरण : जूट) या रोप्स (उदाहरण : हेम्प , चीन जूट , डेक्कन हेम्प) में किया जाता है।

§  सेल्यूलोज एसीटेट लकड़ी के गूदे का एसिटिक अम्ल , एसिटिक अनहाइड्राइड आदि से उपचार करने पर बनता है। सेल्यूलोज एसिटेट का उपयोग double knits , टेरीकोट , wrinkle proof तथा moth प्रूफ कपड़े बनाने में किया जाता है। इन तंतुओं से सिगरेट फ़िल्टर भी बनाये जाते है।

§  रेयोन और सेलोफीन , सेल्युलोज जेन्थेट के बने होते है।

§  सेल्यूलोज नाइट्रेट का उपयोग Explosives में भी किया जाता है।

§  कार्बोक्सीमेथिल सेल्यूलोज को पायसीकारक तथा दवाइयों , आइसक्रीम , स्मूथेनिंग अभिकारक के रूप में भी उपयोग में लिया जाता है।

(ii) काइटिन : यह दूसरा सर्वाधिक पाया जाने वाला पॉलीसैकेराइड है। यह एक जटिल हीटरोपॉलीसैकेराइड  है। जो कि कवक भित्ति और आर्थोपॉड्स के बाह्य कंकाल के संरचनात्मक घटकों के रूप में पाया जाता है। यह N-एसीटाइल ग्लूकोसामीन का बहुलक है। यह स्ट्रेंथ तथा प्रत्यास्थता दोनों प्रदान करता है। ये CaCO3 के संसेचन के कारण कठोर हो जाते है। मोनोमर β (1 → 4) द्वारा जुड़े होते है।

(iii) हेमीसेल्यूलोज : यह डी-xylose और xylans , arabans , galactans तथा ग्लुको-mannans की β (1 → 4) लिंकेज वाला होमोपोलीसैकेराइड है। ये पेक्टिक यौगिको और सेल्युलोज माइक्रोफाइब्रिल्स के बीच बंध बनाता है।

(iv) पेक्टिन : ये अरेबिनोज , गेलेक्टोज और गेलेक्टोयुरोमिक अम्ल के बने होते है , ये जल में विलेय होते है तथा इनमे सोल्जेल परिवर्तन हो सकता है। ये पादपों की मध्य लेमिला और कोशिका भित्ति में पाए जाते है।

3. म्यूकोपॉलीसैकेराइड

ये पतले पदार्थ होते है। ये अम्लीय और अमिनिकृत पॉलीसैकेराइड होते है जो गेलेक्टोज , मेन्नोज , शर्करा व्युत्पन्नों और यूरोनिक अम्ल से बनते है। ये पादप कोशिका भित्ति के अन्दर जीवाणु की कोशिका या शरीर के बाहर पाए जाते है।

इनके प्रमुख कार्य निम्न प्रकार है

§  म्यूकोपॉलीसैकेराइड जीवाणुओं और नीली हरी शैवालो की कोशिका दिवार (cell walls) में पाए जाते है। म्युसिलेज जिव को जल के rotting प्रभाव से सुरक्षा करता है तथा यह dessication , एपीफाइट्स की वृद्धि और पैथोजेन्स के आक्रमण को रोकता है।

§  म्यूको पॉलीसैकेराइड के कारण जल अन्तरकोशिकीय spaces में उपस्थित होता है।

§  ये कोशिका भित्ति तथा संयोजी उत्तक में प्रोटीन को जोड़ता है। (bind करता है। )

§  यह लिगामेंट्स और टेंडॉन्स में स्नेहक का कार्य करता है।

§  हाइल्यूरोनिक अम्ल (ग्लूकूरोनिक अम्ल + एसिटिल ग्लूकेसेमाइन) ऐसा म्यूकोपॉलीसैकेराइड है जो जन्तु कोशिका और कोशिका भित्ति के मध्य सीमेंट सामग्री में मिलता है। यह विभिन्न प्रकार के शरीर द्रव्यों में भी मिलता है। जैसे : vitreous humor of eye , synovial fluid , cerebrospinal fluid आदि।

§  किरेटिन सल्फेट सामर्थ्य और तन्यता प्रदान करने के लिए त्वचा और कार्निया में भी होते है।

§  कोंड्रियोटिन सल्फेट , सपोर्ट और प्रत्यास्थता के लिए कार्टिलेज और संयोजी उत्तक में पाया जाने वाला म्यूकोपॉलीसैकेराइडहै।

§  समुद्री शैवाल , से commercial value वाले म्यूकोपॉलीसैकेराइड प्राप्त होते है जैसे : agar , alginie एसिड , carragenin आदि। agar (लाल शैवाल गेलीडियम , ग्रेसीलेरिया से प्राप्त होता है। ) दैनिक उत्पादों , सौन्दर्य प्रसाधनो में , संवर्धन माध्यम , पायसीकरण और स्थायीकारक का काम करता है। एल्जिन का उपयोग आइसक्रीम , शेविंग क्रीम , टूथपेस्ट , कोस्मटिक क्रीम , सॉस में स्थायी कारक के रूप में किया जाता है। केराजैनिन का उपयोग आइसक्रीम , चोकलेट और टूथपेस्ट में पायसिकारक के रूप में किया जाता है। यह जूस , शराब आदि में क्लीयरिंग एजेंट के रूप में कार्य करता है।

§  हिपेरिन म्यूकोपॉलीसैकेराइड एक ब्लड anticoagulant है।

§  प्लान्टागो ओवाटा की हुस्क में म्यूसिलेज पाया जाता है जिसका उपयोग Intestinal problems के उपचार में होता है , यह विरेचक भी होता है।

§  aloe gel : यह जिलेटिननुमा पल्प होता है जो कि Fleshy leaves aloe barbadensis की एपिडर्मिम से प्राप्त होता है। ताजा जैल दाहित क्षेत्र पर लगाने पर आराम देता है। यह शैम्पू , कंडिशनर हैण्डलोशन और सनस्क्रीन क्रीम में भी मिलाया जाता है।

ये निम्न है

A . स्टार्च (Starch) :

§  इसके जल अपघटन से α-D -ग्लूकोज के अनेक अणु बनते है।

§  यह चावल , आलू , मक्का में पाया जाता है।

§  (C6H10O5)n + nH2O → nC6H12O6

§   यह पादपों में संचित खाद्य पदार्थ है।

§  इसके दो घटक होते है

1. एमीलोस (Amylase):

यह स्टार्च का 10-15% भाग बनती है।

यह जल में विलेय होता है।

इसमें α-D -ग्लूकोज की अशाखित श्रृंखला होता है , α-D -ग्लूकोज के अणु C1-C4 ग्लाइको साइडी बंध बनाते है।

2. एमिलोपेक्टीन (Amylopectine):

यह स्टार्च का 80-85% भाग बनती है।

यह जल में अविलेय होता है।

यह शाखित होता है , शाखित भाग या शाखाएं C1-C ग्लाइकोसाइडी बंध बनाती है।

B . सेलुलोज (Cellulose):

§  यह पादपों में कोशिका भित्ति का प्रमुख अवयव है।

§  इसमें जल अपघटन से β-D -ग्लूकोज के अनेक अणु बनते है।

§  यह स्ई तथा जुट में अधिक मिलता है।

ग्लाइकोजन (Glycogen):

इसकी संरचना एमीलोपेक्टीन के समान होती है परन्तु यह एमिलोपेक्टीन से अधिक शाखित होता है।  यह जन्तुओ में पाया जाता है इसे जंतु स्टार्च भी कहते है।

जब शरीर में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है तो ग्लाइकोजन ग्लूकोज में परिवर्तन हो जाता है।

ग्लाइकोजन यकृत मस्तिष्क मांसपेशी में पाया जाता है।

कार्बोहाइड्रेट का महत्व (Importance of carbohydrates):

§  यह हमारे आहार का प्रमुख अवयव तथा ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत है।

§  पादपों की रचना सेलुलोज से होती है अतः इनका उपयोग फर्नीचर बनाने , कागज , वस्त्र उद्योग में , शराब बनाने में किया जाता है।

§  न्यूक्लिक अम्ल में राइबोज़ डी -ऑक्सीराइबोज शर्कराएं पायी जाती है।

α- अमीनो अम्ल , वर्गीकरण , अम्लों के गुण , पेप्टाइड तथा पॉली पेप्टाइड बंध

प्रोटीन (protein) : प्रोटीन प्रोटियोस से बना है जिसका अर्थ प्राथमिक तथा अति महत्वपूर्ण है , यह मूंगफली , दाल , मांस , मछली तथा अंडे में पाया जाता है।

प्रोटीन को बनाने वाली मूलभूत इकाई α- अमीनो अम्ल (α-amino acids) है।

 α- एमीनो अम्लों का वर्गीकरण :

A . -COOH के सापेक्ष -NH2 समूह की स्थिति के आधार पर 

1. α- एमीनो अम्ल

§  ग्लाइसिन

§  एलानिन (ऐलेनिन)

2. β- एमीनो अम्ल

§  β-amino butyric acid (एमिनो ब्यूटरीक अम्ल )

3. γ-एमीनो अम्ल

§  γ-amino valeric acid (एमिनो वलेरिक अम्ल )

B . प्रकृति के आधार पर :

α- एमीनो अम्लों को प्रकृति के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है।

1. उदासीन एमीनो अम्ल

इसमें एक -NH2  एक -COOH समूह होता है।

उदाहरणग्लासिन , एलानिन

2. अम्लीय एमिनो अम्ल :

इनमें -COOH की संख्या -NHसे अधिक होती है।

उदाहरण : ऐस्टार्टिक अम्ल , ग्लूटेमिक अम्ल

3. क्षारीय एमीनो अम्ल :

इनमे -NH2 समूह की संख्या -COOH से अधिक होती है।

उदाहरणलाइसीन

 α- एमीनो अम्लों के गुण :

§  ये रंगहीन क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है।

§  ये जल , अम्ल , क्षार आदि में विलेय होते है।

§  ग्लासिन के अतिरिक्त सभी ध्रुवण घूर्णक होते है क्योंकि इनमे असम्मित कार्बन परमाणु पाया जाता है।

§  प्राकृतिक अमीनो अम्लों का विन्यास प्राय L होता है।

§  ऐमीनो अम्लों में -NH2 समूह क्षारीय प्रकृति का होता है अर्थात यह प्रोटॉन ग्रहण करता है जबकि -COOH समूह अम्लीय प्रकृति का होता है। अर्थात यह प्रोटोन त्यागता है दोनों की पारस्परिक क्रिया से आंतरिक लवण का निर्माण होता है जिसे उभयधर्मी आयन या ज्वीटर आयन कहते है।

पेप्टाइड तथा पॉली पेप्टाइड बंध (Peptide and poly peptide bond):

जब दो α- एमीनो अम्ल पास पास में आते है तो एक का -NH2 समूह दूसरे के -COOH समूह से क्रिया कर -CONH बंध का निर्माण करता है इसे पेप्टाइड बंध कहते है तथा बनने वाले अणुओं को डाई पेप्टाइड अणु कहते है।

नोट  : इसी प्रकार जब तीन , चार , पांच α- एमीनो अम्ल परस्पर क्रिया करते है तो बनने वाले अणुओं को ट्राई , टेट्रा , पेंटा पेप्टाइड कहते है।

नोट : जब 10 से अधिक एमीन अम्ल परस्पर मिलते है तो उसे पॉलीपेप्टाइड अणु कहते है।

नोट : वह पॉलीपेप्टाइड जो 100 से अधिक α- एमीनो अम्लों के मिलने से बनता है उसे प्रोटीन कहते है ,इनका अणुभार 10000 से अधिक होता है।

प्रोटीन का वर्गीकरण, संरचना ,α-हैलिक्स चित्र ,आवश्यक अनावश्यक अमीनो अम्ल , विकृतिकरण

आणविक आकृति के आधार पर प्रोटीन का वर्गीकरण :

1. रेशेदार प्रोटीन : इसमें पॉलीपेप्टाइड की श्रृंखलाएं एक दूसरे के समानांतर होती है जिनके मध्य हाइड्रोजन बंध , डाई सल्फाइड बंध होते है।  यह जल में अविलेय होती है।

उदाहरण : किरेटिनबाल , ऊन में

मायोसीनमांसपेशियों में।

2. गोलिका का प्रोटीन : इसमें पॉलीपेप्टाइड की श्रंखला कुंडलित होकर गोलीय आकृति ग्रहण कर लेती है यह जल में विलेय होती है।

उदाहरणइन्सुलिन , एल्बुमिन

प्रोटीन की संरचना एवं आकृति :

प्रोटीन की संरचना का अध्ययन चार स्तरों पर किया जाता है।

1. प्राथमिक संरचना : प्रोटीन की प्राथमिक संरचना इस तथ्य को निर्धारित करती है की पॉलीपेप्टाइड की श्रृंखला में कितने α- एमिनो अम्ल है तथा उनका क्रम क्या है यदि इनमे से एक भी एमिनो अम्ल अपने स्थान से हट जाता है और उसके स्थान पर दूसरा एमिनो अम्ल जाये तो नयी किस्म की प्रोटीन बन जाती है।

2. द्वितीयक संरचना : जब प्राथमिक संरचना विशेष आकृति लिए हुए होती है तो उसे द्वितीयक संरचना कहते है यह संरचना दो प्रकार की होती है।

§  α-हैलिक्स – यह सर्पिलाकार होती है इसकी आकृति को दक्षिणावर्ती पेच के समान माना जाता है इसमें अनेक हाइड्रोजन बंध बनते है।  उदाहरणबालउन

§  β-प्लीटेड शीट संरचना – इसमें पॉलीपेप्टाइड की श्रृंखला एक दूसरे के पाश्र्व में स्थित होती है , ये श्रृंखलाएं अधिकतम विस्तारित खींची हुई होती है।  उदाहरणरेशम

3. तृतीयक संरचना : जब प्रोटीन की द्वितीयक संरचना में अनेक वलन (लिपटना) होते है तो तृतीयक संरचना का निर्माण होता है जिससे दो प्रकार की आणविक आकृतियां बनती है जैसे रेशेदार और गोलिकाकार

4. प्रोटीन की चतुष्मक संरचना :

यह त्रिविमीय होती है।

इसमें असंख्य वलन होते है।

इसकी संरचना को उलझे हुए धागे के समान माना जा सकता है।

पॉलीपेप्टाइड की श्रृंखला में निम्न बंध या बल पाए जाते है

§  हाइड्रोजन बंध

§  डाइसल्फाइड बंध

§  वांडरवाल बल

§  स्थिर वैधुत आकर्षण बल

 α-हैलिक्स का नामांकित चित्र बनाइये 

 

प्रश्नआवश्यक अनावश्यक एमिनो अम्ल क्या है उदाहरण दीजिये

उत्तर : 1. आवश्यक ऐमीनो अम्ल : वे ऐमीनो अम्ल जिनका संश्लेषण सजीव के शरीर में होता है उन्हें अनाश्यक ऐमीनो अम्ल कहते है।

उदाहरणग्लाइसिन , एलानिन , प्रोलीन

2. आवश्यक ऐमीनो अम्ल : मनुष्य तथा उच्च श्रेणी के जन्तुओ में कुछ ऐमीनो अम्लों का संश्लेषण नहीं होता शरीर में इनकी कमी शरीर रोग ग्रस्त हो जाता है , इन्हे आहार के रूप में बाहर से ग्रहण करना पड़ता है इन्हे आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहते है।

उदाहरणट्रिप्टोफेन , वैलीन , मेथिओनीन , आइसोल्यूसिन , ल्युसीन ,लायसीन , फेनिल एलानिन , आर्जीनीन , थ्रिओनिन , हिस्टीडीन

प्रोटीन का विकृतिकरण :

प्रोटीन विशिष्ट संरचना युक्त तथा विशेष कार्य के लिए उत्तरदायी होती है , प्रोटीन को गरम करने , pH में परिवर्तन करने , रासायनिक क्रिया द्वारा इसका स्कंदन हो जाता है अर्थात प्रोटीन का विकृतिकरण हो जाता है।

प्रोटीन के विकृतिकरण से उसकी जैविक क्रिया समाप्त हो जाती है।

प्रोटीन के विकृतिकरण से प्राथमिक संरचना में कोई परिवर्तन नहीं होता परन्तु द्वितीयक , तृतीय , चतुष्क संरचनाएं नष्ट हो जाती है।

उदाहरणदुग्ध का दही में बदलना , अंडे को उबालने पर प्रोटीन का स्कंदन होना।

विटामिन क्या है , प्रकार ,न्यूक्लिक अम्ल , संरचना , RNA तथा DNA में अन्तर , महत्व , एन्जाइम

विटामिन (What is vitamins): आहार के साथ लिए जाने वाले वे कार्बनिक पदार्थ जो विशिष्ट जैविक क्रिया के लिए उत्तरदायी होते है जिससे की जीव की इष्टतम वृद्धि तथा स्वास्थ्य का रख रखाव हो सके उन्हें विटामिन कहते है।

विटामिन A , B , C , D , E आदि प्रकार के होते है।

विटामिन का वर्गीकरण :

विलेयता के आधार पर ये दो प्रकार के होते है।

1.     वसा विलेय विटामिनये जल में अविलेय परन्तु तेल वसा में विलेय होते है जैसेविटामिन A , D , E , K

2.     जल विलेय विटामिनये वसा में अविलेय परन्तु जल में विलेय होते है जैसे विटामिन B , C

नोट : ये विटामिन शरीर में संचित नहीं होते परन्तु जल में विलेय होने के कारण मूत्र द्वारा उत्सर्जित हो जाते है अतः शरीर में इनकी आपूर्ति बनी रहनी चाहिए।

विटामिन की कमी से होने वाले रोगों को अभाव रोग कहते है।

 विटामिन

 अभाव रोग

 स्त्रोत

 विटामिन – A

 रात्रि अंधता या रतौंधी

 B1

 बेरी -बेरी

 B

 होठ का फटना

 B

 मरोड़ आना

 B12 

 RBC में HB की कमी होना

 C

 स्कर्वी

 D

 रिकेट्स

 E

 RBC का भूर भूरा होना

 K

 रक्त का थक्का देरी से बनना

न्यूक्लिक अम्ल :

जीवों के वे गुण जो एक पीढ़ी से दूरी पीढ़ी में जाते है उन्हें अनुवांशिक गुण कहते है , केन्द्रक में उपस्थित गुणसूत्र अनुवांशिक गुणों के लिए उत्तरदायी होते है , ये गुणसूत्र प्रोटीन न्यूक्लिक अम्ल के बने होते है न्यूक्लिक अम्ल दो प्रकार के होते है।

1.     राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल (RNA)

2.     डी ऑक्सी राइबोज न्यूक्लिक अम्ल (DNA)

न्यूक्लिक अम्ल का संगठन : न्यूक्लिक अम्ल के पूर्ण जल अपघटन से निम्न पदार्थ बनते है

A . शर्करा

B . क्षार

C . फॉस्फोरिक अम्ल

(A) . शर्करा : यह दो प्रकार की होती है

§  β-D-राइबोस

§   β-D-2 डी ऑक्सी राइबोज़

न्यूक्लिक अम्ल की संरचना :

§  शर्करा तथा क्षार मिलकर न्यूक्लिओ साइड का निर्माण करते है।

§  शर्करा के C’ कार्बन से क्षार जुड़ता है।

§  न्यूक्लिओ साइड तथा फास्फोरिक अम्ल मिलकर न्यूक्लिओटाइड बनते है।

§  बहुत सारे न्यूक्लिओटाइड पॉली न्यूक्लिओटाइड बनाते है जिसे न्यूक्लिक अम्ल कहते है।

§  दो न्यूक्लिओटाइड जिस बंध से जुड़े होते है उसे फास्फोडाइऐस्टर बंध कहते है , यह बंध शर्करा के 3′ 5′ कार्बन के मध्य बंधता है।

DNA (डीएनए ) की संरचना :

§  डीएनए की संरचना द्वीकुण्डलित होती है।

§  इसमें पॉली न्यूक्लिओटाइड की दो शृंखला होती है जिन्हे रज्जुक कहते है।

§  दोनों रज्जुक एक दूसरे से हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़े होते है।

§  एक रज्जुक पर लगे प्यूरीन क्षार दूसरे रज्जुक पर लगे पिरिडिमिन क्षारों के ठीक सामने होते है यहाँ A , T के साथ द्वी हाइड्रोजन बंध द्वारा , G , C के साथ तीन हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़े होते है।

§  क्षार युग्म विशिष्टता के आधार पर एक रज्जुक पर लगे क्षारों का क्रम दूसरे रज्जुक पर लगे क्षारो के क्रम को निर्धारित करता है , अतः हम कह सकते है की दोनों रज्जुक एक दूसरे के समान तो नहीं होते परन्तु एक दूसरे के पूरक होते है।

RNA की संरचना :

§  RNA यह एक कुंडलित होता है , इसमें राइबोज शर्करा होती है इसमें थाइमिन क्षार नहीं होता ये तीन प्रकार के होते है।

m – RNA

r – RNA

T – RNA

न्यूक्लिक अम्ल का जैविक महत्व :

§  अनुवांशिक गुणों को एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में पहुंचाने में।

§  जीवों के विभिन्न प्रजातियों की पहचान में।

§  DNA में स्व प्रतिकरण का गुण पाया जाता है।

§  RNA प्रोटीन संश्लेषित में सहायक है परन्तु प्रोटीन संश्लेषण का सन्देश DNA में उपस्थित रहता है।

RNA तथा DNA में क्या अन्तर है ?

 RNA

 DNA

 1. इसमें रज्जुक कुंडलित अवस्था में होता है

 इसमें दो रज्जुक द्वीकुंडलित अवस्था में होते है।

 2. इसमें β-D-राइबोस शर्करा होती है।

 इसमें β-D-2 डी ऑक्सी राइबोज़ शर्करा होती है।

 3. इसमें AGCU क्षार होते है।

 इसमें ATCG क्षार होते है।

 4. यह प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करता है

 यह अनुवांशिक गुणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाता है

 5. यह मुख्यत कोशिका द्रव्य में पाया जाता है

 यह केन्द्रक में पाया जाता है।

 6. इसमें स्व प्रतिकरण का गुण नहीं होता

 इसमें स्व प्रतिकरण का गुण पाया जाता है।

 7. ये तीन प्रकार के होते है

 यह एक ही प्रकार का होता है।

एन्जाइम :

गोलिकाकार प्रोटीन के बने हुए वे कार्बनिक पदार्थ जो जैव रासायनिक क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम करते है उन्हें एंजाइम कहते है , इनके नाम का अंत में प्राय लगाया जाता है।

 

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