chemistry12th chapter-12 एलडीहाइड्स, केटोनस और कार्बोक्जिलिक एसिड (Aldehydes, Ketones and Carboxylic Acids)

 एलडीहाइड्स, केटोनस और कार्बोक्जिलिक एसिड

परिचय , नामकरण , ऐल्डिहाइड तथा कीटोन दोनों के बनाने की विधियाँ

परिचय :

1.     C=O समूह को कार्बोनिल समूह कहते है।

2.     यदि इसकी दोनों संयोजकताएँ -H से अथवा एक संयोजकता -H से दूसरी संयोजकता R- से जुडी हो तो एल्डिहाइड बनते है।

3.     कार्बोनिल समूह की दोनों संयोजकताएँ एल्किल समूह से जुडी हो तो किटोन बनते है।

4.     एल्डिहाइड कीटोन को सम्मिलित रूप से कार्बोनिल है।

5.     इनका सामान्य सूत्र CnH2nOहोता है।

नामकरण :

1.     एल्डिहाइड कीटोन का IUPAC नाम क्रमशः alkanol alkanone कहते है।

2.     रूड़नाम form , acet , propaion , buter , valer के आधार पर दिया जाता है तथा अन्तः में एल्डिहाइड लगा देते है।

H-CHO Formaldehyde methanol

CH3-CHO axetaldehyde ethanol

CH3-CH2-CH2-CHO butyr aldehyde butanol

नोट  :

–          –    +   – CHO alkanol

= + -CHO alkanol

= + -CO- alkenone

-CHO + -CHO alkanedial

3. यदि एल्डिहाइड कीटोन दोनों एक ही यौगिक में उपस्थित है तो एल्डिहाइड की तरफ से अंक देने चाहिए यौगिक का नाम alkanol के आधार पर दिया जाता है जबकि कीटोन का नाम 0 x 0 के रूप में पूर्व लग्न बनाकर देते है। 

समावयवता :

एल्डिहाइड कीटोन एक दूसरे के समावयवी होते है क्योंकि दोनों का सूत्र CnH2nOहोता है।

 एल्डिहाइड तथा कीटोन दोनों के बनाने की विधियां :

1.     एल्कोहल के विहाइड्रोजनन से : यह क्रिया (CU) कॉपर की उपस्थित में 573k ताप की उपस्थिति में की जाती है , इस क्रिया में 10एल्कोहल से एल्डिहाइड जबकि 2एल्कोहल से किटोन बनते है।

CH3-OH → HCHO + H2

CH3-CH2-OH → CH3-CHO + H2

R-CH2-OH → R-CHO + H2

2.     एल्काइन के जलयोजन से :

यह क्रिया तनु H2SOकी उपस्थिति में की जाती है।

असममित एल्काइन से क्रिया मारकोनी कॉफ नियम से होती है।

3.     एल्कोहल के ऑक्सीकरण से :

1एल्कोहल के ऑक्सीकरण एल्डिहाइड जबकि 2एल्कोहल से कीटोन बनते है।

R-CH2-OH + O → R-CHO + H2O

रोजेन मुण्ड अपचयन , स्टीफैन , ईटार्ड , गाटरमान कॉख , फ्रीडल क्राफ्ट अभिक्रिया

एल्डिहाइड बनाने की विधियां :

रोजेन मुण्ड अपचयन

1.     जब एल्केनॉयल क्लोराइड का अपचयन Pd तथा BaSO4की उपस्थिति में H2से क्रिया जाता है तो एल्डिहाइड बनते है।

CH3-CO-Cl + H2 → CH3-CHO + HCl

C6H5-CO-Cl + H2 → C6H5-CHO + HCl

2.     स्टीफैन अभिक्रिया :

जब सायनाइड का अपचयन SNCl सांद्र HCl की उपस्थिति में किया जाता है तो एल्डीमीन बनता है इसके जल अपघटन से एल्डिहाइड बनते है।

नोट : यदि सायनाइड की क्रिया DIBAL-H तथा जल अपघटन किया जाता है तो एल्डिहाइड बनते है।

R-CN → R-CHO

प्रश्न : DIBAL-H का पूरा नाम सूत्र लिखिए।

उत्तर : डाई आइसो ब्यूटिल एलुमिनियम हाइड्राइड

3.     ईटार्ड अभिक्रिया :

जब टालुइन का ऑक्सीकरण क्रोमिल क्लोराइड जल से किया जाता है तो बेन्जेल्डिहाइड बनता है।

4.     गाटरमान कॉख अभिक्रिया :

जब बेंजीन की क्रिया कार्बन मोनो ऑक्साइड के साथ HCl तथा निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में की जाती है तो C6H5-CHO बनता है।

केवल कीटोन बनाने की विधियां :

1.     फ्रीडल क्राफ्ट अभिक्रिया :

जब बेंजीन की क्रिया CH3-COCl or C6H5-COCl से की जाती है तो क्रमशः एसिटोफिनोन बेंजो फिनॉन बनते है।

2.     जब डाई सेल्किलकैडमियम की क्रिया एसील क्लोराइड से की जाती है तो कीटोन बनते है।

3.     एल्किल सायनाइड की क्रिया ग्रिंयार अभिकर्मक से की जाती है तो बने पदार्थ के जल अपघटन से कीटोन बनते है।

कार्बोनिल यौगिक के भौतिक गुण , संरचना , क्वथनांक के बढ़ते क्रम , कार्बोनिल समूह का चित्र

physical properties of carbonyl compounds in hindi कार्बोनिल यौगिक के भौतिक गुण , संरचना , क्वथनांक के बढ़ते क्रम , कार्बोनिल समूह का चित्र  ?

कार्बोनिल यौगिक के भौतिक गुण :

1 HCHO के 40% जलीय विलयन में फॉर्मेलिन कहते है यह कीटाणुनाशी पदार्थ है।

2. HCHO , CH3-CHO , CH3-CO-CH3  तीक्ष्ण गंध युक्त पदार्थ है।

3. कार्बन की संख्या बढ़ने के साथ साथ तीक्ष्ण गंध का आना कम हो जाता है जबकि सुहावनी गन्ध आने लगती है।

4. HCHO , CH3-CHO , CH3-CO-CH जल के साथ हाइड्रोजन बंध बना लेते है अतः ये जल में विलेय होते है।

5. कार्बन की संख्या बढ़ने के साथ साथ जल विरोधी भाग बढ़ता जाता है , जल के साथ हाइड्रोजन बंध बनाने की क्षमता कम होती जाती है अतः जल में विलेयता कम होती जाती है।

6. एल्कोहल का क्वथनांक कार्बोनिल यौगिक से अधिक होता है क्योंकि एल्कोहल में अंतराणुक हाइड्रोजन बंध कारण संगुणन हो जाता है।

7. कार्बोनिल यौगिक में कीटोन का क्वथनांक अधिक होता है क्योंकि एल्डिहाइड की तुलना में कीटोन अधिक ध्रुवीय होते है जिससे कीटोन के अणुओं के मध्य प्रबल द्विध्रुव द्विध्रुव आकर्षण होता है।

8. कर्बोनिल यौगिको का क्वथनांक ईथर से अधिक होता है क्योंकि ether कम ध्रुवीय होते है।

9. एल्केन के अणुओं के मध्य दुर्बल वांडरवाल बल होते है इसका क्वथनांक सबसे कम होता है।

प्रश्न 1 : निम्न को क्वथनांक के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिये।

propanol ,  propanone , methoxy methane , butane , propan -1 -ol

उत्तर : butan < methoxy methane < propanol < propanon < propan-1-ol

कार्बोनिल समूह की संरचना :

1. कार्बोनिल समूह में कार्बन ऑक्सीजन दोनों को SP2 संकरण होता है।

C6 = 1S2 2S2 2P2    , O8 = 1S2 2S2 2P4

2. कार्बन के तीन  SP2 संकरण कक्षक तीन सिग्मा बंध का निर्माण करते है।

3. कार्बन ऑक्सीजन पर एक एक अर्द्धपूर्ण असंतृप्त p कक्षक शेष रह जाता है जो पाश्विक अतिव्यापन से पाई बंध का निर्माण करता है।

4. ऑक्सीजन की विद्युत ऋणता अधिक होने के कारण पाई बंध के इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन की ओर विस्थापित हो जाता है जिससे ऑक्सीजन पर आंशिक ऋणावेश कार्बन पर आंशिक धनावेश जाता है , अतः कार्बोनिल समूह ध्रुवीय प्रकृति का होता है।

कार्बोनिल समूह (carbonyl group) : वे द्विसंयोजी समूह जिनमे कार्बन ऑक्सीजन द्विबन्ध से जुड़े होते है , कार्बोनिल समूह कहलाते है।

एल्डिहाइड कीटोन में कर्बोनिल ग्रुप पाया जाता है।

एल्डिहाइड : यदि कर्बोनिल समूह की एक संयोजकता एल्किल या एरिल समूह द्वारा दूसरी संयोजकता हाइड्रोजन द्वारा जुडी हो तो ऐसे यौगिक एल्डीहाइड कहलाते है।

अपवाद : फार्मेल्डिहाइड में कर्बोनिल की दोनों संयोजकता हाइड्रोजन द्वारा जुडी होती है।

कीटोन : इसमें कर्बोनिल समूह की दोनों संयोजकता एल्किल या एरिल समूह द्वारा जुडी हो तो ऐसे यौगिक किटोन कहलाते है।

एल्डिहाइड कीटोन में नाभिक स्नेही योगात्मक अभिक्रिया

नाभिक स्नेही योगात्मक अभिक्रिया Nuclei adductive reaction in carbonyl :

वे अभिक्रियाएं जिनमे नाभिक स्नेही पहले इलेक्ट्रॉन स्नेही बाद में प्रहार करता है उन्हें नाभिक स्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते है।

ये क्रियाएँ एल्डिहाइड कीटोन में होती है।

नोट : कार्बोनिल समूह के कार्बन पर electron का घनत्व जितना कम होता है Nu (न्यूक्लियो) उतने ही सुगमता से प्रहार करता है जिससे नाभिक स्नेही योगात्मक अभिक्रिया तेज (फास्ट) गति से होती है।

नोट : कार्बोनिल समूह के कार्बन पर जितने ज़्यादा बेड आकार के एल्किल समूह जुड़े होते है , +I प्रभाव के कारण कार्बोनिल समूह के कार्बन पर इलेक्ट्रॉन का घनत्व बढ़ जाता है जिससे इन अभिक्रियाओं के प्रति क्रियाशीलता कम हो जाती है।

यदि कार्बोनिल समूह के कार्बन पर बेंजीन वलय जुडी हो तो अनुनाद के कारण कार्बन पर इलेक्ट्रॉन का घनत्व बढ़ जाता है।  जिससे Nu का प्रहार आसानी से नहीं होता अतः एरोमैटिक कार्बोनिल यौगिक नाभिक स्नेही योगात्मक अभिक्रिया अभिक्रिया के प्रति कम क्रियाशीलता होता है।

A . रासायनिक गुण :

1. HCN क्रिया करने पर सायनो हाइड्रीन बनता है।

सोडियम हाइड्रोजन सल्फाइड से क्रिया करने पर क्रिस्टलीय योगात्मक उत्पाद बनते है।

नोट : उपरोक्त क्रिया में बने पदार्थों की क्रिया अम्ल या क्षार से करने पर पुन: कार्बोनिल यौगिक बन जाते है।

2. अमोनिया के व्युत्पन्नों से क्रिया

हाइड्रोक्सिल ऐमीन (H2N-OH) से क्रिया करने पर ऑक्सिम बनते है।

हाइड्रेज़ीन से क्रिया करने पर हाइड्रोजन बनते है।

फेनिल हाइड्रेज़ीन से क्रिया करने पर फेनिल हाइड्रोजोन बनते है।

2,4 डाई नाइट्रोफेनिल हाइड्रेज़ीन (2,4 DNP) से क्रिया करने पर 2 , 4 डाई नाइट्रोफेनिल हाइड्रेज़ोन बनते है।

सेमी कार्बेजाइड से क्रिया करने पर सेमी कार्बेजोन बनते है।

एल्किल ऐमीन से क्रिया करने पर शिफ़ क्षार बनते है।

एल्कोहल से क्रिया :

एल्डिहाइड एल्कोहल से क्रिया करके पहले हेमिएसीटैल बनाते है जो पुन: एल्कोहल से क्रिया करके एसिटैल बनाते है।

कीटोन एल्कोहल से क्रिया नहीं करते परन्तु एथिलीन ग्लाइकोल से क्रिया करके चक्रीय कीटैल बनाते है।

क्लीमेन्सन अपचयन , वोल्फ किश्नर , फेलिंग विलयन & टॉलेन अभिकर्मक से क्रिया

अपचयन :

LiAlH4 , NaBH4 , H2/Ni की उपस्थिति में एल्डिहाइड के अपचयन से 10 ऐल्कोहल बनते है जबकि कीटोन के अपचयन से 20 एल्कोहल बनते है।

क्लीमेन्सन अपचयन (Clemenson deprecation):

यह कार्बोनिल यौगिकों को एल्केन में अपचयित कर देता है , इस क्रिया में -CO- समूह -CH2– समूह में बदल जाता है।  इसमें जिंक अमलगम सान्द्र HCl उत्प्रेरक काम में लेते है।

वोल्फ किश्नर (Wolf Kishner) :

जब कार्बोनिल यौगिको के हाइड्रेज़ोन व्युत्पन्नों को एथिलीन ग्लाइकोन तथा KOH के साथ गरम किया जाता है तो एल्केन बनती है।

ऑक्सीकरण

अम्लीय KMnO4 , क्षारीय KMnO4 , अम्लीय K2Cr2O7 ,  तनु HNO3  ,  टॉलेन अभिकर्मक , फेलिंग विलयन आदि द्वारा एल्डिहाइड ऑक्सीकृत होकर कार्बोक्सिलिक अम्ल बनते है।

HCHO + (O) →  H-COOH

CH3-CHO + (O) → CH3-COOH

R-CHO + (O) →  R-COOH

फेलिंग विलयन से क्रिया (reaction from Failing Solutions) :

यह दो विलयनों को मिलाने से बनता है।

 फेलिंग विलयन(A) : यह कॉपर सल्फेट का जलीय विलयन है।

फेलिंग विलयन (B) : यह सोडियम पोटेशियम टार्टरेट (रिशेल लवण) NaOH का जल में बना रंगहीन विलयन है।

1.     सभी एल्डिहाइड फेलिंग विलयन के साथ क्यूप्रस ऑक्साइड का लाल विलयन बनाते है।

R-CHO + 2Cu2+ + 5OH → Cu2O + R-COO + 3H2O

नोट : यदि उपरोक्त समीकरण हो तो निम्न समीकरण भी लिख सकते है।

R-CHO + 2CuO → Cu2O + R-COOH

2.     टॉलेन अभिकर्मक से क्रिया (Tollen reagent reaction):

AgNOमें NH4-OH मिलाने पर  टॉलेन अभिकर्मक बनता है।

AgNO + NH4-OH  →  AgOH + NH4NO3

Ag2भी NH4OH  से क्रिया कर लेता है तथा [Ag(NH3)2]OH बना लेता है इसे टॉलेन अभिकर्मक कहते है।

Ag2O + 4NH4OH →  2[Ag(NH3)2]OH + 2H2O

सभी एल्डिहाइड टॉलेन अभिकर्मक से क्रिया करके रजत दर्पण बनाते है।

R-CHO + 2[Ag(NH3)2]OH → 2Ag + 4NH3 + H2O + R-COOH

Or

R-CHO + Ag2O → 2Ag + R-COOH

नोट : कीटोन टॉलेन अभिकर्मक फेलिंग विलयन को अपचयित नहीं करते है।

प्रश्न 1 : एथेनॉल प्रोपेनोन में विभेद के लिए एक परिक्षण लिखो।

उत्तर : एथेनॉल टॉलेन अभिकर्मक से क्रिया करके रजत दर्पण बनाता है जबकि प्रोपेनोन यह परिक्षण नहीं देता।

CH3-CHO + Ag2O → 2Ag + CH3-COOH

CH3-CO-CH3 + Ag2O → XXXXXXXX

प्रश्न 2  : बेन्जेल्डिहाइड तथा एसिटोफिनोन में विभेद के लिए एक परिक्षण लिखिए।

उत्तर : बेन्जेल्डिहाइड टॉलेन अभिकर्मक से क्रिया करके रजत दर्पण बनाता है जबकि एसिटोफिनोन यह परिक्षण नहीं देता।

C6H5-CHO + Ag2O → C6H5-COOH + 2Ag

C6H5-CO- CH3 + Ag2O → XX

हैलोफार्म अभिक्रिया , ऐल्डोल संघनन , क्रॉस ऐल्डोल संघनन , कैनिजारो अभिक्रिया

हैलोफार्म अभिक्रिया (Hallofarm reaction):

वे यौगिक जिनकी संरचना

जैसी होती है वे समस्त पदार्थ हैलोजन क्षार से क्रिया करके हैलोफॉर्म अभिक्रिया कहते है।

नोट : CH3-CHO , CH3-CH2-OH , CH3-CO-CH3 , CH3-CH2-CO-CH3 , C6H5-CO-CH3 , CH3-CH[OH]-CHआदि पदार्थ हैलोफॉर्म अभिक्रिया प्रदर्शित करते है।

प्रश्न : एथेनॉल प्रोपेनल में अंतर दीजिये :

उत्तर : एथेनॉल आयोडोफॉर्म परिक्षण देता है जबकि प्रोपेनल यह परिक्षण नहीं देता।

CH3-CHO + 3I2 + 4NaOH → CHI3 + 3NaI + 3H2O + HCOONa

CH3-CH2-CHO + I2 + NaOH → XX

ऐल्डोल संघनन (Edel condensation):

वे कार्बोनिल यौगिक जिनके α कार्बन पर H परमाणु होते है वे ऐल्डोल संघनन की क्रिया प्रदर्शित करते है।  यह क्रिया तनु क्षार जैसे NaOH , Ba(OH)की उपस्थिति में होती है।

जब α हाइड्रोजन परमाणु युक्त एल्डिहाइड अथवा कीटोन की क्रिया तनु क्षार की उपस्थिति में की जाती है तो क्रमशः ऐल्डॉल तथा कीटोल बनते है जिन्हे गर्म करने पर असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक बनते है।

क्रॉस ऐल्डोल संघनन (Cross aldol condensation):

जब दो अलग अलग कार्बोनिल यौगिकों में ऐल्डोल संघनन की क्रिया होती है तो इसे क्रॉस ऐल्डोल संघनन कहते है।

इस क्रिया में दोनों एल्डिहाइड अलग अलग या दोनों कीटोन अलग अलग अथवा एक एल्डिहाइड दूसरा कीटोन भाग ले सकते है परन्तु दोनों में से किसी कार्बोनिल यौगिक में α कार्बन पर H अवश्य जुडी होनी चाहिए।

एथेनेल (ehanal) प्रोपेनेल (propanal) के क्रॉस ऐल्डोल संघनन से निम्न प्रकार से चार संभावित उत्पाद बनते है। कैनिजारो अभिक्रिया (Canisar Reaction):

वे एल्डिहाइड जिनके α कार्बन पर H परमाणु नहीं होता , वे सांद्र NaOH अथवा KOH के साथ क्रिया कर लेते है जिससे एल्डिहाइड के एक अणु का ऑक्सीकरण दूसरे अणु का अपचयन हो जाता है।

2HCHO + NaOH →  HCOONa + CH3-OH

2C6H5-CHO + KOH →  C6H5-COOK + C6H5-CH2-OH

ऐरोमैटिक कार्बोनिक यौगिकों की इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया :

बेन्जेल्डिहाइड तथा एसिटोफिनोन में ये क्रियाएं m (मेटा) पर होती है।

कार्बोक्सिलिक अम्ल क्या है , नामकरण , बनाने की विधियां , Carboxylic acid

कार्बोक्सिलिक अम्ल (Carboxylic acid)

परिचय :

1.     -COOH को कार्बोक्सिलिक अम्ल कहते है।

2.     इसका सामान्य सूत्र CnH2n+1-OOH या  CnH2nO2होता  है।

3.     इनका IUPAC नाम Alkanoic acid होता है।

4.     इनका साधारण नाम Form , acet , propion , buter , veler , capro अंत ic acid लगाकर नाम दिया जाता है। 5. अंत में सभी कार्बोक्सिलिक अम्ल NaHCO3से क्रिया करके COगैस बाहर निकालते है।  (पहचान के लिए परिक्षण )

R-COOH + NaHCO3 → R-COONa + CO2 + H2O

H-COOH

Formic acid

Methanoic acid

CH3-COOH

Acetic acid

Ethanoic acid

CH3-CH2COOH

Propic acid

Propanoic acid

CH3-CH2-CH2-COOH

Butyric acid

Butanoic acid

2(COOH)

 ऑक्सेलिक अम्ल

Ethane-1,2.dioic acid

HOOC-CH2-COOH

 मेलोनिक अम्ल

Propane-1,3-dioic acid

HOOC-CH2-CH2-COOH

 सक्सिनिक अम्ल

Butan-1,4, dioic acid

HOOC-(CH2)3-COOH

 ग्लूटेरिक अम्ल

Pentan-1,5-dioic acid

HOOC-(CH2)4-COOH

 एडीपिक अम्ल

Hexan-1,6-dioic acid

C6H5-COOH

 x

Benzoic acid या बेंजीन कार्बोक्सिलिक अम्ल

C6H5-CH2-COOH

 फेनिल एसिटिल अम्ल

2-phenyl ethanoic acid

 कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाने की विधियां (Methods of making carboxylic acid):

 RMgX की क्रिया ठोस CO2 से करने पर तथा बने पदार्थ के जल अपघटन से 

CH3-MgX + CO2 → CH3-COOMgX   (+H2O)→ CH3-COOH

C6H5-MgBr +  + CO2 → C6H5-COOMgBr → C6H5-COOH

नोट : इस विधि से फॉर्मिक अम्ल नहीं बनाया जा सकता।

सायनाइड के पूर्ण जल अपघटन से :

R-CN + H2O → R-CO-NH2

R-CO-NH2 + H2O → R-COOH + NH3

R-CN + 2H2O →  R-COOH + NH3

C6H5-CN + 2H2O → C6H5-COOH + NH3

अम्ल क्लोराइड के जल अपघटन से :  

R-COCl + H-OH → HCl + R-COOH

CH3-COCl + H-OH → HCl + CH3-COOH

C6H5-COCl + H-OH → HCl + C6H5-COOH

ऐमाइड के पूर्ण जल अपघटन से

R-CO-NH2 + H-OH → NH3 + R-COOH

CH3– CO-NH+ H-OH → NH3 + CH3-COOH

C6H5-CO-NH2 + H-OH → NH3  + C6H5– COOH

एस्टर के जल अपघटन से :   

एस्टर का अम्लीय माध्यम में जल अपघटन करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल ऐल्कोहल बनते है जबकि क्षारीय माध्यम में जल अपघटन करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल का लवण तथा एल्कोहल बनते है।

R-COOR + H-OH → R-COOH + R-OH

CH3-COOC2H5 + H-OH → CH3-COOH + C2H5-OH

CH3-COOC2H5 + NaOH → CH3-COONa + C2H5-OH → CH3-COOH + Na

एल्डिहाइड या एल्कोहल के ऑक्सीकरण से 

R-CHO + (O) → R-COOH

R-CH2-OH + (O) → R-CHO → R-COOH

नोट : जोन्स अभिकर्मक CrO3 तथा सांद्र H2SO4 सीधे ही 10 एल्कोहल को कार्बोक्सिलिक अम्ल में बदल देता है।

R-CH2-OH + 2(O) → R-COOH + H2O

एल्किल बेंजीन का क्षारीय KMnO4 तथा जल द्वारा ऑक्सीकरण करने पर  

इस क्रिया में बेंजीन वलय से कितनी ही लम्बी श्रृंखला वाला एल्किल समूह जुड़ा हो वह हमेशा COOH में परिवर्तित हो जाता है।

नोट : बेंजीन वलय से 10 या 2एल्किल समूह जुड़ा होने पर ही क्रिया होती है जबकि 3एल्किल समूह जुड़ा होने पर कोई क्रिया नहीं होती।

कार्बोक्सिलिक अम्ल के भौतिक गुण , ऐमाइड , एनहाइड्राइड , एस्टर बनाना

Physical properties of carboxylic acid कार्बोक्सिलिक अम्ल के भौतिक गुण :  

1.     C1से  Cतक के कार्बोक्सिलिक अम्ल अरूचिकर गंधयुक्त द्रव है जबकि अधिक कार्बन वाले मोम के समान रंगहीन ठोस है।

2.     C1से  C4  तक के कार्बोक्सिलिक अम्ल जल के साथ अंतराणुक हाइड्रोजन बंध बना लेते है अतः जल में विलेय होते है परन्तु जैसे जैसे कार्बन की संख्या बढ़ती जाती है अर्थात जल विरोधी भाग बढ़ता जाता है , जल के साथ हाइड्रोजन बंध बनाने की क्षमता कम हो जाती है जिससे जल में विलेयता भी कम होती जाती है।

3.     वाष्प अवस्था में यह अंतराणुक हाइड्रोजन बंध के कारण द्विलक के रूप में होता है।

A . वे अभिक्रियाएँ जिनमे COOH का -O-H बंध टूटता है। 

लवण बनाना :

कार्बोक्सिलिक अम्ल धातु क्षारों से क्रिया करके लवण बना लेते है।

2R-COOH + 2Na →  2R-COONa + H2

R-COOH + NaOH →  R-COONa + H2O

C6H5-COOH + KOH →  C6H5-COOK + H2O

R-COOH + NaHCO3 →  R-COONa + H2O + CO2

B . वे अभिक्रियाएँ जिनमे COOH का -CO-OH  बंध टूटता है।

R-COOH + PCl5 →  R-COCl + POCl3 + HCl

3(R-COOH) + PCl3 →  H3PO3 + 3R-CO-Cl

R-COOH + SOCl2 →  R-CO-Cl + SO2 + HCl

एमाइड बनाना (Amide making): 

कार्बोक्सिलिक अम्ल अमोनिया से क्रिया करके अमोनियम लवण बनाते है।

R-COOH + NH3 →  R-COONH4

जब कार्बोक्सिलिक अम्लों को अमोनिया के साथ गर्म किया जाता है तो ऐमाइड बनते है।

R-COOH + NH3 →  R-CONH2 + H2O

एनहाइड्राइड बनाना (Making anhydride):

कार्बोक्सिलिक अम्लों को सांद्र H2SOया P2Oकी उपस्थिति में गर्म करने पर हमेशा एनहाइड्राइड बनते है।

एस्टर बनाना (Esterize):

कार्बोक्सिलिक अम्ल ऐल्कोहल क्रिया करके एस्टर बनाते है।

R-COOH + HOR → R-COOR + H2O

CH3-COOH + H-OC2H5 → CH3-COOC2H5 + H2O

C6H5-COOH + H-O-C2H5 → C6H5-COOC2H5 + H2O

-COOH समूह , कोल्वे विद्युत अपघटनी अभिक्रिया , कार्बोक्सिलिक अम्ल की अम्लीय प्रकृति

-COOH समूह की अभिक्रिया :   

1.     विकार्बोक्सीलन (ViktorBoxilan):

जब कार्बोक्सिलिक अम्लों को सोडा लाइम (NaOH तथा CaO) के साथ गर्म किया जाता है तो एल्केन बनती है इस क्रिया में कार्बन परमाणु की संख्या कम हो जाती है।

R-COONa + NaOH → Na2CO3 + RH

CH3-COONa + NaOH → Na2CO3 + CH4

CH3-CH2-COONa + NaOH → Na2CO3 + CH3-CH3

कोल्बे विद्युत अपघटनी अभिक्रिया (Kolbe Electrolytic Reaction):

जब कार्बोक्सिलिक अम्लों के Na या K लवणों के जलीय विलयन का विधुत अपघटन किया जाता है तो एल्केन बनते है।

2(R-COONa) + 2H2O  → R-R + 2CO2 + 2NaOH + H2

2(CH3-COOK) + 2H2O  → CH3-CH3 + 2CO2 + 2KOH + H2

 अपचयन :

R-COOH + 4H → R-CH2-OH + H2O

CH3-COOH + 4H → CH3– CH2-OH + H2O

एल्किल समूह की क्रियाएँ :

हेल फोलार्ड जेलिंस्की अभिक्रिया :

वे कार्बोक्सिलिक अम्ल जिनके α कार्बन पर H परमाणु होता है।  वे लाल फास्फोरस की उपस्थिति में Cl2 या Br से क्रिया करके α हैलो कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाते है।

बेंजोइक अम्ल (benzoic acid) की electron स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया :

बेन्जोइक अम्ल में COOH समूह इलेक्ट्रॉन आकर्षित समूह होने के कारण ये क्रियाएँ m (मेटा) स्थिति पर होती है।

नाइट्रीकरण

ब्रोमोनीकरण

नोट : बेन्जोइक अम्ल में फ्रीडल क्राफ्ट अभिक्रिया नहीं होती क्योंकि COOH समूह इलेक्ट्रॉन आकर्षि समूह होता है जो बेंजीन वलय को निष्क्रिय बना देता है।  साथ ही यह निर्जल AlCl3 से क्रिया करके संकुल यौगिक बना लेते है।

कार्बोक्सिलिक समूह की संरचना :

इसमें कार्बन का संकरण SPहोता है तथा बंध कोण 120 डिग्री होता है।

यह ध्रुवीय स्वाभाव का होता है।

कार्बोक्सिलिक अम्ल की अम्लीय प्रकृति (Acidic nature of carboxylic acid):

कार्बोक्सिलिक अम्ल अनुनादी संरचनाओं में पाया जाता है।

उपरोक्त अनुनादी संरचनाओं को देखने से स्पष्ट है की ऑक्सीजन पर धनावेश जाता है जिससे O-H बंध के इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन की ओर विस्थापित हो जाते है तथा H+ आयन बाहर निकलता है।

Hआयन त्यागने के बाद बना कार्बोक्सिलेट आयन अनुनाद के कारण अधिक स्थाई होता है अतः कार्बोक्सिलिक एक अम्ल है।

नोट : यदि कार्बोक्सिलिक अम्ल में जितने ज़्यादा -I प्रभाव वाले समूह होते है अर्थात इलेक्ट्रॉन आकर्षित समूह होते है।  उतनी आसानी से प्रोटोन बाहर निकल जाता है जिससे अम्ल की प्रबलता बढ़ती है साथ ही H+ आयन त्यागने के बाद बना कार्बोक्सिलेट आयन अधिक स्थायी होता है।

नोट : -I प्रभाव क्रम में घटता जाता है।

-CF3 > -NO2 > -CN > -F > -Cl > -Br > -I

नोट : यदि कार्बोक्सिलिक अम्ल में +I प्रभाव वाले समूह अर्थात इलेक्ट्रॉन देने वाले समूह जुड़े हो तो प्रोटोन त्यागने की प्रवृति कम हो जाती है।  साथ ही H+ आयन त्यागने के पश्चात् बना ऑक्सीलेट आयन कम स्थायी होता है जिससे अम्लीय प्रवृति कम हो जाती है।

नोट : यदि -COOH के सापेक्ष -I प्रभाव वाला समूह जितनी अधिक दूरी पर होता है अम्लीय प्रवृति उतनी ही कम हो  है।

नोट : -COOH समूह जिस कार्बन से जुड़ा होता है यदि उस कार्बन में S गुणों की % जितने ज़्यादा होगी अम्लीय गुण उतने ही अधिक होंगे।

नोट : यदि बेंजीन वलय से इलेक्ट्रॉन आकर्षि समूह जुड़े हो तो अम्लीय प्रवृति बढ़ती है जबकि इलेक्ट्रॉन देने वाले समूह जुड़े हो तो अम्लीय प्रवृति कम हो जाती है।

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