हैलोएल्कीन तथा हैलोऐरिन
हैलोजन की
परिभाषा क्या
है
तथा
वर्गीकरण , प्रकार
परिचय
(Definition of halogen) : जब एलीफेटिक यौगिक (एल्केन) में से H के स्थान पर हैलोजन आता है तो उन्हें हैलोएल्केन कहते है परन्तु जब ऐरोमेटिक यौगिकों में H के स्थान पर हैलोजन आता है तो उन्हें हैलोएरीन कहते है।
जैसे :
RH → R-X
C6H6 → C6H6– X
हैलोजन का वर्गीकरण :
हैलोजन परमाणु की संख्या के आधार पर – जब एल्केन में हाइड्रोजन परमाणु के स्थान पर
1,2,3,4 हैलोजन परमाणु आते है तो उन्हें क्रमशः मोनो , डाई , ट्राई , टेट्रा हैलोजन व्युत्पन्न कहते है या मोनो , डाई , ट्राई , टेट्रा हैलाइड कहते है।
उदाहरण – मेथेन , मोनो क्लोरो मेथेन
sp3 C-X
bond युक्त :
इस आधार पर इन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है।
1. ऐल्किल हैलाइड या हैलोएल्केन :
§ इनमे हैलोजन परमाणु एल्किल समूह से जुड़ते है।
§ इन्हें R-X से व्यक्त करते है।
§ इनका सामान्य सूत्र CnH2n+1 होता है तथा
IUPAC नाम हैलोएल्केन होता है।
§ कार्बन परमाणु के आधार पर इन्हे 10 ,
20 , 30 हैलाइड के नाम से भी जाना जाता है।
2. एलिलिक हैलाइड :
वे हैलाइड जिनमें हैलोजन परमाणु C= C
double bond कार्बन के निक्वर्ती उस कार्बन से जुड़ा होता है जिसका संकरण sp3 होता है उसे एलिलिक हैलाइड कहते है।
उदाहरण
: 3-chloro propene (CH2=CH-CH2-Cl)
3. बेन्जिलिक हैलाइड :
वे हैलाइड जिनमे हैलोजन परमाणु बेंजीन वलय से जुड़े उस कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है जिसका संकरण sp3 होता है।
sp2 C-X
bond युक्त :
ये दो प्रकार के होते है।
1. वाइनिलिक हैलाइड :
वे हैलाइड जिनमें हैलोजन परमाणु सीधे ही द्विबंधित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है , इस कार्बन का संकरण sp2 होता है उन्हें वाइनिलिक हैलाइड कहते है।
उदाहरण
: CH2=CH-X (halo ethane)
2. हैलोएरिन :
इन यौगिकों में हैलोजन परमाणु सीधे ही बेंजील वलय से जुड़ा होता है।
उदाहरण :
halo benzene
डाई हैलाइड के प्रकार , C-X बंध की प्रकृति , एल्किल हैलाइड बनाने की विधियां
प्रश्न 1 : डाई हैलाइड कितने प्रकार के होते है ? प्रत्येक के दो दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर : डाई हैलाइड दो प्रकार के होते है
1. निकटवर्ती डाई हैलाइड :
इसमें पास पास के कार्बन परमाणुओं पर दो हैलोजन जुड़े होते है , इसका साधारण नाम एल्किलिन डाई हैलाइड है।
उदाहरण : एथिलीन डाई हैलाइड
प्रोपिलीन डाई हैलाइड
2. जैमडाई हैलाइड :
जब एक ही कार्बन पर दो हैलोजन जुड़े हो तो उन्हें जैमडाई हैलाइड कहते है।
उदाहरण : मेथिलीन क्लोराइड
एथिलिडीन क्लोराइड
C-X बंध की प्रकृति :
1. c-x बंध में हैलोजन की विद्युत ऋणता अधिक व कार्बन की विद्युत ऋणता कम होती है जिससे कार्बन पर आंशिक धनावेश तथा हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश आ जाता है अतः c-x बंध ध्रुवीय प्रकृति का होता है।
2. हैलोजन में F का आकार सबसे छोटा तथा I का आकार सबसे बड़ा होता है अतः बंध लम्बाई का बढ़ता क्रम
R-F < R-Cl < R-Br < R-I
3. बंध लम्बाई बढ़ने पर बंध वियोजन एन्थैल्पी कम होती है अतः बंध वियोजन एन्थैल्पी का घटता क्रम
R-F > R-Cl > R-Br > R-I
एल्किल हैलाइड बनाने की विधियां :
A . एल्कोहल (alcohol) से –
1. एल्कोहल (alcohol) की क्रिया PCl5से करने पर
R-OH + PCl5 → R-Cl +
POCl3 + HCl
C2H5-OH + PCl5 → C2H5– Cl + POCl3 + HCl
2. एल्कोहल (alcohol) की क्रिया PCl3 से करने पर
3(C2H5-OH) + PCl3 → H3PO3 + 3C2H5-Cl
3. एल्कोहल (alcohol) की क्रिया थायोनिल क्लोराइड (SOCl2) से करने पर –
C2H5-OH
+ SOCl2 → C2H5-Cl + SO2 + HCl
नोट : यह R-Cl बनाने की सबसे अच्छी विधि है क्योंकि इस क्रिया में SO2 व HCl गैसीय अवस्था में होने के कारण बाहर निकल जाते है जिससे शुद्ध R-Cl प्राप्त है।
4. एल्कोहल की क्रिया फास्फोरस तथा हैलोजन से करने पर
R-OH (P/Br)→ R-Br
5. एल्कोहल की क्रिया NaBr तथा सांद्र H2SO4से करने पर
R-OH + NaBr + H2SO4 → R-Br +
NaHSO4 + H2O
नोट : एल्कोहल की क्रिया KI व H2SO4 से करने पर R-I प्राप्त नहीं होते
KI + H2SO4 → HI + KHSO4
इस क्रिया में बने H-I का सांद्र H2SO4 द्वारा I2 में ऑक्सीकरण हो जाता है।
2HI + H2SO4 → 2H2O + I2 + SO2
6. एल्कोहल की क्रिया H-X से करने पर
R-OH + R-X → 2H2O + R-X
नोट : H-X की क्रियाशीलता का घटता क्रम
H-I > H-Br > HCl > H-F
हैलोजन विनिमय विधि
, फिंकेल्स्टाइन , स्वार्ट्स अभिक्रिया , भौतिक
गुण
, रासायनिक गुण
हैलोजन विनिमय विधि :
1. फिंकेल्स्टाइन अभिक्रिया (Finkelstein
reaction):
जब एल्किल क्लोराइड या ब्रोमाइड की क्रिया NaI से की जाती है तो एल्किल आयोडाइड बनते है।
R-X + NaI → R-I +
NaX
2. स्वार्ट्स अभिक्रिया (Swarts
Reaction):
जब R-Cl
अथवा R-Br की क्रिया AgF से की जाती है तो एल्किल फ्लोराइड बनते है।
R-X + AgF → R-F + AgX
एल्किन पर HX की क्रिया से एल्किल हैलाइड बनते है।
CH2=CH2 +
HCl → CH3-CH2-Cl
नोट : असम्मित एल्कीन की क्रिया ध्रुवीय पदार्थ से करने पर ध्रुवीय पदार्थ का ऋण भाग द्विबंध से जुड़े उस कार्बन पर जाता है जिस पर हाइड्रोजन की संख्या कम होती है इसे मार्कोनी कॉफ का नियम कहते है।
नोट : जब असममित एल्कीन की क्रिया परॉक्साइड की उपस्थिति में HBr से की जाती है तो क्रिया मारकोनी कॉफ नियम के विपरीत होती है।
CH3-CH=CH2 +
HBr (peroxide)→ CH3-CH2-CH2-Br
भौतिक गुण (physical
properties):
A
. गलनांक व क्वथनांक :
अणुभार बढ़ने के साथ साथ गलनांक तथा क्वथनांक बढ़ते जाते है
क्वथनांक का बढ़ता क्रम
उदाहरण –
CH3-F
< CH3-Cl < CH3-Br < CH3-I
CH3-Cl
< CH3-CH2-Cl < CH3-CH2-CH2-Cl
नोट : समावयवी हैलाइड में वह हैलाइड जो जितना ज़्यादा शाखित होता है उसका क्वथनांक उतना ही कम होता है क्योंकि अधिक शाखित होने पर अणु गोलिय रूप ग्रहण कर लेते है , गोलीय रूप का पृष्ठीय क्षेत्रफल सबसे कम होता है , पृष्ठीय क्षेत्रफल कम होने पर अणुओ के मध्य आकर्षण बल कम हो जाता है जिससे क्वथनांक कम हो जाता है।
नोट : o
, m , p डाई क्लोरोबेंजीन में से p -डाई क्लोरोबेंजीन का गलनांक सबसे अधिक होता है , क्योंकि p -डाई क्लोरो बेंजीन सममित अणु है जिससे क्रिस्टल जालक में इसके अणु अच्छी तरह से समायोजित हो जाते है अतः गलनांक अधिक हो जाता है।
B
. घनत्व :
अणुभार बढ़ने के साथ साथ घनत्व बढ़ते जाते है।
R-F < R-Cl < R-Br <
R-I
C . विलेयता :
एल्किल हैलाइड जल में विलेय होते है।
1. ये जल के साथ हाइड्रोजन बंध नहीं बनाते।
2. इनके अणुओं में इतनी सामर्थ्य नहीं
होती की ये जल के अणुओं के मध्य बनने वाले हाइड्रोजन बंध को तोड़ सके।
रासायनिक गुण :
1. जलीय
KOH से क्रिया
ये जलीय KOH से क्रिया करके एल्कोहल बनाते है।
CH3-CH2-Cl +
aq KOH → CH3-CH2-OH + KCl
R-X + aq KOH → R-OH + KX
2. एल्कोहली KOH से क्रिया करने पर एल्कीन बनती है।
CH3-CH2-CH2-Cl +
alc. KOH → CH3-CH=CH2 + KCl + H2O
सेत्जेफ नियम
, क्रिया करने
पर
क्या
बनते
है
Saytzeff’s Rule , वुर्ट्ज अभिक्रिया
सेत्जेफ नियम
(Saytzeff’s Rule)
: जब किसी एल्किल हैलाइड का विहाइड्रो हैलोजनीकरण किया जाता है तो वह एल्कीन ज़्यादा बनती है जिससे द्विबंध से जुड़े कार्बन पर अधिक एल्किल समूह जुड़े हो।
नोट : उपरोक्त क्रिया में α कार्बन से हैलोजन तथा β कार्बन से H – निकलता है अतः इसे β विलोपन भी कहते है।
KCN
से क्रिया करने पर सायनाइड बनते है।
R-X + KCN → R-CN +
KX
C2H5-X +
KCN → C2H5-CN + KX
AgCN
से क्रिया करने पर आइसोसायनाइड बनते है
R-X + AgCN → R-NC + AgX
C2H5-X +
AgCN → C2H5-NC + AgX
प्रश्न 1 :
R-X की क्रिया KCN से करने पर मुख्य पदार्थों एल्किल सायनाइड बनते है जबकि AgCN से क्रिया करने पर मुख्य पदार्थ एल्किल आइसोसायनाइड बनता है क्यों ?
R-X + KCN → R-CN +
KX
उत्तर :
KCN एक आयनिक यौगिक है , यह जलीय विलयन में सायनाइड आयन देता है , साइनाइड उभयदंति नाभिक स्नेही है अर्थात इसमें कार्बन व नाइट्रोजन दोनों ही loan pair प्रदान कर सकते है।
कार्बन द्वारा loan pair प्रदान करने पर R-CN
का निर्माण होता है , इसमें C-C बंध ज़्यादा मजबूत होता है जबकि नाइट्रोजन द्वारा lone pair प्रदान करने पर R-NC
बनता है इसमें C-N बंध दुर्बल होता है अतः एल्किल सायनाइड अधिक मात्रा में बनता है।
AgCN सहसंयोजक होने के कारण केवल नाइट्रोजन परमाणु lone
pair प्रदान कर सकता है अतः आइसोसायनाइड प्रमुख उत्पाद बनते है।
सोडियम ऐल्कॉक्साइड से क्रिया :
करने पर ईथर बनते है।
RONa + R-X → NaX + R-O-R
C2H5-ONa
+ X-C2H5 → NaX + C2H5-O-C2H5
पोटैशियम नाइट्राइड से क्रिया करने पर एल्किल नाइट्राइल बनते है
C2H5-X +
KNO2 → C2H5-O-N=O
+ KX
सिल्वर नाइट्राइड से क्रिया करने पर नाइट्रोएल्केन बनती है
R-X +
Ag-O-N=O → R-NO2 + AgX
C2H5-X +
AgNO2 → C2H5-NO2 +
AgX
सिल्वर एल्केनोएट से क्रिया करने पर एस्टर बनते है
R-COOAg + X-R → R-COOR +
AgX
CH3-COOAg
+ X-C2H5 → CH3-COOC2H5 +
AgX
अमोनिया से क्रिया करने पर एमिन बनते है
R-X +
H-NH2 → R-NH2 +
HX
एल्किल ऐमीन से क्रिया करने पर डाई एल्किल ऐमीन बनता है।
R-X +
H-NH-R → HX + R2NH
मैग्नीशियम के साथ शुष्क ईथर की उपस्थिति में क्रिया करने पर
R-MgX (ग्रिन्यार अभिकर्मक ) बनता है।
R-X + Mg → R-MgX
C2H5-Cl +
Mg → C2H5MgCl
वुर्ट्ज अभिक्रिया
(Wurtz Reaction) :
जब एल्किल हैलाइड की क्रिया सोडियम के साथ शुष्क ईथर की उपस्थिति में की जाती है तो उच्च कार्बन
वाली एल्केन बनती है।
2(R-X) + 2Na → 2R
+ 2NaX
2(CH3-Cl)
+ 2Na → 2(CH3) + 2NaCl
SN
अभिक्रिया , प्रकार , SN1 , SN2 नाभिक
स्नेही प्रतिस्थापन , उदाहरण , क्रिया विधि
नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया
(SN अभिक्रिया) (nucleophilic substitution reaction) :
वे अभिक्रिया जिनमे एक नाभिक स्नेही के स्थान पर दूसरा नाभिक स्नेही आता है , उन्हें नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते है।
इन्हे SN अभिक्रिया के नाम से भी जाना जाता है।
ये क्रियाएँ दो प्रकार की होती है।
1. SN1
2. SN2
SN1अभिक्रिया या एकाणुक नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया :
जब तृतीयक ब्यूटिल हैलाइड की क्रिया जलीय KOH से की जाती है तो त्रियक ब्यूटिल एल्कोहल बनता है।
(CH3)3C-X +
जलीय KOH → (CH3)3C-OH
+ KX
क्रिया विधि :
§
यह क्रिया SN1 क्रिया विधि से होती है , यह दो पदों में होती है , पहले पद में मध्यवर्ती कार्बोकैटायन का निर्माण होता है।
यह पद धीमी पद में मध्यवर्ती कार्बोकैटायन पर OH– प्रहार करता है।
यह पद तेज गति से होता है।
§
slow (धीमे) पद में क्रियाकारक का एक अणु भाग लेता है अतः यह प्रथम कोटि की अभिक्रिया है।
§
ध्रुवीय विलायकों की उपस्थिति में यह क्रिया तेज गति से होती है।
§
SN1 अभिक्रिया का वेग कार्बोकैटायन का स्थायित्व पर निर्भर करता है।
§
तृतीक ब्यूटिल क्लोराइड में 30 कार्बोकैटायन बनता है जो की 20 तथा 10 कार्बोकैटायन से अधिक स्थायी होता है अतः 30 हैलाइड में SN1 अभिक्रिया तेज गति से होती है अतः SN1 अभिक्रिया के वेग का घटता क्रम
30 >
20 > 10 हैलाइड
उदाहरण : (CH3)3C-X
> (CH3)2CH-X > CH2-CH2-CH2-X
§ इस क्रिया में रेसिमीकरण होता है।
नोट : बेंजील और एलिल हैलाइड में SN1 अभिक्रिया सबसे तेज गति से होती है क्योंकि बेंजील तथा एलिल कार्बोकैटायन अनुनाद के कारण अधिक स्थायी होते है अतः SN1 अभिक्रिया के वेग का घटता क्रम
benzyl
हैलाइड > एलिल हैलाइड > 30 > 20 > 10 हैलाइड
SN2 अभिक्रिया या द्विअणुक नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया :
जब मैथिल हैलाइड की क्रिया जलीय KOH से की जाती है तो मैथिल एल्कोहल बनता है।
CH3-X +
KOH → CH3-OH + KX
क्रिया विधि :
§
यह क्रिया एक ही पद में होती है , इस क्रिया में आने वाला नाभिक स्नेही जाने वाले नाभिक स्नेही के पीछे से 180 डिग्री के कोण पर प्रहार करता है जिससे मध्यवर्ती संक्रमण अवस्था बनती है। यह अत्यंत अस्थायी होती है , दुर्बल नाभिक स्नेही इसमें से हट जाता है।
§
यह द्वितीय कोटि की अभिक्रिया है क्योंकि क्रियाकारक के दो अणु भाग लेते है।
§
यह क्रिया अध्रुवीय विलायकों में तेज गति से होती है।
§
इस क्रियाविधि में अणु के विन्यास का प्रतिपन हो जाता है।
§
30 हैलाइड में SN2 अभिक्रिया सबसे धीमे वेग से होती है क्योंकि 30 हैलाइड में तीन एल्किल समूह के कारण नाभिक स्नेही को पीछे से प्रहार करने में अधिक त्रिविम बाधा का सामना करना पड़ता है अतः SN2 अभिक्रिया के वेग का घटता क्रम
10 >
20 > 30 हैलाइड
नोट : दोनों प्रकार की क्रियाविधियों के लिए समान एल्किल समूह होने पर अभिक्रिया के वेग का घटता हुआ क्रम
R-I > R-Br > R-Cl >
R-F
प्रश्न : बेंजीन तथा एलिल क्लोराइड में SN1 अभिक्रिया के प्रति अधिक क्रियाशील होते है।
उत्तर
: SN1 अभिक्रिया का वेग कार्बोकैटायन के स्थायित्व पर निर्भर करता है , कार्बोकैटायन जितना अधिक स्थायी होता है SN1 अभिक्रिया उतनी ही तेज गति से होती है।
बेंजीन तथा एलिल कार्बोकैटायन अनुनाद के कारण अधिक स्थायी होते है अतः ये SN1 अभिक्रिया के प्रति अधिक क्रियाशील होते है।
ध्रुवण घूर्णक यौगिक
, किरल
केंद्र , प्रतिबिम्ब रुपी
, रसेमिक मिश्रण , काइरल
, एकाइरल
1. अध्रुवित प्रकाश : साधारण प्रकाश तरंग संचरण की दिशा के लंबवत कम्पन्न करता है , सभी कम्पन्न समान होते है।
2. समतल ध्रुवित प्रकाश : जब साधारण प्रकाश को निकॉल प्रिज्म में से गुजारा जाता है तो वह एक ही तल में कम्पन्न करता है इसे समतल ध्रुवित प्रकाश कहते है।
ध्रुवण घूर्णक यौगिक या प्रकाशिक सक्रीय यौगिक (optical active
compound ) :
वे पदार्थ जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को किसी विशेष दिशा में घुमा देते है उन्हें ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहते है।
यदि वह पदार्थ समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दाई ओर घुमाता है (घडी की सुई की दिशा ) तो उसे दक्षिण ध्रुवण घूर्णक पदार्थ (dextrorotatory ) कहते है , इसे d या + चिन्ह से व्यक्त करते है।
यदि वह समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बाई ओर घुमाता है (घडी की सुई के विपरीत ) तो उसे वाम ध्रुवण घूर्णक पदार्थ (Laevorotatory) कहते है ,इसे l या – चिन्ह से व्यक्त करते है।
असममित कार्बन परमाणु या असममित केंद्र या किरेल केंद्र :
वह कार्बन परमाणु जिसकी चारों संयोजकताएँ अलग अलग परमाणु या परमाणुओं के समूह से जुडी हो उसे त्रिविम केंद्र या असममित कार्बन परमाणु कहते है।
प्रतिबिम्ब रुपी :
वे यौगिक जिनके अणुसूत्र संरचना सूत्र भौतिक व रासायनिक गुण समान हो परन्तु समतल ध्रुवित प्रकाश के प्रति व्यवहार अलग अलग हो उन्हें प्रतिबिम्ब रुपी कहते है।
वह रूप जो समतल को दाई ओर घुमाता है उसे दक्षिण ध्रुवण घूर्णक तथा वह रूप जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दाई ओर घुमाता है , वाम ध्रुवण घूर्णक कहते है उन्हें क्रमशः d व l से व्यक्त करते है।
d व l फॉर्म एक दूसरे पर अध्यरोपित नहीं होती है।
d व l फॉर्म एक दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब है।
d व l फॉर्म के घूर्णक कोण का मान समान परन्तु चिन्ह अलग अलग होता है।
रेसेमिक मिश्रण :
वह मिश्रण जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को किसी भी तल में नहीं घूमता उसे रसेमिक मिश्रण कहते है। इसे u या (±) चिन्ह लगाकर व्यक्त करते है।
50% d फॉर्म तथा 50% l फॉर्म को मिलाने से रसेमिक मिश्रण बनता है। यह ध्रुवण अघूर्णक होता है अर्थात समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को किसी भी दिशा में नहीं घूमता क्योंकि d व l form के घूर्णन कोण के मान समान होते है परन्तु चिन्ह में एक दूसरे के विपरीत होते है अतः ये एक दूसरे की ध्रुवण घूर्णकता को नष्ट कर देते है।
प्रश्न : काइरल अणु किसे कहते है।
उत्तर : वे अणु जो अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यरोपित नहीं होते उन्हें काइरल अणु कहते है ये ध्रुवण घूर्णक होते है इसमें असममित कार्बन परमाणु होता है जिसे काइरल केंद्र कहते है।
उदाहरण : ब्रोमो क्लोरो आयोडो मेथेन , ब्यूटेन -2-ऑल
प्रश्न 2 : दो एकाइरल वस्तुओं के नाम बताइये।
उत्तर : वे वस्तुएँ जो एक दूसरे पर अध्यारोपित हो जाती है उन्हें एकाइरल कहते है।
उदाहरण : किताब , प्याली , पान
प्रश्न 3 : दो काइरल वस्तुओं के नाम बताइये।
उत्तर : हाथो के दस्ताने , चाय का कप , जूते -चप्पल आदि
नाभिक
रागी
या
स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया , धारण
, प्रतिलोमन , रसिमीकरण
धारण
(retention) : जब किसी रासायनिक अभिक्रिया में असममित केंद्र के बंधो के त्रिविमीय विन्यास की अखण्डता बनी रहती है तो उसे विन्यास का धारण कहते है।
उपरोक्त अभिक्रिया में असममित केंद्र से बंधित कोई भी बंध नहीं टूटता है अतः क्रियाफल का विन्यास क्रिया कारक के विन्यास के समान रहता है इसे विन्यास का धारण कहते है।
धारण , प्रतिलोमन , रसिमीकरण इन तीनों पदों की व्याख्या निम्न परिवर्तन द्वारा समझाई जा सकती है इन परिवर्तनों में x के स्थान पर y समूह आता है।
नोट : A से B में परिवर्तन होने पर A तथा B के विन्यास समान है अतः यह अभिविन्यास का धारण कहलाता है।
नोट : A सेट में परिवर्तन होने पर यौगिक का विन्यास परिवर्तित हो जाता है अतः यह प्रतिलोमन है , प्रतिलोमन में d फॉर्म
l form में या l फॉर्म d फॉर्म में बदल जाती है।
नोट : यदि A पदार्थ से 50%
B पदार्थ तथा 50% C पदार्थ बने तो इसे रसिमीकरण की क्रिया कहते है।
नाभिक रागी या स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया के त्रिविम रासायनिक पहलु :
SN1 अभिक्रिया
में रेसिमीकरण तथा SN2 अभिक्रिया प्रतिलोमन होता है इस तथ्य की व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है।
1. SN2 अभिक्रिया में आने वाला नाभिक स्नेही जाने वाले नाभिक स्नेही के पीछे से प्रहार करता है , जिससे बनने वाले उत्पाद (पदार्थ) का विन्यास क्रियाकारको के विन्यास के ठीक उल्टा होता है इसे प्रतिलोमन कहते है।
जैसे – वाम ध्रुवण घूर्णक 2 ब्रोमो ऑक्टेन की क्रिया NaOH
से करने पर दक्षिण घूर्णक ऑक्टेन-2-ऑल बनता है।
2. SN1 अभिक्रिया अभिक्रिया में रेसेमीकरण होता है जैसे – जब 2-ब्रोमो
butane की क्रिया जलीय KOH से करने पर butan-2-ol का रेसिमिक का मिश्रण बनता है।
इसकी व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है
सर्वप्रथम
2-bromo butane ब्रोमाइड आयन को त्यागकर कार्बो कैटायन का निर्माण करता है।
कार्बो कैटायन में केंद्रीय कार्बन परमाणु का SP2 संकरण होता है।
इसकी ज्यामिति समतलीय त्रिभुजीय होती है , इस पर OH– दो प्रकार से प्रहार कर सकता है जब OH– आगे से प्रहार करता है तो वाम ध्रुवण घूर्णक
butan-2-ol बनता है परन्तु जब OH– पीछे से प्रहार करता है तो दक्षिण ध्रुवण घूर्णक
butan-2-ol बनता है। इन दोनों पदार्थों की समान मात्राएँ प्राप्त होती है अर्थात रेसिमिक मिश्रण बनता है अतः SN1 अभिक्रिया में रेसेमीकरण होता है।
प्रश्न 1
: हैलोबेंजीन नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया के प्रति एल्किल हैलाइड से कम सक्रीय होता है।
या
हैलो बेंजीन में नाभिक स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया आसानी से नहीं होती जबकि एल्किल हैलाइड में आसानी से होती है।
उत्तर : हैलोबेंजीन में +R
प्रभाव के कारण अर्थात अनुनाद के कारण कार्बन व हैलोजन के मध्य द्विबंध आ जाता है जिससे बंध अधिक मजबूत हो जाता है इसे तोड़ने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है साथ ही जिस कार्बन पर हैलोजन होता है उस कार्बन का SP2 संकरण होता है। S गुणों की % मात्रा अधिक होने से कार्बन की विधुत ऋणता अधिक हो जाती है जिससे हैलोजन का प्रतिस्थापन आसानी से नहीं होता।
एल्किल हैलाइड में अनुनाद नहीं होता C-X बंध आसानी से टूट जाता है साथ ही जिस कार्बन से हैलोजन जुड़ा होता है उसका SP3 संकरण होने के कारण विद्युत ऋणता कम होती है अतः हैलोजन का प्रतिस्थापन आसानी से हो जाता है।
फिटिंग अभिक्रिया , मेथिलिन क्लोराइड, क्लोरोफॉर्म, आयोडोफॉर्म , फ्रेऑन , D.D.T
फिटिंग अभिक्रिया :
जब हैलोबेंजीन की किया सोडियम (Na) के साथ शुष्क ईथर की उपस्थिति में की जाती है तो डाई फेनिल बनता है।
2(C6H5-X) + 2Na → C6H5 -C6H5 + 2NaX
वुर्टज फिटिंग अभिक्रिया :
जब हैलोबेंजीन की क्रिया एल्किल हैलाइड के साथ शुष्क ईथर की उपस्थिति में की जाती है तो एल्किल बेंजीन बनता है।
C6H5-X + R-X + 2Na → C6H5-R + 2NaX
पॉली हैलोजन यौगिक :
वे यौगिक जिनमें एक से अधिक हैलोजन होती है उन्हें पॉलीहैलोजन यौगिक कहते है।
उदाहरण :
A . CH2Cl2 मेथिलीन क्लोराइड या डाई क्लोरो मेथेन
गुण :
रंगहीन , वाष्पशील द्रव है।
उपयोग :
1. विलायक के रूप में।
2. एरोसॉल प्रणोदक के रूप में
3. धातुओं की सफाई तथा फिनिशिंग के रूप में।
इसके सम्पर्क में आने से सुनने तथा देखने की आंशिक क्षमता कम हो जाती है।
B. CHCl3 क्लोरोफॉर्म या ट्राई क्लोरो मेथेन :
यह रंगहीन द्रव है वायु तथा प्रकाश की उपस्थिति में इसके ऑक्सीकरण से विषैली गैस फास्फीन बनती है।
CHCl3 + O → COCl2 + HCl
नोट : क्लोरोफॉर्म को गहरे भूरे रंग की बोतल में पूर्ण रूप से भर कर बंद करके रखते है , इस बोतल के चारों ओर काले रंग का कागज लगा देते है जिससे की क्लोरोफॉर्म का ऑक्सीकरण न हो सके।
उपयोग : निश्चेतक के रूप में , फिओन बनाने में।
C . आयोडोफोर्म :
CHI3 आयोडोफोर्म या ट्राई आयोडो मेथेन
गुण : यह पिले रंग का क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है।
उपयोग : इसका उपयोग पूतिरोधी (anti septic ) के रूप में किया जाता है।
D . CCl4 कार्बन टेट्रा क्लोराइड :
यह रंगहीन तेलीय द्रव है जल में अविलेय होता है।
उपयोग :
फ्रीऑन बनाने में , विलायक के रूप में , अग्निशमक के रूप में।
E . फ्रेऑन :
मेथेन या एथेन के पॉलीक्लोरोफ्लोरो व्युत्पन्न को फ्रेऑन कहते है।
CCl2F2 फ्रेऑन 12
यह रंगहीन अधिक स्थाई , अविशाक्त , असंक्षारक , आसानी से द्रवित होने वाले गैस है।
उपयोग : इसका उपयोग प्रशीतक के रूप में किया जाता है।
D.D.T (P , P’ -dichloro diphynyl trichloro ethane) :
इसका उपयोग कीटनाशी के रूप में किया जाता है।
वर्तमान में इसके निर्माण पर प्रतिबंध लगा हुआ है क्योंकि
यह शरीर में संचित हो जाता है।
इसका अपघटन नहीं होता
कुछ कीटो ने इससे प्रतिरोधात्मकता बनाली है।
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