विद्युतचुम्बकीय प्रेरण पाठ 9 नोट्स electro magnetic induction notes in hindi 12 class
चुम्बकीय फ्लक्स की परिभाषा क्या है , चुंबकीय फ्लक्स का मात्रक , विमा Magnetic Flux in hindi
Magnetic Flux in hindi चुम्बकीय फ्लक्स की परिभाषा क्या है , मात्रक , विमा : जब किसी चुम्बकीय क्षेत्र में किसी सतह को रखा जाता है तो स्वाभाविक है की इस सतह से चुम्बकीय बल रेखाएं गुजरेंगी , हम चुम्बकीय फ्लक्स को निम्न प्रकार परिभाषित कर सकते है
” किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखे किसी तल से गुजरने वाली चुंबकीय क्षेत्र रेखाओ की संख्या को इस तल से संबध चुंबकीय फ्लक्स कहलाता है ” इसे ϴ से व्यक्त करते है।
माना एक चुम्बकीय क्षेत्र है जिसका परिमाण B है , इसमें एक तल जिसका क्षेत्रफल A है , चुम्बकीय बल रेखाओ (चुंबकीय रेखाओं) के लंबवत रखा हुआ है अतः इस पृष्ठ से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान निम्न सूत्र से दिया जाता है
चुंबकीय फ्लक्स = चुंबकीय क्षेत्र x तल का क्षेत्रफल
ϴ = BA
माना रखा हुआ तल चुम्बकीय बल रेखाओं के लंबवत नहीं है इस स्थिति में माना तल के अभिलम्ब तथा चुंबकीय रेखाओं के मध्य कोण θ है तो चुंबकीय फ्लक्स
ϴ = BA cosθ
जब θ = का मान शून्य होता है अर्थात तल के अभिलम्ब व चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओ के मध्य शून्य कोण हो तो चुंबकीय फ्लक्स का मान अधिकतम होगा
ϴ = BA cos0
cos0 =
1
ϴ = BA
जब θ का मान 90 डिग्री हो अर्थात तल के अभिलम्ब व चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओ के मध्य 90 डिग्री का कोण हो तो चुम्बकीय फ्लक्स का मान शून्य होगा जो की न्यूनतम है
ϴ = 0
चुंबकीय फ्लक्स एक अदिश राशि है।
इसकी विमा[ML2T-2A1] होती है।
इसका SI मात्रक वेबर (Wb) होता है।
विद्युत चुम्बकीय प्रेरण की
परिभाषा क्या
है
(फैराडे तथा
हेनरी
के
प्रयोग ) Electromagnetic induction in hindi
Electromagnetic induction in hindi विद्युत चुम्बकीय प्रेरण की परिभाषा क्या है (फैराडे तथा हेनरी के प्रयोग ) : हम अध्ययन कर चुके है की विद्युत धारा या गतिमान आवेश के कारण चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है इसे देखते हुए फैराडे तथा हेनरी ने सोचा की फिर तो चुंबकीय क्षेत्र के कारण विद्युत धारा भी उत्पन्न होनी चाहिए।
इसलिए फैराडे तथा हेनरी ने धारामापी , कुण्डली तथा चुम्बक पर प्रयोग किये लेकिन धारामापी में कोई विक्षेप उत्पन्न नही हुआ अर्थात कोई धारा प्रवाहित होती हुई नही दिखी।
जिससे ये गुस्से में आ गए और चुम्बक को फेंक दिया , संयोगवस चुम्बक कुण्डली में जा गिरा और उन्होंने देखा की धारामापी में विक्षेप उत्पन्न हो गया।
इसे देखकर उनको यकीन हो गया की उनका प्रयोग कामयाब हुआ क्यूंकि वो इसी के लिए तो यह प्रयोग कर रहे थे की चुम्बकीय क्षेत्र के कारण भी विद्युत धारा उत्पन्न हो सकती है।
इसी घटना को विद्युत चुम्बकीय प्रेरण कहते है।
इसके बाद इन्होने इस पर अनेक प्रयोग किये
फैराडे तथा हेनरी के प्रयोग
1. जब दण्ड चुम्बक (कुण्डली) के पास जब चुम्बक का उत्तरी ध्रुव पास लाया जाता है तो धारामापी में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है अत: हम कह सकते है की चुम्बक की गति से विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। इस स्थिति में चुम्बक का उत्तरी ध्रुव , कुण्डली के पास वाला सिरा उत्तरी ध्रुव की भांति व्यवहार करता है।
इसी प्रकार जब चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को कुण्डली से दूर ले जाते है तो भी धारामापी में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है अर्थात दूर गति कराने से भी विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है लेकिन इस बार विक्षेप की दिशा विपरीत हो जाती है। इस स्थिति में चुम्बक के उत्तरी ध्रुव के पास वाला सिरा कुण्डली के दक्षिणी ध्रुव की तरह कार्य करता है।
2. यदि चुम्बक की गति बंद कर दे अर्थात चुम्बक को स्थिर रखने पर धारामापी में विक्षेप बंद हो जाता है इससे स्पष्ट है की कुण्डली में धारा तब तक प्रवाहित होती रहती है जब तक की कुण्डली तथा चुम्बक के मध्य सापेक्ष गति होती है .
3. यदि चुम्बक के दक्षिण ध्रुव को कुण्डली के पास लेकर जाए तो भी धारामापी में विक्षेप उत्पन्न होता है तथा दूर ले जाने पर भी विक्षेप उत्पन्न होता है लेकिन इस स्थिति में धारा की दिशा विपरीत हो जाती है .
4. यदि अब चुम्बक को स्थिर रखकर कुण्डली को गति करवाए तो भी धारा प्रवाह के कारण धारामापी में विक्षेप उत्पन्न होता है इसका मान उतना ही ही होता है जितनी गति से चुम्बक को गति करवाने पर उत्पन्न हो रहा था .
5. कुण्डली पर फेरो की संख्या बढ़ाने पर धारा का मान बढ़ जाता है।
6. कुण्डली तथा चुम्बक दोनों को सापेक्ष गति करवाने पर भी धारा प्रवाहित होती है अर्थात विक्षेप उत्पन्न होता है।
अत: स्पष्ट है की कुण्डली में विद्युत धारा दोनों के बीच आपेक्षिक गति के कारण उत्पन्न होती है।
जब आपेक्षिक गति होती है तो कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है तथा इस प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण कुण्डली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है इसलिए इस घटना को विद्युत चुम्बकीय प्रेरण कहते है।
फैराडे के
विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के
नियम
Faraday’s electromagnetic induction laws in hindi
Faraday’s electromagnetic induction laws in hindi फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम : फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के प्रयोग को हम विस्तार पूर्वक पढ़ चुके है।
अपने प्रयोगों के आधार पर फैराडे ने निष्कर्ष निकाले और दो नियम दिए जिन्हें फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम कहा जाता है।
फैराडे का प्रथम नियम
जब किसी बन्द परिपथ से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के मान में परिवर्तन होता है तो परिपथ में विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है , इस उत्पन्न विद्युत वाहक बल को प्रेरित विद्युत वाहक बल कहते है। इस प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण इस बन्द परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है।
यह धारा तब तक प्रवाहित होती रहती है जब तक की चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है जैसे ही चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन बंद हो जाता है परिपथ में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा भी बंद हो जाती है।
फैराडे का द्वितीय नियम
प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के बराबर होता है।
यदि प्रेरित विद्युत वाहक बल E है तथा चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन dϴ/dt है तो फैराडे के दूसरे नियम के अनुसार
E = dϴ/dt
मान लीजिये कुण्डली में फेरो की संख्या N है तो
E = -N dϴ/dt
यहाँ dϴ का मान निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है
dϴ = ϴ2 – ϴ1
ϴ2 = dt समय बाद चुम्बकीय फ्लक्स
ϴ1 = प्रारंभिक चुंबकीय फ्लक्स
चुम्बकीय फ्लक्स को परिवर्तन करने के तरीके
1. चुंबकीय क्षेत्र में कुण्डली को घुमाकर : जब चुम्बकीय क्षेत्र में कुण्डली को घुमा दिया जाता है तो चुम्बकीय फ्लक्स का मान भी बदल जाता है।
जैसे मान लीजिये पहले कुण्डली का तल चुंबकीय क्षेत्र रेखाओ के लम्बवत है तो चुम्बकीय फ्लक्स का मान BA होगा (BAcosθ)
अब यदि कुण्डली को 90 डिग्री घुमाकर कुण्डली का तल चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओ के अनुदिश कर दिया जाए तो चुम्बकीय फ्लक्स का मान शून्य हो जायेगा क्यूंकि θ = 90 = 0
2. चुम्बकीय क्षेत्र में उपस्थित कुण्डली के क्षेत्रफल को बदलकर : कुण्डली का जितना भाग या क्षेत्रफल चुम्बकीय क्षेत्र में होगा उतना ही अधिक चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न होगा अत: कुण्डली के क्षेत्रफल को कम या अधिक करके या चुंबकीय क्षेत्रफल से कुंडली के कुछ भाग को बाहर निकालकर या अन्दर प्रविष्ट करवाकर चुंबकीय फ्लक्स का मान बढाया जाता है।
3. कुण्डली से गुजरने वाले चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का मान परिवर्तित करके चुम्बकीय फ्लक्स का मान परिवर्तित किया जा सकता है। .
लैंज का नियम या लेंज नियम क्या है Lenz’s law in hindi
Lenz’s law in hindi लैंज का नियम या लेंज नियम क्या है : फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम में हमने यह तो पढ़ लिया है की कुण्डली तथा चुम्बक के बीच आपेक्षिक गति करने से कुण्डली में विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जिससे विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है , इसके साथ ही हमने सूत्र भी ज्ञात कर लिया था जिससे हम इसके मान की गणना भी कर सकते है।
लेकिन इस विद्युत धारा की दिशा के बारे में फैराडे ने कुछ नहीं बताया।
अत: लेन्ज ने प्रेरित विद्युत वाहक बल से उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा बताने के लिए एक नियम दिया जिसे लेंज का नियम कहते है। इस नियम का उपयोग करके हम फैराडे के प्रयोग में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा की दिशा बता सकते है या ज्ञात कर सकते है।
लेंज ने बताया की ” विद्युत चुम्बकीय प्रेरण की घटना में किसी परिपथ में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल या विद्युत धारा की दिशा इस प्रकार होती है की यह उस कारण का विरोध करती है जिसके कारण यह उत्पन्न हो रही है “
अत: फैराडे तथा लेंज के नियम से
उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल
E = -dϴ/dt
मान लीजिये कुण्डली में फेरो की संख्या N है तो
E = -N dϴ/dt
लेंज के नियम की पुष्टि फैराडे द्वारा किये गए प्रयोगों के आधार पर की जा सकती है
जब कुण्डली के पास चुम्बक का उत्तरी ध्रुव लाया जाता है तो उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा इस प्रकार होती है की चुम्बक के पास वाला सिरा कुण्डली का उत्तरी ध्रुव बने ताकि कुण्डली चुम्बक का विरोध कर सके।
जब चुम्बक को दूर लेके जाए तो चुम्बक के पास वाला कुण्डली का ध्रुव दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है ताकि कुण्डली चुम्बक उसको दूर लेकर जाने के विरोध कर सके।
लेन्ज का नियम एवं ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत में सम्बन्ध Lenz’s law and conservation of energy
Lenz’s law and conservation of energy in hindi लेन्ज का नियम एवं ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत में सम्बन्ध ( ) : हमें ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत बताता है की ” ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न नष्ट किया जा सकता है , लेकिन ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है ”
लेंज का नियम भी ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत सिद्धांत पर आधारित है।
हमने लेंज के नियम में पढ़ा था की जब किसी कुण्डली के पास चुम्बक का उत्तरी ध्रुव लाया जाता है तो कुण्डली के पास वाला सिरा भी उत्तरी ध्रुव बन जाता है , जो चुम्बक का पास आने का विरोध करता है क्यूंकि दोनों समान ध्रुव बन जाते है जो एक दूसरे पर प्रतिकर्षित बल लगाते है अर्थात कुण्डली चुम्बक का पास आने का विरोध करती है।
चुम्बक पर इस प्रतिकर्षण बल के विरुद्ध एक बाह्य कार्य करना पड़ता है यह बाह्य कार्य विद्युत उर्जा में बदलकर हमें प्रेरित विद्युत धारा प्राप्त होती है अत: यहाँ सिर्फ उर्जा का परिवर्तन हुआ है अर्थात
बाह्य कार्य = प्रेरित विद्युत धारा
इसी प्रकार जब चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को कुण्डली से दूर लेकर जाया जाता है तो कुण्डली के पास वाला सिरा दक्षिणी ध्रुव बन जाता है जो इसके दूर जाने का विरोध करता है अर्थात चुम्बक को आकर्षित करता है।
हमें चुम्बक को दूर ले जाने के लिए इस प्रकर्षण बल के विरुद्ध एक बाह्य कार्य करना पड़ेगा तथा यह बाह्य कार्य ही हमें प्रेरित विद्युत धारा के रूप में परिवर्तित होकर प्राप्त होता है।
अत: दोनों स्थितियों में हम यह कह सकते है की यहाँ बाह्य कार्य प्रेरित विद्युत धारा में परिवर्तित हो रहा है तथा पूरे निकाय की उर्जा संरक्षित है अत: यहाँ ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत लागू होता है।
अब यदि हम यह कल्पना कर ले जब चुम्बक का उत्तरी ध्रुव कुण्डली के पास ले जाने पर उसके पास वाले सिरे पर दक्षिणी ध्रुव उत्पन्न हो जाता है , जिससे दोनों में आकर्षण बल लगेगा और कुण्डली चुम्बक को त्वरण के साथ आकर्षित करेगी , अत: इस दशा में कोई कार्य नहीं करना पड़ रहा है।
अगर इस स्थिति में हमें धारा प्राप्त होती है तो यह ऊर्जा संरक्षण की अनुपालना नहीं करेगा।
इसलिए हमारी कल्पना गलत है यह संभव नहीं है। उर्जा हमेशा संरक्षित रहती है।
प्रेरित धारा तथा प्रेरित आवेश में सम्बन्ध Relation Between induced current and induced charge
Relation Between induced current and induced charge in hindi प्रेरित धारा तथा प्रेरित आवेश में सम्बन्ध : फैराडे के नियम में हमने पढ़ा की चुम्बक तथा कुण्डली के मध्य आपेक्षिक गति के कारण कुण्डली में विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जिसका मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है
E = – dϴ/dt
यदि कुण्डली में फेरो की संख्या N हो तो प्रेरित वि.वा.बल
E = -N dϴ/dt
यदि कुण्डली का क्षेत्रफल A हो तथा यह चुंबकीय क्षेत्र B की दिशा में हो अर्थात A तथा B के मध्य शून्य कोण होने पर चुम्बकीय फ्लक्स का मान
ϴ = BA
चुम्बकीय फ्लक्स (ϴ) का मान सूत्र में रखने पर
E = -N dϴ/dt
E = -N dBA/dt
यदि चुम्बकीय क्षेत्र B नियत हो तथा क्षेत्रफल A परिवर्तनशील हो तो B समाकलन से बाहर ले सकते है
E = -BN (dA/dt)
माना कुण्डली के परिपथ का पूर्ण प्रतिरोध का मान R है तो
प्रेरित धारा = प्रेरित विद्युत वाहक बल / परिपथ का कुल प्रतिरोध
I = E/R
E (विद्युत वाहक बल) का मान रखने पर
I = -BN dA/Rdt
यहाँ से dt को दूसरी तरफ लाने पर
I dt = -BN dA/R
B dA = dϴ चुम्बकीय फ्लक्स
अत:
I dt = -N dϴ/R
dt समय में परिपथ में प्रेरित कुल आवेश
प्रेरित आवेश = प्रेरित धारा x समय
dq = I dt
I dt का मान ऊपर से रखने पर
dq = -N dϴ/R
यदि प्रारंभिक चुम्बकीय फ्लक्स का मान ϴ1 हो तथा अंतिम चुम्बकीय फ्लक्स का मान ϴ2 हो तो
q = -N/R (ϴ2 – ϴ1)
यह प्रेरित आवेश q तथा प्रेरित चुम्बकीय फ्लक्स में सम्बन्ध दर्शाता है।
फ्लेमिंग का दायें हाथ का नियम Fleming’s right hand rule in hindi दाएं हाथ के अंगूठे का नियम
Fleming’s
right hand rule in hindi फ्लेमिंग का दायें हाथ का नियम : हमने फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण नियम में देखा की कुंडली तथा चुम्बक के आपस में गति करने से प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है तथा इस वि.वा.बल के कारण प्रेरित विद्युत धारा भी उत्पन्न हो जाती है .
चुम्बकीय प्रेरण के कारण उत्पन्न इस प्रेरित विद्युत धारा की दिशा का मान ज्ञात करने के लिए फ्लेमिंग का दायें हाथ का नियम प्रयोग किया जाता है।
फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम के अनुसार ” दायें हाथ की तर्जनी , मध्य अंगुली तथा अंगूठे को इस प्रकार फैलाया जाए की ये तीनो एक दूसरे के लंबवत हो तथा तर्जनी अंगुली चुम्बकीय क्षेत्र की तरफ हो , तथा अंगूठा चालक की गति की दिशा को दर्शाए तो माध्यिका प्रेरित विद्युत धारा को प्रदर्शित करेगी “
इसे ही फ्लेमिंग का दाये हाथ का नियम कहते है।
जैसा चित्र में दिखाया गया है की अंगूठा चालक की दिशा की तरफ किया हुआ है तथा तर्जनी अंगुली को चुंबकीय क्षेत्र की तरफ। तो माध्यिका अंगुली की दिशा प्रेरित धारा की दिशा में होगी।
एक सरल रेखीय चालक का चुम्बकीय क्षेत्र (field due to a
straight linear conductor) : ऑसर्टेड के प्रयोग से यह ज्ञात हो चुका है कि एक तार में धारा प्रवाहित करने पर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इस क्षेत्र की प्रकृति का पता लगाने के लिए एक प्रयोग करते है।
चित्र में एक सरल रेखीय चालक न दिखाकर बंद परिपथ इसलिए दिखाया गया है जिससे यह ज्ञात हो जाए कि धारा की दिशा विपरीत हो जाने पर बल रेखाओं की दिशा (अर्थात चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा) भी विपरीत हो जाती है। एक हल्के क्षैतिज गत्ते में से उर्ध्वाधर तारों को गुजारा गया है और गत्ते पर लोहे का बुरादा छिडक दिया गया है। एक प्रबल धारा प्रवाहित करने पर यदि गत्ते को धीरे से खटखटा दिया जाए तो बुरादा कुछ समकेन्द्रीय वृत्तों में समंजित हो जाता है। इस प्रकार बनी हुई बल रेखाएं वृत्ताकार होती है जिनका केंद्र तार पर स्थित होता है। यदि एक छोटी सी कम्पास सुई को गत्ते के ऊपर लाकर रखा जाए तो यह ज्ञात होगा कि यह सुई बल रेखाओं की दिशा में संकेत करती है लेकिन चालक की ओर कभी भी संकेत नहीं करती। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि “सरल रेखीय चालक में धारा प्रवाहित करने पर चुम्बकीय ध्रुव उत्पन्न नहीं होते बल्कि वृत्ताकार चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। ”
इन बल रेखाओं की दिशा निम्न नियमों से दी जाती है –
(1) मैक्सवेल का काग पेंच नियम (maxwell corkscrew
rule in hindi) : इस नियम के अनुसार , “यदि धारावाही चालक के अक्ष पर दाहिने हाथ से एक दक्षिणावर्त पेच को घुमाने की कल्पना करे और पेंच की नोक चालक में प्रवाहित धारा की दिशा में गति करे तो अंगूठे के घुमने की दिशा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा व्यक्त करेगी। ”
(2) दाहिने हाथ का नियम (right hand rule
in hindi) : इस नियम के अनुसार “यदि धारावाही चालक को दाहिने हाथ से इस प्रकार पकड़ने की कल्पना करे कि अंगूठा चालक के समान्तर रहे और यदि अंगूठे द्वारा चालक में प्रवाहित धारा की दिशा व्यक्त होती है तो उँगलियों का घुमाव चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा व्यक्त करेगा। ”
नोट : इस नियम का उपयोग चुम्बकीय आघूर्ण की दिशा निकालने में भी किया जाता है। इस नियम में चारों अंगुलियाँ धारा की दिशा को व्यक्त करती है और अंगूठा चुम्बकीय आघूर्ण की दिशा को व्यक्त करता है।
(3) दाहिने हाथ की हथेली का नियम नंबर 1 (right hand palm
rule number 1) : इस नियम के अनुसार “यदि हम दाहिने हाथ का पूरा पंजा इस प्रकार फैलाएं कि अंगुलियाँ अंगूठे के लम्बवत हो और अंगूठा चालक में बहने वाली धारा i की दिशा की ओर तथा फैली हुई उँगलियाँ बिंदु P की तरफ संकेत करे तो P पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा हथेली के लम्बवत बाहर की ओर होती है। ”
नोट : इस नियम से किसी भी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र निकालना आसान है। हमेशा इसी नियम का प्रयोग करना चाहिए।
समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में चालक छड की गति के कारण प्रेरित वि.वा.बल (विद्युत वाहक बल)
Induced emf in a conductor rod moving in a uniform magnetic field in
hindi समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में चालक छड की गति के कारण प्रेरित वि.वा.बल : माना कागज के लम्बवत निचे की तरफ एक चुम्बकीय क्षेत्र B उपस्थित है , यह समरूप से फैला हुआ है।
इस चुम्बकीय क्षेत्र में एक l लम्बाई का चालक रखा हुआ है इसे PQ से चित्र में दर्शाया गया है , यह कागज तल में रखा हुआ है अत: यह चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत स्थित है , क्यूंकि चुम्बकीय क्षेत्र कागज तल के लम्बवत निचे की तरफ उपस्थित है।
अब यदि इस चालक को कागज तल में V वेग से गति कराये तो इसका अभिप्राय यह होगा की यह चालक चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत गति कर रहा है अत: लोरेन्ज के अनुसार इसके आवेशो पर लोरेंज बल लगेगा।
चूँकि हम जानते है की किसी चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते है अतः चालक की गति के साथ इसमें उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉन भी गति करेंगे अत: इन गतिशील इलेक्ट्रॉनो पर चुम्बकीय बल कार्य करेगा जिसका मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है
Fmagnetic = qVBsinθ
चूँकि यहाँ आवेश की गति V तथा चुंबकीय क्षेत्र B एक दूसरे के लंबवत है अर्थात इनके मध्य 90 डिग्री का कोण है
अत: θ = 90
Fmagnetic = qVBsin90
Fmagnetic = qVB
यहाँ q इलेक्ट्रॉन पर आवेश है।
इस चुम्बकीय बल की दिशा ज्ञात करने के लिए फ्लेमिंग का बायें हाथ का नियम काम में लिया जाता है , इस नियम के अनुसार यह लोरेन्ज बल धनावेश पर चालक के P सिरे की ओर कार्य करता है तथा ऋणावेश पर Q सिरे की ओर कार्य करता है।
दूसरे शब्दों में कहे तो इस बल के कारण P सिरे पर धनावेश तथा Q सिरे पर ऋणावेश इकठ्ठा हो जाता है जिससे P सिरा धनावेशित हो जाता है तथा Q सिरा ऋणावेशित हो जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
सिरों पर उत्पन्न इन विपरीत प्रकृति के आवेशों के कारण दोनों सिरों के मध्य एक विभवान्तर(e) उत्पन्न हो जाता है तथा इस विभवांतर(e) के कारण चालक में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , इस विद्युत क्षेत्र (E) की दिशा P से Q की तरफ होगी।
अतः चुम्बकीय बल के विपरीत दिशा में विद्युत क्षेत्र के कारण आवेशों पर विद्युत बल कार्य करेगा जिसका मान निम्न सूत्र द्वारा लिखा जाता है
FElectric = qE
यहाँ q = आवेश तथा E = विद्युत क्षेत्र
चूँकि चुम्बकीय बल तथा विद्युत बल एक दूसरे के विपरीत दिशा में कार्यरत है अतः संतुलन की स्थिति में दोनों बल एक दूसरे के बराबर होते है
अर्थात
Fmagnetic = FElectric
qVB = qE
VB = E
यहाँ
विद्युत क्षेत्र = उत्पन्न वि.वा.बल /चालक की लम्बाई
E = e /l
E का मान समीकरण में रखने पर
E = VB
e /l = VB
e = VBl
मान लीजिये चालक की गति चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत न होकर किसी कोण θ पर हो तो
e = VBl sinθ
संतुलन की स्थिति में परिणामी बल शून्य हो जाता है अर्थात दोनों बिन्दुओ PQ के मध्य विभवांतर शून्य हो जाता है जिससे आवेश का स्थानान्तरण भी नहीं होता है।
असमान चुम्बकीय क्षेत्र में नियत वेग से गति के कारण आयताकार लूप में प्रेरित वि.वा.बल एवं धारा
Induced e.m.f and current in a rectangular loop moving in a non uniform
magnetic field असमान चुम्बकीय क्षेत्र में नियत वेग से गति के कारण आयताकार लूप में प्रेरित वि.वा.बल एवं धारा : माना एक आयताकार आकृति है जिसे चित्र में abcd से दर्शाया गया है , यह एक असमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखी हुई है। यहाँ असमान से तात्पर्य है की चुम्बकीय क्षेत्र का मान अलग अलग जगह पर भिन्न है।
मान लेते है की आयताकार आकृति (कुण्डली) की ab भुजा पर चुंबकीय क्षेत्र का मान B1 है तथा cd भुजा पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान B2 है।
इस आयताकार कुण्डली को इस प्रकार रखा जाता है की यह चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत रहे , अब इस आयताकार कुंडली को v वेग से इस प्रकार गति कराते है की इसकी भुजा ab तथा cd के लम्बवत दिशा में गति हो।
यहाँ भुजा ab व cd की लम्बाई l है , अगर यह कुण्डली t समय तक गति करती है तो , t समय में तय की गयी
दूरी = vt
तथा t समय में पार किया गया क्षेत्रफल = lvt
हमने पहले ही बात की है की ab भुजा पर चुंबकीय क्षेत्र का मान B1 है तथा cd भुजा पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान B2 है।
तथा जितना क्षेत्रफल कुण्डली ab की तरफ खिसकी है उतना ही cd की तरफ खिसकी है अत: हम कह सकते है की कुण्डली का जितना क्षेत्रफल(A) B1 चुंबकीय क्षेत्र से निकलता है उतना ही क्षेत्रफल(A) B2 चुंबकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है।
B1 चुंबकीय क्षेत्र से निकलने में चुम्बकीय फ्लक्स में कमी
ϴB1 = B1A = B1lvt
B2 चुंबकीय क्षेत्र में प्रवेश करने से फ्लक्स में वृद्धि
ϴB2 = B2 A = B2 lvt
अतः A पार करने में कुण्डली के फ्लक्स में आया परिवर्तन
△ϴ = ϴB2 – ϴB1 = B2 lvt – B1lvt
t को दूसरी तरफ लाने पर
△ϴ/t = B2 lv – B1lv
△ϴ/t = (B2 – B1)lv
फैराडे के अनुसार प्रेरित विद्युत वाहक बल
e = △ϴ/t
इसका मान हम ज्ञात कर चुके है अतः
△ϴ/t का मान रखने पर
e = (B2 – B1)lv
माना कुंडली का कुल प्रतिरोध R है तो कुण्डली में प्रेरित धारा I = प्रेरित विद्युत वाहक बल /कुल प्रतिरोध
I = e /R
I = (B2 – B1)lv/R
समरूप (समांग) चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णन करती धातु की छड़ में प्रेरित वि.वा.बल
(Induced EMF in a metal rod rotating in a uniform magnetic field) समरूप (समांग) चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णन करती धातु की छड़ में प्रेरित वि.वा.बल : माना चित्रानुसार एक समरूप चुम्बकीय क्षेत्र B है , इसकी दिशा पृष्ठ के लंबवत है बाहर की तरफ है जिसे चित्र में डॉट (.) से प्रदर्शित किया गया है।
यहाँ समरूप चुंबकीय क्षेत्र से अभिप्राय है की सब जगह चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का मान समान है।
इस समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में एक चालक छड रखी हुई है तथा इसकी लम्बाई l है।
यह चालक छड इस चुम्बकीय क्षेत्र में w कोणीय वेग से घडी की दिशा में घूम रही है , छड के घुमने का तल चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत है जिसे चित्र में दर्शाया गया है।
चालक छड का एक अल्पांश लेते है , इस अल्पांश की लम्बाई dl है , माना यह अल्पांश चुम्बकीय क्षेत्र में v वेग से गति कर रहा है अत: इस अल्पांश पर एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) उत्पन्न हो जाता है।
अल्पांश पर उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) का मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है
dE = Bvdl
चूँकि कोणीय वेग हो रहा है तथा माना अल्पांश केंद्र से l दूरी पर स्थित है तो
v = wl
अत:
अल्पांश पर उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) का मान
dE = Bwldl
यह प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान सिर्फ काल्पनिक अल्पांश dl के लिए है अगर हमे सम्पूर्ण चालक छड के लिए प्रेरित विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) का मान ज्ञात करना है तो समीकरण को 0 से लेकर छड लम्बाई l तक समाकलित करना होगा
अत: सम्पूर्ण छड के लिए वि.वा.बल
समाकलन हल करने पर
E = Bwl2/2
समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णन करती धातु की चकती में प्रेरित विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल)
(Induced emf in a metal disc rotating in a uniform magnetic field) समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णन करती धातु की चकती में प्रेरित विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) : माना एक चित्रानुसार समरूप चुम्बकीय क्षेत्र है जिसकी दिशा पृष्ठ (कागज) के लम्बवत बाहर की तरफ है , चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को चित्र में डॉट (.) से प्रदर्शित किया गया है।
इस समरूप चुंबकीय क्षेत्र में एक धातु की चकती रखी हुई है , इस धातु की चकती की चित्र r है तथा यह चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत रखी हुई। दूसरे शब्दों में कहे तो चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा इस चकती के लम्बवत बाहर की तरफ है।
यह चकती अपनी अक्ष के सापेक्ष w से कोणीय गति कर रही है। इसकी घूर्णन की गति की दिशा घडी की विपरीत दिशा (वामावर्त) में है।
इस सम्पूर्ण चकती में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात करने के लिए हम इस चकती को अल्पांश के रूप में देखते है , तथा किसी एक अल्पांश के लिए प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात करने के बाद उसका समाकलन विधि से सम्पूर्ण चकती में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात करेंगे।
माना चकती का एक अल्पांश dx है जो चकती के केंद्र से x दूरी पर स्थित है।
माना अल्पांश की गति v है तो
v = xw
अल्पांश के कारण प्रेरित विद्युत वाहक बल dE = B(xw)dx
अब सम्पूर्ण धातु की चकती के कारण उत्पन्न विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) ज्ञात करने के लिए हम इस अल्पांश का 0 से r तक समाकलन कर देते है या समाकलन विधि का उपयोग कर हम सम्पूर्ण धातु की चकती के कारण उत्पन्न विद्युत वाहक बल ज्ञात करते है।
समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में आयताकार कुण्डली की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल)
(Induced emf due to rotation of a rectangular coil in uniform magnetic field ) समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में आयताकार कुण्डली की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न विद्युत वाहक बल (वि.वा.बल) : मान लीजिये एक B समरूप चुम्बकीय क्षेत्र में एक आयताकार कुण्डली रखी हुई है , इसे चित्र में abcd द्वारा दर्शाया गया है।
इस आयताकार कुण्डली abcd को इस प्रकार रखा जाता है की इसकी घूर्णन की अक्ष चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत हो।
अब इस आयताकार कुण्डली को w कोणीय वेग से घुमाया जाता है , घुमाने पर हम देखते है की कुण्डली abcd के तल तथा चुम्बकीय क्षेत्र में मध्य कोण θ लगातार बदलता रहता है।
चूँकि हम जानते है की चुम्बकीय फ्लक्स का मान पृष्ठ के तल तथा चुम्बकीय क्षेत्र में मध्य बने कोण पर निर्भर करता है अत: स्पष्ट है की यहाँ लगातार कोण θ परिवर्तित होने से कुण्डली abcd से गुजरने वाला फ्लक्स का मान भी लगातार परिवर्तित होगा।
कुण्डली से संबद्ध फ्लक्स में लगातार परिवर्तन से कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल भी लगातार बदलता रहेगा।
मान लेते है किसी क्षण t पर कुण्डली क्षेत्रफल सदिश A तथा चुंबकीय क्षेत्र B के मध्य θ कोण बना हुआ है तथा इस आयताकार कुण्डली में फेरो की संख्या N है तो इस कुण्डली से सम्बंधित चुम्बकीय फ्लक्स का मान निम्न होगा
ϴ = NBAcosθ
चूँकि यहाँ कोणीय गति हो रही है अतः θ = wt
अतः
ϴ = NBA.cos(wt)
चूँकि t समय के साथ चुम्बकीय फ्लक्स का मान परिवर्तित हो रहा है अत: फैराडे के नियमानुसार कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान
E = dϴ/dt
सूत्र में फ्लक्स ϴ का मान रखने पर
E = dNBA.cos(wt)/dt
अवकलन हल करने पर
E = NBAwsin(wt)
यदि θ = wt = 90 तो
E = NBAw
यह कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का अधिकतम मान है।
प्रेरित विद्युत वाहक बल तथा कोण θ के मध्य ग्राफ खीचने पर यह निम्न प्रकार प्राप्त होता है
भँवर
धाराएँ क्या
है
या
फोको
धारा परिभाषा , प्रयोग , eddy currents in hindi भंवर धाराएँ किसे कहते है
eddy
currents in hindi भँवर धाराएँ क्या है या फोको धारा परिभाषा भंवर धाराएँ किसे कहते है अनुप्रयोग लिखिए , प्रयोग : सन 1895 में फोकॉल्ट वैज्ञानिक ने ज्ञात किया की जब एक बन्द परिपथ से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन किया जाता है तो फ्लक्स में परिवर्तन के कारण परिपथ में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है।
इस प्रेरित विद्युत वाहक बल के उत्पन्न होने के कारण परिपथ में प्रेरित धारा बहने लगती है।
फोकॉल्ट वैज्ञानिक ने यह बताया की जब किसी परिवर्तनशील चुम्बकीय फ्लक्स में किसी चालक आकृति को रखा जाता है तो आकृति से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने से इस आकृति में भी प्रेरण की घटना उत्पन्न होती है।
अर्थात इस चालक आकृति में भी प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती है , ये धाराएँ चालक की गति का विरोध करती है।
ये प्रेरित धाराएं उसी के समान दिखती है जैसी जल में उत्पन्न भंवर दिखती है इसलिए इस प्रेरित धारा को भंवर धारा या भँवर धाराएँ कहते है इनको फोको धाराएँ के नाम से भी जाना जाता है।
परिभाषा (definition)
जब एक चालक से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन किया जाता है तो उस चालक में एक प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है जो चक्कर के रूप में होती है , इन चक्करदार प्रेरित धाराओं को ही भँवर धाराएँ कहते है ”
जिन चालकों का प्रतिरोध अधिक होता है उनमे उत्पन्न भँवर धाराओं का मान कम होता है।
भँवर धाराओं का प्रायोगिक प्रदर्शन
जब धातु की एक पट्टिका की छड़ को चुम्बकीय क्षेत्र में दोलन करवाते है तो दोलन करने से पट्टिका में संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान लगातार परिवर्तित होता रहता है।
चुम्बकीय फ्लक्स के इस परिवर्तन के कारण पट्टिका में भंवर धाराएं उत्पन्न हो जाती है जो पट्टिका की दोलन गति का विरोध करती है।
कभी कभी तो दोलन गति भँवर धाराओं के विरोध के कारण दोलन गति रुक भी जाती है।
यदि इस धातु की पट्टिका में चित्रानुसार खांचे काटे जाए तो यह पट्टिका आसानी से दोलन कर सकती है क्योंकि खांचे काटने से भंवर धाराओं के लिए उपलब्ध बंद पथ में कमी आ जाती है जिससे ये भंवर धाराएं कम हो जाती है और पट्टिका अपनी दोलन गति कर सकता है।
भँवर धाराएँ
(eddy currents in hindi) : जब किसी बंद परिपथ से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है तो परिपथ में एक विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है जिससे परिपथ में प्रेरित धारा बहने लगती है।
सन 1895 में वैज्ञानिक फोकॉल्ट (Foucault) ने यह ज्ञात किया कि प्रेरण की घटना तब भी घटित होती है जब किसी भी आकृति के चालक से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है। उन्होंने देखा कि जब किसी भी आकृति या आकार के चालक को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में चलाया जाता है। या उसे परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो चालक से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने से चालक के सम्पूर्ण आयतन में प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती है जो चालक की गति का विरोध करती है। ये प्रेरित धारायें जल में उत्पन्न भँवर के समान चक्करदार होती है , अत: इन्हें “भँवर धाराएँ” कहते है। आविष्कारक के नाम पर इन्हें “फोकॉल्ट धाराएँ” भी कहते है।
इस प्रकार , “जब किसी चालक से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन किया जाता है तो उस चालक में चक्करदार प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती है , जिहे भंवर धाराएँ कहते है। “
भँवर धाराओं का मान चालक के प्रतिरोध पर निर्भर करता है। यदि चालक का प्रतिरोध अधिक है तो भँवर धाराओं का मान कम होता है। इसके विपरीत यदि चालक का प्रतिरोध कम है तो भँवर धाराओं का मान अधिक होता है। इन धाराओं की प्रबलता इतनी अधिक हो सकती है कि चालक गर्म होकर रक्त तप्त हो सकता है।
चित्र में चालक पदार्थ की एक समतल चादर P को एक असमान चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र की दिशा के लम्बवत रखकर उसे क्षेत्र से बाहर खींचते है तो एक विरोधी बल का अनुभव होता है। इसका कारण यह है कि चादर को क्षेत्र से बाहर खींचने पर चुम्बकीय क्षेत्र के अन्दर चादर का क्षेत्रफल घटता है जिससे चादर से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स (ϕ = BA) का मान घटता है तथा फलस्वरूप चादर के तल में भँवर धाराएँ उत्पन्न होने लगती है। इन भंवर धाराओं की दिशा इस प्रकार होती है कि इनके कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र मूल चुम्बकीय क्षेत्र की ही दिशा में होता है जिससे भँवर धाराएँ फ्लक्स के घटने का विरोध करती है। इसी प्रकार चादर को यदि चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश कराएँ तो भंवर धाराओं के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र मूल क्षेत्र की विपरीत दिशा में होगा। फलत: भँवर धाराएँ चादर से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के बढ़ने का विरोध करेंगी।
(a) प्रायोगिक प्रदर्शन : भंवर धाराओं का प्रायोगिक प्रदर्शन चित्र में प्रदर्शित प्रयोग द्वारा कर सकते है। इसमें एक ताम्बे की आयताकार प्लेट P छिद्र O से जाने वाली क्षैतिज अक्ष पर विद्युत चुम्बक के ध्रुव खण्डो के मध्य स्वतंत्रतापूर्वक गति कर सकती है। जब विद्युत चुम्बक में कोई धारा प्रवाहित नहीं की जाती है तो प्लेट स्वतंत्रतापूर्वक ध्रुव खंडों के मध्य उर्ध्वाधर लटकी होती यह है।
अब प्लेट को घूर्णन गति करा दे तो प्लेट घूर्णन दोलन करने लगेगी। इसी समय यदि विद्युत चुम्बक में धारा प्रवाहित कर दे तो प्लेट के दोलन तुरंत रुक जाते है। इसका कारण है कि चुम्बकीय क्षेत्र में गति करते समय प्लेट से सम्बद्ध फ्लक्स में परिवर्तन होने के कारण प्लेट के तल में भँवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती है जो प्लेट की गति का विरोध करती है। फलस्वरूप प्लेट रुक जाती है।
(b) भँवर धाराओं से हानि तथा उन्हें कम करने के उपाय : अनेक विद्युत उपकरणों जैसे ट्रांसफार्मर्स , डायनमो , प्रेरण कुण्डली आदि में नर्म लोहे की क्रोड़ का प्रयोग होता है। इन उपकरणों में प्रत्यावर्ती धारा बहने से क्रोड़ से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है तथा उसमें भंवर धाराएँ उत्पन्न होने से क्रोड गर्म हो जाती है। इस प्रकार विद्युत ऊर्जा उष्मीय ऊर्जा के रूप में क्षय होने लगती है जो कि अवांछनीय है। भँवर धाराओं के प्रभाव को कम करने के लिए क्रोड को अकेले टुकड़े के रूप में न लेकर पट्लित रूप में लेते है तथा पट्टियाँ पृथक्कृत वार्निश द्वारा विद्युतत: पृथक्कृत कर दी जाती है। इन पत्तियों को चुम्बकीय क्षेत्र के अनुदिश रखते है जिससे भँवर धाराएँ पत्ती की मोटाई (जो कि बहुत कम होती है ) में उत्पन्न होती है। इस प्रकार पटलीत लौह क्रोड़ द्वारा भँवर धाराओं का दुष्प्रभाव कम हो जाता है।
(c) भँवर धाराओं के अनुप्रयोग (application of eddy current
in hindi)
एक तरफ भंवर धाराएँ अवांछनीय है जहाँ इनकी आवश्यकता नहीं है। दूसरा पहलु इनकी उपयोगिता का भी है। ये निम्नलिखित रूपों में उपयोगी है –
1. प्रेरण भट्टी में इनका उपयोग होता है। इसमें धातु को प्रबल परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र में रख दिया जाता है जिससे धातु में प्रबल भँवर धाराएँ उत्पन्न होकर इतनी ऊष्मा उत्पन्न करती है कि धातु पिघल जाती है।
2. धारामापी को रुद्ध दोलन बनाने में इनका उपयोग होता है। धारामापी की कुण्डली ताम्बे के विद्युतरोधी तार को एल्युमिनियम के फ्रेम पर लपेट कर बनाई जाती है। जब कुण्डली विक्षेपित होती है तो फ्रेम में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती है जो कुण्डली की गति का विरोध करती है। अत: कुण्डली विक्षेपित होकर शीघ्र ही उपयुक्त स्थिति में रुक जाती है।
3. विद्युत ट्रेनों को रोकने के लिए भँवर धाराओं का उपयोग विद्युत ब्रेक के रूप में किया जाता है। पहिये की धुरी के साथ साथ धातु का ड्रम लगा होता है जो पहिये के साथ साथ घूमता है। जब ट्रेन को रोकना होता है तो ड्रम के पास प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न कर दिया जाता है जिससे ड्रम में भँवर धाराएँ प्रेरित हो जाती है जो ड्रम की गति का विरोध करती है तथा ट्रेन रुक जाती है।
4. वाहनों के गतिमापी भँवर धाराओं के सिद्धान्त पर ही कार्य करते है। मोटर गाडियों में एक चुम्बक गेयर द्वारा पहिये की धुरी से जुड़ा होता है। यह चुम्बक धातु के ड्रम से घिरा होता है। पहिये के साथ साथ ड्रम भी घूमता है जिससे ड्रम में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती है जो घूमते हुए पहिये तथा ड्रम के मध्य आपेक्षिक गति का विरोध करती है। अत: ड्रम भी घुमने लगता है। ड्रम का घुमाव गाडी की चाल के अनुक्रमानुपाती होता है , अत: ड्रम में संकेतक लगाकर एक पैमाने द्वारा गाडी की चाल मापी जा सकती है।
भँवर
धाराओं के
उपयोग
application of eddy currents in hindi
application of eddy currents
in hindi भँवर धाराओं के उपयोग : कहीं कही भंवर धाराएं अवांछनीय है जैसे इनकी वजह से ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है जिससे ऊर्जा की क्षति होती है , तो कही पर इनका बहुत उपयोग है , हम यहाँ इनके उपयोग के बारे में अध्य्यन करेंगे की इनका उपयोग कहा और क्यों किया जाता है।
1. प्रेरण भट्टी में : प्रेरण भट्टी में इनका उपयोग होता है , भट्टी में धातु को प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र में रख दिया जाता है , जिससे धातु में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती है।
भंवर धारा उत्पन्न होने से ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है तथा इस ऊष्मा का मान इतना अधिक होता है की रखी हुई धातु पिघल जाती है।
2. उत्तको की सिकाई करने में : रोगी के उत्तको की सिकाई करने के लिए , जिस उत्तक की सिकाई करनी है उस भाग पर कुण्डली लपेटकर उसमे धारा प्रवाहित की जाती है जिससे उत्तको में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती है और इसके कारण ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है जिससे उत्तको की सिकाई हो पाती है।
3. रुद्ध दोल धारामापी में
: धारामापी बनाने के लिए ताम्बे के तार को एलुमिनियम के फ्रेम पर लपेटा जाता है , जब कुण्डली विक्षेपित होती है तो तो एलुमिनियम के फ्रेम में भंवर धाराएं उत्पन्न हो जाती है जो कुण्डली में विक्षेप का विरोध करती है जिससे कुण्डली उपयुक्त स्थिति पर विक्षेपित होकर रुक जाती है।
4. विद्युत रेलगाड़ियों में ब्रेक के लिए : विद्युत रेलगाड़ियों में ब्रेक के रूप में भंवर धाराओ का उपयोग किया जाता है।
ट्रेन के पहियें के पास एक धातु का ड्रम लगा होता है , जो हमेशा पहियें के साथ साथ घूमता है , जब ट्रेन में ब्रेक लगाने होते है तो पहियें के पास चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जाता है जिससे धातु के ड्रम में भंवर धाराएं उत्पन्न हो जाती है और ये पहियें की गति का विरोध करती है जिससे ट्रेन रुक जाती है।
5. वाहनों में ब्रेक के रूप में : वाहनों के पहियें के चारो ओर धातु का ड्रम लगा होता है इसी के साथ पहियें का सम्बन्ध चुम्बक गेयर से होता है , जब वाहन में ब्रेक लगाने होते है तो धातु के ड्रम के पास लगे चुम्बक गेयर को एक्टिव किया जाता है जिससे ड्रम में भंवर धारा उत्पन्न हो जाती जो पहियें की गति का विरोध करता है और वाहन रुक जाता है।
स्वप्रेरण की
परिभाषा क्या
है
,स्व
प्रेरण का
प्रायोगिक प्रदर्शन Self induction in hindi स्वप्रेरण किसे कहते हैं
Self induction in hindi स्वप्रेरण किसे कहते हैं स्वप्रेरण की परिभाषा क्या है : जब किसी कुण्डली में परिवर्तित धारा का मान प्रवाहित किया जाता है तो इसमें चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है तथा जिसके कारण इससे सम्बद्ध परिवर्तनशील चुम्बकीय फ्लक्स का मान उत्पन्न हो जाता है। चुम्बकीय फ्लक्स के मान में परिवर्तन होने से प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है इस घटना को ही स्वप्रेरण कहते है।
परिभाषा : किसी कुण्डली में धारा परिवर्तन के कारण प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है इस घटना को स्व प्रेरण कहते है।
स्वप्रेरण का प्रायोगिक प्रदर्शन
स्व प्रेरण की घटना को समझने के लिए एक प्रयोग करते है तथा इसे इस प्रयोग के माध्यम से समझने की कोशिश करते है।
चित्रानुसार एक बल्ब , कुण्डली , बैट्ररी तथा कुंजी को आपस में जोड़ते है। जब कुंजी को लगाया जाता है तो स्वभाविक है की बल्ब जलेगा लेकिन जब कुन्जी को हटाया जाता है तो बल्ब एकदम से बंद न होकर धीरे धीरे बंद होता है अर्थात कुंजी निकालने के बाद बल्ब कुछ देर पर जलता रहता है।
ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि जब कुंजी को निकाला जाता है तो स्वप्रेरण के कारण धारा के विपरीत दिशा में एक प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है , जब कुंजी को हटाया जाता है तो यह प्रेरित धारा मूल धारा के कम होने का विरोध करती है , इसलिए बल्ब कुछ देर तक जलता रहता है जब तक की प्रेरित धारा मूल धारा का विरोध कर उसको शून्य न होने दे।
स्वप्रेरण अथवा आत्म प्रेरण
(self induction in hindi) : स्व प्रेरण की घटना की खोज अमेरिकी वैज्ञानिक “जोसेफ हेनरी ” ने सन 1832
में की थी। “किसी चक्र में धारा परिवर्तन के कारण उसी चक्र में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होने की घटना स्वप्रेरण कहलाती है। ”
किसी चक्र के इस गुण की तुलना जड़त्व से की जा सकती है। जब किसी कुण्डली युक्त चक्र में धारा बढने पर कुंडली के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता बढती है अत: कुण्डली से गुजरने वाली क्षेत्र रेखाओं की संख्या में वृद्धि होती है। ऐसा होने पर कुण्डली में एक प्रतिकूल विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जो प्रधान धारा का विरोध करता है। इसलिए प्रधान धारा अपने उच्चतम मान को ग्रहण करने में कुछ समय लेती है (यद्यपि यह नगण्य होता है ) | जैसे ही प्रधान धारा अधिकतम मान को प्राप्त कर लेती है , फ्लक्स परिवर्तन समाप्त हो जाता है जिससे प्रेरित विद्युत वाहक बल शून्य हो जाता है। इसी प्रकार परिपथ तोड़ते समय चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की संख्या घटती है अत: समान दिशा में प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है जो प्रधान धारा को एकदम शून्य नहीं होने देती है। चित्र में उक्त दोनों स्थितियां प्रदर्शित की गयी है। स्पष्ट है कि स्वप्रेरण के कारण ही किसी कुण्डली में धारा न तो एकदम अधिकतम हो पाती है और न ही एकदम शून्य हो पाती है।
जिस स्थान पर परिपथ टूटता है , उस स्थान पर दोनों बिन्दुओं के मध्य यह प्रेरित धारा विभवान्तर उत्पन्न कर देती है जो इतना अधिक हो सकता है कि दोनों बिन्दुओं के मध्य विद्युत प्रवाह को हवा का पृथककारी गुण न रोक सके तथा धारा वास्तव में प्रवाहित हो जाए। इस धारा प्रवाह से उत्पन्न ऊष्मा चिंगारी के रूप में देखी जा सकती है। इस प्रकार स्वप्रेरण के कारण मुख्य धारा की वृद्धि तथा पतन दोनों का समय बढ़ जाता है परन्तु समय की यह वृद्धि परिपथ को तोड़ने की अपेक्षा जोड़ने के समय अधिक होती है क्योंकि तोड़ने की स्थिति में प्रेरित धारा को विद्युत चक्र पूर्ण नहीं मिलता है।
प्रायोगिक प्रदर्शन : स्वप्रेरण की घटना का प्रदर्शन चित्र में दिखाए गए परिपथ की सहायता से किया जा सकता है। कुंजी दबाने पर बल्ब जलना कोई विशेष बात नहीं है परन्तु कुंजी को खोलने पर बल्ब एकदम चमकना बंद न करके कुछ देर तक चमकता रहता है अर्थात धीरे से बंद होता है , यह विशेष बात है। उक्त व्यवहार स्वप्रेरण के कारण होता है। कुंजी को खोलते समय स्वप्रेरण के कारण समान दिशा में धारा उत्पन्न हो जाती है जो प्रधान धारा के घटने का विरोध करती है तथा वह यकायक शून्य नहीं हो पाती है। इसलिए कुंजी खोलने के बाद भी बल्ब कुछ समय के लिए चमकता रहता है।
स्वप्रेरण गुणांक या
स्वप्रेरकत्व की
परिभाषा क्या
है
, सूत्र
, SI मात्रक , विमा
, coefficient of self inductance in hindi
coefficient of self inductance in hindi self
induction स्वप्रेरण गुणांक या स्वप्रेरकत्व क्या है ? किसे कहते है ?
परिभाषा : माना किसी N फेरो वाली कुण्डली में I धारा प्रवाहित हो रही है , I धारा प्रवाहित होने से इस कुण्डली के प्रत्येक फेरे के कारण ϴ चुम्बकीय फ्लक्स उत्पन्न हो जाता है।
अतः सम्पूर्ण फेरों या कुण्डली के कारण कुल उत्पन्न चुम्बकीय फ्लक्स का मान Nϴ होगा।
कुण्डली में उत्पन्न चुम्बकीय फ्लक्स Nϴ का मान इसमें प्रवाहित धारा के समानुपाती होती है।
अतः
Nϴ ∝ I
समानुपाती का चिन्ह हटाने पर
Nϴ = LI
यहाँ L एक समानुपाती गुणांक (नियतांक) है , इसे स्वप्रेरण गुणांक या स्वप्रेरकत्व कहा जाता है।
L का मान कुण्डली में लिपटे फेरों की संख्या , आकृति , आकार , माध्यम क्रोड़ पदार्थ पर निर्भर करता है।
यदि N = 1 तथा I = 1 तो
ϴ = I
परिभाषा : किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक उस चुम्बकीय फ्लक्स के बराबर होता है जो उस कुण्डली में 1 एम्पियर की धारा प्रवाहित करने पर उत्पन्न होता है।
माना कुण्डली में धारा परिवर्तनशील है अर्थात धारा का मान △t समय में I1 से बदलकर I2 हो जाता है। तो कुण्डली में उत्पन्न प्राम्भिक चुम्बकीय फ्लक्स का मान जब धारा I1 बह रही है।
Nϴ1 = LI1
△t समय बाद कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स जब धारा I2 बह रही है।
Nϴ2 = LI2
△t समय में फ्लक्स में परिवर्तन
N△ϴ = Nϴ2 – Nϴ1
N△ϴ = LI2 – LI1
N△ϴ = L△I
अतः चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर
N△ϴ/△t = L△I/△t
फैराडे के चुम्बकीय प्रेरण के नियम से
प्रेरित विद्युत वाहक बल E = -N△ϴ/△t
समीकरण में मान रखने पर
E = –L△I/△t
यहाँ ऋणात्मक चिन्ह यह दर्शाता है की प्रेरित विद्युत वाहक बल मूल धारा I में परिवर्तन का विरोध करती है।
यदि △I/△t = 1 हो तो
E = -L
अतः ” किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक उस कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल के बराबर होती है जब धारा परिवर्तन की दर 1 एम्पियर प्रति सेकंड हो। “
हमने देखा की प्रेरित विद्युत वाहक बल कुण्डली में धारा का विरोध करता है अत: कुण्डली में धारा प्रवाहन के लिए इस प्रेरित विद्युत वाहक बल के विरुद्ध एक बाह्य कार्य करना पड़ता है , यह कार्य कुण्डली में चुम्बकीय स्थितिज उर्जा के रूप में संचित हो जाता है , जिसका मान निम्न प्रकार दिया जाता है
W = LI2/2
यदि I = L = 1 तो W = 2
अत: कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल के विरुद्ध किया गया कार्य स्वप्रेरकत्व का दोगुना होता है।
प्रेरकत्व एक अदिश राशि है तथा इसका SI मात्रक हेनरी होता है।
इसकी विमा [M1L2T-2A-2] होती है।
स्वप्रेरण गुणांक या स्वप्रेरकत्व
(coefficient of self induction or self inductance in hindi) :
माना N फेरों वाली कुण्डली में i धारा बहने से प्रत्येक फेरे से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स ϕ है , अत: कुण्डली के साथ सम्बद्ध कुल चुम्बकीय फ्लक्स Nϕ होगा। इस फ्लक्स का मान कुंडली में बहने वाली धारा के अनुक्रमानुपाती होता है अर्थात
Nϕ ∝ i
या
Nϕ = L.i . . . . . . . . . .. समीकरण-1
यहाँ L , एक नियतांक है जिसे “स्वप्रेरण गुणांक” अथवा “स्वप्रेरकत्व” कहते है।
समीकरण-1 से –
L = Nϕ/i . . . . . . . . . .. समीकरण-2
यदि धारा i = 1 एम्पियर तो L = Nϕ
अर्थात किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक उस चुम्बकीय फ्लक्स के तुल्य है जो उस कुंडली में एक एम्पियर धारा बहने पर उसके साथ सम्बद्ध होता है।
यदि कुंडली में बहने वाली धारा △t समय में i1 से बदलकर i2 हो जाती है तो कुण्डली से सम्बद्ध प्रारंभिक चुम्बकीय फ्लक्स समीकरण- 1 से –
Nϕ1 = L.i1
तथा अंतिम चुम्बकीय फ्लक्स –
Nϕ2 = L.i2
अत: फ्लक्स परिवर्तन
N△ϕ = Nϕ2 – Nϕ1
N△ϕ = L.i2 – L.i1
N△ϕ = L(i2 – i1)
अत:
N△ϕ = L△i
अत: फ्लक्स परिवर्तन की दर –
N△ϕ/△t = L△i/△t
अत: कुण्डली में स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल –
eL = -N△ϕ/△t
अथवा
eL = -L△i/△t . . . . . . . . . .. समीकरण-3
यदि धारा परिवर्तन की दर △i/△t = 1 A/s हो तो
eL = -L
या संख्यात्मक रूप से eL = L
अर्थात किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक उस विद्युत वाहक बल के तुल्य है जो उस कुण्डली में 1 A/s की दर से विद्युत धारा बदलने पर उसमें उत्पन्न होता है।
स्वप्रेरण गुणांक या स्वप्रेरकत्व का मात्रक (unit of self inductance)
L का मात्रक = V.s/A
= V.s.A-1
अर्थात L का मात्रक V.s.A-1 है जिसे हेनरी भी कहते है अत:
1 V.s.A-1 = 1 H
व्यवहार में प्रेरकत्व के छोटे मात्रक भी प्रयुक्त होते है , जैसे –
1 मिली हेनरी (mH) = 10-3
H
1 माइक्रो हेनरी (uH) = 10–6 H
स्वप्रेरकत्व के मात्रक हेनरी की परिभाषा –
समीकरण-2 से –
L = Nϕ/i
यदि धारा i = 1 एम्पियर ; Nϕ = 1 वेबर तो L = 1 H (हेनरी)
अर्थात यदि किसी कुण्डली में एक एम्पियर की धारा बहने पर उसके साथ एक वेबर का चुम्बकीय फ्लक्स सम्बद्ध होता है तो उस कुण्डली का स्वप्रेरकत्व एक हेनरी होगा।
समीकरण-3 से –
L = -eL/(△i/△t)
L = -eL/(△i/△t)
(संख्यात्मक रूप से)
यदि △i/△t
= 1 As-1 ; eL
= 1 वोल्ट तो L
= 1 हेनरी
अर्थात यदि किसी कुंडली में 1 As-1 की दर से धारा बदलने पर उसमें 1 वोल्ट का स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है तो उसका स्वप्रेरकत्व एक हेनरी होगा।
स्वप्रेरकत्व की विमीय सूत्र –
L का विमीय सूत्र –
L की विमा = [M1L2T-2A-2]
स्वप्रेरकत्व का निरूपण – विभिन्न प्रकार के स्वप्रेरणत्व निम्न चित्र में प्रदर्शित किये गए है –
नोट : एक आदर्श प्रेरकत्व का स्वप्रेरकत्व अधिक होता है और उसका प्रतिरोध शून्य ओम होता है।
युग्मन गुणांक (coefficient of coupling)
– जब दो कुण्डली जिनके प्रेरकत्व (L1
और L2 है तथा अन्योन्य प्रेरकत्व M हो तो युग्मन गुणांक)
K = M/√L1L2
K – 0 = जब दोनों कुण्डलियों का युग्म ढीला होता है।
K – 1 = जब दोनों कुंडलियो का युग्म कसा होता है।
समतल कुण्डली का स्वप्रेरकत्व (self inductance of a plane coil)
माना N फेरों वाली एक समतल कुंडली की त्रिज्या r है तथा इसमें i एम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। इस कुण्डली के केंद्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B = u0.N.i/2r
यदि इस क्षेत्र को कुण्डली के सम्पूर्ण तल में एक समान मानें तो कुंडली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स
Nϕ = N.(BA) = N.B.πr2
अथवा Nϕ = N.u0N.i. πr2/2r
अथवा
Nϕ
= u0πN2i.r/2 . . . . . . . . . . . . समीकरण-1
यदि कुण्डली का स्वप्रेरकत्व L हो तो
L = Nϕ/i .
. . . . . . . . . . . समीकरण-2
समीकरण-2 में Nϕ का मान समीकरण-1 से रखने पर –
L
= u0πN2.r/2 हेनरी .
. . . . . . . . . . . समीकरण-3
समीकरण-3 से स्पष्ट है कि u0 का मात्रक हेनरी/मीटर भी लिखा जा सकता है।
किसी कुण्डली का स्वप्रेरकत्व कुंडली के अन्दर रखे कोड के पदार्थ पर भी निर्भर करता है। यदि कुण्डली के अन्दर किसी लौह चुम्बकीय पदार्थ जैसे लोहा , निकल अथवा कोबाल्ट की छड़ रख दी जाए तो स्वप्रेरण गुणांक L का मान बहुत अधिक हो जाता है। इसे एक सरल प्रयोग द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है। काफी अधिक चक्करों वाली एक कुण्डली को 220 वोल्ट वाले विद्युत बल्ब के साथ श्रेणीबद्ध करके AC स्रोत से जोड़ दिया जाए तो बल्ब चमकने लगता है। अब यदि कुण्डली को बिना स्पर्श किये उसके अन्दर लोहे की छड लायी जाए तो बल्ब की चमक तुरंत काफी कम हो जाती है। इसी प्रकार यदि लोहे की कई छड़े एक एक करके कुण्डली के अन्दर लायी जाए तो बल्ब की चमक क्रमशः कम होती जाती है। स्मरणीय है कि इस प्रयोग में AC स्रोत ही लेना है क्योंकि प्रेरण की घटना तभी तक होती है जब तक धारा परिवर्तित रहती है। दिष्ट धारा नियत रहती है , अत: प्रेरण प्रभाव परिलक्षित नहीं होगा।
समतल
वृत्ताकार कुण्डली का
स्वप्रेरकत्व self inductance of a plane circular coil in hindi
self inductance of a plane circular coil in hindi समतल वृत्ताकार कुण्डली का स्वप्रेरकत्व : हमने स्वप्रेरण तथा स्वप्रेरकत्व के बारे में अध्ययन कर लिया है।
हम अध्ययन करते है की एक समतल वृत्ताकार कुण्डली का स्वप्रेरकत्व कितना होता है इसके लिए हम सूत्र की स्थापना भी करेंगे।
मान लेते है की N फेरे किसी वृत्ताकार कुण्डली में लिपटे हुए है तथा इस वृत्ताकार कुंडली में I धारा प्रवाहित हो रही है।
धारा प्रवाहित होने से इसके केंद्र में एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिसका मान निम्न सूत्र से दिया जाता है
कुण्डली में N फेरे है अत: कुण्डली से उत्पन्न कुल चुम्बकीय फ्लक्स का मान निम्न प्रकार दिया जाता है
स्वप्रेरकत्व की परिभाषा में हमने पढ़ा था की चुम्बकीय फ्लक्स का मान कुण्डली में प्रवाहित हो रही धारा के समानुपाती होती है , जबकि N यहाँ फेरो की संख्या है
Nϴ ∝ I
समानुपाती चिन्ह हटाने पर
Nϴ = LI
L = Nϴ/I
यहाँ सूत्र में चुम्बकीय फ्लक्स का मान रखते है जो हमने ऊपर ज्ञात किया है
यह सूत्र दिखाता है की एक समतल वृत्ताकार कुण्डली का स्वप्रेरकत्व का मान निम्न होता है।
हम सूत्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है की समतल वृत्ताकार कुण्डली का स्वप्रेरकत्व (L) का मान कुण्डली पर लिपटे फेरो(N) के वर्ग के समानुपाती होता है।
धारावाही परिनालिका का
स्वप्रेरकत्व Self inductance of a current carrying solenoid in hindi
Self inductance of a current carrying solenoid in hindi धारावाही परिनालिका का स्वप्रेरकत्व : हमने पिछले topic में एक समतल वृत्ताकार कुण्डली का स्वप्रेरकत्व कितना होता है इसका अध्ययन कर चुके है और इसके लिए सूत्र भी स्थापित कर चुके है।
अब हम यहाँ धारावाही परिनालिका का स्वप्रेरकत्व ज्ञात करेंगे और इसके लिए सूत्र क्या होता है इसकी भी गणना करेंगे।
माना एक धारावाही परिनालिका है जिसके अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A तथा इसकी लम्बाई L है तथा इस पर N फेरे लिपटे हुए है।
जब इसमें I परिमाण की धारा प्रवाहित की जाती है तो इस परिनालिका के अन्दर इसकी अक्ष पर एक चुम्बकीय क्षेत्र हो जाता है जिसका मान निम्न सूत्र से ज्ञात कर सकते है
इस धारावाही परिनालिका से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान निम्न होगा
समीकरण में चुंबकीय क्षेत्र B का मान रखने पर जो हमने ऊपर ज्ञात किया है
यदि परिनालिका के स्वप्रेरकत्व का मान L माने तो हमने पढ़ा था की स्वप्रेरकत्व का मान निम्न प्रकार लिखा जाता है
उक्त समीकरण में चुम्बकीय फ्लक्स का मान रखते है तो हमने अभी ज्ञात किया है
यहाँ n = N/L है। यह परिनालिका में एकांक लम्बाई के फेरों की संख्या को बताता है।
सूत्र से स्पष्ट है की धारावाही परिनालिका का स्वप्रेरकत्व का मान इस पर लिपटे फेरो की संख्या के वर्ग के समानुपाती होता है।
अन्योन्य प्रेरण की
परिभाषा क्या
है
Mutual inductance in hindi
Mutual inductance in hindi अन्योन्य प्रेरण की परिभाषा क्या है : चित्रानुसार पास में रखी दो कुण्डलियों के एक कुण्डली में परिवर्तित धारा प्रवाहित करते है तो पास में रखी दूसरी कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने इस द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है इस घटना को अन्योन्य प्रेरण कहते है।
परिभाषा : जब कुण्डली या परिपथ में धारा परिवर्तन से इसके पास स्थित दूसरी कुण्डली या परिपथ में प्रेरण होता है तो इस घटना को अन्योन्य प्रेरण कहते है।
जिस परिपथ में परिवर्तित धारा प्रवाहित की जाती है उसको प्राथमिक परिपथ तथा जिसमे प्रेरण उत्पन्न होता है उसको द्वितीयक परिपथ कहते है।
विस्तार से व्याख्या
चित्र में दिखाएँ अनुसार एक कुण्डली A के साथ कुंजी S , बैटरी B को जोड़ते है इस प्राथमिक कुण्डली कहते है। तथा इसके पास एक अन्य कुण्डली B को रख देते है जिसमे एक धारामापी (गैल्वेनोमीटर) लगा हुआ है जिसे चित्र में द्वितीयक कुण्डली कहा गया है।
जब कुंजी S को बंद किया जाता है तो प्राथमिक कुण्डली में धारा I प्रवाहित होने लगती है , प्रतिरोध R का मान परिवर्तित करके धारा को परिवर्तित करते है जिससे प्राथमिक कुंडली में परिवर्तित धारा प्रवाहित होने लगती है।
कुण्डली में परिवर्तित धारा प्रवाहित होने से कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के मान में परिवर्तन होता है जिससे द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है , परिणामस्वरूप धारामापी में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है जो यह प्रदर्शित करता है की द्वितीयक कुण्डली में भी धारा प्रवाहित हुई है।
यदि प्राथमिक कुण्डली में नियत धारा का मान प्रवाहित हो तो द्वितीयक कुण्डली में लगे धारामापी में कोई विक्षेप नहीं आयेगा।
यदि प्राथमिक कुण्डली में परिवर्तित धारा का मान बढाया जाए तो विक्षेप अधिक प्राप्त होता है।
द्वितीयक कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा इस प्रकार होती है की यह सम्बद्ध फ्लक्स में परिवर्तन का विरोध करती है
अन्योन्य प्रेरण गुणांक या
अन्योन्य प्रेरकत्व coefficient of mutual inductance in hindi
coefficient of mutual inductance in hindi अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व : चित्रानुसार दो कुंडलियाँ पास में रखी हुई , पहली कुंडली में लिपटे फेरो की संख्या N1 है तथा दूसरी कुण्डली में फेरों की संख्या N2 है।
प्राथमिक कुण्डली में प्रवाहित धारा का मान I1 है यह धारा परिवर्तनशील है जिससे द्वितीयक कुण्डली में उत्पन्न सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान ϴ2 है।
प्राथमिक कुण्डली में प्रवाहित परिवर्तनशील धारा का मान जितना अधिक होता है द्वितीयक कुण्डली में सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान उतना ही अधिक होता है।
अत: हम कह सकते है की द्वितीयक कुण्डली का सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान प्राथमिक कुण्डली में प्रवाहित धारा के समानुपाती होता है।
प्राथमिक कुण्डली में प्रवाहित धारा = I1
द्वितीयक कुण्डली में उत्पन्न सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स = N2ϴ2
अत:
N2ϴ2 ∝ I1
समानुपाती का चिन्ह हटाने पर
N2ϴ2 = M I1
यहाँ M एक नियतांक है , इसे दोनों कुण्डलियों के मध्य अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व कहा जाता है।
अन्योन्य प्रेरण गुणांक का मात्रक हेनरी होता है।
जब प्राथमिक कुण्डली में प्रवाहित धारा में परिवर्तन हो रहा है तो द्वितीयक कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में भी समय के साथ परिवर्तन होगा , इससे द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है जिसका मान निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है
E2 = – dϴ2/dt
यहाँ सूत्र में चुम्बकीय फ्लक्स का मान रखने पर
E2 = – MdI1/dt
यहाँ ऋणात्मक चिह यह दर्शाता है की द्वितीयक कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल की दिशा इस प्रकार होती है की यह प्राथमिक कुण्डली में धारा परिवर्तन का विरोध कर सके।
अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व की विमा [M1L2T-2A-2] होती है।
परिभाषा
किन्ही दो कुण्डलियों के मध्य अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व उस चुम्बकीय फ्लक्स के बराबर होती है जो एक कुण्डली में एक एम्पियर धारा बहने से दूसरी कुण्डली के साथ सम्बद्ध रहती है।
या
दो कुण्डली के मध्य अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व उस विद्युत वाहक बल के बराबर होता है जो एक कुण्डली में 1 एम्पियर प्रति सेकंड की दर की धारा परिवर्तन पर दूसरी कुण्डली में उत्पन्न होता है।
दो
समाक्षीय परिनालिकों के
मध्य
अन्योन्य प्रेरकत्व mutual inductance between two co-axial solenoid
mutual inductance between two co-axial solenoid in hindi दो समाक्षीय परिनालिकों के मध्य अन्योन्य प्रेरकत्व : दो परिनालिका चित्रानुसार एक समान अक्ष पर रखी हुई, एक को हमने चित्र में S1 नाम दिया है तथा दूसरी को S2.
S1 परिनालिका में N1 फेरें लिपटे हुए है तथा S2 परिनालिका में N2 फेरें लिपटे हुए है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
हम चित्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है की दोनों परिनालिकाएं इस प्रकार रखी हुई है की जब S1 परिनालिका में धारा प्रवाहित की जाएगी तो उसके द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय फ्लक्स पूरा का पूरा S2 परिनालिका से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स होगा।
कुण्डली की लम्बाई L है तथा अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A है।
जब S1 परिनालिका में I1 धारा प्रवाहित करने पर इसकी अक्ष पर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिसका मान निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है
अक्ष पर उत्पन्न इस चुम्बकीय क्षेत्र के कारण यह पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र S2 परिनालिका से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स होगा , अत: S2 परिनालिका से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान निम्न होगा
N2 ϴ2 =
N2B1A
यहाँ B1 का मान रखने पर
हम अन्योन्य प्रेरण की परिभाषा से जानते है की
N2 ϴ2 = MI1
अतः दो समाक्षीय परिनालिकों के मध्य अन्योन्य प्रेरकत्व का मान निम्न होगा






































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