विद्युत विभव पाठ 3 फिजिक्स नोट्स 12 क्लास electric potential notes in hindi chpater 12th class
स्थिर
विद्युत विभव
तथा
विभवान्तर की
परिभाषा क्या
है
electrostatic potential and potential difference
electrostatic potential and
potential difference in hindi स्थिर विद्युत विभव तथा विभवान्तर की परिभाषा क्या है
:
स्थितिज ऊर्जा के रूप में :
विभवान्तर : माना के विद्युत क्षेत्र में धन परीक्षण आवेश बिन्दु A पर स्थित है , इस धन परीक्षण आवेश को बिंदु A से B तक इस प्रकार लाया जाता है की यदि उस निकाय में अन्य आवेश उपस्थित है तो वह उनमें कोई विस्थापन उत्पन्न न करे अर्थात सिर्फ धन परिक्षण आवेश ही बिंदु A से B तक विस्थापित हो अन्य सभी आवेश अपरिवर्तित रहे तो इस विस्थापन से बिंदु A तथा B की स्थितिज ऊर्जा में एक परिवर्तन हो जाता है यहाँ स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन UB – UA से दिया जाता है।
तथा A व B बिन्दुओ के मध्य विभवान्तर को निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है।
VB –
VA = (UB – UA)/q0 = △U/q0
परिभाषा : A तथा B अर्थात दो बिन्दुओ के मध्य विभवान्तर उस कार्य के बराबर होती है जो एकांक आवेश को निम्न विभव बिंदु से उच्च विभव बिंदु तक ले जाने में करना पड़ता है।
विभव : माना पिछले उदाहरण में A बिंदु अनंत पर स्थित है
अतः VA = V∞ = 0 and UA =
U∞ = 0
इसलिए
VB = UB /q0
अतः इसको व्यापक रूप में इस प्रकार लिख सकते है
V = U/q0
अतः विभव को इस प्रकार परिभाषित कर सकते है की किसी बिंदु पर एकांक आवेश स्थितिज ऊर्जा को ही विद्युत विभव कहते है।
विद्युत विभव वह कारण है जो आवेश प्रवाह के लिए दिशा का निर्धारण करता है अर्थात आवेश उच्च विधुत विभव से निम्न विभव की ओर तब तक प्रवाहित होता है जब तक की दोनों बिन्दुओ पर विभव का मान समान न हो जाए।
विभव एक अदिश राशि है।
कार्य के रूप में :
बिंदु A तथा बिंदु B के मध्य विभवांतर एकांक आवेश को बिंदु A से B तक विद्युत क्षेत्र के द्वारा किया गया कार्य का ऋणात्मक होता है।
VB –
VA = -Wex/q0
पहले की भांति माना की बिंदु A अनंत पर स्थित है अतः किसी एकांक धन आवेश को अनन्त से किसी बिंदु (B) तक लाने में विद्युत क्षेत्र द्वारा किये गए कार्य के ऋणात्मक को ही विद्युत विभव कहते है।
VA =
0
VB = -Wex/q0
अतः इसको व्यापक रूप में इस प्रकार लिख सकते है
विभव (V) = W/q0
किसी बिंदु पर विद्युत विभव उस कार्य के बराबर होता है जो 1 कुलाम आवेश को अनंत से उस बिंदु तक लाने में विद्युत क्षेत्र द्वारा करना पड़ता है।
विद्युत विभव का SI मात्रक वोल्ट है
वोल्ट = जूल/कूलॉम
तथा विधुत विभव की विमा V = [ML2T-3A-1]
विद्युत क्षेत्र से विभव ज्ञात करना electric potential from electric field in hindi
electric potential from electric field in hindi विद्युत क्षेत्र से विभव : हम विद्युत क्षेत्र , विद्युत क्षेत्र की तीव्रता तथा विद्युत विभव के बारे में पढ़ चुके है अब हम विद्युत क्षेत्र की सहायता से विद्युत विभव का मान ज्ञात करने के लिए सूत्र की स्थापना करेंगे या दूसरे शब्दों में कहे तो विद्युत क्षेत्र (E) तथा विद्युत विभव (V) के मध्य सबन्ध स्थापित करेंगे।
माना चित्रानुसार एक विद्युत क्षेत्र है जिसकी क्षेत्र रेखायें चित्र में दर्शाये अनुसार है , इस विद्युत क्षेत्र में एक धन परिक्षण आवेश (q0) उपस्थित है , यह अल्पांश विद्युत क्षेत्र में a से b तक विस्थापित होता है क्योंकि विद्युत क्षेत्र के कारण आवेश पर बल (F = qE ) लगता है , a से b तक विस्थापन का अल्पांश dl से दर्शाया गया है , विद्युत आवेश (q0) पर अल्पांश dl तक विस्थापन में विद्युत क्षेत्र या विद्युत बल द्वारा किया गया कार्य
dW = F.dl
चूँकि F = q0E
dW = q0E.dl
A से B तक विस्थापन से किया गया कुल कार्य
a∫b q0Edl = q0 a∫b Edl
चूँकि Vb – Va (विभवान्तर) = -W/q0 = कार्य /आवेश
Vb – Va = -(q0/q0). a∫b Edl
= –a∫b Edl
यहाँ समीकरण के राइट साइड को रेखीय समाकल (line integral) कहते है।
हम जानते है की विद्युत बल या विद्युत क्षेत्र संरक्षी प्रकृति का होता है अर्थात पथ पर निर्भर नहीं करता , इसका आशय यह है की a से b तक चाहे किसी भी पथ से पहुंचाया जाए विद्युत बल द्वारा किया गया कार्य समान होगा।
कोई भी विद्युत क्षेत्र किसी धनावेश को उच्च विभव से निम्न विभव में गति कराता है।
जबकि ऋणात्मक आवेश को निम्न विभव से उच्च विभव की ओर गति करता है।
माना बिंदु a अनन्त पर स्थित है इसलिए Va = 0
Vb = –∞∫b Edl
व्यापक रूप से लिखा जा सकता है
V = –∞∫b Edl
बिंदु आवेश के कारण विभव electric potential at a point due to a point charge derivation)
electric
potential at a point due to a point charge derivation) बिंदु आवेश के कारण विभव : हम विद्युत विभव की परिभाषा पढ़ चुके है की जब किसी बिन्दु पर विभव ज्ञात करना होता है तो एकांक धनावेश को अनन्त से उस बिंदु तक लाने में किया गया कार्य ज्ञात करना पड़ेगा।
क्योंकि विभव की परिभाषानुसार किसी आवेश को उस बिंदु तक लाने में किया गया कार्य ही विद्युत विभव कहलाता है।
मान लीजिये कोई बिंदु O है जिस पर कोई आवेश +q रखा हुआ है , इस आवेश (q) अर्थात O बिन्दु से r दूरी पर एक बिंदु P स्थित है तथा हमें P बिंदु पर विभव का मान ज्ञात करना है या दूसरे शब्दों में कहे तो अनंत से एकांक धनावेश को P बिंदु तक लाने में किया गया कार्य ज्ञात करेंगे।
एकांक धन आवेश को अनंत से P बिन्दु तक लाने में किया गया कार्य अर्थात P बिंदु पर विद्युत विभव ज्ञात करने के लिए OP दिशा में O बिंदु से x दुरी पर एक बिंदु A चुन लेते है।
धन परीक्षण आवेश (q0) A बिंदु पर लगने वाला बल (कूलॉम नियम से )
इस बल (F) के विरुद्ध धन परिक्षण आवेश को dx विस्थापित करने में किया गया कार्य
dW = F.dx
dW = F.dx Cos180
dW = F.dx (-1)
dW = -F.dx
अतः धन परिक्षण आवेश (q0) को अनन्त से P बिंदु तक लाने में किया गया कार्य
W = ∞∫rdW = ∞∫r –F.dx
निम्न समीकरण को हल करने पर
हम जानते है की विभव V = W/q
अतः P बिंदु पर विभव
V = W/q0
हमने O बिंदु पर धनात्मक q आवेश की कल्पना की है अतः विद्युत विभव भी धनात्मक है यदि यह आवेश ऋणात्मक होता तो विद्युत विभव का मान भी ऋणात्मक होता।
सूत्रानुसार विभव का मान दूरी(r) के व्युत्क्रमानुपाती है अतः विद्युत विभव व विद्युत विभव के मध्य ग्राफ खींचने पर वह निम्नानुसार प्राप्त होता है
किसी बिन्दु पर बिंदु आवेश के कारण विद्युत विभव (electric
potential at a point due to a point charge derivation) : वैद्युत विभव की परिभाषा के अनुसार किसी बिंदु पर विद्युत विभव ज्ञात करने के लिए एकांक धनावेश को अनंत से उस बिंदु तक लाने में किया गया कार्य ज्ञात करना होगा।
माना एक बिंदु आवेश +q बिन्दु O पर रखा है और इससे r दूरी पर स्थित बिंदु P पर विद्युत विभव ज्ञात करना है। इसके लिए एकांक धनावेश को अनंत से P बिंदु तक लाने में किया गया कार्य ज्ञात करना होगा तथा यह कार्य ज्ञात करने के लिए बिंदु P के आगे OP दिशा में ही एक अन्य बिंदु A चुन लेते है जिसकी O बिंदु से दूरी x है। इस बिंदु A पर धन परिक्षण आवेश +q0 पर लगने वाला विद्युत बल –
F = q.q0/4πε0.x2
इस बल के विरुद्ध परिक्षण आवेश को dx विस्थापन देने में किया गया कार्य –
dW = F.dx
dW = F.dx.cos180
dW = F.dx.(-1)
या
dW = -F.dx
अत: +q आवेश को अनंत से P बिंदु तक लाने में कृत कार्य –
W = ∞∫rdW = ∞∫r-F.dx
मान रख पर हल करने पर –
W = q.q0/4πε0 [1/r – 1/∞]
चूँकि 1/∞ = 0
W = q.q0/4πε0.r
अत: P बिंदु पर विद्युत विभव –
V = W/q0
V = q/4πε0.r
यदि आवेश q धनात्मक है तो उसके कारण धनात्मक विभव उत्पन्न होगा तथा ऋणात्मक आवेश के कारण ऋणात्मक विभव उत्पन्न होगा।
V ∝ 1/r
बिंदु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्र –
E = q/4πε0.r2
E ∝ 1/r2
आवेशों के निकाय के कारण विद्युत विभव potential due to group of electric charges
potential due to group of electric charges in hindi आवेशों के निकाय के कारण विद्युत विभव : हमने पिछले अध्याय में अध्ययन किया था की आवेशों के निकाय के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता सभी आवेशों के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र के सदिश योग के बराबर होता है अर्थात हमने सभी आवेशों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र की तीव्रता अलग अलग ज्ञात किया था और सभी का सदिश योग किया था। हमने यहाँ सदिश योग इसलिए किया था क्योंकि विद्युत क्षेत्र की तीव्रता एक सदिश राशि है।
लेकिन विद्युत विभव अदिश राशि है अतः किसी बिंदु पर विद्युत विभव का मान सभी आवेशों के कारण अलग अलग उत्पन्न विद्युत विभव के अदिश योग के बराबर होता है।
अर्थात मान लीजिये किसी बिंदु पर आवेशों के निकाय के कारण विद्युत विभव ज्ञात करना है तो उस बिंदु पर सभी आवेशों के कारण अलग अलग विभव का मान ज्ञात करेंगे और उसके बाद सभी का अदिश योग करने से उस बिंदु पर सभी आवेशों के निकाय के कारण विद्युत विभव का मान प्राप्त होता है।
चित्रानुसार n आवेशों का निकाय (समूह) है , आवेशों के द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र में एक बिंदु P है , P बिंदु पर हमें इन n आवेशों के कारण विद्युत विभव का मान ज्ञात करना है , P से आवेशों q1 ,
q2 , q3 …qn के मध्य की दुरी क्रमशः r1 ,
r2 , r3 ….rn है।
तो P बिंदु पर अलग अलग आवेशों के कारण उत्पन्न विद्युत विभव का मान सभी आवेशों के कारण उत्पन्न विभव के बीजगणितीय योग के बराबर होगा।
कुल विभव (V) = V1 + V2 + V3 …. +Vn
विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत विभव electric potential due to electric dipole
electric potential due to electric dipole in hindi विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत विभव : परिमाण में समान किन्तु प्रकृति में विपरीत जब दो आवेश अल्प दूरी पर रखे हो तो ऐसे समूह को विद्युत द्विध्रुव कहते है।
पिछले अध्याय में हम विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कर चुके है , अब हम विद्युत द्विध्रुव के कारण विद्युत विभव का मान ज्ञात करेंगे और सूत्र की स्थापित करेंगे की द्विध्रुव के कारण किसी बिंदु पर उत्पन्न विभव का मान कितना होता है।
माना आवेश -q तथा +q अल्प दुरी पर रखे हुए है , इस द्विध्रुव युग्म को AB से चित्र में प्रदर्शित किया गया है तथा दोनों आवेशों के मध्य की अल्प दूरी को 2r माना गया है।
हमें इस द्विध्रुव युग्म के कारण बिन्दु P पर विद्युत विभव का मान ज्ञात करना है।
द्विध्रुव के मध्य बिंदु अर्थात केंद्र बिंदु को O से दर्शाया गया है , द्विध्रुव अक्ष से OP θ कोण बना रहा है।
माना OP की दूरी r , AP की दूरी r1 तथा BP के मध्य की दूरी r2 है।
P बिंदु पर A बिन्दु पर स्थित -q आवेश के कारण उत्पन्न विद्युत विभव का मान
ठीक इसी प्रकार B बिन्दु पर स्थित +q आवेश के कारण P बिंदु पर उत्पन्न विद्युत विभव का मान
अतः P बिंदु पर +q तथा -q आवेश के कारण उत्पन्न कुल विभव का मान
V = V1 + V2
यहाँ r1 – r2 तथा r1 r2 अज्ञात राशि है , इन दोनों का मान ज्ञात करने के लिए A तथा B बिंदु से OP रेखा पर लम्ब डालते है जिससे हमें AC व BD प्राप्त होते है।
OP = OD + DP
यदि PB तथा PD लगभग बराबर है तो
OP = a.COSθ + r2
OP = r
अतः
r2 = r – a.COSθ
CP = OP + OC
यदि AP व CP लगभग बराबर है तो
r1 = r + a.COSθ
दोनों समीकरणों को आपस में घटाने पर
r1 – r2 = 2a.COSθ
दोनों समीकरणों को आपस में गुणा करने पर
r1r2 =
r2 – a2cos2θ
यदि r >> a तो r2 >>>
a2
अतः r2 की तुलना में a2cos2θ को नगण्य मानकर छोड़ने पर
r1r2 =
r2
अतः
चूँकि 2aq = p (द्विध्रुव आघूर्ण )
मान रखने पर सूत्र निम्न प्रकार प्राप्त होता है
प्राप्त सूत्र से यह स्पष्ट है की एक आवेश के कारण r दूरी पर उत्पन्न विद्युत विभव 1/r के समानुपाती होता है लेकिन द्विध्रुव आघूर्ण के कारण उत्पन्न विद्युत विभव 1/r2के समानुपाती होता है।
1. यदि θ=0 अर्थात P
बिंदु अक्ष (AB) पर स्थित है तो cos0 = 1
अतः
2. यदि θ=90 अर्थात P बिंदु निरक्ष पर स्थित है तो cos90 = 0 अर्थात V =0
अर्थात निरक्ष पर द्विध्रुव के कारण विभव का मान शून्य होता है।
नोट : द्विध्रुव के कारण विभव का मान सिर्फ दूरी पर ही निर्भर नहीं करता , वह द्विध्रुव के मध्य कोण पर भी निर्भर करता है।
समविभव पृष्ठ
की
परिभाषा क्या
है
, equipotential surface in hindi गुणधर्म , उदाहरण , सम विभव सतह
equipotential
surface in hindi समविभव पृष्ठ की परिभाषा क्या है , गुणधर्म , उदाहरण सम विभव सतह : किसी विद्युत क्षेत्र (E)
में रखा ऐसा पृष्ठ जिसके सभी बिंदुओं पर विद्युत विभव (V)
का मान एक समान हो , उस पृष्ठ को समविभव पृष्ठ कहते है।
चूँकि समविभव पृष्ठ के सभी बिन्दुओ पर विभव का मान समान होता है अतः दो बिंदुओं में मध्य विभवान्तर का मान शून्य होता है।
विभवांतर का मान शून्य है अर्थात सभी जगह विभव का मान समान है अतः आवेश को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कोई कार्य नहीं करना पड़ेगा अर्थात किया गया कार्य का मान शून्य होगा।
चूँकि किया गया कार्य शून्य है इसका अभिप्राय यह है की E (विद्युत क्षेत्र ) तथा विस्थापन (dl) के मध्य 90 डिग्री का कोण है अर्थात एक दूसरे के लंबवत है , दूसरे शब्दों में कहे तो विद्युत क्षेत्र की दिशा पृष्ठ के लंबवत होगी।
समविभव पृष्ठ के गुणधर्म (properties of equipotential surface)
1. हमने विभवांतर में पढ़ा था की विभवान्तर उस कार्य के बराबर होता है जो एक बिंदु से दूसरी बिंदु अर्थात निम्न विभव बिंदु से उच्च विभव बिंदु तक लाने में करना पड़ता है।
VAB =
WAB = VA –
VB
A पर विभव VA तथा B पर विभव VB तो विभवान्तर
चूँकि हमने समविभव की परिभाषा में पढ़ा की इस पृष्ठ पर सभी बिंदुओं पर विभव का मान समान होता है अर्थात
VA =
VB
अतः कृत कार्य
WAB =
0
अर्थात समविभव पृष्ठ पर स्थित किसी बिन्दु से अन्य बिंदु तक ले जाने में कोई कार्य नहीं करना पड़ता।
2. हम जानते है की किसी एकांक धन आवेश को dl दूरी तक विस्थापित करने में किया गया कार्य निम्न सूत्र द्वारा दिया जाता है।
dW = E.dlCosθ
चूँकि ऊपर हमने देखा की समविभव पृष्ठ पर एक जगह से दूसरी जगह जाने में (विस्थापन) कोई कार्य नहीं करना पड़ता अर्थात कृत कार्य शून्य होता है
अतः
dW = E.dlCosθ = 0
यहां E तथा dl तो शून्य संभव नहीं है
अतः Cosθ = 0
θ = 90
अर्थात समविभव पृष्ठ में E (विद्युत क्षेत्र ) तथा dl (विस्थापन ) के मध्य 90 डिग्री का कोण बनता है अर्थात विद्युत क्षेत्र समविभव पृष्ठ के लंबवत होता है।
समविभव पृष्ठ के उदाहरण (examples of equipotential surface ):
1. माना किसी विलगित आवेश के +q के कारण r दूरी पर विद्युत विभव का मान
यदि इस +q आवेश के चारो ओर r त्रिज्या का गोलीय पृष्ठ बनाया जाए तो इस गोलीय पृष्ठ के सभी बिंदुओं पर विभव का मान समान होगा अर्थात समविभव पृष्ठ गोलीय आकार का हो सकता है जिसका केंद्र +q आवेश होगा।
2. यदि x दिशा में विद्युत क्षेत्र E है तो x के लंबवत रखा समतल पृष्ठ समविभव पृष्ठ होता है।
3. चित्रानुसार समविभव पृष्ठ समान प्रकृति व परिमाण के आवेश युग्म मिलकर बनाते है।
समविभव पृष्ठ
(equipotential surface) : ऐसा पृष्ठ जिसके प्रत्येक बिंदु पर विद्युत विभव समान होता है उस पृष्ठ को सम विभव पृष्ठ कहते है।
समविभव पृष्ठ की विशेषताएँ निम्न है
विभवान्तर की परिभाषा के अनुसार किन्ही दो बिन्दुओ के बीच विभवान्तर उस कार्य के बराबर होता है जो एकांक धन आवेश को निम्न विभव बिंदु से उच्च विभव के बिंदु तक ले जाने में करना पड़ता है।
अर्थात A और B बिन्दुओं के मध्य विभवान्तर –
VB – VA = WAB
यदि A तथा B दोनों बिंदु एक समविभव पृष्ठ पर स्थित है अत: VB = VA
WAB = VB = VA = 0
अर्थात सम विभव पृष्ठ पर किन्ही दो बिन्दुओ के मध्य परिक्षण आवेश को एक बिंदु से दुसरे बिंदु तक ले जाने में कोई कार्य नहीं किया जाता है।
एकांक धन आवेश को किसी सम विभव पृष्ठ पर एक सूक्ष्म विस्थापन dl देने में किया गया कार्य –
dW = E.dl = E.dl.cosθ = 0
cosθ = 0 अत: θ = 90 अर्थात E ⊥ dl
इससे स्पष्ट है कि विद्युत क्षेत्र सदैव समविभव पृष्ठ के लम्बवत होता है।
एक बिंदु आवेश के कारण इससे r दूरी पर उत्पन्न विभव –
V = q/4πε0r . . . . समीकरण-1
स्पष्ट है कि यदि r का मान नियत हो जाए तो V का मान भी नियत हो जायेगा।
समविभव पृष्ठ की कुछ महत्वपूर्ण आकृतियाँ
यदि समीकरण-1 से एक विलगित बिंदु आवेश को केंद्र मानकर समकेन्द्रीय गोलीय पृष्ठ खींचे जाए तो प्रत्येक गोलीय पृष्ठ सम विभव पृष्ठ होगा।
एक वैद्युत द्विध्रुव के कारण समविभव और समान प्रकृति और परिमाण के आवेश युग्म के कारण समविभव पृष्ठ में प्रदर्शित है।
समविभव पृष्ठ : किसी दिए गए आवेश वितरण के लिए समान विभव वाले बिन्दुओं का बिन्दुवत “समविभव पृष्ठ” कहलाता है।
महत्वपूर्ण बिन्दु :
§ सम विभव पृष्ठ कभी भी एक दुसरे को नहीं काटते है , अन्यथा एक ही स्थान पर विभव के दो मान हो जायेंगे , जो संभव नहीं है।
§ समविभव पृष्ठ हमेशा बल रेखाओ के लम्बवत होते है।
§ यदि समविभव पृष्ठ के अनुदिश किसी आवेश को एक बिंदु से दुसरे बिंदु तक विस्थापित किया जाए तो किया गया कार्य शून्य होता है। WAB =
-UAB = q(VB – VA) =
0 [चूँकि VB =
VA]
समविभव पृष्ठ : यदि सम्पूर्ण पृष्ठ पर विभव एक समान है तो ऐसे पृष्ठ को समविभव कहते है।
सम विभव के गुण :
§ जब समविभव पृष्ठ पर किसी आवेश को एक बिंदु से दुसरे बिन्दु तक विस्थापित किया जाता है तो स्थिर वैद्युत बल के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
§ विद्युत क्षेत्र समविभव पृष्ठ के लम्बवत होता है।
§ दो समविभव पृष्ठ कभी भी एक दुसरे को नहीं काटते है।
समविभव पृष्ठ के उदाहरण
1. बिंदु आवेश : गोलीय और संकेन्द्रीय समविभव पृष्ठ दिखाया गया है। चित्रानुसार हम देख सकते है कि R1 त्रिज्या के गोले के पूरे पृष्ठ पर विभव V1 है और इसी प्रकार अन्य संकेन्द्रीय गोले के लिए भी विभव समान है।
2. रैखिय आवेश : रेखीय आवेश के लिए समविभव पृष्ठ अलग अलग त्रिज्याओ के समाक्षीय बेलन होते है।
3. एक समान रूप से आवेशित बड़ी चालक / कुचालक पट्टिका : सम विभव पृष्ठ सामानांतर तल होते है।
विद्युत क्षेत्र एवं
विद्युत विभव
में
सम्बन्ध electric field & electric potential relation
relation between electric field and electric potential in
hindi विद्युत क्षेत्र एवं विद्युत विभव में सम्बन्ध : विद्युत क्षेत्र से विद्युत विभव के सूत्र स्थापन में हमने एक सम्बन्ध स्थापित किया था और इस संबंध के अनुसार दो बिंदुओं के मध्य विभवांतर तथा विद्युत क्षेत्र की तीव्रता निम्न प्रकार से सम्बन्धित है।
VB –
VA = –A∫B E.dl
यहाँ VB B बिंदु पर विभव
VA A बिंदु पर विभव
VB –
VA = दोनों बिंदुओं के मध्य विभव में अंतर (विभवान्तर )
E = विद्युत क्षेत्र की तीव्रता
dl = अल्पांश dl विस्थापन
यहाँ हम विद्युत क्षेत्र तथा विद्युत विभव में सम्बन्ध स्थापित करेंगे।
विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E) में अल्प विस्थापन dl के लिए निम्न प्रकार लिखा जा सकता है।
VB –
VA = –A∫B E.dl
अवकलन लेने पर
(VB –
VA) = – E.dl
बिंदु VA को अनंत पर मानने पर VA = 0 व्यापक रूप
d(V) = -Edl
dV = -Edl COSθ
यहाँ θ , E व dl के मध्य कोण
यहाँ -dV/dl दूरी के साथ विभव में कमी को दर्शाता है अर्थात यह दर्शाता है की दूरी बढ़ने पर विभव कम होता जाता है।
जब E व dl के मध्य कोण का मान शून्य होगा तब विभव में दुरी के साथ कमी अधिकतम होती है।
सामान्यतया dV/dl एक अदिश राशि होती है लेकिन θ = 0 पर dV/dl विभव में अधिकतम कमी को सदिश माना जा सकता है इसकी दिशा E की दिशा में होती है , इसे विभव प्रवणता कहते है , इसे grad V से प्रदर्शित किया जाता है।
चूँकि
-dV/dl = E
अतः
E = -Grad V
समविभव पृष्ठ के लिए विभव प्रवणता की दिशा पृष्ठ के लंबवत होती है।
माना चित्रानुसार दो समविभव पृष्ठ दिए गए है एक पृष्ठ के विभव का मान V तथा दूसरे पर विभव V-dV है।
चूँकि B तथा C बिंदु पर विभव का मान समान है अतः A बिन्दु से B व C के लिए विभव में कमी या हानि का मान समान dV होगा।
लेकिन AB व AC की दूरी भिन्न भिन्न है अतः विभव में दूरी के साथ परिवर्तन की दर भी अलग अलग dV/AB व dV/AC होगी।
क्योंकि दूरी AC का मान AB से अधिक है अर्थात AB < AC है अतः dV/AB > dV/AC
यहाँ विभव में हानि की दर पृष्ठ के अभिलम्ब दिशा में अधिकतम होगा।
यहां हम l को एक अक्ष मानकर समीकरण ज्ञात कर रहे है।
El = E COSθ , dl की दिशा में E
यदि अक्ष x , y , z अक्षो में है तो
चूँकि
अतः
अतः
E = ∇ V
यहाँ इसे ∇ को डेल संकारक (del operator) कहते है।
यदि यहां विभव को गोलीय पृष्ठ के लिए अर्थात त्रिज्या r के रूप में लिखने पर
Er = -dV/dr
आवेशित गोलीय
कोश
के
कारण
विद्युत विभव
electric potential spherical shell
विद्युत विभव का परिकलन (calculation of electric
potential ) : अब हम विभिन्न प्रकार के पृष्ठो अर्थात आकृतियों के लिए विद्युत विभव के लिए परिकलन करेंगे।
सबसे पहले गोलीय कोश के लिए ज्ञात करेंगे , फिर आवेशित चालक गोले व अचालक गोले का अध्ययन करेंगे और इन सब पृष्ठो के कारण किसी बिंदु पर विभव का मान ज्ञात करेंगे और सूत्र स्थापित करेंगे।
आवेशित गोलीय कोश के कारण विद्युत विभव (electric potential due to charged spherical shell )
इस स्थिति में हम एक गोलीय कोश पर अध्ययन करेंगे जो आवेशित किया गया है।
माना एक R त्रिज्या का गोलीय कोश है , इस गोलीय कोश पर q आवेश विधमान है अर्थात यह गोलीय कोश q आवेश से आवेशित है।
अब हम r दूरी पर एक बिंदु P की परिकल्पना करते है और P बिन्दु पर विभव का मान ज्ञात कर सकते है , यहाँ ध्यान देने वाली यह बात है की P बिंदु की तीन स्थितियां संभव है।
1. जब P बिंदु गोलीय कोश के बाहर स्थित हो अर्थात r > R
2. जब P बिंदु गोलीय कोश के पृष्ठ पर स्थित हो अर्थात r = R
3. जब P बिंदु गोलीय कोश के अंदर स्थित हो अर्थात r < R
अब हम तीनो स्थितियों को अध्ययन करेंगे
1. जब P बिंदु गोलीय कोश के बाहर स्थित हो अर्थात r > R
जब बिंदु गोलीय कोश के बाहर (r > R ) स्थित है अर्थात हमें विभव का मान कोश के बाहर स्थित किसी बिन्दु P पर ज्ञात करना है।
हम विद्युत विभव की परिभाषा में पढ़ चुके है
V = – ∞∫rE.dr
हम यह भी पढ़ चुके है की गोले के बाहर स्थित बिंदु P
पर विद्युत क्षेत्र
E का मान सूत्र में रखने पर
सूत्र से यह बात हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की गोलीय कोश के बाहर स्थित बिंदु पर विभव का मान दुरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
2. जब P बिंदु गोलीय कोश के पृष्ठ पर स्थित हो अर्थात r = R
अब हम बात करते है जब P बिंदु गोलीय कोश के पृष्ठ पर स्थित है , इस स्थिति में r = R होता है।
हम जानते है की
V
= – ∞∫RE.dr
हमने ज्ञात किया है
इस स्थिति में r = R है अतः r के स्थान पर R रखने पर हमें पृष्ठ पर विद्युत विभव का मान प्राप्त होता है
3. जब P बिंदु गोलीय कोश के अंदर स्थित हो अर्थात r
< R
जब P बिंदु गोलीय कोश के अंदर स्थित हो अर्थात इस दशा में r
< R होगा , इस स्थिति में विभव का मान ज्ञात करते है
हम जानते है की
V
= – ∞∫rE.dr
यहाँ इसे दो भागों में हल करते है
a . अनंत दूरी से पृष्ठ (R) तक
b . R (पृष्ठ) से P बिंदु तक अर्थात r दुरी तक
V
= – ∞∫RE.dr + (– R∫rE.dr)
चूँकि कोश के भीतर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E) का मान शून्य हो जाता है अतः दूसरा भाग शून्य हो जाता है।
अतः P बिंदु पर विभव का मान सिर्फ पहले भाग के कारण ही होगा।
अतः कोश के अंदर विद्युत विभव
सूत्रों का अध्ययन करने से हम पाते है की पृष्ठ के भीतर स्थित किसी बिंदु पर विद्युत विभव का मान पृष्ठ पर विभव के मान के बराबर होता है तथा पृष्ठ के बाहर यह r (दूरी) के व्युत्क्रमानुपाती होता है अतः पृष्ठ व अंदर विभव का मान अधिकतम होता है।
आवेशित गोलीय कोश द्वारा उत्पन्न विभव व केंद्र से बिंदु P की दुरी के मध्य ग्राफ (graph) खींचने पर वह निम्नानुसार प्राप्त होता है।
आवेशित अचालक
गोले
के
कारण
विद्युत विभव
potential non conducting sphere
(electrical potential due to charged non conducting sphere ) आवेशित अचालक गोले के कारण विद्युत विभव : हम यह पढ़ चुके है की जब अचालक गोले को आवेशित किया जाता है अर्थात आवेश दिया जाता है तो वह वही ठहरा रहता है जहाँ इसे दिया जाता है अर्थात पृष्ठ पर या अन्य जगह पर विस्थापित नहीं होता क्योंकि अचालक में आवेश गति नहीं कर पाते है।
हम मान रहे है की अचालक को आवेशित करने पर आवेश उसके अंदर चित्रानुसार स्थित है अब इस आवेशित अचालक गोले के कारण हम विद्युत विभव का मान ज्ञात करेंगे।
हम गोले के केंद्र O से r दुरी पर एक बिंदु P पर विद्युत विभव ज्ञात करेंगे , इस बिन्दु P की तीन स्थितियां संभव है।
1. जब P बिंदु अचालक गोले के बाहर स्थित हो (r > R )
जब P बिंदु अचालक गोले से r दुरी पर स्थित है अर्थात गोले के बाहर स्थित है तो इस दशा में r > R होगा।
हम विभव की परिभाषा से जानते है की
V = – ∞∫rE.dr
हम आवेशित अचालक गोले के कारण बाहर स्थित बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कर चुके है।
विद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E) का मान रखने पर
हल करने पर
सूत्र से हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की अचालक गोले के बाहर स्थित बिन्दु पर विभव 1/r के समानुपाती होता है।
2. जब P बिन्दु अचालक गोले की सतह पर स्थित हो (R = r )
इस स्थिति में r का मान R (गोले की त्रिज्या) के बराबर होगा
हमने अभी ज्ञात किया था
इस सूत्र में r के स्थान पर R रखने पर हमें पृष्ठ पर विद्युत विभव का मान प्राप्त होता है
अतः
3. जब P बिंदु अचालक गोले के अन्दर स्थित हो अर्थात r < R
जब P बिन्दु अचालक गोले के भीतर होगा तो इसके कारण उत्पन्न विभव को दो भागो में विभक्त कर सकते है
अ. अनंत से पृष्ठ तक
ब. पृष्ठ से बिंदु P तक
अ. अनंत से पृष्ठ तक
V
= – ∞∫RE.dr
हम ज्ञात कर चुके है यह निम्न प्राप्त होगा
ब. पृष्ठ से बिंदु P
तक
पृष्ठ से P बिंदु तक विभव
पृष्ठ के अंदर स्थित बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता
V
= – R∫rE.dr
निम्न समीकरण में E का मान रखकर हल करने पर
आवेशित अचालक गोले के अन्दर कुल विभव
प्राप्त सूत्रों से यह बात स्पष्ट है की आवेशित अचालक गोले के केंद्र से सतह तक विद्युत विभव r2 से घटता है तथा गोले के बाहर r-1 से घटता हुआ अनंत तक शून्य हो जाता है।
तथा गोले के केंद्र पर विभव पृष्ठ की तुलना में 1.5 गुना होता है।
अतः दूरी r व विभव V के मध्य ग्राफ खींचने पर वह निम्न प्रकार प्राप्त होता है।
आवेशित चालक
गोले
के
कारण
विद्युत विभव
electric potential charged conducting sphere
electric potential due to charged conducting sphere in
hindi आवेशित चालक गोले के कारण विद्युत विभव : गोलीय चालक गोले को आवेश देने पर सम्पूर्ण आवेश गोले के पृष्ठ पर ही रहता है अर्थात यह एक गोलीय कोश की भांति व्यवहार करता है , हमने ज्ञात किया है कि गोलीय कोश व चालक गोले के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मान समान रहता है इसलिए आवेशित चालक गोले के कारण विद्युत विभव का मान भी गोलीय कोश के समान ही होगा जो हम ज्ञात कर चुके है।
क्या आप जानते है की जब एक चालक को आवेशित किया जाता है या आवेश दिया जाता है तो वह सम्पूर्ण आवेश चालक गोले के पृष्ठ पर क्यों आ जाता है ?
हम बताते है , जब एक चालक गोले को आवेश दिया जाता है तो समान प्रकृति का आवेश होने के कारण प्रत्येक आवेश अन्य आवेशों के कारण प्रतिकर्षण महसूस करता है और ऐसा हर आवेश के साथ होता है , इस प्रतिकर्षण बल के कारण आवेश एक दूसरे से दूर जाने का प्रयत्न करते है।
हम यह भी जानते है कि चालक में आवेश आसानी से गति कर पाते है अतः आवेश प्रतिकर्षण बल के कारण चालक में गति करते है और परिणाम स्वरूप एक दूसरे से जितना दूर संभव होता है जाने की कोशिश करते है लेकिन आवेश पृष्ठ से बाहर नहीं जा सकते अतः ये सभी आवेश पृष्ठ पर आकर रुक जाते है।
इस प्रकार किसी चालक को चाहे कही पर भी आवेश दिया जाए वह संपूर्ण आवेश चालक गोले के पृष्ठ पर वितरित हो जाता है और चूँकि आवेश पृष्ठ पर उपस्थित है अतः यह चालक गोला , आवेशित गोलीय कोश की तरह व्यवहार करता है और इसके कारण उत्पन्न विद्युत विभव चाहे वह बाहर किसी बिंदु पर हो , पृष्ठ पर हो या गोले के अंदर स्थित हो उसी के समान होगा जो हमने गोलीय कोश के लिए ज्ञात किया है।
गोले के बाहर r दुरी पर स्थित बिंदु पर विभव का मान
गोले के भीतर स्थित किसी बिंदु पर विभव
V = 0
गोले के पृष्ठ पर विद्युत विभव R = r
गोलीय चालक के लिए r दुरी तथा विभव व विद्युत क्षेत्र में ग्राफ
आवेशों के
निकाय
की
स्थितिज ऊर्जा
potential energy of a system of charges in hindi
potential energy of a system of charges in hindi आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा : जब दो या दो से अधिक आवेशों को अनंत से लाकर एक दूसरे के समीप व्यवस्थित करके या रखकर एक निकाय बनाया जाता है , इस निकाय को बनाने के लिए एक कार्य करना पड़ता है और यह किया गया कार्य इस निकाय में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है , इस संचित ऊर्जा को निकाय की स्थितिज ऊर्जा कहते है। इसको U से व्यक्त किया जाता है।
परिभाषा : दो या दो से अधिक आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा उस कार्य के तुल्य होती है जो इन आवेशों को अनन्त से लाकर एक निकाय की रचना करने में करना पड़ता है।
1. दो आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा (potential energy of 2 charges )
इसमें हम दो आवेशों पर अध्ययन करेंगे , इन दोनों आवेशों को अनंत से लाकर एक निकाय की रचना करके इसकी स्थितिज ऊर्जा ज्ञात करेंगे।
माना दो आवेश है q1 तथा q2 , दोनों आवेश r दूरी पर रखे है , दोनों आवेशों की स्थिति क्रमशः A व B है अर्थात बिंदु A व B पर रखे है।
q1 आवेश के कारण B पर उत्पन्न विद्युत विभव का मान
हम यह भी जानते है की किसी बिंदु पर विद्युत विभव का मान उस कार्य के तुल्य होता है जो एकांक धनावेश को अनंत से उस बिन्दु तक लाने में किया जाता है।
q2 आवेश को अनन्त से बिन्दु B तक लाने में किया गया कार्य या दूसरे शब्दों में कहे तो q1 तथा q2 दोनों आवेशों द्वारा रचित इस निकाय की विद्युत ऊर्जा
U = W = V1 q2
यहाँ V1 का मान रखने पर
स्थितिज ऊर्जा = U
इससे हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते है की जब हमने दोनों आवेश धनात्मक लिए है तो स्थितिज ऊर्जा का मान धनात्मक प्राप्त होता है , लेकिन यदि एक आवेश ऋणात्मक लिया जाए तो स्थितिज ऊर्जा का मान ऋणात्मक प्राप्त होता है।
इसलिए स्थितिज ऊर्जा का मान निकालते समय आवेश को उसकी प्रकृति के साथ रखना चाहिए।
2. दो से अधिक आवेशों के निकाय की विद्युत स्थितिज ऊर्जा (potential energy of more
than two charges)
अभी तक हमने सिर्फ दो आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा की गणना की है , अब हम n आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा (U) की गणना करेंगे जो उस कार्य के बराबर होती है जो n आवेशों को उनकी स्थिति तक लाने में करना पड़ता है।
n आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा ज्ञात करने के लिए हम दो – दो आवेशों से बने सभी संभव युग्मों (जोड़ो) की विद्युत स्थितिज ऊर्जा का मान ज्ञात करेंगे और फिर सभी ऊर्जाओं का चिन्ह के साथ बीजगणितीय योग करते है जिससे हमें पूरे निकाय की वैद्युत स्थितिज ऊर्जा प्राप्त होती है।
चित्रानुसार हमारे पास तीन आवेश q1 , q2 , q3 , P1 , P2 , P3 स्थितियों पर रखे है , हमें इस तीन आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा की गणना करनी है।
प्रथम आवेश q1 को P1(r1) स्थिति तक लाने में कोई कार्य नहीं करना पड़ता क्योंकि क्षेत्र में अन्य कोई आवेश उपस्थित नहीं है जिसके विपरीत कार्य करना पड़े अर्थात इसका विरोध करने वाला कोई अन्य आवेश नहीं है अतः किया गया कार्य शून्य होगा।
W1 = 0
जब आवेश q2 को क्षेत्र की स्थिति P2(r2) पर q1 से r12 दूरी पर लाया जाता है तो किया गया कार्य
W2 = (q1 के कारण विभव ) x q2
q3 आवेश को क्षेत्र की स्थिति P3(r3) पर लाने में किया गया कार्य
W3 = (q1 व q2 के कारण विभव ) x q3
अतः आवेशों q1 , q2 , q3 के निकाय की कुल स्थितिज ऊर्जा
U = W1 + W2 + W3
यदि इसी प्रकार चार आवेश लिए जाए तो यह निम्न प्रकार प्राप्त होता है
U = W1 + W2 + W3 + W4
विद्युत क्षेत्र में
द्विध्रुव के
घूर्णन में
कार्य
व स्थितिज ऊर्जा work in rotation of electric
dipole in electric field
(work in rotation of electric dipole in electric field ) विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव के घूर्णन में कार्य : जब किसी द्विध्रुव को एक समान विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो इस द्विध्रुव पर एक बलयुग्म कार्य करता है , यह बल युग्म द्विध्रुव को विधुत क्षेत्र की दिशा में लाने का प्रयास करता है और अन्तत: द्विध्रुव , क्षेत्र की दिशा में संरेखित हो जाता है और साम्यावस्था को प्राप्त कर लेता है।
द्विध्रुव को एक समान क्षेत्र में साम्यावस्था से घुमाने में एक कार्य करना पड़ता है।
मान लेते है की द्विध्रुव पर θ कोण पर बल आघूर्ण का मान pEsinθ है।
अब यदि विद्युत द्विध्रुव को dθ कोण घुमाया जाता है तो किया गया कार्य
dW = बलाघूर्ण x कोणीय विस्थापन
dW = pEsinθ x dθ
θ = θ1 से θ = θ2 तक घुमाने में किया गया कार्य
बाह्य क्षेत्र में किसी विद्युत द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा (potential energy of an electric dipole in electric
field )
विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा उस कार्य के तुल्य होती है जो उस द्विध्रुव को अनंत से उस क्षेत्र में लाने में करना पड़ता है।
क्षेत्र के कारण +q पर बल qE क्षेत्र की दिशा में लगता है तथा -q आवेश के कारण बल -qE विद्युत क्षेत्र की विपरीत दिशा में लगता है।
अतः हम कह सकते है की +q पर बाह्य कार्य करना पड़ता है जबकि -q पर क्षेत्र द्वारा कार्य किया जाता है , चूँकि -q आवेश +q आवेश से 2a अधिक दुरी पर स्थित है अतः अनन्त से इसकी स्थिति पर लाने में -q पर अधिक कार्य करना पड़ता है।
अतः -q पर कृत कार्य
W = -qE x 2a = -2qaE
W = -pE
यहाँ p = द्विध्रुव
E (विद्युत क्षेत्र ) के सामानांतर रखे विद्युत द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा
U1 = -pE
E के सामानांतर स्थिति से θ कोण घुमाने में कृत कार्य
U2 = pE (1 – COSθ)
अतः θ कोण पर द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा
U = U1 + U2
U
= -pE + pE (1 – COSθ)
U
= -pECOSθ













































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