10th class Social Science Geography notes in hindi medium

अध्याय - 1

संसाधन एवं विकास

संसाधन :-हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है जो आर्थिक रूप से संभावय और सांस्कृतिक रूप से मान्य है संसाधन कहलाती है

संसाधन के प्रकार :-  संसाधन को विभिन्न आधारों पर विभिन्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है ; जो नीचे दिये गये हैं

उत्पत्ति के आधार पर :- जैव और अजैव संसाधन 

समाप्यता के आधार पर :- नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य संसाधन 

स्वामित्व के आधार पर :- व्यक्तिगत , सामुदायिक , राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन 

विकास के स्तर के आधार पर :- संभावी , विकसित भंडार और संचित कोष

उत्पत्ति के आधार पर संसाधन के प्रकार :-
जैव संसाधन :- वैसे संसाधन जैव संसाधन कहलाते हैं जो जैव मंडल से मिलते हैं उदाहरण : मनुष्य , वनस्पति , मछलियाँ , प्राणिजात , पशुधन , आदि  

अजैव संसाधन :- वैसे संसाधन अजैव संसाधन कहलाते है जो निर्जीव पदार्थों से मिलते हैं उदाहरण : मिट्टी , हवा , पानी , धातु , पत्थर , आदि

समाप्यता के आधार पर संसाधन के प्रकार :- 
नवीकरण योग्य संसाधन :- कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जिन्हें हम भौतिक , रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा नवीकृत या पुनः उत्पन्न कर सकते हैं ऐसे संसाधन को नवीकरण योग्य संसाधन कहते हैं उदाहरण : सौर ऊर्जा , पवन ऊर्जा , जल , जीव जंतु , आदि  
अनवीकरण योग्य संसाधन :- कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जिन्हें हम किसी भी तरीके से नवीकृत या पुन : उत्पन्न नहीं कर सकते हैं ऐसे संसाधन को अनीवकरण योग्य संसाधन कहते हैं उदाहरण : जीवाष्म ईंधन , धातु , आदि  

🔹 इन संसाधनों के निर्माण में लाखों वर्ष लग जाते हैं इसलिए इनका नवीकरण करना असंभव होता है इनमें से कुछ संसाधनों को पुन : चक्रीय किया जा सकता है , जैसे कि धातु कुछ ऐसे संसाधन भी होते हैं जिनका पुन : चक्रीकरण नहीं किया जा सकता है , जैसे कि ; जीवाष्म ईंधन

स्वामित्व के आधार पर संसाधनों के प्रकार :- 
व्यक्तिगत संसाधन :- वैसे संसाधन व्यकतिगत संसाधन कहलाते हैं जिनका स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास होता है उदाहरण : किसी किसान की जमीन , घर , आदि
सामुदायिक संसाधन :- वैसे संसाधन सामुदायिक संसाधन कहलाते हैं जिनका स्वामित्व समुदाय या समाज के पास होता है उदाहरण : चारागाह , तालाब , पार्क , श्मशान , कब्रिस्तान , आदि  
राष्ट्रीय संसाधन :- वैसे संसाधन राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं जिनका स्वामित्व राष्ट्र के पास होता है उदाहरण : सरकारी जमीन , सड़क , नहर , रेल , आदि

अंतर्राष्ट्रीय संसाधन :- वैसे संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं जिनका नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किया जाता है इसे समझने के लिये समुद्री क्षेत्र का उदाहरण लेते हैं किसी भी देश की तट रेखा से 200 किमी तक के समुद्री क्षेत्र पर ही उस देश का नियंत्रण होता है उसके आगे के समुद्री क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय संसाधन की श्रेणी में आता है  

विकास के स्तर के आधार पर संसाधन के प्रकार :-

संभावी संसाधन :- किसी भी देश या क्षेत्र में कुछ ऐसे संसाधन होते हैं जिनका उपयोग वर्तमान में नहीं हो रहा होता है इन्हें संभावी संसाधन कहते हैं उदाहरण : गुजरात और राजस्थान में उपलब्ध सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा  

विकसित संसाधन :- वैसे संसाधन विकसित संसाधन कहलाते जिनका सर्वेक्षण हो चुका है और जिनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित हो चुकी है  

भंडार :- कुछ ऐसे संसाधन होते हैं जो उपलब्ध तो हैं लेकिन उनके सही इस्तेमाल के लिये हमारे पास उचित टेक्नॉलोजी का अभाव है ऐसे संसाधन को भंडार कहते हैं उदाहरण : हाइड्रोजन ईंधन अभी हमारे पास हाईड्रोजन ईंधन के इस्तेमाल लिये उचित टेक्नॉलोजी नहीं है  

संचित कोष :- यह भंडार का हिस्सा होता है इसके उपयोग के लिये टेक्नॉलोजी तो मौजूद है लेकिन अभी उसका सही ढंग से इस्तेमाल नहीं हो रहा है उदाहरण : नदी के जल से पनबिजली परियोजना द्वारा बिजली निकाली जा सकती है लेकिन वर्तमान में इसका इस्तेमाल सीमित पैमाने पर ही हो रहा है

सतत पोषणीय विकास :- जब विकास होने के क्रम में पर्यावरण को नुकसान पहुँचे और भविष्य की जरूरतों की अनदेखी हो तो ऐसे विकास को सतत पोषणीय विकास कहते हैं

🔹  संसाधनों के सही इस्तेमाल और सतत पोषणीय विकास के मुद्दे पर 1992 में रियो डे जेनेरो में अर्थ समिट का आयोजन किया गया था इस सम्मेलन में एक सौ राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए थे वे सभी एजेंडा 21 पर सहमत हुए थे

🔹 इस एजेंडा का मुख्य मुद्दा था सतत पोषणीय विकास और संसाधन का सही इस्तेमाल इस एजेंडा मे समान हितों , पारस्परिक जरूरतों और सम्मिलित जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए विश्व सहयोग की बात की गई है ताकि पर्यावरण की क्षति , गरीबी और रोगों से मुकाबला किया जा सके
संसाधनों का विकास :-
🔹 मानव अस्तित्व के लिए संसाधन अत्यन्त महत्वपूर्ण है ऐसा विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है इसलिए मानव द्वारा इसका अंधाधुंध उपयोग किया गया जिसके फलस्वरूप निम्नलिखित मुख्य समस्याएँ पैदा हो गयी हैं
👉 कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास  
👉 समाज के कुछ ही लोगों के हाथों में संसाधनों का संचय , जिसमे समाज के दो हिस्सों संसाधन संपन्न अमीर तथा संसाधनहीन यानि गरीब के बीच संसाधनों का बँट जाना  
👉 संसाधनों के अंधाधुध शोषण ने वैश्विक पारिस्थितिकी संकट को पैदा किया है जैसे- भूमंडलीय तापन , ओजोन परत अवक्षय , पर्यावरण प्रदूषण और भूमि - निम्नीकरण आदि  
🔹 मानव जीवन की गुणवत्ता और वैश्विक शांति के लिए समाज में संसाधनों का न्यायसंगत बँटवारा आवश्यक हो गया है  
🔹 संसाधनों के सही उपयोग के लिए हमें सतत आर्थिक विकास करने की आवश्यकता है  
🔹 सतत आर्थिक विकास का तात्पर्य ऐसे विकास है जो पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की उपेक्षा ना करे
संसाधन नियोजन :-
🔹 संसाधन नियोजन के द्वारा हम संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल कर सकते हैं भारत में संसाधनों का वितरण समुचित नहीं है ऐसे में संसाधन नियोजन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कई राज्यों के पास प्रचुर मात्रा में खनिज तो अन्य संसाधनों का अभाव है झारखंड में खनिजों के प्रचुर भंडार हैं लेकिन वहाँ पेय जल और अन्य सुविधाओं का अभाव है मेघालय में जल की कोई कमी नहीं है लेकिन वहाँ अन्य संसाधनों का अभाव है इसलिए इन क्षेत्रों का सही विकास नहीं हो पाया है ऐसे में होने वाली समस्या को हम संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल से ही कम कर सकते हैं  
भारत में संसाधन नियोजन :-
🔹 संसाधनों की मदद से समुचित विकास करने के लिये यह जरूरी है कि योजना बनाते समय टेक्नॉलोजी , कौशल और संस्थागत बातों का ध्यान रखा जाये प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही भारत में संसाधन नियोजन एक प्रमुख लक्ष्य रहा है भारत में संसाधन नियोजन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं
👉 पूरे देश के विभिन्न प्रदेशों के संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना  
👉 उपयुक कौशल , टेक्नॉलोजी और संस्थागत ढाँचे का सही इस्तेमाल करते हुए नियोजन ढाँचा तैयार करना
👉 संसाधन नियोजन और विकास नियोजन के बीच सही तालमेल बैठाना  
संसाधनों का संरक्षण :-
🔹 संसाधनों के दोहन से कई सामाजिक और आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं गांधीजी का मानना था कि आधुनिक टेक्नॉलोजी की शोषणात्मक प्रवृत्ति ही पूरी दुनिया में संसाधनों के क्षय का मुख्य कारण है गांधीजी अत्यधिक उत्पादन के खिलाफ थे और उसकी जगह जनसमुदाय द्वारा उत्पादन की वकालत करते थे

🔹 पृथ्वी पर संसाधन सीमित मात्रा में ही हैं यदि उनके अंधाधुंध इस्तेमाल पर रोक नहीं लगती है तो भविष्य में मानव जाति के लिये कुछ भी नहीं बचेगा फिर हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि हम संसाधनों का संरक्षण करें
भू - संसाधन :-
🔹  भूमि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है  
🔹 प्राकृतिक वनस्पति , वन्य - जीवन , मानव जीवन , आर्थिक क्रियाएँ , परिवहन तथा संचार व्यवस्थाएं भूमि पर ही आधारित हैं 🔹 भूमि एक सीमित संसाधन हैं इसलिए हमें इसका उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से करना चाहिए  
भारत में भूमि - संसाधन :-
🔹 लगभग 43 प्रतिशत भू - क्षेत्र मैदान हैं जो कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक हैं  
🔹 लगभग 30 प्रतिशत भू - क्षेत्र पर विस्तृत रूप से पर्वत स्थित हैं जो बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं , पर्यटन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करता है और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है
🔹 लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा पठारी क्षेत्र है जिसमें खनिजों , जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष है
भारत में भू - उपयोग प्रारूप
🔹  भू - उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्व हैं 
👉 भौतिक कारक जैसे- भू - आकृति , जलवायु और मृदा के प्रकार
👉  मानवीय कारक में जैसे - जनसंख्या - घनत्व , प्रौद्योगिक क्षमता , संस्कृति और परम्पराएँ इत्यादि शामिल हैं  
🔹 भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी . है , परन्तु इसके 93 प्रतिशत भाग के ही भू - उपयोग आंकड़ें उपलब्ध हैं क्योंकि पूर्वात्तर प्रान्तों असम को छोड़कर अन्य प्रान्तों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हैं
👉  इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का सर्वेक्षण भी नहीं हुआ है
भूमि - निम्नीकरण और संरक्षण उपाय :-
🔹 कुछ मानव क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन , अतिपशुचारण , खनन ने भूमि के निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है
👉 भूमि निम्नीकरण को रोकने के उपाय
🔹 वनारोपण 
🔹 चारागाहों का समुचित प्रबंधन
🔹 काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर रेतीले टीलों स्थिर बनाना
🔹 बंजर भूमि का उचित प्रबंधन
🔹 सिंचाई का समुचित प्रबंधन 
🔹 फसलों की सही तरीके से कटाई 
🔹 खनन प्रक्रिया पर नियंत्रण 
🔹 खनन के बाद भूमि का समुचित प्रबंधन 
🔹औद्योगिक जल के परिष्करण के बाद जल का विसर्जन
🔹 सड़कों के किनारों पर वृक्षारोपण 
🔹 वनोन्मूलन की रोकथाम 
मृदा संसाधन :-
🔹 मृदा एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है मिट्टी में ही खेती होती है मिट्टी कई जीवों का प्राकृतिक आवास भी है
मृदा का निर्माण :-
🔹 मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मात्र एक सेमी मृदा को बनने में हजारों वर्ष लग जाते हैं मृदा का निर्माण शैलों के अपघटन क्रिया से होता है मृदा के निर्माण में कई प्राकृतिक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ; जैसे कि तापमान , पानी का बहाव , पवन इस प्रक्रिया में कई भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों का भी योगदान होता है
मृदा का वर्गीकरण :-
🔹 बनावट , रंग , उम्र , रासायनिक गुण , आदि के आधार पर मृदा के कई प्रकार होते हैं भारत में पाई जाने वाली मृदा निम्नलिखित हैं :-
जलोढ़ मृदा :-
🔹 संपूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से बना है
🔹  पूर्वी तटीय मैदान विशेषकर महानदी , गोदावरी , कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टे भी जलोढ़ मृदा से बने हैं  
🔹 अधिकतम उपजाऊ होने के कारण जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि की जाती है जिससे यहाँ जनसँख्या घनत्व भी अधिक है  
🔹 अधिकतर जलोढ़ मृदाएँ पोटाश , फास्फोरस और चूनायुक्त होती हैं , जो इसे गन्ने , चावल , गेंहूँ और अन्य अनाजों और दलहन फसलों की खेती के लिए उपयुक्त बनाती हैं  
काली मृदा :-
🔹 इन मृदाओं का रंग काला है और इन्हें ' रेगर ' मृदाएँ भी कहा जाता है
🔹 काली मृदा कपास की खेती के लिए उचित समझी जाती है और इसे काली कपास मृदा के नाम से भी जाना जाता है  
🔹 ये मृदाएँ महाराष्ट्र , सौराष्ट्र , मालवा , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पत्थर पर पाई जाती हैं और दक्षिण - पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली है
🔹 काली मृदा बहुत महीन कणों अर्थात् मृत्तिका से बनी हैं इनकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत होती है
🔹 ये मृदाएँ कैल्सियम कार्बोनेट , मैग्नीशियम , पोटाश और चूने जैसे पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण होती हैं
लाल और पीली मृदा :-
🔹 लाल मृदा दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्ष वाले भागों में विकसित हुई हैं  
🔹 लाल और पीली मृदाएँ उड़ीसा , छत्तीसगढ़ , मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और पश्चिमी घाट क्षेत्रों में पहाड़ी पद पर पाई जाती है  
🔹 इन मृदाओं का लाल रंग रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार के कारण होता है
लेटराइट मृदा :-
🔹 लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है  
🔹 ये मृदाएँ मुख्य तौर पर कर्नाटक , केरल , तमिलनाडु , मध्य प्रदेश और उड़ीसा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्र में पाई जाती है  
🔹 इस मृदा पर अधिक मात्रा में खाद और रासायनिक उर्वरक डालकर ही खेती की जा सकती है  
🔹 इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है क्योंकि अत्यधिक तापमान के कारण जैविक पदार्थों को अपघटित करने वाले बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं
मरूस्थली मृदा :-
🔹 ये मृदाएँ मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती हैं  
🔹 इस मृदा को सही तरीके से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है  
🔹 शुष्क जलवायु और उच्च तापमान के कारण जलवाष्प दर अधिक है और मृदाओं में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है  
🔹 नमक की मात्रा अधिक पाए जाने के कारण झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता है  
वन मृदा :-
🔹 ये मृदाएँ आमतौर पर पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं जहाँ पर्याप्त वर्षा - वन उपलब्ध है
🔹 इन मृदाओं के गठन में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव आता है
🔹 नदी घाटियों में ये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती हैं , परन्तु ऊपरी ढालों पर इनका गठन मोटे कणों का होता है  
🔹 नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों , विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों , आदि में ये मृदाएँ उपजाऊ होती हैं
मृदा अपरदन और संरक्षण :-
🔹 मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं मृदा अपरदन के मुख्य कारण हैं ; वनोन्मूलन , सघन कृषि , अति पशुचारण , भवन निर्माण और अन्य मानव क्रियाएँ मृदा अपरदन से मरुस्थल बनने का खतरा रहता है  
🔹 मृदा अपरदन को रोकने के लिए मृदा संरक्षण की आवश्यकता है इसके लिए कई उपाय किये जा सकते हैं पेड़ों की जड़ें मृदा की ऊपरी परत को बचाए रखती हैं इसलिये वनरोपण से मृदा संरक्षण किया जा सकता है ढ़ाल वाली जगहों पर समोच्च जुताई मृदा के अपरदन को रोका जा सकता है पेड़ों को लगाकर रक्षक मेखला बनाने से भी मृदा अपरदन की रोकथाम हो सकती है


अध्याय - 2

वन और वन्य जीव संसाधन


👉 भारत में वनों का वितरण बड़ा सामान है इसमें कई राज्यों में इनका वितरण बड़ा घना और कई में बड़ा विरल है।हरियाणा में कुल क्षेत्र में केवल 3.8 % भूभाग पर ही वन है वहीं अंडमान और निकोबार जैसे ऐसे प्रदेश हैं जिनका लगभग 86.9 % भूभाग वनों से ढंका पड़ा है एक अनुमान के अनुसार जब कि अरुणाचल प्रदेश मणिपुर मिजोरम करानेवाला निकोबार दीप समूहों में 60 % से अधिक भू भाग पर बन है परन्तु हरियाणा पंजाब राजस्थान गुजरात जम्मू कश्मीर और दिल्ली आदि राज्यों के 10 % से भी कम भू भाग पर वन है वैसे देश के अधिकतर भागों में वनों के अधीन क्षेत्र कम ही हैं राष्ट्रीय वन नीति के अधीन 33 % भू भाग पर बन होने चाहिए  
राष्ट्रीय उद्यान :-
🔹 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे लक्षित क्षेत्रों को कहते हैं जहां बने प्राणियों से प्राकृतिक वनस्पति और प्राकृतिक सुंदरता को एक साथ सुरक्षित रखा जाता है ऐसे स्थानों की सुरक्षा और प्रबंध की ओर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है इनमें बहुत कम मानव हस्तक्षेप होता है। सिवाय इसके कि अधिकारी वर्ग जा सकते हैं और अपने काम की देखभाल कर सकें सैलानियों को भी एक नियमित बोलकर नियंत्रित संख्या में जाने दिया जाता है भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है और चीता भारत का राष्ट्रीय पशु है
जैव विविधता :-
🔹 किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाले जंतुओं और पादपों की विविधता को उस क्षेत्र की जैव विविधता कहते हैं  
भारत के वनस्पतिजात और प्राणिजात :-
🔹 जैव विविधता के मामले में भारत एक संपन्न देश है विश्व की लगभग 16 लाख प्रजातियों में से लगभग 8 % प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं  

लुप्तप्राय प्रजातियाँ जो नाजुक अवस्था में हैं :- चीता , गुलाबी सिर वाली बतख , पहाड़ी कोयल , जंगली चित्तीदार उल्लू , महुआ की जंगली किस्म , हुबर्डिया हेप्टान्यूरॉन ( घास की एक प्रजाति ) , आदि  
लुप्तप्राय प्रजातियों की संख्या :- 79 स्तनधारी , 44 पक्षी , 15 सरीसृप , 3 उभयचर , और 1,500 पादप प्रजातियाँ
अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार प्रजातियों का वर्गीकरण:-
सामान्य प्रजातियाँ :- जिस प्रजाति की जनसंख्या जीवित रहने के लिये सामान्य हो तो उस प्रजाति को सामान्य प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: मवेशी, साल, चीड़, कृन्तक, आदि।
संकटग्रस्त प्रजातियाँ :- जो प्रजाति लुप्त होने के कगार पर हो उसे संकटग्रस्त प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, भारतीय गैंडा, शेर-पूँछ वाला बंदर, संगाई (मणिपुरी हिरण), आदि।

सुभेद्य (Vulnerable) प्रजातियाँ :- जब किसी प्रजाति की जनसंख्या इतनी कम हो जाये कि उसके लुप्त होने की प्रबल संभावना हो जाये तो उसे सुभेद्य प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा की डॉल्फिन, आदि।

दुर्लभ प्रजातियाँ :- जब किसी प्रजाति की संख्या इतनी कम हो जाये कि उसके संकटग्रस्त या सुभेद्य होने का खतरा उत्पन्न हो तो उसे दुर्लभ प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: हिमालय के भूरे भालू, एशियाई भैंस, रेगिस्तानी लोमड़ी, हॉर्नबिल, आदि।

स्थानीय प्रजातियाँ :- कुछ प्रजाति केवल किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाती है। ऐसी प्रजाति को उस क्षेत्र की स्थानीय प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: अंदमान टील, निकोबार के कबूतर, अंदमान के जंगली सूअर, अरुणाचल प्रदेश के मिथुन, आदि।

लुप्त प्रजातियाँ :- प्रजाति जो अब नहीं पाई जाती है; लुप्त प्रजाति कहलाती है। कोई कोई प्रजाति किसी खास स्थान, क्षेत्र, देश, महादेश या पूरी धरती से विलुप्त हो जाती है। उदाहरण: एशियाई चीता, गुलाबी सिरवाली बतख, आदि।

वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास के कारण :-
कृषि में विस्तार :- भारतीय वन सर्वेक्षण के आँकड़े के अनुसार 1951 से 1980 के बीच 262,000 वर्ग किमी से अधिक के वन क्षेत्र को कृषि भूमि में बदल दिया गया। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के एक बड़े भूभाग को झूम खेती और पेड़ों की कटाई से नुकसान पहुँचा है।

संवर्धन वृक्षारोपण :- जब व्यावसायिक महत्व के किसी एक प्रजाति के पादपों का वृक्षारोपण किया जाता है तो इसे संवर्धन वृक्षारोपण कहते हैं। भारत के कई भागों में संवर्धन वृक्षारोपण किया गया ताकि कुछ चुनिंदा प्रजातियों को बढ़ावा दिया जा सके। इससे अन्य प्रजातियों का उन्मूलन हो गया।

विकास परियोजनाएँ :- आजादी के बाद से बड़े पैमाने वाली कई विकास परियोजनाओं को मूर्तरूप दिया गया। इससे जंगलों को भारी क्षति का सामना करना पड़ा। 1951 से आजतक नदी घाटी परियोजनाओं के कारण 5,000 वर्ग किमी से अधिक वनों का सफाया हो चुका है।
खनन :- खनन से कई क्षेत्रों में जैविक विविधता को भारी नुकसान पहुँचा है। उदाहरण: पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में डोलोमाइट का खनन।

संसाधनों का असमान बँटवारा :- अमीर और गरीबों के बीच संसाधनों का असमान बँटवारा होता है। इससे अमीर लोग संसाधनों का दोहन करते हैं और पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।
कम होते संसाधनों के सामाजिक प्रभाव :-
🔹 संसाधनों के कम होने से समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। कुछ चीजें इकट्ठा करने के लिये महिलाओं पर अधिक बोझ होता है; जैसे ईंधन, चारा, पेयजल और अन्य मूलभूत चीजें। इन संसाधनों की कमी होने से महिलाओं को अधिक काम करना पड़ता है। कुछ गाँवों में पीने का पानी लाने के लिये महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना होता है।

🔹 वनोन्मूलन से बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक विपदाएँ बढ़ जाती हैं जिससे गरीबों को काफी कष्ट होता है।

🔹 वनोन्मूलन से सांस्कृतिक विविधता में भी कमी आती है। कुछ लोग अपने पारंपरिक तौर तरीकों से जीवनयापन करने लिये वनों पर निर्भर रहते थे। ऐसे लोगों को वनोन्मूलन के कारण जीविका के नये साधनों की तलाश में निकलना पड़ता है। इस प्रक्रिया में उनकी जड़ें छूट जाती हैं और उन्हें अपने पारंपरिक आवास और संस्कृति को छोड़ने को विवश होना पड़ता है।

वन्यजीव संरक्षण
भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम 1972 :-
🔹 1960 और 1970 के दशकों में पर्यावरण संरक्षकों ने वन्यजीवन की रक्षा के लिए नए कानून की माँग की थी। उनकी माँगों को मानते हुए सरकार ने भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम 1972 को लागू किया। इस अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजातियों की एक अखिल भारतीय सूची तैयार की गई। बची हुई संकटग्रस्त प्रजातियों के शिकार पर पाबंदी लगा दी गई। वन्यजीवन के व्यापार पर रोक लगाया गया। वन्यजीवन के आवास को कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई। कई राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों ने नेशनल पार्क और वन्यजीवन अभयारण्य बनाए। कुछ खास जानवरों की सुरक्षा के लिए कई प्रोजेक्ट शुरु किये गये, जैसे प्रोजेक्ट टाइगर।
संरक्षण के लाभ :-
🔹 संरक्षण से कई लाभ होते हैं। इससे पारिस्थितिकी की विविधता को बचाया जा सकता है। इससे हमारे जीवन के लिये जरूरी मूलभूत चीजों (जल, हवा, मिट्टी) का संरक्षण भी होता है।
सरकार द्वारा वनों का वर्गीकरण :-
आरक्षित वन :- जिस वन में शिकार और मानव गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध हो उसे आरक्षित वन कहते हैं। कुल वन क्षेत्र के आधे से अधिक को आरक्षित वन का दर्जा दिया गया है। संरक्षण की दृष्टि से इन्हें सबसे बहुमूल्य माना जाता है।
रक्षित वन :- जिस वन में शिकार और मानव गतिविधियों पर प्रतिबंध हो लेकिन यह उस वन पर निर्भर रहने वाले आदिवासियों पर लागू हो तो ऐसे वन को रक्षित वन कहते हैं। कुल वन क्षेत्र के एक तिहाई हिस्से को रक्षित वन का दर्जा दिया गया है। रक्षित वनों को आगे होने वाले नुकसान से बचाया जाता है।
अवर्गीकृत वन :- जो वन ऊपर की दो श्रेणी में नहीं आते हैं उन्हें अवर्गीकृत वन कहा जाता है।
संरक्षण नीति की नई परिपाटी
जैव विविधता को बढ़ाना :- अब कुछ गिने चुने कारकों पर ध्यान देने की बजाय पूरी जैव विविधता पर ध्यान दिया जाता है। इसका असर यह हुआ है कि अब केवल बड़े स्तनधारियों पर ध्यान दिया जाता है बल्कि कीटों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है। 1980 और 1986 के वन्यजीवन अधिनियम के बाद नई अधिसूचनाएँ जारी की गईं। इन अधिसूचनाओं के अनुसार अब कई सौ तितलियों, मॉथ, बीटल और एक ड्रैगनफ्लाई को भी रक्षित जीवों की श्रेणी में रखा गया। 1991 में इस लिस्ट में पादप की : प्रजातियों को भी रखा गया है।
समुदाय और संरक्षण :-
🔹 इस बात को अब कई स्थानीय समुदायों ने भी मान लिया है कि संरक्षण से उनके जीवनयापन को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए अब कुछ लोग कई जगहों पर सरकार के संरक्षण के प्रयासों के साथ भागीदारी कर रहे हैं।
🔹 राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में गाँव के लोगों ने खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।
🔹 कई गाँव के लोग तो अब वन्यजीवन के आवास की रक्षा करने के क्रम में सरकारी हस्तक्षेप की भी अनदेखी कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण अलवर जिले में देखने को मिलता है। इस जिले के पाँच गाँवों ने 1,200 हेक्टेअर वन को भैरोदेव डाकवसोनचुरीघोषित कर दिया है। वहाँ के लोगों ने वन्यजीवन की रक्षा के लिये अपने ही नियम और कानून बनाये हैं।
🔹 हिंदू धर्म और कई आदिवासी समुदायों में प्रकृति की पूजा की पुरानी परंपरा रही है। जंगलों में पवित्र पेड़ों के झुरमुट इसी परंपरा की गवाही देते हैं। वनों में ऐसे स्थानों को मानव गतिविधियों से अछूता रखा जाता है।
🔹 छोटानागपुर के मुण्डा और संथाल लोग महुआ और कदम्ब की पूजा करते हैं। इसी तरह उड़ीसा और बिहार के आदिवासी शादी के मौके पर इमली और आम की पूजा करते हैं।

🔹 बंदरों को हिंदुओं के देवता हनुमान का वंशज माना जाता है। अधिकाँश स्थानों पर इसी मान्यता के कारण बंदरों और लंगूरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाता है। राजस्थान के बिश्नोई गाँवों में चिंकारा, नीलगाय और मोर को पूरे समुदाय का संरक्षण मिलता है और कोई उनको नुकसान नहीं पहुँचाता है।
🔹 संरक्षण कार्य में समुदाय की भागीदारी का एक अच्छा उदाहरण है चिपको आंदोलन।
🔹 टेहरी और नवदन्य के बीज बचाओ आंदोलन जैसे संगठनों ने यह दिखा दिया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध अनाजों की पैदावार करना आर्थिक रूप से संभव है।
🔹 स्थानीय समुदाय द्वारा संरक्षण में भागीदारी का एक और उदाहरण है ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट। यह कार्यक्रम उड़ीसा में 1988 से चल रहा है। इस कार्यक्रम के तहत गाँव के लोग अपनी संस्था का निर्माण करते हैं और संरक्षण संबंधी क्रियाकलापों पर काम करते हैं। उसके बदले में सरकार द्वारा उन्हें कुछ वन संसाधनों के इस्तेमाल का अधिकार मिल जाता है।
प्रोजेक्ट टाइगर :-
🔹 बाघों को विलुप्त होने से बचाने के लिये प्रोजेक्ट टाइगर को 1973 में शुरु किया गया था।
🔹 बीसवीं सदी की शुरुआत में बाघों की कुल आबादी 55,000 थी जो 1973 में घटकर 1,827 हो गई।
बाघ की आबादी के लिए खतरे :- व्यापार के लिए शिकार, सिमटता आवास, भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की घटती संख्या, आदि।
महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व :-कॉर्बेट नेशनल पार्क (उत्तराखंड), सुंदरबन नेशनल पार्क (पश्चिम बंगाल), बांधवगढ़ नेशनल पार्क (मध्य प्रदेश), सरिस्का वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी (राजस्थान), मानस टाइगर रिजर्व (असम) और पेरियार टाइगर रिजर्व (केरल)

अध्याय - 3

 जल संसाधन

जल : कुछ रोचक तथ्य :-

👉 पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का 97.5 % समुद्र और सागरों में पाया जाता है  

👉 पूरे जल का लगभग 2.5 % ताजे पानी के रूप में उपलब्ध है  

👉 कुल ताजे पानी का 70 % आइसबर्ग और ग्लेशियर में जमी हुई बर्फ के रूप में मौजूद है  

👉 कुल ताजे पानी का 30 % से थोड़ा कम हिस्सा भूमिगत जल के रूप में संचित है

👉 पूरे विश्व की कुल वर्षा का 4 % हिस्सा भारत में होता है  

👉 प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल की उपलब्धता के मामले में भारत का विश्व में 133 वाँ स्थान है  

👉 भारत में पुन : चक्रीकरण के लायक जल संसाधन 1,897 वर्ग किमी प्रति वर्ष है  

👉 ऐसा अनुमान है कि 2025 तक भारत उन क्षेत्रों में शामिल हो जायेगा जहाँ पानी की भारी कमी है

प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ :-

🔹 इलाहाबाद के नजदीक श्रिग्विरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को सुरक्षित करने के लिए जल संग्रहण तंत्र  

🔹 चंद्रगुप्त मौर्य के समय बाँध , झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण

🔹 कलिंग , नागार्जुन कोडा , बेन्नुर और कोल्हापुर में सिंचाई तंत्र  
🔹 कृत्रिम झील - भोपाल झील , 11 वीं शताब्दी में बनाई गई  

🔹 इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज़ खास बनवाया

जल दुर्लभता :-
🔹 जल की दुर्लभता के मुख्य कारण हैं; जल का अत्यधिक दोहन, अत्यधिक इस्तेमाल और विभिन्न सामाजिक समूहों में असमान वितरण।
🔹 जल हमारे जीवन के लिये अत्यंत जरूरी होता है। हमारे दैनिक कामों के अलावा अधिकतर आर्थिक क्रियाओं के लिये भी जल की आवश्यकता होती है। जनसंख्या बढ़ने के साथ साथ जल की मांग भी बढ़ रही है। लेकिन भूमिगत जल का प्राकृतिक तरीके से रिचार्ज अब कई कारणों से बाधित होने लगा है।
🔹 हमारे जंगल तेजी से कट रहे हैं। तेजी से होने वाले वनोन्मूलन के कारण भूमिगत जल के प्राकृतिक रिचार्ज में कमी आई है। जमीन के ऊपर कंक्रीट के मकान, कारखाने और सड़कें बनने से जमीन की जल सोखने की क्षमता कम हुई है। इसलिये अब वर्षा के पानी का जमीन के अंदर रिसाव कम हो गया है और भूमिगत जल ठीक से रिचार्ज नहीं हो पा रहा है।
🔹 कई स्थानों पर भूमिगत जल इसलिये प्रदूषित हो गया है कि वहाँ पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल हुआ है। कई स्थानों पर भूमिगत जल इतना प्रदूषित हो चुका है कि वह अब हमारे इस्तेमाल लायक नहीं बचा है।
🔹 नाले का पानी अक्सर बिना सुचारु उपचार किये ही नदियों और तालाबों में बहा दिया जाता है। इससे नदियों और तालाबों का पानी प्रदूषित हो चुका है।
जल संसाधन प्रबंधन :-
🔹 भारत में सदियों से जल संसाधन के समुचित प्रबंधन के लिये तरह तरह की संरचनाएँ बनाई जाती रही हैं। सिंचाई प्रणाली तो मौर्य साम्राज्य से पहले से ही बनने लगी थीं।
🔹 आधुनिक भारत में अनेक बहुद्देशीय बांध परियोजनाएँ बनी हैं। इस तरह की परियोजनाएँ कई जरूरतों को पूरा करती हैं। ये पानी के बहाव को काबू में करती हैं और बाढ़ की रोकथाम करती हैं। इन बांधों के पानी को नहरों के तंत्र के द्वारा दूर दराज के गांवों में भेजा जाता है ताकि वहाँ खेतों की सिंचाई हो सके। इनसे पीने के पानी की आपूर्ति भी की जाती है।

🔹 लेकिन बड़े बांध बनाने के लिये कई एकड़ जमीन खाली करानी पड़ती है। बांध के बहाव क्षेत्र में आने वाली जमीन का एक बडा हिस्सा डूब जाता है। ऐसे क्षेत्र के लोगों को अपने जमीन से बेदखल होने को बाध्य होना पड़ता है। जमीन के जलमग्न होने से पर्यावरण पर भीषण समस्या जाती है। इसलिये कई लोगों ने बांधों के खिलाफ आवाज उठानी शुरु कर दी है। नर्मदा बचाओ आंदोलन ऐसा ही एक आंदोलन है।
बाँध :-
🔹 बाँध बहते जल को रोकने , दिशा देने , बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय , झील अथवा जलभरण बनाती है  
🔹 बाँधों का वर्गीकरण उनकी संरचना और उद्देश्य या ऊँचाई के अनुसार  
🔹 संरचना और उनमें प्रयुक्त पदार्थों के आधार पर बाँधों को लकड़ी के बाँध , तटबंध बाँध या पक्का बाँध में विभाजन
🔹 ऊँचाई के अनुसार बाँध को बड़े बाँध और मुख्य बाँध या नीचे बाँध , माध्यम बाँध और उच्च बाँधों में वर्गीकृत
वर्षा जल संग्रहण :-
🔹 वर्षा का अधिकांश जल जमीन में प्रवेश नहीं कर पाता है और बेकार में बह जाता है। इस बरबादी को वर्षाजल संग्रहण के द्वारा रोका जा सकता है। वर्षाजल संग्रहण से जमा हुए जल को भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे भूमिगत जल को रिचार्ज करने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। छोटे पैमाने पर छत वर्षाजल संग्रहण भी कारगर साबित होता है।
🔹 राजस्थान में टाँका बनाने की पुरानी परंपरा रही है। यह एक भूमिगत टंकी होती है जिसमें वर्षाजल संग्रहण किया जाता है। इस जल को गर्मी के दिनों में इस्तेमाल किया जाता है।
3. वर्षा जल संग्रहण तरीके :-
🔹 पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों ने गुल अथवा कुल जैसी वाहिकाएँ बनाई  

🔹 गुल या कुल में नदी की धारा का रास्ता बदला जाता था छत वर्षा जल संग्रहण करना  

🔹 बाढ़ जल बाहिकाएँ बनाना - गढ्ढे बनाना  

🔹  राजस्थान के ज़िले जैसलमेर में खादीन और जोहड़ बनाना टाँका या भूमिगत टैंक - पीने का पानी संग्रहित करने के . लिए . . . बीकानेर , फलोदी और बाड़मेर में  

🔹 आकार एक कमरे जितना

🔹  छत का पानी पीने के लिए संग्रहित  

🔹 वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में उपयोग वर्षा जल को पालर पानी कहना

🔹 टाँकों के साथ भूमिगत कमरे गर्मी से राहत देते थे  

🔹 कुछ घरों में टाँका आज भी मौजूद क्योंकि नल के पानी का उन्हें स्वाद पसंद नहीं  

🔹 गंडायूर गाँव में छत वर्षा जल संग्रहण 

अध्याय - 4

कृषि

कृषि :- कृषि एक प्राथमिक क्रिया है जो हमारे अधिकांश का खाद्यान्न उत्पन्न करती है

कृषि प्रक्रिया :-

🔹 जुताई ( खेत जोतना , मिट्टी को भुरभुरा करना )

🔹 बुवाई ( बीज बोना )

🔹 निराई ( खरपतवार निकालना )

🔹 सिंचाई ( पानी डालना )

🔹 खाद ( खाद या उवर्रक डालना )

🔹 कीटनाशक ( कीड़े मारने वाली दवाई छिड़कना )

🔹 कटाई ( फसल पकने पर काटना )

 🔹 दलाई / गहराई ( बालियों में से बीज अलग करना )

कृषि प्रणाली :-

👉 निर्वाह कृषि :- ( 1 ) प्रारंभिक कृषि , ( 2 ) गहन कृषि

👉 वाणिज्यिक कृषि :- ( 1 ) मिश्रित कृषि , ( 2 ) रोपण कृषि 

प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि :-

🔹 जिस प्रकार की खेती से केवल इतनी उपज होती हो कि उससे परिवार का पेट भर सके तो उसे प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि कहते हैं। इस प्रकार की खेती जमीन के छोटे टुकड़ों पर की जाती है। इसमें आदिम औजार और परिवार या समुदाय के श्रम का इस्तेमाल होता है। यह मुख्यतया मानसून पर और जमीन की प्राकृतिक उर्वरता पर निर्भर करती है। इस प्रकार की कृषि में किसी स्थान विशेष की जलवायु के हिसाब से ही किसी फसल का चुनाव किया जाता है।

🔹 इसेकर्तन दहन खेतीभी कहा जाता है। ऐसा करने के लिये सबसे पहले जमीन के किसी टुकड़े की वनस्पति को काटा जाता और फिर उसे जला दिया जाता है। वनस्पति के जलाने से राख बनती है उसे मिट्टी में मिला दिया जाता है। उसके बाद फसल उगाई जाती है।

🔹 किसी जमीन के टुकड़े पर दो चार बार खेती करने के बाद उसे परती छोड़ दिया जाता है। उसके बाद एक नई जमीन को खेती के लिये तैयार किया जाता है। इस बीच पहले वाली जमीन को इतना समय मिल जाता है कि प्राकृतिक तरीके से उसकी खोई हुई उर्वरता वापस हो जाती है।

गहन कृषि :-

🔹 जब कृषि बड़े भूभाग पर होती है और सघन आबादी वाले क्षेत्रों में होती है तो उसे गहन जीविका कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि में जैव रासायनिक निवेशों और सिंचाई का अत्यधिक इस्तेमाल होता है।

गहन जीविका कृषि की समस्याएँ :- पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन का बँटवारा होने लगता है। इससे जमीन का आकार छोटा होता चला जाता है। छोटे आकार के भूखंड से होने वाली पैदावार लाभप्रद नहीं रह जाती है। इसके फलस्वरूप किसानों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है।

वाणिज्यिक कृषि :-

🔹 जब खेती का मुख्य उद्देश्य पैदावार की बिक्री करना हो तो उसे वाणिज्यिक कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि में आधुनिक साजो सामान का इस्तेमाल होता है। इसमें अधिक पैदावार वाले बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और खरपतवारनाशक का इस्तेमाल होता है। भारत में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ भागों में बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक कृषि होती है। इसके अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु, आदि में भी इस प्रकार की खेती होती है।
रोपण कृषि :- जब किसी एक फसल को एक बड़े क्षेत्र में उपजाया जाता है तो उसे रोपण कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि में बड़ी पूंजी और बहुत सारे कामगारों की जरूरत पड़ती है। रोपण कृषि से मिलने वाला उत्पाद अक्सर उद्योग में इस्तेमाल होता है। चाय, कॉफी, रबर, गन्ना, केला, आदि रोपण कृषि के मुख्य फसल हैं। चाय का उत्पादन मुख्य रूप से असम और उत्तरी बंगाल के चाय बागानों में होता है। कॉफी तमिल नाडु में उगाई जाती है। केला बिहार और महाराष्ट्र में उगाया जाता है। रोपण कृषि की सफलता के लिये यातायात और संचार के विकसित माध्यम और अच्छे बाजार की आवश्यकता होती है।
कृषि ऋतुएं :-
👉 खरीफ
👉  जायद
👉  रबी

रबी :- रबी की फसल जाड़े में उगायी जाती है इसलिये इसे जा‌ड़े की फसल भी कहते हैं। रबी की बुआई अक्तूबर से दिसंबर की बीच होती है। इसकी कटाई अप्रिल से जून के बीच होती है। रबी की मुख्य फसलें हैं गेहूँ, बार्ली, मटर, चना और सरसों। पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश रबी की फसल के मुख्य उत्पादक हैं।
खरीफ :- खरीफ की फसल गरमी में उगायी जाती है इसलिये इसे गरमी की फसल भी कहते हैं। खरीफ की बुआई जुलाई में होती है और कटाई सितंबर अक्तूबर में होती है। खरीफ की मुख्य फसलें हैं धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, तुअर, मूंग, उड़द, मूंगफली और सोयाबीं। धान के मुख्य उत्पादक हैं असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा के तटवर्ती इलाके, आंध्र प्रदेश, तमिल नाडु, केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार। असम, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में एक साल में धान की तीन फसलें उगाई जाती हैं; जिन्हें ऑस, अमन और बोरो कहते हैं।
जायद :- जायद का मौसम रबी और खरीफ के बीच आता है। इस में तरबूज, खरबूजा, खीरा, सब्जियाँ और चारे वाली फसलें उगाई जाती हैं। गन्ने को भी इसी मौसम में लगाया जाता है लेकिन उसे पूरी तरह से बढ़ने में एक साल लग जाता है।
कृषि की मुख्य फसलें :-
चावल :- चीन के बाद भारत दुनिया में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। धान की खेती के लिए जरूरी होते हैं उच्च तापमान (25°C से अधिक), अधिक आर्द्रता और 100 सेमी से अधिक की सालाना वर्षा। यदि सिंचाई की सही व्यवस्था हो तो धान को कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है। अब धान की खेती पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी होने लगी है। ऐसा इसलिये संभव हो पाया है कि इन क्षेत्रों में नहरों का सघन जाल है।

गेहूँ :- गेहूँ उगाने के लिए 50 से 75 सेमी की सालाना वर्षा की जरूरत होती है जिसका वितरण समान रूप से हो। पाला पड़ने से गेहूँ की फसल तबाह हो जाती है। गेहूँ के मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं; पश्चिम उत्तर के गंगा सतलज के मैदान और दक्कन के काली मृदा वाले क्षेत्र। गेहूँ के मुख्य उत्पादक हैं पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ भाग।

मोटे अनाज :- भारत में उगने वाले मोटे अनाज में से मुख्य हैं ज्वार, बाजरा और रागी। हालाँकि ये मोटे अनाज हैं लेकिन इनमें पोषक तत्वों की अधिक मात्रा होती है।

ज्वार :- ज्वार उत्पादन के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे है। ज्वार की खेती कर्णाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी होती है। ज्वार को अक्सर आर्द्र क्षेत्रों में उगाया जाता है इसलिये इसे सिंचाई की जरूरत नहीं होती है।

बाजरा :- बाजरे को बलुई और उथली काली मिट्टी में उगाया जाता है। राजस्थान बाजरे का सबसे बड़ा उत्पादक है। बाजरे की खेती उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में भी होती है।

रागी :- रागी को शुष्क प्रदेशों में लाल, काली, बलुआ दोमट और उथली काली मिट्टी में उगाया जाता है। रागी के उत्पादन में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है जिसके बाद तमिल नाडु का स्थान है।

मक्का :- मक्के का इस्तेमाल खाद्यान्न और चारे दोनों के रूप में होता है। पुरानी जलोढ़ मिट्टी में मक्के की पैदावार अच्छी होती है। मक्के की खेती के लिए 21°-27°C के बीच के तापमान की जरूरत पड़ती है। कर्णाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश मक्के के मुख्य उत्पादक हैं।

दालें :- भारत विश्व में दाल का सबसे बड़ा उत्पादक होने के साथ साथ सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। दालों को सामन्यतया अन्य फसलों के आवर्तन में उगाया जाता है। इसका यह मतलब है कि हर दो फसल के बीच एक दाल की फसल उगाई जाती है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्णाटक दाल के मुख्य उत्पादक हैं।

गन्ना :- गन्ने की फसल के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु, 21°-27°C के बीच का तापमान और 75 cm से 100 cm की वर्षा की जरूरत होती है। गन्ने के उत्पादन में ब्राजील पहले नंबर पर है और भारत दूसरे नंबर पर। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्णाटक, तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा गन्ने के मुख्य उत्पादक हैं।

तिलहन :- भारत तिलहन का सबसे बड़ा उत्पादक है। मूंगफली, सरसों, नारियल, तिल, सोयाबीन, अरंडी, बिनौला, अलसी और सूरजमुखी भारत के मुख्य तिलहन हैं।

मूंगफली :- भारत में पैदा होने वाले तिलहनों में मूंगफली का हिस्सा 50% है। आंध्र प्रदेश मूंगफली का सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके बाद तमिल नाडु, कर्णाटक, गुजरात और महाराष्ट्र का स्थान आता है।

🔹 मूंगफली एक खरीफ फसल है। अलसी और सरसों रबी की फसलें हैं। तिल उत्तरी भारत में खरीफ की फसल है और दक्षिण में रबी की फसल है। अरंडी को रबी और खरीफ दोनों मौसमों में उगाया जाता है।

चाय :- उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु चाय की फसल के लिये अच्छी होती है। इसके लिए गहरी मिट्टी और सुगम जल निकास वाले ढ़लुवा क्षेत्रों की जरूरत पड़ती है। चाय के उत्पादन में गहन श्रम की आवश्यकता होती है। असम, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु और केरल चाय के मुख्य उत्पादक हैं। दार्जीलिंग की पहाड़ियाँ अपनी खास चाय के लिए मशहूर हैं। भारत चाय का सबसे बड़ा उत्पादक है।
कॉफी :- चाय की तरह कॉफी को भी बागानों में उगाया जाता है। भारत में सबसे पहले यमन से अरेबिका किस्म की कॉफी को उगाया गया था। शुरुआत में कॉफी को बाबा बूदन पहाड़ियों में उगाया गया था।
बागवानी फसलें :- भारत में उष्ण और शीतोष्ण कटिबंधीय फलों का उत्पादन होता है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के आम, नागपुर और चेरापुंजी के संतरे, केरल, मिजोरम, महाराष्ट्र और तमिल नाडु के केले, उत्तर प्रदेश और बिहार की लीची, मेघालय के अनन्नास, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के अंगूर, जम्मू कश्मीर और हिमाचल के सेब, नाशपाती, खूबानी और अखरोट पूरी दुनिया में मशहूर हैं।
👉 भारत सब्जियों और फलों का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में पूरे विश्व के उत्पादन की 13% सब्जियाँ पैदा होती हैं। भारत मटर, गोभी, प्याज, बंदगोभी, टमाटर, बैगन और आलू का एक मुख्य उत्पादक है।
अखाद्य फसलें :-
 
रबर :- भूमध्यरेखीय क्षेत्र रबर की फसल के लिये सबसे उपयुक्त है। लेकिन उष्ण और उपोष्ण क्षेत्रों में भी रबर की खेती होती है। रबर की खेती के लिए आर्द्र और नम जलवायु की जरूरत होती है जहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा होती हो और 25°C से अधिक तापमान रहता हो। भारत में रबर की खेती मुख्य रूप से केरल, तमिल नाडु, कर्णाटक, अंदमान निकोबार द्वीप समूह और मेघालय की गारो पहाड़ियों में होती है। रबर के उत्पादन में भारत का विश्व में पाँचवां स्थान है।
कपास :- भारत कपास का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। कपास की खेती दक्कन पठार के शुष्क भागों की काली मिट्टी में होती है। कपास की अच्छी पैदावार के लिए उच्च तापमान, हल्की वर्षा, 210 पाला रहित दिन और तेज धूप की जरूरत होती है। कपास की फसल को पकने में 6 से 8 महीने लगते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्णाटक, आंध्र प्रदेश, तमिल नाडु, हरियाणा और उत्तर प्रदेश कपास के मुख्य उत्पादक हैं।
जूट :- जूट के लिए अच्छी जल निकासी वाली बाढ़ के मैदानों की उपजाऊ मिट्टी की जरूरत होती है। जूट के मुख्य उत्पादक हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, उड़ीसा और मेघालय।
प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार :-
🔹 स्वतंत्रता के पश्चात देश में संस्थागत सुधार करने के लिए जोतों की चकबंदी , सहकारिता तथा जमींदारी आदि समाप्त करने को प्राथमिकता दी गई  
🔹 प्रथम पंचवर्षीय योजना में भूमि सुधार मुख्य लक्ष्य  
🔹 पैकेज टैक्नोलॉजी पर आधारित हरित क्रांति और श्वेत क्रांति  
🔹 विकास कुछ क्षेत्रों तक सीमित  
🔹 1980 और 1990 के दशकों में व्यापक भूमि विकास कार्यक्रम शुरू जो संस्थागत और तकनीकी सुधारों पर आधारित था  
🔹 सूखा , बाढ़ , चक्रवात , आग तथा बीमारी के लिए फसल बीमा के प्रावधान  
🔹 किसानों को कम दर पर ऋण सुविधाएँ प्रदान करने के लिए ग्रामीण बैंकों , सहकारी समितियों और बैंकों की स्थापना
🔹 किसान क्रेडिट कार्ड और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजनाशुरू  
🔹 आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किसानों के लिए मौसम की जानकारी के बुलेटिन और कृषि कार्यक्रम प्रसारित करना  
🔹 किसानों को बिचैलियों और दलालों के शोषण से बचाने के लिए न्यूनतम सहायता मूल्य और कुछ महत्वपूर्ण फसलों के लाभदायक खरीद मूल्यों की सरकार घोषणा करती है
हरित क्रांति :-
🔹 हरित क्रांति की शुरुआत 1960 और 1970 के दशक में हुई। इस क्रांति का मुख्य उद्देश्य था कृषि उपज को बढ़ाना। इस क्रांति में नई टेक्नॉलोजी और अधिक उपज देने वाली बीजों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया। हरित क्रांति के परिणाम सुखद आये; खासकर पंजाब और हरियाणा में।
श्वेत क्रांति :-
🔹 श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) की शुरुआत दूध के उत्पादन को बढ़ाने के लिये हुई।
🔹 1980 और 1990 के दशकों में भूमि विकास के लिए एक व्यापक कार्यक्रम शुरु किया गया। इस कार्यक्रम में संस्थागत और टेक्नॉलोजिकल दोनों पहलुओं पर जोर दिया गया। किसानों को नुकसान की भरपाई के लिये बाढ़, सूखा, चक्रवात, आग और बीमारी के लिए फसल बीमा की सुविधा दी गई। किसानों को आसानी से कर्ज मुहैया कराने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण बैंक और को-ऑपरेटिव सोसाइटी खोली गई।

🔹 किसानों के फायदे के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, पर्सनल ऐक्सिडेंट इंश्योरेंस स्कीम और कई अन्य स्कीम को लाया गया।

🔹 सरकारी टेलिविजन चैनल और रेडियो पर कृषि से संबंधित कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं और मौसम की बुलेटिन भी आती है। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। उस मूल्य पर सरकार किसानों से अनाज खरीदती है ताकि बिचौलियों के कुचक्र को तोड़ा जा सके।
वर्तमान स्थिति :-
🔹वर्तमान में कृषि क्षेत्र की हालत अच्छी नहीं है। इस क्षेत्र में विकास तेजी से नीचे गिर रहा है। आयात शुल्क में कटौती के कारण यहाँ के किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से कड़ी टक्कर मिल रही है। कृषि क्षेत्र में निवेश नहीं हो पा रहा है। इस क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर नहीं पनप रहे हैं।
🔹 सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि की भागीदारी 1951 से लगातार गिर रही है। इसके बावजूद अभी भी कृषि क्षेत्र ही सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। कृषि में होने वाली गिरावट के भयानक परिणाम हो सकते हैं क्योंकि इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
🔹 कृषि के आधुनिकीकरण के लिए सरकार लगातार काम कर रही है। भारत में कृषि सुधार के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), कृषि विश्वविद्यालय, पशु चिकित्सा सेवा, पशु प्रजनन केंद्र, बागवानी, मौसम विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास पर खास ध्यान दिया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत ढ़ाँचे के सुधार के लिए भी सरकार कई कदम उठा रही है।
कृषि का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था , रोजगार और उत्पादन में योगदान :-
🔹सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान  
🔹जन संख्या के लिए योगदान  
🔹आजीविका का साधन
🔹भारत सरकार ने आधुनिकीकरण के लिए भरसक प्रयास
🔹भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना  
🔹पशु चिकित्सा सेवाएँ और पशु प्रजनन केन्द्र की स्थापना  
🔹बागवानी विकास  
🔹मौसम विज्ञान और मौसम के पूर्वानुमान के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास  

अध्याय - 5

खनिज और ऊर्जा संसाधन खनिजों का वर्गीकरण

खनिज :-
🔹 प्राकृतिक रूप में उपलब्ध एक समरूप पदार्थ जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना होती है उसे खनिज कहते हैं।
खनिजों के प्रकार :-
🔹 खनिज तीन प्रकार के होते हैं ;
👉 धात्विक,
👉 अधात्विक और 
👉 ऊर्जा खनिज
धात्विक खनिज :-
लौह धातु :- लौह अयस्क, मैगनीज, निकेल, कोबाल्ट, आदि।
अलौह धातु :- तांबा, लेड, टिन, बॉक्साइट, आदि।
बहुमूल्य खनिज :- सोना, चाँदी, प्लैटिनम, आदि।
अधात्विक खनिज :- अभ्रक, लवण, पोटाश, सल्फर, ग्रेनाइट, चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, आदि।
ऊर्जा खनिज :- कोल, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
खनिज के भंडार :-

1.
आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में :- इस प्रकार की चट्टानों में खनिजों के छोटे जमाव शिराओं के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टानों में खनिजों के बड़े जमाव परत के रूप में पाये जाते हैं। जब खनिज पिघली हुई अवस्था या गैसीय अवस्था में होती है तो खनिजों का निर्माण आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में होता है। इस अवस्था में खनिज दरारों से होते हुए भूमि की ऊपरी सतह तक पहुँच जाते हैं। उदाहरण: टिन, जस्ता, लेड, आदि।
2. अवसादी चट्टानों में :- इस प्रकार की चट्टानों में खनिज परतों में पाये जाते है। उदाहरण: कोयला, लौह अयस्क, जिप्सम, पोटाश लवण और सोडियम लवण, आदि।
3. धरातलीय चट्टानों के अपघटन के द्वारा :- जब चट्टानों के घुलनशील अवयवों का अपरदन हो जाता है तो बचे हुए अपशिष्ट में खनिज रह जाता है। बॉक्साइट का निर्माण इसी तरह से होता है।
4. जलोढ़ जमाव के रूप में :- इस तरह से बने हुए खनिज नदी के बहाव द्वारा लाये जाते हैं और जमा होते हैं। ऐसे खनिज रेतीली घाटी की तली में और पहाड़ियों के आधार में पाये जाते हैं। ऐसे में वो खनिज मिलते हैं जिनका अपरदन जल द्वारा नहीं होता है। उदाहरण: सोना, चाँदी, टिन, प्लैटिनम, आदि।
महासागर के जल में :- समुद्र में पाये जाने वाले ज्यादातर खनिज इतने विरल होते हैं कि ये आर्थिक महत्व के नहीं होते हैं लेकिन समुद्र के जल से साधारण नमक, मैग्नीशियम और ब्रोमीन निकाला जाता है।
लौह अयस्क :-
🔹 अच्छी क्वालिटी के लौह अयस्क में लोहे की अच्छी मात्रा होती है। मैग्नेटाइट में 70% लोहा होता है इसलिए इसे सबसे अच्छी क्वालिटी का लौह अयस्क माना जाता है। अपने उत्तम चुम्बकीय गुण के कारण यह लोहा विद्युत उद्योग के लिये अच्छा माना जाता है। हेमाटाइट में 50 से 60% लोहा होता है। इसे मुख्य औद्योगिक लौह अयस्क माना जाता है।
भारत में लौह अयस्क के मुख्य बेल्ट :-
उड़ीसा झारखंड बेल्ट :- उड़ीसा के मयूरभंज और केंदुझर जिले की बादामपहाड़ की खानों में हाई ग्रेड का हेमाटाइट अयस्क मिलता है। झारखंड के सिंहभूम जिले के गुआ और नोआमुंडी की खानों में भी हेमाटाइट अयस्क मिलता है।

दुर्ग बस्तर चंद्रपुर बेल्ट :- यह बेल्ट छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में पड़ता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की बैलादिला पहाड़ियों में हाई ग्रेड का हेमाटाइट अयस्क मिलता है। इन पहाड़ियों में सुपर हाई ग्रेड हेमाटाइट अयस्क के 14 भंडार हैं। इन खानों के लोहे को विशाखापत्तनम के बंदरगाह से जापान और दक्षिण कोरिया तक निर्यात किया जाता है।

बेल्लारी चित्रदुर्ग चिकमगलूर बेल्ट :- यह बेल्ट कर्णाटक में पड़ता है। पश्चिमी घाट में स्थित कुद्रेमुख की खानें शत प्रतिशत निर्यात के लिए उत्पादन करती है। यहाँ का लौह अयस्क स्लरी के रूप में पाइपलाइन के द्वारा मंगलोर के निकट के बंदरगाह तक भेजा जाता है।

महाराष्ट्र गोवा बेल्ट :- इस बेल्ट में गोवा राज्य और महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला आता है। यहाँ के खानों के अयस्क अच्छी क्वालिटी के नहीं हैं। इन अयस्कों को मारमागाओ पोर्ट से निर्यात किया जाता है।

मैगनीज :-
🔹 मैगनीज का इस्तेमाल मुख्य रूप से स्टील और फेरो-मैगनीज अयस्क के निर्माण में होता है। इसका इस्तेमाल ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक और पेंट बनाने में भी होता है।
तांबा :-
🔹 तांबा एक महत्वपूर्ण अयस्क है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बिजली के तार, इलेक्ट्रॉनिक और रसायन उद्योग में होता है। मध्यप्रदेश की बालाघाट की खानों में भारत का 52% तांबा निकलता है। 48% शेअर के साथ राजास्थान तांबे का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। तांबे का उत्पादन झारखंड के सिंहभूम जिले में भी होता है।

अलमुनियम :-
🔹 अलमुनियम का इस्तेमाल कई चीजें बनाने में किया जाता है क्योंकि यह हल्का और मजबूत होता है। अलमुनियम के अयस्क को बॉक्साइट कहते हैं। बॉक्साइट के मुख्य भंडार अमरकंटक के पठार, मैकाल पहाड़ी और बिलासपुर कटनी के पठारी क्षेत्रों में हैं। बॉक्साइट का मुख्य उत्पादक उड़ीसा है जहाँ 45% बॉक्साइट का उत्पादन होता है। उड़ीसा में बॉक्साइट के मुख्य भंडार पंचपतमाली और कोरापुट जिले में हैं।

अभ्रक :-
🔹 अभ्रक एक ऐसा खनिज है जो पतली प्लेटों के कई लेयर से बना होता है। कुछ ही सेंटीमीटर अभ्रक की शीट में हजारों प्लेटें हो सकती हैं। अभ्रक के पास उच्च डाई-इलेक्ट्रिक शक्ति, निम्न ऊर्जा ह्रास फैक्टर, इंसुलेशन प्रोपर्टी और हाई वोल्टेज से रेसिस्टेंस की शक्ति होती है। इसलिए अभ्रक को इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में इस्तेमाल किया जाता है।
🔹 अभ्रक के भंडार छोटानागपुर पठार के उत्तरी किनारों पर पाये जाते हैं। झारखंड का कोडरमा गया हजारीबाग बेल्ट अभ्रक का मुख्य उत्पादक है। अभ्रक का उत्पादन राजस्थान के अजमेर और आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में भी होता है।
खनन के दुष्प्रभाव :-
🔹 खानों में काम करने वाले मजदूरों और आस पास रहेन वाले लोगों के लिये खनन एक घातक उद्योग है। खनिकों को कठिन परिस्थिति में काम करना पड़ता है। खान के अंदर नैसर्गित रोशनी नहीं मिल पाती है। खानों में हमेशा खान की छत गिरने, पानी भरने और आग लगने का खतरा रहता है। खान के आस पास के इलाकों में धूल की भारी समस्या होती है। खान से निकलने वाली स्लरी से सड़कों और खेतों को नुकसान पहुँचता है। इन इलाकों में घर और कपड़े ज्यादा जल्दी गंदे हो जाते हैं। खनिकों को सांस की बीमारी होने का खतरा अधिक रहता है। खनन वाले क्षेत्रों में सांस की बीमारी के केस अधिक होते हैं।
खनिजों का संरक्षण :-
🔹 खनिजों के बनने में करोड़ों वर्ष लग जाते हैं। इसलिये खनिज अनवीकरण योग्य संसाधण की श्रेणी में आते हैं। जिस तेजी से हम खनिजों का इस्तेमाल कर रहे हैं उसकी तुलना में खनिजों का पुनर्रभरण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है। इसलिए खनिजों का संरक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है।
ऊर्जा संसाधन :-
परंपरागत ऊर्जा के स्रोत :- ,जलावन, उपले, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और बिजली।
गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोत :- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, बायोगैस और परमाणु ऊर्जा।
जलावन और उपले :- 
🔹 अनुमानित आंकड़े के अनुसार ग्रामीण घरों की ऊर्जा की जरूरत का 70% भाग जलाव और उपलों से पूरा होता है। जंगलों के तेजी से कटने के कारण जलावन की लकड़ियाँ मिलना पहले से मुश्किल होता जा रहा है। यदि गोबर का इस्तेमाल खाद बनाने में किया जाये तो वह उपले बनाने से अधिक लाभप्रद होगा। इसलिये यह जरूरी है कि उपलों का इस्तेमाल कम होना चाहिए।

कोयला :-
🔹 भारत की वाणिज्यिक ऊर्जा जरूरतों के लिये कोयला सबसे महत्वपूर्ण है। संपीड़न की मात्रा, गहराई और समय के अनुसार कोयले के तीन प्रकार होते हैं जो निम्नलिखित हैं।
लिग्नाइट :- 
🔹 यह एक निम्न दर्जे का भूरा कोयला है। लिग्नाइट मुलायम होता है और इसमें अधिक नमी होती है। लिग्नाइट के मुख्य भंडार तमिल नाडु के नैवेली में हैं। इस प्रकार के कोयले का इस्तेमाल बिजली के उत्पादन में होता है।
बिटुमिनस कोयला :- 
🔹 जो कोयला उच्च तापमान के कारण बना था और अधिक गहराई में दब गया था उसे बिटुमिनस कोयला कहते हैं। वाणिज्यिक इस्तेमाल के दृष्टिकोण से यह सबसे लोकप्रिय कोयला माना जाता है। बिटुमिनस कोयले को लोहा उद्योग के लिये आदर्श माना जाता है।
एंथ्रासाइट कोयला :-
🔹 यह सबसे अच्छे ग्रेड का और सख्त कोयला होता है।
🔹 भारत में पाया जाने वाला कोयला दो मुख्य भूगर्भी युगों की चट्टानों की परतों में मिलता है। गोंडवाना कोयले का निर्माण बीस करोड़ साल पहले हुआ था। टरशियरी निक्षेप के कोयले का निर्माण लगभग साढ़े पाँच करोड़ साल पहले हुआ था। गोंडवाना कोयले के मुख्य स्रोत दामोदर घाटी में हैं। इस बेल्ट में झरिया, रानीगंज और बोकारो में कोयले की मुख्य खदाने हैं। गोदावरी, महानदी, सोन और वर्धा की घाटियों में भी कोयले के भंडार हैं।

🔹 टरशियरी कोयला पूर्वोत्तर के मेघालय, असम, अरुणाचल और नागालैंड में पाया जाता है।
पेट्रोलियम :-
🔹 कोयले के बाद, भारत का मुख्य ऊर्ज संसाधन है पेट्रोलियम। पेट्रोलियम का इस्तेमाल कई कार्यों में ऊर्जा के स्रोत के रूप में होता है। इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में कई उद्योगों में होता है। उदाहरण: प्लास्टिक, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आदि।
🔹 भारत में पाया जाने वाला पेट्रोलियम टरशियरी चट्टानों की अपनति और भ्रंश ट्रैप में पाया जाता है। चूना पत्थर या बलुआ पत्थर की सरंध्र परतों में तेल पाया जाता है जो बाहर भी बह सकता है। लेकिन बीच बीच में स्थित असरंध्र परतें इस तेल को रिसने से रोकती हैं। इसके अलावा सरंध्र और असरंध्र परतों के बीच बने फॉल्ट में भी पेट्रोलियम पाया जाता है। हल्की होने के कारण गैस सामान्यतया तेल के ऊपर पाई जाती है।
🔹 भारत का 63% पेट्रोलियम मुम्बई हाई से निकलता है। 18% गुजरात से और 13% असम से आता है। गुजरात का सबसे महत्वपूर्ण तेल का क्षेत्र अंकलेश्वर में है। भारत का सबसे पुराना पेट्रोलियम उत्पादक असम है। असम के मुख्य तेल के कुँए दिगबोई, नहरकटिया और मोरन-हुगरीजन में हैं।
प्राकृतिक गैस :-
🔹 प्राकृतिक गैस या तो पेट्रोलियम के साथ पाई जाती है या अकेले भी। इसका इस्तेमाल भी ईंधन और कच्चे माल के तौर पर होता है। कृष्णा गोदावरी बेसिन में प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार की खोज हुई है। खंभात की खाड़ी, मुम्बई हाई और अंदमान निकोबार में भी प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार हैं।
🔹 मुम्बई हाई और कृष्णा गोदावरी बेसिन को पश्चिमी और उत्तरी भारत के खाद, उर्वरक और औद्योगिक क्षेत्रों को एक 1700 किमी लम्बी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर पाइपलाइन जोड़ती है। प्राकृतिक गैस का मुख्य इस्तेमाल उर्वरक और बिजली उत्पादन में होता है। आजकल, सीएनजी का इस्तेमाल गाड़ियों के ईंधन के रूप में भी होने लगा है।
बिजली :-
🔹 विद्युत का उत्पादन मुख्य रूप से दो तरीकों से होता है। एक तरीके में बहते पानी से टरबाइन चलाया जाता है। दूसरे तरीके में कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करके भाप बनाई जाती है जिससे टरबाइन चलाया जाता है। देश के मुख्य पनबिजली उत्पादक हैं भाखड़ा नांगल, दामोदर वैली कॉरपोरेशन, कोपिली हाइडेल प्रोजेक्ट, आदि। वर्तमान में भारत में 300 से अधिक थर्मल पावर स्टेशन हैं।
गैर परंपरागत ऊर्जा संसाधन :-

परमाणु ऊर्जा :- परमाणु की संरचना में बदलाव करके परमाणु ऊर्जा प्राप्त की जाती है। जब किसी परमाणु की संरचना में बदलाव किया जाता है तो इससे बहुत भारी मात्रा में ताप ऊर्जा निकलती है। इस ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली पैदा करने में किया जाता है। इस ऊर्जा से भाप बनाई जाती है जिससे टरबाइन चलाकर बिजली पैदा की जाती है। परमाणु ऊर्जा के निर्माण के लिए यूरेनियम और थोरियम को इस्तेमाल किया जाता है। ये खनिज झारखंड में और राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में पाये जाते हैं। केरल में पाई जाने वाली मोनाजाइट रेत में भी थोरियम की प्रचुरता होती है।

सौर ऊर्जा :- सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने के लिए फोटोवोल्टाइक टेक्नॉलोजी का इस्तेमाल होता है। भुज के निकट माधापुर में भारत का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट है। सौर ऊर्जा भविष्य के लिए नई उम्मीदें जगाता है। इससे ग्रामीण इलाकों में जलावन और उपलों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। इससे जीवाष्म ईंधन के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। सौर ऊर्जा पर्यावरण हितैषी है।

पवन ऊर्जा :- भारत को अब विश्व मेंपवन सुपर पावरमाना जाता है। तामिलनाडु में नगरकोइल से मदुरै तक के विंड फार्म भारत के सबसे बड़े विंड फार्म क्लस्टर हैं। पवन ऊर्जा के मामले में आंध्र प्रदेश, कर्णाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र और तामिलनाडु भी अहम हैं।
बायोगैस :- खरपतवार, कृषि अपशिष्ट और पशु और मानव अपशिष्ट से बायोगैस बनाई जा सकती है। केरोसीन, उपले और चारकोल की तुलना में बायोगैस ज्यादा कार्यकुशल है। बायोगैस प्लांट को म्यूनिसिपल, को-ऑपरेटिव और व्यक्तिगत स्तर पर भी बनाया जा सकता है। गोबर गैस प्लांट से ऊर्जा के साथ साथ खाद भी मिलती है।
ज्वारीय ऊर्जा :- ज्वारीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए बाँध बनाकर पानी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है। इसके लिए बने रास्ते से ज्वार के समय पानी बाँध के पीछे पहुँच जाता है और गेट के बंद होने से वहीं रुक जाता है। ज्वार के चले जाने के बाद गेट खोल दिया जाता है जिससे पानी वापस समुद्र की ओर जाने लगता है। पानी के बहाव से टरबाइन चलाये जाते हैं जिससे बिजली बनती है। नेशनल हाइड्रोपावर कॉरपोरेशन ने कच्छ की खाड़ी में 900 मेगावाट का एक ज्वारीय ऊर्जा प्लांट बनाया है।

भू-तापीय ऊर्जा :- आपको पता होगा कि धरती के अंदर काफी गरमी होती है। कुछ स्थानों पर यह उष्मा दरारों से होकर सतह पर जाती है। ऐसे स्थानों का भूमिगत जल गर्म हो जाता है और भाप के रूप में ऊपर उठता है। इस भाप का इस्तेमाल टरबाइन चलाने में किया जाता है। भारत में प्रयोग के तौर पर भू-तापीय ऊर्जा से बिजली बनाने के दो संयंत्र लगाये गये हैं। उनमे से एक हिमाचल प्रदेश में मणिकरण के निकट पार्वती घाटी में है और दूसरा लद्दाख में पूगा घाटी में है।
ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण :-
🔹 आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक आधारभूत आवश्यकता राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में प्रत्येक क्षेत्र कृषि उद्योग , परिवहन , वाणिज्य घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऊर्जा निवेश की आवश्यकता हमें ऊर्जा के सीमित संसाधनों को उपयोग न्यायसंगत से करना है
🔹 निजी वाहन की अपेक्षा सार्वजनिक वाहनों का उपयोग  
🔹 जब प्रयोग हो रही हो तो बिजली बन्द करें
🔹  गैर परांपरिक ऊर्जा संसाधनों का प्रयोग  

अध्याय - 6

विनिर्माण उद्योग

विनिर्माण :-

🔹 मशीनों द्वारा बड़ी मात्रा में कच्चे माल से अधिक मूल्यवान वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण कहते हैं

विनिर्माण का महत्व :-

🔹  विनिर्माण उद्योग से कृषि को आधुनिक बनाने में मदद मिलती है  

🔹 विनिर्माण उद्योग से लोगों की आय के लिये कृषि पर से निर्भरता कम होती है

🔹 विनिर्माण से प्राइमरी और सेकंडरी सेक्टर में रोजगार के अवसर बढ़ाने में मदद मिलती है  

🔹 इससे बेरोजगारी और गरीबी दूर करने में मदद मिलती है  

🔹  विनिर्माण द्वारा उत्पादित वस्तुओं से निर्यात बढ़ता है जिससे विदेशी मुद्रा देश में आती है

🔹 किसी देश में बड़े पैमाने पर विनिर्माण होने से देश में संपन्नता आती है  

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विनिर्माण उद्योग का योगदान :-

🔹 सकल घरेलू उत्पाद ( GDP ) में उद्योग का कुल शेअर 27 % है इसमें से 10 % खनन , बिजली और गैस से आता शेष 17 % विनिर्माण से आता है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण का यह शेअर पिछले दो दशकों से स्थिर रहा है

🔹 पिछले दशक में विनिर्माण की वृद्धि दर 7 % रही है 2003 से यह वृद्धि दर 9 से 10 % रही है अगले दशक के लिये कम से कम 12 % की वृद्धि दर की आवश्यकता है

🔹 भारत सरकार ने नेशनल मैन्युफैक्चरिंग काउंसिल ( NMCC ) का गठन किया गया है ताकि सही नीतियाँ बनाई जा सकें और उद्योग सही ढंग से कार्य करे

उद्योग :- 

🔹 विनिर्माण का विस्तृत रूप उद्योग कहलाता है

उद्योग अवस्थिति :-

🔹 उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कुछ कारक निम्नलिखित हैं:

👉 कच्चे माल की उपलब्धता

👉 श्रम की उपलब्धता

👉 पूंजी की उपलब्धता

👉 ऊर्जा की उपलब्धता

👉 बाजार की उपलब्धता

👉 आधारभूत ढ़ाँचे की उपलब्धता

🔹 कुछ उद्योग शहर के निकट स्थित होते हैं जिससे उद्योग को कई लाभ मिलते हैं। शहर के पास होने के कारण बाजार उपलब्ध हो जाता है। इसके अलावा शहर से कई सेवाएँ भी मिल जाती हैं; जैसे कि बैंकिंग, बीमा, यातायात, श्रमिक, विशेषज्ञ सलाह, आदि। ऐसे औद्योगिक केंद्रों को एग्लोमेरेशन इकॉनोमी कहते हैं।

🔹 आजादी के पहले के समय में ज्यादातर औद्योगिक इकाइयाँ बंदरगाहों के निकट होती थीं; जैसे कि मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, आदि। इसके फलस्वरूप ये क्षेत्र ऐसे औद्योगिक शहरी क्षेत्रों के रूप में विकसित हुए जिनके चारों ओर ग्रामीण कृषि पृष्ठप्रदेश थे।

उद्योग के प्रकार :-

कच्चे माल के आधार पर वर्गीकरण :-

कृषि आधारित उद्योग :- कपास, ऊन, जूट, सिल्क, रबर, चीनी, चाय, कॉफी, आदि।

खनिज आधारित उद्योग :- लोहा इस्पात, सीमेंट, अलमुनियम, पेट्रोकेमिकल्स, आदि।

भूमिका के आधार पर वर्गीकरण :-

आधारभूत उद्योग :- जो उद्योग अन्य उद्योगों को कच्चे माल और अन्य सामान की आपूर्ति करते हैं उन्हें आधारभूत उद्योग कहते हैं। उदाहरण: लोहा इस्पात, तांबा प्रगलन, अलमुनियम प्रगलन, आदि।

उपभोक्ता उद्योग :- जो उद्योग सीधा ग्राहक को सामान सप्लाई करते हैं उन्हें उपभोक्ता उद्योग कहते हैं। उदाहरण: चीनी, कागज, इलेक्ट्रॉनिक्स, साबुन, आदि।

पूंजी निवेश के आधार पर :-

लघु उद्योग :- जिस उद्योग में एक करोड़ रुपए तक की पूंजी का निवेश हो तो उसे लघु उद्योग कहते हैं।

बृहत उद्योग :- जिस उद्योग में एक करोड़ रुपए से अधिक की पूंजी का निवेश हो तो उसे बृहत उद्योग कहते हैं।

स्वामित्व के आधार पर :-

सार्वजनिक या पब्लिक सेक्टर :- जो उद्योग सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रबंधित होते हैं उन्हें पब्लिक सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: SAIL, BHEL, ONGC, आदि।

प्राइवेट सेक्टर :- जो उद्योग किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित संचालित होते हैं उन्हें प्राइवेट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: टिस्को, रिलायंस, महिंद्रा, आदि।

ज्वाइंट सेक्टर :- जो उद्योग सरकार और व्यक्तियों द्वारा साझा रूप से प्रबंधित होते हैं उन्हें ज्वाइंट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: ऑयल इंडिया लिमिटेड।

को-ऑपरेटिव सेक्टर :- जिन उद्योगों का प्रबंधन कच्चे माल के निर्माता या सप्लायर या कामगार या दोनों द्वारा किया जाता है उन्हें को-ऑपरेटिव सेक्टर कहते हैं। इस प्रकार के उद्योग में संसाधनों को संयुक्त रूप से इकट्ठा किया जाता। इस सिस्टम में लाभ या हानि को अनुपातिक रूप से वितरित किया जाता है। मशहूर दूध को‌-ऑपरेटिव अमूल इसका बेहतरीन उदाहरण है। महाराष्ट्र का चीनी उद्योग इसका एक और उदाहरण है। लिज्जत पापड़ भी को-ऑपरेटिव सेक्टर का एक अच्छा उदाहरण है।

कच्चे और तैयार माल की मात्रा और भार के आधार पर :-

भारी उद्योग :- लोहा इस्पात

हल्के उद्योग :- इलेक्ट्रॉनिक्स
विनिर्माण कपड़ा उद्योग :-
🔹 भारत की अर्थव्यवस्था में कपड़ा उद्योग अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के कुल औद्योगिक उत्पाद का 14% कपड़ा उद्योग से आता है। रोजगार के अवसर प्रदान करने के मामले में कृषि के बाद कपड़ा उद्योग का स्थान दूसरे नंबर पर है। इस उद्योग में 3.5 करोड़ लोगों को सीधे रूप से रोजगार मिलता है। सकल घरेलू उत्पाद में कपड़ा उद्योग का शेअर 4% है। यह भारत का इकलौता उद्योग है जो वैल्यू चेन में आत्मनिर्भर है और संपूर्ण है।

सूती कपड़ा :- 
🔹 पारंपरिक तौर पर सूती कपड़े बनाने के लिए तकली और हथकरघा का इस्तेमाल होता था। अठारहवीं सदी के बाद पावर लूम का इस्तेमाल होने लगा। किसी जमाने में भारत का कपड़ा उद्योग अपनी गुणवत्ता के लिये पूरी दुनिया में मशहूर था। लेकिन अंग्रेजी राज के समय इंगलैंड की मिलों में बने कपड़ों के आयात के कारण भारत का कपड़ा उद्योग तबाह हो गया था।
🔹 वर्तमान में भारत में 1600 सूती और सिंथेटिक कपड़े की मिलें हैं। उनमें से लगभग 80% प्राइवेट सेक्टर में हैं। बाकी की मिलें पब्लिक सेक्टर और को-ऑपरेटिव सेक्टर में हैं। इनके अलावा हजारों ऐसी छोटी-छोटी फैक्टरियाँ हैं जिनके पास चार से लेकर दस करघे हैं।
सूती कपड़ा उद्योग की अवस्थिति :-
🔹 शुरुआती दौर में यह उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात के कॉटन बेल्ट तक ही सीमित हुआ करता था। सूती कपड़ा उद्योग के लिये यह बेल्ट आदर्श था क्योंकि यहाँ कच्चे माल, बंदरगाह, यातायात के साधन, श्रम, नम जलवायु, आदि की उपलब्धता थी। यह उद्योग से कपास उगाने वालों, कपास चुनने वालों, धुनाई करने वालों, सूत की कताई करने वालों, रंगरेजों, डिजाइनर, पैकिंग करने वालों और दर्जियों को रोजगार प्रदान करता है। कपड़ा उद्योग कई अन्य उद्योगों को भी पालता है; जैसे केमिकल और डाई, मिल स्टोर, पैकेजिंग मैटीरियल और इंजीनियरिंग वर्क्स।

🔹 आज भी कताई का काम मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और तामिलनाडु में केंद्रित है। लेकिन बुनाई का काम देश के कई हिस्सों में फैला हुआ है।

🔹 भारत जापान को सूती धागे निर्यात करता है। सूती उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, पूर्वी यूरोप, नेपाल, सिंगापुर, श्रीलंका और अफ्रिकी देशों को भी निर्यात किये जाते हैं।

🔹 चीन के बाद भारत के पास स्पिंडल्स (तकुओं) की दूसरी सबसे बड़ी क्षमता है। वर्तमान में भारत में 3.4 करोड़ के आस पास स्पिंडल्स की क्षमता है। सूती धागे के विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी एक चौथाई यानि 25% है। लेकिन सूती पोशाकों के व्यवसाय में भारत का शेअर केवल 4% ही है। हमारे स्पिनिंग मिल इतने सक्षम हैं कि ग्लोबल लेवेल पर कंपीट कर सकते हैं और जो भी रेशे हम उत्पादित करते हैं उन सबकी खपत कर सकते हैं। लेकिन हमारे बुनाई, कताई और प्रक्रमण यूनिट उतने सक्षम नहीं हैं कि देश में बनने वाले उच्च क्वालिटी के रेशों का इस्तेमाल कर सकें।

सूती कपड़ा उद्योग की समस्याएँ :-
🔹 इस उद्योग की मुख्य समस्याएँ हैं बिजली की अनियमित सप्लाई और पुरानी मशीनें। इसके अलावा अन्य समस्याएँ हैं; श्रमिकों की कम उत्पादकता और सिंथेटिक रेशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा।

जूट उद्योग :-
🔹 कच्चे जूट और जूट से बने सामानों के मामले में भारत विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक है। बंगलादेश के बाद भारत जूट का दूसरे नंबर का निर्यातक है। भारत की 70 जूट मिलों में ज्यादातर पश्चिम बंगाल में हैं जो मुख्यतया हुगली नदी के किनारे स्थित हैं। जूट उद्योग एक पतली बेल्ट में स्थित है जो 98 किमी लंबी और 3 किमी चौड़ी है।
हुगली घाटी के गुण :-
🔹 हुगली घाटी के मुख्य गुण हैं; जूट उत्पादक क्षेत्रों से निकटता, सस्ता जल यातायात, रेल और सड़क का अच्छा जाल, जूट के परिष्करण के लिये प्रचुर मात्रा में जल और पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश से मिलने वाले सस्ते मजदूर।
🔹 जूट उद्योग सीधे रूप से 2.61 लाख कामगारों को रोजगार प्रदान करता है। साथ में यह उद्योग 40 लाख छोटे और सीमांत किसानों का भी भरण पोषण करता है। ये किसान जूट और मेस्टा की खेती करते हैं।

जूट उद्योग की चुनौतियाँ :-
🔹 जूट उद्योग को सिंथेटिक फाइबर से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। साथ में इसे बंगलादेश, ब्राजील, फिलिपींस, मिस्र और थाइलैंड से भी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। सरकार ने पैकेजिंग में जूट के अनिवार्य उपयोग की नीति बनाई है। इसके कारण देश के अंदर ही मांग में वृद्धि हो रही है। 2005 में नेशनल जूट पॉलिसी बनाई गई थी जिसका उद्देश्य था जूट की उत्पादकता, क्वालिटी और जूट किसानों की आमदनी को बढ़ाना। विश्व में पर्यावरण के लिये चिंता बढ़ रही है और पर्यावरण हितैषी और जैवनिम्नीकरणीय पदार्थों पर जोर दिया जा रहा है। इसलिये जूट का भविष्य उज्ज्वल दिखता है। जूट उत्पाद के मुख्य बाजार हैं अमेरिका, कनाडा, रूस, अमीरात, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया।
चीनी उद्योग :-
🔹 विश्व में भारत चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत गुड़ और खांडसारी का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में 460 से अधिक चीनी मिलें हैं; जो उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश में फैली हुई हैं। साठ प्रतिशत मिलें उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं और बाकी अन्य राज्यों में हैं। मौसमी होने के कारण यह उद्योग को‌-ऑपरेटिव सेक्टर के लिये अधिक उपयुक्त है।
🔹 हाल के वर्षों में चीनी उद्योग दक्षिण की ओर शिफ्ट कर रहा है। ऐसा विशेष रूप से महाराष्ट्र में हो रहा है। इस क्षेत्र में पैदा होने वाले गन्ने में शर्करा की मात्रा अधिक होती है। इस क्षेत्र की ठंडी जलवायु से गन्ने की पेराई के लिये अधिक समय मिल जाता है।
चीनी उद्योग की चुनौतियाँ :- 
🔹 इस उद्योग की मुख्य चुनौतियाँ हैं; इसका मौसमी होना, उत्पादन का पुराना और कम कुशल तरीका, यातायात में देरी और खोई (baggage) का अधिकतम इस्तेमाल कर पाना।
खनिज पर आधारित उद्योग :-

 लोहा इस्पात उद्योग :-

🔹 लोहा इस्त्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है क्योंकि लोहे का इस्तेमाल मशीनों को बनाने में होता है। इस कारण से स्टील के उत्पादन और खपत को किसी भी देश के विकास के सूचक के रूप में लिया जाता है।

🔹 भारत में कच्चे इस्पाद का उत्पादन 32.8 मिलियन टन है और विश्व में इसका 9वाँ स्थान है। भारत स्पॉंज लोहे का सबसे बड़ा उत्पादक है। लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत केवल 32 किग्रा प्रति वर्ष है।

🔹 अभी भारत में 10 मुख्य संकलित स्टील प्लांट हैं। इनके अलावा कई छोटे प्लांट भी हैं। इस सेक्टर में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड एक मुख्य पब्लिक सेक्टर कंपनी है। प्राइवेट सेक्टर की मुख्य कम्पनी है टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी।

🔹 भारत में ज्यादातर लोहा इस्पात उद्योग छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में केंद्रित है। इस क्षेत्र में सस्ता लौह अयस्क, उच्च क्वालिटी का कच्चा माल, सस्ते मजदूर और रेल और सड़क से अच्छा संपर्क है।

भारत में लोहा इस्पात उद्योग के खराब प्रदर्शन के कारण :-
🔹 कोकिंग कोल की सीमित उपलब्धता और ऊँची कीमत
🔹 श्रमिकों की कम उत्पादकता
🔹 अनियमित विद्युत सप्लाई
🔹 अविकसित अवसंरचना
अलमुनियम प्रगलन :-
🔹 भारत में अलमुनियम प्रगलन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धातु शोधन उद्योग है। अलमुनियम को अक्सर मिश्रधातु में बदला जाता है। अलमुनियम के मिश्रधातु का इस्तेमाल विभिन्न उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
🔹 भारत में अलमुनियम प्रगलन के आठ प्लांट हैं। ये उड़ीसा (नालको और बालको), पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तामिलनाडु में हैं। 2004 में भारत में 600 मिलियन टन अलमुनियम का उत्पादन हुआ था।
रसायन उद्योग :-
🔹 भारत के सकल घरेलू उत्पाद में रसायन उद्योग का शेअर 3% है। भारत का रसायन उद्योग का एशिया में तीसरे नम्बर पर है और विश्व में बारहवें नम्बर पर है।
अकार्बनिक रसायन :- सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड, अल्काली, सोडा ऐश और कॉस्टिक सोडा अकार्बनिक रसायन हैं। सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल उर्वरक, सिंथेटिक फाइबर, प्लास्टिक, एढ़ेसिव, पेंट और डाई बनाने में किया जाता है। सोडा ऐश का इस्तेमाल काँच, साबुन, डिटर्जेंट, कागज, आदि बनाने में होता है।
कार्बनिक रसायन :- पेट्रोकेमिकल इस श्रेणी में आता है। पेट्रोकेमिकल का इस्तेमाल सिंथेटिक फाइबर, सिंथेटिक रबर, प्लास्टिक, डाई, दवा, आदि बनाने में होता है। कार्बनिक रसायन की फैक्टरियाँ तेल रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल प्लांट के आस पास मौजूद हैं।
👉  रसायन उद्योग ही अपना सबसे बड़ा ग्राहक होता है।
उर्वरक उद्योग :-
🔹 उर्वरक उद्योग में मुख्य रूप से नाइट्रोजन युक्त उर्वरक, फॉस्फ़ेटिक उर्वरक, अमोनियम फॉस्फेट और कॉम्प्लेक्स उर्वरक का उत्पादन होता है। कॉम्प्लेक्स उर्वरक में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश का समावेश होता है। भारत के पास वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल लायक पोटाश या पोटैशियम उत्पाद के भंडार नहीं हैं। इसलिई भारत को पोटाश का आयात करना पड़ता है।
🔹 भारत नाइट्रोजन युक्त उर्वरक का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यहाँ 57 खाद कारखाने हैं जहाँ नाइट्रोजन युक्त उर्वरक और कॉम्प्लेक्स उर्वरक का उत्पादन होता है। उनमें से 29 कारखानों में यूरिया का उत्पादन होता है और 9 कारखानों में बाइप्रोडक्ट के रूप में अमोनियम सल्फेट का उत्पादन होता है। यहाँ 68 छोटे कारखाने हैं जो सिंगल सुपरफॉस्फेट बनाते हैं।
सीमेंट उद्योग :-
🔹 सीमेंट उद्योग में भारी कच्चा माल लगता है; जैसे चूना पत्थर, सिलिका, एल्यूमिना और जिप्सम। गुजरात में सीमेंट के कई कारखाने हैं क्योंकि वहाँ बंदरगाह नजदीक है।

🔹 भारत में सीमेंट के 128 बड़े और 323 छोटे कारखाने हैं।

🔹 क्वालिटी में सुधार के बाद से भारत के सीमेंट को पूर्वी एशिया, गल्फ देशों, अफ्रिका और दक्षिण एशिया में अच्छा बाजार मिल गया है। उत्पादन और निर्यात के मामले में यह उद्योग अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।
मोटरगाड़ी उद्योग :-
🔹 आज भारत में लगभग हर प्रकार की मोटरगाड़ी बनती है। 1991 की उदारवादी नीतियों के बाद कई मोटरगाड़ी कम्पनियों ने भारत में काम शुरु कर दिया। आज का भारत मोटरगाड़ी के लिए अच्छा बाजार बन गया है। अभी भारत में कार और मल्टी यूटिलिटी वेहिकल के 15 निर्माता, कॉमर्सियल वेहिकल के 9 निर्माता और दोपहिया वाहन के 15 निर्माता हैं। मोटरगाड़ी उद्योग के मुख्य केंद्र हैं दिल्ली, गुड़गाँव, मुम्बई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर, बंगलोर, सानंद, पंतनगर, आदि।
सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग :-
🔹 सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग का मुख्य केंद्र बंगलोर है। इस उद्योग के अन्य मुख्य केंद्र हैं मुम्बई, पुणे, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ और कोयम्बटूर। देश में 18 
सॉफ्टवेयर टेक्नॉलोजी पार्क हैं। ये सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों को एकल विंडो सेवा और उच्च डाटा संचार की सुविधा देते है।
🔹 इस उद्योग ने भारी संख्या में रोजगार प्रदान किये है। 31 मार्च 2005 तक 10 लाख से अधिक लोग सूचना प्रौद्योगिकी में कार्यरत हैं। हाल के वर्षों में बीपीओ में तेजी से वृद्धि हुई है। इसलिये इस सेक्टर से विदेशी मुद्रा की अच्छी कमाई होती है।
औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण :-

🔹 यद्यपि उद्योगों की हमारी अर्थ व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है पर यह प्रदूषण को भी बढावा देते है  
वायु प्रदूषण :- अधिक अनुपात में गैसों की उपस्थिति सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड वायु प्रदूषण का कारण है वायु में निलंबित कणनुमा पदार्थ , घूले , स्प्रे , कुहासा तथा धुआँ वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य पशुओं पौधों , इमारत तथा पूरे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव डालती है  
जल - प्रदूषण :- उद्योगों द्वारा कार्बनिक तथा अकार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों के नदी में छोडने से जल प्रदूषण फैलता है कुछ उद्योग है जो रंग अपमार्जक अम्ल , लवण तथा भारी धातुएँ , कृत्रिम रसायन आदि जल में वांछित करते है  
तापीय प्रदूषण :- परमाणु ऊर्जा संयत्रों के अपशिष्ट परमाणु शस्त्रा उत्पादक कारखानों से केंसर जन्मजात विकार तथा अकाल प्रसव जैसी बिमारियां होती है  
ध्वनि प्रदूषण :- ध्वनि प्रदूषण से खिन्नता तथा उत्तेजना ही नही बरन् श्रवण असक्षमता , हदयगति , रक्तचाप तथा अन्य कायिक व्यथाएँ भी बढ़ती है  
उद्योग द्वारा पर्यावरण को होने वाले नुकसान की रोकथाम :-
🔹 जल का पुन : चक्रीकरण होना चाहिए। जल के पुन:चक्रीकरण से ताजे पानी के इस्तेमाल को कम किया जा सकता है।
🔹 वर्षाजल संग्रहण पर जोर देना चाहिए।
🔹 गरम पानी और अपशिष्टों को समुचित उपचार के बाद ही नदियों और तालाबों में छोड़ना चाहिए।

अध्याय - 7

 राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ

परिवहन के साधन :-

🔹 वे साधन जो मनुष्य को तथा सामन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं परिवहन के साधन कहलाते हैं | ( example : रेल , जल परिवहन वायु परिवहन

संचार के साधन :- वे साधन जो सूचना , समाचार और संवाद को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं संचार के साधन कहलाते हैं |

परिवहन के साधन :-

स्थल :-

👉 सड़क 

👉 रेल 

👉 पाइपलाइन

जल :-

👉 आंतरिक

👉  समुद्री

वायु :-

👉 घरेलु ( निजी / सार्वजानिक )

👉 अन्तराष्ट्रीय

सड़क परिवहन :-

🔹 भारत में सड़कों का जाल आज दुनिया के विशाल सड़क नेटवर्कों में से एक है। भारत में कुल 2.3 मिलियन किलोमीटर सड़क है। निर्माण और रखरखाव के मामले में रेल की तुलना में सड़कें बेहतर होती हैं। रेल परिवहन की तुलना में सड़क परिवहन का महत्व बढ़ रहा है। इसके कारण निम्नलिखित हैं:

🔹 रेल की तुलना में सड़कें बनाने की लागत कम पड़ती है।

🔹 सड़कें ऊबड़-खाबड़ और विछिन्न भूभागों पर भी बनाई जा सकती हैं।

🔹 सड़कों का निर्माण अधिक ढ़ाल वाले क्षेत्रों और पहाड़ियों पर भी आसानी से किया जा सकता है।

🔹 कम लोगों तथा कम सामान को छोटी दूरी तक पहुँचाने के लिये सड़क मार्ग से जाने में कम खर्चा पड़ता है।

🔹 सड़कों के कारण घर-घर तक सामान और सेवाएँ पहुँचाना संभव हो पाता है।

🔹 स‌ड़क परिवहन से परिवहण के अन्य साधनों तक कड़ी का काम किया जा सकता है।

भारत में सड़कों के प्रकार :-
भारत में सड़कों की क्षमता के आधार पर इन्हें : प्रकारों में बाँटा गया है:
स्वर्णिम चतुर्भुज महाराजमार्ग :- 
🔹 यह 6 लेन वाली महाराजमार्ग की सड़क परियोजना है जो दिल्ली-कोलकाता-चेन्नई-मुम्बई और दिल्ली को जोड़ती है। उत्तर दक्षिण कॉरिडोर श्रीनगर और कन्याकुमारी को आपस में जोड़ता है। पूर्व पश्चिम कॉरिडॉर सिलचर और पोरबंदर को आपस में जोड़ता है। इस सुपर हाइवे प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य है भारत के बड़े शहरों के बीच की दूरी को कम करना। इस परियोजना को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा कार्यरूप दिया जा रहा है।
राष्ट्रीय राजमार्ग :-
🔹 राष्ट्रीय राजमार्ग भारत के सुदूर हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग देश की मुख्य सड़क प्रणाली बनाते हैं। इन्हें सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट द्वारा बनाया और मेंटेन किया जाता है।
राज्य राजमार्ग :-
🔹 राज्य राजमार्ग के तहत वो सड़कें आती हैं जो किसी भी राज्य की राजधानी को विभिन्न जिला मुख्यालयों से जोड़ती हैं। इन्हें स्टेट पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट द्वारा बनाया और मेंटेन किया जाता है।
जिला मार्ग :-
🔹 जिला मुख्यालय को जिले के अन्य भागों से जोड़ने वाली सड़कों को जिला मार्ग कहते हैं। इन सड़कों का निर्माण और रखरखाव जिला परिषद द्वारा किया जाता है।
अन्य सड़कें :- 
🔹 ग्रामीण सड़कें इस श्रेणी में आती हैं। प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत इन सड़कों के निर्माण में तेजी आई है। इस योजना को इस उद्देश्य से शुरु किया गया था ताकि देश का हर गाँव पक्की सड़क से किसी मुख्य शहर से जुड़ सके।
सीमांत सड़कें :-
🔹 सीमा पर स्थित सड़कों को इस श्रेणी में रखा गया है। इनका निर्माण और रखरखाव बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन द्वारा किया जाता है। इस संस्था का गठन 1960 में किया गया था ताकि सीमा पर स्थित पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में सामरिक महत्व की सड़कें बन सकें। सीमांत सड़कों ने दुर्गम इलाकों के लोगों का जीवन आसान बना दिया है।
सड़क घनत्व :-
🔹 प्रति 100 वर्ग किमी में उपलब्ध सड़क की लंबाई को सड़क घनत्व कहते हैं। हमारे देश में हर तरह की भौगोलिक संरचना पाई जाती है। इसलिये यहाँ सड़कों का फैलाव एक जैसा नहीं है। एक ओर जम्मू कश्मीर में सड़क घनत्व 10 किमी प्रति वर्ग किमी है तो दूसरी ओर केरल में यह आँकड़ा 375 किमी है। 1996 – 97 के आँकड़ों के अनुसार पूरे देश का सड़क घनत्व 75 किमी है।
🔹 आज भी भारत में सड़क परिवहन यहाँ कि जरूरतों को पूरा करने के लिये काफी नहीं है। विशाल जनसंख्या के हिसाब से सड़कों का जाल काफी नहीं है। आधे से अधिक सड़कें कच्ची हैं। शहरों में तंग और भीड़-भाड़ भरी सड़कें हैं। अधिकतर पुल और पुलिया पुराने हो गये हैं और संकरे हैं।
रेल परिवहन :-
🔹 हमारे देश में लोगों और माल ढ़ुलाई के लिये रेल ही मुख्य साधन है। रेल से लंबी दूरी तक माल ढ़ुलाई आसानी से होती है। रेल ने व्यवसाय, पर्यटन, तीर्थयात्रा को भी बढ़ावा दिया है। रेल भारत के लोगों की आर्थिक जिंदगी को एक धागे में पिरोने का काम करता है। यह कृषि और उद्योग के विकास में भी मददगार साबित हुआ है।
🔹 भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक सेक्टर का उपक्रम है। भारत में पहली रेल मुम्बई से ठाणे के बीच 1853 में चली थी।
रेल नेटवर्क :- 
🔹 भारतीय रेल तंत्र में 7,031 स्टेशन हैं जो 63,221 किमी के लंबे जाल में फैले हुए हैं। 31 मार्च 2004 के आँकड़ों के अनुसार भारतीय रेल के पास 7817 इंजन, 5321 पैसेंजर सेवा वाहन, 4,904 अन्य कोच वाहन और 228,170 वैगन हैं।
रेल का विकास :-
🔹 भारतीय रेल को 16 जोन में बाँटा गया है। भारत में रेल का विकास यहाँ की भौगोलिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के प्रभाव में हुआ है।
🔹 उत्तर भारत के मैदानों की समतल जमीन, अत्यधिक जनसंख्या घनत्व और कृषि संसाधनों की प्रचुरता ने रेल के विकास के लिये अनुकूल स्थिति प्रदान की। इस इलाके में चौड़ी नदियों की भरमार भी है। इसलिये यहाँ पुल बनाने की चुनौतियाँ भी आईं।
🔹 पहाड़ी इलाकों ने नीची पहाड़ियों और सुरंगों से होकर रेल लाइनें बिछाई गईं। हिमालय के पहाड़ों में दुर्गम क्षेत्र, कम जनसंख्या और आर्थिक अवसरों की कमी है। इसलिये इस क्षेत्र में रेल लाइन बिछाना संभव नहीं हो पाया है।
🔹 राजस्थान के रेगिस्तान, गुजरात के दलदली भाग, तथा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड के जंगलों में रेल लाइन बिछाना संभव नहीं हो पाया है। सहयाद्रि के क्षेत्र को घाटों या दर्रों से होकर पार करना ही संभव था। हाल के वर्षों में सहयाद्रि क्षेत्र में कोंकण रेलवे का निर्माण हुआ है। इससे इस क्षेत्र में यात्रियों के आवागमन और माल ढ़ुलाई में बहुत सुविधा हुई है।
🔹 आज परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में रेल का महत्व भारत की अर्थव्यवस्था के लिये अधिक बढ़ गया है। लेकिन रेल परिवहन की अपनी कई समस्याएँ हैं। अभी भी कई यात्री बिना टिकट यात्रा करते हैं। रेल संपत्ति को नुकसान और चोरी एक गंभीर समस्या है। कई लोग बिना कारण के जंजीर खींचकर ट्रेन को रोक देते हैं। इन सबसे रेलवे को भारी नुकसान होता है।
पाइपलाइन :-
🔹 कुछ वर्षों पहले तक पाइपलाइन का उपयोग केवल पानी की सप्लाई के लिये किया जाता है। अब पाइपलाइन का उपयोग कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद और प्राकृतिक गैस की सप्लाई के लिये भी होने लगा है। कुछ ठोस पदार्थों को स्लरी के रूप में पाइपलाइन से सप्लाई किया जाता है। बरौनी, मथुरा और पानीपत जैसे स्थानों पर तेल रिफाइनरी का निर्माण पाइपलाइन के कारण ही संभव हो पाया। अज गैस पर आधारित उर्वरक प्लांट पाइपलाइन के कारण ही बन पाये हैं। पाइपलाइन को बिछाने में बहुत अधिक खर्च आता है। लेकिन पाइपलाइन को चलाने में कम से कम खर्चा आता है। इससे परिवहन में होने वाली देरी और नुकसान से भी बचा जा सकता है।

भारत में पाइपलाइन के तीन मुख्य नेटवर्क हैं :-

👉 ऊपरी असम से गुवाहाटी होते हुए कानपुर, बरौनी और इलाहाबाद तक। इसकी बरौनी से राजबंध होते हुए हल्दिया तक, राजबंध से मौरीग्राम तक, और गुवाहाटी से सिलिगुड़ी तक शाखाएँ भी हैं।

👉 गुजरात के सलाया से वीरमगाँव, मथुरा, दिल्ली और सोनीपत से होते हुए पंजाब के जलंधर तक। इसकी शाखाएँ कोयली और चक्शु तक जाती हैं।

👉 गुजरात के हजीरा से निकलने वाली गैस पाइपलाइन मध्य प्रदेश के विजयपुर से होते हुए उत्तर प्रदेश के जगदीशपुर को जोड़ती है। इसकी शाखाएँ राजस्थान के कोटा और उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर, बबराला और अन्य स्थानों तक जाती हैं।

जल परिवहन :-

🔹 यह परिवहन का सबसे सस्ता साधन है। जल परिवहन भारी और विशाल सामान को ले जाने के लिये अत्यंत उपयुक्त है। इसमें ईंधन की कम खपत होती है और यह पर्यावरण हितैषी भी है। भारत में अंत: स्थलीय नौचालन मार्ग 14,500 किमी लंबा है। लेकिन इसमें से केवल 3,700 किमी मोटरचालित बोट के लायक हैं।

निम्नलिखित जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है :

👉 इलाहाबाद और हल्दिया के बीच की गंगा का मार्ग (1620 किमी): नौगम्य जलमार्ग संख्या 1

👉 सदिया और धुबरी के बीच ब्रह्मपुत्र का मार्ग (891 किमी): नौगम्य जलमार्ग संख्या 2

👉 केरल का पश्चिम तटीय नहर ((कोट्टापुरमा से कोम्मान तक, उद्योगमंडल और चम्पक्कारा नहरें: 205 किमी): नौगम्य जलमार्ग संख्या 3

👉 गोदावरी, कृष्णा, सुंदरबन, बराक, बकिंघम कैनाल, ब्राह्मणी, पूर्व-पश्चिम नहर और दामोदर घाटी नहर का नाम अन्य सक्षम जलमार्गों की श्रेणी में आता है। 

प्रमुख समुद्री पत्तन :-

🔹 भारत की तटरेखा 7,516.6 किमी लंबी है। इसमें 12 प्रमुख और 181 मध्यम और छोटे पत्तन हैं। देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का 95% प्रमुख पत्तनों से संचालित होता है। विभाजन के बाद कराची पत्तन भारत के पास से निकल गया। इसलिए मुम्बई के प्त्तन पर लोड हटाना जरूरी हो गया था। इसलिये आजादी के तुरंत बाद कच्छ में कांडला के पत्तन को विकसित किया गया। कांडला का पत्तन एक ज्वारीय पत्तन है। यह जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के औद्योगित और खाद्यान्न निर्यात और आयात को सुचारू तरीके से संचालित करता है।

🔹 मुंबई एक विशाल पत्तन है जहाँ प्राकृतिक रूप से खुले और बड़े हार्बर हैं। मुम्बई के पत्तन पर से भीड़ कम करने के लिए पास में ही जवाहरलाल नेहरू पत्तन का निर्माण किया गया। गोवा का मारमागाओ पत्तन लौह अयस्क के निर्यात के लिए एक अग्रणी पत्तन है। इस पत्तन से भारत के लौह अयस्क के निर्यात का 50% हिस्सा संचालित होता है।

🔹 कर्नाटक के न्यू मंगलोर पत्तन से कुद्रेमुख की खानों से निकलने वाला लौह अयस्क निर्यात होता है। कोची का पत्तन सुदूर दक्षिण पश्चिम में है जो लैगून के मुहाने पर स्थित है और जहाँ प्राकृतिक हार्बर है।

🔹 पूर्वी तट पर तामिलनाडु का तूतीकोरन पत्तन है। यहाँ एक प्राकृतिक हार्बर है और आस पास के इलाके समृद्ध हैं। इसलिये यहाँ से श्रीलंका, मालदीव और भारत के तटीय इलाकों के लिये विविध प्रकार के वस्तुओं का व्यापार संचालित होता है।

🔹 चेन्नई का पत्तन सबसे पुराने कृत्रिम पत्तनों में से एक है। व्यापार की मात्रा और माल ढ़ुलाई के मामले में इसका स्थान मुम्बई के बाद दूसरा है।

🔹 विशाखापत्तनम जमीन से घिरा हुआ, गहरा और सुरक्षित पत्तन है। इस पत्तन का निर्माण मूल रूप से लौह अयस्क के निर्यात के लिए किया गया था।

🔹 उड़ीसा का पारादीप पत्तन विशेषत: लौह अयस्क का निर्यात करता है।

कोलकाता में एक अंत:स्थलीय नदी पत्तन है। इस पत्तन से गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानों का समृद्ध इलाका जुड़ा हुआ है। एक ज्वारीय पत्तन होने के कारण इस पत्तन में हुगली के तलछट के जमाव को नियमित रूप से साफ करना पड़ता है। कोलकाता के पत्तन पर से भीड़ हटाने के उद्देश्य से हल्दिया के पत्तन का निर्माण हुआ था।

वायु परिवहन :-

🔹 1953 में वायु परिवहन का राष्ट्रीकरण हुआ था। उससे पहले वायु परिवहण केवल निजी कंपनी के हाथों में था। भारत में अंतर्देशीय उड़ानों की सेवा एअर इंडिया, एलायंस एअर और कुछ निजी सेक्टर के एअरलाइन द्वारा सेवा प्रदान की जाती है। एअर इंडिया अंतर्राष्ट्रीय उड़ान की सेवा भी देती है। पवनहंस हेलिकॉप्टर लिमिटेड ऑयल ऐंड नैचुरल गैस कमिशन को और उत्तरी और पूर्वोत्तर राज्यों के दुर्गम इलाकों के लिये हेलिकॉप्टर सेवा प्रदान करती है।

🔹 वायु परिवहन से दुर्गम इलाकों; जैसे ऊँचे पहाड़, कठिन रेगिस्तान, घने जंगल और दूर दराज के द्वीपों तक भी आसानी से पहुँचा जा सकता है।

संचार सेवाएँ :-

🔹 भारत में टेलिविजन, रेडियो, प्रेस, फिल्मों, टेलिफोन, आदि द्वारा निजी दूरसंचार और जनसंचार की सुविधा उपलब्ध है।

भारतीय डाक :- भारतीय डाक सेवा का नेटवर्क दुनिया में सबसे बड़ा है। डाक से पार्सल और चिट्ठियाँ भेजी जाती हैं। कार्ड और लिफाफों को फर्स्ट क्लास मेल माना जाता है और उन्हें हवाई जहाज से भेजा जाता है। बुक पैकेट, अखबार और पत्रिकाओं को सेकंड क्लास मेल का दर्जा दिया जाता है। उन्हें भू परिवहन और जल परिवहन द्वारा भेजा जाता है। बड़े शहरों और महानगरों में तेजी से डाक पहुँचाने के लिए हाल ही में : चैनलों की शुरुआत की गई है। इन चैनलों के नाम हैं; राजधानी चैनल, मेट्रो चैनल, ग्रीन चैनल, बिजनेस चैनल, बल्क मेल चैनल और पीरियोडिकल चैनल।

टेलिफोन :- भारत का टेलिफोन नेटवर्क एशिया के बड़े नेटवर्कों में से एक है। जमीनी स्तर से लेकर उँचे स्तर तक सूचना के प्रसारण को सुलभ बनाना जरूरी होता है। इसी उद्देश्य से सरकार ने देश के हर गाँव में 24 घंटे एसटीडी सुविधा देने का प्रावधान किया है। पूरे भारत में एसटीडी की कॉल की दरें एक समान हैं। यह सब स्पेस टेक्नॉलोजी और कम्युनिकेशन टेक्नॉलोजी में परस्पर तालमेल के कारण संभव हो पाया है।
मोबाइल टेलिफोन :- भारत का मोबाइल नेटवर्क दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल फोन ने भारत में बिजनेस करने के तरीके बदल दिये हैं। अब तो छोटे कारोबारी भी मोबाइल फोन से जुड़े होने के कारण बेहतर व्यवसाय कर पा रहे हैं।
जनसंचार :- जनसंचार से लोगों का मनोरंजन करता है और उन्हें सरकार की योजनाओं और क्रियाकलापों के बारे में जानकारी देता है। रेडियो, टेलिविजन, अखबार, पत्रिका, किताब और फिल्म जनसंचार के साधन हैं। आकाशवाणी से विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। ये कार्यक्रम विभिन्न क्षेत्रीय और स्थानीय भाषाओं में होते हैं और पूरे भारत में फैले विविध प्रकार के लोगों तक पहुँचते हैं। भारत का राष्ट्रीय टेलिविजन चैनल; दूरदर्शन; विश्व के कुछ बड़े नेटवर्क में से एक है। दूरदर्शन पर मनोरंजन, शिक्षा, खेलकूद, आदि से संबंधित कई प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। इनके अलावा भारत में कई प्राइवेट टेलिविजन चैनल और रेडियो चैनल हैं।
समाचारपत्र :- भारत में भारी संख्या में अखबार और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। भारत में लगभग 100 भाषाओं और बोलियों में अखबार निकलते हैं। हिंदी भाषा में सबसे अधिक अखबार प्रकाशित होते हैं। उसके बाद अंग्रेजी और उर्दू अखबारों का नम्बर आता है।
फिल्म :- पूरे विश्व में भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं। भारत में फीचर फिल्म, लघु फिल्म और वृत्त चित्र बनते हैं। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन भारतीय और विदेशी फिल्मों को सर्टिफाई करने का काम करता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार :-
🔹 दो देशों के बीच के व्यापार को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं। किसी भी देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से उस देश की समृद्धि का आकलन किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को देश की अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर भी माना जाता है।
निर्यात :- जब सामान देश से बाहर व्यापार के लिये जाता है तो इसे निर्यात कहते हैं।
आयात :- जब बाहर का सामान देश में व्यापार के लिये आता है तो इसे आयात कहते हैं।
व्यापार संतुलन :- किसी भी देश के निर्यात और आयात में अंतर को व्यापार संतुलन कहते हैं। व्यापार संतुलन अनुकूल होने की स्थिति में आयात की तुलना में निर्यात अधिक होता है। व्यापार संतुलन प्रतिकूल होने की स्थिति में निर्यात की तुलना में आयात अधिक होता है।
🔹 एक समूह के तौर पर भारी वस्तुओं के आयात में वृद्धि हुई है और इसका शेअर कुल आयात का 39.09% है। इस समूह में उर्वरक (67.01%), अनाज (25.23%), खाद्य तेल (7.94%) और न्यूजप्रिंट (5.51%) आते हैं।
🔹 पिछले पंद्रह सालों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में जबरदस्त बदलाव आया है। अब वस्तुओं के आदान प्रदान की तुलना में सूचना, ज्ञान और प्रौद्योगिकी का आदान प्रदान अधिक बढ़ गया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज भारत एक सॉफ्टवेअर महाशक्ति के रूप में जाना जाता है।

पर्यटन: एक व्यापार के रूप में :-
🔹 2003 की तुलना में 2004 में विदेशी पर्यटकों की संख्या में 23.5% की वृद्धि हुई थी। इससे विदेशी मुद्रा भंडार में 21,828 करोड़ रुपये आये। भारत में हर वर्ष 2.6 मिलियन विदेशी पर्यटक आते हैं। पर्यटन उद्योग में 15 मिलियन लोग सीधे तौर पर लगे हुए हैं।
पर्यटन से लाभ :-
🔹 यह राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा देता है।
🔹 यह स्थानीय हस्तकला और संस्कृति को बढ़ावा देता है।
🔹 पर्यटन के द्वारा दूसरे देशों के लोग हमारी संस्कृति और विरासत को समझ पाते हैं।

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